पद्मपुराण भूमिखण्ड अध्याय ३८–३९ का सार और ऋग्वेद के नासदीय एवं दान सूक्त का तुलनात्मक अध्ययन

पद्मपुराण भूमिखण्ड अध्याय ३८–३९ का सार और ऋग्वेद के नासदीय एवं दान सूक्त का तुलनात्मक अध्ययन


पद्मपुराण भूमिखण्ड अध्याय ३८–३९ का सार और ऋग्वेद के नासदीय एवं दान सूक्त का तुलनात्मक अध्ययन

प्रस्तावना : सृष्टि, चेतना और ज्ञान का प्रवाह

पद्मपुराण भूमिखण्ड के अध्याय ३८–३९ तथा ऋग्वेद के नासदीय और दान सूक्त का तुलनात्मक अध्ययन करने पर एक व्यापक विचार-यात्रा सामने आती है। यह यात्रा सृष्टि के मूल तत्त्व की खोज से आरम्भ होकर चेतना के स्वरूप, ज्ञान की प्राप्ति, जीव के आचरण और ज्ञानदान के उत्तरदायित्व तक पहुँचती है।

नासदीय सूक्त सृष्टि के आरम्भ में विद्यमान उस मूल अवस्था का अन्वेषण करता है, जहाँ सामान्य भौतिक विभाजन और परिचित रूपों के आधार पर मूल तत्त्व को नहीं समझा जा सकता। वह काम, मनस्, रेतस्, ऋत और सत्य के संबंधों के माध्यम से सृष्टि के प्राकट्य की विचार-यात्रा प्रस्तुत करता है। इसके विपरीत दान सूक्त ज्ञान के व्यवहारगत और आध्यात्मिक पक्ष को सामने लाता है। वह दान को केवल किसी वस्तु का हस्तांतरण न मानकर ऐसे संबंध के रूप में देखने का मार्ग खोलता है, जिसमें देने वाला, पाने वाला, पात्रता, इच्छा, स्वार्थ और ज्ञान का प्रवाह एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

पद्मपुराण के अध्याय ३८–३९ में यही विषय आख्यान के माध्यम से विकसित होता है। वेन के चरित्र में ज्ञान से विमुखता, अपने को सर्वोच्च मान लेने और धर्म के स्थान पर अपने अहं को स्थापित करने की प्रवृत्ति सामने आती है। पृथु के प्राकट्य के बाद कथा का प्रवाह परिवर्तित होता है। अध्याय ३९ में तप, शुद्धि, ईश्वर के व्यापक स्वरूप, चेतना की विभिन्न अवस्थाओं और दान के महत्त्व का विस्तार मिलता है।

इन तीनों विषयों को एक साथ पढ़ने पर प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि सृष्टि कैसे प्रकट हुई या दान करने से कौन-सा फल प्राप्त होता है। मूल प्रश्न यह बनता है कि चेतना और ज्ञान के साथ जीव का वास्तविक संबंध क्या है, वह संबंध उसके आचरण में किस प्रकार व्यक्त होता है और ज्ञान का प्रवाह दूसरे जीवों तक पहुँचाने का क्या महत्त्व है।

१. पद्मपुराण भूमिखण्ड अध्याय ३८ : वेन का चरित्र और ज्ञान से विमुखता

अध्याय ३८ में वेन का चरित्र ऐसे शासक के रूप में सामने आता है, जो ऋषियों के निर्देशों को स्वीकार करने के स्थान पर अपने को ही सर्वोच्च धर्म, सनातन तत्त्व और समस्त व्यवस्था का आधार घोषित करने लगता है। कथा के आरम्भ में उसके आचरण के परिणामस्वरूप वेदाध्ययन, यज्ञ, दान और धर्म-संबंधी गतिविधियों के रुकने का वर्णन है। ऋषि उसे उसके उत्तरदायित्व का स्मरण कराते हैं, लेकिन वेन अपने ज्ञान को पूर्ण मानकर दूसरों की बात सुनने से इनकार करता है।

इस प्रसंग का केंद्रीय तत्त्व वेन की राजसत्ता मात्र नहीं, बल्कि उसका वह अभिमान है जिसमें वह अपने सीमित ज्ञान को ही अंतिम सत्य मान बैठता है। वह स्वयं को धर्म का आधार घोषित करता है और दूसरों के लिए भी अपनी ही सत्ता को स्वीकार करना अनिवार्य समझता है। यहाँ ज्ञान और अहं के बीच का अंतर महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

ज्ञान का संबंध उस तत्त्व से है जो जीव को अपने वास्तविक स्वरूप और व्यापक व्यवस्था का बोध कराता है। अहंकार इसके विपरीत अपनी वर्तमान धारणा को ही अंतिम मानकर अन्य सभी दृष्टियों को अस्वीकार कर सकता है। जब जीव अपने सीमित अनुभव को पूर्ण ज्ञान समझ लेता है, तब वह ज्ञान के स्रोत से संबंध स्थापित करने के स्थान पर स्वयं को ही उसका स्वामी मानने लगता है।

वेन का चरित्र इसी स्थिति का आख्यानात्मक रूप प्रस्तुत करता है। वह ज्ञान की बात करता है, लेकिन ज्ञान के प्रति ग्रहणशील नहीं रहता। वह धर्म का दावा करता है, लेकिन अपने आचरण को धर्म के व्यापक आधार से जोड़ने के स्थान पर अपनी इच्छा को ही निर्णायक बनाता है।

इस प्रसंग को ऋग्वेद के नासदीय सूक्त के साथ जोड़कर देखने पर एक महत्त्वपूर्ण अंतर स्पष्ट होता है। नासदीय सूक्त सृष्टि के मूल तत्त्व की खोज में अपने विचार को क्रमशः गहराई तक ले जाता है। वह प्रकट जगत् के परिचित रूपों को ही मूल सत्य मानकर नहीं रुकता। वेन इसके विपरीत अपनी वर्तमान धारणा को ही अंतिम मान लेता है। एक ओर मूल तत्त्व की खोज है, दूसरी ओर अपनी धारणा को ही मूल तत्त्व घोषित कर देने की प्रवृत्ति।

इस प्रकार वेन का प्रसंग ज्ञान की अनुपस्थिति से अधिक ज्ञान के प्रति अनुचित अभिमान की समस्या को सामने लाता है। जहाँ ज्ञान का संबंध व्यापक चेतना से टूटकर निजी प्रभुत्व का साधन बन जाता है, वहाँ उसका प्रवाह रुकने लगता है।

धर्म, दान और ज्ञान के प्रवाह का संबंध

अध्याय ३८ में वेदाध्ययन और दान के रुकने का उल्लेख विशेष ध्यान देने योग्य है। ज्ञान केवल किसी व्यक्ति के भीतर संचित रहने वाली जानकारी नहीं है। उसका एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसके प्रवाह में है। ज्ञान का अर्जन, उसका आत्मसात् करना और उसे दूसरे तक पहुँचाना—ये एक ही व्यापक प्रक्रिया के परस्पर संबंधित पक्ष हैं।

जब कोई व्यक्ति अपने ज्ञान को केवल अपने अधिकार की वस्तु समझने लगता है, तब ज्ञान का सामाजिक और आध्यात्मिक प्रवाह बाधित होता है। इस स्थिति में ज्ञान का संग्रह तो हो सकता है, लेकिन उसका वह उद्देश्य पूरा नहीं होता जिसके द्वारा दूसरा जीव भी अपने बोध का विस्तार कर सके।

दान सूक्त इसी समस्या को अधिक सूक्ष्म स्तर पर उठाता है। उसमें देने और न देने का अंतर केवल भौतिक वस्तुओं की उपलब्धता से निर्धारित नहीं होता। देने वाले की वृत्ति, दूसरे की आवश्यकता और ज्ञान के प्रवाह के प्रति उसका व्यवहार भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

वेन के चरित्र और दान सूक्त के इस संबंध को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि ज्ञान का वास्तविक मूल्य उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके उचित प्रयोग और प्रवाह में भी व्यक्त होता है।

२. पृथु का प्राकट्य : अव्यवस्था से नई व्यवस्था की ओर

अध्याय ३८ के उत्तरार्ध में ऋषियों द्वारा वेन के शरीर का मंथन करने और उससे पृथु के प्रकट होने का वर्णन है। कथा में पृथु को महान् बुद्धिमान, शक्तिशाली और पृथ्वी का पालन करने वाला राजा बताया गया है। पृथ्वी का दोहन करने वाला पृथु व्यवस्था, पोषण और लोकपालन के साथ जुड़ता है।

वेन और पृथु के प्रसंग को एक साथ देखने पर दोनों के बीच का अंतर केवल दो राजाओं का अंतर नहीं रह जाता। वेन का चरित्र उस स्थिति को व्यक्त करता है जिसमें सत्ता स्वयं को ही अंतिम आधार मानने लगती है। पृथु का चरित्र उस व्यवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें सत्ता का प्रयोजन लोक के पोषण और संरक्षण से जुड़ता है।

पृथु का पृथ्वी से संबंध भी इसी कारण महत्त्वपूर्ण है। पृथ्वी से प्राप्त होने वाला पोषण केवल अधिकार का विषय नहीं है; वह जीवन के निर्वाह और व्यवस्था के संचालन से संबंधित है। पृथु के माध्यम से कथा शासक और पोषित जगत् के बीच उत्तरदायित्व का संबंध स्थापित करती है।

इस बिंदु पर दान सूक्त के विचार से संबंध बनता है। दान का मूल तत्त्व भी केवल किसी वस्तु को अपने पास से बाहर कर देना नहीं, बल्कि किसी दूसरे के जीवन में आवश्यक पूर्ति का माध्यम बनना है। पृथु का पृथ्वी के पोषण से संबंध और दान सूक्त का देने वाले तथा पाने वाले के संबंध पर बल—दोनों में प्रवाह और पोषण का तत्त्व उपस्थित है।

यहाँ पोषण का व्यापक अर्थ समझना आवश्यक है। जीवन को केवल भौतिक साधनों से ही पोषण नहीं मिलता। ज्ञान, विवेक और सही दिशा भी जीव की उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भौतिक साधन जीवन को चलाने में सहायता करते हैं, जबकि ज्ञान जीव को अपने जीवन और आचरण के स्वरूप को समझने की दिशा देता है।

३. पद्मपुराण भूमिखण्ड अध्याय ३९ : तप, शुद्धि और शाश्वत ज्ञान

अध्याय ३९ का आरम्भ एक प्रश्न से होता है—वेन पाप को त्यागकर स्वर्ग अथवा उच्च अवस्था को कैसे प्राप्त हुआ? उत्तर में ऋषियों का पुण्य-संपर्क, संवाद, तप और ज्ञान की प्राप्ति का वर्णन आता है। कथा बताती है कि वेन ने तप किया, काम और क्रोध से दूर रहा और अंततः भगवान् की कृपा प्राप्त की।

इस प्रसंग में एक महत्त्वपूर्ण क्रम दिखाई देता है। पहले अपने दोषों का सामना, फिर तप के माध्यम से वृत्तियों का परिष्कार, और उसके बाद ज्ञान की प्राप्ति। वेन का पूर्ववर्ती अभिमान इस क्रम में निर्णायक नहीं रहता। अब वह अपनी स्थिति को स्वीकार करके उद्धार की याचना करता है।

यह परिवर्तन केवल बाहरी परिस्थिति का परिवर्तन नहीं है। कथा में वेन का संबंध ज्ञान के साथ बदलता है। पहले वह स्वयं को सब कुछ जानने वाला घोषित करता था; अब वह अपने पूर्वकर्मों को स्वीकार करता है और भगवान् से मार्गदर्शन माँगता है। इस परिवर्तन में ग्रहणशीलता का महत्त्व स्पष्ट होता है।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए केवल यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि सब कुछ ज्ञात है। ज्ञान के प्रति खुलना, अपने आचरण को देखना और उच्चतर तत्त्व से मार्गदर्शन स्वीकार करना भी आवश्यक है। अध्याय ३९ में वेन की स्थिति इसी परिवर्तन के माध्यम से विकसित होती है।

वासुदेव का व्यापक स्वरूप

अध्याय ३९ में वासुदेव के स्वरूप का जो वर्णन मिलता है, वह तुलनात्मक अध्ययन का केंद्रीय आधार है। भगवान् कहते हैं कि यह समस्त जगत् उनकी अव्यक्त मूर्ति से व्याप्त है। जीव जिस सत्ता में स्थित हैं और जो स्वयं समस्त जीवों में व्यापक है, उसे वासुदेव के स्वरूप से जोड़ा गया है।

यह वर्णन ईश्वर को किसी एक सीमित रूप या स्थान तक बाँधकर नहीं रखता। यहाँ व्यापकता का तत्त्व प्रधान है। ईश्वर का संबंध समस्त जगत् से है, लेकिन उसका स्वरूप केवल प्रकट पदार्थों की सीमाओं में समाप्त नहीं हो जाता। अव्यक्त और व्यक्त, व्यापक आधार और प्रकट जगत् के बीच संबंध को समझना इस प्रसंग का मुख्य विषय है।

नासदीय सूक्त में भी सृष्टि के प्रकट रूपों के पीछे स्थित मूल अवस्था का अन्वेषण किया गया है। वहाँ आरम्भ में सत् और असत् के परिचित विभाजन से परे की स्थिति का प्रश्न उठता है। तीसरे मंत्र में अंधकार से आवृत अवस्था तथा तप की महिमा से एक तत्त्व के प्रकट होने का वर्णन आता है। चौथे मंत्र में काम, मनस् और रेतस् के माध्यम से सृष्टि के प्राकट्य की विचार-यात्रा आगे बढ़ती है।

पद्मपुराण का वासुदेव-वर्णन और नासदीय सूक्त का सृष्टि-अन्वेषण एक ही भाषा या आख्यान-पद्धति में नहीं हैं, लेकिन दोनों को साथ पढ़ने पर प्रकट जगत् और उसके व्यापक आधार के संबंध पर विचार करने का अवसर मिलता है। नासदीय सूक्त मूल अवस्था से प्राकट्य की ओर प्रश्न करता है, जबकि पद्मपुराण का यह प्रसंग सर्वव्यापक ईश्वर के स्वरूप को समझाता है।

चेतना की अवस्थाएँ और आत्मस्वरूप

अध्याय ३९ में विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय का वर्णन विशेष महत्त्व रखता है। इन अवस्थाओं के माध्यम से चेतना के अनुभव और आत्मस्वरूप को अलग-अलग स्तरों पर व्यक्त किया गया है।

विश्व का संबंध जाग्रत् अवस्था और बाहरी जगत् के अनुभव से बताया गया है। तैजस स्वप्न-अवस्था से संबंधित है, जहाँ अनुभव का स्वरूप जाग्रत् जगत् से भिन्न होता है। प्राज्ञ सुषुप्ति-अवस्था से जुड़ा है, जबकि तुरीय को निर्विकार, गुणों की अवस्थाओं से परे और साक्षीस्वरूप कहा गया है।

इस क्रम में चेतना को केवल जाग्रत् अवस्था में दिखाई देने वाले अनुभवों तक सीमित नहीं किया गया। अनुभव बदलते हैं, अवस्थाएँ बदलती हैं, लेकिन आत्मस्वरूप का विवेचन इन परिवर्तनों के आधार पर आगे बढ़ता है। तुरीय का वर्णन विशेष रूप से उस निर्विकार स्वरूप की ओर संकेत करता है जो अवस्थाओं के परिवर्तन से परे है।

नासदीय सूक्त में मनस्, ऋत और सत्य के संबंधों का विवेचन भी प्रकट जगत् को समझने की दृष्टि को व्यापक करता है। वहाँ मनस् सृष्टि के आरम्भिक रचनात्मक क्रम में महत्त्वपूर्ण है और ऋषियों द्वारा हृदय में चिंतन करके सत्य तथा असत् के संबंध का अन्वेषण किया जाता है।

इन दोनों प्रसंगों को जोड़कर देखने पर बाहरी जगत् के ज्ञान और स्वयं चेतना के ज्ञान के बीच अंतर सामने आता है। किसी वस्तु को जानना और उस चेतना के स्वरूप को समझना जिससे अनुभव संभव होता है, एक ही बात नहीं है। चेतना की अवस्थाओं का विवेचन इसी अंतर को समझने की दिशा प्रदान करता है।

४. ऋग्वेद का नासदीय सूक्त : सृष्टि के मूल तत्त्व की खोज

ऋग्वेद १०.१२९ का नासदीय सूक्त सात मंत्रों में सृष्टि के मूल स्वरूप का अन्वेषण करता है। इसका आरम्भ उस अवस्था से होता है जहाँ न सत् का परिचित रूप था, न असत् का, न सामान्य अर्थ में आकाश का वह विस्तार था जिसे वर्तमान जगत् में देखा जाता है। पहला मंत्र मूल अवस्था के संबंध में प्रश्न उठाता है और दूसरा मंत्र मृत्यु, अमृत तथा दिन-रात्रि के परिचित विभाजनों से परे की स्थिति का वर्णन करता है।

दूसरे मंत्र में ‘तदेकम्’ और ‘स्वधया’ का उल्लेख आता है। यह वर्णन उस एक तत्त्व की ओर संकेत करता है जो सामान्य बाहरी सहारे के बिना अपने स्वरूप में स्थित है। तीसरे मंत्र में अंधकार से आवृत अंधकार, अविभक्त जलरूप स्थिति और तप की महिमा से एक तत्त्व के प्रकट होने का वर्णन है।

चौथे मंत्र में विचार-यात्रा एक नई दिशा ग्रहण करती है—

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।
सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥

इस मंत्र में काम, मनस् और रेतस् के संबंध को सृष्टि के प्राकट्य के क्रम में रखा गया है। यहाँ काम को केवल जीव की सामान्य इच्छा तक सीमित करके पढ़ना मंत्र के विचार को संकुचित कर देगा। इस प्रसंग में काम सृष्टि-संकल्प के रूप में समझा जाता है—वह सक्रिय भाव जिसके साथ प्राकट्य का क्रम जुड़ता है।

मनस् और रेतस् का उल्लेख इस क्रम को आगे बढ़ाता है। मनस् ज्ञान और रचनात्मक संकल्प से जुड़ता है, जबकि रेतस् सृजन के बीज अथवा जनक तत्त्व का बोध कराता है। इसके बाद ‘सतो बन्धुमसति’ का संबंध सामने आता है। यहाँ ऋषियों का चिंतन प्रकट और अप्रकट के बीच संबंध को खोजता है।

‘हृदि प्रतीष्या’ और ‘कवयो मनीषा’ इस खोज के साधन को प्रकट करते हैं। ऋषि केवल बाहरी दृश्य का वर्णन नहीं कर रहे; वे हृदय में चिंतन करके उस संबंध का अन्वेषण कर रहे हैं जो प्रकट जगत् को उसके मूल आधार से जोड़ता है।

यहाँ चेतना और ज्ञान का प्रश्न केंद्रीय हो जाता है। सृष्टि के विषय में विचार करने के लिए केवल प्रकट वस्तुओं की सूची पर्याप्त नहीं है। उनके बीच संबंध, उनके प्राकट्य का क्रम और उस क्रम के मूल तत्त्व को समझना भी आवश्यक है।

नासदीय सूक्त के अंतिम मंत्र सृष्टि के विषय में जानने और कहने की सीमा पर प्रश्न उठाते हैं। यह प्रश्न-क्रम पूरे सूक्त की गंभीरता का हिस्सा है। सूक्त सृष्टि को केवल परिचित पदार्थों की व्यवस्था मानकर नहीं रुकता; वह उस मूल तत्त्व की खोज करता है जिसके संबंध में सामान्य अनुभव की भाषा पर्याप्त नहीं रह जाती।

इस प्रकार नासदीय सूक्त का केंद्रीय विषय सृष्टि के मूल आधार, प्राकट्य के क्रम और उस क्रम के ज्ञान का अन्वेषण है। पद्मपुराण के अध्याय ३९ में सर्वव्यापक वासुदेव और चेतना की अवस्थाओं का विवेचन इसी व्यापक प्रश्न के साथ तुलनात्मक अध्ययन का आधार प्रदान करता है।

५. ऋग्वेद का दान सूक्त : ज्ञान के प्रवाह का तत्त्व

ऋग्वेद १०.११७ का दान सूक्त नौ मंत्रों में देने और न देने, अभाव और पूर्ति, स्वार्थ और परहित तथा दाता और याचक के संबंधों का विवेचन करता है। इसका अध्ययन केवल वस्तुओं के वितरण तक सीमित नहीं होना चाहिए। सूक्त में दान के साथ वृत्ति, आवश्यकता और दूसरे के जीवन में होने वाली पूर्ति का संबंध भी महत्त्वपूर्ण है।

पहले मंत्र में भूख, मृत्यु, संपदा और देने वाले का संबंध आता है। यहाँ दान का विषय जीवन की आवश्यकता से जुड़ता है, लेकिन विचार केवल आवश्यकता पूरी करने पर समाप्त नहीं होता। देने वाले और न देने वाले के बीच का अंतर भी सामने आता है। देने वाला अपनी उपलब्धि को केवल अपने तक सीमित नहीं रखता; वह दूसरे की आवश्यकता से संबंध स्थापित करता है।

दूसरे और तीसरे मंत्रों में मन की संकीर्णता, दूसरे की आवश्यकता के प्रति व्यवहार तथा स्वार्थपूर्ण जीवन की समस्या सामने आती है। यहाँ प्रश्न यह है कि किसी जीव के पास उपलब्ध साधन और उसकी आंतरिक वृत्ति के बीच कैसा संबंध है। केवल उपलब्धि होना दानशीलता नहीं है। दान के लिए देने की वृत्ति और दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व भी आवश्यक हैं।

चौथे मंत्र में मित्रता और दान का संबंध विचार को और गहराई देता है। मित्रता केवल साथ रहने का नाम नहीं; उसमें सहभागिता और एक-दूसरे के लिए उपयोगी होने का भाव भी शामिल है। ज्ञान के संदर्भ में यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ज्ञान का वास्तविक लाभ तब व्यापक होता है जब वह दूसरे के बोध में भी योगदान दे सके।

पाँचवाँ मंत्र देने वाले को याचक की आवश्यकता, मार्ग और संपदा के प्रवाह के संबंध में विचार करने की दिशा देता है। देने का अर्थ केवल कुछ दे देना नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि प्राप्त करने वाले तक सहायता किस प्रकार पहुँचेगी, उसका उपयोग कैसे होगा और वह किस प्रकार वास्तविक पूर्ति का कारण बनेगी।

यहीं ज्ञानदान का व्यापक अर्थ सामने आता है। किसी तत्त्व के विषय में जानकारी देना और दूसरे को उस तत्त्व को समझने की विधि तक पहुँचाना अलग-अलग स्तर हैं। यदि ज्ञान का उद्देश्य बोध का विस्तार है, तो केवल शब्द पहुँचा देना पर्याप्त नहीं; उसके ग्रहण और आत्मसात् होने की प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण है।

छठे मंत्र से आगे सूक्त न देने वाले के जीवन, अकेले उपभोग और दूसरों के प्रति उत्तरदायित्व के विषय को और स्पष्ट करता है। अंतिम मंत्रों में भोजन, संपदा, परस्पर निर्भरता और देने वाले के व्यवहार का संबंध सामने आता है। सूक्त की समग्र विचार-यात्रा यह बताती है कि जीवन में उपलब्ध साधनों का महत्त्व उनके संग्रह से आगे जाकर उनके उचित प्रवाह में भी है।

