एवं तस्य सर्वविद्यापरिचयमाचरतश्चन्द्रापीडस्य त्रिभुवनविलोभनीयोमृत रस इव सागरस्य सकललोकहृदयानन्दनश्चन्द्रोदय इव प्रदोषस्य बहुविधरागविकारभङ्गुरः सुरधनुः कलाप इव जलधरसमयस्य मकरध्वजायुधभूतः कुसुमप्रसव इव कल्पपादपस्याभिनवाभिव्यज्यमानरागरमणीयः सूर्योदय इव कमलवनस्य विविधलास्यविलासयोगः कलाप इव शिखण्डिनो यौवनारम्भः प्रादुर्भवन्नमणीयस्यापि द्विगुणां रमणीयतां पुपोष। लब्धावसरो नवसेवक इव निकटीबभूवास्य मन्मथः। लक्ष्म्या सह वितस्तार वक्षःस्थलम्। बन्धुजनमनोरथैः सहापूर्यतोदण्डद्वयम्। अरिजनेन सह तनिमानमभजत् मध्यभागः। त्यागेन सह प्रथिमानमाततान नितम्बभागः।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| वृकोदरस्येव | वृकस्य इव उदरं यस्य (भीमः) | भीम के समान (महाप्राणता/शक्ति) |
| सिंहकिशोरक्रमम् | सिंहस्य किशोरः (शावकः) | सिंह के शावक के आक्रमण के समान |
| सहपांशुकीडनतया | पांशु (धूलि) क्रीडन + तल + टाप् | बचपन में साथ धूल में खेलने के कारण |
| मकरध्वजायुधभूतः | मकरध्वजस्य (कामदेवस्य) आयुधः | कामदेव के अस्त्र के समान (यौवन) |
| आयोदण्डेन | अयसः दण्डेन | लोहे के भारी व्यायाम-स्तम्भ से |
केवल शारीरिक महाशक्ति को छोड़कर, अन्य सभी कलाओं में वैशम्पायन ने चन्द्रापीड का पूर्णतः अनुकरण किया (यानी वे भी उतने ही निपुण हुए)। समस्त विद्याओं के परिचय, मन्त्री शुकनास के प्रति आदर और बचपन से साथ धूल में खेलने के कारण वैशम्पायन चन्द्रापीड के "दूसरे हृदय" के समान अभिन्न मित्र बन गए। चन्द्रापीड उनके बिना एक क्षण भी अकेले नहीं रह सकते थे, और वैशम्पायन भी चन्द्रापीड का उसी तरह साथ देते थे जैसे दिन सूर्य का साथ देता है।
इस प्रकार विद्याभ्यास करते हुए चन्द्रापीड के शरीर में 'यौवन' (जवानी) का आरम्भ हुआ। यह यौवन सागर से निकले अमृत के समान, रात्रि के लिए चन्द्रोदय के समान और वर्षा ऋतु के लिए इन्द्रधनुष के समान शोभायमान था। कामदेव का अस्त्र बना यह यौवन उनके शरीर की सुंदरता को दोगुना करने लगा। अवसर पाकर कामदेव उनके निकट एक सेवक की तरह रहने लगा। लक्ष्मी के साथ-साथ उनका वक्षस्थल भी विशाल हो गया। परिजनों की इच्छाओं के साथ-साथ उनकी भुजाएँ भी पुष्ट हो गईं। शत्रुओं की संख्या के साथ-साथ उनका मध्यभाग (कमर) भी क्षीण (पतला) हो गया, और दानशीलता के साथ-साथ उनके नितम्ब भाग का विस्तार हुआ।
Except for that immense physical strength, Vaishampayana followed Chandrapida in mastering all other arts and sciences. Due to their shared education, deep respect for Minister Shukanasa, and having played together in the dust since childhood, Vaishampayana became Chandrapida's "second heart" and closest friend. Chandrapida could not remain alone for even a moment without him, and Vaishampayana followed him just as the day follows the sun.
