ऋग्वेद मंडल १ सूक्त १०९ संस्कृत व्याकरण और हिंदी भावार्थ

ऋग्वेद मंडल १ सूक्त १०९ संस्कृत व्याकरण और हिंदी भावार्थ


अथ नवोत्तरशततमस्याष्टर्च्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसः कुत्स ऋषिः। इन्द्राग्नी देवते। 1,3,4,6,8 निचृत्त्रिष्टुप्। 2,5 त्रिष्टुप्। 7 विराट् त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥

 पुनस्तौ विद्युत्प्रसिद्धाग्नी कीदृशावित्युपदिश्यते॥ 

अब एकसौ नववें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र से फिर वे भौतिक अग्नि और बिजुली कैसे हैं, यह उपदेश किया है॥

 वि ह्यख्यं॒ मन॑सा॒ वस्य॑ इ॒च्छन्निन्द्रा॑ग्नी ज्ञा॒स उ॒त वा॑ सजा॒तान् नान्या यु॒वत्प्रम॑तिरस्ति॒ मह्यं॒ स वां॒ धियं॑ वाज॒यन्ती॑मतक्षम्॥1॥ 

वि। हि। अख्य॑म्। मन॑सा॒। वस्यः॑। इ॒च्छन्। इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। ज्ञा॒सः। उ॒त। वा॒। स॒ऽजा॒तान्। न। अ॒न्या। यु॒वत्। प्रऽम॑तिः। अ॒स्ति॒। मह्य॑म्। सः। वा॒म्। धिय॑म्। वा॒ज॒ऽयन्ती॑म्। अ॒त॒क्ष॒म्॥1॥

 पदार्थः—(वि) विविधार्थे (हि) खलु (अख्यम्) अन्यान् प्रति कथयेयम् (मनसा) विज्ञानेन (वस्यः) वसुषु साधेु। छान्दसो वर्णलोपो वेत्युकारलोपः। (इच्छन्) (इन्द्राग्नी) विद्युद्भौतिकावग्नी (ज्ञासः) जानन्ति ये तान् विदुषः सृष्टिस्थान् ज्ञातव्यान् पदार्थान् वा (उत) अपि (वा) विद्यार्थिनां ज्ञापकानां समुच्चये वा (सजातान्) सहोत्पन्नान् (न) नहि (अन्या) भिन्ना (युवत्) मिश्रयित्रमिश्रकौ वा (प्रमतिः) प्रकृष्टा चासौ मतिश्च प्रमतिः (अस्ति) (मह्यम्) (सः) (वाम्) युवाभ्याम् (धियम्) उत्तमां प्रज्ञाम् (वाजयन्तीम्) सबलानां विद्यानां प्रज्ञापिकाम् (अतक्षम्) तनूकुर्य्याम्॥1॥

 अन्वयः—यथेन्द्राग्नी इच्छन् वस्योऽहं ज्ञासः सजातानुत वा मनसा ज्ञातुमिच्छन् युवदहमेतान् हि खलु व्यख्यं तथा यूयमपि विख्यात या मम प्रमतिरस्ति सा युष्मभ्यमप्यस्तु नान्या यथाहं वामध्यापकाध्येतृभ्यां वाजयन्तीं धियमतक्षं तथा सोऽध्यापकोऽध्येता चैनां मह्यं तक्षतु॥1॥ 

भावार्थः—अत्र लुप्तोपमालङ्कारौ। मनुष्याणां योग्यतास्ति सत्प्रीतिपुरुषार्थाभ्यां सद्विद्यादिबोधयन्तोऽत्युत्तमां बुद्धिं जनयित्वा व्यवहारपरमार्थसिद्धिकराणि कार्याण्यवश्यं साध्नुवन्तु॥1॥