ज्ञानदान इसी विचार को एक गहरे स्तर पर व्यक्त करता है। ज्ञान को केवल निजी उपलब्धि मानकर रोक लेना और उसे दूसरे के बोध के लिए उपलब्ध कराना—इन दोनों में अंतर है। भौतिक संपदा बाँटने पर उसका स्वामित्व बदल सकता है, लेकिन ज्ञान का साझा होना ज्ञान को समाप्त नहीं करता। सही प्रकार से दिया गया ज्ञान दूसरे जीव में नए बोध का माध्यम बन सकता है, और देने वाले के ज्ञान को भी उसके प्रयोग तथा आत्मचिंतन के माध्यम से अधिक स्पष्ट कर सकता है।

इसलिए दान सूक्त का तुलनात्मक अध्ययन करते समय ज्ञानदान को उसके व्यापक तात्त्विक संदर्भ में देखना आवश्यक है। यहाँ दान केवल किसी वस्तु का हस्तांतरण नहीं, बल्कि जीवन के प्रवाह में सहभागिता का रूप ग्रहण करता है।

६. पद्मपुराण अध्याय ३९ में दान : भावना, पात्रता और ज्ञान का संबंध

अध्याय ३९ में भगवान् वेन को दान का महत्त्व बताते हैं। दान को श्रेष्ठ कहा गया है और उसके साथ पुण्य, सुख, यश तथा उच्च गति का संबंध स्थापित किया गया है। इसके बाद दान के समय, तीर्थ और पात्र के लक्षणों का वर्णन आता है।

इस क्रम में दान के कई पक्ष सामने आते हैं। दान देने वाले की भावना, प्राप्त करने वाले की पात्रता, दान का अवसर और उसके पीछे स्थित उद्देश्य—ये सभी महत्त्वपूर्ण हैं। दान को केवल बाहरी क्रिया मानकर देखने पर इन संबंधों का पूरा अर्थ सामने नहीं आता।

दान के प्रसंग में श्रद्धा और भावना का विशेष उल्लेख है। इसका अर्थ है कि दान की क्रिया के साथ देने वाले का अंतःकरण भी जुड़ा है। यदि दान केवल प्रतिष्ठा, स्वार्थ या किसी लाभ की अपेक्षा से किया जाए, तो उसकी आंतरिक दिशा उस दान से भिन्न होगी जो दूसरे के हित और ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से किया जाता है।

पात्रता का विवेचन भी इसी संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। अध्याय में वेदाध्ययन, शांति, संयम, तप, प्रज्ञा, ज्ञान और धर्मबोध जैसे गुणों का उल्लेख किया गया है। इन गुणों को दान के पात्र की पहचान से जोड़ने का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि दान का फल और प्रयोजन उसके उचित ग्रहण से भी संबंधित है।

ज्ञानदान के संदर्भ में पात्रता का अर्थ केवल किसी सामाजिक पहचान से निर्धारित नहीं किया जा सकता। ज्ञान का ग्रहण करने वाला उसे किस भावना से ग्रहण करता है, वह उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा और उस ज्ञान का उपयोग किस दिशा में करेगा—ये प्रश्न भी विचारणीय हैं। ज्ञान का उद्देश्य बोध का विस्तार है; इसलिए ज्ञान देने की प्रक्रिया में ग्रहण करने वाले की आवश्यकता और उसकी ग्रहणशीलता का विचार आवश्यक है।

यहाँ पद्मपुराण के अध्याय ३९ और ऋग्वेद के दान सूक्त के बीच सीधा तुलनात्मक संबंध स्थापित होता है। दान सूक्त देने वाले की वृत्ति और दूसरे की आवश्यकता को महत्त्व देता है। पद्मपुराण दान की भावना, पात्रता और विधि का विस्तार करता है। दोनों को साथ पढ़ने पर दान एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में सामने आता है जिसमें केवल दाता की उपलब्धि नहीं, बल्कि दान के उद्देश्य और उसके उचित ग्रहण का भी महत्त्व है।

दान और ईश्वर से संबंध

पद्मपुराण में दान के समय भगवान् में भाव स्थापित करने का निर्देश मिलता है। यह निर्देश दान को केवल लौकिक लेन-देन से ऊपर उठाता है। दान की क्रिया जब ईश्वर के प्रति समर्पित भावना से जुड़ती है, तब उसका उद्देश्य केवल तत्काल प्रतिफल प्राप्त करना नहीं रहता।

ज्ञानदान के संदर्भ में यह बात और स्पष्ट होती है। ज्ञान को ईश्वर की ओर से प्राप्त तत्त्व मानकर देने वाला स्वयं को उसका अंतिम स्वामी नहीं समझता। वह ज्ञान के प्रवाह में माध्यम बनता है। इस भाव में ज्ञानदान निजी प्रभुत्व का साधन नहीं, बल्कि दूसरे जीव के बोध और उन्नति में सहभागिता है।

वेन के चरित्र की प्रारंभिक अवस्था इस दृष्टि से विपरीत स्थिति प्रस्तुत करती है। वह स्वयं को सर्वोच्च आधार मानता है और दूसरों के लिए अपनी सत्ता को निर्णायक बनाता है। अध्याय ३९ में उसका मार्ग बदलता है। वह अपनी स्थिति स्वीकार करता है, तप करता है और ईश्वर से मार्गदर्शन माँगता है। यह परिवर्तन ज्ञान के प्रति उसके संबंध में भी परिवर्तन है।

इस प्रकार वेन का आख्यान, वासुदेव के व्यापक स्वरूप का विवेचन और दान का उपदेश एक ही अध्याय में परस्पर जुड़े हुए हैं। पहले अहंकार और अज्ञान से उत्पन्न स्थिति सामने आती है; फिर शुद्धि और ज्ञान का मार्ग; और उसके बाद दान तथा उचित पात्र को देने की विधि।

७. तीनों ग्रंथांशों का तुलनात्मक अध्ययन

(क) मूल तत्त्व और प्रकट जगत्

नासदीय सूक्त सृष्टि के मूल तत्त्व और प्राकट्य के क्रम की खोज करता है। पद्मपुराण का अध्याय ३९ वासुदेव को समस्त जगत् में व्यापक बताता है। दोनों प्रसंग प्रकट जगत् को ही विचार की अंतिम सीमा मानकर नहीं रुकते। वे उसके व्यापक आधार के संबंध में चिंतन की दिशा देते हैं।

नासदीय सूक्त में यह दिशा प्रश्न, चिंतन और ऋषियों की मनीषा के माध्यम से व्यक्त होती है। पद्मपुराण में यह दिशा भगवान् के स्वरूप के उपदेश और चेतना की अवस्थाओं के विवेचन से सामने आती है। अभिव्यक्ति की पद्धति अलग है, लेकिन दोनों के तुलनात्मक अध्ययन का केंद्र प्रकट और अप्रकट के संबंध को समझना है।

(ख) चेतना और ज्ञान

नासदीय सूक्त का चौथा मंत्र काम, मनस् और रेतस् को सृष्टि के प्राकट्य के क्रम में रखता है। यहाँ मनस् का संबंध केवल सामान्य विचारों तक सीमित नहीं है; वह उस रचनात्मक क्रम में आता है जिसके माध्यम से सृष्टि के मूल संबंध का अन्वेषण किया जाता है।

पद्मपुराण का अध्याय ३९ चेतना की जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं का विवेचन करता है। इससे अनुभव की बदलती अवस्थाओं और आत्मस्वरूप के संबंध पर विचार होता है।

दोनों को साथ पढ़ने पर ज्ञान के दो परस्पर जुड़े आयाम सामने आते हैं—सृष्टि के व्यापक क्रम को जानना और उस चेतना के स्वरूप को समझना जिसके माध्यम से अनुभव तथा बोध संभव होते हैं।

(ग) अहंकार और ज्ञान का अवरोध

वेन का चरित्र ज्ञान के प्रति अभिमान और अपनी धारणा को अंतिम मान लेने की समस्या को सामने लाता है। वह अपने को सर्वोच्च घोषित करता है और ऋषियों के निर्देश को स्वीकार नहीं करता। दान सूक्त में भी देने और न देने के बीच वृत्ति का अंतर महत्त्वपूर्ण है। जो केवल अपने लिए संचित करता है, वह दूसरे की आवश्यकता से अपना संबंध सीमित कर लेता है।

इन दोनों प्रसंगों में ज्ञान और संपदा के प्रति स्वामित्व-बोध का प्रश्न उठता है। जब उपलब्धि को केवल अपने अधिकार में रखने की प्रवृत्ति प्रधान हो जाती है, तब उसका व्यापक प्रयोजन पीछे छूट सकता है। ज्ञान का वास्तविक विस्तार तब होता है जब जीव उसके प्रति ग्रहणशील भी रहे और उसके उचित प्रवाह में सहभागी भी बने।

(घ) शुद्धि, पात्रता और ग्रहणशीलता

पद्मपुराण के अध्याय ३९ में वेन के तप और ज्ञानप्राप्ति का वर्णन है। दान के प्रसंग में श्रद्धा तथा पात्रता का उल्लेख भी मिलता है। ये दोनों विषय ग्रहणशीलता से संबंधित हैं।

ज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने को सर्वज्ञ मानकर बंद हो जाना और ज्ञान के लिए स्वयं को तैयार करना—इन दोनों में अंतर है। इसी प्रकार ज्ञान देने में केवल अपनी उपलब्धि का प्रदर्शन और दूसरे के वास्तविक बोध के लिए मार्ग खोलना भी अलग-अलग स्थितियाँ हैं।

दान सूक्त में दूसरे की आवश्यकता के प्रति संवेदनशीलता और पद्मपुराण में पात्रता तथा भावना का विवेचन इसी अंतर को समझने में सहायता करता है।

(ङ) दान और ज्ञान का प्रवाह

दान सूक्त दान को जीवन के व्यापक संबंधों में रखता है। पद्मपुराण दान के उद्देश्य, भावना, समय और पात्र का विस्तार करता है। जब इन दोनों को ज्ञानदान के संदर्भ में पढ़ा जाता है, तो दान का एक गहरा तात्त्विक पक्ष सामने आता है।

ज्ञान का प्रवाह केवल शब्दों के आदान-प्रदान से पूरा नहीं होता। उसके लिए समझ, उचित विधि, ग्रहणशीलता और आत्मसात् करने की प्रक्रिया भी महत्त्वपूर्ण हैं। ज्ञानदान का उद्देश्य दूसरे को केवल सूचना से भर देना नहीं, बल्कि उसके बोध को विकसित करने में सहायता करना है।

इस दृष्टि से ज्ञानदान दान की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें देने वाला ज्ञान का माध्यम बनता है, ग्रहण करने वाला उसे आत्मसात् करता है और ज्ञान का प्रवाह एक जीव से दूसरे जीव तक आगे बढ़ता है।

८. समग्र निष्कर्ष : सृष्टि-बोध से ज्ञानदान तक

पद्मपुराण भूमिखण्ड के अध्याय ३८–३९ और ऋग्वेद के नासदीय तथा दान सूक्त का तुलनात्मक अध्ययन एक व्यापक विचार-क्रम प्रस्तुत करता है।

नासदीय सूक्त सृष्टि के मूल तत्त्व और प्राकट्य के संबंध की खोज करता है। उसका चिंतन प्रकट जगत् के परिचित रूपों से आगे बढ़कर काम, मनस्, रेतस् तथा ऋत-सत्य के संबंध तक पहुँचता है। पद्मपुराण का अध्याय ३९ वासुदेव के व्यापक स्वरूप और चेतना की विभिन्न अवस्थाओं का विवेचन करता है। इन दोनों प्रसंगों से सृष्टि और चेतना के मूल संबंध पर विचार करने की दिशा मिलती है।

पद्मपुराण का अध्याय ३८ वेन के माध्यम से उस स्थिति को सामने रखता है जिसमें जीव अपने को ही अंतिम आधार मानने लगता है। उसका अभिमान उसे ज्ञान के प्रति ग्रहणशील रहने से रोकता है। पृथु का प्राकट्य कथा को पोषण और व्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ाता है। अध्याय ३९ में तप, शुद्धि और ज्ञानप्राप्ति के बाद दान का उपदेश आता है। इस प्रकार कथा ज्ञान से विमुखता, परिवर्तन, ज्ञान की प्राप्ति और दान के उत्तरदायित्व को एक ही क्रम में जोड़ती है।

ऋग्वेद का दान सूक्त इस क्रम को जीवन के व्यवहार और परस्पर संबंधों में व्यक्त करता है। वह देने वाले की वृत्ति, दूसरे की आवश्यकता और ज्ञान अथवा संपदा के प्रवाह के महत्त्व को सामने लाता है। पद्मपुराण दान की भावना, पात्रता और विधि को विस्तार देता है। दोनों का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि दान का उद्देश्य केवल किसी वस्तु को अपने अधिकार से अलग कर देना नहीं, बल्कि उचित माध्यम से दूसरे के जीवन में पूर्ति और उन्नति का कारण बनना है।

ज्ञानदान में यह तत्त्व विशेष रूप से प्रकट होता है। भौतिक वस्तु का मूल्य उसके उपयोग और उपलब्धता से जुड़ सकता है, लेकिन ज्ञान का महत्त्व केवल उसके संग्रह में नहीं है। ज्ञान जब दूसरे के बोध में प्रवेश करता है, तब वह उसके लिए नई समझ और नई दिशा का माध्यम बन सकता है। देने वाला ज्ञान को अपने भीतर बंद रखने के स्थान पर उसके प्रवाह में सहभागी बनता है।

इस पूरी विचार-यात्रा का केंद्र यही है कि चेतना के मूल स्वरूप का बोध, ज्ञान के प्रति ग्रहणशीलता और ज्ञानदान का उत्तरदायित्व एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। सृष्टि के मूल तत्त्व का अन्वेषण ज्ञान की दिशा खोलता है; अपने वास्तविक स्वरूप का बोध उस ज्ञान को जीवन से जोड़ता है; और ज्ञानदान उस बोध को दूसरे जीवों तक पहुँचाने का मार्ग बनता है।

इस प्रकार नासदीय सूक्त सृष्टि के मूल आधार की खोज, पद्मपुराण के अध्याय ३८–३९ चेतना, अहंकार, शुद्धि और दान के संबंधों का आख्यानात्मक तथा तात्त्विक विवेचन, और दान सूक्त ज्ञान तथा जीवन के प्रवाह में देने के महत्त्व को सामने रखते हैं। तीनों का संयुक्त अध्ययन ज्ञान को केवल निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि व्यापक चेतना से संबंध स्थापित करने और दूसरे जीवों के बोध में सहभागी होने की प्रक्रिया के रूप में समझने की दिशा देता है।

त्रिकालदर्शी विषय प्रवेश

पद्मपुराण भूमिखण्ड — अध्याय ३९

श्लोक ११८–१२७ : पात्रता, श्रद्धा और दान का फल

श्लोक ११८

मूल श्लोक

हीनांगमधिकांगं च कुष्ठिनं कुनखं तथा । दुश्चर्माणं महाराज खल्वाटं परिवर्जयेत् ॥ ११८॥

शब्दार्थ

  • हीनाङ्गम् — जिसके शरीर का कोई अंग कम या अविकसित हो।
  • अधिकाङ्गम् — जिसके अंग सामान्य से अधिक हों।
  • कुष्ठिनम् — कुष्ठ रोग से ग्रस्त व्यक्ति।
  • कुनखम् — विकृत अथवा दोषयुक्त नखों वाला।
  • दुश्चर्माणम् — त्वचा के विकार से ग्रस्त व्यक्ति।
  • महाराज — हे महाराज!
  • खल्वाटम् — गंजे व्यक्ति को।
  • परिवर्जयेत् — वर्जित करना चाहिए।

भावार्थ

इस श्लोक में दान के लिए वर्जित व्यक्तियों की सूची में शारीरिक अंगों, नखों और त्वचा से संबंधित विभिन्न अवस्थाओं का उल्लेख किया गया है।

व्याख्या

यहाँ ग्रन्थ शारीरिक विशेषताओं के आधार पर कुछ व्यक्तियों को दान का अयोग्य बताता है। यह कथन ग्रन्थ में वर्णित पात्रता-नियम का हिस्सा है। इसे प्रस्तुत करते समय पाठ में कही गई बात और उसके आधुनिक सामाजिक या नैतिक मूल्यांकन को अलग रखना चाहिए।

श्लोक ११९

मूल श्लोक

अन्यायेषु रता यस्य जाया विप्रस्य कस्य च । तस्मै दानं न दातव्यं यदि ब्रह्मसमो भवेत् ॥ ११९॥

शब्दार्थ

  • अन्यायेषु — अन्यायपूर्ण कर्मों में।
  • रता — लगी हुई, प्रवृत्त।
  • यस्य — जिसकी।
  • जाया — पत्नी।
  • विप्रस्य — ब्राह्मण की।
  • कस्य च — किसी की भी।
  • तस्मै — उसे।
  • दानम् — दान।
  • न दातव्यम् — नहीं देना चाहिए।
  • यदि — यदि।
  • ब्रह्मसमः — ब्रह्मा के समान।
  • भवेत् — हो।

भावार्थ

जिस ब्राह्मण की पत्नी अन्यायपूर्ण कर्मों में लगी हो, उसे दान नहीं देना चाहिए, भले ही वह स्वयं ब्रह्मा के समान क्यों न हो।

व्याख्या

यहाँ दान की पात्रता के संबंध में परिवार के आचरण को भी विचार में रखा गया है। श्लोक का कथन कठोर है—व्यक्ति की अपनी प्रतिष्ठा अथवा महानता को भी उसकी पत्नी के अन्यायपूर्ण आचरण के संदर्भ में पर्याप्त नहीं माना गया है।

श्लोक १२०

मूल श्लोक

स्त्रीजिताय न दातव्यं शाखारंडे महामते । व्याधिताय न दातव्यं मृतभोजिषु भूपते ॥ १२०॥

शब्दार्थ

  • स्त्रीजिताय — स्त्री के वश में रहने वाले व्यक्ति को।
  • न दातव्यम् — दान नहीं देना चाहिए।
  • शाखारंडे — मूल पाठ में प्रयुक्त यह पद स्पष्ट अर्थ नहीं देता; इसके पाठ की अलग से जाँच आवश्यक है।
  • महामते — हे महाबुद्धिमान!
  • व्याधिताय — रोगग्रस्त व्यक्ति को।
  • भूपते — हे राजन्!
  • मृतभोजिषु — मृत व्यक्ति के लिए निर्धारित भोजन करने वालों के संदर्भ में प्रयुक्त पद।

भावार्थ

श्लोक में स्त्री के वश में रहने वाले व्यक्ति, शाखारंडे कहे गए व्यक्ति, रोगग्रस्त व्यक्ति तथा मृतभोजिषु से संबंधित व्यक्तियों को दान न देने का निर्देश है।

व्याख्या

इस श्लोक में कई प्रकार के निषेध एक साथ आए हैं। स्त्रीजित का अर्थ स्त्री के वश में रहने वाला है। लेकिन शाखारंडे और मृतभोजिषु जैसे पदों का सटीक आशय निर्धारित करने के लिए पाठ और परंपरागत व्याख्या का मिलान करना आवश्यक है। इसलिए इनका अर्थ अनुमान से निश्चित नहीं किया जा रहा।

श्लोक १२१

मूल श्लोक

चोराय च न दातव्यं स यद्यत्रिसमो भवेत् । अतृप्ताय न दातव्यं शावं तु परिवर्जयेत् ॥ १२१॥

शब्दार्थ

  • चोराय — चोर को।
  • च — भी।
  • न दातव्यम् — दान नहीं देना चाहिए।
  • सः — वह।
  • यदि — यदि।
  • अत्रिसमः — अत्रि ऋषि के समान।
  • भवेत् — हो।
  • अतृप्ताय — अतृप्त व्यक्ति को।
  • शावम् — मूल पाठ में प्रयुक्त पद; यहाँ इसका आशय संदर्भ से निश्चित करना आवश्यक है।
  • तु — तो।
  • परिवर्जयेत् — वर्जित करना चाहिए।

भावार्थ

चोर को दान नहीं देना चाहिए, भले ही वह अत्रि ऋषि के समान क्यों न हो। अतृप्त व्यक्ति को भी दान न देने का निर्देश दिया गया है। दूसरे चरण में शावम् पद के संबंध में मूल पाठ का आशय स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त संदर्भ आवश्यक है।

व्याख्या

यहाँ पात्रता के निर्धारण में व्यक्ति के वास्तविक आचरण को महत्त्व दिया गया है। चोर के संदर्भ में श्लोक स्पष्ट है—उच्च प्रतिष्ठा या किसी महान व्यक्ति से तुलना भी उसके कर्म को निरस्त नहीं करती।

श्लोक १२२

मूल श्लोक

अतिस्तब्धाय नो देयं शठाय च विशेषतः । वेदशास्त्रसमायुक्तः सदाचारेण वर्जितः ॥ १२२॥

शब्दार्थ

  • अतिस्तब्धाय — अत्यन्त अभिमानी अथवा हठी व्यक्ति को।
  • नः/नो देयम् — नहीं देना चाहिए।
  • शठाय — कपटी व्यक्ति को।
  • विशेषतः — विशेष रूप से।
  • वेदशास्त्रसमायुक्तः — वेद और शास्त्रों का ज्ञान रखने वाला।
  • सदाचारेण वर्जितः — सदाचार से रहित।

भावार्थ

अत्यन्त अभिमानी और कपटी व्यक्ति को दान नहीं देना चाहिए। वेद-शास्त्रों का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी यदि सदाचार से रहित हो, तो उसका ज्ञान अकेले उसे उत्तम पात्र नहीं बनाता।

व्याख्या

यह श्लोक पहले बताए गए ज्ञान और अध्ययन के गुणों के साथ आचरण को जोड़ता है। वेद और शास्त्रों का ज्ञान होना तथा सदाचारी होना अलग-अलग बातें हैं। श्लोक का विशेष संकेत यह है कि ज्ञान के साथ सदाचार का होना भी आवश्यक है।

श्लोक १२३

मूल श्लोक

श्राद्धे दाने च राजेंद्र नैव युक्तः कदा भवेत् । अथ दानं प्रवक्ष्यामि सफलं पुण्यदायकम् ॥ १२३॥

शब्दार्थ

  • श्राद्धे — श्राद्ध में।
  • दाने — दान में।
  • च — और।
  • राजेन्द्र — हे राजाओं में श्रेष्ठ!
  • न एव — कदापि नहीं।
  • युक्तः — योग्य।
  • कदा — कभी।
  • भवेत् — होता है।
  • अथ — अब।
  • दानम् — दान।
  • प्रवक्ष्यामि — मैं बताता हूँ।
  • सफलम् — फलदायक।
  • पुण्यदायकम् — पुण्य देने वाला।

भावार्थ

हे राजेन्द्र! ऐसा व्यक्ति श्राद्ध और दान के लिए कभी योग्य नहीं माना जाता। अब मैं उस दान का वर्णन करता हूँ, जो सफल और पुण्यदायक होता है।

व्याख्या

यह श्लोक पिछले निषेधों का समापन करता है और आगे दान के सकारात्मक स्वरूप की ओर बढ़ता है। अब चर्चा इस बात पर केंद्रित होगी कि दान को फलदायक बनाने वाले प्रमुख तत्त्व कौन-से हैं।

श्लोक १२४

मूल श्लोक

कालतीर्थसुपात्राणां श्रद्धा योगात्प्रजायते । नास्ति श्रद्धासमं पुण्यं नास्ति श्रद्धासमं सुखम् ॥ १२४॥

शब्दार्थ

  • काल — उचित समय।
  • तीर्थ — पवित्र स्थान।
  • सुपात्राणाम् — उत्तम पात्रों का।
  • श्रद्धा — श्रद्धा।
  • योगात् — संयोग से, जुड़ने से।
  • प्रजायते — उत्पन्न होता है।
  • न अस्ति — नहीं है।
  • श्रद्धासमम् — श्रद्धा के समान।
  • पुण्यम् — पुण्य।
  • सुखम् — सुख।

