प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥१॥
०३।०२७।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (प्राची=प्राच्याः) पूर्व वा सन्मुखवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (अग्निः) अग्नि [अग्नि विद्या में निपुण सेनापति] (अधिपतिः) अधिष्ठाता हो, (असितः) कृष्ण सर्प [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक हो, (आदित्याः) सूर्य से संबन्धवाले (इषवः) बाण हों। (तेभ्यः) उन (अधिपतिभ्यः) अधिष्ठाताओं और (रक्षितृभ्यः) रक्षकों के लिये (नमो नमः) बहुत बहुत सत्कार वा अन्न और (एम्यः) इन (इषुभ्यः) बाणों [बाणवालों] के लिये (नमोनमः) बहुत-२ सत्कार वा अन्न (अस्तु) होवे (यः) जो [वैरी] (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) वैर करता है, [अथवा] (यम्) जिस [वैरी से] (वयम्) हम (द्विष्मः) वैर करते हैं, [हे शूरो] (तम्) उसको (वः) तुम्हारे (जम्भे) जबड़े में (दध्मः) हम धरते हैं ॥१॥
भावार्थः (आदित्याः इषवः) बाण अर्थात् सब अस्त्र शस्त्र सूर्य वा बिजुली वा अग्नि के प्रयोग से चलनेवाले हों। शत्रु दो प्रकार के होते हैं, एक वे जो अपनी दुष्टता से धर्मात्माओं को बुरा जानते हैं, दूसरे वे जिनको धर्मात्मा लोग उनकी दुष्टता के कारण बुरा समझते हैं। उक्त दिशा में (अग्नि) पदवाला सेनापति (असित) नाम काले साँप के समान सेना व्यूह से ऐसे दुष्टों को जीतकर सैनिकों सहित यशस्वी होकर धर्मात्माओं की रक्षा करे ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (प्राची दिक्) पूर्व की दिशा है, (अग्नि: अधिपति) अग्नि अधिपति है। (असितः) यह सीमाबद्ध नहीं, (रक्षिता) रक्षण करता है, (आदित्य) आदित्य की रश्मियाँ (इषवः) इषुरूप हैं। (तेभ्यः) उन के प्रति (नमः) हमारा प्रह्णीभाव हो, (अधिपतिभ्यः नमः) उन अधिपतियों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (रक्षितृभ्यः नमः ) उन रक्षकों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (इषुभ्यः नमः) इषुरुप उनके प्रति प्रह्णीभाव हो, (एभ्यः) इन सबके प्रति (नमः) प्रह्णीभाव (अस्तु) हो। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, (यम् वयम् द्विष्मः) और जिसके साथ प्रतिक्रियारूप हम द्वेष करते हैं (तम्) उसे (व: जम्भे) तुम्हारी दाढ़ में (दध्मः) हम स्थापित करते हैं।
टिप्पणी: [अभिप्राय है द्वेष्टा को आदित्य रश्मियों के प्रति सुपुर्द करते हैं। यन्त्र द्वारा आदित्य रश्मियों को एकत्रित कर उन द्वारा उसे जला देते हैं। नमः=णम प्रह्वत्वे शब्दे च। प्रह्णीभाव है उनके प्रति झुकना, उन्हें सर्वोपरि शक्ति मानकर उनका प्रयोग करना।]
दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥२॥
०३।०२७।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (दक्षिणा-०-णायाः) दक्षिण वा दाहिनी ओर वाली (दिक्=दिशः) दिशा का (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाला इन्द्र [अधिकारी सेनापति] (अधिपतिः) अधिष्ठाता हो, (तिरश्चिराजिः) तिरछी धारीवाले साँप यद्वा पशु पक्षी आदि की पङ्क्ति [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक हो, (पितरः) रक्षा करने हारे (इषवः) बाण होवें। (तेभ्यः) उन (अधिपतिभ्यः) अधिष्ठाताओं और.... [म० १] ॥२॥
