पद्मपुराण भुमिखण्ड और महाभारत आदिपर्व के आख्यान ऋग्वेद मरुत सुक्त प्रलय और सृष्टि सृजन

 

पद्मपुराण भुमिखण्ड और महाभारत आदिपर्व के आख्यान ऋग्वेद मरुत सुक्त प्रलय और सृष्टि सृजन

पद्यमपुराण की यह घटना ठीक इसी रूप में महाभारत के आदिपर्व में आती है इन दोनों में यह समानता है कि इन्द्र यहां गर्भ में प्रवेश करके उस गर्भ को ही नष्ट कर देता है सात मरूत्गण जन्म लेते है फिर इन सात मरुत्गण पर ध्यान केंद्रित होता है हम जिस विषय से भाग रहे हमारे सामने वहीं आकर खड़ा हो जाता है क्या इस संसय का समाधान करे या इसको छोड़ दे यदि समाधान करना है तो हमें फिर से ऋग्वेद के मंत्रों कि सरण में जाना होगा और उन मंत्रों कि खोज करनी होगी जिसमें सात मरुत्गण का उल्लेख किया गया और उस पर विचार करके विषय को स्पष्ट करना होगा।

महाभारत के आदिपर्व और पद्मपुराण के भूमिखण्ड में गर्भ-विभाजन तथा मरुद्गणों की उत्पत्ति का समान प्रसंग है।

कथा में इन्द्र गर्भ में प्रवेश करता है, गर्भ को विभाजित करता है और उसके परिणामस्वरूप मरुद्गण उत्पन्न होते हैं। इसलिए अब हमारा ध्यान सात मरुद्गणों और उनकी उत्पत्ति के रहस्य पर जाता है।

त्रिकालदर्शी

पद्मपुराण — भूमिखण्ड

अध्याय २६: मरुदुत्पत्ति

श्लोक, भावार्थ और व्याख्या


श्लोक १

सूत उवाच—

तं पुत्रं निहतं श्रुत्वा सा दितिर्दुःखपीडिता । पुत्रशोकेन तेनैव संदग्धा द्विजसत्तमाः ॥१॥

भावार्थ:
सूतजी कहते हैं—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! अपने पुत्र के मारे जाने का समाचार सुनकर दिति अत्यंत दुःखी हुई। पुत्र की मृत्यु के शोक ने उसे भीतर तक व्याकुल कर दिया।

व्याख्या:
दिति का दुःख केवल पुत्र-वियोग का दुःख नहीं है। पिछले अध्याय में इन्द्र ने विश्वास में आए वृत्र का वध किया था। अब वही घटना दिति के भीतर प्रतिशोध की अग्नि को और प्रबल करती है। कथा यहाँ से उस संकल्प की ओर बढ़ती है जो आगे मरुद्गणों की उत्पत्ति का कारण बनेगा।


श्लोक २

पुनरूचे महात्मानं कश्यपं मुनिपुंगवम् । इंद्रस्यापि सुदुष्टस्य वधार्थं द्विजसत्तम ॥२॥

भावार्थ:
दिति ने फिर महात्मा, मुनियों में श्रेष्ठ कश्यप से कहा कि उसे उस दुष्ट इन्द्र के वध के लिए एक पुत्र चाहिए।

व्याख्या:
दिति अपने दुःख को एक निश्चित उद्देश्य में बदल देती है। अब उसका संकल्प केवल पुत्र-प्राप्ति नहीं, बल्कि इन्द्र का अंत करने वाले पुत्र की प्राप्ति है। इस प्रकार कथा में संकल्प, तपस्या और उसके परिणाम का संबंध आगे बढ़ता है।


श्लोक ३

ब्रह्मतेजोमयं तीव्रं दुःसहं सर्वदैवतैः । पुत्रैकं दीयतां कांत सुप्रियाहं यदा विभो ॥३॥

भावार्थ:
दिति कश्यप से कहती है—हे प्रिय स्वामी! मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो ब्रह्मतेज से युक्त, अत्यंत शक्तिशाली और सभी देवताओं के लिए असहनीय हो। मैं आपकी प्रिय हूँ; मेरी इच्छा पूरी कीजिए।

व्याख्या:
दिति जिस पुत्र की कामना करती है, उसके गुण सामान्य शारीरिक बल तक सीमित नहीं हैं। वह ब्रह्मतेज, असाधारण शक्ति और देवताओं को परास्त करने की क्षमता चाहती है। उसके संकल्प में तपस्या से प्राप्त होने वाली शक्ति और उस शक्ति के प्रयोग का लक्ष्य, दोनों उपस्थित हैं।


श्लोक ४

कश्यप उवाच—

निहतौ बलवृत्रौ च मम पुत्रौ महाबलौ । अघमाश्रित्य देवेन इंद्रेणापि दुरात्मना ॥४॥

भावार्थ:
कश्यप कहते हैं—मेरे दोनों महाबली पुत्र बल और वृत्र भी इन्द्र के हाथों मारे गए। उस दुरात्मा देवता ने अधर्म का सहारा लेकर उनका वध किया।

व्याख्या:
कश्यप के कथन में अपने पुत्रों की मृत्यु का दुःख और इन्द्र के आचरण के प्रति असंतोष प्रकट होता है। दिति का संकल्प अब कश्यप की स्वीकृति से जुड़ जाता है। पिता और माता दोनों की इच्छा एक ही दिशा में केंद्रित हो रही है।


श्लोक ५

तस्यैव च वधार्थाय पुत्रमेकं ददाम्यहम् । वर्षाणां तु शतैकं त्वं शुचिर्भव यशस्विनि ॥५॥

भावार्थ:
कश्यप कहते हैं—मैं इन्द्र के वध के लिए तुम्हें एक पुत्र प्रदान करूँगा। किंतु हे यशस्विनी! तुम्हें सौ वर्ष तक शुद्धता का पालन करना होगा।

व्याख्या:
यहाँ पुत्र की प्राप्ति को सौ वर्ष के नियम और तपस्या से जोड़ा गया है। दिति की इच्छा को परिणाम तक पहुँचाने के लिए समय, अनुशासन और निरंतर शुद्धता आवश्यक बताए गए हैं। कथा में सौ वर्ष की अवधि एक बार फिर महत्त्वपूर्ण हो जाती है, जैसे पिछले अध्यायों में सुव्रत और बल की तपस्या के प्रसंग में हुआ था।


श्लोक ६

एवमुक्त्वा स योगींद्रो हस्तं शिरसि वै तदा । दत्त्वादित्या सहैवासौ गतो मेरुं तपोवनम् ॥६॥

भावार्थ:
ऐसा कहकर योगियों में श्रेष्ठ कश्यप ने दिति के सिर पर हाथ रखा और अदिति के साथ मेरु पर्वत के तपोवन की ओर चले गए।

व्याख्या:
कश्यप दिति को संकल्प और नियम प्रदान करने के बाद तपस्या के लिए चले जाते हैं। कथा में मेरु तपोवन तपश्चर्या से जुड़ा स्थान बनता है। यहाँ कश्यप का प्रस्थान और दिति का तप में प्रवृत्त होना, दोनों आगे की घटनाओं की भूमिका तैयार करते हैं।


श्लोक ७

तपस्तताप सा देवी तपोवननिवासिनी । शुचिष्मती सदा भूत्वा पुत्रार्था द्विजसत्तम ॥७॥

भावार्थ:
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! तपोवन में रहने वाली दिति पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से निरंतर शुद्धता का पालन करती हुई तपस्या करने लगी।

व्याख्या:
दिति का संकल्प अब व्यवहार में बदल चुका है। वह केवल इच्छा प्रकट करके नहीं रुकती, बल्कि निर्धारित नियमों के अनुसार दीर्घकालीन तपस्या करती है। कथा में तपस्या संकल्प को निरंतर बनाए रखने वाली प्रक्रिया है।


श्लोक ८

ततो देवः सहस्राक्षो ज्ञात्वा उद्यममेव च । दित्याश्चैव महाभाग अंतरप्रेक्षकोऽभवत् ॥८॥

भावार्थ:
दिति के इस प्रयास को जानकर सहस्राक्ष इन्द्र उसके संकल्प और तपस्या पर दृष्टि रखने लगा तथा उसके आचरण में कोई अवसर खोजने लगा।

व्याख्या:
इन्द्र समझ जाता है कि दिति की तपस्या का उद्देश्य उसके लिए संकट उत्पन्न करना है। वह सीधे सामने आकर संघर्ष करने के बजाय दिति के नियम में त्रुटि खोजने की योजना बनाता है। कथा में यहाँ से प्रत्यक्ष शक्ति-संघर्ष के स्थान पर छिपकर अवसर खोजने की प्रक्रिया आरंभ होती है।


श्लोक ९

पंचविंशाब्दिको भूत्वा देवराड्दैवतोपमः । ब्राह्मणस्य च रूपेण तस्याश्चांतिकमागतः ॥९॥

भावार्थ:
देवराज इन्द्र पच्चीस वर्ष के युवक के समान रूप धारण करके ब्राह्मण का वेश बनाए दिति के समीप पहुँचा।

व्याख्या:
इन्द्र अपनी वास्तविक पहचान छिपाकर दिति के पास आता है। वह ऐसा रूप चुनता है जिससे दिति उसे शत्रु न समझे। इस प्रकार कथा में वेश-परिवर्तन और पहचान छिपाने का प्रसंग आता है।


श्लोक १०

स तां प्रणम्य धर्मात्मा मातरं तपसान्विताम् । तयोक्तस्तु सहस्राक्षो भवान्को द्विजसत्तम ॥१०॥

भावार्थ:
उसने तपस्या में लगी दिति को प्रणाम किया। दिति ने उससे पूछा—हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! तुम कौन हो?

व्याख्या:
इन्द्र दिति के सामने विनम्र सेवक और धर्मपरायण ब्राह्मण का रूप प्रस्तुत करता है। दिति उसकी वास्तविक पहचान नहीं जानती, इसलिए उसके व्यवहार को उसी बाहरी रूप के अनुसार ग्रहण करती है।


श्लोक ११

तामुवाच सहस्राक्षः पुत्रोऽहं तव शोभने । ब्राह्मणो वेदविद्वांश्च धर्मं जानामि भामिनि ॥११॥

भावार्थ:
सहस्राक्ष ने उससे कहा—हे सुंदरी! मैं तुम्हारा पुत्र हूँ। मैं वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण हूँ और धर्म को जानता हूँ।

व्याख्या:
इन्द्र स्वयं को दिति का पुत्र बताकर उसके विश्वास को प्राप्त करता है। वह अपनी पहचान और उद्देश्य दोनों छिपाता है। यह छल आगे दिति की सेवा करने और उसके नियम की निगरानी करने का साधन बनता है।


श्लोक १२

तपसस्तव साहाय्यं करिष्ये नात्र संशयः । शुश्रूषति स तां देवीं मातरं तपसान्विताम् ॥१२॥

भावार्थ:
इन्द्र कहता है—मैं तुम्हारी तपस्या में सहायता करूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं। इसके बाद वह तपस्या में लगी दिति की सेवा करने लगा।

व्याख्या:
इन्द्र दिति के निकट रहकर उसकी दिनचर्या और तपस्या के नियमों को जान सकता है। उसकी सेवा बाहरी रूप से सहायता है, लेकिन कथा के घटनाक्रम में यह दिति के नियम में त्रुटि खोजने की योजना से जुड़ी है।


श्लोक १३

तमिंद्रं सा न जानाति आगतं दुष्टकारिणम् । धर्मपुत्रं विजानाति शुश्रूषंतं दिने दिने ॥१३॥

भावार्थ:
दिति उस दुष्ट उद्देश्य से आए इन्द्र को नहीं पहचानती। वह उसे धर्मपरायण पुत्र समझती है, जो प्रतिदिन उसकी सेवा करता है।

व्याख्या:
दिति के लिए इन्द्र एक विश्वसनीय सेवक है। वह उसके वास्तविक उद्देश्य से अनजान रहती है। कथा में विश्वास और छिपे हुए उद्देश्य के बीच का अंतर स्पष्ट हो जाता है।


श्लोक १४

अंगं संवाहयेद्देव्याः पादौ प्रक्षालयेत्ततः । पत्रं मूलं फलं तत्र वल्कलाजिनमेव च ॥१४॥

भावार्थ:
इन्द्र दिति के शरीर की मालिश करता, उसके पैर धोता और उसके लिए पत्ते, मूल, फल, वृक्ष की छाल तथा मृगचर्म जैसी आवश्यक वस्तुएँ उपलब्ध कराता था।

व्याख्या:
यह श्लोक दिति की तपस्विनी जीवनचर्या और इन्द्र की दैनिक सेवा का विवरण देता है। इन्द्र भोजन और तपस्या के लिए आवश्यक सामग्री जुटाने से लेकर शारीरिक सेवा तक करता है। इस निरंतर निकटता से उसे दिति के आचरण का निरीक्षण करने का अवसर मिलता है।


श्लोक १५

ददात्येवं स धर्मात्मा तस्यै दित्यै सदैव हि । भक्त्या संतोषिता तस्य संतुष्टा तमभाषत ॥१५॥

भावार्थ:
वह धर्मात्मा के समान व्यवहार करता हुआ दिति को सदैव आवश्यक वस्तुएँ देता रहा। उसकी सेवा से संतुष्ट होकर दिति प्रसन्न हुई और उससे बोलने लगी।

व्याख्या:
दिति इन्द्र की सेवा को सच्ची भक्ति और समर्पण समझती है। उसका विश्वास धीरे-धीरे बढ़ता है। इस प्रकार इन्द्र को वह अवसर मिलता है जिसमें दिति अपने मन की इच्छा और भविष्य की योजना उसके सामने प्रकट करती है।


श्लोक १६

पुत्रे जाते महापुण्ये इंद्रे च निहते सति । कुरु राज्यं महाभाग पुत्रेण मम दैवकम् ॥१६॥

भावार्थ:
दिति कहती है—जब मेरा महान् पुत्र जन्म ले लेगा और इन्द्र मारा जाएगा, तब हे महाभाग! तुम मेरे पुत्र के साथ राज्य करो।

व्याख्या:
दिति अपने विश्वासपात्र सेवक को भविष्य के राज्य में भागीदार बनाने की बात कहती है। वह समझती है कि इन्द्र के वध के बाद उसका पुत्र सत्ता प्राप्त करेगा। लेकिन जिस व्यक्ति के सामने वह यह योजना प्रकट कर रही है, वही इन्द्र है। इस प्रकार कथा में विश्वास और छल का विरोधाभास और गहरा हो जाता है।