भावार्थ

उचित समय, तीर्थ और उत्तम पात्र के साथ श्रद्धा का संयोग होने पर दान की सार्थकता उत्पन्न होती है। श्रद्धा के समान पुण्य नहीं है और श्रद्धा के समान सुख भी नहीं है।

व्याख्या

यहाँ चार तत्त्व सामने आते हैं—उचित समय, तीर्थ, सुपात्र और श्रद्धा। पहले के श्लोकों में समय, तीर्थ और पात्र का विस्तार से वर्णन किया गया था। अब श्रद्धा को उनके साथ जोड़कर दान की सफलता का आधार बताया गया है।

दूसरे चरण में श्रद्धा को पुण्य और सुख के साथ जोड़ा गया है। इस प्रकार दान की चर्चा केवल बाहरी विधि तक सीमित नहीं रहती; उसमें श्रद्धा की भूमिका भी प्रमुख हो जाती है।

श्लोक १२५

मूल श्लोक

नास्ति श्रद्धासमं तीर्थं संसारे प्राणिनां नृप । श्रद्धाभावेन संयुक्तो मामेवं परिसंस्मरेत् ॥ १२५॥

शब्दार्थ

  • न अस्ति — नहीं है।
  • श्रद्धासमम् — श्रद्धा के समान।
  • तीर्थम् — तीर्थ।
  • संसारे — संसार में।
  • प्राणिनाम् — प्राणियों के लिए।
  • नृप — हे राजन्!
  • श्रद्धाभावेन — श्रद्धा के भाव से।
  • संयुक्तः — युक्त हुआ।
  • माम् — मेरा, मुझे।
  • एवम् — इस प्रकार।
  • परिसंस्मरेत् — पूर्ण रूप से स्मरण करे।

भावार्थ

हे राजन्! संसार में प्राणियों के लिए श्रद्धा के समान कोई तीर्थ नहीं है। श्रद्धाभाव से युक्त होकर मनुष्य मेरा स्मरण करे।

व्याख्या

पिछले श्लोक में श्रद्धा को पुण्य और सुख का आधार बताया गया था। यहाँ उसे तीर्थ के समान महत्त्व दिया गया है। तीर्थों की विस्तृत सूची के बाद श्रद्धा को स्वयं तीर्थ के तुल्य बताना इस अंश का प्रमुख विचार है।

इसके साथ भगवान का स्मरण भी जोड़ा गया है। श्रद्धा केवल दान के समय की भावना नहीं, बल्कि ईश्वर के स्मरण से जुड़ा आन्तरिक भाव है।

श्लोक १२६

मूल श्लोक

पात्रहस्ते प्रदातव्यं स्वल्पमेव नृपोत्तम । एवंविधस्य दानस्य विधियुक्तस्य यत्फलम् ॥ १२६॥

शब्दार्थ

  • पात्रहस्ते — पात्र के हाथ में।
  • प्रदातव्यम् — देना चाहिए।
  • स्वल्पम् एव — थोड़ा ही सही।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजन्!
  • एवंविधस्य — इस प्रकार के।
  • दानस्य — दान का।
  • विधियुक्तस्य — विधि के अनुसार किए गए।
  • यत् फलम् — जो फल है।

भावार्थ

हे नृपोत्तम! योग्य पात्र के हाथ में थोड़ा-सा दान भी देना चाहिए। विधि के अनुसार किए गए ऐसे दान का जो फल होता है, उसका वर्णन आगे किया जाता है।

व्याख्या

यहाँ दान की मात्रा की अपेक्षा पात्रता और विधि को महत्त्व दिया गया है। स्वल्पम् एव कहकर बताया गया है कि दान की मात्रा कम होने पर भी उसे योग्य पात्र को देना महत्त्वपूर्ण है।

इस श्लोक का अगला चरण दान के फल की ओर संकेत करता है, जिसे अगले श्लोक में पूरा किया गया है।

श्लोक १२७

मूल श्लोक

अनंतं तदवाप्नोति मत्प्रसादात्सुखी भवेत् ॥ १२७॥

शब्दार्थ

  • अनन्तम् — अनन्त, जिसका अंत न हो।
  • तत् — वह फल।
  • अवाप्नोति — प्राप्त करता है।
  • मत्प्रसादात् — मेरी कृपा से।
  • सुखी — सुखी।
  • भवेत् — हो जाता है।

भावार्थ

इस प्रकार विधिपूर्वक दान करने वाला व्यक्ति उस दान का अनन्त फल प्राप्त करता है और मेरी कृपा से सुखी होता है।

व्याख्या

यह अध्याय का अंतिम श्लोक है। इसमें विधि के अनुसार, श्रद्धापूर्वक और योग्य पात्र को दिए गए दान का फल अनन्त बताया गया है। भगवान अपनी कृपा से दानकर्ता के सुखी होने की बात कहते हैं।

इस प्रकार दान के विषय में वर्णन पात्र की पहचान से आरम्भ होकर श्रद्धा, उचित विधि और फल तक पहुँचता है।

अध्याय ३९ का समापन

इस अध्याय में तीर्थों के विविध स्वरूप बताए गए हैं—नदियाँ, समुद्र, सरोवर, झरने, पर्वत, यज्ञस्थल, वेदाध्ययन के स्थान, गौशालाएँ, वृक्ष, माता-पिता, गुरु और सद्गुणी परिवारजन।

इसके बाद दान के योग्य पात्र के गुणों का वर्णन आता है। सत्य, ज्ञान, संयम, तप, धर्मनिष्ठा और सदाचार को महत्त्व दिया गया है। कुछ व्यक्तियों को अयोग्य बताने वाली सूची भी दी गई है; उसमें शारीरिक विशेषताओं पर आधारित निषेध भी हैं, जिन्हें ग्रन्थ के कथन के रूप में पहचानना चाहिए।

अंततः श्लोक १२४–१२७ श्रद्धा को दान की सफलता का प्रमुख आधार बताते हैं। श्रद्धा को पुण्य, सुख और तीर्थ के समान महत्त्व दिया गया है। उचित विधि से, योग्य पात्र को दिया गया थोड़ा-सा दान भी अनन्त फलदायक कहा गया है।

इति श्रीपद्मपुराणे भूमिखण्डे वेनोपाख्याने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥

ऋग्वेद 10.117.1 — दान, ज्ञान और मृत्यु के बंधन से मुक्ति

न वा उ देवा क्षुधमिद्वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यवः। उतो रयिः पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन्मर्डितारं न विन्दते॥ १॥

न वा उ निश्चित रूप से वह क्रिय जीव को उ उत्तर समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है, देवा जो भौतिक विद्या या विज्ञान है, क्षुधम भुख तृष्णा इच्छा काम में सहायता सिद्ध होती है इत् क्योंकि वधम् मृत्यु के आश्रित जीव ददु: जब अपनी इच्छा तृष्णा के विपरित ज्ञानश्रित हो कर भौतिक संसार के साथ को जान कर अपनी वस्तु आपने ज्ञान को किसी जीव के कल्याणार्थ देता है, तो वह देने वाला मृतधर्मा जीव उत मृत्युलोक से परे अशितम् अज्ञान कि आशा तृष्णा की वृत्ति से अलग स्वयं के शाश्वत चेतना ईश्वर के उप समीप गच्छन्ति पहुचने में समर्थ होता है। मृत्यवे जो जीव मृत्यु की जाल में फंसा था वह उतो उससे अलग रयि: ज्ञान धन को पृणत देने वाला बन कर न उप निश्चित ही प्राप्त करने वाले से उपर देने वाले कि स्थिति में उपस्थित होकर दस्यति दासता से बंधन से मुक्त होने कि दिशा में उत बढ़ता है अपृणत न देने वाले कि तुलना में देने वाला मर्डितारम् लोगो के दुखों को दूर करने वाला न विन्दते बिना फल कि इच्छा से दिया गया ज्ञान आत्मज्ञान में सहायक सिद्ध होता है।

ऋग्वेद 10.117.1 — दान, ज्ञान और मृत्यु के बंधन से मुक्ति

न वा उ देवा क्षुधमिद्वधं ददुरुताशितमुप गच्छन्ति मृत्यवः। उतो रयिः पृणतो नोप दस्यत्युतापृणन्मर्डितारं न विन्दते॥ १॥

शब्दार्थ एवं तात्त्विक व्याख्या

न वा उ — निश्चित रूप से, निश्चय ही। यह पद जीव के सामने उपस्थित समस्या के समाधान की ओर संकेत करता है।

देवाः — भौतिक विद्या अथवा विज्ञान, जिसके माध्यम से भौतिक संसार की व्यवस्था और उसके गुणधर्मों का ज्ञान प्राप्त होता है।

क्षुधम् — भूख, तृष्णा, इच्छा और कामना। ये जीव को भौतिक संसार के साथ संबंध स्थापित करने तथा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरित करती हैं।

इत् वधम् — मृत्यु के आश्रित जीव की वह अवस्था, जिसमें उसकी इच्छाएँ और तृष्णाएँ उसे मृत्यु के बंधन में बाँधे रखती हैं।

ददुः — जब जीव अपनी इच्छाओं और तृष्णाओं के विपरीत ज्ञान का आश्रय ग्रहण करता है, भौतिक संसार के गुणधर्मों को जानता है और अपने ज्ञान को किसी दूसरे जीव के कल्याण के लिए प्रदान करता है, तब वह देने वाला बनता है। इस प्रकार ज्ञान का दान जीव की वृत्ति को केवल अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति से हटाकर दूसरे के कल्याण की ओर ले जाता है।

उत अशितम् — अज्ञान, आशा और तृष्णा की वृत्तियों से अलग होने की दिशा में आगे बढ़ना। जब जीव केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं मानता, तब उसके सामने आत्मज्ञान का मार्ग खुलता है।

उप गच्छन्ति — समीप पहुँचते हैं। ज्ञान और निःस्वार्थ दान के माध्यम से जीव अपनी शाश्वत चेतना तथा ईश्वर के समीप पहुँचने में समर्थ होता है।

मृत्यवः — मृत्यु के बंधन में रहने वाले जीव। जो जीव अपनी इच्छाओं और तृष्णाओं के कारण मृत्यु के जाल में फँसा हुआ है, वह ज्ञान के आश्रय से उससे मुक्त होने की दिशा में बढ़ सकता है।

उतो रयिः — इसके अतिरिक्त धन का वास्तविक स्वरूप भी विचारणीय है। यहाँ रयि को ज्ञान-धन के रूप में समझा गया है, जो दूसरों के कल्याण के लिए प्रदान करने पर सार्थक होता है।

पृणतः — देने वाला, दूसरों को तृप्त करने वाला। ज्ञान को अपने तक सीमित रखने के स्थान पर दूसरे जीवों के कल्याण के लिए प्रदान करना दानशीलता का स्वरूप है।

न उप दस्यति — देने वाले का ज्ञान-धन केवल बाँटने से नष्ट नहीं होता। वह दूसरों तक पहुँचकर उनके जीवन में उपयोगी बनता है। इस प्रकार ज्ञान का दान संपत्ति के ऐसे क्षय के समान नहीं है, जिसमें देने वाले के पास कुछ शेष न रहे।

उत अपृणन् — दूसरी ओर वह व्यक्ति है, जो ज्ञान और सामर्थ्य होते हुए भी दूसरों को कुछ नहीं देता। वह ज्ञान को अपने तक सीमित रखता है और दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक नहीं बनता।

मर्डितारम् — दूसरों के दुःख दूर करने वाला, संकट में सहायता करने वाला।

न विन्दते — नहीं पाता। जो दूसरों के दुःख दूर करने और उनके कल्याण में सहायक नहीं बनता, वह उस सहायक की प्राप्ति से वंचित रह सकता है, जिसकी आवश्यकता स्वयं उसे भी पड़ सकती है।

भावार्थ

इस मंत्र में ज्ञान के दान को जीव की वृत्ति में परिवर्तन के साथ जोड़कर समझा जा सकता है। भौतिक संसार की इच्छाएँ और तृष्णाएँ जीव को कर्म तथा उसके परिणामों से बाँधती हैं। जब जीव ज्ञान का आश्रय लेकर संसार के गुणधर्मों को समझता है और अपने ज्ञान को दूसरे जीव के कल्याण के लिए प्रदान करता है, तब वह केवल अपने लिए संग्रह करने वाली वृत्ति से ऊपर उठता है।

ज्ञान का वास्तविक धन देने से समाप्त नहीं होता। इसके विपरीत, वह दूसरे जीव के जीवन को दिशा देता है और उसके दुःख दूर करने में सहायक बनता है। ज्ञान को निःस्वार्थ भाव से प्रदान करने वाला व्यक्ति स्वयं भी आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ता है। इस प्रकार दान केवल किसी वस्तु का हस्तांतरण नहीं, बल्कि ज्ञान, कल्याण और आत्मोन्नति से जुड़ी प्रक्रिया है।

मंत्र के अंतिम पद विशेष रूप से यह स्पष्ट करते हैं कि दूसरों के दुःख दूर करने वाला व्यक्ति और ज्ञान को अपने तक सीमित रखने वाला व्यक्ति एक समान स्थिति में नहीं हैं। ज्ञान का दान दूसरे के कल्याण का साधन होने के साथ-साथ दाता के आत्मज्ञान की दिशा को भी प्रशस्त करता है।

न विन्दते पर पुर्ण हुआ था वही से यह मंत्र आगे बढ़ता है, जो संकृण बुद्धि वाले जन है जो ज्ञान के प्रवाह को रोकने वाले है, य आध्राय कृपण कंजूस स्वार्थी भेद भाव करने वाले किसी वस्तु पर जो एकाधिकार करने के पागलो कि तरह चकमानाय जैसे चकवा पक्षी होता है वह पृथ्वी पर जल को ना ग्रहण करके आकाशीय जल के आश्रित रहता है ऐसे लक्षण वाले जीव अपनी आत्मा से अतृप्त दूसरे के आत्मज्ञान की इच्छा करने वाले जन पित्व: उसको ग्रहण करते है जैसे क्रितृम यंत्र सिर्फ विद्युत पर निर्भर रहते है, अन्नवान् जो जीव अन्न ग्रहण करता है सन वह निश्चित रूप से प्राकृतिक स्वाभाविक शक्ति प्राप्त करता है रफिताय उसकी तुलना में जो अन्न का सेवन नहीं करते है दुसरे जीवों के शरीर मांस पर आश्रित रहते है, उपजग्मुषे वह जगत में आज्ञान का विस्तार करने वाले जन है, स्थिरम् स्वयं को जड़ मान कर चेतना संबेदना भाव से भिन्न मन: मन वाले लोग कृणुते अपने कर्मो से दुसरे जीव के लिए संकट उपस्थित करते हैं, वह स्वार्थी बन कर हर वस्तु का सेवन अपने लिए अपने समुह के लिए संरक्षित करता है पुरा भौतिक पदार्थों का उत और वह अपनी चित् कि वृत्तियों उपर ना उठ कर काम क्रोध लोभ मोह मद ईर्ष्या के वशीभूत होकर स वह मर्डितारम् इस मृत्युलोक के बंधन में न विन्दते इससे बाहर नही निकल पाता है।

ऋग्वेद 10.117.2 — ज्ञान के प्रवाह में बाधा और मृत्यु-बंधन

य आध्राय चकमानाय पित्वोऽन्नवान्त्सन्रफितायोपजग्मुषे।
स्थिरं मनः कृणुते सेवते पुरोतो चित्स मर्डितारं न विन्दते॥ २॥

पहले मंत्र का अंत “न विन्दते” से हुआ था। वही विचार इस मंत्र में आगे बढ़ता है। जो जीव ज्ञान के प्रवाह को रोकता है, अपनी संकीर्ण बुद्धि के कारण दूसरे जीवों के आत्मज्ञान की इच्छा को समझ नहीं पाता और प्रत्येक वस्तु पर अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहता है, वह स्वयं भी मृत्यु के बंधन से बाहर निकलने का मार्ग नहीं पाता।

यः — वह जीव, जो अपने कर्मों और वृत्तियों के कारण ज्ञान के प्रवाह में बाधा उत्पन्न करता है।

आध्राय — कृपण, कंजूस, स्वार्थी और भेदभाव करने वाली संकीर्ण बुद्धि का परिचायक। ऐसा जीव उपलब्ध वस्तुओं और ज्ञान पर अपना अधिकार बनाए रखना चाहता है। वह स्वयं उनका उपभोग करना चाहता है, लेकिन दूसरे जीवों तक उनके लाभ को पहुँचने नहीं देता।

चकमानाय — एकाधिकार की तीव्र इच्छा रखने वाला। चकवा पक्षी के उदाहरण से उस प्रवृत्ति को समझा जा सकता है, जो अपने पोषण के लिए आकाशीय जल की प्रतीक्षा करता है। इसी प्रकार कुछ जीव अपनी आत्मा की अतृप्ति को दूर करने के लिए आत्मज्ञान की इच्छा तो रखते हैं, लेकिन अपने भीतर उस ज्ञान को विकसित करने के स्थान पर दूसरे पर निर्भर रहते हैं। वे ज्ञान चाहते हैं, किंतु ज्ञान के वास्तविक स्रोत और उसके स्वतंत्र प्रवाह को समझने में असमर्थ रहते हैं।

पित्वः — ग्रहण किए जाने वाले पोषण का बोध कराता है। जैसे कृत्रिम यंत्र विद्युत के आश्रित होकर कार्य करते हैं, वैसे ही किसी दूसरे के ज्ञान पर आश्रित जीव उस ज्ञान को ग्रहण करने की इच्छा रख सकता है। किंतु केवल आश्रित रहना और ज्ञान के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करना अलग-अलग अवस्थाएँ हैं।

अन्नवान् — अन्न ग्रहण करने वाला जीव। अन्न प्राकृतिक जीवन का पोषण करता है और जीव को स्वाभाविक शक्ति प्रदान करता है। यहाँ अन्न के माध्यम से प्राकृतिक पोषण और जीवन की सहज व्यवस्था की ओर संकेत है।

सन् — होते हुए, उस अवस्था में विद्यमान रहते हुए।

रफिताय — उसकी तुलना में उन जीवों की स्थिति को समझना चाहिए, जो प्राकृतिक पोषण से दूर होकर दूसरे जीवों के शरीर और मांस पर आश्रित रहते हैं। यह तुलना जीव के पोषण के साधन और उसकी जीवन-वृत्ति के अंतर को सामने रखती है।

उपजग्मुषे — उस अवस्था में पहुँचने वाले अथवा उसके समीप जाने वाले। इस प्रसंग में इसका संबंध उन जीवों से है, जो जगत में अज्ञान का विस्तार करते हैं और ज्ञान के स्वाभाविक प्रवाह को बाधित करने वाली व्यवस्था के निकट पहुँचते हैं।

स्थिरम् — स्थिर, जड़ और परिवर्तन से रहित मान लेने की प्रवृत्ति। जो जीव स्वयं को जड़ मानकर चेतना, संवेदना और भाव से अलग समझता है, उसकी दृष्टि अपने वास्तविक स्वरूप से हट जाती है।

मनः — मन; वह आंतरिक प्रवृत्ति जिसके आधार पर जीव वस्तुओं, संबंधों और अपने कर्मों का संचालन करता है।

कृणुते — करता है, बनाता है। ऐसा जीव अपने कर्मों से दूसरे जीवों के लिए संकट उत्पन्न करता है। उसकी संकीर्ण मानसिकता ज्ञान और सहयोग का मार्ग खोलने के स्थान पर बाधाएँ खड़ी करती है।

सेवते — सेवन करता है, अपने उपभोग में लगाता है। स्वार्थी जीव प्रत्येक वस्तु का उपयोग अपने लिए अथवा अपने समूह के लिए सुरक्षित रखना चाहता है। उसके लिए वस्तु का संग्रह और उपभोग प्रधान हो जाता है, जबकि दूसरे जीवों की आवश्यकता और उनके विकास का विचार पीछे छूट जाता है।

पुरा — पहले, पूर्व से चली आ रही उस प्रवृत्ति के रूप में, जो जीव को अपने स्वार्थ के अनुसार कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।

उत — और; इसके आगे विचार को एक और पक्ष की ओर ले जाने वाला पद।

चित् — चित्त की वृत्तियों से संबंधित बोध। जीव जब अपनी चित्त-वृत्तियों से ऊपर उठने का प्रयास नहीं करता, तब काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और ईर्ष्या जैसी प्रवृत्तियाँ उसके कर्मों को संचालित करने लगती हैं।

सः — वह जीव, जो इन प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर अपने कर्म करता है और ज्ञान के प्रवाह को बाधित करता है।

मर्डितारम् — यहाँ उस अवस्था की ओर संकेत है, जिसमें जीव दुःख और मृत्यु के बंधन से मुक्त होने का मार्ग खोजता है। किंतु जो स्वयं दूसरे जीवों के लिए संकट उत्पन्न करता है और अपने भीतर की वृत्तियों पर विजय प्राप्त नहीं करता, वह दूसरों के दुःख दूर करने वाला भी नहीं बन पाता।

न विन्दते — वह प्राप्त नहीं करता; वह उस अवस्था को नहीं पाता, जहाँ से मृत्यु के बंधन से बाहर निकलने का मार्ग खुलता है।

इस प्रकार मंत्र उस जीव की स्थिति स्पष्ट करता है, जो ज्ञान चाहता तो है, लेकिन ज्ञान के स्वतंत्र प्रवाह को स्वीकार नहीं करता; जो वस्तुओं का उपभोग करता है, किंतु उनके प्राकृतिक और पारस्परिक संबंधों को नहीं समझता; जो अपने समूह और अपने स्वार्थ के लिए संग्रह करता है, लेकिन अपनी चित्त-वृत्तियों पर नियंत्रण नहीं रखता। ऐसा जीव ज्ञान के वास्तविक लाभ से वंचित रह जाता है और मृत्यु के बंधन से बाहर निकलने का मार्ग प्राप्त नहीं कर पाता।

ऋग्वेद 10.117.3 — विषयी जीवन से ईश्वर के सहयोगी बनने तक

स इद्भोजो यो गृहवे ददात्यन्नकामाय चरते कृशाय।
अरमस्मै भवति यामहूता उतापरीषु कृणुते सखायम्॥ ३॥

1. सः इद्भोजः — इंद्रियों की पिपासा शांत करने वाला विषयी मनुष्य

पिछले मंत्र में जिस अतृप्त इच्छाओं वाले जीव का वर्णन हुआ, उसी के संदर्भ में यहाँ विचार आगे बढ़ता है। सः इद्भोजः उस मनुष्य की ओर संकेत करता है, जो अपनी इंद्रियों की पिपासा शांत करने और विषयों का भोग करने में लगा रहता है। उसकी दृष्टि जीवन के व्यापक उद्देश्य पर नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं की तृप्ति पर केंद्रित रहती है।

2. यः गृहवे — शरीर की कामनाओं की तृप्ति में लगा जीव

यः गृहवे उस जीव की स्थिति को सामने रखता है, जो अपने शरीर की कामनाओं की पूर्ति में लगा रहता है। उसके संबंधों और व्यवहार का केंद्र भी शारीरिक इच्छाओं की तृप्ति बन जाता है। वह अपने स्वार्थ के लिए लेन-देन करता है और अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए कपटपूर्ण व्यवहार तक करता है।