भावार्थः उक्त दिशा में [इन्द्र पदधारी सेनापति] (तिरश्चिराजिः) नाम सेना व्यूह करके शत्रुओं को जीतकर.... [म० १] ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (दक्षिणा दिक्) दक्षिण दिशा है, (तिरश्चिराजी) टेढ़ी रेखा वाला (इन्द्रः) इन्द्र१ [विद्युत्] (रक्षिता) रक्षा करता है, (पितरः) पालक वायुएँ (इषवः) इषु है। (तेभ्यः) उन के प्रति (नमः) हमारा प्रह्णीभाव हो, (अधिपतिभ्यः नमः) उन अधिपतियों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (रक्षितृभ्यः नमः ) उन रक्षकों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (इषुभ्यः नमः) इषुरुप उनके प्रति प्रह्णीभाव हो, (एभ्यः) इन सबके प्रति (नमः) प्रह्णीभाव (अस्तु) हो। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, (यम् वयम् द्विष्मः) और जिसके साथ प्रतिक्रियारूप हम द्वेष करते हैं (तम्) उसे (व: जम्भे) तुम्हारी दाढ़ में (दध्मः) हम स्थापित करते हैं।
टिप्पणी: [दक्षिण समुद्र से जब मानसून वायु चलती है, तब यह मेघ भरी होती है और इसमें इन्द्र अर्थात् विद्युत टेढ़ी रेखा में चलती हुई चलती है, जोकि मेघ को ताड़ित कर वर्षा करती है।२] [१. इन्द्र मध्यस्थानी देवता है। २. वर्षा प्रथम पश्चिम दिशा से प्रारम्भ होती है। तत्पश्चात् प्रधानवर्षा दक्षिण समुद्र से मानसून वायुओं में प्रकट होती है। इन्हें पितरः कहा है, ये पितृवत् हमारी रक्षा करती हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य है कि प्रथम वर्षा का प्रारम्भ पश्चिम से, और तत्पश्चात् प्रधान वर्षा का दक्षिण समुद्र से आगमन होना।]
प्रतीची दिग्वरुणोऽधिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥३॥
०३।०२७।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (प्रतीची=०-च्याः) पश्चिम वा पीछे की (दिक्=दिशः) दिशा का (वरुणः) शत्रुओं का रोकनेवाला, वरुण [पदवाला सेनापति] (अधिपतिः) अधिष्ठाता हो, (पृदाकः) अजगर, बिच्छू, बाघ, चीता वा हाथी [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक हो, और (अन्नम्) अन्न (इषवः) बाण होवें। (तेभ्यः अधिपतिभ्यः) उन अधिष्ठाताओं और.... [म० १] ॥३॥
भावार्थः उक्त दिशा में (वरुण) नाम अधिकारी सेनापति (पृदाकः) नाम सेनाव्यूह बनाकर, और अन्न आदि सामग्री एकत्र रखकर शत्रुओं को जीतकर... [म० १] ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (प्रतीची दिक्) पश्चिम की दिशा है, (वरुणः अधिपतिः) वरुण अधिपति है, (पृदाकुः) वह पालनप्रदान करता है, (रक्षिता) तो रक्षा करता है, (अन्नम् इषवः) अन्न उसके इषु हैं। (तेभ्यः) उन के प्रति (नमः) हमारा प्रह्णीभाव हो, (अधिपतिभ्यः नमः) उन अधिपतियों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (रक्षितृभ्यः नमः ) उन रक्षकों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (इषुभ्यः नमः) इषुरुप उनके प्रति प्रह्णीभाव हो, (एभ्यः) इन सबके प्रति (नमः) प्रह्णीभाव (अस्तु) हो। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, (यम् वयम् द्विष्मः) और जिसके साथ प्रतिक्रियारूप हम द्वेष करते हैं (तम्) उसे (व: जम्भे) तुम्हारी दाढ़ में (दध्मः) हम स्थापित करते हैं।
टिप्पणी: [वरुणः अपामधिपतिः (अधर्व० ५।२४।४)। अत: वरुण भी वर्षा द्वारा अन्नप्रदान करता है अन्न इषु हैं। अन्न खाने से शरीर में शक्ति बढ़ती है। और शक्ति के बढ़ने से रोगकीटाणु शरीर पर प्रहार नहीं कर पाते, अतः अन्न इषु हैं। पृदाकु=पृदाकु सर्प भी सम्भव है। वर्षाऋतु में मेघ अन्तरिक्ष में नाना आकृतियाँ धारण करते हैं, उनमें पृदाकु की भी आकृति सम्भावित है। कवि ने एक-मेघाकृति को गज अर्थात् हाथी रूप भी कहा है। यथा मेघ के सम्बन्ध में कहा है, "वप्रक्रीड़ापरिणतगजप्रेक्षादियं ददर्श"। पृदाकु:=प् (पालनम्)+ दा (दानम्) कुः (करोतीति)। मन्त्र में पूदाकु मेघ की एक आकृतिविशेष है, यह वर्षा द्वारा अन्न प्रदान करती है।]
