आत्मा की खोज: बाहर नहीं, भीतर

जिस प्रकार तिलों में तेल छिपा होता है, दही में घी विद्यमान होता है, सूखी नदी की रेत के नीचे जल होता है और अरणि काष्ठ में अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा और आत्मा का सत्य हमारे भीतर ही विद्यमान है। उसे सत्याचरण और तप के द्वारा अनुभव किया जा सकता है।

🌿 आत्मा की खोज: बाहर नहीं, भीतर

मंत्र:

तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिरापः स्रोतःसु अरणीषु चाग्निः।
एवमात्मात्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति॥

श्वेताश्वतर उपनिषद्

भावार्थ

जिस प्रकार तिलों में तेल छिपा होता है, दही में घी विद्यमान होता है, सूखी नदी की रेत के नीचे जल होता है और अरणि काष्ठ में अग्नि छिपी रहती है, उसी प्रकार परमात्मा और आत्मा का सत्य हमारे भीतर ही विद्यमान है। उसे सत्याचरण और तप के द्वारा अनुभव किया जा सकता है।

मनुष्य की सबसे बड़ी भूल

मनुष्य जीवनभर सुख, शांति, प्रेम और परमात्मा को बाहर खोजता रहता है। कभी धन में, कभी पद में, कभी संबंधों में, कभी तीर्थों में। परंतु उपनिषद् कहता है कि जिसे तुम बाहर खोज रहे हो, वह तुम्हारे अपने अस्तित्व की गहराइयों में ही छिपा हुआ है।

तेल तिल के बाहर नहीं मिलता, घी दही के बाहर नहीं मिलता और अग्नि लकड़ी के बाहर नहीं मिलती। उसी प्रकार आत्मज्ञान भी बाहरी संसार में नहीं, बल्कि अंतर्मन में प्राप्त होता है।

सत्य और तप का महत्व

मंत्र स्पष्ट कहता है—

"सत्येनैनं तपसा योऽनुपश्यति"

अर्थात् सत्य और तप के द्वारा ही उस परम सत्य का दर्शन होता है।

यहाँ तप का अर्थ केवल उपवास या शरीर को कष्ट देना नहीं है, बल्कि—

  • इन्द्रिय संयम,
  • मन की शुद्धि,
  • विचारों की पवित्रता,
  • और सत्य के प्रति निष्ठा है।

जब मनुष्य का अंतःकरण निर्मल होता है, तब आत्मा का प्रकाश स्वयं प्रकट होने लगता है।

आत्मा का अनुभव

आत्मा कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे आँखों से देखा जाए। वह अनुभव का विषय है। जैसे फूल की सुगंध को केवल अनुभव किया जा सकता है, वैसे ही आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार भी अनुभव का विषय है।

महर्षियों ने कहा है—

"यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह"

जहाँ वाणी और मन भी नहीं पहुँच सकते, उस सत्य को केवल अनुभूति से जाना जा सकता है।

आज की आवश्यकता

आज मनुष्य बाहरी उपलब्धियों में इतना उलझ गया है कि स्वयं को ही भूल बैठा है। उपनिषद् हमें भीतर लौटने का आह्वान करता है। आत्मचिंतन, सत्य और साधना के द्वारा हम उस दिव्य चेतना को पहचान सकते हैं जो सदैव हमारे भीतर विद्यमान है।

निष्कर्ष

तेल तिल में है, घी दही में है, अग्नि अरणि में है और परमात्मा हमारे अपने हृदय में है। आवश्यकता केवल उसे खोजने की नहीं, बल्कि स्वयं को उसके योग्य बनाने की है।

जो स्वयं के भीतर उतरना सीख लेता है, उसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का रहस्य प्राप्त हो जाता है।

"परमात्मा कहीं बाहर नहीं है; वह तुम्हारी आत्मा की गहराइयों में प्रतीक्षा कर रहा है।" 🙏🌿

   🔥 कोई वस्तु परमात्मा से मांगने से पहले उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए उसके अनुसार प्रयत्न करना आवश्यक है । विधार्थी परमात्मा से प्रार्थना करे कि वह उसे परीक्षा में पास कर दे , तो विधार्थी का कर्तव्य है कि वह परीक्षा की तैयारी पूरी मेहनत से करे । 

    हम ईशवर से प्रार्थना करे कि वह हमें तीक्ष्ण बुद्धि दे तो उस के लिए हमें भी ऐसे यत्न करने चाहिए जिससे बुद्धि तीक्ष्ण हो - खान, पान, ब्रहचर्य का पालन, अच्छी- अच्छी पुस्तकों का पढ़ना आदि ।यदि हम स्वयं प्रयत्न न करे और ईशवर से मांगते रहें तो हमें कुछ नहीं मिलेगा । जो ईशवर के सहारे आलसी बन कर बैठे रहते है , उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता , क्योंकि ईशवर की पुरूषार्थ करने की आज्ञा है ।

   ईशवर उसी की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करता है जो बैठा हुआ गुड़-गुड़ करता रहे, उसे गुड़ प्राप्त नहीं होता ।जो उस के लिए प्रयास करता है उसे कभी न कभी गुड़ अवश्य ही मिल जाता है ।

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   तिलेषु तैलं दधिनीव सर्पिराप: स्रोत: सु अरणीषु चाग्नि:। एवमात्मात्मनि गृहाते ऽसौ सत्येनैनं तपसयोऽ नुपश्यति ।। ( श्वेताश्वतर उपनिषद् )

   💐अर्थ :-  जैसे तिलों में तेल , दही में घी, झरणों मे पानी और अरणी नाम की लकड़ी में आग रहती है । और तिलों को पीलने से, दही को बिलोने से , और अरणीयों को रगड़ने से ये प्रकट होते है ।वैसे ही जीवात्मा में परमात्मा रहता है और वह वहीं मिलता है ।सत्य और तप से उसे जाना जा सकता है ।

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