3. ददाति — स्वार्थपूर्ण लेन-देन

ददाति का अर्थ है देना। किंतु यहाँ विचार केवल वस्तु देने तक सीमित नहीं रहता। जब देने का उद्देश्य दूसरे के कल्याण के स्थान पर अपनी शारीरिक इच्छा की पूर्ति हो, तब वह व्यवहार भी स्वार्थपूर्ण लेन-देन बन जाता है। ऐसा व्यक्ति दूसरे के हित के लिए नहीं, बल्कि अपनी इच्छा पूरी करने के लिए देता है।

4. अन्नकामाय — अन्न का सेवन भी कामना की तृप्ति के लिए

अन्नकामाय उस प्रवृत्ति को सामने रखता है, जिसमें अन्न का सेवन भी जीवन के पोषण और संतुलन के स्थान पर इंद्रिय-सुख की पूर्ति का साधन बन जाता है। अन्न शरीर को जीवित रखने और कर्म करने की शक्ति देता है, लेकिन विषयी मनुष्य उसी अन्न को अपनी इच्छाओं की तृप्ति तक सीमित कर देता है।

5. चरते — पशुओं की तरह विचरण

चरते का भाव यहाँ ऐसे जीवन से जुड़ता है, जिसमें मनुष्य अपनी उच्चतर चेतना और विवेक का उपयोग किए बिना केवल अपनी वृत्तियों के अनुसार चलता रहता है। उसका जीवन विषयों की खोज, इच्छाओं की पूर्ति और भोग की पुनरावृत्ति में बीतता है।

इसी भाव को एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक में इस प्रकार व्यक्त किया गया है—

येषां न विद्या न तपो न दानं,
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुविभारभूता,
मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥

अर्थात् जिनके जीवन में विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म का विकास नहीं होता, वे पृथ्वी पर भार के समान जीवन व्यतीत करते हैं और मनुष्य का शरीर धारण करके भी पशुओं की तरह विचरण करते हैं।

6. कृशाय — निर्मल चित्त से रहित जीव

कृशाय उस जीव की ओर संकेत करता है, जिसका चित्त निर्मल, स्वच्छ और पवित्र नहीं है। वह दूसरे की भावनाओं और आवश्यकताओं को समझने में असमर्थ रहता है। उसके भीतर अपनी इच्छाओं का इतना प्रभाव होता है कि वह दूसरे के दुःख, अभाव और संवेदना को उचित स्थान नहीं दे पाता।

7. अरम् — स्वार्थ और शत्रुता की प्रवृत्ति

अरम् का भाव यहाँ अपने स्वार्थ से वशीभूत जीवन की ओर बढ़ता है। जब मनुष्य अपने आराम, इच्छाओं और निजी लाभ को ही प्रधानता देता है, तब उसका व्यवहार दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण भी हो सकता है। स्वार्थ की यही प्रवृत्ति हिंसक व्यवहार और परस्पर संघर्ष को जन्म देती है।

8. अस्मै भवति — संसार में ऐसी प्रवृत्ति की पर्याप्त उपस्थिति

अस्मै भवति के माध्यम से उस प्रवृत्ति के व्यापक परिणाम को समझा जा सकता है। संसार में ऐसे जीवों की कमी नहीं है, जिनका जीवन अपनी इच्छाओं की पूर्ति, स्वार्थ और दूसरों के उपयोग तक सीमित रहता है। वे जीवन की व्यवस्था में उपस्थित तो हैं, किंतु अपने कर्मों से जगत के कल्याण में सहयोग नहीं करते।

9. यामहूता — इस आयाम से अलग, जगत-कल्याण के लिए आहुति

यामहूता को यहाँ पिछले वर्णन से अलग दिशा में समझना आवश्यक है। एक ओर वह जीवन है, जिसमें कर्म का उद्देश्य अपनी इंद्रियों और इच्छाओं की तृप्ति है; दूसरी ओर वह कर्म है, जिसमें व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जगत के कल्याण के लिए स्वयं को समर्पित करता है।

आहुति का मूल भाव है—अपने पास उपलब्ध साधनों, सामर्थ्य और कर्म को किसी व्यापक उद्देश्य के लिए अर्पित करना। इस प्रकार जगत-कल्याण के लिए किया गया कर्म उस विषयी जीवन से भिन्न आयाम प्रस्तुत करता है, जिसमें सब कुछ अपने लिए सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति प्रधान रहती है।

10. उत — उपकार और परोपकार की ओर

उत यहाँ विचार को दूसरे पक्ष की ओर ले जाता है। अब विषय केवल अपनी इच्छाओं की पूर्ति नहीं, बल्कि उपकार और परोपकार की भावना से प्रेरित कर्म है। मनुष्य जब अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के हित के लिए कार्य करता है, तब उसके कर्मों का उद्देश्य व्यापक हो जाता है।

11. अपरीषु — दूसरों को अपने समान मानना

अपरीषु के भाव में अपने अतिरिक्त दूसरे जीवों को भी महत्त्व देने की दिशा सामने आती है। दूसरों को अपने समान मानकर उनके सुख-दुःख और आवश्यकताओं का विचार करना परोपकार की आधारभूमि है। ऐसा व्यक्ति जगत को केवल अपने उपभोग का साधन नहीं मानता, बल्कि उसमें अपने समान अन्य जीवों की उपस्थिति और उनके हित को स्वीकार करता है।

12. कृणुते — अपने कर्मों से सहयोग की व्यवस्था बनाना

कृणुते का अर्थ है करना, बनाना अथवा स्थापित करना। जो व्यक्ति अपने कर्मों को उपकार, परोपकार और जगत के कल्याण के लिए नियोजित करता है, वह अपने आचरण से सहयोग की व्यवस्था निर्मित करता है। उसके कर्म केवल निजी इच्छाओं की पूर्ति नहीं करते, बल्कि दूसरे जीवों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होते हैं।

13. सखायम् — ईश्वर का सहयोगी

सखायम् का भाव मित्र और सहयोगी का है। जो जीव अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर जगत के कल्याण के लिए कर्म करता है, वह ईश्वर की व्यवस्था में सहयोगी सिद्ध होता है। उसका जीवन केवल भोग और संग्रह में व्यतीत नहीं होता, बल्कि वह उस व्यापक उद्देश्य में सहभागी बनता है, जिसके अंतर्गत दूसरे जीवों का हित भी उसके कर्म का अंग बनता है।

ऋग्वेद का मंत्र “सखायः” और “सयुजा सखाया” जैसे पदों के माध्यम से साथ और सहयोग के संबंध की ओर संकेत करता है। इस संदर्भ में मित्रता केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं रह जाती, बल्कि एक व्यापक तात्त्विक संबंध बन जाती है—जहाँ जीव अपने कर्मों को स्वार्थ की सीमा से निकालकर ईश्वर की व्यवस्था के अनुकूल नियोजित करता है।

निष्कर्ष

तीसरा मंत्र दो दिशाओं का अंतर सामने रखता है। पहली दिशा उस विषयी मनुष्य की है, जो अपनी इंद्रियों की पिपासा, शारीरिक कामनाओं और स्वार्थपूर्ण लेन-देन में जीवन व्यतीत करता है। दूसरी दिशा उस मनुष्य की है, जो अपने समान दूसरे जीवों को महत्त्व देता है और उपकार, परोपकार तथा जगत-कल्याण के लिए कर्म करता है।

पहली दिशा में कर्म का केंद्र निजी इच्छा है; दूसरी दिशा में कर्म का केंद्र व्यापक हित है। जब मनुष्य अपने जीवन को केवल भोग और संग्रह तक सीमित नहीं रखता, बल्कि अपने कर्मों को जगत के कल्याण में नियोजित करता है, तब वह ईश्वर का सहयोगी बनता है।

यहां वह कौन व्यक्ति है जिसकी बात पिछले मंत्र में कि गयी अतृप्त इच्छाएं वाला मनुष्य स: इद्भोजो इंन्द्रियों कि पिपासा को शांत करने वाला विषयी मनुष्य यो जो गृहवे अपनी शरीर की कामना को तृप्त करने में लगा जीव कामीपुरुष ददाति शारीरिक इच्छा कि तृप्ति के लिए लेन देन स्वार्थ पुर्ण करता कपट पुर्ण व्यवहार वाला अन्नकामाय आन्न का सेवन भी केवल काम तृप्ति के लिए करता है, वह पशुओं की तरह पृथ्वी पर भार के रूप में पशुओं की तरह विचरण करता है, जैसा कि एक संस्कृत का श्लोक आता है येषां न विद्या न तपो न दानं, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः ।

ते मर्त्यलोके भुविभारभूता, मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

कृषाय जिनका चित्त मन निर्मल स्वच्छ पवित्र नही है जो दुसरे कि भावनाओं को समझने में पुरी तरह से असमर्थ हैं। अरम् अपने आराम स्वार्थ से वशीभूत अरम का भाव शत्रुता पुर्ण व्यवहार करने वाला हिंसक प्राणी अस्मै इस प्रकार के लोग भवती संसार में पर्याप्त मात्रा में उपस्थित है। इसलिए यामहूतौ इस आयाम से अलग आहूति जो जगत कल्याणार्थ कर्म है उत उपकार परोपकार कि भावनाओं से प्रेरित होकर जो कर्म किए जाते है अपरीषु अपने समान दुसरे को भी मान कर जो व्यक्ति कृणुते कर्म करता है वह सखायाम ईश्वर का सहयोगी सिद्ध होता है जैसा कि एक मंत्र है सयुजा सखाय।

ऋग्वेद 10.117.4 — ज्ञान ही सखा और ज्ञानदान का उत्तरदायित्व

न स सखा यो न ददाति सख्ये सचाभुवे सचमानाय पित्वः।
अपास्मात्प्रेयान्न तदोको अस्ति पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्॥ ४॥

जैसा कि पिछला मंत्र सखाय से पुर्ण हुआ है उसी भाव को यहा भी रखा गया एक चरण आगे बढ़ कर यहां न से पुरानी मृत्रता में दृढ़ता प्रदान करने के लिए रखा है आगे स वह सखा बन चुका है पिछले मंत्र में सखाय था जिसका मतलब था सखा के साथ यहां सखा अकेला सखा है उसका मित्र ईश्वर शरीरधारी नही है इस भाव को यहां प्रकट किया गया है जब सखाय शब्द है वहा भावना का एक रूपता का भाव है अब सखा वैचारिक स्तर पर है यहा भौतिक जगत मे मनुष्य बाहर ईश्वर कि खोज नहीं करता है यहां उसकी समझ ज्ञान ही उसका सखा है, और जब इस सखा का ज्ञान का विचार का मंत्र का वह व्यक्ति दान नहीं करता है यो नो ददाति सख्ये अपने सहयोगी समान परिस्थितियों में रहने वाले जीव को सचाभुवे भौतिक जगत में उद्धार का साधन ज्ञान सचमानाय मंत्रोपदेश मंत्रोपचार पित्व: पिता है स्वयं के लिए ही संचित करता है। तो अपास्मात्प्रेयान्न यह दुसरे तरह का संचय है जो मनुष्य को प्रेयान्न प्रेय सांसारिक भोगों में ही उलझा कर रखती है, पहले कोटी के मनुष्य जिसकी बात पिछले मंत्र में कि गयी वह अपनी शारीरिक इच्छा तृष्णा का दास बना रहता है पशुवत जीवन जीता यहा और सुक्ष्म बात हो रही ज्ञान संपन्न होने पर भी व्यक्ति ज्ञान का दान नही करता है क्योंकि वह ईश्वर उसके साथ जबरदस्ती नहीं करता है वह ईश्वरीय निधि पर भी सुक्ष्म एकाधिकार करने कि भावना से भर जाता है इसलिए म़त्र आगे कहता है कि तदोको जो तत्व सर्व सुलभ नही है अस्ति पृणान्तमन्नमरणं दान देने कि स्थिति वह मन मे ही दबा रहता है जिसे मृत्यु ग्रहण करलेती है, इसलिए चित् चेतन रहते हुये जब तक मृत्यु नहीं आयी है,अपनी इच्छते इच्छा ज्ञान का दान करना अनिवार्य खहा गया है।

पिछले मंत्र का अंत “सखायम्” से हुआ था। उसी भाव को यहाँ आगे बढ़ाया गया है। पिछले मंत्र में सखा के साथ एकरूपता और सहयोग का भाव था। यहाँ “न” से आरंभ करके उसी मित्रता में दृढ़ता स्थापित की गई है। सखायम् में सखा के साथ संबंध और सहभागिता का भाव था, जबकि यहाँ सखा को स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत किया गया है। यह अंतर विचार को एक सूक्ष्म स्तर पर ले जाता है।

यहाँ सखा कोई आवश्यक रूप से शरीरधारी व्यक्ति नहीं है। भौतिक जगत में मनुष्य ईश्वर को किसी बाहरी शरीर में खोजने के स्थान पर उसके ज्ञान को अपना सखा समझ सकता है। ज्ञान, विचार और मंत्रोपदेश के माध्यम से ही वह ईश्वर के साथ अपने संबंध को समझता है। इसलिए ज्ञान का सखा बनना केवल किसी व्यक्ति से मित्रता करना नहीं, बल्कि उस ज्ञान को अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाना है।

न — मित्रता में दृढ़ता

न से मंत्र का आरंभ उस संबंध को दृढ़ करने के लिए होता है, जिसकी चर्चा पिछले मंत्र में हुई थी। सखा के साथ संबंध केवल भावना तक सीमित नहीं रह सकता; उसकी पुष्टि कर्म से होती है। यदि ज्ञान को सखा माना गया है, तो उस ज्ञान के प्रति अपने उत्तरदायित्व को भी स्वीकार करना होगा।

सः सखा — ज्ञान को सखा मानने वाला

सः सखा उस व्यक्ति की स्थिति को सामने रखता है, जो ज्ञान को अपना सखा बना चुका है। वह जानता है कि ज्ञान ही उसे अपने वास्तविक स्वरूप, अपने कर्म और ईश्वर के साथ अपने संबंध को समझने में सहायता देता है।

इस संबंध में सखा का अर्थ केवल साथ रहने वाला नहीं, बल्कि ऐसा मार्गदर्शक है जिसके ज्ञान से जीवन की दिशा निर्धारित होती है। जब मनुष्य ज्ञान को अपना सखा मानता है, तब उस ज्ञान को अपने तक सीमित रखना उसके सख्यभाव के विपरीत हो जाता है।

यो नो ददाति — जो ज्ञान का दान नहीं करता

यो न ददाति उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है, जो ज्ञान से संपन्न होने पर भी उसे दूसरे तक नहीं पहुँचाता। पिछले मंत्र में स्वार्थी मनुष्य अपनी शारीरिक इच्छाओं का दास था। यहाँ उससे भी सूक्ष्म स्थिति सामने आती है—व्यक्ति ज्ञान को जानता है, उसके महत्त्व को समझता है, लेकिन उसे अपने तक सीमित रखता है।

यहाँ समस्या ज्ञान के अभाव की नहीं, बल्कि ज्ञान के संचय और उसके दान से विमुख होने की है। मनुष्य ईश्वर के ज्ञान को प्राप्त कर सकता है, परंतु उसे दूसरे जीवों के कल्याण के लिए देना उसके अपने कर्म और इच्छा पर निर्भर है। ईश्वर का ज्ञान उपलब्ध होने पर भी मनुष्य उसके प्रति एकाधिकार की भावना विकसित कर सकता है।

सख्ये — मित्रता के संबंध में

सख्ये उस संबंध का बोध कराता है, जिसमें ज्ञान को सखा मानकर उसके साथ एक विचारात्मक संबंध स्थापित किया गया है। इस संबंध की सार्थकता तभी है, जब ज्ञान केवल निजी लाभ का साधन न बने, बल्कि दूसरे जीवों के लिए भी उपयोगी हो।

यदि कोई व्यक्ति ज्ञान को अपना सखा मानता है, लेकिन समान परिस्थिति में रहने वाले दूसरे जीव को उससे वंचित रखता है, तो वह मित्रता के वास्तविक भाव को सीमित कर देता है।

सचाभुवे — साथ रहने वाले और समान परिस्थिति में स्थित जीव के लिए

सचाभुवे उस जीव की ओर संकेत करता है, जो उसी भौतिक जगत में रहता है और समान प्रकार की परिस्थितियों से गुजरता है। उसके लिए ज्ञान उद्धार का साधन बन सकता है। जिस प्रकार एक जीव ज्ञान के सहारे अपनी स्थिति को समझता है, उसी प्रकार दूसरे जीव को भी ज्ञान प्राप्त होने पर अपनी स्थिति और उससे निकलने का मार्ग समझने का अवसर मिलता है।

इसलिए ज्ञान का दान केवल सूचना देना नहीं है। यह दूसरे जीव को उसके जीवन, कर्म और अपने वास्तविक स्वरूप को समझने का साधन देना है।

सचमानाय — मंत्रोपदेश और ज्ञानोपचार

सचमानाय के प्रसंग में ज्ञान के साथ चलने, उसका अनुसरण करने और उसे व्यवहार में लाने का भाव सामने आता है। मंत्रोपदेश और ज्ञानोपचार के माध्यम से मनुष्य दूसरे जीव को उस मार्ग से परिचित करा सकता है, जिस पर चलकर वह अपने जीवन की दिशा बदल सके।

ज्ञान का वास्तविक उपयोग तभी होता है, जब वह जीवन में उतरे और दूसरे के लिए भी मार्गदर्शक बने। यदि ज्ञान केवल अपने पास सुरक्षित रखा जाता है, तो उसका लोककल्याणकारी पक्ष प्रकट नहीं हो पाता।

पित्वः — ज्ञानरूपी पोषण और पिता का भाव

पित्वः को यहाँ ज्ञान के पोषणकारी स्वरूप से जोड़कर समझा जा सकता है। जिस प्रकार पिता का भाव पोषण और मार्गदर्शन से जुड़ा है, उसी प्रकार ज्ञान भी जीव के विकास का आधार बनता है। मंत्रोपदेश और ज्ञान का दान दूसरे जीव को वैचारिक पोषण प्रदान करता है।

लेकिन जब मनुष्य इस ज्ञान को केवल अपने लिए संचित करता है, तब वह उसके व्यापक उद्देश्य को सीमित कर देता है। वह ज्ञान का लाभ स्वयं लेना चाहता है, किंतु दूसरे को उससे लाभान्वित करने के दायित्व से बचता है।

अपास्मात्प्रेयान् — ज्ञान से दूर करके प्रेय की ओर ले जाना

अपास्मात्प्रेयान् में विचार का अगला सूक्ष्म पक्ष सामने आता है। पिछले मंत्र में जिस मनुष्य को अपनी शारीरिक इच्छाओं और तृष्णा का दास बताया गया था, वह भोग के कारण ज्ञान से दूर रहता है। यहाँ ऐसा व्यक्ति सामने आता है, जो ज्ञान से परिचित होने पर भी उसे दूसरे तक नहीं पहुँचाता।

इस प्रकार ज्ञान का संचय स्वयं एक दूसरी बाधा बन सकता है। मनुष्य ज्ञान से संपन्न होते हुए भी अपनी इच्छा, स्वार्थ और निजी लाभ के कारण प्रेय—अर्थात् सांसारिक भोगों और आकर्षणों—में उलझा रह सकता है। वह स्वयं भी ज्ञान के व्यापक उद्देश्य से दूर होता है और दूसरे को भी उस ज्ञान से वंचित रखता है।

न तदोकः अस्ति — वह स्थायी आश्रय नहीं है

न तदोकः अस्ति का भाव है कि वह अवस्था वास्तविक आश्रय नहीं बनती। ज्ञान को अपने तक सीमित रखने वाला व्यक्ति अपने लिए भी ऐसा स्थायी आधार निर्मित नहीं करता, जो दूसरे जीवों के कल्याण और व्यापक हित से जुड़ा हो।

ज्ञान का वास्तविक आश्रय वह है, जहाँ उसका उपयोग केवल निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि जीवन के व्यापक उद्देश्य को समझने और दूसरे जीवों के मार्गदर्शन में भी होता है।

पृणन्तम् — देने और आवश्यकता पूरी करने वाला

पृणन्तम् उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है, जो दूसरे की आवश्यकता पूरी करता है। इस मंत्र के विचार-क्रम में ज्ञानदान भी इसी व्यापक भाव का अंग है। ज्ञान की आवश्यकता रखने वाले जीव को ज्ञान देना, उसके लिए मार्ग खोलना और उसे अपने जीवन को समझने का साधन प्रदान करना दान का महत्त्वपूर्ण स्वरूप है।

अन्यम् — दूसरे जीव के लिए

अन्यम् अपने अतिरिक्त दूसरे जीव की ओर संकेत करता है। ज्ञान का दान तभी प्रकट होता है, जब मनुष्य अपने अतिरिक्त किसी दूसरे के हित को भी स्वीकार करता है। यदि ज्ञान केवल अपने लिए है, तो उसका प्रवाह वहीं रुक जाता है; यदि वह दूसरे तक पहुँचता है, तो वह उसके लिए भी उपयोगी बन सकता है।

अरणम् — ज्ञान के अभाव और बंधन से निकलने का मार्ग

अरणम् को इस विचार-क्रम में उस सहायता और मार्ग के रूप में देखा जा सकता है, जो जीव को अपने बंधनों को समझने में सहयोग देता है। ज्ञान का दान दूसरे के लिए ऐसा मार्ग खोल सकता है, जिसके सहारे वह अपनी इच्छाओं और वृत्तियों को पहचानकर उनसे ऊपर उठने का प्रयास करे।

चित् — चेतन रहते हुए

चित् इस प्रसंग में चेतन अवस्था की ओर ध्यान आकर्षित करता है। जब तक मनुष्य चेतन है और उसके पास कर्म करने की स्वतंत्रता है, तब तक उसके सामने यह अवसर रहता है कि वह अपने ज्ञान का उपयोग केवल निजी स्वार्थ के लिए न करे, बल्कि उसे दूसरे जीवों के हित में भी लगाए।

इच्छेत् — इच्छा करे और कर्म में प्रवृत्त हो

इच्छेत् इच्छा करने और उसके अनुसार प्रवृत्त होने का बोध कराता है। ज्ञान का दान केवल विचार में स्वीकार कर लेने से पूरा नहीं होता; उसके लिए मनुष्य को स्वयं इच्छा करके कर्म करना पड़ता है।

इस प्रकार मंत्र ज्ञान के प्रति मनुष्य के उत्तरदायित्व को सामने रखता है। ईश्वर ज्ञान प्रदान करता है, लेकिन उस ज्ञान को दूसरे तक पहुँचाने के लिए मनुष्य को स्वयं प्रवृत्त होना पड़ता है। ज्ञान प्राप्त करना एक अवस्था है; उसे लोककल्याण में लगाना दूसरी अवस्था है।

निष्कर्ष

इस मंत्र में ज्ञान के संचय की एक सूक्ष्म समस्या सामने आती है। पिछले मंत्र में मनुष्य अपनी शारीरिक इच्छाओं का दास था; यहाँ ज्ञान से संपन्न होने पर भी वह उसके दान से विमुख हो सकता है। वह ईश्वरीय ज्ञान को प्राप्त करके भी उस पर सूक्ष्म एकाधिकार की भावना विकसित कर लेता है।

इसीलिए ज्ञान का दान महत्त्वपूर्ण है। जब तक मनुष्य चेतन है, तब तक उसके पास अपनी इच्छा और कर्म के द्वारा ज्ञान को दूसरे जीवों तक पहुँचाने का अवसर है। यदि वह इस अवसर को केवल अपने स्वार्थ के कारण छोड़ देता है, तो ज्ञान उसके पास रहते हुए भी उसका व्यापक कल्याणकारी उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

ज्ञान को सखा मानने का वास्तविक अर्थ है—उसके साथ संबंध स्थापित करना, उसके अनुसार जीवन जीना और उसके लाभ को दूसरे जीवों तक पहुँचाना। यही वह बिंदु है जहाँ ज्ञान का निजी संचय समाप्त होकर ज्ञानदान और लोककल्याण का मार्ग खुलता है।