 पदार्थः—जैसे (इन्द्राग्नी) बिजुली और जो दृष्टिगोचर अग्नि हैं, उनको (इच्छन्) चाहता हुआ (वस्यः) जिन्होंने चौबीस वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्य किया है, उनमें प्रशंसनीय मैं तथा (ज्ञासः) जो ज्ञाताजन हैं उनको वा जानने योग्य पदार्थों को (सजातान्) वा एक संग हुए पदार्थों को (उत) और (वा) विद्यार्थी वा समझानेवालों को (मनसा) विशेष ज्ञान से जानने की इच्छा करता हुआ (युवत्) सब वस्तुओं को यथायोग्य कार्य्य में लगवानेहारा मैं इनको (हि) निश्चय से (वि, अख्यम्) औरों के प्रति उत्तमता के साथ कहूं, वैसे तुम लोग भी कहो, जो मेरी (प्रमतिः) प्रबल मति (अस्ति) है, वह तुम लोगों को भी हो, (न, अन्या) और न हो। जैसे मैं (वाम्) तुम दोनों पढ़ाने-पढ़नेवालों से (वाजयन्तीम्) समस्त विद्याओं को जतानेवाली (धियम्) उत्तम बुद्धि को (अतक्षम्) सूक्ष्म करूं अर्थात् बहुत कठिन विषयों को सुगमता से जानूं, वैसे (सः) वह पढ़ाने और पढ़नेवाला इसको (मह्यम्) मेरे लिये सूक्ष्म करे॥1॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में दो लुप्तोपमालङ्कार हैं। मनुष्यों की योग्यता यह है कि अच्छी प्रीति और पुरुषार्थ से श्रेष्ठ विद्या आदि का बोध कराते हुए अति उत्तम बुद्धि उत्पन्न कराकर व्यवहार और परमार्थ की सिद्धि करानेवाले कामों को अवश्य सिद्ध करें॥1॥ 

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥ 

फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 अश्र॑वं॒ हि भू॑रि॒दाव॑त्तरा वां॒ विजा॑मातुरु॒त वा॑ घा स्या॒लात्। अथा॒ सोम॑स्य॒ प्रय॑ती यु॒वभ्या॒मिन्द्रा॑ग्नी॒ स्तोमं॑ जनयामि॒ नव्य॑म्॥2॥

 अश्र॑वम्। हि। भू॒रि॒दाव॑त्ऽतरा। वा॒म्। विऽजा॑मातुः। उ॒त। वा॒। घ॒। स्या॒लात्। अथ॑। सोम॑स्य। प्रऽय॑ती। यु॒वऽभ्या॑म्। इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। स्तोम॑म्। ज॒न॒या॒मि॒। नव्य॑म्॥2॥

 पदार्थः—(अश्रवम्) शृणोमि (हि) किल (भूरिदावत्तरा) अतिशयेन बहुधनदानप्राप्तिनिमित्तौ (वाम्) एतौ (विजामातुः) विगतो विरुद्धश्च जामाता च तस्मात् (उत) अपि (वा) (घ) एव। अत्र ऋचि तु॰ इति दीर्घः। (स्यालात्) स्वस्त्रीभ्रातुः (अथ) निपातस्य चेति दीर्घः। (सोमस्य) ऐश्वर्य्यप्रापकस्य व्यवहारस्य (प्रयती) प्रयत्यै प्रदानाय। अत्र प्रपूर्वाद्यमधातोः क्तिन् तस्माच्चतुर्थ्येकवचने सुपां सुलुगितीकारादेशः। (युवभ्याम्) एताभ्याम् (इन्द्राग्नी) पूर्वोक्तौ (स्तोमम्) गुणप्रकाशम् (जनयामि) प्रकटयामि (नव्यम्) नवीनम्॥2॥

 अन्वयः—यौ वामेतौ भूरिदावत्तरेन्द्राग्नी वर्त्तेते यौ विजामातुः स्यालादुतापि वा धान्येभ्यश्चैव धनानि दापयत इत्यहमश्रवं अथ हि युवभ्यामेताभ्यां सोमस्य प्रयती ऐश्वर्य्यप्रदानाय नव्यं स्तोममहं जनयामि॥1॥

 भावार्थः—सर्वेषां मनुष्याणां विद्युदादिपदार्थानां गुणज्ञानसंप्रयोगाभ्यां नूतनं कार्य्यसिद्धिकरं कलायन्त्रादिकं विधायानेकानि कार्य्याणि निर्वृत्य धर्मार्थकामसिद्धिः सम्पादनीयेति॥2॥

