एकैकयैषा सृष्ट्या सं बभूव यत्र गा असृजन्त भूतकृतो विश्वरूपाः । यत्र विजायते यमिन्यपर्तुः सा पशून् क्षिणाति रिफती रुशती ॥१॥
०३।०२८।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (एषा) यह [साधारणी सृष्टि] (एकैकया) एक एक (सृष्ट्या) सृष्टि [सृष्टि के परमाणु] से (सम्=संभूय) मिलकर (बभूव) हुई है, (यत्र) जिसमें (भूतकृतः) पृथ्वी आदि भूतों से बनानेवाले (विश्वरूपाः) नाना रूपवाले [ईश्वर गुणों] ने (गाः) भूमि, सूर्य आदि लोकों को (असृजन्त) सृजा है। (यत्र) जहाँ पर (यमिनी) उत्तम नियमवाली [बुद्धि] (अपर्तुः) ऋतु अर्थात् क्रम वा व्यवस्था से विरुद्ध (विजायते) हो जाती है [वहाँ] (सा) वह [व्यवस्था विरुद्ध बुद्धि] (रिफती) पीड़ा देती हुई और (रुशती) सताती हुई (पशून्) व्यक्त वाणीवाले और अव्यक्त वाणीवाले जीवों को (क्षिणाति) नष्ट कर देती है ॥१॥
भावार्थः ईश्वर ने अपनी सर्वशक्तिमत्ता से एक-एक परमाणु के संयोग से नियमानुसार यह इतनी बड़ी सृष्टि रची है। जो प्राणी ईश्वरीय नियम तोड़ता है, वह दुःख उठाता है ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (एषा) यह सृष्टि (एकैकया) एक-एक से (सृष्ट्या) सर्जन द्वारा अर्थात् क्रमशः (सम्बभूव) निर्मित हुई है, (यत्र) जिस सृष्टि में (भूतकृतः) भूतसृष्टि के सदश उत्पन्न करनेवालों ने (विश्वरूपाः) विश्व का निरूपण करनेवाली (गाः) वेदवाणियों का (असृजन्त) सर्जन किया। (यत्र) जहाँ (यमिती) यम नियमों का उपदेश करनेवाली वेदवाणी (अपर्तुः१) ऋतु अर्थात समय को अपगत करके (विजायते) विधिविरुद्ध रूप में प्रकट की जाती है, तो (सा) वह वेदवाणी मानो (रिफती२, रुशती) हिंसित होती हुई तथा विनष्ट होती हुई (पशून्) पञ्चविध पशुओं का (क्षिणाति) क्षय कर देती है।[वेदोक्त कर्मों से रहित पुरुष भी पशुसदृश हैं।]
टिप्पणी: [गा:= गौ: वाङ्नाम (निघं० १।११)। गाः बहुवचन में है। वेदवाणियाँ चार हैं, ऋक्, यजुः साम, अथर्व। भूतकृतः=भूतकाल की सृष्टियों के सदृश वेदवाणियों को आविर्भूत करनेवाले अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा है चार ऋषि। विश्वरूपाः=वेदवाणियाँ विश्व के घटकों का निरूपण करती हैं, यतः उनमें सब विद्याएँ मूलरूप में विद्यमान हैं। एकैकया= एक-एक करके, अर्थात् क्रमशः सृष्टि की उत्पत्ति हुई है, युगपत् नहीं। पहिले विराट् पैदा हुआ, उसके अतिविरेचन से तारा-नक्षत्र पैदा हुए, तदनन्तर आदित्य, आदित्य परिवार, पृथिवी, और प्राणिजगत् पैदा हुआ। पशून्=तवेमे पञ्च पशवो विभक्ता गावो अश्वाः पुरुषा अजावयः (अथर्व० १०।२।९)।]