ऋग्वेद 10.117.5 — ज्ञानदान की विधि, पात्रता और प्राणप्रतिष्ठा

पृणीयादिन्नाधमानाय तव्यान्द्राघीयांसमनु पश्येत पन्थाम्।
ओ हि वर्तन्ते रथ्येव चक्रान्यमन्यमुप तिष्ठन्त रायः॥ ५॥

1. पिछले मंत्र से आगे — ज्ञानदान की विधि

पिछले मंत्र का अंतिम पद इच्छेत् था। वहाँ ज्ञानदान की इच्छा पर बल दिया गया था। यहाँ एक नया प्रश्न सामने आता है—मनुष्य के भीतर ज्ञान देने की इच्छा जागृत हो जाने पर भी वह ज्ञान दूसरे तक कैसे पहुँचेगा? इसके लिए केवल इच्छा पर्याप्त नहीं है। ज्ञान को ऐसे माध्यम और पद्धति से जोड़ना होगा, जिसके द्वारा उसे ग्रहण करने वाला जीव उसके वास्तविक लाभ तक पहुँच सके।

किसी व्यक्ति ने ईश्वर से ज्ञान प्राप्त किया, यह उसके लिए एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है; किंतु उस व्यक्तिगत उपलब्धि को समाज तक पहुँचाना एक अलग कार्य है। समाज पहले से अपनी अवधारणाएँ, मान्यताएँ और ज्ञानार्जन की पद्धतियाँ विकसित कर चुका होता है। कोई साधु-संत, गुरु, विद्वान अथवा वैज्ञानिक अपने ज्ञान को पूर्ण मान सकता है। ऐसी स्थिति में किसी दूसरे व्यक्ति के लिए केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं कि उसके पास ईश्वरीय ज्ञान है।

उसे उस माध्यम को समझना होगा, जिससे लोग ज्ञान ग्रहण करते हैं। वर्तमान ज्ञान-पद्धति को समझकर अपने ज्ञान को इस प्रकार परिष्कृत करना होगा कि वह ग्रहण करने वाले तक पहुँच सके।

इसका उदाहरण जल के स्रोतों से समझा जा सकता है। पहले लोग बावड़ी और कुएँ से पानी लेते थे, फिर हैंडपंप और नल का प्रयोग बढ़ा। आज अनेक लोग फिल्टर, आरओ और बोतलबंद जल पर निर्भर हैं। यदि कोई व्यक्ति लोगों से कहे कि आधुनिक साधनों को छोड़कर वे फिर से कुएँ और बावड़ी से पानी लेने लगें, तो वर्तमान जीवन-व्यवस्था में उसे स्वीकार कराना कठिन होगा। बड़ी इमारतों और फ्लैटों में रहने वाले लोगों तक पानी पहुँचाने के लिए अलग व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार ज्ञान प्राप्त करना एक बात है और ज्ञान को योग्य व्यक्ति तक पहुँचाना दूसरी बात। ज्ञानदान के लिए उसकी प्रस्तुति, माध्यम, विधि और ग्रहण करने वाले की परिस्थिति को समझना आवश्यक है।

2. पृणीयात् — प्राणवान बनाने की प्रक्रिया

पृणीयात् का सामान्य अर्थ तृप्त करना, भरना अथवा आवश्यकता पूरी करना है। इस मंत्र के विचार-क्रम में इसे ज्ञान के माध्यम से जीव को परिपूर्ण बनाने की प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है।

यहाँ दान साधारण लेन-देन नहीं है। इसका उद्देश्य किसी जीव को ऐसा ज्ञान देना है, जिसके सहारे वह अपने जीवन को समझ सके, अपनी सीमाओं को पहचान सके और अपने बंधनों से बाहर निकलने का मार्ग खोज सके। इस अर्थ में ज्ञानदान जीव को प्राणवान बनाने की प्रक्रिया से जुड़ता है।

प्राणप्रतिष्ठा का भाव भी यहाँ एक उपयोगी संदर्भ प्रस्तुत करता है—किसी वस्तु या व्यवस्था को उसके उद्देश्य के अनुरूप सक्रिय और उपयोगी बनाना। उसी प्रकार ज्ञान को केवल शब्दों और सूचनाओं के रूप में प्रस्तुत कर देना पर्याप्त नहीं; उसे ग्रहण करने वाले के जीवन में वास्तविक बोध उत्पन्न करने योग्य बनाना भी आवश्यक है।

3. इत् — निश्चित रूप से

इत् कथन को निश्चितता प्रदान करता है। ज्ञानदान का उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब वह वास्तविक आवश्यकता की पूर्ति करे। केवल देने वाले की भावना पर्याप्त नहीं है; यह भी देखना होगा कि उसके द्वारा दिया गया ज्ञान ग्रहण करने वाले के लिए किस प्रकार उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

4. नाधमानाय — आवश्यकता रखने वाले पात्र तक पहुँचना

नाधमानाय उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है, जो याचना करता है अथवा किसी आवश्यकता की पूर्ति चाहता है।

यहाँ केवल भौतिक धन माँगने वाले व्यक्ति का विचार नहीं है। व्यापक प्रसंग में यह उस जीव की स्थिति है, जिसे अपने जीवन, कर्म और वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है।

लेकिन ज्ञान देने वाले के सामने एक कठिनाई होती है। सामने वाला व्यक्ति अपनी स्थापित मान्यताओं और धारणाओं के कारण नए ज्ञान को स्वीकार करने में असमर्थ हो सकता है। वह देने वाले की भावना को भी गलत समझ सकता है। इसलिए पात्र की खोज और उसकी परिस्थिति को समझना ज्ञानदान की प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण भाग है।

ज्ञान देने की इच्छा रखने वाले को यह देखना होगा कि किसे ज्ञान की आवश्यकता है, कौन उसे ग्रहण करने के लिए तैयार है और किस माध्यम से वह उसके वास्तविक लाभ तक पहुँच सकता है।

5. तव्यान् — सामर्थ्य और द्रव्य का उपयोग

तव्यान् के प्रसंग में सामर्थ्य और उपलब्ध साधनों की ओर ध्यान जाता है। ज्ञानदान के लिए केवल ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं; उसे दूसरे तक पहुँचाने की क्षमता और साधन भी चाहिए।

द्रव्य का उपयोग केवल भौतिक संपत्ति तक सीमित नहीं है। ज्ञान, अनुभव, विधि और उसे समझाने की क्षमता भी उस प्रक्रिया के साधन बनते हैं, जिसके द्वारा दूसरे जीव को लाभ पहुँचाया जा सकता है।

यहाँ दान का उद्देश्य संग्रह को बढ़ाना नहीं, बल्कि उपलब्ध सामर्थ्य को दूसरे जीव के विकास में लगाना है।

6. द्राघीयसम् — दूर तक जाने वाला मार्ग

द्राघीयसम् दीर्घ अथवा दूर तक जाने वाले मार्ग का बोध कराता है। ज्ञानदान के संदर्भ में यह उस प्रक्रिया की ओर संकेत करता है, जिसके परिणाम तत्काल तक सीमित नहीं रहते।

किसी व्यक्ति को एक विषय की जानकारी देना एक बात है; उसे उस जानकारी के प्रयोग की विधि सिखाना दूसरी बात। जानकारी मिलने से व्यक्ति किसी वस्तु को पहचान सकता है, किंतु विधि का प्रयोग सीखने पर वह उस ज्ञान के फल तक पहुँच सकता है।

इसलिए ज्ञानदान में दीर्घकालीन परिणाम को ध्यान में रखना आवश्यक है। ऐसी पद्धति का चुनाव करना चाहिए, जो ग्रहण करने वाले को केवल जानकारी तक सीमित न रखे, बल्कि उसे ज्ञान के वास्तविक प्रयोग और उसके परिणाम तक पहुँचा सके।

7. अनु पश्येत् — प्रक्रिया और परिणाम को समझना

अनु पश्येत् का भाव है—क्रम के अनुसार देखना, विचार करना और मार्ग को समझना।

ज्ञान देने वाले को यह देखना होगा कि किस परिस्थिति में कौन-सी विधि उपयुक्त है। कहीं केवल जानकारी देना पर्याप्त हो सकता है, कहीं प्रयोग कराना आवश्यक होगा और कहीं जानकारी तथा प्रयोग दोनों को साथ लेकर चलना होगा।

यह चुनाव सरल नहीं है। हर व्यक्ति को एक ही समय पर एक ही प्रकार के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। किसी को आधारभूत जानकारी चाहिए, किसी को अभ्यास और किसी को अपने अनुभवों की समीक्षा करने की आवश्यकता होती है।

अतः ज्ञानदान में केवल विषय का ज्ञान नहीं, बल्कि उस ज्ञान को पहुँचाने की प्रक्रिया का बोध भी आवश्यक है।

8. पन्थाम् — पात्र तक पहुँचने का मार्ग

पन्थाम् मार्ग है। यहाँ ज्ञान को पात्र तक पहुँचाने की विधि पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है।

ज्ञान देने वाले और ग्रहण करने वाले के बीच केवल दूरी ही बाधा नहीं होती। उनके बीच मान्यताओं, अनुभवों, भाषा, सामाजिक परिस्थितियों और समझ का अंतर भी हो सकता है। इन बाधाओं को समझे बिना ज्ञान का वास्तविक लाभ पहुँचाना कठिन है।

इसलिए ज्ञानदान की अपनी पद्धति होनी चाहिए। वह पद्धति ग्रहण करने वाले की स्थिति को ध्यान में रखकर विकसित की जाए, ताकि ज्ञान केवल प्रस्तुत न हो, बल्कि समझा और व्यवहार में लाया भी जा सके।

9. ओ हि — क्योंकि यही वास्तविक स्थिति है

ओ हि आगे दिए गए कारण पर बल देता है। ज्ञानदान के लिए मार्ग को समझना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि संसार में वस्तुओं और संपत्तियों का प्रवाह निरंतर बदलता रहता है। जो आज किसी एक के पास है, वह कल किसी दूसरे के पास जा सकता है।

इसी परिवर्तनशील व्यवस्था को अगली उपमा के माध्यम से स्पष्ट किया गया है।

10. वर्तन्ते — निरंतर घूमते रहना

वर्तन्ते का अर्थ घूमना अथवा निरंतर गतिशील रहना है। संसार में वस्तुएँ और संपत्तियाँ एक ही स्थान पर सदा स्थिर नहीं रहतीं। उनके स्वामित्व, उपयोग और पहुँच में परिवर्तन होता रहता है।

ज्ञान के संदर्भ में भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक विचार पहुँच सकते हैं। एक व्यक्ति में जागृत हुआ ज्ञान दूसरे व्यक्ति के लिए प्रेरणा और बोध का कारण बन सकता है। इस प्रकार ज्ञान का प्रवाह अनेक जीवों को जोड़ता है।

11. रथ्या इव — रथ के समान

रथ्या इव के माध्यम से गति और परिवर्तन को एक दृश्य उदाहरण से समझाया गया है। रथ के पहिए लगातार घूमते रहते हैं। उनकी गति के कारण रथ आगे बढ़ता है।

यह उपमा केवल गति को नहीं, बल्कि गति के पीछे स्थित व्यवस्था को भी समझने का अवसर देती है। पहिए घूमते हैं, किंतु उनके घूमने के लिए धुरा और संरचना आवश्यक हैं।

12. चक्रा — पहिए और गति का आधार

चक्रा पहियों का बोध कराता है। पहिए निरंतर घूमते रहते हैं, लेकिन उनके केंद्र का कार्य अलग होता है। इस उदाहरण से गति और स्थिर आधार के बीच का अंतर समझा जा सकता है।

ज्ञान के प्रवाह में भी अनेक व्यक्ति, विचार और माध्यम सक्रिय रहते हैं। एक से दूसरे तक ज्ञान पहुँचता है और नए व्यक्तियों में बोध उत्पन्न होता है। इस क्रम में ज्ञान के मूल आधार को समझना उतना ही आवश्यक है, जितना उसके प्रवाह को।

13. अन्यम् अन्यम् — एक से दूसरे तक

अन्यम् अन्यम् का भाव है—एक से दूसरे तक, क्रमशः अलग-अलग व्यक्तियों के बीच।

जैसे एक जलता हुआ दीपक दूसरे दीपक को जलने का अवसर देता है, वैसे ही ज्ञान प्राप्त व्यक्ति अपने ज्ञान के माध्यम से दूसरे में भी बोध जागृत करने में सहयोग कर सकता है।

दूसरे दीपक को जलाने से पहले दीपक का प्रकाश अपने भीतर समाप्त नहीं हो जाता। इसी प्रकार ज्ञान का उचित दान दूसरे के लिए भी ज्ञानार्जन का मार्ग खोल सकता है।

यहाँ ज्ञान का प्रवाह केवल वस्तु के हस्तांतरण की तरह नहीं है। इसका उद्देश्य दूसरे जीव में समझ और बोध को जागृत करना है।

14. उप — समीप आना और जुड़ना

उप निकटता अथवा किसी के पास पहुँचने का बोध कराता है। ज्ञान का प्रवाह तभी प्रभावी होता है, जब वह ग्रहण करने वाले के निकट पहुँचे—अर्थात् उसकी समझ, परिस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप प्रस्तुत हो।

उपासना के संदर्भ में भी निकटता और एकाग्र भाव का विचार आता है। यहाँ ज्ञान के निकट आना केवल शब्द सुनना नहीं, बल्कि उसके अर्थ और उद्देश्य से जुड़ना है।

15. तिष्ठन्ति — स्थिर होना

तिष्ठन्ति का अर्थ है स्थित होना अथवा ठहरना। ज्ञान के प्रवाह में अनेक जीव सहभागी होते हैं, लेकिन ज्ञान में स्थिर होना केवल उसे सुन लेने से नहीं होता।

जब जीव ज्ञान को समझता है, उस पर विचार करता है और उसके अनुसार अपने जीवन को व्यवस्थित करता है, तब वह उस ज्ञान में स्थिर होने लगता है।

16. रायः — ऐश्वर्य और वास्तविक संपन्नता

रायः का सामान्य अर्थ धन, संपत्ति और ऐश्वर्य है। इस मंत्र के व्यापक विचार-क्रम में संपन्नता को केवल भौतिक संग्रह तक सीमित नहीं रखा जा सकता।

भौतिक संपत्ति का स्वामित्व बदलता रहता है। ज्ञान का दान भी तभी व्यापक फल देता है, जब वह दूसरे जीव के भीतर बोध उत्पन्न करने और उसके जीवन को दिशा देने में सहायक हो।

इस प्रकार वास्तविक संपन्नता का संबंध उस सामर्थ्य से भी है, जिसके द्वारा जीव अपने ज्ञान का उपयोग करता है और दूसरे के विकास में सहयोग देता है।

निष्कर्ष — ज्ञान प्राप्त करना और ज्ञान पहुँचाना

इस मंत्र का विचार पिछले मंत्र के इच्छेत् से आगे बढ़ता है। ज्ञानदान की इच्छा आवश्यक है, लेकिन उस इच्छा को वास्तविक परिणाम तक पहुँचाने के लिए उपयुक्त मार्ग, विधि और पात्र की पहचान भी आवश्यक है।

ज्ञान प्राप्त करना व्यक्तिगत उपलब्धि है; उसे दूसरे तक पहुँचाना एक अलग उत्तरदायित्व है। इसके लिए ग्रहण करने वाले की परिस्थिति को समझना, उचित माध्यम चुनना और ज्ञान को इस प्रकार प्रस्तुत करना आवश्यक है कि वह उसके जीवन में वास्तविक बोध उत्पन्न कर सके।

रथ के घूमते पहियों की उपमा संपत्ति के निरंतर परिवर्तन को सामने रखती है। दीपक से दीपक जलने का उदाहरण ज्ञान के प्रवाह को समझने में सहायक है। एक व्यक्ति में जागृत हुआ ज्ञान दूसरे तक पहुँच सकता है, और इस प्रकार ज्ञान का दान अनेक जीवों के लिए मार्ग खोल सकता है।

ज्ञानदान का उद्देश्य केवल ज्ञान को अपने पास से बाहर निकालना नहीं, बल्कि उसे ऐसे योग्य मार्ग से दूसरे तक पहुँचाना है, जहाँ वह ग्रहण करने वाले के लिए उपयोगी और जीवन-परिवर्तनकारी बन सके।

यहां वही भाव आगे बढ़ता है जिसकी बात पिछले मंत्र में ऋषि ने शुरू कि है जैसा कि पिछले मंत्र का आखिरी शब्द इच्छन्ति इच्छा पर जोर दिया गया था कि वह स्वेच्छा से ऐसा करे यहां एक प्रश्न और उठता है कि उसमें वह भाव देने का कैसे जागृत होगा इसके लिए उसे अपने वस्तु को एक नेटवर्क से जोड़ना होगा इसकि भि अपनी विधि है जैसे किसी ने ईश्वर से ज्ञान प्राप्त किया एक अलग बात है वह उसका व्यक्तिगत मामला है समाज को उसके व्यक्तिगत ईश्वरीय ज्ञान कि जरुरत ही नहीं है समाज पहले अपना एक निश्चित अवधारणा बना रखा है कोई साधु संत गुरू विद्वान वैज्ञानिक इत्यादि आज हर आदमी स्वयं ज्ञान संपन्न समझता है इसलिए किसी को आप ईश्वरीय ज्ञान ऐसे ही नहीं दे सकते है, आपको वह पद्धति विकसित करनी होगी जिस माध्यम से लोग ज्ञानार्जन कर रहे हैं वर्तमान में आपको उसी मार्ग से अपने ज्ञान को परिष्कृत करके देना होगा जैसे लोग पानी कभी बावड़ी कुआं से ले कर पिते फिर हैण्ड पम्प नल अब लोग रीफाइन पानी पिते है एक्वा आरो के बाटल में शुद्ध किया हुआ और यदि आप लोगों कहेंगे कि लोग कुआं और बावड़ी से पानी पिये तो यह आज के युग में बहुत कठीन है आछ लोग फ्लैट और बड़ी बड़ी ईमारतों में ही जीवन व्यतीत कर देते हैं इसलिए ज्ञान को देने कि विधि को समझना होगा यह मशक्कत वाला काम है ज्ञान प्राप्त करना अलग बात है ज्ञान का योग्य व्यक्ति के पांस पहुंचाना दुसरी बात है यही बात अगला मंत्र करता है। आपमे देने कि इच्छा का होना पर्याप्त नहीं है सामने वाला क्या उसे लेने योग्य है यहा पात्र तक पहुंचने कि बात है और अपात्र से दुर रखना है धही वह दुसरा हानीकारक समस्या पैदा करदेगा, पृणीयात प्राणो का आयात निर्यात कि बात हो रही है यह कोई साधारण लेन देन नहीं है, इत् निश्चित ही यह प्राणदान या किसी को प्राणवान बनाना जैसा कि कहते है कि प्राण प्रतिष्ठा करने कि बात है नाधमानाय यहां केवल भौतिक धन देने कि बात नहीं है यह तो दुनिया कि सबसे निकृष्ट वस्तु है यहां भौतिक धन का कोई मान नही है। तव्यान द्रव्यान तत्वज्ञान देने कि बात है जिसके सहारे इस मृत्युलोक को पार कर के जीव द्राघीयसम् यहां पदार्थ जब ऊर्जा में बदल जाती है रूपांतरित कि जो प्रणाली है जैसे अनु अणु जो ठोस जड़ है जब यह ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता तो अकल्पनीय शक्ति प्रकठ होती है पश्येत जिसका सामना करना या तुलना करना जैसे कोयला या पेट्रोलियम से यह एख दूसरे के समकक्ष नही सिद्ध होते है इसलिए इनके विशेष मार्ग विधि को प्रक्रिया को समझना होगा जानकारी और प्रयोग किसी को जानकारी देना अलग बात है और किसी को विधि का प्रयोग करा के उसके फल से उसके सम्पन्न कर देना अलंग बात है, इसका ओ निश्चित करना होगा मार्ग का चुनाव क्या जानकारी क्या प्रयोग या दोनों वस्तु एक साथ पात्र के पास पहुचाना हि क्योंकि यह प्रक्रिया आसान और सरल नहीं है और सबको इसकी जरूरत भी नहीं है इसमे जरूरत म़द कि खोज भी करनी पड़ती है वर्तन्ते वर्तमान में जिसको जरुरत है वह देने वाले को गलत समझ सकता है क्योंकि वह अपने विशेष वायुमंडल में निर्मित होता है और उसको उसके वायुमंडल निकालना एक बड़ी चुनौती सिद्ध हो सकती है इसलिए रथ्या ईव जैसे चक्रव्यूह में फसा जीव उस चक्रव्यूह से निकलने का रास्ता भी है इसका उसके बोध कराना होगा और उसे उस रास्ते को खोजने के दृढ़संकल्प से भरना होगा जैसे चक्रा निरंतर घुमता रहता यद्यपि उसका धुरा स्थिर रहता है वहां कौई गति नहीं है इसी प्रकार से अन्यम् अन्यम् ज्ञान एक दूसरे में जागृत होता रहता जैसे एक दिपक दुसरे दिपक को जलने का अवसर देता है। जब एक बुझा हूआ दिपक जले हुए दिपक के पास आता है उप जिससे उपासना एकाकार होना भावदशा है। तिष्ठन्ति जब जीव ज्ञान मे स्थिर होता है राय: परमैश्वरशाली स्वयं को अनुभव करता है।

नासदीय सूक्त — प्रथम मंत्र

ऋग्वेद 10.129.1

मूल मंत्र

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥ १॥

1. शब्द-दर-शब्द अर्थ

1. न — नहीं। यह निषेध का बोध कराता है।

2. असत् — असत्; वह जो सत् नहीं है। इस पद का अर्थ निर्धारित करते समय यह देखना आवश्यक है कि यहाँ असत् किस सत्ता अथवा अवस्था का बोध करा रहा है।

3. आसीत् — था, विद्यमान था।

4. नो — न, नहीं। यहाँ यह निषेध को आगे बढ़ाता है।

5. सत् — सत्; विद्यमान सत्ता अथवा अस्तित्व।

6. आसीत् — था, विद्यमान था।

7. तदानीम् — उस समय, उस अवस्था में।

8. न — नहीं।

9. आसीत् — था।

10. रजः — रजः; एक लोक अथवा अंतरिक्षीय क्षेत्र का बोध कराने वाला पद। इसका निश्चित आशय समझने के लिए वैदिक प्रयोग और प्रसंग को साथ रखना होगा।

11. नो — न, नहीं।

12. व्योम — व्योम; आकाश अथवा व्यापक आकाशीय क्षेत्र।

13. परः — परे, उससे आगे, उससे परे स्थित।

14. यत् — जो, जहाँ तक, अथवा जिसको लेकर आगे का कथन है। इसका सटीक संबंध वाक्य की संरचना से निर्धारित होगा।

15. किम् — क्या?

16. आवरीवः — क्या आवरण करने वाला था? किसने अथवा किस वस्तु ने उसे ढक रखा था? यह प्रश्न आवरण या ढके होने की स्थिति की ओर संकेत करता है।

17. कुह — कहाँ?

18. कस्य — किसका? किसके?

19. शर्मन् — आश्रय, सुरक्षित स्थान अथवा निवास का भाव। यहाँ प्रश्न है—किसके आश्रय में?

20. अम्भः — जल अथवा जलराशि।

21. किम् — क्या?

