अथर्ववेद काण्ड 3 सूक्त २ सरल हिन्दी शब्दार्थ और भावार्थ

अथर्ववेद काण्ड 3 सूक्त २ सरल हिन्दी शब्दार्थ और भावार्थ


अथर्ववेद काण्ड 3 सूक्त २

०३।००२।०१

अग्निर्नो दूतः पुत्येतु विद्वान् पति दहन्नभिशस्तिमरातिम्।

स चित्तानि मोहयतु परेषां निर्हस्तांश्च कृणवज्जातवैंदाः ॥१॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (अग्निः) अग्नि [के समान तेजस्वी] (दूतः) अग्रगामी वा तापकारी (विद्वान्) विद्वान् राजा (नः) हमारेलिये (अभिशस्तिम्) मिथ्या अपवाद और (अरातिम्) शत्रुता को (प्रतिवहन्) सर्वथा भस्म करता हुआ (प्रत्येतु) चढ़ाई करे। (सः) वह (जातवेदाः) प्रजाओं का जाननेवाला [सेनापति] (परेषाम्) शत्रुओं के (चित्तानि) चित्तों को (मोहयतु) व्याकुल कर देवे (च) और [उनको] (निर्हस्तान्) निहत्था (कृणवत्) कर डाले ॥१॥

भावार्थः राजा सेनादि से ऐसा प्रबन्ध रक्खे कि प्रजा गण आपस में मिथ्या कलङ्क न लगावें और न वैर करें और दुराचारियों को दण्ड देता रहे कि वे शक्तिहीन होकर सदा दबे रहें, जिससे श्रेष्ठों को सुख मिले और राज्य बढ़ता रहे ॥१॥ यह मन्त्र इसी काण्ड के सूक्त १ मन्त्र १ में कुछ भेद से है ॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (नः) हमारा (विद्वान्) युद्धविद्याविज्ञ (दूतः) शत्रुओं का उपतापक (अग्निः) अग्रणी प्रधानमंत्री (प्रत्येतु) शत्रुओं के प्रतिमुख आए, (अभी शस्तिम्) अभिमुख होकर हिंसा करनेवाले, (अरातिम्) दानभावनारहित अतः शत्रु को (प्रतिदहन्) प्रतिकूल रूप में युद्ध करता हुआ। (सः) वह (परेषाम्) शत्रुओं के (चित्तानि) चित्तों को (मोहयतु) कर्त्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित करे, (च) और (जातवेदा:) नवजात परिस्थितियों का वेत्ता अग्रणी (निर्हस्तान् कृणवत्) उन्हें निहत्त्थे कर दे। [निर्हस्तान् (अथर्व ०१।१)]

०३।००२।०२

अयमग्निरमूमुहद् यानि चित्तानि वो हृदि।

वि वो धमन्वोकसः प्र वो धमतु सर्वतः ॥२॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (अयम्) इस (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी राजा] ने (चित्तानि) उन ज्ञानों को (अमूमुहत्) उलट-पलटकर दिया है (यानि) जो (वः) तुम्हारे (हृदि) हृदय में [थे]। वह (वः) तुमको (ओकसः) घर से (वि, धमतु) निकाल देवे, वह (वः) तुमको (सर्वतः) सब स्थान से (प्र घमतु) बाहिर कर देवे ॥२॥

भावार्थः जिस सेनापति राजा ने दुष्टों को वश में करके रक्खा था, वह राजा विरोधियों को प्रतिज्ञा भङ्ग करने पर देशनिकाला आदि दण्ड देवे ॥२॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (अयम्) इस (अग्निः) अग्रणी प्रधानमंत्री ने (व: अमूमुहत्) तुम्हें मुग्ध कर दिया है, कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित कर दिया है, (व:) तुम्हारे (हृदि) हृदय में (यानि) जो (चित्तानि) संकल्प हैं [उनसे रहित कर दिया है।] (वः) तुम्हें (ओकसः) गृहों से (वि धमतु) अग्रणी निकाल दे, (वः) तुग्हें (सर्वसः) सब स्थानों से (प्र धमतु) प्रकर्षतया निकाल दे।