While thus engaged in his studies, the onset of youth (Yauvana) graced Chandrapida. This youth was like nectar rising from the ocean, like the moonrise to the evening, and like a rainbow to the rainy season. Becoming an instrument for the God of Love (Kamadeva), this youth doubled his natural charm. Seizing the opportunity, Cupid began to dwell near him like a new attendant. Along with his prosperity (Lakshmi), his chest broadened. Along with the desires of his kin, his arms grew powerful. While his waist became slender like the diminishing number of his enemies, his hips attained greatness alongside his generosity.
एवं च क्रमेण समारूढयौवनारम्भं परिसमाप्तसकलकलाविज्ञानमधीताशेषविद्यं चावगम्यानुमोदितमाचार्यैश्चन्द्रापीडमानेतुं राजा बलाधिकृतं बलाहकनामानमाहूय बहुतुरगबलपदातिपरिवृतमतिप्रशस्तेहनि प्राहिणोत्। स गत्वा विद्यागृहं द्वाःस्थैः समावेदितः प्रविश्य क्षितितलाविलम्बितचूडामणिना शिरसा प्रणम्य स्वभूमिसमुचिते राजसमीप इव सविनयमासने राजपुत्रानुमतो न्यषीदत्।
स्थित्वा च मुहूर्तमात्रं बलाहकश्चन्द्रापीडमुपसृत्य दर्शितविनयो व्यजिज्ञपत्। कुमार महाराजः समाज्ञापयति। पूर्णा नो मनोरथाः। अधीतानि शास्त्राणि। शिक्षिताः सकलाः कलाः। गतोसि सर्वास्त्रायुधविन्यासु परां प्रतिष्ठाम्। अनुमोतोसि निर्गमाय विद्यागृहात्सर्वाचार्यैः। उपगृहीतशिक्षं गन्धगजकुमारकमिव वारिबन्धान्निर्गतमवगतसकलकलाकलापं पौर्णमासीशशिनमिव नवोद्गतं पश्यतु त्वां जनः। ब्रजन्तु सफलतामतिचिरदर्शनोत्कण्ठितानि लोकलोचनानि। दर्शनं प्रति ते समुत्सुकान्यतीव सर्वाण्यन्तःपुराणि। अयमत्रभवतो दशमो वत्सरो विद्यागृहमिधिवसतः। प्रविष्टोसि षष्ठमनुभवन्वर्षम्। एवं संपिण्डितेनामुना षोडशेन प्रवर्षसे। तदद्यप्रभृति निर्गत्य दर्शनोत्सुकाभ्यो दत्त्वा दर्शनमखिलाभ्यो मातृभ्योभिवाद्य च गुरुनपगतनियन्त्रणो यथासुखमनुभव राज्यसुखानि नवयौवनललितानि च। संमानय राजलोकम्। पूजय द्विजातीन्। परिपालय प्रजाः। आनन्दय बन्धुवर्गम्।
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| बलाधिकृतम् | बलानां (सेनानां) अधिकृतः | सेनापति (Commander of forces) |
| बलाहकनामानम् | बलाहकः इति नाम यस्य तम् | बलाहक नामक व्यक्ति को |
| अधिताशेषविद्यम् | अधितानि शेषाः विद्याः येन तम् | जिसने समस्त विद्याएँ पढ़ ली हों |
| षोडशेन प्रवर्षसे | षोडश (१६) वर्षे | सोलहवें वर्ष में प्रवेश (आयु १६ वर्ष) |
| गन्धगजकुमारकम् | गन्धगजस्य कुमारकः इव | मत्त हाथी के बच्चे के समान |
इस प्रकार जब चन्द्रापीड युवावस्था में पहुँचे और आचार्यों ने पुष्टि कर दी कि उन्होंने समस्त शास्त्रों, कलाओं और शस्त्र-विद्या में सर्वोच्च निपुणता प्राप्त कर ली है, तब महाराज तारापीड ने उन्हें वापस लाने के लिए 'बलाहक' नामक सेनापति को चतुरंगिणी सेना के साथ एक शुभ दिन पर भेजा। सेनापति ने विद्या-मन्दिर पहुँचकर राजकुमार को प्रणाम किया और उनके अनुमति देने पर उचित आसन पर बैठा।