उदीची दिक्सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥४॥
०३।०२७।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (उदीची=०-च्याः) उत्तर वा बाईं ओर वाली (दिक्=दिशः) दिशा का (सोमः) प्रेरक वा उत्तेजक [सोम पद वाला सेनापति] (अधिपतिः) अधिष्ठाता हो, (स्वजः) आप उत्पन्न होनेवाला वा बहुत दौड़नेवाले साँप [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक होवे, और (अशनिः) बिजुली (इषवः) बाण होवें। (तेभ्यः अधिपतिभ्यः) उन अधिष्ठाताओं और... [म० १] ॥४॥
भावार्थः इस दिशा में (सोम) नाम अधिकारी सेनापति (स्वज) नाम सेना व्यूह रचकर बिजुली के अस्त्र शस्त्रों से शत्रुओं को जीतकर.... [म० १] ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (उदीची दिक्) उत्तर की दिशा है, (सोमः अधिपति) सौम्य स्वभाव वाला अधिपति है, (स्वजः) स्वयम् अर्थात् स्वभावत: उत्पन्न हुआ है, (रक्षिता) रक्षा करता है, (अशनिः इषवः) व्याप्त प्रकाश इषुरूप हैं। (तेभ्यः) उन के प्रति (नमः) हमारा प्रह्णीभाव हो, (अधिपतिभ्यः नमः) उन अधिपतियों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (रक्षितृभ्यः नमः ) उन रक्षकों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (इषुभ्यः नमः) इषुरुप उनके प्रति प्रह्णीभाव हो, (एभ्यः) इन सबके प्रति (नमः) प्रह्णीभाव (अस्तु) हो। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, (यम् वयम् द्विष्मः) और जिसके साथ प्रतिक्रियारूप हम द्वेष करते हैं (तम्) उसे (व: जम्भे) तुम्हारी दाढ़ में (दध्मः) हम स्थापित करते हैं। अशनि=आशूङ व्याप्तौ (भ्वादिः)। अशनि उत्तरध्रुव में व्याप्त होकर वहाँ के अन्धकार के विनाश के लिए इषुरूप है।
टिप्पणी: [सोमः=सौम्यस्वभाववाला है उत्तरदिशास्थ Aurora (औरोरा) यथा "A luminous meteoric Phenomenon of electrical charactor seen in and towards the Polar regions with a tremulous motion and giving forth streams of light. Aurora Borealis, north lights." (चेम्बरज, २०वीं शतक, कोश)।"औरोरा" यह प्रकाशमान घटना है, जोकि वैद्युत है, और उत्तरदिशा सम्बन्धी है, जोकि उत्तर व में दृष्टिगोचर होती है, चन्चलगतिवाली है, और प्रकाशमयी धाराओंरूपी है, इसे उत्तरीय प्रकाश कहते हैं। ये धाराएँ प्रकाशमयी है, और शीतल हैं। अतः सौम्यस्वभाव वाली हैं।।]
ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥५॥
०३।०२७।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ध्रुवा=ध्रुवायाः) स्थिर (दिक्=दिशः) दिशा का (विष्णुः) कामों में व्यापक [सद्वैद्य] (अधिपतिः) अधिष्ठाता होवे, (कल्माषग्रीवः) चितकबरे वा काले गलेवाले साँप [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक होवे, और (वीरुधः) जड़ी बूटी औषधें (इषवः) बाण होवें। (तेभ्यः अधिपतिभ्यः) उन अधिष्ठाताओं और.... [म० १] ॥५॥