श्लोक १७

एवमस्तु महाभागे ते प्रसादाद्भविष्यति । तस्याश्चैवांतरं प्रेप्सुरभवत्पाकशासनः ॥१७॥

भावार्थ:
इन्द्र ने कहा—हे महाभागे! आपकी कृपा से ऐसा ही होगा। परंतु पाकशासन इन्द्र उसके नियम में त्रुटि खोजने के अवसर की प्रतीक्षा करता रहा।

व्याख्या:
इन्द्र दिति के सामने उसकी इच्छा स्वीकार करता है, किंतु भीतर से अपने उद्देश्य पर अडिग रहता है। उसकी सहमति विश्वास बनाए रखने का साधन है। कथा इस प्रकार बाहरी वचन और वास्तविक अभिप्राय के अंतर को दिखाती है।


श्लोक १८

ऊने वर्षशते चास्या ददर्शांतरमच्युतः । अकृत्वा पादयोः शौचं दितिः शयनमाविशत् ॥१८॥

भावार्थ:
सौ वर्ष पूरे होने में कुछ समय शेष था, तभी इन्द्र को अवसर दिखाई दिया। एक दिन दिति ने अपने पैरों को धोए बिना ही शयन कर लिया।

व्याख्या:
दिति की दीर्घ तपस्या लगभग पूर्ण होने वाली थी। किंतु एक छोटी-सी असावधानी उसके नियम में व्यवधान बन जाती है। इन्द्र इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। कथा में यह क्षण निर्णायक मोड़ बनता है।


श्लोक १९

शय्यांते सा शिरः कृत्वा मुक्तकेशातिविह्वला । निद्रामाहारयामास तस्याः कुक्षिं प्रविश्य ह ॥१९॥

भावार्थ:
दिति अत्यंत थकी हुई अवस्था में खुले बालों के साथ शय्या पर लेट गई और सो गई। इसी समय इन्द्र उसके गर्भ में प्रवेश कर गया।

व्याख्या:
यहाँ दिति की थकान और निद्रा के कारण तपस्या के नियम में व्यवधान उत्पन्न होता है। इन्द्र इस अवसर का उपयोग करता है। कथा अब तक चल रही योजना को गर्भ के भीतर घटित होने वाली घटना से जोड़ देती है।


श्लोक २०

वज्रपाणिस्ततो गर्भं सप्तधा तं न्यकृंतत । वज्रेण तीक्ष्णधारेण रुरोद उदरे स्थितः ॥२०॥

भावार्थ:
वज्र धारण करने वाले इन्द्र ने अपने तीक्ष्ण वज्र से गर्भ को सात भागों में काट दिया। गर्भ के भीतर स्थित शिशु रोने लगा।

व्याख्या:
दिति जिस पुत्र को इन्द्र के वध के लिए प्राप्त करना चाहती थी, इन्द्र उसी गर्भ को नष्ट करने का प्रयास करता है। किंतु गर्भ का रोना और आगे इन्द्र का उसे बार-बार संबोधित करना बताता है कि यह घटना कथा में केवल विनाश तक सीमित नहीं रहती; इससे एक नए समूह की उत्पत्ति का प्रसंग जुड़ता है।


श्लोक २१

स गर्भस्तत्र विप्रेंद्रा इंद्रहस्तगतेन वै । रोदमानं महागर्भं तमुवाच पुनः पुनः ॥२१॥

भावार्थ:
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! इन्द्र के हाथ में पड़े उस गर्भ के भाग रो रहे थे। इन्द्र उस रोते हुए गर्भ से बार-बार बोलने लगा।

व्याख्या:
इन्द्र गर्भ को विभाजित करने के बाद भी उससे संवाद करता है। कथा में यह संवाद आगे मरुद्गणों के नामकरण और उनकी उत्पत्ति की भूमिका बनता है।


श्लोक २२

शतक्रतुर्महातेजा मा रोदीरित्यभाषत । सप्तधा कृतवाञ्छक्रस्तं गर्भं दितिजं पुनः ॥२२॥

भावार्थ:
महातेजस्वी शतक्रतु इन्द्र ने कहा—मत रोओ। उसने दिति के उस गर्भ को फिर सात भागों में विभाजित किया।

व्याख्या:
इन्द्र का “मत रोओ” कहना इस कथा में विशेष महत्त्व रखता है। गर्भ के विभाजन के साथ यह संबोधन जुड़ जाता है और आगे उन भागों को मरुत् नाम मिलने की पृष्ठभूमि बनती है।


श्लोक २३

एकैकं सप्तधा च्छित्त्वा रुदमानं स देवराट् । एवं वै मरुतो जातास्ते तु देवा महौजसः ॥२३॥

भावार्थ:
देवराज इन्द्र ने प्रत्येक भाग को सात-सात भागों में विभाजित किया। इस प्रकार वे महाबली देवता मरुत् उत्पन्न हुए।

व्याख्या:
गर्भ को विभाजित करने की घटना से मरुद्गणों की उत्पत्ति बताई गई है। कथा का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि जिस गर्भ से इन्द्र के लिए शत्रु उत्पन्न होना था, उसी से आगे चलकर देवताओं के समूह का जन्म होता है।


श्लोक २४

यथा इंद्रेण ते प्रोक्ता बभूवुर्नामभिस्ततः । अतिवीर्य महाकायास्तीव्र तेजः पराक्रमाः ॥२४॥

भावार्थ:
इन्द्र द्वारा संबोधित किए जाने के अनुसार उनके नाम प्रसिद्ध हुए। वे अत्यंत शक्तिशाली, विशालकाय, प्रचंड तेज और पराक्रम से युक्त थे।

व्याख्या:
मरुद्गणों का स्वरूप असाधारण शक्ति और तेज से युक्त बताया गया है। कथा में उनका जन्म किसी साधारण घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे परिणाम के रूप में सामने आता है जो आगे देवताओं के समूह में उनका स्थान निर्धारित करता है।


श्लोक २५

एकोना वै बभूवुस्ते पंचाशन्मरुतस्ततः । मरुतो नाम ते ख्याता इंद्रमेव समाश्रिताः ॥२५॥

भावार्थ:
वे मरुत् उनचास हुए। मरुद्गण नाम से प्रसिद्ध होकर वे इन्द्र के आश्रित हो गए।

व्याख्या:
यहाँ मरुद्गणों की संख्या और इन्द्र के साथ उनके संबंध का उल्लेख है। दिति के गर्भ से इन्द्र-विरोधी पुत्र उत्पन्न होने की संभावना थी, लेकिन कथा का परिणाम इसके विपरीत आता है: उसी गर्भ से उत्पन्न मरुद्गण इन्द्र के सहयोगी बन जाते हैं।


श्लोक २६

भूतानामेव सर्वेषां रोचयंति गणं महत् । निकायेषु निकायेषु हरिः प्रादात्प्रजापतिः ॥२६॥

भावार्थ:
वे सभी प्राणियों के समूहों में एक महत्त्वपूर्ण गण के रूप में प्रतिष्ठित हुए। प्रजापति हरि ने उन्हें विभिन्न समुदायों और समूहों में स्थान प्रदान किया।

व्याख्या:
कथा अब मरुद्गणों की उत्पत्ति से आगे बढ़कर सृष्टि में उनके स्थान की चर्चा करती है। अलग-अलग गणों और निकायों में उनका प्रतिष्ठित होना सृष्टि की विविध व्यवस्था का संकेत है।


श्लोक २७

क्रमशस्तानि राज्यानि पृथुपूर्वाणि तानि वै । स देवः पुरुषः कृष्णः सर्वव्यापी जगद्गुरुः ॥२७॥

भावार्थ:
सृष्टि में विभिन्न राज्य और व्यवस्थाएँ क्रमशः स्थापित हुईं। वही देव, पुरुष, कृष्ण, सर्वव्यापी और जगद्गुरु इस समस्त व्यवस्था के आधार हैं।

व्याख्या:
यहाँ कथा मरुद्गणों के प्रसंग से व्यापक सृष्टि-विधान की ओर मुड़ती है। विभिन्न राज्यों और व्यवस्थाओं के पीछे सर्वव्यापी पुरुष का उल्लेख किया गया है। इससे कथा का दृष्टिकोण किसी एक पात्र या घटना से आगे समस्त जगत् तक विस्तृत होता है।


श्लोक २८

तपोजिष्णुर्महातेजाः सर्व एकः प्रजापतिः । पर्जन्यः पावकः पुण्यः सर्वात्मा सर्व एव हि ॥२८॥

भावार्थ:
वही तप से विजय प्राप्त करने वाला, महातेजस्वी, एक प्रजापति, पर्जन्य, पावक, पवित्र और सबका आत्मस्वरूप है।

व्याख्या:
इस श्लोक में एक ही व्यापक सत्ता के अनेक नाम और रूप प्रस्तुत किए गए हैं। प्रजापति, पर्जन्य और पावक जैसे नाम सृष्टि की विभिन्न शक्तियों की ओर संकेत करते हैं, जबकि “सर्वात्मा” इन सबको एक व्यापक आधार से जोड़ता है।


श्लोक २९

तस्य सर्वमिदं पुण्यं जगत्स्थावरजंगमम् । भूतसर्गमिमं सम्यग्जानतो द्विजसत्तम ॥२९॥

भावार्थ:
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणों! यह समस्त जगत्, जिसमें स्थावर और जंगम सभी प्राणी सम्मिलित हैं, उसी का है। जो इस भूत-सृष्टि को ठीक प्रकार से जान लेता है—

व्याख्या:
यहाँ सृष्टि के समस्त रूपों को एक व्यापक आधार से संबंधित बताया गया है। स्थावर और जंगम—अर्थात् स्थिर तथा गतिशील—दोनों प्रकार की सृष्टि इसी व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं। इसके बाद अगला श्लोक इस ज्ञान के परिणाम को बताता है।


श्लोक ३०

नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुतः । इमां सृष्टिं महापुण्यां सर्वपापहरां शुभाम् ॥३०॥

भावार्थ:
ऐसे ज्ञानवान व्यक्ति को पुनरावृत्ति का भय नहीं रहता, फिर परलोक का भय कहाँ रह जाता है? यह सृष्टि महान् पुण्यदायी, पापों को दूर करने वाली और कल्याणकारी है।

व्याख्या:
यहाँ सृष्टि के ज्ञान को भय से मुक्ति के साथ जोड़ा गया है। जो व्यक्ति सृष्टि के व्यापक विधान को समझता है, वह जन्म, पुनरावृत्ति और परलोक को लेकर भय में नहीं रहता। कथा अब केवल मरुद्गणों की उत्पत्ति नहीं रह जाती, बल्कि सृष्टि के ज्ञान और उससे प्राप्त होने वाली परम गति की चर्चा बन जाती है।


श्लोक ३१

यः शृणोति नरो भक्त्या सर्वपापैः प्रमुच्यते । स हि धन्यश्च पुण्यश्च स हि सत्यसमन्वितः ॥३१॥

भावार्थ:
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को सुनता है, वह सभी पापों से मुक्त होता है। वह धन्य, पुण्यवान और सत्य से युक्त होता है।

व्याख्या:
पुराण यहाँ कथा-श्रवण को केवल मनोरंजन या घटनाओं की जानकारी प्राप्त करने का साधन नहीं मानता। श्रद्धा के साथ सृष्टि-विधान को सुनना व्यक्ति के आचरण और दृष्टि को शुद्ध करने वाला माना गया है।


श्लोक ३२

यः शृणोति इमां सृष्टिं स याति परमां गतिम् । सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥३२॥

भावार्थ:
जो इस सृष्टि-वर्णन को सुनता है, वह परम गति प्राप्त करता है। पापों से विशुद्ध आत्मा विष्णुलोक को जाती है।

व्याख्या:
अध्याय का समापन सृष्टि के ज्ञान और परम गति के संबंध से होता है। कथा दिति के पुत्र-शोक से आरंभ हुई थी; फिर संकल्प, तपस्या, इन्द्र के छल, गर्भ-विभाजन और मरुद्गणों की उत्पत्ति से गुजरी। अंत में यह समस्त घटनाक्रम व्यापक सृष्टि-विधान और विष्णु की सर्वव्यापकता से जुड़ जाता है।


अध्याय २६ का समग्र भाव

इस अध्याय में दिति की तपस्या, इन्द्र की छिपी हुई योजना और मरुद्गणों की उत्पत्ति एक ही घटनाक्रम के अंग हैं। दिति जिस पुत्र को इन्द्र-वध के लिए चाहती है, उसके गर्भ से अंततः मरुद्गण उत्पन्न होते हैं, जो इन्द्र के आश्रित बन जाते हैं। इस प्रकार संकल्प का परिणाम उसी रूप में नहीं आता जिसकी अपेक्षा की गई थी।

अध्याय के अंतिम श्लोक कथा को सृष्टि के व्यापक विधान तक ले जाते हैं। स्थावर-जंगम जगत्, प्रजापति, पर्जन्य, पावक और सर्वात्मा का उल्लेख यह स्पष्ट करता है कि पुराण की दृष्टि में किसी एक घटना को समझने के लिए उसे समस्त सृष्टि के क्रम से जोड़कर देखना आवश्यक है।

इस अध्याय की विचार-यात्रा तीन मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित है:

  1. दिति का संकल्प और सौ वर्ष की तपस्या।
  2. इन्द्र का छल तथा उसी गर्भ से मरुद्गणों की उत्पत्ति।
  3. मरुद्गणों की कथा से सर्वव्यापी सृष्टि-विधान और परम गति तक पहुँचना।

त्रिकालदर्शी

मरुद्गणों की उत्पत्ति का रहस्य

पद्मपुराण, महाभारत और ऋग्वेद के मरुत्सूक्त के संदर्भ में

१. एक घटना, दो पुराणेतिहासिक आख्यान

पद्मपुराण के भूमिखण्ड के छब्बीसवें अध्याय में मरुद्गणों की उत्पत्ति का जो वर्णन मिलता है, वह एक असाधारण घटना के रूप में सामने आता है। इससे पहले के अध्यायों में दिति के पुत्र बल और वृत्र का वध हो चुका है। दिति अपने पुत्रों की मृत्यु से दुःखी होकर कश्यप से इन्द्र का वध करने में समर्थ पुत्र प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करती है।