कुछ समय पश्चात बलाहक ने चन्द्रापीड के पास जाकर विनयपूर्वक महाराज का संदेश सुनाया— "हे कुमार! महाराज की आज्ञा है कि हमारे मनोरथ पूर्ण हुए। आपने सभी शास्त्र पढ़ लिए, कलाएँ सीख लीं और अस्त्र-शस्त्र चलाने में परम प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली। सभी आचार्यों ने अब आपको विद्या-मन्दिर से बाहर जाने की अनुमति दे दी है। अब लोग आपको वैसे ही देखें जैसे बंधन से मुक्त हुए किसी मत्त हाथी को या पूर्णिमा के नए उगे चंद्रमा को देखते हैं। नगरवासियों की आँखें जो बहुत समय से आपके दर्शन को उत्सुक थीं, अब सफल हों। अंतःपुर की सभी माताएँ आपको देखने के लिए व्याकुल हैं। आपको इस पाठशाला में रहते हुए १० वर्ष हो गए हैं। आप छठे वर्ष में यहाँ आए थे और अब १६वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। अतः आज से बाहर निकलकर माताओं और गुरुजनों का आशीर्वाद लें और बिना किसी बंधन के राज्य के सुखों और नए यौवन का आनंद लें। राजाओं का सम्मान करें, ब्राह्मणों को पूजें, प्रजा का पालन करें और अपने बंधु-बांधवों को आनंदित करें।"
When King Tarapida learned that Chandrapida had attained youth and mastered all sciences, arts, and weaponry as confirmed by the teachers, he sent the commander named Balahaka with a vast army on an auspicious day to fetch him. Balahaka reached the academy, bowed deeply before the prince, and with his permission, sat on a respectful seat.
After a while, Balahaka approached Chandrapida and conveyed the King's message: "O Prince! The King says our desires are fulfilled. You have mastered all scriptures and arts, and achieved the highest proficiency in weaponry. All your teachers have now granted you permission to leave the academy. Let the people behold you now, like a majestic elephant released from captivity or like the newly risen full moon. Let the eyes of the citizens, longing for your sight for so long, find fulfillment. All the queens in the inner chambers are eager to see you. It has been 10 years since you came to this academy; you entered in your 6th year and are now in your 16th. Therefore, from today, go forth, seek the blessings of your mothers and elders, and enjoy the royal pleasures and the charms of youth without restraint. Respect the kings, worship the learned Brahmins, protect your subjects, and bring joy to your kinsmen."
इत्यभिधाय विरतवचसि बलाहके चन्द्रापीड: पितुराज्ञां शिरसि कृत्वा नवजलधरध्वानगम्भीरया गिरा प्रवेश्यतामिन्द्रायुध इति निर्जगामिषुरादिदेश। अथ वचनान्तरमेव प्रवेशितमुभयतः खलीनकनककटकावलग्राभ्यां पदे-पदे कृताकुञ्चनप्रयत्नाभ्यां पुरुषाभ्यामवकृष्यमाणमतिप्रमाणमूर्ध्वकरपुरुषप्राप्यपृष्ठभागमापिबन्तमिव संमुखागतमखिलमाकाशमतिनिष्ठुरं मुहुर्मुहु: प्रकम्पितोदररन्ध्रेण हेषारवेण पूरितभुवनोदरविवरेण निर्भर्त्सयन्तमिवलीकवेगदुर्विदग्धं गरुत्मन्तमतिदूरमवनमता प्रतिक्षणमतिदूरमुज्जमता च जवनिरोधस्फीतरोषघुरघुरायमाणघोरघोणेन शिरोभागेण निजजवदर्पवशादुल्लङ्घनार्थमाकलयन्तमिव त्रिभुवनमसितपीतहरितपाटलमिराखण्डलचापकारिणीभिर्लेखाभि: कल्माषितशरीरमास्तीर्णविचित्रवर्णकम्बलमिव कुंजरकलभं कैलासतटाघातधातुधूलिपाटलमिव हरवृषभमसुररुधिरपङ्कलेखालोहितसटमिव...
