अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २५ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ
उत्तुदस्त्वोत्तुदतु मा धृथाः शयने स्वे ।
इषुः कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि ॥१॥
०३।०२५।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: [हे अविद्या !] (उत्तुदः) तेरा उखाड़नेवाला [विद्वान्] (त्वा) तुझको (उत् तुदतु) उखाड़ दे। (स्वे शयने) अपने शयन स्थान [हृदय] में (मा धृथाः) मत ठहर। (कामस्य) सुकामना का (या) जो [तेरे लिये] (भीमा) भयानक (इषुः) तीर है, (तया) उससे (त्वा) तुझको (हृदि) हृदय में (विध्यामि) बेधता हूँ ॥१॥
भावार्थः सब स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्यादि तपोबल द्वारा अविद्या को हृदय से मिटावें, जैसे शूर वीर योद्धा शत्रु सेना को अस्त्र शस्त्रों से मार गिराता है ॥१॥ इस सूक्त में स्त्री लिङ्ग शब्द अविद्या और विद्या के लिए आये हैं। पहले तीन मन्त्र अविद्यापरक, और पिछले तीन विद्यापरक हैं। अलङ्कार से अविद्या को दुःखदायिनी और विद्या को सुखदायिनी मानकर संबोधन किया है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (उत्तुदः) अति व्यथाकारी काम (उत् तुदतु) हे पत्नी! तुझे व्यथित करे, (स्वे शयने) निज शय्या पर (मा धृथाः) तू धारित न हो। (कामस्य) कामवासना की (या भीमा इषुः) जो भयानक इषु है (तया) उस द्वारा (त्वा) तुझे (हदि) हृदय में (विध्यामि) मैं बींधता हूँ।
टिप्पणी: [रुष्ट हुई पत्नी के प्रति उसका पति कहता है कि तुझे काम के बाण द्वारा बींधता हूँ, इससे तू शय्या पर सुख से शयन न कर सकेगी।]
आधीपर्णां कामशल्यामिषुं संकल्पकुल्मलाम् ।
तां सुसंनतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हृदि ॥२॥
तां सुसंनतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हृदि ॥२॥
०३।०२५।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (आधीपर्णाम्) अधिष्ठान वा प्रतिष्ठा के पंखवाले, (कामशल्याम्) वीर्य [तपोबल] की अणिवाले (संकल्पकुल्मलाम्) संकल्प के दंड छिद्रवाले (ताम्) उस [प्रसिद्ध, बुद्धि रूपी] (इषुम्) तीर को (सुसंनताम्) ठीक-२ लक्ष्य पर सीधा (कृत्वा) करके (कामः) सुन्दर मनोरथ (त्वा) तुझ [अविद्या] को (हृदि) हृदय में (विध्यतु) बेधे ॥२॥
भावार्थः ब्रह्मचारी योगी बुद्धि बल से अविद्या को हटाकर प्रतिष्ठावान् बलवान्, और सत्यसंकल्पी होता है ॥२॥ मुण्डकोपनिषद् का वचन है−प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ मुण्ड० उ० २।२।४ ॥ (प्रणवः) (धनुः) धनुष् (आत्मा हि) आत्मा ही (शरः) तीर, और (ब्रह्म) ब्रह्म (तल्लक्ष्यम्) उसका लक्ष्य (उच्यते) कहा जाता है, (अप्रमत्तेन) अप्रमत्त, अति सावधान मनुष्य (वेद्धव्यम्) बेधे, और वह (शरवत्) तीर के समान (तन्मयः) उसमें लय (भवेत्) हो जावे ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (आधीपर्णाम्) मानसिक चिन्तारूमी पंखोंवाली, (कामशल्याम्) अभिलाक्षारूपी लोहाग्रवाली, (संकल्पकुल्मलाम्) संकल्परूपी फूलती हुई कलीवाली, (ताम्) उस कामेषु को (सुसंनतां कृत्वा) उत्तम प्रकार से तेरी ओर नत करके, झुकाकर (काम:) काम (त्वा) तुझे (हृदि विध्यतु) हृदय में वीधें।
टिप्पणी: [पर्ण को पुंख भी कहते हैं अर्थात् खिलती हुई कली (उणा० ४।१८८; दयानन्द)। खिले फूल, मेघगर्जना, वसन्त ऋतु आदि कामोत्तेजक हैं-ऐसा कामविज्ञ कहते हैं।]