टिप्पणी: [धमतु=धमा शब्दाग्निसंयोगयोः (भ्वादिः), ''शब्द' अर्थ अभिप्रेत है, अर्थात् निज आज्ञा द्वारा।]

०३।००२।०३

इन्द्रं चित्तानिं मोहयंन्नर्वाङाकूत्या चर।

अग्नेर्वातस्य ध्राज्या तान् विषूचो वि नाशय ॥ ३॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (इन्द्र) हे महाप्रतापी राजन् ! [शत्रुओं के] (चित्तानि) चित्त को (मोहयन्) व्याकुल करता हुआ (अर्वाङ्) हमारे सन्मुख (आकूत्या) उत्तम संकल्प से (चर) आ। (अग्नेः) अग्नि के और (वातस्य) पवन के (ध्राज्या) झोंके से (तान्) उन (विषूचः) विरुद्ध गतिवालों को (वि, नाशय) नाश कर डाल ॥३॥

भावार्थः जैसे अग्नि और वायु मिलकर प्रचण्ड हो जाते हैं, इसी प्रकार राजा प्रचण्ड होकर दुष्टों को दण्ड देवे और सत्कर्मी पुरुषों का शिष्टाचार करे ॥३॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा अ० ३।१।५। में आ चुका है ॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (इन्द्र) हे सम्राट्! (चित्तानि) शत्रुओं के चित्तों को (मोहयन्) मुग्ध करता हुआ, कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित करता हुआ तू, (आकूत्या) सफल हुए निज संकल्प के साथ, (अर्वाङ्) इधर हमारी ओर (चर) विचर [साम्राज्य में विचर], “अग्नेर्वातस्य आदि पूर्ववत् (अथर्व० १।५)

टिप्पणी: [मंत्र २ और ३ द्वारा प्रतीत है कि शत्रु के मोहन का अधिकार, प्रधानमन्त्री तथा सम्राट् दोनों को है।]

०३।००२।०४

व्या कूतय एषामिताथो चित्तानि मुह्यत।

अथो यदद्यैषां हृदि तदेषां परि निर्जहि ॥४॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः हे (एषाम्) इन [शत्रुओं] के (आकूतयः) विचारो ! (वि) उलट-पलट होकर (इत) चले जाओ, (अथो) और हे (चित्तानि) इनके चित्तो ! (मुह्यत) व्याकुल हो जाओ। (अथो) और [हे राजन्] (यत्) जो कुछ [मनोरथ] (अद्य) अब (एषाम्) इनके (हृदि) हृदय में है, (एषाम्) इनके (तत्) उस [मनोरथ] को (परि) सर्वथा (निर्जहि) नाश कर दे ॥४॥

भावार्थः नीतिकुशल राजा दुराचारियों में परस्पर मतभेद करा दे और उनका मनोरथ सिद्ध न होने दे ॥४॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (व्याकूतयः) हे परस्पर विरुद्ध संकल्पों! (एषाम्) इन शत्रुओं के (चित्तानि) चित्तों को (इत) तुम प्राप्त होओ, (अथो) तथा (चित्तानि) हे शत्रुओं के चित्तों ! (मुह्यत) तुम मोहग्रस्त हो जाओ, कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित हो जाओ। (अथो) तथा (अद्य) आज (यद्) जो (एषाम् हृदि) इन शत्रुओं के हृदय में है, (एषाम्) इन शत्रुओं के (तत्) उस संकल्प को (परि निर्जहि) सर्वथा नष्ट कर दे।

टिप्पणी: [मन्त्र में इन्द्र के प्रति कहा है "निर्जहि"।]

