प्रश्न :- आत्माएं कितनी है ? इनकी संख्या कितनी है ? क्या आत्मा अजर,अमर,नित्य है ?
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उत्तर :- आत्माएं अनन्त है, असंख्य है।इनकी गिनती जीवात्मा अल्पज्ञ होने के कारण नही कर सकता। सर्वज्ञ ईश्वर के ज्ञान में आत्माएं सीमित है।आत्माओं की संख्या में बढ़ोतरी या घटोतरी नहीं हो सकती क्योंकि आत्माएं अनादि है,अमर है और एक दुसरे से पृथक है।जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करके भी इनकी गणना नहीं कर सकता और इन आत्माओं की संख्या जानकर भी जीवात्मा को कोई लाभ होने वाला नही है।
हाँ आत्मा अजर- अमर -नित्य है इसके लिए गीता का यह श्लोक बहुत ही प्रसिद्ध हैं।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि,नैनं दहति पावक:। च चैनं क्लेदयन्त्यापो, न शोषयति मारूत:।।( गीता/२/२३ )
अर्थात् इस अमर आत्मा को कोई शस्त्र काट नही सकता, आग की तपिश इसे जला नही सकती, जल से यह गल नही सकता, न ही वायु इसे सुखा सकती है।
अब वेद मंत्र देखें -
अमर्त्यो मर्त्येना सयोनि: ( ऋग्वेद १\६४\३० )
अर्थात् अमर जीवात्मा नश्वर शरीर के साथ रहता है।
मर्तेष्वग्निरमृतो नि धायि ( ऋग्वेद १०\४५\७
अर्थात् मनुष्यों में अमर जीवात्मा विद्यमान है।
आश्चर्य देवों देवं, सत्यमित्रन्द्रं सत्य इन्दु: ( ऋग्वेद २\२१\१
अर्थात् इस शरीर में अनश्वर परमात्मा, अनश्वर जीवात्मा के साथ रहता है।
न यंहा रिपो न रिषण्यवो गर्भे सन्तं रेषणा रेषयन्ति।
अन्धा अपश्या न दभन्नभिख्या नित्यास ई प्रेतारो आरक्षण। ।(ऋग्वेद १\४८५ )
इस मंत्र का भी यही भाव है कि आत्मा किसी शत्रु से मर नही सकती। यह नित्य अविनाशी है , अत: इसे कोई कभी मार नही सकता।
अत: आत्मा नित्य- अमर- अजर- अखन्ड है, अनादि-अनन्त है ।वह आत्मा जानने योग्य है।
प्रश्न :- ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो क्या आत्माओं को उत्पन्न नहीं कर सकता?
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उत्तर:- जी नही । भले ही ईश्वर सर्वशक्तिमान है परन्तु वह एक भी आत्मा को न तो पैदा कर सकता है न ही मार सकता है क्योंकि आत्माएं अनादि है। अनादि उसे कहते है जिसका कोई आदि कारण न हो , इसी कारण उसका अन्त भी नही हो सकता। जो वस्तु उत्पन्न ही नहीं हुई हो उसे कोई मार भी नही सकता अर्थात् उसका कभी विनाश नही हो सकता।
ईश्वर सर्वशक्तिमान है इसका यह अर्थ नही है कि वह जो चाहे कर सकता है।
सर्वशक्तिमान का मतलब है कि परमात्मा किसी की सहायता लिए बिना अपने कार्य स्वयं ही करता है जैसे -
१- सृष्टि की रचना करना।
२ - सृष्टि के नियम बना कर , सृष्टि का पालन करना, धारण करना।
३ - सृष्टि का प्रलय करना।
४ - सब जीवों के कर्मों की न्यायपूर्वक फल - व्यवस्था करना और फल प्रदान करना।
५ - सब मनुष्यों की अज्ञानता दूर करने के लिए सृष्टि के आदि में वेद का ज्ञान प्रदान करना। इन सभी कार्यों के करने के लिए ईश्वर किसी की सहायता नहीं लेता।
उपरोक्त सभी गुणों को धारण करने से ईश्वर को सर्वशक्तिमान कहा गया है।
परमात्मा की समीपता।
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परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आन्तरिक शान्ति की भी उपलब्धि होती चलती है।
हिमालय की ठण्डी हवाएँ उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को गर्मी अधिक अनुभव होती है। जीव ज्यों-ज्यों परमात्मा के निकट पहुँचता जाता है, त्यों-त्यों उसे उन विभूतियों का अपने में अनुभव होने लगता है जो उस परम प्रभु में ओत प्रोत हैं।
उपासना का अर्थ है—पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?