कश्यप उसकी इच्छा स्वीकार करते हैं, लेकिन इसके लिए सौ वर्ष तक शुद्धता और तपस्या का नियम निर्धारित करते हैं। दिति तपस्या में प्रवृत्त होती है। दूसरी ओर, इन्द्र को ज्ञात हो जाता है कि दिति का संकल्प उसके लिए संकट उत्पन्न कर सकता है। वह ब्राह्मण का रूप धारण करके दिति के समीप पहुँचता है और उसकी सेवा करने लगता है।

दिति इन्द्र को पहचान नहीं पाती। वह उसे अपना हितैषी समझती है और उसकी सेवा से संतुष्ट होकर अपने भावी पुत्र के विषय में उससे बात भी करती है। इन्द्र इसी विश्वास के बीच दिति के नियम में त्रुटि की प्रतीक्षा करता रहता है।

जब सौ वर्ष पूरे होने में कुछ समय शेष रह जाता है, तब एक दिन दिति बिना पैरों की शुद्धि किए शयन कर लेती है। इन्द्र इस अवसर का उपयोग करके उसके गर्भ में प्रवेश करता है और गर्भ को अपने वज्र से विभाजित कर देता है। अंततः इसी घटना से मरुद्गणों की उत्पत्ति का वर्णन सामने आता है।

२. महाभारत के आदिपर्व में भी यही प्रसंग

इस घटना की विशेषता यह है कि मरुद्गणों की उत्पत्ति का यह प्रसंग केवल पद्मपुराण तक सीमित नहीं है। महाभारत के आदिपर्व में भी दिति, इन्द्र, गर्भ-विभाजन और मरुद्गणों की उत्पत्ति से संबंधित कथा मिलती है।

दोनों ग्रंथों में कथा का केंद्रीय घटनाक्रम समान है—दिति का पुत्र-प्राप्ति के लिए संकल्प, इन्द्र की निगरानी और छल, गर्भ में प्रवेश, गर्भ का विभाजन और मरुद्गणों का जन्म।

इस समानता को ध्यान में रखना आवश्यक है। जब एक ही असाधारण घटना दो अलग ग्रंथों में लगभग उसी मूल घटनाक्रम के साथ सामने आती है, तब केवल कथा को दोहरा देना पर्याप्त नहीं रह जाता। यह देखना आवश्यक हो जाता है कि इन आख्यानों के पीछे कौन-सा मूल विषय सुरक्षित है और उसे समझने के लिए किन अन्य वैदिक संदर्भों की आवश्यकता पड़ती है।

३. गर्भ-विभाजन और सात मरुद्गणों का प्रश्न

पद्मपुराण के छब्बीसवें अध्याय में गर्भ को विभाजित करने की घटना के बाद मरुद्गणों की उत्पत्ति का वर्णन आता है। यहाँ गर्भ-विभाजन और मरुद्गणों के जन्म के बीच सीधा कथात्मक संबंध स्थापित किया गया है।

यही वह बिंदु है जिस पर हमें विशेष ध्यान देना होगा।

कथा में इन्द्र केवल गर्भ का नाश करने का प्रयास नहीं करता; उसके कार्य के परिणामस्वरूप मरुद्गणों का जन्म होता है। इस प्रकार विनाश का उद्देश्य और उससे उत्पन्न परिणाम एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं। जिस गर्भ से इन्द्र के वध के लिए पुत्र उत्पन्न होना था, उसी से आगे चलकर मरुद्गणों का समूह प्रकट होता है।

अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि मरुद्गण कौन थे। प्रश्न यह भी है कि उनकी उत्पत्ति को गर्भ-विभाजन की इस विशिष्ट घटना से क्यों जोड़ा गया है और इस प्रसंग में सात की संख्या का क्या महत्त्व है।

इन प्रश्नों का समाधान केवल कथा के शब्दों को दोहराने से नहीं होगा। हमें उन मूल मंत्रों की ओर जाना होगा जिनमें मरुतों का वर्णन मिलता है।

४. ऋग्वेद का मरुत्सूक्त—अध्ययन का अगला आधार

ऋग्वेद के प्रथम मण्डल का पचासीवाँ सूक्त मरुत्सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें बारह मंत्र हैं। इस सूक्त में मरुतों के स्वरूप, उनकी शक्तियों, उनकी गति, उनके कार्यों और द्यावापृथिवी से उनके संबंध का वर्णन मिलता है।

सूक्त के प्रथम मंत्र में ही मरुतों को रुद्र के पुत्र कहा गया है और उनके कार्यों को द्यावापृथिवी की वृद्धि से जोड़ा गया है। आगे के मंत्रों में उनकी शक्ति, गति, तेज, रथ, आयुध और विभिन्न कार्यों का विस्तार मिलता है।

इसलिए अब हमारा ध्यान इसी सूक्त पर केंद्रित होगा। हम इसके सभी बारह मंत्रों को क्रम से पढ़ेंगे और प्रत्येक मंत्र के शब्दों, पदों तथा उनके पारस्परिक संबंधों पर विचार करेंगे।

अभी किसी एक मंत्र को अलग करके अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। पहले पूरे सूक्त का विषय और उसकी आंतरिक निरंतरता समझनी आवश्यक है।

५. कथा से मूल विषय की ओर

पद्मपुराण और महाभारत के समान प्रसंग ने हमें मरुद्गणों की उत्पत्ति के प्रश्न तक पहुँचाया है। अब ऋग्वेद का मरुत्सूक्त इस प्रश्न की अगली कड़ी बनेगा।

हम पहले यह समझने का प्रयास करेंगे कि ऋग्वेद मरुतों के बारे में क्या कहता है, उनकी उत्पत्ति और स्वरूप को किन शब्दों में व्यक्त करता है तथा उनके कार्यों का अन्य वैदिक विषयों से क्या संबंध है।

इसके बाद आवश्यकता हुई तो दूसरे मरुत्सूक्तों और संबंधित मंत्रों को भी सामने रखा जाएगा। इस प्रकार अध्ययन का क्रम कथा से मंत्र की ओर और मंत्र से उसके व्यापक विषय की ओर बढ़ेगा।

हमारा उद्देश्य किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष को सिद्ध करना नहीं, बल्कि मूल मंत्रों के क्रमिक अध्ययन से उस विषय को स्पष्ट करना है जो पद्मपुराण और महाभारत की समान कथा में हमारे सामने आया है।

इसी उद्देश्य से अब ऋग्वेद १.८५ के सभी बारह मंत्रों का क्रमशः अध्ययन आरंभ किया जाएगा।

त्रिकालदर्शी

ऋग्वेद १.८५.१ — मरुत्सूक्त का प्रथम मंत्र

शब्द-दर-शब्द व्याख्या

मूल मंत्र

प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामन्रुद्रस्य सूनवः सुदंससः । रोदसी हि मरुतश्चक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वयः ॥१॥

१. प्र

शब्दार्थ: आगे, प्रकट रूप से, विशेष रूप से, विस्तारपूर्वक।

व्याख्या: मंत्र के आरंभ में ‘प्र’ क्रिया को विशेष गति और विस्तार प्रदान करता है। यहाँ आगे आने वाला वर्णन मरुतों की किसी स्थिर अवस्था का नहीं, बल्कि उनके प्रकट होने और सक्रिय रूप से कार्य करने का है।

२. ये

शब्दार्थ: जो, वे।

व्याख्या: यह पद उन शक्तियों की ओर संकेत करता है जिनका वर्णन मंत्र आगे करता है। अगले पदों में उनका स्वरूप, गति और कार्यक्षमता स्पष्ट होती है।

३. शुम्भन्ते

शब्दार्थ: सुशोभित होते हैं, स्वयं को सज्जित या प्रकाशित करते हैं।

व्याख्या: यह पद मरुतों के तेजस्वी और सुसज्जित स्वरूप को प्रकट करता है। उनके व्यक्त होने में शोभा, शक्ति और प्रभाव तीनों जुड़े हुए हैं।

४. जनयः

शब्दार्थ: जनन करने वाली शक्तियाँ, स्त्रीलिंग बहुवचन में जननशील या सृजनकारी सत्ताएँ; संदर्भ के अनुसार समूह अथवा स्त्री-स्वरूप का बोध भी।

व्याख्या: इस पद पर विशेष ध्यान देना होगा। मंत्र में मरुतों के वर्णन के बीच ‘जनयः’ का प्रयोग आया है। इसलिए मरुतों के स्वरूप को समझते समय जनन, उत्पत्ति और सृजन से जुड़े अर्थ-संबंधों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।

५. न

शब्दार्थ: जैसे, के समान।

व्याख्या: यहाँ ‘न’ तुलना का बोध कराता है। मंत्र मरुतों के स्वरूप को एक उपमा के माध्यम से स्पष्ट करता है।

६. सप्तयः

शब्दार्थ: घोड़े, विशेष रूप से तीव्र गति से चलने वाले अश्व; वैदिक संदर्भ में गति और शक्ति का बोध कराने वाला पद।

व्याख्या: ‘सप्तयः’ मंत्र का एक महत्त्वपूर्ण पद है। इसके साथ ‘जनयो न’ जुड़ने पर मरुतों की शोभा और उनकी गतिशीलता को उपमा के माध्यम से व्यक्त किया गया है। यहाँ ‘सप्त’ से संबंधित ध्वनि पर ध्यान जा सकता है, लेकिन केवल इस शब्द के आधार पर सात मरुतों की संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती। इस प्रश्न को पूरे सूक्त के संदर्भ में देखना होगा।

७. यामन्

शब्दार्थ: गति में, यात्रा में, गमन के समय या मार्ग में।

व्याख्या: यह पद गति और क्रियाशीलता को सामने लाता है। मरुतों का स्वरूप केवल उनकी शक्ति से नहीं, बल्कि उस शक्ति की गति और उसके कार्य करने के ढंग से भी समझा जाता है।

८. रुद्रस्य

शब्दार्थ: रुद्र का।

व्याख्या: यह पद मरुतों के संबंध को रुद्र से जोड़ता है। आगे आने वाला ‘सूनवः’ इसी संबंध को स्पष्ट करता है।

९. सूनवः

शब्दार्थ: पुत्र, संतानें।

व्याख्या: ‘रुद्रस्य सूनवः’ का अर्थ है—रुद्र के पुत्र। मरुतों की उत्पत्ति और उनके समूहगत स्वरूप पर विचार करते समय यह संबंध महत्त्वपूर्ण है। पद्मपुराण में दिति के गर्भ से मरुद्गणों की उत्पत्ति का जो प्रसंग आया है, उसके साथ इस वैदिक पद को ध्यान में रखकर आगे के मंत्रों का अध्ययन किया जा सकता है।

१०. सुदंससः

शब्दार्थ: उत्तम कर्म करने वाले, अद्भुत कार्यों में समर्थ, उत्कृष्ट कार्यक्षमता वाले।

व्याख्या: मरुतों को यहाँ ऐसे शक्तिशाली समूह के रूप में चित्रित किया गया है जो असाधारण कार्य करने में समर्थ हैं। उनका तेज केवल बाहरी शोभा तक सीमित नहीं, बल्कि उनके कार्यों में भी प्रकट होता है।


मंत्र का दूसरा भाग

११. रोदसी

शब्दार्थ: द्यावापृथिवी—द्युलोक और पृथ्वी; दोनों व्यापक क्षेत्रों का संयुक्त बोध।

व्याख्या: यह पद मंत्र के विषय को व्यापक जगत् से जोड़ता है। मरुतों की क्रियाशीलता का संबंध केवल किसी छोटे क्षेत्र से नहीं, बल्कि द्यावापृथिवी की व्यवस्था से है।

१२. हि

शब्दार्थ: निश्चय ही, वास्तव में, क्योंकि।

व्याख्या: यह पद कथन पर बल देता है। इसके द्वारा मरुतों और रोदसी के संबंध को विशेष महत्त्व दिया गया है।

१३. मरुतः

शब्दार्थ: मरुत्; बहुवचन में मरुतों का समूह।

व्याख्या: यही इस सूक्त का केंद्रीय विषय है। पहले भाग में उनके तेज, गति, जनन-संबंध और कार्यक्षमता का वर्णन हुआ; अब उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य का उल्लेख आता है।

१४. चक्रिरे

शब्दार्थ: उन्होंने किया, बनाया, स्थापित किया या अपने लिए निर्मित किया—संदर्भानुसार।

व्याख्या: यह क्रिया मरुतों की सक्रिय भूमिका को व्यक्त करती है। वे केवल किसी व्यवस्था में उपस्थित नहीं हैं, बल्कि उसके निर्माण अथवा विस्तार में भाग लेते हैं।

१५. वृधे

शब्दार्थ: वृद्धि के लिए, बढ़ाने के लिए, विकास या विस्तार के लिए।

व्याख्या: ‘चक्रिरे वृधे’ का संयुक्त भाव है—उन्होंने वृद्धि या विस्तार के लिए कार्य किया। इससे मरुतों की शक्ति का संबंध विकास और विस्तार से स्थापित होता है।

१६. मदन्ति

शब्दार्थ: आनंदित होते हैं, उत्साहित होते हैं, उल्लास प्रकट करते हैं।

व्याख्या: यह पद मरुतों की सक्रियता के साथ उनके उत्साह और प्रचंड ऊर्जा का भी बोध कराता है।

१७. वीराः

शब्दार्थ: वीर, शक्तिशाली, पराक्रमी।

व्याख्या: मरुतों को यहाँ वीर कहा गया है। उनके कार्यों में साहस, शक्ति और पराक्रम का महत्त्व है।

१८. विदथेषु

शब्दार्थ: विदथों में—वैदिक सभाओं, सामूहिक अनुष्ठानों अथवा कार्य-संयोजन के अवसरों में।

व्याख्या: यह पद मरुतों की गतिविधियों को एक सामूहिक क्षेत्र से जोड़ता है। वे अपने कार्यों में समूहगत रूप से सक्रिय होते हैं।

१९. घृष्वयः

शब्दार्थ: प्रबल, साहसी, आक्रमणशील अथवा तीव्र क्रियाशीलता वाले।

व्याख्या: मंत्र के अंतिम पद में मरुतों की प्रचंडता और सक्रियता पर बल दिया गया है। इससे उनके वीरत्व और कार्यक्षमता का वर्णन पूर्ण होता है।


पूरे मंत्र का संयुक्त भावार्थ

मरुत तेजस्वी, गतिशील और अद्भुत कार्य करने में समर्थ शक्तियों का समूह हैं। वे रुद्र के पुत्र कहे गए हैं। उनकी शोभा और गति को उपमा के माध्यम से व्यक्त किया गया है। वे द्यावापृथिवी की वृद्धि और विस्तार से जुड़े हैं तथा सामूहिक कार्यों में वीरतापूर्वक सक्रिय रहते हैं।

