प्रश्न - ईश्वर सृष्टि की रचना क्यों करता है?
उत्तर - परमात्मा, जीवात्मा और और प्रकृति ये तीनों तत्व अनादि है , अन्त रहित , अविनाशी है अर्थात् ये तीनों तत्व कभी जन्म नहीं लेते और ना ही कभी नष्ट होते है ।परमात्मा अपने सामर्थ्य से सृष्टि के सब स्थूल जगत् को उत्पन्न करता है और प्रलय के समय सबको सूक्ष्म कारण में लीन करता है। जीवात्मा के लिए स्थूल जगत में स्थूल शरीर मुक्ति का साधन है ।जीवात्माओं की भलाई के लिए उन पर उपकार करते हुए ईश्वर प्रकृति से सृष्टि का निर्माण अपने ज्ञान से करता है।
क्योंकि जीवात्मा अल्पज्ञ है उसे थोड़ा सा ही ज्ञान है , ईश्वर सर्वज्ञ है- सम्पूर्ण है, तो फिर वह सृष्टि की रचना क्यों न करें? ईश्वर अपने अमृत- सन्तानों को फल प्रदान क्यों न करें? इसमें स्वयं ईश्वर की योग्यता भी सफल होती है । ईश्वर आनन्दस्वरूप है अत: आनन्द किसमें बांटेगा? सृष्टि निर्माण में ही तीनों अनादि तत्वों की सार्थकता प्रकट होती है। सृष्टि न करने में तीनों ही का कोई उपयोग नही हो सकता।
सृष्टि में ही जीवात्माओं को दुखों से छूटकर मोक्ष अर्थात् सुखों की प्राप्ति होती है। कर्मों के फलस्वरूप प्रकृति (सृष्टि) ही भोग प्रदान करती है और ईश्वरीय आनन्द को प्राप्त कराने में में भी सहायता करती है ।अत: भोग और योग का साधन प्रकृति ही सृष्टि ही बनाती है और जीवात्मा को अपने परम लक्ष्य (मोक्ष ) तक पहुँचाने के लिए सृष्टि- निर्माण परम आवश्यक है।
🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷ओ३म् येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनु: समिद्धाग्निर्मनसा सप्तमी होतृभि। त आदित्याँ अभयं शर्मा यच्छत सुखा न: कर्त्तव्य सुपथा स्वस्तये। ( ऋग्वेद)
💐 जिनके विद्वानों के लिए अग्नि, सूर्य आदि तेज के प्रकाशक ज्ञानवान परमेश्वर ने मन के सात यज्ञों को करने वाले, वरने योग्य वेद वाणी को यथाविधि दिया था , उस भजनीय परमैश्वर्यवान का हम कल्याण के लिए आह्वान करते हैं।
मंत्र का भावार्थ एवं वैदिक विवेचन
मंत्र
ॐ येभ्यो होत्रां प्रथमामायेजे मनुः समिद्धाग्निर्मनसा सप्त होतृभिः।
त आदित्या अभयं शर्म यच्छत सुगा नः कर्त सुपथा स्वस्तये॥(ऋग्वेद)
पद-पदार्थ
- येभ्यः = जिनके लिए, जिन दिव्य शक्तियों के निमित्त
- होत्राम् प्रथमाम् = प्रथम यज्ञ, श्रेष्ठ उपासना
- आयेजे = सम्पन्न की, आरम्भ की
- मनुः = मननशील मानव, आदिपुरुष मनु
- समिद्ध-अग्निः = प्रज्वलित अग्नि, जागृत ज्ञान एवं उत्साह
- मनसा = मन से, एकाग्र चित्त से
- सप्त होतृभिः = सात होताओं (इन्द्रियों, प्राणों अथवा यज्ञ के सात कर्ताओं) के साथ
- ते आदित्याः = वे आदित्य, अर्थात् दिव्य गुणों वाले, न्यायकारी, प्रकाशमय परमात्मा के स्वरूप
- अभयम् = निर्भयता
- शर्म = सुख, शरण, कल्याण
- यच्छत = प्रदान करें
- सुगा नः कर्त = हमारा मार्ग सुगम करें
- सुपथा = उत्तम मार्ग से
- स्वस्तये = कल्याण के लिए
सरल भावार्थ
