उनके पीछे-पीछे तपोवन का एक मृग चल रहा था, जिसके साथ उनका गहरा परिचय था। वह मृग अपनी चंचल आँखों से हारीत के हाथ में स्थित फूलों को देख रहा था। हारीत का व्यक्तित्व विभिन्न उपमानों से युक्त था:
- द्रौणि (अश्वत्थामा) के समान: जैसे अश्वत्थामा 'कृपा' (आचार्य) के साथ रहते थे, वैसे ही हारीत 'कृपा' (दया) से युक्त थे।
- नक्षत्रराशि के समान: जैसे नक्षत्र मण्डल 'चित्र', 'मृग', 'कृत्तिका' और 'आश्लेषा' से सुशोभित होता है, वैसे ही हारीत विचित्र मृगचर्म (मृगकृत्तिका) और जटाओं के विन्यास (आश्लेष) से शोभित थे।
- समुद्र के समान: जैसे समुद्र में जल का भँवर होता है, वैसे ही हारीत के कण्ठ में रेखाओं का चक्र था।
- प्रभात काल के समान: जैसे सुबह की धूप कपिल (लाल-पीली) होती है, वैसे ही उनका शरीर तपस्या के तेज से कपिल वर्ण का था।
"प्रायेणाकारणमित्राण्यतिकरुणाद्राणि च सदा खलु भवन्ति सतां चेतांसि"
अर्थात्: सज्जनों के चित्त सदैव बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के मित्र होते हैं और करुणा से आर्द्र (कोमल) रहते हैं।
इसी करुणा के वशीभूत होकर उन्होंने मुझ (वैशम्पायन) को उस दयनीय अवस्था में देखा और अपने साथ के ऋषिकुमार से कहा— "यह छोटा सा पक्षी, जिसके अभी पंख भी नहीं उगे हैं, वृक्ष के शिखर से गिर पड़ा है।"
He was followed by a forest deer, a familiar companion nurtured by handfuls of wild grains (Nivara). The sage was described through masterful metaphors:
- Like Ashwatthama (Drauni): Just as Ashwatthama was followed by Kripa (his uncle and teacher), Harita was followed by Kripa (boundless compassion).
- Like the Celestial Firmament: Adorned with the skin of a spotted deer, much as the sky is adorned with constellations like Chitra and Mrigashira.
- Like the Dawn: His complexion was tawny (Kapila), glowing with the radiant heat of his rigorous penance, much like the rays of the rising sun.