 पदार्थः—जो (वाम्) ये (भूरिदावत्तरा) अतीव बहुत से धन की प्राप्ति करानेहारे (इन्द्राग्नी) बिजुली और भौतिक अग्नि हैं वा जो उक्त इन्द्राग्नी (विजामातुः) विरोधी जमाई (स्यालात्) साले से (उत, वा) अथवा और (घ) अन्यों जनों से धनों को दिलाते हैं, यह मैं (अश्रवम्) सुन चुका हूं (अथ, हि) अभि (युवभ्याम्) इनसे (सोमस्य) ऐश्वर्य्य अर्थात् धनादि पदार्थों की प्राप्ति करनेवाले व्यवहार के (प्रयती) अच्छे प्रकार देने के लिये (नव्यम्) नवीन (स्तोमम्) गुण के प्रकाश को मैं (जनयामि) प्रकट करता हूं॥2॥

 भावार्थः—सब मनुष्यों को बिजुली आदि पदार्थों के गुणों का ज्ञान और उनके अच्छे प्रकार कार्य में युक्त करने से नवीन-नवीन कार्य्य की सिद्धि करनेवाले कलायन्त्र आदि का विधान कर अनेक कामों को बना कर धर्म, अर्थ और अपनी कामना की सिद्धि करनी चाहिये॥2॥

 पुनरेताभ्यां किन्न कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते॥

 फिर उनको क्या न करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 मा छे॑द्म र॒श्मीँरिति॒ नाध॑मानाः पितॄ॒णां श॒क्तीर॑नु॒यच्छ॑मानाः। इ॒न्द्रा॒ग्निभ्यां॒ कं वृष॑णो मदन्ति॒ ता ह्यद्री॑ धि॒षणा॑या उ॒पस्थे॑॥3॥

 मा। छे॒द्म॒। र॒श्मीन्। इति॑। नाध॑मानाः। पि॒तॄ॒णाम्। श॒क्तीः। अ॒नु॒ऽयच्छ॑मानाः। इ॒न्द्रा॒ग्निऽभ्या॑म्। कम्। वृष॑णः। म॒द॒न्ति॒। ता। हि। अद्री॒ इति॑। धि॒षणा॑याः। उ॒पऽस्थे॑॥3॥

 पदार्थः—(मा) निषेधे (छेद्म) छिन्द्याम (रश्मीन्) विद्याविज्ञानतेजांसि (इति) प्रकारार्थे (नाधमानाः) ऐश्वर्य्येणाप्तिमिच्छुकाः (पितॄणाम्) पालकानां विज्ञानवतां विदुषां रक्षानुयुक्तानामृतूनां वा (शक्तीः) सामर्थ्यानि (अनुयच्छमानाः) आनुकूल्येन नियन्तारः। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम्। (इन्द्राग्निभ्याम्) पूर्वोक्ताभ्याम् (कम्) सुखम् (वृषणः) बलवन्तः (मदन्ति) मदन्ते कामयन्ते। अत्र वा च्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति नुमभावो व्यत्ययेन परस्मैपदं च। (ता) तौ (हि) खलु (अद्री) यौ न द्रवतो विनश्यतः कदाचित्तौ (धिषणायाः) प्रज्ञायाः (उपस्थे) समीपे स्थापयितव्ये व्यवहारे। अत्र घञर्थे कविधानमिति कः प्रत्ययः॥3॥

 अन्वयः—यथा वृषणो यावद्री वर्त्तेते ता सम्यग्विज्ञायैताभ्यामिन्द्राग्निभ्यां धिषणाया उपस्थे कं प्राप्य मदन्ति तथा पितॄणां रश्मीन् नाधमानाः शक्तीरनुयच्छमाना वयं मदेमहीति विज्ञायैतदादिविद्यानां मूलं मा छेद्म॥3॥

 भावार्थः—ऐश्वर्यकामैर्मनुष्यैर्न कदाचिद्विदुषां सेवासङ्गौ त्यक्त्वा वसन्तादीनामृतूनां यथायोग्ये विज्ञानसेवने च विहाय वर्त्तितव्यम्। विद्याबुद्ध्युन्नतिर्व्यवहारस्य सिद्धिश्च प्रयत्नेन कार्या॥3॥