इस मंत्र में विशेष रूप से चार विषय सामने आते हैं:

  1. मरुतों का समूहगत स्वरूप।
  2. रुद्र के पुत्र होने का संबंध।
  3. गति, तेज और अद्भुत कार्यक्षमता।
  4. द्यावापृथिवी की वृद्धि और विस्तार से संबंध।

पद्मपुराण के प्रसंग से आगे का संबंध

पद्मपुराण के भूमिखण्ड में मरुद्गणों की उत्पत्ति गर्भ-विभाजन की घटना से जोड़ी गई है। ऋग्वेद १.८५.१ में मरुतों को रुद्र के पुत्र कहा गया है और उनके समूहगत स्वरूप का वर्णन मिलता है। इन दोनों संदर्भों को साथ रखकर अभी इतना स्पष्ट होता है कि मरुतों की उत्पत्ति, उनकी सामूहिकता और उनकी शक्ति को समझने के लिए केवल एक मंत्र पर्याप्त नहीं होगा।

अगले मंत्रों में यह देखना होगा कि मरुतों की गति, उनके स्वरूप, उनके कार्य और उनकी उत्पत्ति के विषय में कौन-से अतिरिक्त संकेत मिलते हैं। विशेष रूप से ‘सप्तयः’ और ‘जनयः’ जैसे पदों को पूरे सूक्त के संदर्भ में फिर से देखना उपयोगी होगा।

ऋग्वेद १.८५.१ — सप्त रूप, जीव और पदार्थ के रूपांतरण का रहस्य

मंत्र

प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामन्रुद्रस्य सूनवः सुदंससः । रोदसी हि मरुतश्चक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वयः ॥१॥

१. प्र ये शुम्भन्ते — प्राचीन व्यवस्था और शुभ गुणों का रूपांतरण

मंत्र के आरंभ में प्र प्राचीन काल की ओर संकेत करता है। शुम्भन्ते शुभ गुणों से संबंधित है। इस व्याख्या में उस अवस्था पर ध्यान दिया जाता है, जब जीवन के भीतर शुभ गुणों की पुरानी व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी और एक नई प्रक्रिया के माध्यम से जीव तथा पदार्थ के स्वरूप को समझने की आवश्यकता उत्पन्न हुई।

२. जनयो न सप्तयो — जीव के भीतर सात रूपों की अभिव्यक्ति

जनयः मनुष्यों के जीवन अथवा जीव के भीतर की अवस्था को व्यक्त करता है। न उपमा का संकेत देता है और सप्तयः सात रूपों की ओर ध्यान ले जाता है।

यहाँ सात की संख्या एक व्यापक सूत्र बन जाती है। सप्तधातु, सप्तर्षि और सात प्रकार के अनाज जैसे संदर्भ इसी संख्या की विभिन्न अभिव्यक्तियों पर विचार करने का आधार बनते हैं।

इस संदर्भ में अथर्ववेद का यह मंत्र भी महत्त्वपूर्ण है:

त्रि सप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषामद्य दधातु मे॥

यहाँ त्रि-सप्त अर्थात् तीन और सात के संबंध से इक्कीस रूपों का प्रसंग सामने आता है। इस विचार-श्रृंखला में मूल अणु, उसके विभाजन और अनेक रूपों में उसकी अभिव्यक्ति के संबंध को समझने का प्रयास किया जाता है।

३. यामन् रुद्रस्य सूनवः — आयाम और जीव-शरीर का संबंध

यामन् आयाम से संबंधित है। इस प्रकार सात रूपों की अभिव्यक्ति को अलग-अलग आयामों में देखने का सूत्र मिलता है।

रुद्रस्य सूनवः में पुत्र और पिता का संबंध सामने आता है। यहाँ जीव तथा उसके शरीर का संबंध इसी आधार पर समझा जाता है कि शरीर जीव से पृथक् दिखाई देने पर भी उसके जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम है।

जीव और शरीर का संबंध केवल बाहरी आकार तक सीमित नहीं रहता; उसके भीतर उन घटकों और प्रक्रियाओं का संबंध भी शामिल है जिनसे शरीर निर्मित तथा संचालित होता है।

४. सुदंससः — सुंदर अंश और भाग का संबंध

सुदंससः को इस व्याख्या में सुंदर अंश, हिस्सा अथवा भाग के रूप में समझा जाता है।

सूर्य और पृथ्वी का संबंध इसका उदाहरण बनता है। पृथ्वी सूर्य से अलग दिखाई देती है, लेकिन दोनों के बीच ऐसा संबंध है जिसमें एक दूसरे से निरपेक्ष नहीं है। इसी प्रकार किसी पूर्ण व्यवस्था के अंश को समझने के लिए उसके मूल और अन्य अंशों के साथ उसके संबंध को देखना आवश्यक है।

५. रोदसी — परस्पर रूपांतरण और पाचन की प्रक्रिया

रोदसी को यहाँ परस्पर संबंधित दो क्षेत्रों के रूप में देखा जाता है, जिनके बीच निरंतर क्रिया होती है।

शरीर के भीतर भोजन के पाचन से सप्तधातुओं की उत्पत्ति का उदाहरण सामने आता है। भोजन अपने मूल रूप में बना नहीं रहता; वह शरीर की प्रक्रियाओं से गुजरकर विभिन्न घटकों में रूपांतरित होता है।

इसी प्रकार बाहरी जगत् में सप्तर्षि, तारे और ग्रह एक व्यापक व्यवस्था में परस्पर संबंधित दिखाई देते हैं। इस व्याख्या में शरीर के भीतर की प्रक्रिया और बाहरी जगत् की व्यवस्था को एक ही विचार-श्रृंखला में रखकर देखा जाता है।

६. हि मरुतः — मृत्यु से परे रहने वाला तत्त्व

हि निश्चय और सार्वभौमिक सत्य पर बल देता है।

मरुतः को इस व्याख्या में मृत्यु से बाहर रहने वाले उस तत्त्व से जोड़ा जाता है, जिसके अस्तित्व को जीव अपनी इच्छा मात्र से समाप्त नहीं कर सकता। जीव के शरीर में परिवर्तन हो सकता है, लेकिन यहाँ विचार का केंद्र उस तत्त्व की सत्ता है जो शरीर के परिवर्तन से स्वतंत्र रूप में विद्यमान रहती है।

७. चक्रिरे वृधे — पदार्थ का निरंतर रूपांतरण और वृद्धि

चक्रिरे चक्र के समान निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का संकेत देता है। पदार्थ अपने एक रूप से दूसरे रूप में बदलता है और यह रूपांतरण किसी स्थिर अवस्था पर समाप्त नहीं हो जाता।

वृधे वृद्धि को व्यक्त करता है। इस विचार में पदार्थ के रूपांतरण और उसके विविध रूपों की वृद्धि को एक-दूसरे से संबंधित माना जाता है।

८. मदन्ति वीरा — अहंकार का अंत और वीर्य का धारण

मदन्ति को मद अथवा अहंकार के संदर्भ में समझा जाता है। मरुतों के संसर्ग से जीव के भीतर अहंकार का अंत होने की प्रक्रिया सामने आती है।

वीराः पराक्रम तथा वीर्य धारण करने वालों का संकेत देता है। इस क्रम में जीव अहंकार से मुक्त होकर अपने पराक्रम को धारण करता है। ब्रह्मचर्य इस अवस्था का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष बनता है।

९. विदथेषु घृष्वयः — ज्ञान का विभाजन, सार का मंथन और बोध

विदथेषु ज्ञान और बोध के क्षेत्र को सामने लाता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए किसी विषय को उसके अलग-अलग भागों में समझना, उन भागों के पारस्परिक संबंध को देखना और उसके सार को पहचानना आवश्यक है।

घृष्वयः को इस क्रम में सार को मथकर प्राप्त करने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है। जीव अपने ज्ञान-बोध से विषयों को अलग-अलग करता है, उनका मनन-चिंतन करता है और उनके भीतर निहित सार को ग्रहण करता है।

इस प्रकार मंत्र की विचार-यात्रा सात रूपों की अभिव्यक्ति से आरंभ होकर जीव, शरीर, पदार्थ के रूपांतरण, अहंकार के अंत और ज्ञान के सार की प्राप्ति तक पहुँचती है।

ऋग्वेद १.८५.२ — शब्द-दर-शब्द व्याख्या

मंत्र

त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः । अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः ॥२॥

१. त — वे, वे सभी

त उन शक्तियों की ओर संकेत करता है जिनका उल्लेख पिछले मंत्र में हुआ है। यहाँ विचार की निरंतरता बनी रहती है। पिछले मंत्र में जिन मरुतों के स्वरूप, सात रूपों और क्रियाशीलता का प्रसंग आया था, उसी विषय को आगे बढ़ाया जा रहा है।

२. उक्षितासः — सींचे हुए, पोषित और विकसित

उक्षितासः का संबंध सींचने, पोषण करने तथा वृद्धि प्राप्त करने से है। इस पद में किसी ऐसी अवस्था का संकेत है जिसमें पोषण के कारण शक्ति विकसित होती है।

पिछले मंत्र के वृधे पद के साथ इसे देखने पर वृद्धि और पोषण के बीच संबंध सामने आता है। किसी शक्ति की अभिव्यक्ति के लिए उसका पोषण और विकास भी आवश्यक है।

३. महिमानम् — महिमा, विशालता और व्यापक सामर्थ्य

महिमानम् महिमा, महानता और व्यापक सामर्थ्य को व्यक्त करता है।

यहाँ पोषित शक्तियों की परिणति उनके महत्त्व और विस्तार में दिखाई देती है। जिस शक्ति का विकास होता है, उसकी कार्यक्षमता और प्रभाव भी व्यापक रूप ग्रहण करते हैं।

४. आशत — प्राप्त किया, पहुँचे

आशत का संबंध प्राप्त करने अथवा किसी अवस्था तक पहुँचने से है।

इस प्रकार उक्षितासो महिमानमाशत का संयुक्त भाव है—वे पोषित शक्तियाँ महिमा अथवा व्यापक सामर्थ्य तक पहुँचीं।

५. दिवि — द्युलोक में, प्रकाशमान क्षेत्र में

दिवि का सामान्य अर्थ द्युलोक अथवा आकाशीय क्षेत्र में है। इस पद को समझने में द्युति, प्रकाश और उच्चतर क्षेत्र का संबंध भी ध्यान में आता है।

पहले मंत्र के रोदसी पद और इस मंत्र के दिवि पद को साथ रखने पर बाहरी विस्तार तथा उच्चतर क्षेत्र में शक्ति की स्थिति का प्रश्न सामने आता है।

६. रुद्रासः — रुद्र से संबंधित शक्तियाँ

रुद्रासः रुद्र से संबंधित बहुवचन पद है। पहले मंत्र में रुद्रस्य सूनवः आया था; यहाँ उसी संबंध को आगे बढ़ाते हुए रुद्रों का उल्लेख किया गया है।

इस प्रकार दोनों मंत्रों के बीच एक सीधा सूत्र बनता है—पहले मंत्र में रुद्र के पुत्रों का उल्लेख और दूसरे में रुद्रों की स्थिति तथा उनके कार्यों का वर्णन।

७. अधि — ऊपर, पर, किसी आधार पर स्थित

अधि किसी आधार पर स्थित होने, ऊपर रहने अथवा किसी क्षेत्र पर अधिकारपूर्वक स्थापित होने का अर्थ देता है।

इस पद का संबंध अगले शब्द चक्रिरे और सदः से जुड़ता है। इससे किसी स्थान या आधार पर स्थिति स्थापित करने की बात सामने आती है।

८. चक्रिरे — बनाया, स्थापित किया, धारण किया

चक्रिरे का संबंध करने, बनाने अथवा स्थापित करने से है।

पहले मंत्र में चक्रिरे पद वृधे के साथ आया था, जहाँ वृद्धि की प्रक्रिया सामने थी। यहाँ इसका संबंध सदः से है, जिससे स्थिति या स्थान की स्थापना का भाव निकलता है।

९. सदः — स्थान, आसन अथवा निवास

सदः का अर्थ बैठने का स्थान, आसन अथवा निवास-स्थान है।

अधि चक्रिरे सदः का संयुक्त भाव है—उन्होंने अपना स्थान स्थापित किया अथवा किसी आधार पर स्थित हुए।

इस पद से शक्ति की केवल गति ही नहीं, बल्कि उसकी स्थिति और कार्यक्षेत्र का प्रश्न भी जुड़ता है।

१०. अर्चन्तः — अर्चना करते हुए, प्रकाशित करते हुए

अर्चन्तः का संबंध अर्चना, स्तुति तथा प्रकाशमान करने से है।

इस पद में सक्रिय क्रिया का भाव है। यहाँ वर्णित शक्तियाँ केवल किसी स्थान पर स्थित नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी क्रिया में संलग्न हैं जिसका संबंध अगले पद अर्कम् से है।

११. अर्कम् — स्तुति, तेज अथवा प्रकाश से संबंधित अभिव्यक्ति

अर्कम् का अर्थ स्तुति, स्तोत्र अथवा तेजस्वी अभिव्यक्ति से संबंधित है। वैदिक प्रयोग में इसका अर्थ संदर्भ के अनुसार समझा जाता है।

अर्चन्तो अर्कम् में दोनों पद एक-दूसरे से जुड़े हैं—अर्चना अथवा प्रकाशमान अभिव्यक्ति की क्रिया और उसका विषय।

१२. जनयन्तः — उत्पन्न करते हुए, जन्म देते हुए

जनयन्तः का अर्थ उत्पन्न करते हुए अथवा जन्म देते हुए है।

यह पद मंत्र में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत करता है। इससे पहले पोषण, महिमा और स्थान की स्थापना का उल्लेख था; अब उत्पत्ति की क्रिया सामने आती है।

इस प्रकार मंत्र की विचार-श्रृंखला में पोषण और विकास के बाद सृजन अथवा उत्पत्ति का प्रसंग जुड़ता है।

१३. इन्द्रियम् — सामर्थ्य, शक्ति अथवा कार्य करने की क्षमता

इन्द्रियम् का संबंध शक्ति, सामर्थ्य और कार्य करने की क्षमता से है। संदर्भ के अनुसार यह इन्द्रिय अथवा प्रभावशाली शक्ति का अर्थ भी देता है।