पुष्प वाटिका में जाते ही फूलों की सुगन्ध से चित्त प्रसन्न होता है। चन्दन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगन्धित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
मृत्योपरांत जीवात्मा।
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जीवात्मा किसे कहते हैं:-
एक ऐसी वस्तु जो अत्यंत सूक्ष्म है, अत्यंत छोटी है , एक जगह रहने वाली है, जिसमें ज्ञान अर्थात् अनुभूति ( महसूस)का गुण है, जिस में रंग रूप गंध भार (वजन) नहीं है, कभी नाश नहीं होता, जो सदा से है और सदा रहेगी, जो मनुष्य-पक्षी-पशु आदि का शरीर धारण करती है तथा कर्म करने में स्वतंत्र है उसे जीवात्मा कहते हैं । जीवात्मा स्थान नहीं घेरती,एक सुई की नोक पर विश्व की सभी जीवात्माएँ आ सकती हैं।
मृत्यु के बाद जीवात्मा की गति :-
मृत्योपरांत जीवात्मा कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म को प्राप्त करेगी या मुक्त/ मोक्ष को प्राप्त करेगी । जीवात्मा शरीर छोड़ने के बाद (मृत्यु पश्च्यात) ईश्वर की व्यवस्था के अनुसार कुछ पलों में शिघ्र ही दूसरे शरीर को धारण कर लेता है | एक क्षण के कई भाग कर दीजिए उससे भी कम समय में आत्मा एक शरीर छोड़ तुरंत दूसरे शरीर को धारण कर लेता है । यह सामान्य नियम है |
आत्मा का स्वभाव :-
आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता । वे कर्म अच्छे करे या फिर बुरे, ये उस पर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य । तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है । पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है ।
जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं । कर्मों का फल अवश्य मिलता है, बिना फल दिए वे कर्म कभी नष्ट नहीं होते क्योंकि :-
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् । ( महाभारत ) किये गये अच्छे बुरे कर्मों का फल अवश्य भोगना पढ़ेगा।
नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । ( अत्री स्मृति )
यथा धेनुसहस्त्रेषु वत्सो गच्छति मातरम् । तथा यच्च कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति । ( चाणक्य नीति १३/१४ )
हजारों गायों के बीच में से भी बछड़ा जैसे केवल अपनी माँ के पास ही आता है, वैसे ही किया हुआ कर्म हजारों मनुष्यों में कर्ता को पहचान लेता है।
पुनर्जन्म में जीवात्मा किस शरीर को प्राप्त होगी :-
मनुष्य का जीव पशु - पक्षियों में और पशु-पक्षियों का जीव मनुष्य में, आता जाता है। जब पाप अधिक बढ़ जाते है और पुण्य कम होते है तब मनुष्य का जीव पशु आदि नीच शरीर में जाता है। जब धर्म अधिक और अधर्म कम होता है तो मनुष्य का शरीर मिलता है। सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है , यदि सात्विक कर्म बहुत कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में , यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा । जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा ।
मोक्ष क्या है :-
मुक्त या मोक्ष का अर्थ है, समस्त दुःख, भय चिंता, रोग, शोक, पीड़ा , इच्छाओं का त्याग,जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर परमपिता परमात्मा के परम आनन्द को प्राप्त करना तथा बिना शरीर के भी इच्छानुसार स्वतंत्रता पूर्वक समस्त लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करना। यह मुक्ति या मोक्ष वेदादि शास्त्रों में बताये ईश्वर आज्ञा पालने ,अधर्म अविद्या कुसंग कुसंस्कार बुरे व्यसन से अलग रहना तथा यम नियमों का पालन करते हुए अष्टांगयोगाभ्यास के माध्यम से समाधी अवस्था को प्राप्त करके समस्त