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| अनिलगरुडसमजव: | अनिल: (वायु:) गरुडश्च ताभ्यां सम:जव: यस्य स: | वायु और गरुड़ के समान वेग वाला |
| अयोनिजम् | न योन्या: जायते इति | जो गर्भ से उत्पन्न न हुआ हो (दिव्य) |
| इन्द्रायुधनामा | इन्द्रायुध: इति नाम यस्य स: | इन्द्रायुध नामक (अश्व) |
| उच्चै:श्रवस: | इन्द्र के प्रसिद्ध अश्व के समान | दिव्य लक्षणों वाला अश्व |
| मूर्धाभिषिक्त | मूर्ध्नि अभिषिक्ता: (राजा:) | राजवंशों में उत्पन्न (राजपुत्र) |
बलाहक के चुप होने पर चन्द्रापीड ने पिता की आज्ञा को शिरोधार्य किया और नवीन बादलों के समान गंभीर स्वर में आदेश दिया— "इन्द्रायुध को भीतर प्रवेश कराया जाए।" आदेश मिलते ही दो पुरुषों द्वारा खींचकर लाया जाता हुआ वह विशाल घोड़ा प्रविष्ट हुआ। वह घोड़ा इतना ऊँचा था कि उसका पिछला भाग हाथ उठाए हुए पुरुष की पहुँच तक आता था। वह अपनी हिनहिनाहट (हेषारव) से मानो पूरे ब्रह्मांड को भर रहा था और गरुड़ के वेग का भी तिरस्कार कर रहा था। उसका शरीर इंद्रधनुष की तरह काली, पीली, हरी और लाल रेखाओं से चित्रित था, जिससे वह विचित्र रंगों के कंबल से ढके हुए हाथी के बच्चे के समान लग रहा था। वह कैलाश पर्वत की धातु-धूलि से रंगे शिव के बैल (नंदी) अथवा असुरों के रक्त से सनी गर्दन वाले सिंह के समान तेजस्वी दिख रहा था।
When Balahaka finished speaking, Chandrapida accepted his father's command with great respect. In a voice as deep as fresh thunderclouds, he ordered, "Let Indrayudha be brought in." Immediately, the horse was led in by two men pulling at his golden bits. He was so massive that his back reached the height of a man with raised arms. With his piercing neighing, he seemed to fill the hollow of the universe, mocking even the speed of Garuda. His body was marked with black, yellow, green, and red streaks like a rainbow, making him look like a young elephant covered in a multi-colored blanket. He appeared as majestic as Shiva's bull (Nandi) stained with the mineral dust of Mount Kailash or a lion with its mane reddened by the blood of demons.
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| रंह:संघातम् | रंहस: (वेगस्य) संघात: (समूह:) तम् | मानो वेग का पुंज या समूह हो |
| अतिजवापीतम् | अतिजवेन आपीत: (पियत:) तम् | अत्यधिक वेग के कारण पी ली गई (वायु) |
| लालाजलमुव: | लालाया: जलम् (थूक/झाग) मुञ्चति इति | मुख से झाग उगलने वाला |
| वेगसब्रह्मचारिणम् | वेगस्य सब्रह्मचारी (समान:) तम् | मन के वेग के समान गति वाला |
| सकलवसुंधरोल्लङ्घनक्षमम् | सकलां वसुंधरां उल्लङ्घयितुं क्षम: | पूरी पृथ्वी को लाँघने में समर्थ |