 पदार्थः—जैसे (वृषणः) बलवान् जन जो (अद्री) कभी विनाश को न प्राप्त होनेवाले हैं (ता) उन इन्द्र और अग्नियों को अच्छी प्रकार जान (इन्द्राग्निभ्याम्) इनसे (धिषणायाः) अति विचारयुक्त बुद्धि के (उपस्थे) समीप में स्थिर करने योग्य अर्थात् उस बुद्धि के साथ में लाने योग्य व्यवहार में (कम्) सुख को पाकर (मदन्ति) आनन्दित होते हैं वा उस सुख की चाहना करते हैं, वैसे (पितॄणाम्) रक्षा करनेवाले ज्ञानी विद्वानों वा रक्षा से अनुयोग को प्राप्त हुए वसन्त आदि ऋतुओं के (रश्मीन्) विद्यायुक्त ज्ञानप्रकाशों को (नाधमानाः) ऐश्वर्य के साथ चाहते (शक्तीः) वा सामर्थ्यों को (अनु यच्छमानाः) अनुकूलता के साथ नियम में लाते हुए हम लोग आनन्दित होते (हि) ही हैं और (इति) ऐसा जानके इन विद्याओं की जड़ को हम लोग (मा छेद्म) न काटें॥3॥

 भावार्थः—ऐश्वर्य्य की कामना करते हुए हम लोगों को कभी विद्वानों का संग और उनकी सेवा को छोड़ तथा वसन्त आदि ऋतुओं का यथायोग्य अच्छी प्रकार ज्ञान और सेवन का न त्यागकर अपना वर्त्ताव रखना चाहिये और विद्या तथा बुद्धि की उन्नति और व्यवहार सिद्धि उत्तम प्रयत्न के साथ करना चाहिये॥3॥ 

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥

 त॒तं मे॒ अप॒स्तदु॑ तायते॒ पुनः॒ स्वादि॑ष्ठा धी॒तिरु॒चथा॑य शस्यते। अ॒यं स॑मु॒द्र इ॒ह वि॒श्वदे॑व्यः॒ स्वाहा॑कृतस्य॒ समु॑ तृप्णुत ऋभवः॥1॥  वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 यु॒वाभ्यां॑ दे॒वी धि॒षणा॒ मदा॒येन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑मुश॒ती सु॑नोति। ताव॑श्विना भद्रहस्ता सुपाणी॒ आ धा॑वतं॒ मधु॑ना पृ॒ङ्क्तम॒प्सु॥4॥

 यु॒वाभ्या॑म्। दे॒वी। धि॒षणा॑। मदा॑य। इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑। सोम॑म्। उ॒श॒ती। सु॒नो॒ति॒। तौ। अ॒श्वि॒ना॒। भ॒द्र॒ऽह॒स्ता॒। सु॒पा॒णी॒ इति॑ सुऽपाणी। आ। धा॒व॒त॒म्। मधु॑ना। पृ॒ङ्क्तम्। अ॒प्ऽसु॥4॥

 पदार्थः—(युवाभ्याम्) (देवी) दिव्यशिक्षाशास्त्रविद्याभिर्देदीप्यमाना (धिषणा) प्रज्ञा (मदाय) हर्षाय (इन्द्राग्नी) पूर्वोक्तौ (सोमम्) ऐश्वर्यम् (उशती) कामयमाना (सुनोति) निष्पादयति (तौ) (अश्विना) व्याप्तिशीलौ (भद्रहस्ता) भद्रकरणहस्ताविव गुणा ययोस्तौ (सुपाणी) शोभनाः पाण्यो व्यवहारा ययोस्तौ (आ) समन्तात् (धावतम्) धावयतः (मधुना) जलेन (पृङ्क्तम्) सम्पृङ्क्त (अप्सु) कलास्थेषु जलाशयेषु वर्त्तमानौ॥4॥