०३।००२।०५

अमीषां चित्तानि प्रतिमोहयन्ती गृहाणाङ्गान्यवे परेहि।

अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैर्ग्राह्यामित्रांस्तमंसा विध्य शत्रुत् ॥५॥

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (अष्वे) हे शत्रुओं को मार डालने वा हटा देनेवाली सेना (अमीषाम्) उन [शत्रुओं] के (चित्तानि) चित्तों और (अङ्गानि) शरीर के अवयवों और सेनाविभागों को (प्रतिमोहयन्ती) व्याकुल करती हुई (गृहाण) पकड़ ले और (परा, इहि) पराक्रम से चल। (अभि) चारों ओर से (प्र, इहि) धावा कर (हृत्सु) उनके हृदयों में (शोकैः) शोकों से (निर्दह) जलन कर दे और (ग्राह्या) ग्रहणशक्ति [बन्धनादि] से और (तमसा) अन्धकार से (अमित्रान्) पीड़ा देनेवाले (शत्रून्) शत्रुओं को (विध्य) छेद डाल ॥५॥

भावार्थः सेनापति इस प्रकार व्यूह रचना करे कि उसकी उत्साहित सेना धावा करके अश्ववार अश्ववारों को, रथी रथियों को, पदाति पदातियों को व्याकुल कर दें, अर्थात् आग्नेय अस्त्रों से धूँआ धड़क और वारुणेय अस्त्रों से बन्धन में करके जीत लें ॥५॥

इस मन्त्र का ऋग्वेद १०।१०३।१२। यजुर्वेद १७।४४। सामवेद उ० ९।३।५ तथा निरुक्त ९।३३ में इस प्रकार समान पाठ है ॥

अ॒मीषां॑ चि॒त्तं प्र॑तिलो॒भय॑न्ती गृहा॒णाङ्गा॑न्यष्वे॒ परें॑हि।

अ॒भि प्रेहि॒ निर्द॑ह हृ॒त्सु शोकै॑र॒न्धेनामित्रा॒स्तम॑सा सचन्ताम् ॥

(अप्वे) हे शत्रुओं को मार डालने वा हटा देनेवाली सेना ! (अमीषाम्) उनके (चित्तम्) चित्त को (प्रतिलोभयन्ती) व्याकुल करती हुई (अङ्गानि) अङ्गों को (गृहाण) पकड़ ले और (परा, इहि) पराक्रम से चल। (अभि) चारों ओर से (प्र, इहि) आगे बढ़ (हृत्सु) उनके हृदयों में (शोकैः) शोकों से (निर्दह) जलन कर दे। (अन्धेन) गाढ़े [दृष्टि रोकनेवाले] (तमसा) अन्धकार से (अमित्राः) पीड़ा देनेवाले लोग (सचन्ताम्) संयुक्त हो जावें ॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (अमीषाम्) इन शत्रुओं के (चित्तानि) चित्तों को (प्रति मोहयन्ती) कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित करती हुई (अप्वे) हे अप्वा-इषु! (अङ्गानि) इनके अङ्गों को (गृहाण) जकड़ दे, (परेहि) और हम से पराङ्मुखी हुई शत्रु की ओर जा। (अभिप्रेहि) साक्षात् शत्रु की ओर प्रयाण कर और (हृत्सु शोकैः) हृदयस्थ शोकाग्नियों द्वारा (निर्दह) इन्हें दग्ध कर, (ग्राह्या) अङ्गों के जकड़नरूपी इषु द्वारा, तथा (तमसा) अन्धकार द्वारा (शत्रुन्) शत्रुओं को (विध्य) बींध।