भावार्थः सद्वैद्य दृढ़ वा निश्चित स्थान में औषधालय से सैनिकों को स्वस्थ रक्खे और उसके साथ सेना ‘कल्माषग्रीवा’ नाम व्यूह बनाकर रहे, और सब मिलकर शत्रुओं को जीतकर... [म० १] ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ध्रुवा दिक्) ध्रुवा अर्थात् स्थिरा, पूथिवीरूपा, दिशा है, (विष्णु:) रश्मियों से व्याप्त आदित्य (अधिपतिः) अधिपति है। (कल्माषग्रीवः) यह कृष्णवर्णवाली लताओं को मालारूप में ग्रीवा में धारण किये हुआ है, (रक्षिता) हमारा रक्षक है, (वीरुधः) विविधरूप में आरोहण करनेवाली लताएँ और वृक्ष आदि इसके (इषवः) इषु हैं। (तेभ्यः) उन के प्रति (नमः) हमारा प्रह्णीभाव हो, (अधिपतिभ्यः नमः) उन अधिपतियों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (रक्षितृभ्यः नमः ) उन रक्षकों के प्रति प्रह्णीभाव हो, (इषुभ्यः नमः) इषुरुप उनके प्रति प्रह्णीभाव हो, (एभ्यः) इन सबके प्रति (नमः) प्रह्णीभाव (अस्तु) हो। (यः) जो (अस्मान् द्वेष्टि) हमारे साथ द्वेष करता है, (यम् वयम् द्विष्मः) और जिसके साथ प्रतिक्रियारूप हम द्वेष करते हैं (तम्) उसे (व: जम्भे) तुम्हारी दाढ़ में (दध्मः) हम स्थापित करते हैं।
टिप्पणी: [विष्णुः=व्यश्नोतेर्वा (निरुक्त १२।२।१८), विष्णु अर्थात् आदित्य रश्मियों द्वारा व्याप्त होता है। रश्मियों द्वारा व्याप्त आदित्य को "अवि" भी कहा है (अथर्व० १०।८।३१), अवि है रक्षक, इसके सम्बन्ध में कहा है कि "यस्या रूपेणेमे वृक्षा हरितम्रजः" विष्णु अर्थात् आदित्य के ताप और प्रकाश द्वारा वीरुधें प्राप्त होती हैं, ये इषुरूप हैं, रोगों की विनाशिका हैं। अवशिष्ट मन्त्र के अर्थों तथा भावार्थों के लिए देखो मन्त्र (१)।]
ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः श्वित्रो रक्षिता वर्षमिषवः । तेभ्यो नमोऽधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु । योऽस्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः ॥६॥
०३।०२७।०६
०३।०२७।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ऊर्ध्वा=ऊर्ध्वायाः) ऊपरवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (बृहस्पतिः) बड़े-२ शूरों का स्वामी, बृहस्पति [पद वाला सेनापति] (अधिपतिः) अधिष्ठाता हो, (श्वित्रः) श्वेत वर्णवाले साँप [के समान सेना व्यूह] (रक्षिता) रक्षक होवे, (वर्षम्) वर्षा [वृष्टि विद्या] (इषवः) बाण होवें। (तेभ्यः अधिपतिभ्यः रक्षितृभ्यः) उन अधिष्ठाताओं और रक्षकों के लिये (नमोनमः) बहुत-२ सत्कार वा अन्न, और (एभ्यः इषुभ्यः) उन बाणों [बाण वालों] को (नमो नमः) बहुत-२ सत्कार वा अन्न (अस्तु) होवे। (यः) जो [वैरी] (अस्मान् द्वेष्टि) हमसे वैर करता है, [अथवा] (यम्) जिससे (वयम् द्विष्मः) हम वैर करते हैं, [हे शूरो !] (तम्) उसको (वः जम्भे) तुम्हारे जबड़े में (दध्मः) हम धरते हैं ॥६॥
भावार्थः (बृहस्पति) मुख्य सेनापति पर्वत आदि उच्च स्थान में (श्वित्र) नाम सेनाव्यूह रचकर ठहरे और वारुणेय अर्थात् जल संबन्धी अस्त्र शस्त्रों से, अथवा अस्त्र शस्त्रों की वर्षा करके वैरियों को मिटाकर संसार में सैनिकों समेत कीर्ति पावे ॥६॥ यही मन्त्र [अथर्व० का० ३ सू० २७ म० १-६] महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत पुस्तक “पञ्चमहायज्ञविधिः” में “मनसा परिक्रमा मन्त्राः” के नाम से ईश्वरपरक अर्थ में आये हैं, वह अर्थ इस प्रकार होता है−पदार्थ−(प्राची=प्राच्याः) पूर्व वा सन्मुखवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (अग्निः) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (अधिपतिः) अधिष्ठाता और (असितः) बन्धनरहित (रक्षिता) रक्षक है, [जिसके] (आदित्याः) प्राण और किरणें (इषवः) बाण [के समान] हैं (तेभ्यः) उन (अधिपतिभ्यः) अधिष्ठाता, (रक्षितृभ्यः) रक्षा करनेवाले ईश्वरीय गुणों को (नमोनमः) बारम्बार नमस्कार, और (एभ्यः) इन (इषुभ्यः) बाणों [पापियों के लिये बाणरूप गुणों] को (नमोनमः) बारम्बार नमस्कार, और (एभ्यः) इन (इषुभ्यः) बाणों [पापियों के लिये बाणरूप गुणों] को (नमोनमः) बारम्बार नमस्कार (अस्तु) होवे। (यः) जो [अज्ञानी] (अस्मान्) हमसे (द्वेष्टि) वैर करता है, [अथवा] (यम्) जिस [अज्ञानी] से (वयम्) हम (द्विष्मः) वैर करते हैं, [हे ईश्वर गुणो !] (तम्) उसको (वः) तुम्हारे (जम्भे) मुख वा वश में (दध्मः) हम धरते हैं ॥