22. आसीत् — था।

23. गहनम् — गहन, जिसमें प्रवेश करना या जिसके भीतर तक पहुँचना कठिन हो।

24. गभीरम् — गहरा, जिसकी गहराई का सहज अनुमान न लगाया जा सके।

2. पदों को जोड़कर अर्थ

मंत्र का पहला भाग कहता है—

न असत् आसीत्, नो सत् आसीत् तदानीम्।

अर्थात् उस समय न असत् था, न सत् था।

दूसरा भाग कहता है—

न आसीत् रजः, नो व्योम परः यत्।

अर्थात् उस समय रजः नहीं था और उससे परे व्योम भी नहीं था।

इसके बाद प्रश्नों की शृंखला आती है—

किम् आवरीवः? कुह? कस्य शर्मन्? अम्भः किम् आसीत् गहनं गभीरम्?

अर्थात् क्या आवरण करने वाला था? वह कहाँ था? किसके आश्रय में था? क्या कोई गहन और गहरी जलराशि थी?

3. भावार्थ

यह मंत्र सृष्टि के आरंभिक प्रसंग को सामने रखकर सत् और असत्, रजः और व्योम की स्थिति पर विचार करता है। इसके बाद वह आवरण, स्थान, आश्रय और गहन जलराशि के विषय में प्रश्न उठाता है।

मंत्र का विचार-क्रम ध्यान देने योग्य है। पहले दो पदों के माध्यम से अस्तित्व की स्थिति का प्रश्न उठता है। फिर लोक और आकाशीय क्षेत्र का उल्लेख आता है। अंत में यह पूछा जाता है कि उस अवस्था में आवरण, स्थान, आश्रय और जलराशि की क्या स्थिति थी।

इस प्रकार मंत्र केवल किसी एक वस्तु के उत्पन्न होने का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस अवस्था की प्रकृति पर प्रश्न करता है जिसमें सृष्टि के परिचित आधारों का वर्णन अभी सामने नहीं आया है।

4. विचार के लिए मुख्य बिंदु

पहला प्रश्न — सत् और असत्

मंत्र में सत् और असत् दोनों का निषेध एक साथ आया है। इसलिए इन दोनों शब्दों का अर्थ निर्धारित करना आगे की व्याख्या के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यहाँ असत् को केवल ‘कुछ भी नहीं’ और सत् को केवल ‘कोई वस्तु’ मानकर आगे बढ़ना पर्याप्त नहीं होगा; दोनों पदों के दार्शनिक आशय को समझना होगा।

दूसरा प्रश्न — रजः और व्योम

मंत्र इन दोनों को अलग-अलग पदों में रखता है। इसलिए रजः और व्योम के अर्थ तथा उनके पारस्परिक संबंध को अलग से समझना आवश्यक है।

तीसरा प्रश्न — आवरण और आश्रय

‘किमावरीवः’, ‘कुह’ और ‘कस्य शर्मन्’ प्रश्नवाचक पद हैं। मंत्र यहाँ किसी आवरण, स्थान और आश्रय को पहले से निश्चित करके उनका वर्णन नहीं करता, बल्कि उनकी स्थिति के विषय में प्रश्न करता है।

चौथा प्रश्न — अम्भः

अंतिम पदों में जलराशि का प्रश्न आता है। उसे तुरंत सामान्य भौतिक जल मान लेना या बिना विचार किए किसी अन्य तत्त्व का पर्याय मान लेना उचित नहीं होगा। इसके अर्थ को अगले मंत्रों और वैदिक प्रयोगों के साथ जोड़कर समझना होगा।

नासदासीन्नो न+आ+स+द+स+ई+न्+न+ओ निश्चित रूप से जब आत्मा में सद सत्य प्रकट नहीं हुआ था। उस समय केवल ईश्वर ही चारो तरफ व्याप्त था उसके अतिरिक्त दुसरा कोई नहीं था। सदासीत्तदानी स+द+आ+स+ई+त्+त+द+आ+न+ई सत्य रूपी आत्मा उस समय ईश्वर मे तात्विक रूप से विद्यमान थी इसलिए आत्मा निश्चित रूप से ईश्वर से अलग नहीं है। नासीद्रजो न+आ+ई+द+र+ज+ओ जब निश्चित रूप से आत्मा ईश्वर में विद्यमान थी दुसरा राज्य करने वाला और जंन्म मरणधर्मा जीव नहीं था। नो व्योम परो यत निश्चित रूप से उस समय व्योमा अंतरिक्ष या अंत:करण जिसमें प्राण रहता है वह भी उससे अलग परे यत अब तक नहीं था इसका मतलब उससे पर उससे अलग प्राण अंत:करण मे विद्यमान होगा। क्रिमावरीय क+र+इ+म+आ+व+र+ई+व+ह कर्म करने वाली आत्मा वह ईश्वर ही है। कुह क+उ+ह अब ऋषि यहा प्रश्न करते है कि वह ईश्वर कौन है, कस्य कैसे शर्मन्नम्भ: श+र+न्+न+भ वह आकाश रूप में व्याप्त कैसे हुआ किमासीद्गहनं गभीरम् यह आकाश उस ईश्वर के अंदर किस तरह से गहन तात्विक रूप विद्यमान हुआ जो एक गभीरम् अपने आप में गंभीर विषय हैं।

प्रथम मंत्र की तात्त्विक व्याख्या

मूल मंत्र

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम्॥ १॥

1. नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्

नासदासीत् — न + आसीत् + असत्; नो सदासीत् — न + आसीत् + सत्; तदानीम् — उस समय।

इस मंत्र में सृष्टि की उस आद्यावस्था का वर्णन है, जब आत्मा में सत् का प्राकट्य नहीं हुआ था। उस समय ईश्वर के अतिरिक्त दूसरी कोई स्वतंत्र सत्ता विद्यमान नहीं थी। ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त था।

इसके बाद आने वाला पद ‘सदासीत्तदानीम्’ इसी विषय को आगे बढ़ाता है। सत् अर्थात् सत्यरूप आत्मा उस समय ईश्वर में तात्त्विक रूप से विद्यमान थी। इससे आत्मा और ईश्वर के संबंध का प्रश्न सामने आता है। आत्मा ईश्वर से स्वतंत्र सत्ता के रूप में प्रकट नहीं हुई थी; वह ईश्वर में तात्त्विक रूप से विद्यमान थी।

यहाँ विचार के दो स्तर हैं—एक ओर सत् का अप्रकट होना और दूसरी ओर उसका ईश्वर में तात्त्विक रूप से विद्यमान होना। अप्रकट अवस्था और तात्त्विक अस्तित्व को एक ही अर्थ में नहीं लेना चाहिए।

2. नासीद्रजो नो व्योम

नासीद्रजः — न + आसीत् + रजः; नो व्योम — न + व्योम।

जब आत्मा ईश्वर में तात्त्विक रूप से विद्यमान थी, तब उससे पृथक् राज्य करने वाला तथा जन्म-मरण के अधीन रहने वाला जीव प्रकट नहीं हुआ था।

इसके बाद ‘नो व्योम’ आता है। यहाँ व्योम को केवल बाहरी आकाश तक सीमित न रखकर अंतरिक्ष और अंतःकरण से संबंधित व्यापक संदर्भ में देखना है। अंतःकरण वह क्षेत्र है जिसमें प्राण का संबंध रहता है। मंत्र की इस व्याख्या के अनुसार, उस समय व्योम भी ईश्वर से अलग स्वतंत्र सत्ता के रूप में विद्यमान नहीं था।

‘परो यत्’ पद इस विचार को आगे बढ़ाता है। अर्थात् ईश्वर से परे अथवा उससे पृथक् कोई दूसरा आधार उस अवस्था में सामने नहीं आता।

इस प्रकार मंत्र का यह भाग आत्मा के तात्त्विक अस्तित्व और जन्म-मरणधर्मा जीव की अप्रकट अवस्था के बीच अंतर प्रस्तुत करता है।

3. किमावरीवः

किम् — क्या; आवरीवः — आवरण करने अथवा ढकने से संबंधित प्रश्न।

इस पद पर विचार करते हुए कर्म करने वाली आत्मा और ईश्वर के संबंध का प्रश्न उठता है। जब ईश्वर ही सर्वत्र व्याप्त है और उससे पृथक् कोई दूसरी स्वतंत्र सत्ता नहीं है, तब उस आद्यावस्था में कर्म का कर्ता कौन है?

यहाँ कर्म करने वाली आत्मा को ईश्वर से जोड़कर देखा गया है। इससे सृष्टि के प्राकट्य में कर्तृत्व का प्रश्न सामने आता है—क्या कर्म करने वाली आत्मा और ईश्वर दो अलग सत्ताएँ हैं, अथवा आत्मा का कर्तृत्व ईश्वर में उसके तात्त्विक अस्तित्व से संबंधित है?

यह प्रश्न अगले पदों के साथ मिलकर समझने योग्य है।

4. कुह कस्य शर्मन्

कुह — कहाँ; कस्य — किसका अथवा किसके; शर्मन् — आश्रय या निवास।

यहाँ ऋषि प्रश्न करते हैं—वह कहाँ था और किसके आश्रय में था?

जब ईश्वर के अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र सत्ता नहीं थी, तब ईश्वर के लिए किसी दूसरे आश्रय की कल्पना कैसे की जाए? प्रश्न इस संबंध को समझने का मार्ग खोलता है कि ईश्वर स्वयं सर्वव्यापक आधार है, अथवा उसके अस्तित्व के लिए उससे अलग कोई आश्रय आवश्यक है।

इस प्रकार ‘कुह’ और ‘कस्य शर्मन्’ को केवल स्थान पूछने वाले सामान्य प्रश्नों के रूप में नहीं, बल्कि सत्ता और उसके आधार के संबंध में उठाए गए प्रश्नों के रूप में देखना है।

5. अम्भः

अम्भः — जल अथवा जलराशि।

यह पद अगले प्रश्न से जुड़ता है। यहाँ जलराशि को सृष्टि की आद्यावस्था के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। जब व्योम और उससे परे के आधार का प्रश्न उठ चुका है, तब अम्भः के विषय में पूछना यह विचार खोलता है कि उस अवस्था में जलराशि की स्थिति क्या थी और उसका आधार क्या था।

इस पद का तात्त्विक अर्थ निर्धारित करने के लिए मंत्र के अंतिम अंश को साथ पढ़ना आवश्यक है।

6. किमासीद्गहनं गभीरम्

किम् — क्या; आसीत् — था; गहनम् — गहन; गभीरम् — गहरा अथवा गंभीर।

मंत्र के अंतिम पद में ऋषि पूछते हैं—क्या था जो गहन और गभीर था?

यहाँ प्रश्न केवल किसी वस्तु की बाहरी गहराई का नहीं रह जाता। जब सृष्टि के आधार, आश्रय और जलराशि की स्थिति पर प्रश्न किया जा रहा है, तब ‘गहनं गभीरम्’ उस तात्त्विक स्थिति की ओर भी विचार ले जाता है जिसकी गहराई को सामान्य रूप से समझ लेना संभव नहीं है।

इसलिए मंत्र का अंत किसी निश्चित वस्तु का सरल परिचय देकर नहीं होता, बल्कि उस गहन तात्त्विक स्थिति के प्रश्न पर होता है।

समग्र विचार

प्रथम मंत्र में विचार का क्रम इस प्रकार आगे बढ़ता है—

  1. सत् और असत् की आद्यावस्था का प्रश्न।
  2. आत्मा के ईश्वर में तात्त्विक रूप से विद्यमान होने का विचार।
  3. जन्म-मरणधर्मा जीव तथा उससे संबंधित व्योम की अप्रकट अवस्था।
  4. कर्म करने वाली आत्मा और ईश्वर के कर्तृत्व-संबंध का प्रश्न।
  5. ईश्वर के आश्रय और स्थान का प्रश्न।
  6. अम्भः तथा गहन-गभीर तात्त्विक अवस्था का प्रश्न।

इस प्रकार प्रथम मंत्र सृष्टि के प्राकट्य से पहले की अवस्था को समझने का आधार बनता है। इसमें ईश्वर, आत्मा, जीव, व्योम, प्राण और आकाश के संबंध में उठाए गए प्रश्न अगले मंत्रों के विचार-क्रम के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।

सत और असत यहां ऋत और सत्य है सत्य वह भौतिक जगत है जिसके केंद्र में जीव उसका कर्म और परिणाम है जब कि ऋत स्वयं ईश्वर है इस भौतिक जगत के बिना भी परीपुर्ण है आत्मा उससे ही नीकलती है वह भौतिक जगत के लिए सक्रिय होती है इसलिए वह सत के साथ निरंतर बदलाव के साथ एकात्म स्थापित करती है और अज्ञानता और अपने निरंतर बदलते बाहरी स्वरूप के संसर्ग के कारण परिवर्तनिय समझने लगती है उसकी वृत्तियां उस ईश्वर से अलग सिद्ध करती है जहां से मतभेद जन्म लेता है यही बूद्धि विवेक ज्ञान प्रवेश करता जो इस भैद को दुर करने का साधन सिद्ध होता है जो स्वयं वेद है जिसके द्रष्टा ऋषि हुये है।

सत् और असत् : ऋत और सत्य का संबंध

नासदीय सूक्त के प्रथम मंत्र में सत् और असत् का प्रश्न सृष्टि की आद्यावस्था को समझने का आधार बनता है। इस संदर्भ में ऋत और सत्य के तात्त्विक संबंध को समझना आवश्यक है।

ऋत स्वयं ईश्वर की शाश्वत, पूर्ण सत्ता है। उसकी पूर्णता भौतिक जगत पर निर्भर नहीं है। भौतिक जगत के प्राकट्य से पहले भी ईश्वर अपनी पूर्णता में विद्यमान है। सत्य भौतिक जगत का वह क्षेत्र है जिसमें जीव, उसका कर्म और कर्म के परिणाम सक्रिय होते हैं।

आत्मा उसी ईश्वरीय सत्ता से निकलकर भौतिक जगत में सक्रिय होती है। यहाँ वह निरंतर बदलते बाहरी स्वरूपों के साथ संबंध स्थापित करती है। शरीर, परिस्थितियाँ, कर्म और उनके परिणाम बदलते रहते हैं। आत्मा इन बदलते स्वरूपों के संसर्ग में अपने वास्तविक तात्त्विक स्वरूप को भी परिवर्तनशील समझने लगती है।

यहीं से अज्ञान का आरंभ होता है। आत्मा की वृत्तियाँ उसे उसके मूल आधार से अलग होने का अनुभव कराती हैं। इस अनुभव से भेद उत्पन्न होता है—एक ओर आत्मा का वास्तविक तात्त्विक आधार और दूसरी ओर परिवर्तनशील बाहरी स्वरूप, जिसे वह अपना स्वरूप मानने लगती है।

ज्ञान का प्रवेश और भेद का निराकरण

इस भेद को दूर करने के लिए बुद्धि, विवेक और ज्ञान की आवश्यकता होती है। ज्ञान का कार्य आत्मा को किसी नई सत्ता में बदलना नहीं, बल्कि उसके वास्तविक तात्त्विक संबंध का बोध कराना है। जिस आधार से आत्मा निकली है, उस आधार के साथ अपने संबंध को पहचानना ही इस ज्ञान-यात्रा का केंद्र है।

यहीं वेद का महत्त्व सामने आता है। वेद उस ज्ञान का माध्यम है जिसके द्रष्टा ऋषि हुए हैं। ऋषि ज्ञान के निर्माता नहीं, उसके द्रष्टा हैं; वे उस तात्त्विक सत्य का साक्षात्कार करके उसे प्रकट करते हैं, जो आत्मा और ईश्वर के संबंध को समझने का मार्ग खोलता है।

इस प्रकार ज्ञान और विवेक आत्मा के वास्तविक स्वरूप तथा उसके परिवर्तनशील बाहरी अनुभवों के बीच उत्पन्न भेद को समझने और दूर करने के साधन बनते हैं।

मूल मंत्र

न मृत्यु रासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः। आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास॥ २॥

1. न मृत्युरासीत्

पद-विभाजन: न + मृत्युः + आसीत्।

  • न — नहीं।
  • मृत्युः — मृत्यु; मरणधर्मा अवस्था अथवा जीवन की समाप्ति।
  • आसीत् — था, विद्यमान था।

अर्थ: उस समय मृत्यु नहीं थी।

पहले मंत्र में सत् और असत् की आद्यावस्था का प्रश्न आया था। यहाँ उसी क्रम में मृत्यु का निषेध है। मृत्यु उस व्यवस्था से संबंधित है जिसमें जन्म, जीवन और जीवन की समाप्ति का क्रम होता है। मंत्र कहता है कि उस समय मृत्यु विद्यमान नहीं थी।

2. अमृतं न तर्हि

पद-विभाजन: अमृतम् + न + तर्हि।

  • अमृतम् — अमृत; मृत्यु से रहित अवस्था अथवा अमरता।
  • न — नहीं।
  • तर्हि — तब, उस समय।

अर्थ: उस समय अमृत भी नहीं था।

यहाँ मृत्यु और अमृत दोनों का उल्लेख एक साथ है। मृत्यु और अमृत सामान्यतः एक-दूसरे के विपरीत समझे जाते हैं, लेकिन मंत्र उस अवस्था की बात करता है जिसमें ये दोनों परिचित अवस्थाएँ ही प्रकट नहीं हुई थीं।

ऋत और सत्य के संबंध में विचार करते हुए यहाँ यह प्रश्न सामने आता है कि शाश्वत ईश्वरीय सत्ता की पूर्णता और भौतिक जगत में प्रकट होने वाली अमरता की अवस्था क्या एक ही बात हैं, अथवा उनमें तात्त्विक अंतर है।

3. न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः

पद-विभाजन: न + रात्र्याः + अह्नः + आसीत् + प्रकेतः।

  • न — नहीं।
  • रात्र्याः — रात्रि का।
  • अह्नः — दिन का।
  • आसीत् — था।
  • प्रकेतः — चिह्न, संकेत, पहचान अथवा बोध कराने वाला लक्षण।

अर्थ: उस समय रात्रि और दिन का कोई चिह्न या भेद प्रकट नहीं हुआ था।

रात्रि और दिन का भेद समय की एक व्यवस्थित अवस्था को दर्शाता है। जब यह भेद प्रकट नहीं हुआ था, तब उस अवस्था को सामान्य दिन-रात के क्रम से नहीं समझा जा सकता।

यह पद पहले मंत्र में उठाए गए सृष्टि की आद्यावस्था के प्रश्न को आगे बढ़ाता है। यहाँ केवल पदार्थों का ही नहीं, बल्कि समय को पहचानने वाले चिह्नों का भी निषेध है।

4. आनीदवातम्

पद-विभाजन: आनीत् + अवातम्।

  • आनीत् — साँस लेता था, श्वास-सदृश क्रिया करता था अथवा स्पंदित था।
  • अवातम् — वायु के बिना; जहाँ सामान्य वायु का आधार नहीं था।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात है। मंत्र में आनीत् अवातम् कहा गया है—अर्थात् वह एक सत्ता वायु के बिना भी सक्रिय थी।

यदि इस पद को सामान्य शारीरिक श्वसन तक सीमित कर दिया जाए, तो प्रश्न उत्पन्न होगा कि वायु के अभाव में श्वसन कैसे संभव था। इसलिए यहाँ उस क्रिया के तात्त्विक आशय पर विचार आवश्यक है।

आपके द्वारा पहले स्थापित ईश्वर और आत्मा के संबंध में यह प्रश्न सामने आता है कि क्या यहाँ ईश्वर की ऐसी स्वाभाविक सक्रियता का संकेत है जो भौतिक वायु अथवा प्राण की सामान्य व्यवस्था पर निर्भर नहीं है।

5. स्वधया

  • स्वधया — अपनी स्वधा से, अपने स्वभावगत सामर्थ्य से अथवा अपनी अंतर्निहित शक्ति से।

यह पद ‘आनीदवातम्’ के साथ जुड़ता है। यदि वह सत्ता वायु के बिना सक्रिय थी, तो उसकी सक्रियता का आधार क्या था? मंत्र इसका उत्तर स्वधया पद से देता है।

अर्थात् उस एक सत्ता की क्रिया किसी बाहरी साधन पर निर्भर नहीं थी; वह अपनी स्वधागत शक्ति से सक्रिय थी।

ऋत को ईश्वर की पूर्ण और स्वतंत्र सत्ता के रूप में समझने के संदर्भ में यह पद विशेष महत्त्व रखता है। यहाँ सत्ता की सक्रियता के लिए किसी दूसरे स्वतंत्र आधार की आवश्यकता नहीं बताई गई है।

6. तदेकम्

पद-विभाजन: तत् + एकम्।

  • तत् — वह।
  • एकम् — एक, अद्वितीय।

अर्थ: वह एक ही सत्ता।

इस पद का संबंध पिछले पदों से है। मंत्र उस एक सत्ता का वर्णन कर रहा है जो वायु के बिना, अपनी स्वधा से सक्रिय थी।

पहले मंत्र में ईश्वर की सर्वव्यापकता और उससे पृथक् किसी स्वतंत्र सत्ता के न होने का विचार सामने आया था। यहाँ ‘तदेकम्’ उसी एकत्व के संदर्भ को आगे बढ़ाता है।

7. तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास

पद-विभाजन: तस्मात् + ह + अन्यत् + न + परः + किम् + चन + आस।

  • तस्मात् — उससे।
  • ह — निश्चयार्थक अथवा बल देने वाला अव्यय।
  • अन्यत् — दूसरा, अन्य।
  • न — नहीं।
  • परः — उससे परे, उससे अलग।
  • किम् — क्या।
  • चन — भी, कोई भी।
  • आस — था, विद्यमान था।

अर्थ: उस एक सत्ता से अलग अथवा उसके परे कोई दूसरी सत्ता विद्यमान नहीं थी।

यह मंत्र का निष्कर्षात्मक कथन है। पहले मृत्यु और अमृत का निषेध हुआ, फिर दिन-रात्रि के चिह्न का। इसके बाद उस एक सत्ता का वर्णन है जो अपनी स्वधा से सक्रिय थी। अंत में कहा गया है कि उससे अलग कोई दूसरी सत्ता नहीं थी।

यह कथन प्रथम मंत्र में उठाए गए प्रश्न को आगे बढ़ाता है—सृष्टि के प्राकट्य से पहले उस एक सत्ता के अतिरिक्त किसी दूसरी स्वतंत्र सत्ता का आधार नहीं था।

समग्र भावार्थ

सृष्टि की उस आद्यावस्था में न मृत्यु थी, न अमृत की प्रकट अवस्था। दिन और रात्रि का भेद पहचानने वाला कोई चिह्न भी नहीं था। उस समय वह एक सत्ता वायु के बिना अपनी स्वधा से सक्रिय थी। उसके अतिरिक्त कोई दूसरी स्वतंत्र सत्ता विद्यमान नहीं थी।

इस मंत्र में तीन विचार क्रमशः सामने आते हैं:

  1. मृत्यु और अमृत का अभाव — जीवन और मृत्यु के परिचित क्रम का अप्रकट होना।
  2. दिन और रात्रि के चिह्न का अभाव — समय के परिचित विभाजन का अप्रकट होना।
  3. एक सत्ता की स्वधागत सक्रियता — उस सत्ता का किसी बाहरी आधार पर निर्भर हुए बिना विद्यमान होना।

इस प्रकार प्रथम मंत्र में जहाँ सत्-असत्, व्योम, आश्रय और गहन अवस्था के प्रश्न उठे थे, वहीं दूसरा मंत्र मृत्यु-अमृत, दिन-रात्रि और उस एक सत्ता की स्वधागत सक्रियता पर विचार आगे बढ़ाता है।

जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने अंतिम शब्द गभीरम् गंभीरता पर ध्यान केन्द्रित किया था उसी कड़ी को इस मंत्र से आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि जो इस भौतिक जगत का सबसे गंभीर विषय में से एक है न निश्चित रूप से वह मृत्यु ही है इसलिए यह रासीदमृतं आत्मा रूपी अमृत की यह सार्वभौमिक शत्रु है क्योंकि न निश्चित रूप तर्ही से इस मृत्युलोक को पार करने के लिए न रात्रा केवल भौतिक जगत अणुओं के जानकारी मात्र या उसके लक्षण के बोध से अह्न इस मृत्यु के अहम मैं को परास्त करना आसीत्प्रत्केत आत्मा के लिए सत्य के आश्रय अर्थात मृत्यु का आश्रय प्रकेत प्राकृतिक भौतिक जड़ता में बांधने वाला बंधन है इसलिए आनीदवात मतलब अनित्य प्राण के साथ स्वधया स्वयं के ज्ञान को धारण करना कि वह और ईश्वर तदेकम् एक ही है, तस्माद्धान्यनन् पर: कि़ चनास उसको यह निश्चित करने मे कि वह और ईश्वर एक ही है पर: उससे अलग करने वाला किं उसका स्वयं का कर्म ही चनास चुनाव करता है।

द्वितीय मंत्र की तात्त्विक व्याख्या

मूल मंत्र

न मृत्यु रासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः। आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास॥ २॥

1. न मृत्यु रासीदमृतं न तर्हि

प्रथम मंत्र का अंत ‘गहनं गभीरम्’ से हुआ था। इस गंभीर तात्त्विक प्रश्न को आगे बढ़ाते हुए ऋषि मृत्यु और अमृत का विषय सामने रखते हैं।

मृत्यु भौतिक जगत की गंभीर समस्याओं में से एक है। आत्मा अमृतस्वरूप है, जबकि भौतिक शरीर परिवर्तन और मृत्यु के अधीन है। जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर शरीर और उसके बदलते स्वरूपों को ही अपना स्वरूप मानने लगती है, तब मृत्यु का भय उत्पन्न होता है।

‘न मृत्यु’ मृत्यु की उस अवस्था के अभाव को प्रकट करता है, जबकि ‘अमृतं न तर्हि’ उस समय अमृत की पृथक् अवस्था के भी अप्रकट होने का संकेत देता है। यहाँ मृत्यु और अमृत के परिचित भेद से पहले की अवस्था का वर्णन है।

इस विचार में मृत्यु आत्मा के अमृतस्वरूप के सामने खड़ी समस्या है। आत्मा का वास्तविक ज्ञान इस समस्या को समझने और मृत्यु के बंधन से परे अपने स्वरूप को पहचानने का साधन बनता है।

2. न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः

इस पद में रात्रि और दिन के चिह्न का उल्लेख है।

रात्रि और दिन भौतिक जगत की व्यवस्था में पहचाने जाने वाले भेद हैं। इनके लक्षणों और बाहरी स्वरूपों का ज्ञान प्राप्त करना एक बात है, लेकिन मृत्यु के प्रश्न का समाधान केवल भौतिक जगत के अणुओं और उनके लक्षणों की जानकारी प्राप्त कर लेने से नहीं होता।

यहाँ विचार का केंद्र आत्मा का ज्ञान है। आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होना आवश्यक है, जिससे वह बाहरी परिवर्तनशील स्वरूपों और अपने तात्त्विक अस्तित्व के बीच अंतर पहचान सके।

‘प्रकेतः’ को इस विचार-क्रम में पहचान अथवा बोध कराने वाले चिह्न के रूप में समझा जा सकता है। भौतिक जगत के लक्षणों का ज्ञान अपने क्षेत्र में है, जबकि आत्मा का ज्ञान उसे अपने वास्तविक आधार की पहचान कराता है।

3. आनीदवातं स्वधया

यहाँ विचार आत्मा और प्राण के संबंध की ओर बढ़ता है।

‘आनीदवातम्’ के संदर्भ में प्राण और उसकी अनित्यता का प्रश्न सामने आता है। प्राण जीवित शरीर की क्रियाओं से संबंधित है, जबकि आत्मा का तात्त्विक स्वरूप केवल शरीर की परिवर्तनशील अवस्था तक सीमित नहीं है।

‘स्वधया’ का संबंध उस अंतर्निहित सामर्थ्य से है जिसके आधार पर सत्ता सक्रिय रहती है। इस विचार-क्रम में इसे आत्मज्ञान के संदर्भ में भी देखा जाता है—आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानती है और अपने ईश्वरीय आधार का बोध प्राप्त करती है।

इस प्रकार प्राण के साथ सक्रिय जीवन और आत्मा के तात्त्विक ज्ञान के बीच अंतर सामने आता है। केवल प्राण की क्रिया को जान लेना आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं है।

4. तदेकम्

‘तदेकम्’ का अर्थ है—वह एक।

इस पद में विचार आत्मा और ईश्वर के तात्त्विक संबंध पर केंद्रित होता है। आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करती है, तो वह अपने को ईश्वर से पूर्णतः स्वतंत्र सत्ता मानने के भ्रम से मुक्त होती है।

यहाँ एकत्व का बोध आत्मा के वास्तविक आधार को पहचानने से संबंधित है। आत्मा का बाहरी स्वरूप बदलता है, उसकी वृत्तियाँ बदलती हैं और उसके कर्मों के परिणाम भी बदलते हैं; लेकिन इन परिवर्तनों को ही आत्मा का अंतिम तात्त्विक स्वरूप मान लेना अज्ञान है।

5. तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास

इस पद में उस एक सत्ता से पृथक् दूसरी सत्ता के न होने का कथन आता है।

इस विचार-क्रम में आत्मा और ईश्वर के संबंध को पहचानना महत्त्वपूर्ण है। आत्मा जब अपने को ईश्वर से अलग मानती है, तब उसके भीतर भेद का अनुभव उत्पन्न होता है। उसकी वृत्तियाँ, कर्म और चुनाव इस भेद को बनाए रख सकते हैं।

इसलिए आत्मज्ञान का प्रश्न केवल यह जानने का प्रश्न नहीं है कि ईश्वर विद्यमान है। प्रश्न यह है कि आत्मा अपने वास्तविक तात्त्विक आधार को पहचानती है या अपने कर्मों और वृत्तियों से उत्पन्न भेद को ही अपना अंतिम सत्य मानती है।

कर्म और चुनाव जीव के अनुभवों तथा उसके बंधन को प्रभावित करते हैं। ज्ञान का कार्य इस भेद के मूल को पहचानने और आत्मा को उसके वास्तविक आधार का बोध कराने में है।

समग्र भावार्थ

प्रथम मंत्र के ‘गभीरम्’ से आगे बढ़कर दूसरा मंत्र मृत्यु, अमृत, प्राण और आत्मा के तात्त्विक संबंध का प्रश्न सामने रखता है। मृत्यु का प्रश्न केवल शरीर की समाप्ति का प्रश्न नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप और उसके परिवर्तनशील बाहरी अनुभवों के बीच अंतर पहचानने का प्रश्न भी है।

प्राण और शरीर की क्रियाओं का ज्ञान आत्मा के तात्त्विक ज्ञान के समान नहीं है। आत्मा को अपने वास्तविक आधार का बोध होना आवश्यक है। ‘स्वधया तदेकम्’ और ‘तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास’ के माध्यम से विचार एक ऐसी सत्ता की ओर जाता है जो किसी दूसरी स्वतंत्र सत्ता पर निर्भर नहीं है।

इस प्रकार दूसरे मंत्र की विचार-यात्रा मृत्यु के प्रश्न से आरंभ होकर आत्मज्ञान, स्वधागत सामर्थ्य और उस एक सत्ता के तात्त्विक आधार तक पहुँचती है।

यहां यह भी समझना है कि सिर्फ चेतना को ही अपना बोध नहीं है भौतिक जगत के हर कण में भी बोध है मृत्यु कोई जड़ वस्तु नहीं है जिसे तुम दिन रात कह रहे हो उनका यहां कोई स्थान ही नहीं है अभी तो प्रारंभिक अवस्था पर ऋषि विचार कर रहे हैं।

पहली बात: बोध केवल चेतना तक सीमित नहीं है। भौतिक जगत के प्रत्येक कण में भी बोध है। इसलिए जड़ पदार्थ को ऐसा मानकर नहीं चलना है जिसमें बोध का सर्वथा अभाव हो।

दूसरी बात: दूसरे मंत्र में ऋषि अभी सृष्टि की प्रारंभिक अवस्था का विचार कर रहे हैं। उस समय मृत्यु, अमृत, दिन और रात्रि को वर्तमान जगत की परिचित घटनाओं के रूप में रखकर व्याख्या करना उचित नहीं है। इन पदों का अर्थ उसी आद्यावस्था के संदर्भ में समझना होगा।

अब मंत्र की क्रमिक कड़ी को इस प्रकार देखना चाहिए:

न मृत्यु रासीदमृतं न तर्हि — मृत्यु और अमृत की अवस्थाओं का प्रश्न उस प्रारंभिक स्थिति से संबंधित है, जहाँ सृष्टि का प्रकट क्रम अभी स्थापित नहीं हुआ था।

न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः — यहाँ दिन और रात्रि की सामान्य घटनाओं का वर्णन नहीं, बल्कि उस अवस्था में उनके पहचान-चिह्नों की स्थिति का प्रश्न है।

आनीदवातं स्वधया तदेकम् — यहाँ उस एक सत्ता की सक्रियता और उसकी स्वधागत स्थिति पर विचार है। इसे सामान्य शारीरिक श्वसन तक सीमित नहीं किया जा सकता।

तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास — मंत्र अंत में उस एक के अतिरिक्त किसी दूसरी सत्ता के न होने की बात कहता है।

इसलिए अभी हमें मृत्यु को केवल शरीर की समाप्ति, दिन-रात्रि को समय के सामान्य विभाजन और बोध को केवल चेतना की विशेषता मानकर नहीं चलना है। ये धारणाएँ मंत्र के मूल विचार को सीमित कर देंगी।

अब दूसरे मंत्र का वास्तविक प्रश्न है: सृष्टि की आद्यावस्था में मृत्यु और अमृत का भेद किस अर्थ में अनुपस्थित था, और उस अवस्था में स्वधा से सक्रिय ‘तदेकम्’ का स्वरूप क्या था? इसी प्रश्न पर टिककर आगे विचार करना चाहिए।

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त (10.129) के तीसरे मंत्र को पहले दूसरे मंत्र के क्रम से जोड़कर समझेंगे। यहाँ ऋषि अभी सृष्टि की आद्यावस्था का विचार कर रहे हैं। इसलिए प्रत्येक शब्द का अर्थ उसी क्रम में देखना है, न कि वर्तमान भौतिक जगत की बनी-बनाई अवस्थाओं को सामने रखकर।

ऋग्वेद 10.129.3 — मूल मंत्र

तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥ ३॥

1. तम् — तम

तम् का सामान्य अर्थ अंधकार है। लेकिन यहाँ इसे केवल प्रकाश के अभाव के रूप में नहीं लेना चाहिए। पिछले दो मंत्रों में ऋषि उस अवस्था का विचार कर चुके हैं, जिसमें सत्-असत्, मृत्यु-अमृत और अन्य भेदों की वर्तमान रूप में स्थापना नहीं हुई थी।

इसलिए यहाँ विचार करना है कि आद्यावस्था में जिस अवस्था को तम कहा गया है, उसका उस मूल सत्ता और सृष्टि की अभिव्यक्ति से क्या संबंध है।

2. आसीत् — था

आसीत् का अर्थ है—था, विद्यमान था।

ऋषि उस आद्यावस्था का वर्णन कर रहे हैं जिसमें आगे चलकर सृष्टि का प्राकट्य होना है। अतः यहाँ यह देखना आवश्यक है कि तम किस रूप में विद्यमान था।

3. तमसा — तम से

तमसा का अर्थ है—तम से अथवा तम के द्वारा।

पहले तम और फिर तमसा का प्रयोग हुआ है। यह दोहराव अर्थ की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। ऋषि केवल तम के होने की बात नहीं कहते, बल्कि बताते हैं कि वह तमसा से आच्छादित था।

यहाँ विचार का विषय है कि एक अवस्था का दूसरी अवस्था से ढका होना किस प्रकार समझा जाए।

4. गूळ्हम् — छिपा हुआ, आच्छादित

गूळ्हम् का अर्थ है—छिपा हुआ, गुप्त अथवा आवृत।

इस शब्द से पता चलता है कि आद्यावस्था में जो कुछ था, उसकी वास्तविक स्थिति स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं थी। यहाँ प्रश्न केवल किसी वस्तु के दिखाई न देने का नहीं, बल्कि उसकी सत्ता और स्वरूप के अप्रकट होने का है।

5. अग्रे — आरंभ में

अग्रे का अर्थ है—आरंभ में, सबसे पहले।

इस शब्द से मंत्र का कालक्रम स्पष्ट होता है। ऋषि सृष्टि के विकसित हो जाने के बाद की स्थिति नहीं, बल्कि उसके आरंभ की अवस्था का विचार कर रहे हैं।

6. अप्रकेतम् — अप्रकट, जिसका लक्षण स्पष्ट न हुआ हो

अप्रकेतम् का अर्थ है—जिसका संकेत, लक्षण अथवा पहचान प्रकट न हुई हो।

यह शब्द दूसरे मंत्र के प्रकेतः से भी जुड़ता है। दूसरे मंत्र में ऋषि ने उस अवस्था का विचार किया था जिसमें रात्रि और अह्न का प्रकेत नहीं था। तीसरे मंत्र में अप्रकेतम् कहकर उसी मूल प्रश्न को आगे बढ़ाया गया है—जब भेदों के पहचानने योग्य लक्षण प्रकट नहीं हुए थे, तब उस अवस्था का स्वरूप क्या था?

7. सलिलम् — सलिल

सलिलम् का सामान्य अर्थ जल अथवा प्रवाहशील द्रव्य है। इस मंत्र में इसका अर्थ निर्धारित करते समय पूरे वाक्य को देखना आवश्यक है, क्योंकि इसके साथ सर्वम् आ इदम् जुड़ा हुआ है।

इसलिए यहाँ केवल वर्तमान जगत के जल की कल्पना कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। ऋषि आद्यावस्था में समस्त के सलिलरूप होने की बात कह रहे हैं। इसका तात्त्विक अर्थ पिछले मंत्रों में वर्णित मूल अवस्था के संदर्भ में समझना होगा।

8. सर्वम् — सब, समस्त

सर्वम् का अर्थ है—सब कुछ, समस्त।

यह शब्द बताता है कि वर्णन किसी एक सीमित वस्तु का नहीं, बल्कि समग्र अवस्था का है।

9. आ इदम् — यह सब

इदम् का अर्थ है—यह; और आ के प्रयोग सहित पद का पाठ समझते समय संहिता के स्वरूप को ध्यान में रखना चाहिए। मंत्र का आशय समग्रता की ओर संकेत करता है—यह सब।

इस प्रकार सलिलं सर्वमा इदम् को अलग-अलग शब्दों में बाँटकर वर्तमान जल, पृथ्वी या समुद्र का वर्णन मान लेना उचित नहीं होगा। यहाँ ऋषि समस्त की आद्यावस्था का विचार कर रहे हैं।

10. तुच्छ्येन — तुच्छ से, रिक्त अथवा नगण्य अवस्था से

तुच्छ्येन का संबंध अगले पद अभु से है। इस पद का अर्थ निर्धारित करते समय केवल शब्दकोशीय अर्थ पर रुकना नहीं चाहिए; इसे अपिहितम्, यत् आसीत् और आगे आने वाले तपसः के साथ पढ़ना होगा।

11. अभु — अभु

अभु इस मंत्र का महत्त्वपूर्ण पद है। इसके अर्थ और व्युत्पत्ति को निश्चित किए बिना इसे सीधे किसी परिचित भौतिक वस्तु या पूर्ण अभाव का नाम नहीं देना चाहिए।

12. अपिहितम् — ढका हुआ, आवृत

अपिहितम् का अर्थ है—ढका हुआ अथवा आच्छादित।

इससे पहले आए गूळ्हम् की तरह यहाँ भी आवरण का भाव है। लेकिन दोनों प्रयोगों को एक ही अर्थ में समेटने से पहले देखना होगा कि मंत्र में उनका संबंध किन पदों से है।

13. यत् आसीत् — जो था

यत् का अर्थ है—जो; आसीत् का अर्थ है—था।

यह पद पहले कही गई अवस्था की ओर संकेत करता है। अर्थात् ऋषि उस स्थिति का उल्लेख कर रहे हैं जो आवृत थी और जिसके बाद अगले चरण का वर्णन आता है।

14. तपसः — तपस् से

तपसः का सामान्य अर्थ तपस् से, तप की शक्ति से अथवा तप के प्रभाव से है।

यहाँ इसे केवल मनुष्य द्वारा किए जाने वाले तप के अर्थ में सीमित नहीं करना चाहिए। मंत्र में इसका संबंध सृष्टि की आद्यावस्था और उसके आगे प्रकट होने से है।

15. तत् — वह

तत् का अर्थ है—वह। यह पहले वर्णित अवस्था की ओर संकेत करता है।

16. महिना — महिमा से, महान सामर्थ्य से

महिना का अर्थ है—महिमा से, महान शक्ति अथवा सामर्थ्य से।

इस पद के साथ तपसः जुड़कर उस शक्ति और उसके प्रभाव की ओर संकेत करता है जिसके माध्यम से आगे का प्राकट्य वर्णित है।

17. अजायत — उत्पन्न हुआ, प्रकट हुआ

अजायत का अर्थ है—उत्पन्न हुआ अथवा प्रकट हुआ।

यहाँ मंत्र का क्रम विशेष महत्त्व रखता है: पहले आवृत आद्यावस्था का वर्णन है, फिर तपस् और उसकी महिमा का उल्लेख है, और उसके बाद अजायत आता है। अतः इस क्रिया को उसी क्रम में समझना होगा।

18. एकम् — एक

एकम् का अर्थ है—एक।

मंत्र का अंतिम पद पूरे वर्णन को एक विशेष सत्ता अथवा एक अवस्था के प्राकट्य पर केंद्रित करता है। यह जानने के लिए कि यहाँ एकम् का संबंध किससे है, अगले मंत्र में आने वाले काम, मनसः और रेतः के साथ इस विचार की निरंतरता देखनी होगी।


अब तीसरे मंत्र में विचार का मुख्य क्रम

मंत्र में चार प्रमुख चरण सामने आते हैं:

  1. तम आसीत् तमसा गूळ्हम् — तम का तम से आवृत होना।
  2. अग्रे अप्रकेतम् सलिलं सर्वम् इदम् — आरंभ में समस्त का अप्रकेत अथवा अप्रकट अवस्था में वर्णन।
  3. तुच्छ्येन अभु अपिहितम् यत् आसीत् — किसी अवस्था का आवरण से ढका होना।
  4. तपसः तत् महिना अजायत एकम् — तपस् की महिमा से एक के प्रकट होने का वर्णन।

इस मंत्र में सबसे अधिक ध्यान देने योग्य बात यह है कि ऋषि आवृत और अप्रकट आद्यावस्था से एक के प्राकट्य तक का क्रम प्रस्तुत करते हैं। लेकिन तम, सलिल, तुच्छ्य, अभु और तपस् के तात्त्विक संबंध को निश्चित करने से पहले इनके पदों का अर्थ एक-दूसरे से जोड़कर देखना आवश्यक है।

अब इस मंत्र में “तम आसीत्तमसा गूळ्हम्” से आगे बढ़ते हुए आपके स्थापित विचार-क्रम के अनुसार अर्थ को और स्पष्ट किया जा सकता है।

इस मंत्र कि भी कड़ी पिछले मंत्र से जुड़ती है जैसा कि पिछले मंत्र का अंतिम शब्द चनास है चुनाव करना जैसा कि मैंने इसे कर्म से जोड़ कर देखा था क्योंकि चेतना जब कर्म से जुड़ती है तभी सक्रिय होती है अन्यथा वह निष्क्रिय होती है जहां कोई कर्म और उसका परीणाम नहीं होता है लेकिन आत्मा होती है जब कर्म से जुड़ती है तो उस कर्म की दिशा पुण्य और पाप दो तरफा होती है जिसका फल आत्मा को भोगना पड़ता है इसी फल के आधार पर वह अपने अगले जीवन में गतिशील होती है। यहां चुनाव कर्म का करने वाला है वह कौन है जिसकि बात यह वर्तमान मंत्र कर रहा है वह तम में है और तम है दो अलग अलग बाते है यहा आसीत्तमसा तमस रूप से हि विद्यमान है, गुळहम् वह कोई सामान्य तम में तम नहीं है वह विशेष रूप से विशेष व्यवस्था से उसमें उपस्थित हैं अग्रे अनादिकाल में सबसे पहले अप्रकेतम् इसका मतलब है प्रकृति से अलग अप्राकृतिक क्रितृम रूफ से सलिलम् उसने सब कुछ अपने अंदर नीगल रखा था जैसे मकड़ी जाला बनाने का पदार्थ अपने अंदर रखती है जैसे वघलय और वीलायक यहा वह वीलायक की भुमिका में है सर्वम् समस्त आ इदम आज जो भी दृश्य मय जगत दिख रहा है तुच्छ्येन यहां उसकी विशालता को यह शब्द व्यक्त करता है कि उस सत्ता के सामने संपुर्ण दृश्ययम जगत तुच्छ बहुत ही मुल्यहिन नगण्य के समान है इसलिए अभु उस प्रभु ईश्वर ने अपिहितम् जो अदृश्य जगत में था वह वह यत आसीत उससे बाहर हुआ अपने तपस: तप से संकल्प बल से तत वह महिना अपने ज्ञान माध्यम से यहां महिना मतलब ईश्वर अपनी बुद्धि से अजायत दृश्य मय जगत मे अंकुरित हुआ जैसे बल्ब से प्रकाश फैलता है स्वयं विद्युत बाहर नही फैलती है जैसे प्रकाश कि किरणे बल्ब कि दिवाल से नहीं नीकलती है बल्ब के अंदर कुछ विशेष बुद्धि के उपयोग से ऐसी स्थिति तैयार कि जाती है जिससे विद्युत के संपर्क में आते ही वह प्रकाशित हो जाता है यहां ज्ञान और बुद्धि पर विशेष जोर दिया गया है। एक वह एक ही है क्योंकि वह अपनी विषेश बुद्धि से स्वयं कि तरंगों को अदृश्य से दृश्य में प्रकट कर रहा है।

ऋग्वेद 10.129.3 — अदृश्य सत्ता से दृश्य जगत का प्राकट्य

तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्। तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥ ३॥

तीसरे मंत्र की विचारधारा पिछले मंत्र के अंतिम पद “किं चनास” से जुड़ती है। पिछले मंत्र में चेतना के कर्म से जुड़ने, कर्म के चुनाव और उसके परिणाम का प्रश्न सामने आया था। चेतना जब कर्म से जुड़ती है, तभी कर्म और उसके परिणाम की प्रक्रिया में सक्रिय होती है। कर्म की दिशा पुण्य और पाप, दोनों ओर हो सकती है और उसके फल के आधार पर आत्मा अगले जीवन में गतिशील होती है। लेकिन जहाँ कोई कर्म और उसका परिणाम नहीं है, वहाँ भी आत्मा का अस्तित्व बना रहता है। इस प्रकार कर्म से जुड़ी सक्रियता और आत्मा की मूल सत्ता दो अलग-अलग अवस्थाएँ हैं।

तीसरे मंत्र में विचार का केंद्र उस मूल सत्ता की ओर मुड़ता है, जो तम में विद्यमान है और अपनी विशेष बुद्धि तथा संकल्पशक्ति से अदृश्य को दृश्य जगत के रूप में प्रकट करती है।