 अन्वयः—या सोममुशती देवी धिषणा मदाय युवाभ्यां कार्य्याणि सुनोति तया याविन्द्राग्नी अप्सु मधुना पृङ्क्तं भद्रहस्ता सुपाणी अश्विना स्तस्ताविन्द्राग्नी यानेषु संप्रयुक्तौ सन्तवाधावतं समन्तात् यानानि धावयतम्॥4॥

 भावार्थः—मनुष्या यावत् सुशिक्षासुविद्याक्रियाकौशलयुक्ताधियो न सम्पादयन्ति तावद्विद्युदादिभ्यः पदार्थेभ्य उपकारं ग्रहीतुं न शक्नुवन्ति तस्मादेतत् प्रयत्नेन साधनीयम्॥4॥

 पदार्थः—जो (सोमम्) ऐश्वर्य की (उशती) कान्ति करानेवाली (देवी) अच्छी-अच्छी शिक्षा और शास्त्रविद्या आदि से प्रकाशमान (धिषणा) बुद्धि (मदाय) आनन्द के लिये (युवाभ्याम्) जिनसे कामों को (सुनोति) सिद्ध करती है, उस बुद्धि से जो (इन्द्राग्नी) बिजुली और भौतिक अग्नि (अप्सु) कलाघरों के जल के स्थानों में (मधुना) जल से (पृङ्क्तम्) सम्पर्क अर्थात् संबन्ध करते हैं वा (भद्रहस्ता) जिनके उत्तम सुख के करनेवाले हाथों के तुल्य गुण (सुपाणी) और अच्छे-अच्छे व्यवहार वा (अश्विना) जो सब में व्याप्त होनेवाले हैं (तौ) वे बिजुली और भौतिक अग्नि रथों में अच्छी प्रकार लगाये हुए उनको (आ, धावतम्) चलाते हैं॥4॥

 भावार्थः—मनुष्य जब तक अच्छी शिक्षा, उत्तम विद्या और क्रियाकौशलयुक्त बुद्धियों को न सिद्ध करते हैं, तब तक बिजुली आदि पदार्थों से उपकार को नहीं ले सकते। इससे इस काम को अच्छे यत्न से सिद्ध करना चाहिये॥4॥

 पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥ 

फिर वे दोनों कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 यु॒वामि॑न्द्राग्नी॒ वसु॑नो विभा॒गे त॒वस्त॑मा शुश्रव वृत्र॒हत्ये॑। तावा॒सद्या॑ ब॒र्हिषि॑ य॒ज्ञे अ॒स्मिन् प्र च॑र्षणी मादयेथां सु॒तस्य॑॥5॥28॥

 यु॒वाम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। वसु॑नः। वि॒ऽभा॒गे। तवः॒ऽत॑मा। शु॒श्र॒व॒। वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑। तौ। आ॒ऽसद्य॑। ब॒र्हिषि॑। य॒ज्ञे। अ॒स्मिन्। प्र। च॒र्ष॒णी॒ इति॑। मा॒द॒ये॒था॒म्। सु॒तस्य॑॥5॥

 पदार्थः—(युवाम्) एतौ द्वौ (इन्द्राग्नी) पूर्वोक्तौ (वसुनः) धनस्य (विभागे) सेवनव्यवहारे (तवस्तमा) अतिशयेन बलयुक्तौ बलप्रदौ वा (शुश्रव) शृणोमि (वृत्रहत्ये) वृत्रस्य शत्रूसमूहस्य मेघस्य वा हत्या हननं येन तस्मिन् सङ्ग्रामे (तौ) (आसद्य) प्राप्य वा। अत्रान्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः। (बर्हिषि) उपवर्धयितव्ये (यज्ञे) सङ्गमनीये शिल्पव्यवहारे (अस्मिन्) (प्र, चर्षणी) सम्यक् सुखप्रापकौ। चर्षणिरिति पदनामसु पठितम्। (निघं॰4.2) (मादयेथाम्) मादयेते हर्षयतः (सुतस्य) निष्पादितस्य। कर्मणि षष्ठी॥5॥