जनयन्त इन्द्रियम् का संयुक्त भाव है—शक्ति या सामर्थ्य को उत्पन्न करते हुए।

इस पद को पहले मंत्र के वीराः और घृष्वयः से जोड़कर देखने पर शक्ति, पराक्रम और सक्रिय कार्यक्षमता का संबंध सामने आता है।

१४. अधि — ऊपर, पर अथवा किसी आधार पर

इस मंत्र में अधि दूसरी बार आया है। पहले इसका संबंध सदः से था; अब इसका संबंध श्रियो दधिरे से है।

एक ही पद का पुनः प्रयोग दोनों स्थानों पर संबंध स्थापित करने का काम करता है, लेकिन उसके साथ जुड़े शब्दों के कारण उसका संदर्भ बदल जाता है।

१५. श्रियः — शोभाएँ, समृद्धियाँ, वैभव

श्रियः का संबंध श्री, शोभा, समृद्धि और वैभव से है।

यहाँ शक्ति की उत्पत्ति के बाद उसके साथ शोभा अथवा समृद्धि का संबंध स्थापित होता है। इस क्रम में महिमा, सामर्थ्य और श्री—तीनों पद विकास की अलग-अलग अवस्थाओं पर विचार करने का अवसर देते हैं।

१६. दधिरे — धारण किया, धारण करने लगे

दधिरे का अर्थ धारण किया अथवा अपने भीतर स्थापित किया है।

अधि श्रियो दधिरे का संयुक्त भाव है—उन्होंने श्री अथवा समृद्धि को धारण किया।

यहाँ क्रिया का केंद्र केवल उत्पत्ति नहीं, बल्कि किसी गुण या सामर्थ्य को अपने भीतर धारण करना भी है।

१७. पृश्निमातरः — पृश्नि को माता मानने वाले

पृश्नि वैदिक साहित्य में विविध संदर्भों में प्रयुक्त नाम है। मरुतों के प्रसंग में पृश्नि को उनकी माता कहा गया है। मातरः का अर्थ माताएँ अथवा माता से संबंधित होने वाला है।

इस प्रकार पृश्निमातरः मरुतों के मातृ-संबंध को सामने लाता है। यह पद इस मंत्र का समापन करते हुए उनकी उत्पत्ति और मातृ-संबंध की ओर ध्यान आकर्षित करता है।


मंत्र का संयुक्त भावार्थ

वे पोषित शक्तियाँ अपनी महिमा और व्यापक सामर्थ्य को प्राप्त करती हैं। रुद्र उनसे संबंधित होकर द्युलोक में अपना स्थान स्थापित करते हैं। वे अर्चना अथवा प्रकाशमान अभिव्यक्ति के साथ शक्ति को उत्पन्न करते हैं और श्री तथा समृद्धि को धारण करते हैं। इस मंत्र में मरुतों का संबंध पृश्नि से भी स्थापित किया गया है, जिसे उनकी माता कहा गया है।

पहले मंत्र से दूसरे मंत्र तक विचार की निरंतरता

पहले मंत्र में मरुतों की गति, सात रूपों, जीव और पदार्थ के रूपांतरण तथा वृद्धि का प्रसंग सामने आया था। दूसरे मंत्र में उसी विचार को आगे बढ़ाते हुए चार बिंदु विशेष रूप से सामने आते हैं:

  1. पोषण से महिमा तक — उक्षितासो महिमानमाशत।
  2. शक्ति का स्थान और आधार — दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः।
  3. उत्पत्ति और सामर्थ्य — अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियम्।
  4. समृद्धि और मातृ-संबंध — अधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः।

इस प्रकार दूसरे मंत्र में पोषण, महिमा, स्थान, उत्पत्ति, शक्ति, समृद्धि और मातृ-संबंध एक ही क्रम में आते हैं। आगे के मंत्रों में इन पदों के आपसी संबंध को देखते हुए मरुतों के स्वरूप की व्याख्या को और विकसित किया जा सकता है।

ऋग्वेद १.८५.२ — जड़ पदार्थ, चेतन सत्ता और जीव की शाश्वतता

मंत्र

त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः । अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः ॥२॥

१. त — पिछले मंत्र के विषय की निरंतरता

मंत्र का आरंभ त से होता है। यह पिछले मंत्र में प्रस्तुत विषय को आगे बढ़ाता है। वहाँ मरुतों, सप्त रूपों, जीव और पदार्थ के संबंध पर विचार किया गया था। यहाँ उसी विषय की अगली अवस्था सामने आती है।

इस विचार-श्रृंखला में मरुत जड़ पदार्थ, तामसिक अज्ञान और जड़ता से संबंधित मूल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए दूसरे मंत्र का आरंभ पिछले मंत्र से अलग नहीं है; वह उसी विषय को आगे विकसित करता है।

२. उक्षितासो — जड़ता के भीतर छिपे तत्त्व का सूक्ष्म अध्ययन

उक्षितासो इस मंत्र का विशेष महत्त्वपूर्ण पद है। इसमें आप चक्षु अर्थात् देखने और सूक्ष्म अध्ययन करने का भाव ग्रहण करते हैं। इस दृष्टि से यह केवल पोषण या वृद्धि का संकेत नहीं रह जाता, बल्कि उस जड़ पदार्थ के भीतर विद्यमान तत्त्वों का निरंतर निरीक्षण करने की ओर ध्यान ले जाता है।

तामसिक अज्ञान और जड़ता के वाहक प्रकृति के परमाणुओं का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक है, क्योंकि उनके भीतर होने वाली प्रक्रियाएँ जीव के उत्थान और पतन से भी संबंधित होती हैं।

इसी पद में तासो के साथ आशा और हताशा के भावों को जोड़कर देखने पर यह प्रश्न सामने आता है कि जड़ता से संबंधित प्रक्रियाएँ जीव के जीवन में किस प्रकार उत्थान अथवा पतन का कारण बनती हैं।

३. महिमानमाशत — ईश्वर-संबंधी ज्ञान में निष्ठा और साधना

महिमानम् महिमा को व्यक्त करता है। यहाँ यह महिमा ईश्वर-संबंधी ज्ञान से जुड़ती है। जीव के उत्थान के लिए उस ज्ञान में निष्ठा, निरंतर अभ्यास और साधना पर बल दिया गया है।

इस प्रकार मंत्र में एक ओर जड़ पदार्थ का सूक्ष्म अध्ययन है, तो दूसरी ओर जीव के लिए ईश्वर-संबंधी ज्ञान में स्थिर होने का मार्ग है। दोनों को समझने के लिए निरंतरता आवश्यक है।

४. दिवि — पदार्थ से भिन्न दिव्य सत्ता का बोध

दिवि दिव्य विज्ञान और उस सत्ता के बोध की ओर संकेत करता है जो पदार्थ से भिन्न है।

इस संदर्भ में पदार्थ का अध्ययन करते हुए उसके मूल आधार और उससे भिन्न चेतन सत्ता के बीच अंतर को पहचानना आवश्यक है। दिव्य विज्ञान का विषय केवल पदार्थ के रूपों को जानना नहीं, बल्कि उन रूपों और चेतन सत्ता के संबंध को समझना भी है।

५. रुद्रासो — मूल मरुत पर नियंत्रण रखने वाली चेतन शक्ति

रुद्रासो को यहाँ उस समर्थ चेतन शक्ति के रूप में समझा जाता है जो पदार्थ के मूल तत्त्वों को नियंत्रित करती है।

मरुत जड़ता और पदार्थ के मूल तत्त्व से संबंधित हैं, जबकि रुद्र उस पर नियंत्रण रखने वाली समर्थ चेतन सत्ता का संकेत देते हैं। इस प्रकार दोनों के बीच का संबंध मूल पदार्थ और उसे नियंत्रित करने वाली सत्ता के संबंध के रूप में सामने आता है।

६. अधि चक्रिरे सदः — मूल आधार और पदार्थ की विशिष्टता

अधि अपने मूल आधार से संबंध को व्यक्त करता है। चक्रिरे रूपांतरण की प्रक्रिया का संकेत देता है और सदः मूल अवस्था अथवा आधार को सामने लाता है।

इस विचार के अनुसार पदार्थ अपने मूल आधार से संबंधित रहते हुए रूपांतरित होता है, लेकिन रूपांतरण के कारण एक पदार्थ दूसरे पदार्थ की मूल सत्ता का अतिक्रमण नहीं करता।

आकाश और वायु इसका उदाहरण हैं। आकाश और वायु साथ रहते हैं, परंतु आकाश स्वयं वायु में रूपांतरित नहीं हो जाता और न वायु स्वयं को आकाश में रूपांतरित करती है। दोनों का अपना विशिष्ट स्वरूप और आधार बना रहता है।

इस प्रकार पदार्थों के बीच संबंध और सह-अस्तित्व होने पर भी उनकी मूल सत्ताओं की विशिष्टता बनी रहती है।

७. अर्चन्तो अर्कम् — अर्चना से परे मूल सार की निरंतरता

अर्चन्तः अर्चना की क्रिया को व्यक्त करता है, जबकि अर्कम् को यहाँ किसी वस्तु के मूल सार के रूप में समझा गया है।

अर्चना अथवा किसी क्रिया से पदार्थ के मूल तत्त्व का अंत नहीं हो जाता। उसका सार अपनी सत्ता बनाए रखता है। जैसे दूध से घृत प्राप्त होता है, उसी प्रकार किसी पदार्थ के भीतर उसके सार को पहचानने का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है।

यहाँ ध्यान केवल बाहरी रूप पर नहीं, बल्कि उस सार पर है जो रूपांतरण के क्रम में अपनी विशिष्टता बनाए रखता है।

८. जनयन्त इन्द्रियम् — जीव की निरंतरता और सूक्ष्म शरीर

जनयन्तः उत्पत्ति की प्रक्रिया को व्यक्त करता है। इन्द्रियम् का संबंध इन्द्रियों और उनकी कार्यक्षमता से है।

इस विचार-श्रृंखला में जीव का अंत केवल शरीर के परिवर्तन से नहीं माना जाता। इन्द्रियाँ और उनसे संबंधित सूक्ष्म संरचना जीव के साथ सूक्ष्म शरीर में विद्यमान रहती हैं।

इसलिए शरीर के स्थूल रूप में परिवर्तन होने पर भी जीव और उससे संबंधित सूक्ष्म संरचना की निरंतरता का प्रश्न बना रहता है।

९. अधि श्रियो दधिरे — परम धन और ईश्वर-सिद्धि

श्रियः को यहाँ परम धन के रूप में समझा गया है। यह धन बाहरी संपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि ईश्वर-सिद्धि से संबंधित है।

दधिरे धारण करने का भाव व्यक्त करता है। इस प्रकार ईश्वर-सिद्धि को धारण करने की प्रक्रिया जीव के लिए सर्वोच्च उपलब्धि के रूप में सामने आती है।

यहाँ साधना, ज्ञान और मूल सत्ता के बोध का संबंध जुड़ता है। जीव को अपने अस्तित्व तथा उसके मूल आधार का ज्ञान प्राप्त करना इस विचार-श्रृंखला का केंद्रीय उद्देश्य है।

१०. पृश्निमातरः — अपने मूल उद्गम तक पहुँचने की क्षमता

पृश्निमातरः में पृश्नि और मातृ-संबंध का उल्लेख है। मातरः मूल आधार, माता अथवा उद्गम से संबंध को सामने लाता है।

इस व्याख्या में जीव अपने आधार और मूल उद्गम को पहचानने की दिशा में आगे बढ़ता है। पदार्थ, उसकी मूल सत्ता, चेतन नियंत्रण, सूक्ष्म शरीर और ईश्वर-संबंधी ज्ञान—इन सभी के संबंध को समझकर जीव अपने मूल आधार तक पहुँचने में समर्थ होता है।


मंत्र की संपूर्ण विचार-श्रृंखला

इस मंत्र में विचार का क्रम इस प्रकार विकसित होता है:

पिछले मंत्र के विषय की निरंतरता → जड़ पदार्थ का सूक्ष्म अध्ययन → उत्थान-पतन का संबंध → ईश्वर-संबंधी ज्ञान में निष्ठा → पदार्थ से भिन्न चेतन सत्ता का बोध → मूल तत्त्वों पर नियंत्रण → पदार्थ की मूल अवस्था और विशिष्टता → सार की निरंतरता → जीव और सूक्ष्म शरीर का संबंध → ईश्वर-सिद्धि → मूल उद्गम की प्राप्ति।

इस प्रकार मंत्र का विचार केवल पदार्थ की उत्पत्ति तक सीमित नहीं रहता। इसमें पदार्थ की संरचना, उसकी विशिष्टता, चेतन सत्ता के साथ उसका संबंध, जीव की निरंतरता और अपने मूल आधार को प्राप्त करने की प्रक्रिया एक साथ जुड़ती हैं।

दिति, कश्यप और इन्द्र: संकल्पशक्ति तथा प्राकृतिक प्रक्रिया का रहस्य

१. दिति — अंतःकरण और संकल्प की शक्ति

इस व्याख्या में दिति अंतःकरण का प्रतीक है। वह अपने संकल्प और तप के बल से संतति को जन्म देने की क्षमता रखती है। यहाँ गर्भ केवल स्थूल शरीर के भीतर स्थित गर्भ नहीं, बल्कि उस आंतरिक प्रक्रिया का भी संकेत है जिसमें संकल्प से शक्ति का विकास होता है और वह आगे चलकर पदार्थ के आवरण तथा शरीर के माध्यम से भौतिक जगत् में अभिव्यक्त होती है।

इस प्रकार दिति के गर्भ में पलने वाला पुत्र एक विकसित होती हुई शक्ति का प्रतीक बनता है। उसका जन्म अंतःकरण में आरंभ हुई प्रक्रिया का बाहरी जगत् में प्रकट होना है।

२. कश्यप — ज्ञानसंपन्न और मुक्त जीव

कश्यप इस व्याख्या में ज्ञानसंपन्न जीव का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो मुक्त अवस्था में स्थित है। उनका ज्ञान और तप उस मूल प्रक्रिया से संबंधित है जिसके माध्यम से संकल्पशक्ति का विकास होता है।

दिति और कश्यप का संबंध इस प्रकार अंतःकरण के संकल्प तथा ज्ञानसंपन्न जीव के बीच के संबंध को सामने लाता है। संकल्प से उत्पन्न शक्ति का विकास और उसकी अभिव्यक्ति इसी संबंध में समझी जाती है।

