🚩‼️ओ३म्‼️🚩
🕉️🙏🏽 सभी मित्रों को बासन्ती नवसस्येष्टि ( होलिकोत्सव ) की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं!!!
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🔥इस पर्व का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ, परन्तु होली होलक का अपभ्रंश है।
यथा–
तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक: (शब्द कल्पद्रुम कोष) अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह। (भाव प्रकाश)
'होलिका' (होलक) का वैदिक एवं आयुर्वेदिक स्वरूप
आपके द्वारा उद्धृत दोनों प्रमाण शब्दकल्पद्रुम और भावप्रकाश से लिए गए हैं, जो "होलक" शब्द के अर्थ और उसके पारंपरिक उपयोग को स्पष्ट करते हैं।
मूल उद्धरण
तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलकः।— शब्दकल्पद्रुम
अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृणभ्रष्टैश्च होलकः।होलकोऽल्पानिलो मेदः कफदोषश्रमापहः॥— भावप्रकाश
शब्दार्थ
- तृणाग्नि — घास-फूस अथवा सूखी वनस्पतियों की अग्नि।
- भ्रष्ट — भुना हुआ।
- शमी धान्य — शमी अथवा अन्य अर्धपक्व धान्य (संदर्भानुसार हरे अनाज)।
- होलकः — तृणाग्नि में भुना हुआ अन्न।
- अल्पानिलः — वात को संतुलित करने वाला।
- मेदः — शरीर की अतिरिक्त चर्बी।
- कफदोष — कफ विकार।
- श्रमापहः — थकान दूर करने वाला।
भावार्थ
"होलक" वह अन्न है जिसे सूखी घास या लकड़ियों की अग्नि में भूनकर तैयार किया जाता है। आयुर्वेद के अनुसार ऐसा भुना हुआ अन्न उचित मात्रा में सेवन करने पर शरीर में वात का संतुलन बनाए रखने, अतिरिक्त कफ और मेद को कम करने तथा श्रम से उत्पन्न थकान को दूर करने में सहायक माना गया है।
परंपरागत महत्व
भारतीय कृषि परंपरा में जब चना, जौ, गेहूँ आदि की नई फसल पकने लगती थी, तब किसान उसकी कुछ बालियों को अग्नि में भूनकर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते थे। इसी भुने हुए नए अन्न को "होलक" कहा गया।
इस परंपरा का उद्देश्य था—
- नई फसल के लिए ईश्वर के प्रति आभार व्यक्त करना।
- नवीन अन्न का शुभारंभ करना।
- समाज में प्रसाद के रूप में अन्न का वितरण करना।
- सामूहिक सद्भाव और उत्सव का वातावरण बनाना।
आयुर्वेदिक दृष्टि
भावप्रकाश के अनुसार, तृणाग्नि में भुना हुआ नया अन्न—
- पाचन में अपेक्षाकृत हल्का हो सकता है।
- कफ की वृद्धि को कम करने में सहायक माना गया है।
- श्रम के बाद ऊर्जा प्रदान करने वाला माना गया है।
- ऋतु परिवर्तन (शिशिर से वसंत) के समय उपयोगी आहार के रूप में वर्णित है।
यह ध्यान रखना चाहिए कि ये आयुर्वेदिक ग्रंथों के पारंपरिक गुण-वर्णन हैं; इन्हें आधुनिक चिकित्सा का प्रत्यक्ष विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
निष्कर्ष
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि "होलक" का मूल अर्थ तृणाग्नि में भुना हुआ नवीन अन्न है। इसका संबंध कृषि, ऋतु परिवर्तन, ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और स्वास्थ्यकर आहार की परंपरा से है। भारतीय संस्कृति में यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आभार, अन्न का सम्मान और सामूहिक सद्भाव का प्रतीक भी है।
अर्थात् ―तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है।
(ब) होलिका ―किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं-जैसे-चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते है कि वह चनादि का निर्माण करती *(माता निर्माता भवति)* यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया।
(स) अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम "होलिकोत्सव" है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम "वासन्ती नव सस्येष्टि" है। यथा―वासन्तो=वसन्त ऋतु। नव=नये। येष्टि=यज्ञ। इसका दूसरा नाम नव सम्वतसर है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है―(१) वैशाखी, (२) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, कैसे सम्भव है। तो कहा गया है–
अग्निवै देवानाम मुखं अर्थात् अग्नि देवों–पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि आग में डाला जायेगा। वह सूक्ष्म होकर पितरों देवों को प्राप्त होगा।
हमारे यहाँ आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं―(१) आषाढ़ मास, (२) कार्तिक मास (दीपावली) (३) फाल्गुन मास (होली) यथा फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत् सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी अर्थात् फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्यमास कहे जाते हैं आग्रहाण या नव संस्येष्टि।
समीक्षा―आप प्रतिवर्ष होली जलाते हो। उसमें आखत डालते हो जो आखत हैं–वे अक्षत का अपभ्रंश रुप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। आप जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। आपकी इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रुपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। आप जो गुलरियाँ बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे दूसरा कारण यह भी था।
ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते ―अर्थात् ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली शिशिर और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है।
पौराणिक मत में कथा इस प्रकार है―होलिका हिरण्यकश्यपु नाम के राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का आस्तिक पुत्र विष्णु की पूजा करता था। वह उसको कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। वह प्रह्लाद को आग में गोद में लेकर बैठ गई, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। होलिका की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है l जो नितांत मिथ्या हैं।।
होली उत्सव यज्ञ का प्रतीक है। स्वयं से पहले जड़ और चेतन देवों को आहुति देने का पर्व हैं। आईये इसके वास्तविक स्वरुप को समझ कर इस सांस्कृतिक त्योहार को बनाये। होलिका दहन रूपी यज्ञ में यज्ञ परम्परा का पालन करते हुए शुद्ध सामग्री, तिल, मुंग, जड़ी बूटी आदि का प्रयोग करना चाहिए।
ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्वां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीवथा मा गृध: कस्य स्विद्वनम् ।। ( यजुर्वेद )
अर्थ -: इस गतिशील संसार में जो कुछ भी है ईशवर उस सब में बसा हुआ है । इसलिए वह हमें सब ओर से देखता है ।यह जानकर तथा उससे डर कर दुसरों के पदार्थों को अन्याय से लेने की कभी इच्छा मत कर ।अन्याय के त्याग और न्यासचरण रूप धर्म से आनन्द को भोग ।
ईशावास्योपनिषद् / यजुर्वेद 40.1 (ईशावास्य मंत्र) की व्याख्या
ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥— यजुर्वेद 40.1 (ईशावास्योपनिषद्, मंत्र 1)
शब्दार्थ
- ईशा — परमेश्वर से, परमात्मा द्वारा।
- वास्यम् — व्याप्त है, आच्छादित है।
- इदम् — यह।
- सर्वम् — सम्पूर्ण।
- यत्किञ्च — जो कुछ भी।
- जगत्याम् — इस गतिशील जगत में।
- जगत् — चर-अचर समस्त संसार।
- तेन — उसी (ईश्वरभाव या त्याग की भावना) से।
- त्यक्तेन — त्यागपूर्वक, आसक्ति छोड़कर।
- भुञ्जीथाः — उपभोग करो, उपयोग करो।
- मा — मत।
- गृधः — लोभ करो, लालच करो।
- कस्यस्वित् — किसी दूसरे का।
- धनम् — धन, संपत्ति।
भावार्थ
यह सम्पूर्ण जगत और इसमें जो कुछ भी है, वह सब परमात्मा से व्याप्त है और उसी का है। इसलिए मनुष्य को त्याग, संयम और उत्तरदायित्व की भावना से संसार के संसाधनों का उपयोग करना चाहिए। किसी दूसरे के धन या अधिकार पर लोभ नहीं करना चाहिए।
दार्शनिक विवेचन
यह मंत्र ईशावास्योपनिषद् का प्रथम और सर्वाधिक प्रसिद्ध मंत्र है। इसमें वैदिक जीवन-दर्शन का सार निहित है।
1. संपूर्ण सृष्टि ईश्वर की है
मनुष्य किसी वस्तु का पूर्ण स्वामी नहीं, बल्कि एक उत्तरदायी संरक्षक (Trustee) है। प्रकृति, धन, ज्ञान और शक्ति—सब ईश्वर की देन हैं।
2. त्यागपूर्वक उपभोग
"तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा" का अर्थ संसार का त्याग करके भाग जाना नहीं है। इसका अर्थ है—
- आवश्यकतानुसार उपयोग करना।
- आसक्ति और अहंकार से मुक्त रहना।
- संसाधनों का दुरुपयोग न करना।
- अपने अधिकार के साथ अपने कर्तव्य को भी समझना।
3. लोभ का त्याग
"मा गृधः कस्यस्विद्धनम्" का संदेश है कि दूसरे के धन, अधिकार या संपत्ति पर लालच न करें। ईमानदारी, न्याय और संतोष ही सुखी समाज की नींव हैं।
जीवनोपयोगी शिक्षा
- संसार की प्रत्येक वस्तु का सम्मान करें, क्योंकि वह ईश्वर की सृष्टि है।
- आवश्यकता के अनुसार उपभोग करें, अपव्यय न करें।
- दूसरों के अधिकारों का सम्मान करें।
- धन कमाएँ, परंतु धर्म और ईमानदारी के साथ।
- संतोष, त्याग और सेवा का भाव विकसित करें।
आज के संदर्भ में
यह मंत्र आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है—
- पर्यावरण संरक्षण का आधार यही है कि प्रकृति को ईश्वर की धरोहर मानकर उसका संरक्षण किया जाए।
- भ्रष्टाचार, शोषण और लालच का समाधान इसी शिक्षा में निहित है।
- सीमित संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही सतत विकास (Sustainable Development) का आधार है।
निष्कर्ष
यह मंत्र सिखाता है कि ईश्वर समस्त सृष्टि में व्याप्त है। इसलिए मनुष्य को लोभ और स्वार्थ का त्याग करके, संतोष, संयम और उत्तरदायित्व के साथ जीवन जीना चाहिए। जो व्यक्ति ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हुए संसार के संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग करता है और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करता है, वही वास्तविक अर्थ में धर्ममय और सुखी जीवन जीता है।
"त्याग, संतोष और ईश्वर-चेतना—यही ईशावास्य मंत्र का शाश्वत संदेश है।"

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