 अन्वयः—अहं वसुनो विभागे वृत्रहत्ये वा युवामिन्द्राग्नी तवस्तमा स्त इति शुश्रव शृणोमि। अतस्तौ प्रचर्षणी अस्मिन् बर्हिषि यज्ञे सुतस्य निष्पादितं यानमासद्य मादयेथाम्॥5॥ भावार्थः—मनुष्या याभ्यां धनानि विभजन्ति वा शत्रून् विजित्य सार्वभौमं राज्यं कर्त्तुं शक्नुवन्ति, तौ कार्यसिद्धये कथं न संप्रयुञ्जीरन्॥5॥

 पदार्थः—मैं (वसुनः) धन के (विभागे) सेवन व्यवहार में (वृत्रहत्ये) वा जिसमें शत्रुओं और मेघों का हनन हो उस संग्राम में (युवाम्) ये दोनों (इन्द्राग्नी) बिजुली और साधारण अग्नि (तवस्तमा) अतीव बलवान् और बल के देनेहारे हैं, यह (शुश्रव) सुनता हूं, इससे (तौ) वे दोनों (प्रचर्षणी) अच्छे सुख को प्राप्त करानेहारे (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) समीप में बढ़नेहारे (यज्ञे) शिल्पव्यवहार के निमित्त (सुतस्य) उत्पन्न किये विमान आदि रथ को (आसद्य) प्राप्त होकर (मादयेथाम्) आनन्द देते हैं॥5॥

 भावार्थः—मनुष्य जिससे धनों का विभाग करते हैं वा शत्रुओं को जीत के समस्त पृथिवी पर राज्य कर सकते हैं, उनको कार्य की सिद्धि के लिये कैसे न यथायोग्य कामों में युक्त करें॥5॥ 

अथ वायुविद्युतौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥

 अब पवन और बिजुली कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

प्र च॑र्ष॒णिभ्यः॑ पृतना॒हवे॑षु॒ प्र पृ॑थि॒व्या रि॑रिचाथे दि॒वश्च॑। प्र सिन्धु॑भ्यः॒ प्र गि॒रिभ्यो॑ महि॒त्वा प्रेन्द्रा॑ग्नी॒ विश्वा॒ भुव॒नात्य॒न्या॥6॥

 प्र। च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑। पृ॒त॒ना॒ऽहवे॑षु। प्र। पृ॒थि॒व्याः। रि॒रि॒चा॒थे॒ इति॑। दि॒वः। च॒। प्र। सिन्धु॑ऽभ्यः। प्र। गि॒रिऽभ्यः॑। म॒हि॒त्वा। प्र। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। विश्वा॑। भुव॑ना। अति॑ अ॒न्या॥6॥

 पदार्थः—(प्र) प्रकृष्टार्थे (चर्षणिभ्यः) मनुष्येभ्यः (पृतनाहवेषु) सेनाभिः प्रवृत्तेषु युद्धेषु (प्र) (पृथिव्याः) भूमेः (रिरिचाथे) अतिरिक्तौ भवतः (दिवः) सूर्यात् (च) अन्येभ्योऽपि लोकेभ्यः (प्र) (सिन्धुभ्यः) समुद्रेभ्यः (प्र) (गिरिभ्यः) शैलेभ्यः (महित्वा) प्रशंसय्य (प्र) (इन्द्राग्नी) वायुविद्युतौ (विश्वा) अखिला (भुवना) भुवनानि लोकान् (अति) (अन्या) अन्यानि॥6॥

 अन्वयः—इन्द्राग्नी अन्या विश्वा भुवना अन्यान् सवार्ँल्लोकान् महित्वा पृतनाहवेषु चर्षणिभ्यः प्रपृथिव्या प्रसिन्धुभ्यः प्रगिरिभ्यः प्रदिवश्च प्रातिरिरिचाथे प्रातिरिक्तौ भवतः॥6॥ भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। नहि वायुविद्युद्भ्यां सदृशो महान् कश्चिदपि लोको भवितुमर्हति कुत एतौ सवार्ँल्लोकानभिव्याप्य स्थितावतः॥6॥