३. इन्द्र — जीव और शरीर का संयुक्त रूप

इन्द्र यहाँ जीव और शरीर के संयुक्त रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह संयुक्त सत्ता अपने वर्तमान अस्तित्व, व्यवस्था और साम्राज्य को बनाए रखती है।

जब दिति के गर्भ में एक नई शक्ति विकसित होती है, तब इन्द्र को अपने साम्राज्य पर संकट दिखाई देता है। इस संकट का कारण केवल किसी बाहरी शत्रु का जन्म नहीं, बल्कि उस प्राकृतिक प्रक्रिया का आगे बढ़ना है जो वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन ला सकती है।

४. गर्भ में प्रवेश — प्राकृतिक प्रक्रिया का बाधित होना

इन्द्र का गर्भ में प्रवेश करके गर्भस्थ पुत्र का अंत करना इस व्याख्या का केंद्रीय बिंदु है।

दिति के संकल्प और तप से उत्पन्न शक्ति स्वाभाविक रूप से विकसित होकर आगे भौतिक जगत् में प्रकट हो सकती थी। लेकिन इन्द्र उस शक्ति को उसके पूर्ण विकास से पहले ही नष्ट करने का प्रयास करता है।

इस प्रकार गर्भस्थ शक्ति का विनाश उस प्राकृतिक प्रक्रिया के बाधित होने का प्रतीक बनता है, जिसमें अंतःकरण से उत्पन्न संकल्पशक्ति पदार्थ के आवरण और शरीर के माध्यम से अभिव्यक्त होती है।

५. साम्राज्य का संकट — वर्तमान व्यवस्था और नई शक्ति का संघर्ष

इन्द्र को अपने साम्राज्य पर संकट दिखाई देता है, क्योंकि नई शक्ति का जन्म वर्तमान व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकता है। इस संघर्ष में एक ओर संकल्प और तप से विकसित होने वाली शक्ति है, दूसरी ओर जीव और शरीर का वह संयुक्त रूप है जो अपनी वर्तमान स्थिति को बनाए रखना चाहता है।

इस प्रकार कथा में संघर्ष केवल देवता और दैत्य के बीच नहीं रह जाता। वह प्राकृतिक विकास और उसे बाधित करने वाली सत्ता के बीच संबंध को भी व्यक्त करता है।

६. मरुत्सूक्त से इसका संबंध

मरुतों की उत्पत्ति से जुड़ी कथा को ध्यान में रखते हुए ऋग्वेद के मरुत्सूक्त का अध्ययन इस प्रश्न को आगे बढ़ाता है कि जीव, अंतःकरण, पदार्थ और शरीर के बीच संबंध किस प्रकार व्यक्त होता है।

दिति के गर्भ में शक्ति का विकास और इन्द्र द्वारा उसका विभाजन—ये दोनों घटनाएँ उस मूल विषय की ओर ध्यान ले जाती हैं जिसे आप मरुतों, सप्तधातु और जीव की संरचना के संबंध में देख रहे हैं।

इसलिए आगे के मंत्रों में मरुतों के स्वरूप और उनकी उत्पत्ति को समझते समय इस सूत्र को बनाए रखना आवश्यक है: अंतःकरण में संकल्प से विकसित होने वाली शक्ति, उसका पदार्थ और शरीर के माध्यम से प्रकट होना, तथा वर्तमान व्यवस्था द्वारा उस प्रक्रिया का बाधित किया जाना।

ऋग्वेद १.८५.३ — शब्द-दर-शब्द व्याख्या

मंत्र

गोमातरो यच्छुभयन्ते अञ्जिभिस्तनूषु शुभ्रा दधिरे विरुक्मतः । बाधन्ते विश्वमभिमातिनमप वर्त्मान्येषामनु रीयते घृतम् ॥३॥

१. गोमातरः — गो को माता के रूप में धारण करने वाले

गोमातरः का निर्माण गो और मातरः से हुआ है। वैदिक प्रयोग में गो का संबंध गौ, प्रकाश, किरण तथा अन्य अर्थों से हो सकता है। मातरः माताओं अथवा माता के रूप में आधार देने वाली सत्ता को व्यक्त करता है।

आपकी विचार-श्रृंखला में यह पद उस मूल आधार की ओर ध्यान ले जाता है जिससे मरुतों का संबंध है। पिछले मंत्र में पृश्निमातरः आया था; यहाँ गोमातरः के माध्यम से मातृ-संबंध का एक नया रूप सामने आता है।

इसलिए दोनों पदों के संबंध को आगे के मंत्रों में भी ध्यान में रखना होगा।

२. यत् — जब, जो अथवा जिस अवस्था में

यत् संबंधसूचक पद है। इसका अर्थ वाक्य में उसके प्रयोग के अनुसार जब, जो अथवा जिस अवस्था में हो सकता है।

यहाँ इसका संबंध अगले पद शुभयन्ते से है और यह उस अवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें किसी वस्तु को शोभायुक्त किया जाता है।

३. शुभयन्ते — शोभायुक्त करते हैं, प्रकाशित करते हैं

शुभयन्ते का संबंध शोभा, सज्जा और प्रकाशमान होने से है।

पिछले मंत्र में श्रियो दधिरे के माध्यम से श्री अथवा समृद्धि को धारण करने की बात आई थी। यहाँ शोभा की अभिव्यक्ति का प्रसंग सामने आता है।

इस क्रम में किसी तत्त्व की आंतरिक विशेषता और उसकी बाहरी अभिव्यक्ति के बीच संबंध देखा जा सकता है।

४. अञ्जिभिः — अंजन, लेपन अथवा सज्जा के साधनों से

अञ्जिभिः का संबंध अंजन, लेपन अथवा सज्जा से है। इसका मूल भाव किसी वस्तु को विशेष रूप देना या उसे स्पष्ट रूप से प्रकट करना है।

यह पद बताता है कि शोभा की अभिव्यक्ति किसी माध्यम अथवा प्रक्रिया से जुड़ी है। इसे पिछले पद शुभयन्ते के साथ पढ़ने पर रूप को सज्जित करने अथवा स्पष्ट करने की क्रिया सामने आती है।

५. तनूषु — शरीरों में

तनूषु, तनु का बहुवचन सप्तमी रूप है। इसका अर्थ है—शरीरों में अथवा देहों के भीतर।

यह पद मंत्र की विचार-श्रृंखला में विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि अब चर्चा किसी बाहरी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती; शरीरों के भीतर की अभिव्यक्ति भी सामने आती है।

आपके पहले के विवेचन में जीव, स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर के संबंध पर विचार किया गया था। इस संदर्भ में तनूषु उन शरीरों की ओर ध्यान ले जाता है जिनमें संबंधित तत्त्व अभिव्यक्त होते हैं।

६. शुभ्राः — उज्ज्वल, निर्मल अथवा प्रकाशमान

शुभ्राः का अर्थ उज्ज्वल, निर्मल अथवा प्रकाशमान है।

यह पद पहले आए शुभयन्ते से अर्थगत संबंध रखता है। एक ओर शोभा उत्पन्न करने की क्रिया है, दूसरी ओर उज्ज्वलता अथवा निर्मलता की अवस्था।

इस प्रकार मंत्र में शरीरों के भीतर किसी विशेष गुण के प्रकाशमान होने का वर्णन सामने आता है।

७. दधिरे — धारण किया, स्थापित किया

दधिरे का अर्थ है—धारण किया अथवा स्थापित किया।

यह क्रिया पिछले मंत्र में भी आई थी—अधि श्रियो दधिरे। वहाँ श्री अथवा समृद्धि को धारण करने का प्रसंग था; यहाँ इसका संबंध विरुक्मतः से जुड़ता है।

दोनों स्थानों पर धारण करने की क्रिया किसी गुण अथवा विशेषता को अपने भीतर स्थापित करने का भाव व्यक्त करती है।

८. विरुक्मतः — तेजस्वी आभूषणों अथवा चमकदार अलंकरणों से युक्त

विरुक्मतः का संबंध चमक, तेज अथवा स्वर्णाभ आभूषणों से है। इस पद को समझते समय रूप की शोभा और उसके प्रकाशमान होने के भाव पर ध्यान देना चाहिए।

शुभ्राः दधिरे विरुक्मतः के संयुक्त प्रयोग में उज्ज्वलता, धारण करने और तेजस्वी अलंकरण का संबंध सामने आता है।

९. बाधन्ते — बाधा डालते हैं, परास्त करते हैं

बाधन्ते का अर्थ है—बाधा डालना, रोकना अथवा परास्त करना।

यहाँ मंत्र का विषय रूप और शोभा से आगे बढ़कर क्रिया तथा संघर्ष की ओर जाता है। जिन शक्तियों का वर्णन हो रहा है, वे केवल किसी गुण को धारण नहीं करतीं; वे विरोधी शक्ति के विरुद्ध सक्रिय भी होती हैं।

१०. विश्वम् — समस्त, संपूर्ण जगत्

विश्वम् का अर्थ है—समस्त अथवा संपूर्ण जगत्।

इस पद के कारण अगले शब्द अभिमातिनम् का क्षेत्र व्यापक हो जाता है। यहाँ किसी सीमित वस्तु के बजाय पूरे जगत् से संबंधित विरोध अथवा प्रतिरोध का प्रसंग सामने आता है।

११. अभिमातिनम् — विरोधी, शत्रुतापूर्ण अथवा आक्रमणकारी शक्ति

अभिमातिनम् का संबंध विरोध करने वाले, आक्रमणकारी अथवा शत्रु के भाव से है।

विश्वमभिमातिनम् के संयुक्त प्रयोग को उस विरोधी शक्ति के रूप में समझा जा सकता है जो व्यापक व्यवस्था के सामने बाधा उत्पन्न करती है।

आपके पहले विवेचन में इन्द्र द्वारा दिति के गर्भ में विकसित होती शक्ति को बाधित करने का प्रसंग आया था। इस संदर्भ में विरोधी शक्ति और स्वाभाविक विकास के बीच संबंध पर आगे विचार किया जा सकता है।

१२. अप — दूर, अलग अथवा हटाकर

अप का अर्थ दूर करना, अलग करना अथवा हटाना है।

यह अगले पद वर्त्मानि के साथ मिलकर मार्गों को हटाने, अलग करने अथवा बाधित करने का भाव व्यक्त कर सकता है।

१३. वर्त्मानि — मार्ग, रास्ते अथवा गतिपथ

वर्त्मानि, वर्त्मन् का बहुवचन रूप है। इसका अर्थ मार्ग, रास्ते अथवा गतिपथ है।

इस पद से गति और मार्ग का संबंध सामने आता है। पहले मंत्र में यामन् के माध्यम से गति का उल्लेख था; यहाँ अनेक मार्गों अथवा गतिपथों का प्रसंग है।

इस प्रकार गति, मार्ग और उनके सामने आने वाली बाधाओं का संबंध इस मंत्र में महत्त्वपूर्ण बनता है।

१४. एषाम् — इनके, इनका

एषाम् का अर्थ है—इनके अथवा इनका। इसका संबंध मंत्र में वर्णित शक्तियों से है।

यह पद आगे आने वाली क्रिया को उन्हीं शक्तियों से जोड़ता है, जिनका उल्लेख पहले किया गया है।

१५. अनु — पीछे-पीछे, क्रम से, अनुसरण करते हुए

अनु का अर्थ है—पीछे-पीछे, क्रम से अथवा अनुसरण करते हुए।

यह किसी क्रम का संकेत देता है। अगले पद रीयते के साथ इसका प्रयोग किसी वस्तु के प्रवाह अथवा गति के साथ-साथ चलने का भाव व्यक्त करता है।

१६. रीयते — बहता है, प्रवाहित होता है, गति करता है

रीयते का संबंध बहने, प्रवाहित होने अथवा गति करने से है।

यहाँ किसी प्रवाह के क्रमशः आगे बढ़ने का भाव सामने आता है। इस प्रकार मंत्र के अंतिम पदों में मार्ग और गति के साथ प्रवाहित होने वाली वस्तु का संबंध स्थापित होता है।

१७. घृतम् — घृत, स्पष्ट किया हुआ सार अथवा चमकदार द्रव्य

घृतम् का सामान्य अर्थ घी अथवा घृत है। वैदिक प्रयोगों में इसका संबंध प्रकाश, चमक और कुछ संदर्भों में सार अथवा परिष्कृत द्रव्य से भी जुड़ता है।

इस मंत्र के अंत में घृतम् का उल्लेख है। इसे समझने के लिए उसके पहले आए वर्त्मानि, एषाम्, अनु और रीयते के साथ इसका संबंध देखना आवश्यक है।

इस प्रकार मंत्र का अंतिम पद किसी ऐसे द्रव्य अथवा सार की ओर ध्यान आकर्षित करता है जो वर्णित शक्तियों के मार्ग का अनुसरण करते हुए प्रवाहित होता है।


मंत्र का संयुक्त भावार्थ

मरुतों का संबंध मातृ-आधार से है। वे शरीरों में उज्ज्वलता और शोभा की अभिव्यक्ति से जुड़े हैं तथा तेजस्वी विशेषताओं को धारण करते हैं। वे विरोधी शक्तियों का सामना करते हैं और मार्गों से संबंधित बाधाओं को दूर करते हैं। उनके मार्गों के अनुसरण में घृत का प्रवाह वर्णित किया गया है।

पहले दो मंत्रों से तीसरे मंत्र तक

पहले मंत्र में मरुतों, सप्त रूपों और पदार्थ के रूपांतरण का प्रसंग था। दूसरे मंत्र में पोषण, महिमा, शक्ति, समृद्धि और मातृ-संबंध सामने आए। तीसरे मंत्र में यही विचार शरीर, उज्ज्वलता, विरोधी शक्तियों, मार्गों और घृत के प्रवाह तक पहुँचता है।

इस प्रकार तीनों मंत्रों को क्रम से देखने पर मूल तत्त्व, उसका विकास, शरीर में उसकी अभिव्यक्ति और उसके कार्यक्षेत्र से संबंधित प्रश्न सामने आते हैं। आगे के मंत्रों में इन्हीं संबंधों को क्रमशः देखना होगा।

ऋग्वेद १.८५.३ — गोमातरः, मूल ध्वनि और पदार्थों की सात अवस्थाएँ

मंत्र

गोमातरो यच्छुभयन्ते अञ्जिभिस्तनूषु शुभ्रा दधिरे विरुक्मतः । बाधन्ते विश्वमभिमातिनमप वर्त्मान्येषामनु रीयते घृतम् ॥३॥

