श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत आदिपर्व अध्याय 105 संस्कृत हिन्दी व्याख्या

श्लोक 1-5

वैशंपायन उवाच। संवत्सरानृतून्मासान्बुबुधे न बहून्गतान्। रममाणस्तया सार्धं यथाकामं नरेश्वरः।। (1-105-1) आसाद्य शान्तनुः श्रीमान्मुमुदे योषितां वराम्।। (1-105-2) ऋतुकाले तु सा देवी दिव्यं गर्भमधारयत्। अष्टावजनयत्पुत्रांस्तस्मादमरसन्निभान्।। (1-105-3) जातं जातं च सा पुत्रं क्षिपत्यम्यसि भारत। सूतके कण्ठमाक्रम्य तान्निनाय यमक्षयम्।। (1-105-4) प्रीणाम्यहं त्वामित्युग्त्वा गङ्गास्रोतस्यमज्जयत्। तस्य तन्न प्रियं राज्ञः शान्तनोरभवत्तदा।। (1-105-5)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— उन श्रेष्ठ स्त्री (गंगा) के साथ अपनी इच्छा के अनुसार रमण करते हुए उन नरेश्वर शांतनु को यह पता ही नहीं चला कि कितने वर्ष, ऋतुएँ और महीने बीत गए हैं। श्रीमान शांतनु उस सर्वश्रेष्ठ स्त्री को पाकर बहुत प्रसन्न हुए। तदनंतर उचित समय आने पर उन देवी ने दिव्य गर्भ धारण किया और उन (शांतनु) से अमर देवताओं के समान कांति वाले आठ पुत्रों को जन्म दिया। हे भारत! वह उत्पन्न होने वाले प्रत्येक पुत्र को जन्म लेते ही जल (गंगाजी के प्रवाह) में फेंक देती थीं। सूतिकाकाल में ही उनके गले को दबाकर वह उन्हें यमलोक (मृत्यु के मुख) में पहुँचा देती थीं। "मैं तुम्हें प्रसन्न करती हूँ"— ऐसा कहकर वह उन्हें गंगा के तेज प्रवाह में डुबो देती थीं। राजा शांतनु को उनका यह आचरण बिल्कुल भी प्रिय नहीं लगता था।

व्याख्या: यहाँ शांतनु और गंगा के दांपत्य जीवन के उस गुप्त और मर्मस्पर्शी पक्ष का आरंभ होता है जहाँ गंगा एक-एक करके अपने जन्म लेने वाले सातों पुत्रों को जन्म लेते ही जल में प्रवाहित कर देती हैं। राजा शांतनु अपनी प्रतिज्ञा और प्रेम के कारण अंदर से दुखी होने के बावजूद शांत रहते हैं।

श्लोक 6-11

न च तां किंचनोवाच त्यागाद्भीतो महीपतिः। स्मरन्पितृवचश्चैव नापृच्छत्पुत्रकिल्बिषम्।। (1-105-7) शान्तनुर्धर्मभङ्गाच्च नापृच्छत्तां कथंचन। अष्टमं तु जिघांसन्त्यां चुक्षुभे शान्तनोर्धृतिः।। (1-105-8) अथैनामष्टमे पुत्रे जाते प्रहसतीमिव। उवाच राजा दुःखार्तः परीप्सन्पुत्रमात्मनः।। (1-105-9) अब्रवीद्भरतश्रेष्ठो वाक्यं परमदुःखितः।। (1-105-10) मावधीः कस्य काऽसीति किं हिनत्सि सुतानिति। पुत्रघ्नि सुमहत्पापं संप्राप्तं ते सुगर्हितम्।। (1-105-11)

हिंदी अनुवाद: महीपति शांतनु उनके द्वारा (गंगा द्वारा) छोड़े जाने के भय से उन्हें कुछ नहीं कहते थे। वे अपने पिता (प्रतीप) के वचनों का स्मरण करते हुए पुत्रों के मारे जाने के पाप के संबंध में भी उनसे कोई प्रश्न नहीं करते थे। धर्मभंग होने के भय से शांतनु ने उनसे किसी भी प्रकार की पूछताछ नहीं की, किंतु जब वे आठवें पुत्र को मारने का उपक्रम करने लगीं, तब शांतनु का धैर्य डिग गया। तदनंतर आठवें पुत्र के जन्म पर मानो हँसती हुई-सी दिखाई देने वाली उन गंगा से अपने पुत्र की रक्षा की इच्छा रखने वाले दुःखित राजा ने कहा। भरतश्रेष्ठ राजा ने अत्यंत दुःखी होकर यह वचन कहा— "इसे मत मारो! तुम किसकी पुत्री हो और कौन हो? इन संतानों की हत्या क्यों करती हो? हे पुत्रघातिनी! तुम्हें यह अत्यंत गर्हित (निंदनीय) और महापाप प्राप्त हो रहा है।"