[१. अपर्तु:= ऋतु अर्थात् शिष्यों के आयु:-काल अर्थात् योग्यताकाल का विचार न करके दी गई यमिनी अर्थात् आध्यात्मिक वेदवाणी स्वयं भी विनष्ट होती है, निष्फला होती है, और ग्रहण करनेवालों और उनकी सम्पत्तियों को भी नष्ट कर देती है। यथा–विद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानृजवेऽयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम्। (निरुक्त २।१।४)। इस उद्धरण में कहा है कि विद्या ब्राह्मण की निधि है, इसका प्रदान ब्राह्मण अर्थात् वेदवेत्ता और ब्रह्मवेत्ता उसे प्रदान न करे जो कि निन्दक है, कुटिल है, और संयमी नहीं है। २. रिफ हिंसायाम् (तुदादि:) रूश हिंसायाम् (तुदादि:)। अपात्रों और कुपात्रों को दी गई पमिनी वेदवाणी उनके लिए क्रव्याद हो जाती है (मन्त्र २)।]
एषा पशून्त्सं क्षिणाति क्रव्याद्भूत्वा व्यद्वरी ।
उतैनां ब्रह्मणे दद्यात्तथा स्योना शिवा स्यात्॥२॥
०३।०२८।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (एषा) यह [व्यवस्था विरुद्ध बुद्धि] (क्रव्याद्) मांस खानेवाली और (व्यद्वरी) अनेक विधि से भक्षणशीला (भूत्वा) होकर (पशून्) दो पाए और चौपाये जीवों को (संक्षिणाति) सर्वथा नष्ट करती है। (उत) इस लिये (एनाम्) इस [अनिष्ट बुद्धि को] (ब्रह्मणे) ब्रह्म [ईश्वर, वेद, वा ब्राह्मण को] (दद्यात्) वह सौंपे, (तथा) तो वह (स्योना) सुखदायिनी और (शिवा) कल्याणी (स्यात्) हो जावे ॥२॥
भावार्थः कुबुद्धि पापी मनुष्य परमात्मा वा वेद वा उत्तम विद्वान् की शरण लेकर उत्तम कर्म करने से सुधर जाता है ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (एषा) यह [यमनियमोंवाली वेदवाणी] (क्रव्याद्) मांस खाने वाली, तथा (व्यद्वरी) विविध रूप में खानेवाली (भूत्वा) होकर (पशून्) पञ्चविध पशुओं [मन्त्र १] का (संक्षिणाति) सम्यक् क्षय कर देती है। (उत) इसलिए (एनाम्) इस वेदवाणी को (ब्रह्मणे) वेदवाणी के अधिकारी को (दद्यात्) दे, (तथा) इस प्रकार (स्योना) यमिनी वेदवाणी सुखकरी, (शिवा) तथा कल्याणकारी (स्यात्) हो जाए।
टिप्पणी: [वेद वाणी का तो सर्वत्र प्रचार होना चाहिए, "यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः" (यजुः० २६।२) तथापि यमनियमों का प्रतिपादक वेदभाग ब्राह्मी प्रकृति के व्यक्ति को ही देना चाहिए। क्रव्याद= क्रव्य+ अद् भक्षणे।]
शिवा भव पुरुषेभ्यो गोभ्यो अश्वेभ्यः शिवा ।
शिवास्मै सर्वस्मै क्षेत्राय शिवा न इहैधि ॥३॥
०३।०२८।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (हे यमिनि) उत्तम नियमवाली बुद्धि ! (पुरुषेभ्यः) पुरुषों के लिये (शिवा) कल्याणी और (गोभ्यः) गौओं को और (अश्वेभ्यः) घोड़ों को (शिवा) कल्याणी (भव) हो, (इह) यहाँ (अस्मै सर्वस्मै क्षेत्राय) इस सब खेत को (शिवा) कल्याणी और (नः) हमको (शिवा) कल्याणी (एधि) हो ॥३॥
भावार्थः मनुष्य ईश्वर ज्ञान से उत्तम बुद्धि पाकर सब संसार को सुखदायी होता है ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे आध्यात्मिक वेदवाणी!] (पुरुपेभ्यः) हम गृहस्थ-पुरुषों के लिए (शिवा भव) कल्याणकारी हो, (गोभ्यः अश्वेभ्यः) हमारी गौओं और अश्वों के लिए (शिवा) कल्याणकारी हो। (अस्मै सर्वस्मै क्षेत्राय) इस सब कृषिक्षेत्र के लिए (शिवा) कल्याणकारी हो। (इह) इस गृहस्थजीवन में (न:) हम सब के लिए (शिवा) कल्याणकारी (एधि) हो।