या प्लीहानं शोषयति कामस्येषुः सुसंनता ।
प्राचीनपक्षा व्योषा तया विध्यामि त्वा हृदि ॥३॥
प्राचीनपक्षा व्योषा तया विध्यामि त्वा हृदि ॥३॥
०३।०२५।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (कामस्य) सुन्दर मनोरथ का (सुसंनता) ठीक-२ लक्ष्य पर चलाया हुआ, (प्राचीनपक्षा) प्राचीन [वेदविज्ञान] का पंख रखनेवाला, (व्योषा) विविध प्रकार से [अविद्या का] दाह करनेवाला [बुद्धिरूपी] (या) जो (इषुः) तीर [अविद्या] की (प्लीहानम्) गति [वा तिल्ली नाम मर्मस्थान] को (शोषयति) सुखा देता है, (तया) उससे (त्वा) तुझ [अविद्या] को (हृदि) हृदय में (विध्यामि) बेधता हूँ ॥३॥
भावार्थः मनुष्य पूर्ण ब्रह्मचर्य और दृढ़ प्रतिज्ञा से वेदविज्ञान द्वारा अविद्या मिटाकर आनन्द भोगे, जैसे शूर वैरी का मर्मस्थान छेद कर सुखी होता है ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (सु संनता) उत्तम प्रकार से झुकी हुई, (प्राचीनपक्षा) प्रगति देनेवाले पंखवाली (व्योषाः) विविध प्रकार से जलानेवाली (कामस्य इषुः) काम की इषु (या) जोकि (प्लीहानम्) तिल्ली को (शोषयति) सूखा१ कर देती है, (तया) उस द्वारा (त्वा) तुझे (हृदि विध्यामि) हृदय में मैं पति बींधता हूँ।
टिप्पणी: [व्योषाः=वि+उष दाहे (भ्वादिः)। सम्भवतः असफल कामवासना चिन्ता तिल्ली (Spleen) को सुखा देती हो।] [१. प्लीहा अर्थात् तिल्ली रक्त का निर्माण करती है। चिन्ता रक्त को सुखा देती है। यह है प्लीहा का शोषण। Spleen=a blood forming organ (your guide to Health) पूना, इण्डिया।]
शुचा विद्धा व्योषया शुष्कास्याभि सर्प मा ।
मृदुर्निमन्युः केवली प्रियवादिन्यनुव्रता ॥४॥
मृदुर्निमन्युः केवली प्रियवादिन्यनुव्रता ॥४॥
०३।०२५।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: [हे विद्या] (व्योषया) विशेष दाह करनेवाली (शुचा) पीड़ा से (विद्धा) बिंधी हुई, (शुष्कास्या) सूखे मुखवाली, (मृदुः) कोमल स्वभाववाली (निमन्युः) निरभिमान, (केवली) सेवनीया, (प्रियवादिनी) प्रिय बोलनेवाली और (अनुव्रता) अनुकूल आचरणवाली [पतिव्रता स्त्री के समान] तू (मा अभि) मेरी ओर (सर्प) चली आ ॥४॥
भावार्थः यहाँ से तीन मन्त्र विद्यापरक हैं। मन्त्र का आशय यह है, जो ब्रह्मचारी विद्या के लिए पूरी लालसा से यत्नपूर्वक परिश्रम करता है, विद्या शीघ्र ही उसको मिलकर हितकारिणी होती है, जैसे सती गुणवती स्त्री मन, वचन और कर्म से अपने पति की सेवा करती है ॥४॥ ऋग्वेद के परमब्रह्मज्ञान सूक्त वा विद्यासूक्त में भी विद्या की उपमा पतिव्रता स्त्री से दी है। उ॒त त्वः॒ पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्वः॑ शृ॒ण्वन्न शृ॑णोत्येनाम्। उतो त्व॑स्मै तन्वं१ विस॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑ ॥ ऋ० १०।७१।४ ॥ (त्वः) एक पुरुष ने (पश्यन् उत) देखते हुए भी (वाचम्) वेद वाणी को (न ददर्श) नहीं देखा है, (त्वः) एक पुरुष (शृण्वन् उत) सुनता हुआ भी (एनाम्) इसको (न शृणोति) नहीं सुनता है। (उतो) किन्तु (त्वस्मै) एक पुरुष को [अपना] (तन्वम्) स्वरूप [परमज्ञान] (विसस्रे) उसने दिखाया है, (इव) जैसे (उशती) अनुरागवती (सुवासाः) सुन्दर वस्त्रवाली (जाया) पत्नी [अपने] (पत्ये) पति को ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (व्योषया शुचा) विदाहयुक्त शोक द्वारा (विद्धा) बींधी हुई, (शुष्कास्या) दाह के कारण रुद्ध गलेवाली तू (मा अभि) मेरी ओर (सर्प) आ। और तू (मृदुः) मृदुभाषिणी, (निमन्युः) मन्युरहित, (प्रियवादिनी) प्रिय बोलनेवाली, (अनुव्रता) मेरे अनुकूल कर्मोवाली हुई, (केवली) केवल मेरी हो जा।