व्याख्या: शांतनु पिता की चेतावनी और अपनी शर्त का पालन करते हुए लंबे समय तक चुपचाप अपने पुत्रों का वध देखते रहे। किंतु जब आठवें पुत्र की बारी आई, तो एक पिता का हृदय विचलित हो गया और उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा तथा शर्त को तोड़ते हुए गंगा से प्रश्न कर ही लिया।

श्लोक 12-19

गङ्गोवाच। पुत्रकाम न ते हन्मि पुत्रं पुत्रवतां वर। जीर्णस्तु मम वासोऽयं यथा सा समयः कृतः।। (1-105-12) अहं गङ्गा जह्नुसुता महर्षिगणसेविता। देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थमुषिताऽहं त्वया सह।। (1-105-13) इमेऽष्टौ वसवो देवा महाभागा महौजसः। वसिष्ठशापदोषेण मानुषत्वमुपागताः।। (1-105-14) तेषां जनयिता नान्यस्त्वदृते भुवि विद्यते। मद्विधा मानुषी धात्री लोके नास्तीह काचन।। (1-105-15) तस्मात्तज्जननीहेतोर्मानुषत्वमुपागता। जनयित्वा वसूनष्टौ जिता लोकास्त्वयाऽक्षयाः।। (1-105-16) देवानां समयस्त्वेष वसूनां संश्रुतो मया। जातं जातं मोक्षयिष्ये जन्मतो मानुषादिति।। (1-105-17) तत्ते शापाद्विनिर्मुक्ता आपवस्य महात्मनः। स्वस्ति तेस्तु गमिष्यामि पुत्रं पाहि महाव्रतम्।। (1-105-18) अयं तव सुतस्तेषां वीर्येण कुलनन्दनः। संभूतोतिजनं कर्म करिष्यति न संशयः।। (1-105-19)

हिंदी अनुवाद: गंगा जी बोलीं— हे पुत्रवानों में श्रेष्ठ पुत्रकाम! मैं तुम्हारे पुत्र को नहीं मार रही हूँ। जैसा कि हमारा पहले समय (समझौता) हुआ था, यह तो मेरे वस्त्र (शारीरिक संबंध या रूप) का जीर्ण होना (समाप्त होना) है। मैं महर्षिगणों द्वारा सेवित जह्नुपुत्री गंगा हूँ। देवताओं के कार्य की सिद्धि के लिए ही मैं तुम्हारे साथ निवास कर रही थी। ये महाभाग और महातेजस्वी आठों वसु देवता वशिष्ठ के शाप के दोष से मनुष्य योनि को प्राप्त हुए थे। पृथ्वी पर तुम्हारे सिवा इनका दूसरा कोई पिता नहीं हो सकता और मेरे जैसी मनुष्य रूप धारण करने वाली गर्भधारिणी (धात्री) भी इस लोक में दूसरी कोई नहीं है। इसलिए इन वसुओं की जननी बनने के लिए ही मैंने मनुष्य रूप प्राप्त किया था। आठ वसुओं को उत्पन्न करके तुमने अक्षय लोकों को जीत लिया है। देवताओं और वसुओं के साथ मेरा यह समझौता तय हुआ था कि मैं जन्म लेते ही इन सबको मनुष्य योनि से मुक्त कर दूँगी। तुम्हारे इस पुत्र को छोड़कर वे सभी महात्मा आपव (वशिष्ठ) के शाप से मुक्त हो चुके हैं। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाती हूँ। हे महाव्रत! तुम अपने इस शेष बचे हुए पुत्र की रक्षा करो। कुलनन्दन! तुम्हारा यह पुत्र उन वसुओं के ही आधे-आधे तेज से उत्पन्न हुआ है, यह संसार में बहुत बड़े-बड़े कर्म करेगा, इसमें कोई संशय नहीं है।

व्याख्या: यहाँ गंगा अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करती हैं और शांतनु को समझाती हैं कि उन्होंने जिन पुत्रों को प्रवाहित किया, वे वस्तुतः वशिष्ठ के शाप से मुक्त हुए अष्टवसु थे। आठवें पुत्र को वे मुक्त नहीं करतीं, बल्कि उसे जीवित लौटाती हैं— जो आगे चलकर महापराक्रमी भीष्म (देवव्रत) के रूप में प्रसिद्ध होता है।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः।। 105 ।।

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