टिप्पणी: [मंत्र में अप्वा द्वारा इषु का वर्णन हुआ है। अप्वा का अर्थ है अपगत हुई, जो शत्रु की ओर गमन करती है, अप + वा (गतौ, अदादिः)। इसके तीन काम हैं। (१) शत्रुसेना के अङ्गों को जकड़ देना, (२) शत्रुसेना में तमसा अर्थात् अन्धकार को फैला देना। (३) शत्रु सेना के चित्तों को कर्तव्याकर्तव्य ज्ञान से रहित कर देना। यह इषु भयस्वरूपा है, भयप्रदा है, भयानक है। इसे निरुक्त में "भय" शब्द द्वारा द्योतित किया है। यथा "व्याधिर्वा भयं वा" (६।३।१२; पदसंख्या ४८) अप्वा के चलाने की आज्ञा देता है इन्द्र अर्थात सम्राट्, परन्तु इसे फेंकते हैं "मरुतः" अर्थात् सैनिक (मन्त्र ६)। अप्वा को missile कह सकते हैं।]

०३।००२।०६

असौ या सेना मरुतः परेषामस्मानैत्यभ्योजसा स्पर्धमाना।

तां विध्यत तमसापव्रतेन यथैषामन्यो अन्यं न जानात् ।।६।।

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थः (मरुतः) हे शूर पुरुषों (परेषाम्) बैरियों की (असौ) वह (या) जो (सेना) सेना (अस्मान्) हम पर (अभि) चारों ओर से (ओजसा) बल के साथ (स्पर्धमाना) ललकारती हुई (आ-एति) चढ़ी आती है। (ताम्) उसको (अपव्रतेन) क्रियाहीन कर देनेवाले (तमसा) अन्धकार से (विध्यत) छेद डालो, (यथा) जिससे (एषाम्) इनमें से (अन्यः) कोई (अन्यम्) किसी को (न) न (जानात्) जाने ॥६॥

भावार्थः सेनापति अपनी पलटनों को घातस्यानों में इस प्रकार खड़ा करे कि आती हुई शत्रुसेना को रोककर सब नष्ट कर देवें ॥६॥

(मरुतः) शब्द के लिये अ० १।२०।१। देखो ॥

यह मन्त्र यजुर्वेद में इस प्रकार है−

अ॒सौ या सेना॑ मरु॒तः परे॑षाम॒भ्यैति॑ न॒ ओज॑सा॒ स्पर्ध॑माना।

तां गू॑हत तम॒साप॑व्रतेन॒ यथा॒मी ऽग्र॒न्योऽअ॒न्यन्न जा॒नन् ॥

यजु०। १७।४७ ॥

(मरुतः) हे शूरों ! (परेषाम्) वैरियों की (असौ या सेना) वह जो सेना (नः) हमको (अभि) चारों ओर से (ओजसा स्पर्धमाना) बल के साथ ललकारती हुई (आ, एति) चली आती है। (ताम्) उसको (अपव्रतेन तमसा) क्रियाहीन कर देनेवाले अन्धकार से (गूहत) ढ़क दो, (यथा) जिससे (अमी) वे लोग (अन्यः, अन्यम्) एक दूसरे को (न जानन्) न जानें ॥

✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थः (मरुतः)१ मारने में कुशल है सैनिकों ! (परेषाम्) शत्रुओं की (या) जो (असौ) बह (सेना) सेना (ओजसा) बलातिशय के कारण (स्पर्धमाना) स्पर्धा करती हुई (अस्मान् अभि) हमारे अभिमुख (इति) आती है (ताम्) उसे (अपव्रतेन) कर्महीन कर देनेवाले (तमसा) अन्धकारास्त्र द्वारा (विध्यत) बींधो, (यथा) जिस प्रकार कि (एषाम्) इन शत्रुओं के मध्य में (अन्यः) एक सैनिक (अन्यम्) दूसरे निज सैनिक को (न जानात्) न पहचान सकें।

टिप्पणी: [मरुतः = मारने में कुशल हमारे सैनिक (यजु० १७।४०)। व्रतम् कर्मनाम (निघं० २।१)।] 

[१. म्रियते मारयति वा स मरुत्, मनुष्यजातिः (उणा १।९४ दयानन्द)।]


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