१. पृश्निमातरः से गोमातरः तक — विचार की नई दिशा

पिछले मंत्र के अंतिम पद पृश्निमातरः में जीव के मूल उद्गम की प्राप्ति का विचार सामने आया था। अब तीसरे मंत्र में गोमातरः पद आया है। इस परिवर्तन को ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि यहाँ केवल माता का एक दूसरा नाम नहीं आया, बल्कि विचार का केंद्र बदल रहा है।

पृश्निमातरः के माध्यम से जीव अपने मूल उद्गम से संबंधित होता है, जबकि गोमातरः के माध्यम से उस मूल शक्ति का विचार सामने आता है जिससे पदार्थों का विकास और उनका विविध रूपों में प्राकट्य होता है।

२. गोमातरः — मूल ध्वनि और सूक्ष्म तरंग की शक्ति

यहाँ गो का अर्थ सामान्य गौ तक सीमित नहीं है। इसे उस सूक्ष्म तरंग के रूप में समझा जाता है जो सृष्टि के आरंभ में विद्यमान अगाध अंधकार अर्थात् तम से संबंधित मूल शक्ति से निकलती है।

इस अवस्था में दृश्य पदार्थ अभी अपने स्थूल रूप में प्रकट नहीं हुआ है। मूल शक्ति की पहली अभिव्यक्ति ध्वनि के रूप में होती है। ईश्वर की अदृश्य सत्ता जब अभिव्यक्त होती है, तब वाणी का उद्घोष इस विचार-श्रृंखला का आरंभ बनता है।

इसी मूल ध्वनि से आगे सघनता और रूपांतरण का क्रम विकसित होता है। इस प्रकार गोमातरः पदार्थों के मूल स्रोत तथा उस ध्वनि-शक्ति के संबंध को व्यक्त करता है जिससे विविध पदार्थों की अभिव्यक्ति का क्रम आरंभ होता है।

३. ध्वनि से स्थूल पदार्थ तक — सात अवस्थाओं का क्रम

इस व्याख्या में सृष्टि के विकास को सात मुख्य चरणों में समझा जाता है।

पहला चरण — मूल ध्वनि: अदृश्य सत्ता की पहली अभिव्यक्ति ध्वनि के रूप में होती है।

दूसरा चरण — सूक्ष्म तरंग: ध्वनि का प्रसार तरंग के रूप में समझा जाता है। यही तरंग आगे की अभिव्यक्तियों का आधार बनती है।

तीसरा चरण — सघन तरंग: तरंग के अधिक सघन रूप में प्रकट होने से रेडियो-आवृत्ति जैसी अभिव्यक्तियों का विचार सामने आता है।

चौथा चरण — विद्युत तरंग: सघनता के अगले चरण में विद्युत रूप की तरंग का विचार आता है।

पाँचवाँ चरण — परमाणु: विद्युत रूप की सघनता से परमाणु के प्रकट होने का चरण रखा जाता है।

छठा चरण — डार्क मैटर और सघन संरचनाएँ: परमाणु से आगे पदार्थ के अधिक व्यापक और सघन रूपों की अभिव्यक्ति का विचार आता है।

सातवाँ चरण — खगोलीय संरचनाएँ: ब्लैक होल, निहारिका, आकाशगंगा, तारे और ग्रह जैसे रूपों तक पदार्थ की विविध अभिव्यक्तियों का क्रम सामने आता है।

यह सात चरणों वाला क्रम मूल मरुत की अभिव्यक्ति को समझने का ढाँचा बनता है। इस विचार में पदार्थों के मूल स्रोत के रूप में वाणी और ध्वनि की भूमिका केंद्रीय है, जबकि इस समस्त अभिव्यक्ति का मूल आधार ईश्वर है।

४. यच्छुभयन्ते — दृश्य जगत् का प्राकट्य

यच्छुभयन्ते में दृश्यता और शोभा की अभिव्यक्ति का भाव सामने आता है। मूल शक्ति के क्रमिक विकास से वह अवस्था प्रकट होती है जिसमें जगत् दृश्य रूप ग्रहण करता है।

जो पहले अदृश्य और सूक्ष्म था, वह आगे चलकर ऐसे रूपों में अभिव्यक्त होता है जिन्हें भौतिक चक्षुओं से देखा जा सकता है। इस प्रकार यह पद मूल ध्वनि से दृश्य जगत् तक पहुँचने वाले रूपांतरण के प्राकट्य को व्यक्त करता है।

५. अञ्जिभिस्तनूषु — पदार्थों के सार से शरीर की रचना

अञ्जिभिः को इस व्याख्या में पदार्थों के सार से संबंधित माना जाता है, जबकि तनूषु शरीरों में अभिव्यक्ति का संकेत देता है।

इस प्रकार पदार्थों के विकास से प्राप्त सार के माध्यम से जीव के शरीर की रचना का विचार सामने आता है। स्थूल शरीर पदार्थों से निर्मित होता है और उसका स्वरूप उन पदार्थों की संरचना तथा उनके परस्पर संबंध पर निर्भर करता है।

यहाँ मूल ध्वनि से पदार्थ और पदार्थ से शरीर तक की विचार-श्रृंखला आगे बढ़ती है।

६. शुभ्रा दधिरे — पवित्र जीव का शरीर धारण करना

शुभ्राः पवित्रता और निर्मलता का संकेत देता है, जबकि दधिरे धारण करने की क्रिया को व्यक्त करता है।

इस व्याख्या में जीव शरीर को धारण करके उसमें अपना निवास स्थापित करता है। शरीर पदार्थों से निर्मित है, लेकिन जीव की सत्ता केवल उन्हीं पदार्थों के स्थूल स्वरूप तक सीमित नहीं रहती।

इस प्रकार शरीर जीव की अभिव्यक्ति और निवास का माध्यम बनता है।

७. विरुक्मतः — अभिव्यक्ति की विविधता और ईश्वरीय इच्छा

विरुक्मतः को यहाँ तेजस्वी अभिव्यक्ति और विविध रूपों से संबंधित करके समझा जाता है।

जीव के लिए शरीर की रचना और उसमें निवास का प्रश्न इस विचार से जुड़ता है कि परम शक्ति में विभिन्न अभिव्यक्तियों का सामर्थ्य विद्यमान है। एक ही मूल सत्ता से विविध रूपों का प्राकट्य होता है, और उन रूपों में जीव की अभिव्यक्ति भी शामिल है।

८. बाधन्ते विश्वमभिमातिनम् — जीव को भौतिक शरीर में स्थापित करने की प्रक्रिया

बाधन्ते बाधा देने अथवा रोकने की क्रिया को व्यक्त करता है। विश्वम् व्यापक जगत् का संकेत है और अभिमातिनम् विरोधी अथवा प्रतिरोधी शक्ति से संबंधित है।

इस व्याख्या में इन पदों को जीव के भौतिक जगत् में प्रवेश और उसकी अभिव्यक्ति की प्रक्रिया के संदर्भ में देखा जाता है। जीव को शरीर में स्थित करने तथा उसे भौतिक जगत् की प्रक्रियाओं से जोड़ने का विचार सामने आता है।

यहाँ जल के भीतर जीव की उपस्थिति और उसकी जीवन-प्रक्रिया का संदर्भ भी विचार की इस दिशा से जुड़ता है।

९. अप वर्त्मानि — वर्तमान सृष्टि में प्रवेश का मार्ग

अप और वर्त्मानि को साथ रखकर देखने पर मार्ग तथा उसके माध्यम से होने वाली गति का विचार सामने आता है।

इस संदर्भ में जीव की अभिव्यक्ति किसी एक स्थिर अवस्था में नहीं होती, बल्कि वह सृष्टि की विभिन्न प्रक्रियाओं से जुड़ता है। शरीर, मन और पदार्थ के साथ उसका संबंध इसी क्रम में विकसित होता है।

१०. एषामनु रीयते — मन और गति का संबंध

एषाम् का अर्थ इनके अथवा इनसे संबंधित है। अनु क्रम और अनुसरण का संकेत देता है, जबकि रीयते गति अथवा प्रवाह से संबंधित है।

आपकी व्याख्या में यह क्रम मन को धारण करने वाले जीव की अभिव्यक्ति से जुड़ता है। जीव शरीर में स्थित होकर मन के माध्यम से विभिन्न क्रियाओं और अनुभवों से संबंधित होता है।

इस प्रकार जीव, शरीर और मन का संबंध मूल पदार्थों की अभिव्यक्ति से जुड़ जाता है।

११. घृतम् — बुद्धिपूर्वक शरीर और मन का उपयोग

घृतम् को इस व्याख्या में सार तथा परिष्कृत तत्त्व के रूप में देखा जाता है। मंत्र के अंतिम पद के रूप में यह उस प्रक्रिया की ओर ध्यान ले जाता है जिसमें जीव अपने शरीर और मन का बुद्धिपूर्वक उपयोग करने में समर्थ होता है।

शरीर पदार्थों से निर्मित है, मन अनुभवों और क्रियाओं का माध्यम है, तथा बुद्धि उनके विवेकपूर्ण उपयोग से संबंधित है। इस प्रकार जीव की यात्रा केवल शरीर धारण करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि शरीर और मन का उचित उपयोग करने की क्षमता तक पहुँचती है।


मंत्र की संपूर्ण विचार-श्रृंखला

इस मंत्र में विचार का क्रम इस प्रकार सामने आता है:

पृश्निमातरः से गोमातरः तक मूल आधार का परिवर्तन → मूल ध्वनि और सूक्ष्म तरंग → पदार्थों की क्रमिक अभिव्यक्ति → दृश्य जगत् का प्राकट्य → पदार्थों से शरीर की रचना → जीव द्वारा शरीर धारण करना → भौतिक जगत् में जीव की अभिव्यक्ति → मन का संबंध → बुद्धिपूर्वक शरीर और मन का उपयोग।

इस प्रकार तीसरा मंत्र मूल ध्वनि से पदार्थ, पदार्थ से शरीर और शरीर के माध्यम से जीव की अभिव्यक्ति तक की विचार-यात्रा प्रस्तुत करता है। इसमें गोमातरः का पद पदार्थों के मूल स्रोत की ओर ध्यान आकर्षित करता है, जबकि मंत्र का अंतिम पद जीव की अभिव्यक्ति और उसके शरीर-मन के उपयोग तक विचार को आगे बढ़ाता है।

त्रिकालदर्शी — ऋग्वेद १.८५.४

मन्त्र की शब्द-दर-शब्द व्याख्या

मन्त्र

वि ये भ्राजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा ।
मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रातासः पृषतीरयुग्ध्वम् ॥४॥

इस मन्त्र में मरुतों की गति, उनके तेज, उनकी शक्ति और उनके रथों से जुड़ी क्रिया का वर्णन है। पिछले मन्त्र में गोमातरः, मूल ध्वनि, पदार्थों की अवस्थाओं और जीव के शरीर से संबंध की चर्चा आगे बढ़ी थी। अब इस मन्त्र के प्रत्येक पद को उसी क्रम में समझते हैं।

१. वि

शब्दार्थ: अलग-अलग दिशाओं में, विशेष रूप से, विस्तारपूर्वक।

भावार्थ: किसी शक्ति का अपने मूल केंद्र से अनेक दिशाओं में फैलना और विभिन्न रूपों में व्यक्त होना। यहाँ वि उस विस्तार और विविध अभिव्यक्ति की ओर संकेत करता है।

२. ये

शब्दार्थ: जो, वे।

भावार्थ: यह पद उन मरुतों की ओर संकेत करता है जिनकी क्रियाओं और शक्तियों का वर्णन इस मन्त्र में किया जा रहा है। पिछले मन्त्र से चला आ रहा विषय यहाँ निरन्तर बना हुआ है।

३. भ्राजन्ते

शब्दार्थ: चमकते हैं, प्रकाशमान होते हैं, तेज से प्रकाशित होते हैं।

भावार्थ: किसी शक्ति का अपने प्रभाव और तेज के कारण प्रकट होना। जो तत्त्व पहले सूक्ष्म या अप्रकट अवस्था में था, वह अपनी क्रियाशीलता के कारण अभिव्यक्त होता है।

४. सुमखासः

शब्दार्थ: सुन्दर, अनुकूल या श्रेष्ठ यज्ञीय क्रिया से सम्बद्ध; उत्तम कार्य करने वाले।

भावार्थ: यह पद मरुतों की कार्यप्रणाली की विशेषता बताता है। उनकी शक्ति केवल विद्यमान नहीं है, बल्कि एक निश्चित व्यवस्था में कार्य करती है। यहाँ उस सुव्यवस्थित क्रिया पर ध्यान देना आवश्यक है जिसके माध्यम से शक्ति अपना प्रभाव प्रकट करती है।

५. ऋष्टिभिः

शब्दार्थ: ऋष्टियों के द्वारा; ऋष्टि का अर्थ भाला अथवा नुकीला अस्त्र भी होता है।

भावार्थ: यह पद शक्ति के तीक्ष्ण, भेदने वाले और प्रभाव उत्पन्न करने वाले साधनों का बोध कराता है। मन्त्र में मरुतों का तेज और उनकी क्रियाशीलता इन ऋष्टियों के साथ व्यक्त होती है।

६. प्रच्यावयन्तः

शब्दार्थ: आगे हटाने वाले, विचलित करने वाले, अपने स्थान से हटाने वाले।

भावार्थ: जब कोई शक्ति सक्रिय होती है, तो वह स्थिर अवस्था को प्रभावित कर सकती है। किसी तत्त्व का अपने पहले के स्थान या अवस्था से हटना, उसका रूप बदलना अथवा किसी दूसरी अवस्था में प्रवेश करना इस पद के भाव को समझने में सहायक है।

७. अच्युता

शब्दार्थ: जो अपने स्थान से नहीं गिरता, जो विचलित नहीं होता, स्थिर रहने वाला।

भावार्थ: यह पद स्थिरता और अविचल अवस्था का संकेत देता है। मन्त्र में इसके साथ प्रच्यावयन्तः का आना विशेष ध्यान देने योग्य है—एक ओर किसी वस्तु को विचलित करने वाली क्रिया है, दूसरी ओर वह अवस्था है जो स्वयं विचलित नहीं होती।

८. चित्

शब्दार्थ: भी, ही, यहाँ तक कि।

भावार्थ: यह शब्द पहले कहे गए पद के अर्थ को विशेष बल देता है। अर्थात् जिस स्थिर या अच्युत अवस्था की बात हो रही है, उस पर भी मरुतों की शक्ति का प्रभाव व्यक्त किया गया है।