जिन दिव्य शक्तियों के निमित्त मनु ने जागृत ज्ञानरूपी अग्नि के साथ, एकाग्र मन से और यज्ञ के समस्त साधनों द्वारा प्रथम यज्ञ का अनुष्ठान किया था, वे आदित्यगण (कल्याणकारी दिव्य शक्तियाँ) हमें निर्भयता, सुख और संरक्षण प्रदान करें तथा हमारे कल्याण के लिए हमें उत्तम और सरल मार्ग पर चलाएँ।
वैदिक दृष्टि से व्याख्या
यह मंत्र मानव जीवन में यज्ञ, ज्ञान, मनन और सत्कर्म के महत्व को दर्शाता है।
यहाँ मनु केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मननशील मानवता का प्रतीक है। मनु ने यज्ञ किया, अर्थात् अपने जीवन को ईश्वर, समाज और सत्य के लिए समर्पित किया। यज्ञ का वास्तविक अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि अपने श्रेष्ठ कर्मों, ज्ञान और पुरुषार्थ को लोककल्याण में लगाना है।
"समिद्धाग्निः" का अर्थ है प्रज्वलित अग्नि। वैदिक भाषा में यह ज्ञान, विवेक, उत्साह और आध्यात्मिक चेतना का भी प्रतीक है। जब मनुष्य का अंतःकरण ज्ञान से प्रकाशित होता है, तभी वह जीवन के यज्ञ को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकता है।
"सप्त होतृ" का संकेत
वैदिक विद्वान इसके अनेक अर्थ करते हैं—
- पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ + मन + बुद्धि
- अथवा यज्ञ के सात प्रमुख कर्ता
- अथवा सात प्रकार की जीवन-शक्तियाँ
भाव यह है कि मनुष्य को अपनी समस्त शक्तियों को एकत्र करके सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए।
गुरु और गुरुडम के संदर्भ में
यह मंत्र बताता है कि कल्याण का मार्ग ज्ञान, यज्ञ, मनन और ईश्वर-उपासना है।
मनु ने किसी व्यक्ति-विशेष की पूजा नहीं की, बल्कि सत्य और धर्म का अनुसरण किया। इसलिए वैदिक परम्परा में गुरु का कार्य मनुष्य को "सुपथा" अर्थात् श्रेष्ठ मार्ग पर चलाना है।
सच्चा गुरु कहता है—
"वेद को पढ़ो, सत्य को जानो, ईश्वर को समझो और जीवन को यज्ञमय बनाओ।"
जबकि गुरुडम व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द बाँध देता है और स्वतंत्र विचार की क्षमता को कम कर देता है।
ऋषि यहाँ दिव्य शक्तियों से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे हमें सुपथा पर चलाएँ, किसी व्यक्ति-पूजा के मार्ग पर नहीं।
जीवनोपयोगी शिक्षा
- जीवन को यज्ञमय बनाना ही वास्तविक धर्म है।
- ज्ञानरूपी अग्नि को सदैव प्रज्वलित रखना चाहिए।
- मन, बुद्धि और इन्द्रियों को सत्कर्म में लगाना चाहिए।
- निर्भयता और सुख धर्माचरण से प्राप्त होते हैं।
- ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें सदैव सही मार्ग पर चलाए।
निष्कर्ष
यह मंत्र मानव जीवन के लिए एक महान प्रार्थना है। इसमें ऋषि ईश्वर से धन, वैभव या भोग नहीं माँगते, बल्कि निर्भयता, कल्याण और सत्य मार्ग का निर्देशन माँगते हैं। जो व्यक्ति ज्ञानरूपी अग्नि को प्रज्वलित रखकर अपने जीवन को यज्ञमय बनाता है, वह स्वयं भी सुखी होता है और समाज के लिए भी कल्याणकारी बनता है।
"हे आदित्य स्वरूप परमात्मन्! हमें निर्भयता, कल्याण और सत्य के उत्तम मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करें।" ॥ ॐ ॥

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