उसने सोने और रत्नों से जड़े जो आभूषण पहने थे, वे प्रत्येक कदम पर मधुर ध्वनि (मुरज वाद्य की भाँति) कर रहे थे। उन आभूषणों में जड़े मरकत मणियों की हरी प्रभा के कारण उसका शरीर श्यामल दिख रहा था, जिससे ऐसा भ्रम होता था मानो सूर्य के रथ का घोड़ा आकाश से नीचे उतर आया हो। अत्यधिक वेग को रोकने के कारण उत्पन्न क्रोध से उसके रोम-कूपों से पसीने की बूंदें निकल रही थीं, जो समुद्र के मोतियों के समान उज्ज्वल थीं। उसके खुर पृथ्वी को इस प्रकार थपथपा रहे थे मानो कोई संगीत का अभ्यास कर रहा हो। वह अपनी विशाल छाती, सुडौल गर्दन और सुगठित अंगों के कारण गरुड़ के वेग को चुनौती देने वाला और साक्षात् वायु का अंशावतार प्रतीत हो रहा था। वह पूरी पृथ्वी को एक ही छलांग में लाँघने में सक्षम था। उसका मुख किसी तपस्वी के तिलक के समान सफेद निशान से सुशोभित था और उसकी कांति ग्रीष्म काल के प्रचंड सूर्य के समान तेजस्वी थी।
The ornaments of gold and jewels he wore made a rhythmic sound (like a drum) with every step. Due to the green reflection of the emeralds set in his trappings, his body appeared dark, creating the illusion that one of the horses of the Sun's chariot had descended from the sky. Sweat droplets, bright as ocean pearls, emerged from his pores due to the fury of being restrained. His hooves struck the ground with a rhythmic beat as if practicing a musical performance. With his broad chest, slender neck, and powerful build, he seemed a rival to Garuda's speed and an incarnation of the Wind-god. He was capable of leaping across the entire earth in a single bound. His forehead was marked with a white blaze like the sectarian mark of a sage, and his brilliance was as intense as the mid-day sun in summer.
दृष्ट्वा च तमदृष्टपूर्वममानुषलोकोचिताकारमखिलत्रिभुवनराज्योचितमशेषलक्षणोपपन्नमश्वरूपातिशयमतिधीरप्रकृतेरपि चन्द्रापीडस्य पस्पर्श विस्मयो हृदयम्। आसीच्चास्य मनसि। सरभसविवर्तनवलितवासुकिभ्रमितमन्दरेण मथ्नता जलनिधिजलमिदमश्वरत्नमनभ्युद्धरता किं नाम रत्नमुद्धृतं सुरासुरलोकेन। अनारोहता च मेरुशिलातलविशालमस्य पृष्ठमाखण्डलेन किमासादितं त्रैलोक्यराज्यफलम्। उच्चै:श्रवसा विस्मितहृदयो वञ्चित: खलु जलनिधिना शतमख:। मन्ये च भगवतो नारायणस्य चक्षुर्गोचरमियता कालेन नायमुपगत:। येनाद्यापि ता गरुडारोहणव्यसनितां न परित्यजति। अहो खल्वतिशयितत्रिदशराजसमृद्धिरियं तातस्य राजलक्ष्मी:। यदेवंविधान्यपि सकलत्रिभुवनदुर्लभानि रत्नान्युपकरणतामागच्छन्ति। अतितेजस्वितया महाप्राणतया च सदैवतेवेयमस्याकृति:। यत्सत्यमारोहणे शङ्कामिव मे जनयति। न हि सामान्यवाजिनाममानुषलोकोचिता: सकलत्रिभुवनविस्मयजनन्य ईदृश्यो भवन्त्याकृतय:। दैवतान्यपि हि मुनिशापवशादुज्झितनिजशरीराणि शापवचनोपनीतानि शरीरान्तराण्यध्यासत एव। श्रूयते हि। पुरा किल स्थूलशिरा नाम महातपा मुनिरखिलभुवनललामभूतामपसरसं रम्भाभिधानां शशाप। सा सुरलोकमपहायाश्वहृदये निवेश्यात्मानमश्वहृदयेतिविख्याता वडवा मृत्तिकावत्यां शतधन्वानं नाम राजानमुपसेवमाना मर्त्यलोके महान्तं कालमुवास। अन्ये च महात्मानो मुनिजनशापपरिप्रीत...