आजामि त्वाजन्या परि मातुरथो पितुः ।
यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥५॥
यथा मम क्रतावसो मम चित्तमुपायसि ॥५॥
०३।०२५।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: [हे विद्या !] (त्वा) तुझको (आजन्या) पूरे उपाय से [अपनी] (मातुः) माता से (अथो) और (पितुः) पिता से (परि) सब ओर (आ) यथानियम (अजामि) प्राप्त करता हूँ, (यथा) जिससे (मम) मेरे (क्रतौ) कर्म वा बुद्धि में (असः) तू रहे, (मम चित्तम्) मेरे चित्त में (उपायसि) तू पहुँचती है ॥५॥
भावार्थः सब स्त्री पुरुष माता-पिता आदि से विद्या पाकर परीक्षा द्वारा साक्षात् करके हृदय में दृढ़ करें ॥५॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध कुछ भेद से अथर्व० १।३४।२ में आया है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (परि मातुः) माता के पास से, (अथो) मा (परि पितुः) पिता के पास से, (त्वा) तुझे (अजन्या) निज प्रेरणा द्वारा (आ अजामि) पूर्णतया मैं प्रेरित करता हूँ, (यथा) जिस प्रकार कि (मम क्रतौ असः) मेरे कर्मों में सहयोगिनी तू हो जाए और (मम चित्तम् उप) मेरे चित्त के समीप (अयसि) तू आ जाए।
टिप्पणी: [विवाहित पत्नियाँ रुष्ट होकर माता-पिता की शरण में चली जाती हैं, वे ही उनके स्वाभाविक आश्रय होते हैं।]
व्यस्यै मित्रावरुणौ हृदश्चित्तान्यस्यतम् ।
अथैनामक्रतुं कृत्वा ममैव कृणुतं वशे ॥६॥
अथैनामक्रतुं कृत्वा ममैव कृणुतं वशे ॥६॥
०३।०२५।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (मित्रावरुणौ) हे प्राण और अपान (अस्यै) इस [विद्या] के लिए [मेरे] (हृदः) हृदय के (चित्तानि) विचारों को (वि अस्यतम्) फैलाओ। (अथ) और (एनाम्) इसको (अक्रतुम्) अहिंसिका [हितकारिणी] (कृत्वा) करके (मम एव) मेरे ही (वशे) वश में (कृणुतम्) करो ॥६॥
भावार्थः सब ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी प्राण और अपान अर्थात् इन्द्रियों को जीतकर अपने विचारों को बढ़ाकर महाहितकारिणी विद्या को उपयोगी बनावें ॥६॥ इति पञ्चमोऽनुवाकः ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (मित्रावरुणौ) हे स्नेही तथा वरणीय परमेश्वर ! (अस्यै) इसके (हृदः) हृदय से (चितानि) संकल्पों या विचारों को (व्यस्यतम्) फैंक दे, निकाल दे। (अथ) तदनन्तर (एनाम) इसे (अक्रतुम कृत्वा) कर्म तथा प्रज्ञा से रहित कर, (मम एव) मेरे ही (वशे) वश में (कृणुतम्) कर दे।
टिप्पणी: [मित्रावरुणौ=एक ही परमेश्वर के गुण-कर्म के भेद से दो नाम हैं। मित्रपद द्वारा परमेश्वर के स्नेह का कथन किया है और वरुणपद द्वारा परमेश्वर की वरणीयता का। निरुक्तकार की दृष्टि में केवल तीन देव हैं, अग्नि, इन्द्र, [वायु] और आदित्य। प्रत्येक के गुण कर्म के भेद से प्रत्येक के नाना दैवत नाम हैं। यथा-"तासां महाभाग्यादेकैकस्या अपि बहूनि नामधेयानि भवन्ति अपि वा कर्म-पृथक्त्वाद यथा होताध्वर्युर्ब्रह्मोद्गातेत्यप्येकस्य सतः" (निरुक्त ७।२।५)। "तथा तिस्र एव देवता इति नैरुक्ताः। अग्निः पृथिवीस्थानो, वायुर्वा इन्द्रो वा अन्तरिक्षस्थानः, सूर्यो द्युस्थानः।" (निरुक्त ७।२।५)।]

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