टिप्पणी: [आध्यात्मिक वेदवाणी का प्रसार उन गृहस्थों में भी होना चाहिए, जिनका जीवन आध्यात्मिक हो, ताकि उस आध्यात्मिकता में वे गृहप्रबंध किया करें।]
इह पुष्टिरिह रस इह सहस्रसातमा भव ।
पशून् यमिनि पोषय ॥४॥
०३।०२८।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (इह) यहाँ पर (पुष्टिः) पुष्टि, और (इह) यहाँ पर ही (रसः) रस होवे। (यमिनि) हे उत्तम नियमवाली बुद्धि ! (इह) यहाँ पर (सहस्रसातमा) अत्यन्त करके सहस्रों प्रकार से धन देनेवाली (भव) हो, और (पशून्) व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले जीवों को (पोषय) पुष्ट कर ॥४॥
भावार्थः उत्तम नियम युक्त बुद्धि से मनुष्य अनेक प्रकार की वृद्धि और दूध, घी, आदि रस और बहुत सा धन पाकर सब जीवों की रक्षा करता है ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इह) इस गृहस्थ में (पुष्टिः) पोषण हो, (इह) इसमें (रसः) दुग्धघृत आदि रस हो, (इह) इसमें (सहस्रसातमा) हजारों सुखों को अतिशयदान करनेवाली (भव) तू हो। (यमिनि) हे यमनियमोंवाली वेदवाणी! (पशून्) पञ्चविध पशुओं को (पोषय) परिपुष्ट कर।
टिप्पणी: [सहस्रसातमा= सहस्र+षण्ड (दाने, तनादि)+तमप्। मन्त्र में गृहस्थजीवन को आध्यात्मिक बनाने का निर्देश हुआ है।]
यत्रा सुहार्दः सुकृतो मदन्ति विहाय रोगं तन्वः स्वायाः । तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिंसीत्पुरुषान् पशूंश्च ॥५॥
०३।०२८।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (यत्र) जहाँ पर (सुहार्दः) सुन्दर हृदयवाले (सुकृतः) सुकर्मी लोग (स्वायाः तन्वः) अपने शरीर का (रोगम्) रोग (विहाय) त्यागकर (मदन्ति) आनन्द भोगते हैं। (तम्) उस (लोकम्) लोक [जनसमूह] को (यमिनी) उत्तम नियमवाली [सुमति] (अभिसंबभूव) साक्षात् आकर मिली है। (सा) वह [सुमति] (नः) हमारे (पुरुषान्) पुरुषों (च) और (पशून्) ढोरों को (मा हिंसीत्) न पीड़ा दे ॥५॥
भावार्थः जिस घर में परस्पर हितैषी पुण्यात्मा स्त्री पुरुष नीरोग रहकर विद्या और धन को भोगते हैं, वह उनकी नियमवती सुमति देवी का साक्षात् फल है। वहाँ पर सब मनुष्य और गौ, घोड़े आदि बहुत काल तक जीकर आपस में उपकारी होते हैं ॥५॥ इस मन्त्र का पूर्वार्ध अ० का० ६ सू० १२० म० ३ में इस प्रकार है−यत्रा॑ सु॒हार्दः॑ सु॒कृतो॒ मद॑न्ति वि॒हाय॒ रोगं॑ त॒न्वः स्वायाः॑। अश्लो॑णा॒ अङ्गै॒रह्रु॒ताः स्व॒र्गे तत्र॑ पश्येम पि॒तरौ॑ च पु॒त्रान् ॥ जहाँ पर सुन्दर हृदयवाले सुकर्मी लोग अपने शरीर का रोग त्यागकर आनन्द भोगते हैं, (तत्र) वहाँ पर (स्वर्गे) स्वर्ग में (अश्लोणाः) बिना लंगड़े हुए और (अङ्गैः अह्रुताः) अङ्गों से विना टेढ़े हुए हम (पितरौ) माता पिता (च) और (पुत्रान्) सन्तानों को (पश्येम) देखते रहें ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (यत्र) जिस गृहस्थ में (सुहार्द:) उत्तम हार्दिक भावनाओंवाले, (सुकृतः) तथा उत्तम कर्मोंवाले, (स्वायाः) निज (तन्वः) तनू के (रोगम् विहाय) रोग को त्याग कर, (मदन्ति) मोद-प्रमोद करते हैं, (तम् लोकम्) उस गृहस्थ लोक में, (यमिनि) हे यमनियमोंवालो वेदवाणी! (अभि) साक्षात् (सम्बभूव) तू सम्यक् प्रकार से सत्तावाली हुई है। (सा) वह वेदवाणी (नः) हमारे (पुरुषान्) पुरुषों की (च) और (पशून्) पशुओं की (मा हिंसीत) हिंसा न करे।
टिप्पणी: [जिस गृहस्थ में आध्यात्मिक वेदवाणी की सम्यक् सत्ता होती है, उस गृहस्थ में, असामयिक मृत्यु नहीं होती, क्योंकि गृहस्थी वेदवाणी में कथित जीवन-चर्या करते हैं। "लोकम्" का अभिप्राय पदलोक नहीं, अपितु गृहस्थलोक है। यथा "पितृलोकात् पतिं यतीः" (अथर्व० १४।२।५२; विवाह प्रकरण)। इस प्रकरण में कहा है कि "उशती-कन्यला इमाः पितृलोकात् पतिं बतीः"। इससे स्पष्ट है कि "लोक" पद पितृगृह का भी वाचक है।]
यत्रा सुहार्दां सुकृतामग्निहोत्रहुतां यत्र लोकः ।
तं लोकं यमिन्यभिसंबभूव सा नो मा हिंसीत्पुरुषान् पशूंश्च ॥६॥
०३।०२८।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (यत्र) जहाँ पर (सुहार्दाम्) सुन्दर हृदयवाले (सुकृताम्) सुकर्मियों का और (यत्र) जहाँ पर (अग्निहोत्रहुताम्) अग्निहोत्र करनेवालों का (लोकः) लोक [जन समूह] है, (तम् लोकम्) उस लोक को (यमिनी) उत्तम नियमवाली [सुमति] (अभिसम्बभूव) साक्षात् आकर मिली है। (सा) वह [सुमति] (नः पुरुषान्) हमारे पुरुषों (च) और (पशून्) ढोरों को (मा हिंसीत्) न पीड़ा दे ॥६॥
भावार्थः जहाँ सब स्त्री पुरुष एकमन रहकर पुण्यात्मा पुरुषार्थी होकर अग्निहोत्र करते अर्थात् वेदमन्त्रों से अग्नि में मिष्ट सुगन्ध द्रव्य चढ़ाकर वायुशुद्धि करते और अग्निविद्या द्वारा अग्निनौका, अग्नियान, विमान आदि रचते, वहाँ (यमिनी) नियमवती सुमति के निवास से सब जने आनन्द भोगते हैं ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (यत्र) जिस गृहस्थ में (सुहार्दाम्) उत्तम हार्दिक भावनाओंवालों का तथा (सुकृताम्) सुकर्मियों का (लोकः) स्थान है, या दर्शन होता है, (यत्र) जिस गृहस्थ में (अग्निहोत्रहुताम्) अग्निहोत्र करनेवालों का (लोकः) स्थान है, या दर्शन होता है, (तम् लोकम्) उस गृहस्थ लोक में, (यमिनि) हे यमनियमोंवालो वेदवाणी! (अभि) साक्षात् (सम्बभूव) तू सम्यक् प्रकार से सत्तावाली हुई है। (सा) वह वेदवाणी (नः) हमारे (पुरुषान्) पुरुषों की (च) और (पशून्) पशुओं की (मा हिंसीत) हिंसा न करे।
टिप्पणी: [लोकम्=लोकृ दर्शने (भ्वादिः)। मनु ने गृहस्थ के लिए पञ्चमहायज्ञों का विधान किया है, उनमें अग्निहोत्र भी एक महायज्ञ है।]

0 टिप्पणियाँ
If you have any Misunderstanding Please let me know