 पदार्थः—(इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (अन्या) (विश्वा) (भुवना) और समस्त लोकों को (महित्वा) प्रशंसित करा के (पृतनाहवेषु) सेनाओं से प्रवृत्त होते हुए युद्धों में (चर्षणिभ्यः) मनुष्यों से (प्र, पृथिव्याः) अच्छे प्रकार पृथिवी वा (प्र, सिन्धुभ्यः) अच्छे प्रकार समुद्रों वा (प्र गिरिभ्यः) अच्छे प्रकार पर्वतों वा (प्र दिवश्च) और अच्छे प्रकार सूर्य्य से (प्र, अति रिरिचाथे) अत्यन्त बढ़ कर प्रतीत होते अर्थात् कलायन्त्रों के सहाय से बढ़कर काम देते हैं॥6॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पवन और बिजुली के समान बड़ा कोई लोक नहीं होने योग्य है, क्योंकि ये दोनों सब लोकों को व्याप्त होकर ठहरे हुए हैं॥6॥ 

अथाध्यापकाध्येतारौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥ 

अब पढ़ाने और पढ़नेवाले कैसे होते हैं, यह उपदेश अगले मन्त्र में इन्द्र और अग्नि नाम से किया है॥

 आ भ॑रतं॒ शिक्ष॑तं वज्रबाहू अ॒स्माँ इ॑न्द्राग्नी अवतं॒ शची॑भिः। इ॒मे नु ते र॒श्मयः॒ सूर्य॑स्य॒ येभिः॑ सपि॒त्वं पि॒तरो॑ न॒ आस॑न्॥7॥

 आ। भ॒र॒त॒म्। शिक्ष॑तम्। व॒ज्र॒बा॒हू॒ इति॑ वज्रऽबाहू। अ॒स्मान्। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। अ॒व॒त॒म्। श॒ची॑भिः। इ॒मे। नु। ते। र॒श्मयः॑। सूर्य॑स्य। येभिः॑। स॒ऽपि॒त्वम्। पि॒तरः॑। नः॒। आस॑न्॥7॥

 पदार्थः—(आ) (भरतम्) धारयतम् (शिक्षतम्) विद्योपादानं कारयतम् (वज्रबाहू) वज्रौ बलवीर्य्ये बाहू ययोस्तौ (अस्मान्) (इन्द्राग्नी) अध्येत्रध्यापकौ (अवतम्) रक्षणादिकं कुरुतम् (शचीभिः) कर्मभिः प्रज्ञाभिर्वा (इमे) प्रत्यक्षाः (नु) शीघ्रम् (ते) (रश्मयः) किरणाः (सूर्य्यस्य) मार्त्तण्डमण्डलस्य (येभिः) (सपित्वम्) समानं च तत् पित्वं प्रापणं वा विज्ञानं च तत्। अत्र पिगतावित्यस्माद् धातोरौणादिकस्त्वन् प्रत्ययः। (पितरः) यथा जनकाः (नः) अस्मभ्यम् (आसन्) भवन्ति॥7॥

 अन्वयः—हे वज्रबाहू इन्द्राग्नी! युवां य इमे सूर्यस्य रश्मयः सन्ति ते रक्षणादिकं च कुर्वन्ति यथा च पितरो येभिर्यैः कर्मभिर्नोऽस्मभ्यं सपित्वं प्रदायोपकारका आसन् तथा शचीभिरस्मान्नाभरतं शिक्षतं सततं न्ववतं च॥7॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्या! यः सुशिक्षया मनुष्येषु सूर्यवद्विद्याप्रकाशको मातापितृवत्कृपया रक्षकोऽध्यापकस्तथा सूर्यवत् प्रकाशितप्रज्ञोध्येता चास्ति तौ नित्यं सत्कुरुत नह्येतेन कर्मणा विना कदाचिद्विद्योन्नतिः सम्भवति॥7॥