| पद (Word) | विग्रह / विवरण | विशेष / अर्थ |
|---|---|---|
| सदागत्यभिमुखम् | सदागति: (वायु:) तस्य अभिमुख: | सदा वायु के वेग के सन्मुख रहने वाला |
| अमानुषलोकोचिताकारम् | न मानुष: अमानुष: (दिव्य:) तस्य उचित: आकार: | दिव्य लोक के योग्य आकृति वाला |
| शतमख: | शतं मखा: (यज्ञा:) यस्य स: | इन्द्र (सौ यज्ञ करने वाला) |
| अश्वहृदयेतिविख्याता | अश्वस्य हृदयं यस्या: सा | 'अश्वहृदया' नाम से प्रसिद्ध |
| चक्रवर्तिनरवाहनोचितम् | चक्रवर्तिन: नरवाहनस्य उचितम् | चक्रवर्ती और नरवाहन के योग्य |
उस अलौकिक आकृति वाले और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त अश्व को देखकर चन्द्रापीड का धैर्यवान हृदय भी विस्मय से भर गया। उसने मन में सोचा— "जब देवताओं और असुरों ने मन्दराचल पर्वत से समुद्र का मंथन किया था, तब यदि उन्होंने इस अश्वरत्न को नहीं निकाला, तो फिर भला उन्होंने कौन सा रत्न निकाला? इन्द्र ने यदि इसकी सुविशाल पीठ पर सवारी नहीं की, तो उन्हें त्रैलोक्य के राज्य का क्या फल मिला? जलधि (समुद्र) ने 'उच्चैःश्रवा' जैसा घोड़ा देकर इन्द्र को निश्चय ही ठग लिया है। मुझे लगता है कि भगवान नारायण की दृष्टि अब तक इस पर नहीं पड़ी, अन्यथा वे गरुड़ की सवारी का मोह त्यागकर इसी को अपना वाहन बना लेते। धन्य है पिताजी की राजलक्ष्मी, जिनके पास त्रिभुवन में दुर्लभ ऐसे रत्न उपकरण के रूप में विद्यमान हैं।"
चन्द्रापीड आगे विचार करता है कि इस अश्व का तेज और प्राणशक्ति इतनी अधिक है कि इसकी आकृति 'दैवीय' प्रतीत होती है। साधारण घोड़ों की ऐसी आकृति नहीं होती जो पूरे ब्रह्मांड को चकित कर दे। देवता भी मुनि के शाप वश अपना शरीर छोड़कर दूसरे शरीरों में निवास करते हैं। जैसा कि सुना जाता है— प्राचीन काल में **स्थूलशिरा** नामक महातपस्वी मुनि ने **रम्भा** नामक अप्सरा को शाप दिया था। तब उसने स्वर्ग छोड़कर घोड़ी का रूप धारण किया और 'अश्वहृदया' नाम से प्रसिद्ध होकर मृत्यलोक में राजा शतधन्वा की सेवा की। अवश्य ही यह अश्व भी कोई शापग्रस्त महापुरुष या देवता है।
Upon seeing that form, which was suitable for a divine world and endowed with all auspicious marks, even the deeply composed heart of Chandrapida was struck with wonder. He thought to himself: "When the gods and demons churned the ocean with Mount Mandara, if they did not extract this horse-jewel, then what jewel did they truly find? If Indra did not mount this broad back, what was the use of his sovereignty over the three worlds? The ocean surely deceived Indra by giving him the horse Uchhaishravas instead. I believe Lord Narayana’s eyes have not yet fallen upon this horse; otherwise, He would have abandoned His fondness for riding Garuda and chosen this as His vehicle. Truly, my father’s royal fortune is superior to that of the gods, as such rare treasures serve him."
He further pondered that the intense brilliance and vitality of this horse suggested a divine nature. Ordinary horses do not possess such forms that astonish the entire universe. Even deities, due to the curses of sages, leave their original bodies and inhabit other forms. It is heard that in ancient times, a great sage named **Sthulashira** cursed the celestial nymph **Rambha**. Consequently, she left heaven, entered the body of a mare, and became famous as 'Ashvahridaya', serving King Shatadhanva in the mortal world for a long time. Surely, this horse too is some cursed great soul or deity.