१॥ भावार्थ−मनुष्य अपने सन्मुख और पूर्व दिशा में जगद्रक्षक परमात्मा को साक्षात् जानकर पापों से बचें और सब प्राणी अज्ञान और वैर छोड़कर परस्पर मित्रवत् रहें। यही भावार्थ अगले मन्त्रों में लगालें ॥१॥ पदार्थ−(दक्षिणा=दक्षिणस्याः) दक्षिण वा दाहिनी (दिक्=दिशः) दिशा का (इन्द्रः) पूर्ण ऐश्वर्यवाला परमेश्वर (अधिपतिः) अधिष्ठाता और (तिरश्चिराजिः=०-जेः) तिरछे चलनेवाले कीट, पतङ्ग, बिच्छू आदि की पंक्ति से (रक्षिता) बचानेवाला है, और (पितरः) ज्ञानी लोग (इषवः) बाण [के समान] हैं। (तेभ्यः) उन.... [म० १] ॥२॥ पदार्थ−(प्रतीची=०-च्याः) पश्चिम वा पीछेवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (वरुणः) सब में उत्तम परमेश्वर (अधिपतिः) अधिष्ठाता, (पृदाकु=०-कुभ्यः) बड़े-२ अजगर सर्पादि विषधारी प्राणियों से (रक्षिता) बचानेवाला है, (अन्नम्) जिसके अन्न [अर्थात् पृथिव्यादि पदार्थ] (इषवः) बाण [बाणों के समान श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों की ताड़ना के लिये] हैं। (तेभ्यः) उन..... [म० १] ॥३॥ पदार्थ−(उदीची=०-च्याः) उत्तर वा बाईं (दिक्=दिशः) दिशा का (सोमः) सब जगत् का उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर (अधिपतिः) अधिष्ठाता और (स्वजः) अच्छे प्रकार अजन्मा (रक्षिता) बचानेवाला है, [जिसके] (अशनिः) बिजुली (इषवः) बाण हैं। (तेभ्यः) उन.... [म० १] ॥४॥ पदार्थ−(ध्रुवा=ध्रुवायाः) नीचेवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (विष्णुः) व्यापक परमात्मा (अधिपतिः) अधिष्ठाता और (कल्माषग्रीवः) हरित रंगवाले वृक्षादि की ग्रीवावाला (रक्षिता) बचानेवाला है, [जिसके] (वीरुधः) सब वृक्ष (इषवः) बाण [के समान] हैं। (तेभ्यः) उन... [म० १] ॥५॥ पदार्थ−(ऊर्ध्वा=ऊर्ध्वायाः) ऊपरवाली (दिक्=दिशः) दिशा का (बृहस्पतिः) बड़ी वाणी अर्थात् वेदशास्त्र, और बड़े आकाशादि का स्वामी परमेश्वर (अधिपतिः) अधिष्ठाता और (श्वित्रः) ज्ञानमय और वृद्धिमय (रक्षिता) बचानेवाला है, जिसके (वर्षम्) बरसा के बिन्दु (इषवः) बाण [के समान] हैं। (तेभ्यः) उन... [म० १] ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ऊर्ध्वा दिक्) ऊपर की दिशा है, (बृहस्पतिः) बृहत् अर्थात् महा विस्तारी द्युलोक,१ (अधिपतिः) अधिपति है, (श्वित्रः) यह श्वित्र है, (रक्षिता) रक्षक है (वर्षम् इषवः) वर्षा इसके इषु हैं।
टिप्पणी: [बृहस्पतिः= "बृहत् चासौ पति," अथवा "बृहताम् अधिपतिः," द्युलोके। श्वित्रः= श्वेतते वर्णविशिष्टो भवतीति। कुष्ठभेदो वा (उणा० २।१३; दयानन्द)। द्युलोक चमकते ताराओं द्वारा श्वेतवर्णवाला है, तथा श्वेतवर्णी ताराओं के मध्यवर्ती स्थानों में आकाश की नीलिमा के कारण कुष्ठरोगरूपी भी है। द्युलोक की ओर से वर्षा आती है। यह वर्षा इषुरूप है; गर्मी, सोखा, अन्नादि के अभाव की विनाशिका है। अवशिष्ट मन्त्रार्थ तथा भावार्थ के लिए देखो मन्त्र (१)।] [१. ऊर्ध्वादिक् में ही ग्रह, उपग्रह, आदित्य, चन्द्रमा, नक्षत्र, तारागण निवास करते तथा विचर रहे हैं, अतः ऊर्ध्वादिक ही वस्तु संसार या ब्रह्माण्ड है। शेष दिशाएँ तो लगभग शून्यसदृश हैं।]

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