अविद्या और अज्ञानता के संस्कारों को नष्ट करके सत्यभाष्ण, परोपकार न्याय धर्म की वृद्धि करने तथा जब संसार के भोगों से वैराग्य हो जाता है तब जीवात्मा की संसार के भोग पदार्थ को प्राप्त करने की इच्छायें समाप्त हो जाती हैं तब जीवात्मा मोक्ष को प्राप्त करती है | वैराग्य मन की एक स्थिति है जो जीवन में किसी भी समय सहज ही प्राप्त हो सकती है इसके लिए राग-द्वेषादि समस्त क्लेशों को नष्ट करने वाले योगी को शरीर छोड़ने के बाद मोक्ष मिलता है। जीवात्मा वास्तव में क्या चाहता है ? इसका संक्षिप्त उत्तर है कि जीवात्मा पूर्ण और स्थायी सुख , शांति, निर्भयता और स्वतंत्रता चाहता है जो की इस मनुष्य शरीर में असम्भव है इस लिए वेद शास्त्रों में मोक्ष या मुक्ति का मार्ग बताया गया है।जहां पूर्ण आनन्द है।
जीवात्मा, अपने कर्मफल को भोगने और मोक्ष को प्राप्त करने के लिए शरीर को धारण करता है संसार के प्रारम्भ से यह शरीर धारण करता आया है और जब तक मोक्ष को प्राप्त नहीं करता तब तक शरीर धारण करते रहेगा | शरीर दो प्रकार का होता है :- (१) सूक्ष्म शरीर ( मन, बुद्धि, अहंकार, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ ) (२) स्थूल शरीर ( ५ कर्मेन्द्रियाँ = नासिका, त्वचा, कर्ण आदि बाहरी शरीर ) और इस शरीर के द्वारा आत्मा कर्मों को करता है ।
जब मृत्यु होती है तब आत्मा अपने सूक्ष्म शरीर को पूरे स्थूल शरीर से समेटता हुआ किसी एक द्वार से बाहर निकलता है । और जिन जिन इन्द्रियों को समेटता जाता है वे सब निष्क्रिय होती जाती हैं । तभी हम देखते हैं कि मृत्यु के समय बोलना, दिखना, सुनना सब बंद होता चला जाता है । मृत्यु ठीक वैसा ही जैसा कि हमें बिस्तर पर लेटे लेटे गहरी नींद में जाते हुए लगता है । हम ज्ञान शून्य होने लगते हैं ।नवजात शिशु को ध्यान पूर्वक बढ़ता हुआ देखेंगे तो पायेंगे वे अपने पूर्व जन्म गुण लेकर आता है भय हर्ष स्वाद सीखने की क्षमता उत्साह सोते हुआ रोना हँसना यह सब क्रियाएँ और स्मरण उसके सूक्ष्म शरीर के साथ ही आई हैं।
मोक्ष के बाद जीवात्मा कहाँ रहता है:-
मुक्ति या मोक्ष में जीवात्मा ब्रह्म में रहता है ब्रह्म जो पूर्ण है सर्व व्यापक है उसी में जीवात्मा स्वतंत्र आनन्दपूर्वक विचरता है। मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है। जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती। जब स्थूल शरीर नहीं रहता तो जीवात्मा में सूक्ष्म शरीर के संकल्पादि स्वाभाविक शुद्ध गुण रहते हैं।जब सुनना चाहता है तब सुनता है स्पर्श करना चाहता है तो तब त्वचा देखने के संकल्प से चक्षु/ आँखें स्वाद के अर्थ रसना संकल्प के लिए मन व बुद्धी स्मरण के लिये चित अपनी स्व शक्ति से मुक्ति और संकल्प मात्र से शरीर होता है।जैसे शरीर धारण करके इन्द्रियों के द्वारा जीव आनन्द भोगता है और वे आनन्द असल में जीवात्मा ही भोगती है शरीर नहीं वैसे ही मुक्ति में बिना शरीर के संकल्प मात्र से सब आनन्द भोग लेता है।जैसे बिना परिवार के व्यक्ति अपने विचारों में ही समस्त प्राणी मात्र को अपना परिवार मान कर सुख अनुभव कर सकता है।जैसे एकांत में ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव कर के अकेला नहीं समझता यह सब संकल्प ही कहलाता है।जैसे स्वादिष्ट चीज़ के स्मरण मात्र से ही मुख में उसका स्वाद संकल्प मात्र से ही अनुभव हो जाता है। वेदादि शास्त्रों के अनुसार मोक्ष की समय अवधि है - ३६ हजार बार सृष्टि की उत्पत्ति व विनाश होने तक अर्थात् ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्षों तक ईश्वर के आनंद मे मग्न रहना ।

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