 पदार्थः—(वज्रबाहू) जिनके वज्र के तुल्य बल और वीर्य हैं, वे (इन्द्राग्नी) हे पढ़ने और पढ़ानेवालो! तुम दोनों जैसे (इमे) ये (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मयः) किरणें हैं और (ते) रक्षा आदि करते हैं और जैसे (पितरः) पितृजन (येभिः) जिन कामों से (नः) हम लोगों के लिये (सपित्वम्) समान व्यवहारों की प्राप्ति करने वा विज्ञान को देकर उपकार के करनेवाले (आसान्) होते हैं, वैसे (शचीभिः) अच्छे काम वा उत्तम बुद्धियों से (अस्मान्) हम लोगों को (आ, भरतम्) स्वीकार करो, (शिक्षतम्) शिक्षा देओ और (नु) शीघ्र (अवतम्) पालो॥7॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो! जो अच्छी शिक्षा से मनुष्यों में सूर्य के समान विद्या का प्रकाशकर्ता और माता-पिता के तुल्य कृपा से रक्षा करने वा पढ़ानेवाला तथा सूर्य के तुल्य प्रकाशित बुद्धि को प्राप्त और दूसरा पढ़नेवाला है, उन दोनों का नित्य सत्कार करो। इस काम के विना कभी विद्या की उन्नति होने का संभव नहीं है॥7॥ 

पुनस्तौ कीदृशावित्युपदिश्यते॥ 

फिर वे दोनों कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥ 

पुरं॑दरा॒ शिक्ष॑तं वज्रहस्ता॒ऽस्माँ इ॑न्द्राग्नी अवतं॒ भरे॑षु। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥8॥29॥ 

पुर॑म्ऽदरा। शिक्ष॑तम्। व॒ज्र॒ऽह॒स्ता॒। अ॒स्मान्। इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑। अ॒व॒त॒म्। भरे॑षु। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥8॥ 

पदार्थः—(पुरन्दरा) यौ शत्रूणां पुराणि दारयतस्तौ (शिक्षतम्) (वज्रहस्ता) वज्रहस्तौ वज्रं विद्यारूपं वीर्यं हस्त इव ययोस्तौ। वज्रो वै वीर्यम्। (शत॰7.4.2.24) अत्रोभयत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः। (अस्मान्) (इन्द्राग्नी) उपदेश्योपदेष्टारौ (अवतम्) रक्षादिकं कुरुतम् (भरेषु) (तन्नो मित्रो॰) इति पूर्ववत्॥8॥

 अन्वयः—हे पुरन्दरा वज्रहस्तेन्द्राग्नी! युवां यथा मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्नो मामहन्तां तथाऽस्मान् तद्विज्ञानं शिक्षतं भरेष्ववतञ्च॥8॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा मित्रादयः स्वमित्रादीन् रक्षित्वा वर्धयन्त्यानुकूल्ये वर्त्तन्ते तथोपदेश्योपदेष्टारौ परस्परं विद्यां वर्धयित्वा संप्रीत्या सखित्वे वर्त्तेयाताम्॥8॥ अत्रेन्द्राग्निशब्दार्थवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति वेद्यम्॥ इति नवोत्तरशततमं 109 सूक्तमेकोनत्रिंशो 29 वर्गश्च समाप्तः॥

 पदार्थः—जो (पुरन्दरा) शत्रुओं के पुरों को विध्वंस करनेवाले वा (वज्रहस्ता) जिनका विद्यारूपी वज्र हाथ के समान है, वे (इन्द्राग्नी) उपदेश के सुनने वा करनेवाले तुम जैसे (मित्रः) सुहृज्जन (वरुणः) उत्तम गुणयुक्त (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्य का प्रकाश (नः) हम लोगों को (मामहन्ताम्) उन्नति देता है, वैसे (अस्मान्) हम लोगों को (तत्) उन उक्त पदार्थों के विशेष ज्ञान की (शिक्षतम्) शिक्षा देओ और (भरेषु) संग्राम आदि व्यवहारों में (अवतम्) रक्षा आदि करो॥8॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे मित्र आदि जन अपने मित्रादिकों की रक्षा कर और उन्नति करते वा एक-दूसरे की अनुकूलता में रहते हैं, वैसे उपदेश के सुनने और सुनाने वाले परस्पर विद्या की वृद्धि कर प्रीति के साथ मित्रपन में वर्त्ताव रक्खें॥8॥

 इस सूक्त में इन्द्र और अग्नि शब्द के अर्थ का वर्णन है। इससे इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति है, यह जानना चाहिये॥ यह एकसौ नववाँ 109 सूक्त और उनतीसवाँ 29 वर्ग पूरा हुआ॥



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