तम आसीत्तमसा गूळ्हम्

तम और तमसा से आवृत होकर विद्यमान सत्ता दो अलग-अलग बातें हैं। यहाँ तम केवल सामान्य अंधकार नहीं है। मंत्र के अनुसार, वह मूल सत्ता तमसा से आवृत होकर विद्यमान थी। गूळ्हम् का अर्थ है—गुप्त, छिपा हुआ अथवा विशेष व्यवस्था के भीतर आवृत। इसका आशय किसी सामान्य वस्तु का अंधकार में छिप जाना नहीं, बल्कि उस मूल सत्ता की विशेष अवस्था से है, जिसमें दृश्य जगत अभी प्रकट नहीं हुआ था।

अग्रेऽप्रकेतम्

अग्रे का अर्थ है—सबसे पहले, अनादिकाल की आद्यावस्था में। अप्रकेतम् उस अवस्था की ओर संकेत करता है, जिसमें दृश्य जगत के वर्तमान रूप और पहचान अभी प्रकट नहीं हुए थे। यह प्रकृति के सामान्य दृश्य रूप से अलग, अप्रकट अवस्था का वर्णन है। ऋषि उस समय की बात कर रहे हैं, जब आज दिखाई देने वाला जगत अपने दृश्य रूप में सामने नहीं आया था।

सलिलं सर्वमा इदम्

सलिलम् और सर्वम् आ इदम् को एक साथ समझने पर समस्त दृश्य जगत की मूल अवस्था का संकेत मिलता है। आज जो दृश्य जगत दिखाई देता है, उसके समस्त रूप उस मूल सत्ता में समाहित थे। जैसे मकड़ी अपने भीतर से जाला बनाने का पदार्थ निकालकर जाल का विस्तार करती है, वैसे ही यहाँ मूल सत्ता के भीतर समाहित संभावनाओं के दृश्य रूप में प्रकट होने का विचार सामने आता है। इस उदाहरण में मूल सत्ता की अंतर्निहित सामर्थ्य और उससे होने वाले प्राकट्य पर बल है।

तुच्छ्येनाभ्वपिहितम्

तुच्छ्येन उस विशालता की ओर संकेत करता है, जिसके सामने संपूर्ण दृश्य जगत तुच्छ, नगण्य और अत्यंत अल्प है। दृश्य जगत की विशालता चाहे कितनी भी हो, मूल सत्ता की तुलना में उसका विस्तार सीमित है।

अभु उस प्रभु सत्ता के संदर्भ में समझा जाता है, जिसमें दृश्य जगत अभी अप्रकट रूप से समाहित था। अपिहितम् का अर्थ है—आवृत अथवा ढका हुआ। इस प्रकार जो दृश्य जगत अभी प्रकट नहीं हुआ था, वह उस अदृश्य सत्ता में समाहित और आवृत था।

यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम्

यत् आसीत् उस पूर्ववर्ती अवस्था की ओर संकेत करता है, जिसमें दृश्य जगत अप्रकट रूप से विद्यमान था।

तपसः का अर्थ यहाँ तपशक्ति और संकल्पबल से है। यह सृष्टि के प्राकट्य के पीछे सक्रिय मूल सामर्थ्य को व्यक्त करता है।

तत् महिना में महिना का अर्थ महिमा और महान सामर्थ्य से है। इस संदर्भ में यह ईश्वर के ज्ञान और विशेष बुद्धि के माध्यम से होने वाले प्राकट्य की ओर संकेत करता है। दृश्य जगत का प्रकट होना केवल किसी पदार्थ के बाहर निकल आने जैसा नहीं, बल्कि मूल सत्ता के ज्ञान, बुद्धि और संकल्पशक्ति से जुड़ी प्रक्रिया है।

अजायत का अर्थ है—उत्पन्न हुआ अथवा प्रकट हुआ। एकम् उस एक ही मूल सत्ता की ओर संकेत करता है, जो अपनी विशेष बुद्धि और सामर्थ्य से अदृश्य को दृश्य रूप में प्रकट करती है।

बल्ब और प्रकाश का उदाहरण

बल्ब से प्रकाश प्रकट होता है, लेकिन विद्युत स्वयं प्रकाश की किरणों के रूप में बाहर नहीं निकलती। बल्ब की विशेष संरचना विद्युत के प्रभाव को प्रकाश के रूप में प्रकट करती है। विद्युत के संपर्क में आने पर उसके भीतर ऐसी स्थिति बनती है, जिससे प्रकाश उत्पन्न होता है।

इसी प्रकार दृश्य जगत का प्राकट्य मूल सत्ता के ज्ञान, बुद्धि और संकल्पशक्ति से संबंधित है। अदृश्य सत्ता स्वयं दृश्य जगत की प्रत्येक वस्तु के समान रूप धारण करके बाहर नहीं निकलती, बल्कि अपनी विशेष सामर्थ्य से दृश्य रूपों को प्रकट करती है। इस उदाहरण का केंद्रीय बिंदु यह है कि प्राकट्य के पीछे व्यवस्था, ज्ञान और बुद्धि की भूमिका है।

इस प्रकार तीसरा मंत्र केवल सृष्टि के उत्पन्न होने का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस मूल सत्ता की सामर्थ्य पर विचार करता है, जिसके भीतर दृश्य जगत अप्रकट रूप में समाहित था और जो अपनी तपशक्ति, ज्ञान तथा विशेष बुद्धि के माध्यम से दृश्य जगत में प्रकट हुई। अदृश्य से दृश्य का यह प्राकट्य उसी एक मूल सत्ता की सामर्थ्य का परिणाम है।

ऋग्वेद 10.129.4 — शब्द-दर-शब्द व्याख्या

मूल मंत्र

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥ ४॥

यह मंत्र पिछले मंत्र के विचार को आगे बढ़ाता है। तीसरे मंत्र में अदृश्य सत्ता से दृश्य जगत के प्राकट्य, तथा उस प्राकट्य में ज्ञान, बुद्धि और संकल्पशक्ति की भूमिका सामने आई। अब ऋषि उस अवस्था का विचार करते हैं, जहाँ काम, मनस् और रेतस् का संबंध प्रकट होता है।

1. कामः — काम, इच्छा, संकल्प

कामः का अर्थ है इच्छा अथवा कामना। इस मंत्र में यह शब्द विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि तीसरे मंत्र में वर्णित प्राकट्य के बाद अब सृष्टि के मूल में सक्रिय होने वाली इच्छा का उल्लेख आता है।

पिछले मंत्र में दृश्य जगत के प्राकट्य का संबंध तपस्, महिमा और विशेष बुद्धि से जुड़ा था। यहाँ कामः उस प्रेरक तत्त्व की ओर संकेत करता है, जिसके माध्यम से आगे की सृष्टि-प्रक्रिया का विचार किया जाता है।

2. तत् — वह

तत् का अर्थ है—वह। यह पहले वर्णित मूल सत्ता और उसकी अवस्था की ओर संकेत करता है।

3. अग्रे — आरंभ में

अग्रे का अर्थ है—आरंभ में, सबसे पहले।

पिछले मंत्र में अग्रे शब्द आद्यावस्था के संदर्भ में आया था। यहाँ भी ऋषि सृष्टि की प्रारंभिक अवस्था के क्रम को आगे बढ़ाते हैं।

4. समवर्तत — उत्पन्न हुआ, प्रवृत्त हुआ

समवर्तत का अर्थ है—उत्पन्न हुआ, प्रवृत्त हुआ अथवा प्रकट होकर सक्रिय हुआ।

इस प्रकार कामस्तदग्रे समवर्तत का सामान्य पदक्रम है—उस आरंभिक अवस्था में काम उत्पन्न हुआ अथवा प्रवृत्त हुआ।

5. अधि — ऊपर, पर, आधार पर

अधि का अर्थ संदर्भ के अनुसार ऊपर, पर अथवा किसी आधार पर हो सकता है। इस मंत्र में इसका संबंध अगले पद मनसः से है।

6. मनसः — मन का

मनसः का अर्थ है—मन का। यह षष्ठी विभक्ति का रूप है।

यहाँ काम और मनस् के बीच संबंध स्थापित होता है। सृष्टि के मूल प्राकट्य की चर्चा अब मनस् की भूमिका तक पहुँचती है।

7. रेतः — बीज, सृजन-बीज

रेतः का अर्थ बीज, सृजन का मूल तत्त्व अथवा जनन-सामर्थ्य है।

इस मंत्र में मनसो रेतः पद विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। यह मनस् के बीज अथवा सृजनकारी तत्त्व की ओर संकेत करता है। यहाँ रेतस् को केवल स्थूल शारीरिक अर्थ तक सीमित करने के बजाय मंत्र में उसके सृष्टि-संबंधी संदर्भ को समझना आवश्यक है।

8. प्रथमम् — प्रथम, सबसे पहले

प्रथमम् का अर्थ है—पहला अथवा सबसे पहले।

यह पद बताता है कि यहाँ जिस रेतस् का उल्लेख है, वह क्रम में प्रथम है।

9. यत् — जो

यत् का अर्थ है—जो। यह अगले पद के साथ मिलकर उस प्रथम तत्त्व की पहचान कराता है जिसका वर्णन किया जा रहा है।

10. आसीत् — था

आसीत् का अर्थ है—था, विद्यमान था।

इस प्रकार मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् का सामान्य अर्थ है—जो मनस् का प्रथम बीज था।


11. सतः — सत् का, विद्यमान सत्ता का

सतः का अर्थ है—सत् का अथवा विद्यमान सत्ता का।

यहाँ पिछले मंत्रों के सत्-असत् संबंध को ध्यान में रखना आवश्यक है। चौथे मंत्र में ऋषि सत् और असत् के बीच संबंध खोजने की बात करते हैं।

12. बन्धुम् — संबंध, बंधन-सूत्र, जुड़ाव

बन्धुम् का अर्थ है—संबंध, जुड़ाव अथवा बंधन-सूत्र।

यह पद मंत्र के केंद्रीय विचारों में से एक है। ऋषि केवल सत् और असत् का अलग-अलग उल्लेख नहीं करते, बल्कि उनके बीच संबंध खोजने की बात कहते हैं।

13. असति — असत् में

असति का अर्थ है—असत् में।

यहाँ सतः और असति का साथ आना महत्त्वपूर्ण है। ऋषि असत् में सत् के बंधु अथवा संबंध-सूत्र की खोज का वर्णन करते हैं।

14. निरविन्दन् — खोज निकाला, प्राप्त किया

निरविन्दन् का अर्थ है—खोज निकाला, प्राप्त किया अथवा पहचान लिया।

यह क्रिया बताती है कि सत् और असत् के संबंध को सहज रूप से सामने आया हुआ नहीं माना गया; उसे खोजकर पहचाना गया।

15. हृदि — हृदय में

हृदि का अर्थ है—हृदय में।

यह खोज केवल बाहरी निरीक्षण के रूप में नहीं बताई गई, बल्कि हृदय में होने वाली खोज के रूप में प्रस्तुत की गई है।

16. प्रतीष्या — खोजते हुए, अन्वेषण करके

प्रतीष्या का संबंध खोजने, अनुसरण करने अथवा अन्वेषण करने के भाव से है। इस पद के सूक्ष्म व्याकरणिक अर्थ पर अलग से विचार किया जा सकता है, लेकिन मंत्र के क्रम में यह हृदय में होने वाली खोज से जुड़ता है।

17. कवयः — कवि, मनीषी, दूरदर्शी ऋषि

कवयः का अर्थ है—कवि, मनीषी अथवा दूरदर्शी ज्ञानी।

वैदिक संदर्भ में कवि केवल रचना करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि गहन तत्त्व को देखने और पहचानने वाला मनीषी भी है।

18. मनीषा — मनीषा से, सूक्ष्म बुद्धि और विवेक से

मनीषा का अर्थ है—सूक्ष्म बुद्धि, विचारशक्ति अथवा विवेकपूर्ण ज्ञान।

मंत्र के अंत में यह पद बताता है कि कवियों ने सत् और असत् के संबंध को हृदय में मनीषा के माध्यम से खोजा।


मंत्र का विचार-क्रम

इस मंत्र में दो प्रमुख भाग हैं:

पहला भाग — काम, मनस् और रेतस्

काम का प्रवर्तन, मनस् से उसका संबंध और प्रथम सृजन-बीज का उल्लेख है। इससे तीसरे मंत्र में वर्णित प्राकट्य के बाद सृष्टि की आगे बढ़ती प्रक्रिया का संकेत मिलता है।

दूसरा भाग — सत् और असत् का बन्धु

कवियों ने मनीषा से हृदय में खोज करते हुए असत् में सत् का बंधु अथवा संबंध-सूत्र पहचाना। इस प्रकार मंत्र सृष्टि के प्राकट्य से आगे बढ़कर उस संबंध की खोज तक पहुँचता है, जो अप्रकट और प्रकट सत्ता को जोड़ता है।

अगले चरण में सबसे महत्त्वपूर्ण विचार “सतो बन्धुमसति” का है। इसे पहले मंत्र में स्थापित ऋत और सत्य के संबंध, तीसरे मंत्र में वर्णित अदृश्य से दृश्य के प्राकट्य, और यहाँ मनस् के प्रथम बीज के साथ जोड़कर समझना होगा।

जहां पर पिछला मंत्र पुर्ण होता है एकम् उसी एकम् से यह काम: इच्छा कामना जुड़ती है उस एक ने इच्छा कि कामना जो आगे उसे कर्म में सक्रिय करता है यहां ध्यान देने वाली बात है कि ईश्वर का काम इच्छा पुर्ण है इसलिए वह किसी प्रकार के परीणाम से नहीं जुड़ता है जैसा कि साधारण जीव जुड़ता है ईश्वर और जीव कर्म में भेद है, ईश्वर जो एक था उसमे काम इच्छा संकल्प जागृत हुआ फिर वह काम तात्विक रुप ना केवल वैचारिक रूप से यहां ध्यान देने वाली बात है मनुष्य की इच्छा पहले वैचारिक स्तर पर प्रकट होती है, जबकि ईश्वर कि इच्छा तत् तात्विक रूप से वह अग्रे अनादिकाल मे प्रारंभ में समवर्तत समान रूप से जैसे असिमित अदृश्य जगत में व्याप्त था वैसे ही वह अनंत रुप से दृश्य जगत में व्याप्त होने ला फैलने लगा अधि अपने मुल आधार पर जैसे वृक्ष अपनी जड़ो के आधार पर ही तना शाखा फल फुल फैलाता है मनस: मतलब हर वस्तु कि पिछे उसका पुरा विज्ञान मान था और इस मान के आधार पर ही बीज रेत: का उद्भव हुआ प्रथमम् प्रारंभिक काल मे सबसे पहले यत जो ऋत रुप से विद्यमान आसीत था वही सत: दृश्य मय जगत मे काल समय सिमा के अंदर मान मन के अनुकुल बन कर बंधुम् उस ऋत का सहोदर असति जो अदृश्य था वह निरविन्दन भौतिक दृश्य मय जगत विश्व ब्रह्माण्ड के रुप में हृदि हृदय का स्वामी बना अर्थात उसने अंत:करण बनाया प्रतीष्मा और उसमे अपना ही रुप छाया प्रतीष्मा स्थापित किया जैसा कि एक मंत्र आता य: आत्मदा बलदा यस्यछायामृतम् यस्यमृत्यु इत्यादि कवय: क्रांतिदर्शी जिसके पास अंतर्दृष्टि विद्यमान है मनीषा मनन चिंतन विचार के द्वारा मंत्र के द्वारा उसे उपलब्ध हुये।

ऋग्वेद 10.129.4 — एकम् से काम, मनस् और दृश्य जगत का प्राकट्य

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा॥ ४॥

कामस्तदग्रे समवर्तत

पिछले मंत्र का समापन एकम् शब्द से हुआ था। उसी एकम् से इस मंत्र का आरंभिक विचार जुड़ता है। वह एक ही मूल सत्ता, जो अपनी विशेष बुद्धि, ज्ञान और संकल्पशक्ति से अदृश्य को दृश्य रूप में प्रकट करती है, उसमें काम अर्थात् इच्छा और कामना का संकल्प जागृत हुआ।

यहाँ ईश्वर की इच्छा और साधारण जीव की इच्छा के बीच मूलभूत अंतर समझना आवश्यक है। जीव की इच्छा प्रायः किसी अपूर्णता, आवश्यकता अथवा अभाव से उत्पन्न होती है। वह इच्छा की पूर्ति के लिए कर्म करता है और कर्म के परिणाम से जुड़ जाता है। परिणाम के अनुसार उसे सुख-दुःख तथा पुण्य-पाप का फल भोगना पड़ता है। इसके विपरीत, ईश्वर का काम पूर्ण है। उसकी इच्छा किसी अभाव की पूर्ति के लिए नहीं होती और न ही वह अपने कर्म के किसी बाहरी परिणाम पर निर्भर है। इसलिए ईश्वर और जीव के कर्म में भेद है।

कामः यहाँ इच्छा, कामना और संकल्प का बोध कराता है। मनुष्य की इच्छा पहले वैचारिक स्तर पर प्रकट होती है, फिर वह कर्म में परिणत होती है। लेकिन ईश्वर की इच्छा केवल विचार के स्तर पर सीमित नहीं रहती; वह तात्त्विक रूप से सृष्टि के प्राकट्य का आधार बनती है।

तत् अग्रे का अर्थ है—उस आद्यावस्था में, सबसे पहले। समवर्तत का अर्थ है—प्रवृत्त हुआ, प्रकट हुआ अथवा सक्रिय हुआ। इस प्रकार उस एक मूल सत्ता में काम का संकल्प जागृत हुआ और सृष्टि की सक्रिय प्रक्रिया आगे बढ़ी।

अधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्

अधि अपने मूल आधार पर स्थित होकर उसके आधार से आगे विस्तार करने का संकेत देता है। जैसे वृक्ष अपनी जड़ों के आधार पर तना, शाखाएँ, पत्तियाँ, फूल और फल विकसित करता है, वैसे ही दृश्य जगत का विस्तार भी अपने मूल आधार से जुड़ा हुआ है।

मनसः का संबंध उस मनस् से है, जिसके आधार पर सृष्टि की व्यवस्था और उसका विज्ञान प्रकट होता है। यहाँ मनस् को केवल मनुष्य के विचार करने वाले मन तक सीमित नहीं किया जा सकता। सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के पीछे उसकी अपनी व्यवस्था, संरचना और कार्यप्रणाली है। इस व्यवस्था का मूल ज्ञान उस एक सत्ता में विद्यमान है, जिससे दृश्य जगत का प्राकट्य होता है।

रेतः का अर्थ है बीज अथवा सृजन का मूल तत्त्व। जब मूल सत्ता की इच्छा और ज्ञान सृष्टि की सक्रिय प्रक्रिया से जुड़ते हैं, तब उस प्रक्रिया का बीज प्रकट होता है। प्रथमम् बताता है कि यह सृजन-बीज प्रारंभिक अवस्था का है। यत् आसीत् उस मूल तत्त्व की ओर संकेत करता है, जो पहले से विद्यमान था।

इस प्रकार मनसो रेतः प्रथमम् सृष्टि के उस मूल बीज की ओर संकेत करता है, जिसका संबंध मनस् और उसके भीतर विद्यमान ज्ञान-विज्ञान से है। दृश्य जगत का विस्तार किसी अज्ञानपूर्ण अथवा अव्यवस्थित प्रक्रिया का परिणाम नहीं, बल्कि मूल सत्ता में विद्यमान ज्ञान और व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

सतो बन्धुमसति निरविन्दन्

सतः का संबंध सत् से है—उस सत्ता से, जो ऋत के रूप में मूल और शाश्वत है। असति उस अप्रकट अवस्था की ओर संकेत करता है, जिससे दृश्य जगत का प्राकट्य होता है। यहाँ ऋत और सत्य का संबंध विशेष महत्त्व रखता है।

ऋत मूल सत्ता है, जो अपनी पूर्णता में विद्यमान है। सत्य दृश्य जगत है, जो काल, समय और सीमा के भीतर प्रकट होता है। दृश्य जगत का प्रत्येक रूप परिवर्तनशील है, जबकि उसका मूल आधार ऋत है।

बन्धुम् का अर्थ है—संबंध, सहोदरता अथवा जुड़ाव का सूत्र। यहाँ सत् और असत् के बीच उस संबंध की ओर संकेत है, जिसके माध्यम से मूल सत्ता और दृश्य जगत का संबंध समझ में आता है। असत् में सत् का बन्धु खोजने का अर्थ है, अप्रकट और प्रकट के बीच विद्यमान मूल संबंध को पहचानना।

निरविन्दन् का अर्थ है—खोज निकाला, प्राप्त किया अथवा पहचान लिया। इस प्रकार कवियों ने अप्रकट और प्रकट सत्ता के बीच उस संबंध को पहचाना, जिसके माध्यम से दृश्य जगत में मूल सत्ता की उपस्थिति समझी जा सकती है।

हृदि प्रतीष्या

हृदि का अर्थ है—हृदय में। यहाँ हृदय का संबंध केवल शारीरिक अंग से नहीं, बल्कि अंतःकरण और उसके आधार से है।

दृश्य जगत के प्राकट्य के साथ अंतःकरण की व्यवस्था का विचार भी सामने आता है। हृदय का स्वामी वह मूल सत्ता है, जिसके आधार पर अंतःकरण की रचना और उसका संचालन संभव होता है। इस प्रकार हृदय और अंतःकरण में मूल सत्ता की उपस्थिति का विचार इस मंत्र के व्यापक तात्त्विक संदर्भ से जुड़ता है।

प्रतीष्या का संबंध खोजने, अन्वेषण करने और भीतर की ओर दृष्टि करने से है। इस पद के माध्यम से बाहरी दृश्य जगत से आगे बढ़कर अंतःकरण में मूल सत्ता के संबंध को पहचानने का भाव प्रकट होता है।

यह विचार यजुर्वेद के उस मंत्र से भी जुड़ता है, जिसमें परम सत्ता को प्राण, बल, अमरत्व और मृत्यु के आधार के रूप में वर्णित किया गया है—

य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः। यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम॥

यहाँ परम सत्ता के साथ अमरत्व और मृत्यु, दोनों के संबंध का उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि दृश्य जगत में जीवन, शक्ति और मृत्यु की समस्त व्यवस्थाओं का मूल आधार वही परम सत्ता है।

कवयो मनीषा

कवयः का अर्थ है—क्रांतदर्शी, दूरदर्शी ऋषि, जिनके पास अंतर्दृष्टि विद्यमान है। वे केवल बाहरी दृश्य रूपों को देखकर संतुष्ट नहीं होते, बल्कि उनके मूल तत्त्व और उनके परस्पर संबंध को पहचानते हैं।

मनीषा का अर्थ है—मनन, चिंतन, विचार और सूक्ष्म बुद्धि। ऋषियों ने मनीषा के माध्यम से उस मूल संबंध को जाना, जो अप्रकट सत्ता और दृश्य जगत के बीच विद्यमान है। यह ज्ञान केवल बाहरी सूचना का संग्रह नहीं, बल्कि मंत्र के माध्यम से प्राप्त तात्त्विक बोध है।

इस प्रकार चौथे मंत्र में एकम् से काम का संकल्प, मनस् से सृजन-बीज का संबंध, ऋत और सत्य के बीच बन्धु की पहचान तथा अंतःकरण में मूल सत्ता की उपस्थिति का विचार एक क्रम में आगे बढ़ता है। ऋषियों ने अपनी मनीषा और अंतर्दृष्टि से उस संबंध को पहचाना, जिसके आधार पर दृश्य जगत के प्राकट्य और उसके मूल आधार को समझा जा सकता है।

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