९. ओजसा

शब्दार्थ: ओज से, बल से, सामर्थ्य से।

भावार्थ: यहाँ परिवर्तन या प्रभाव का कारण केवल सामान्य गति नहीं, बल्कि विशेष सामर्थ्य है। ओजस् उस शक्ति का बोध कराता है जिसके कारण कोई क्रिया प्रभावशाली बनती है।

१०. मनोजुवः

शब्दार्थ: मन के समान तीव्र गति वाले।

भावार्थ: मन की गति को यहाँ तीव्रता के बोध के लिए लिया गया है। मरुतों की गति इतनी शीघ्र बताई गई है कि उसकी तुलना मन की गति से की जाती है। यह पद उनकी गतिशील प्रकृति को स्पष्ट करता है।

११. यत्

शब्दार्थ: जब, जिस समय, जो।

भावार्थ: यह पद अगले कथन को पूर्ववर्ती विषय से जोड़ता है। आगे मरुतों के रथों और उनसे जुड़ी क्रिया का वर्णन आता है।

१२. मरुतः

शब्दार्थ: मरुतगण; शक्तिशाली गतिशील तत्त्वों या देवगणों के लिए प्रयुक्त पद।

भावार्थ: इस सूक्त में मरुतों का विषय आरम्भ से निरन्तर चल रहा है। पहले मन्त्र में उनके स्वरूप और सप्त-सम्बन्धी संकेत, दूसरे में उनके आधार और शक्ति, तथा तीसरे में गोमातरः के माध्यम से मूल स्रोत और अभिव्यक्ति की चर्चा हुई। चौथे मन्त्र में उन्हीं मरुतों की गति, ओज और कार्य करने की प्रक्रिया सामने आती है।

१३. रथेषु

शब्दार्थ: रथों में, रथों पर।

भावार्थ: रथ गति और शक्ति के संचालन का माध्यम है। मन्त्र में यह मरुतों की गतिशीलता को एक संगठित व्यवस्था में व्यक्त करता है। आगे के पद इसी रथ-सम्बन्धी क्रिया को स्पष्ट करते हैं।

१४. आ

शब्दार्थ: इस उपसर्ग का अर्थ प्रसंग के अनुसार निकटता, ओर गति अथवा किसी क्रिया की पूर्णता से जुड़ सकता है।

भावार्थ: यहाँ यह अगले पद अयुग्ध्वम् के साथ मिलकर रथों से सम्बन्धित क्रिया को व्यक्त करने में सहायक है।

१५. वृषव्रातासः

शब्दार्थ: वृषभ के समान शक्तिशाली समूह; प्रबल सामर्थ्य वाले गण।

भावार्थ: वृष शक्ति, प्रजनन-सामर्थ्य और प्रबलता का बोध करा सकता है; व्रात समूह या गण का। इस प्रकार यह पद मरुतों को एक शक्तिशाली समूह के रूप में प्रस्तुत करता है।

१६. पृषतीः

शब्दार्थ: पृषती नाम से सम्बद्ध, चितकबरे या धब्बेदार रंग वाली; वैदिक वर्णन में मरुतों के रथों से जुड़ी हुई।

भावार्थ: यह पद रथों के साथ जुड़ी पृषती शक्तियों अथवा वाहनों का उल्लेख करता है। इसके विशेष तात्त्विक संकेत को समझने के लिए इसे अयुग्ध्वम् के साथ पढ़ना आवश्यक है।

१७. अयुग्ध्वम्

शब्दार्थ: तुमने जोता, जोड़ा या रथ में लगाया।

भावार्थ: यह क्रिया केवल शक्ति के अस्तित्व का वर्णन नहीं करती, बल्कि उसके संयोजन और संचालन की ओर भी संकेत करती है। किसी शक्ति का कार्य में प्रवृत्त होना और किसी माध्यम के साथ जुड़ना इस पद का प्रमुख भाव है।


मन्त्र का समग्र भावार्थ

इस मन्त्र में मरुतों के तेजस्वी रूप, उनकी तीव्र गति, उनके ओज और उनकी संगठित क्रियाशीलता का वर्णन है। वे अपने सामर्थ्य से स्थिर अवस्था को भी प्रभावित कर सकते हैं। उनकी गति मन के समान तीव्र है और रथों से सम्बन्धित उनकी शक्ति एक सुव्यवस्थित क्रिया के रूप में व्यक्त होती है।

पिछले तीन मन्त्रों से इसकी विचार-यात्रा को जोड़कर देखें तो क्रम इस प्रकार आगे बढ़ता है:

  • प्रथम मन्त्र: मरुतों के स्वरूप और सप्त-सम्बन्धी संकेत।
  • द्वितीय मन्त्र: उनके आधार, शक्ति और स्थिर अवस्था से सम्बन्ध।
  • तृतीय मन्त्र: मूल स्रोत से पदार्थों की अभिव्यक्ति और जीव के शरीर से सम्बन्ध।
  • चतुर्थ मन्त्र: शक्ति का तेजस्वी होना, तीव्र गति, स्थिर अवस्था पर प्रभाव और शक्तियों का संयोजन।

इस प्रकार चौथा मन्त्र मरुतों की शक्ति को केवल अस्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि गति, प्रभाव और संगठित क्रिया के रूप में सामने लाता है। अब इसके पदों के भीतर निहित विशेष संकेतों को आगे खोलने पर इस सूक्त की विचार-यात्रा और स्पष्ट होगी।

ऋग्वेद १.८५.४ — मन, संकल्पशक्ति और चेतन-अचेतन की मर्यादा

मन्त्र

वि ये भ्राजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा । मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रातासः पृषतीरयुग्ध्वम् ॥४॥

१. वि — विशेष बुद्धि और विज्ञानयुक्त विवेक

पिछले मन्त्र में घृतम् के माध्यम से विशेष बुद्धि और उसके विवेकपूर्ण प्रयोग की चर्चा हुई। उसी विशेष बुद्धि को केन्द्र में रखकर इस मन्त्र का भाव प्रकट होता है।

यहाँ वि केवल विस्तार का संकेत नहीं है। यह विशेष बुद्धि, विज्ञानयुक्त विवेक और भेद करके समझने की क्षमता का भी संकेत देता है। इस बुद्धि के द्वारा चेतन और अचेतन से सम्बन्धित दोनों प्रकार की विद्याओं को अलग-अलग समझा जा सकता है।

चेतन और अचेतन के अपने-अपने क्षेत्र हैं। दोनों की प्रकृति और कार्य अलग हैं। जब किसी एक को सम्पूर्ण व्यवस्था का एकमात्र आधार मान लिया जाता है, तब संतुलन बिगड़ने लगता है।

यदि भौतिक विज्ञान का ज्ञाता स्वयं को ही परम सत्ता मानकर प्रकृति को पूरी तरह अपने नियन्त्रण में करने का प्रयास करे, तो वह दिति के वंश से सम्बन्धित उस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी शक्ति को ही सर्वोपरि मानती है।

दूसरी ओर, यदि कोई मुक्त जीव केवल सभी जीवों को मुक्त करने का सिद्धान्त लेकर चले और सृष्टि में जीवों की निरन्तर उत्पत्ति तथा उनके जीवन की भूमिका को ही समाप्त कर देना चाहे, तो वहाँ भी सृष्टि की निरन्तरता बाधित होगी।

इस प्रकार मन्त्र की विशेष बुद्धि दोनों क्षेत्रों के बीच मर्यादा पहचानने में सहायक होती है। न पदार्थ को चेतना का स्वामी बनाना है और न चेतना की मुक्ति के नाम पर सृष्टि की निरन्तरता को नकारना है।

२. ये भ्राजन्ते — शक्ति के प्रकट होने की मर्यादा

ये उस विषय को आगे बढ़ाता है जिसकी चर्चा पिछले मन्त्रों में मरुतों के रूप में हुई है।

भ्राजन्ते का भाव है—तेजस्वी होना, प्रकाशित होना और अपनी शक्ति से प्रकट होना।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है: किसी शक्ति के प्रकट होने, विकसित होने और कार्य करने का उत्तरदायित्व किस प्रकार निर्धारित हो?

यदि सम्पूर्ण व्यवस्था का भार केवल एक ही पक्ष पर डाल दिया जाए, तो उसी पक्ष का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है। इसलिए चेतन और अचेतन की शक्तियों को उनके अपने-अपने क्षेत्र में समझना आवश्यक है।

मन्त्र का यह भाग शक्ति के प्राकट्य के साथ उसकी मर्यादा को भी विचार के केन्द्र में लाता है।

३. सुमखासः — मन की दो दिशाएँ

यहाँ सुमखासः को सुन्दर और विशेष मन के रूप में समझने पर मन की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामने आती है।

मन दो दिशाओं में गति कर सकता है। वह पुण्य की ओर भी प्रवृत्त हो सकता है और पाप की ओर भी। वह विवेक का साधन बन सकता है और अविवेक का कारण भी। उसी मन से जीव अपनी उन्नति के लिए संकल्प करता है और उसी मन से अपने पतन का मार्ग भी बना सकता है।

इसलिए मन को केवल अच्छा या बुरा कह देना पर्याप्त नहीं है। उसके संकल्प, दिशा और प्रयोग को समझना आवश्यक है।

मन की इसी विशेषता को यजुर्वेद के चौंतीसवें अध्याय के शिवसंकल्प मन्त्र अत्यन्त सुन्दर ढंग से व्यक्त करते हैं। प्रत्येक मन्त्र के अन्त में यही प्रार्थना आती है—

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु।

अर्थात् मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।

यजुर्वेद ३४.१ — जाग्रत् और सुप्त अवस्था में मन

ओ३म् यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदुसुप्तस्य तथैवैति। दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु॥

मन जाग्रत् अवस्था में दूर-दूर तक जाता है और सोते समय भी अपनी गति से सम्बन्ध बनाए रखता है। वह दूरगामी है और ज्योतियों की भी ज्योति कहा गया है।

यह मन्त्र मन की उस व्यापक क्षमता को सामने रखता है जो केवल शरीर की तत्काल उपस्थित क्रिया तक सीमित नहीं रहती।

यजुर्वेद ३४.२ — कर्म और विवेक में मन की भूमिका

येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः। यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥

मन के द्वारा मनीषी और धीर पुरुष यज्ञों तथा ज्ञान-विचार से सम्बन्धित कार्यों को सम्पन्न करते हैं। मन ही कर्म को दिशा देने और उसे विचारपूर्वक करने का साधन बनता है।

यहाँ मन की विशेषता उसके कर्म-संचालन में है। केवल शक्ति होना पर्याप्त नहीं; उस शक्ति को किस उद्देश्य के लिए लगाया जाता है, यह भी महत्त्वपूर्ण है।

यजुर्वेद ३४.३ — प्रज्ञान, चेतना और धृति

यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु। यस्मान्न ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥

इस मन्त्र में प्रज्ञान, चेतना, धृति और आन्तरिक ज्योति के साथ मन का सम्बन्ध व्यक्त होता है। कर्म की दिशा निर्धारित करने में मन की भूमिका के कारण उसका संकल्प कल्याणकारी होना आवश्यक है।

यजुर्वेद ३४.४ — भूत, वर्तमान और भविष्य से सम्बन्ध

येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्। येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥

मन उस व्यवस्था से सम्बन्ध रखता है जिसके अन्तर्गत भूत, वर्तमान और भविष्य का विचार किया जाता है। इस मन्त्र में सप्त होता वाले यज्ञ के विस्तार का भी उल्लेख है।

यहाँ मन को केवल व्यक्तिगत विचारों तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि व्यापक व्यवस्था को ग्रहण करने और उसके भीतर कर्म करने की क्षमता से जोड़ा गया है।

यजुर्वेद ३४.५ — वेद और प्राणियों का आधार

यस्मिन्नृचः साम यजूंषि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः। यस्मिँश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥

जिस प्रकार रथ के पहिए की तीलियाँ उसकी नाभि में जुड़ी रहती हैं, उसी प्रकार ऋक्, साम और यजुः उससे सम्बन्धित आधार में प्रतिष्ठित हैं। प्राणियों का चित्त भी उसी व्यापक सम्बन्ध में गुंथा हुआ बताया गया है।

यहाँ मन और चित्त की भूमिका को एक संगठित व्यवस्था के रूप में समझने का अवसर मिलता है।

यजुर्वेद ३४.६ — सारथि के समान मन

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव। हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥

जैसे कुशल सारथि लगाम से घोड़ों को उचित दिशा में ले जाता है, वैसे ही मनुष्य को दिशा देने में मन की भूमिका है। वह हृदय में प्रतिष्ठित, तीव्र और गतिशील कहा गया है।

इन छह मन्त्रों से मन की अनेक विशेषताएँ सामने आती हैं—उसकी दूरगामी गति, कर्मों को दिशा देने की क्षमता, प्रज्ञान और धृति से सम्बन्ध, व्यापक व्यवस्था को ग्रहण करना तथा सारथि की तरह इन्द्रियों और कर्मों का संचालन करना।

इसलिए सुमखासः के अन्तर्गत मन को विशेष स्थान देना उचित है। मन की शक्ति का मूल्यांकन केवल उसकी गति से नहीं, बल्कि उसके संकल्प और दिशा से होता है।

४. ऋष्टिभिः — मन और सृष्टि को समझने का साधन

मन्त्र में ऋष्टिभिः आता है। ऋष्टि का सामान्य अर्थ भाला अथवा नुकीला अस्त्र है। इस प्रसंग में इसे उस तीक्ष्ण साधन के रूप में भी समझा जा सकता है जिसके द्वारा किसी विषय के भीतर प्रवेश करके उसके रहस्य को जाना जाता है।

मन के साथ विशेष बुद्धि जुड़ने पर जीव सृष्टि की प्रक्रियाओं को समझने में समर्थ होता है। वह केवल बाहर दिखाई देने वाले रूप को नहीं देखता, बल्कि उसके आधार, उसकी गति और उसके परिवर्तन के कारणों का भी विचार करता है।

इस प्रकार मन और विशेष बुद्धि सृष्टि को समझने के साधन बनते हैं।

५. प्रच्यावयन्तः — प्राचीन शक्ति और प्राण का सम्बन्ध

प्रच्यावयन्तः में किसी अवस्था को उसके स्थान से हटाने, विचलित करने अथवा परिवर्तन की ओर ले जाने का भाव है।

आपकी विचार-यात्रा में इसे प्राचीन, अनादिकाल से चली आ रही उस शक्ति से जोड़ा गया है जो प्राण के सम्बन्ध से बल प्राप्त करती है। इस दृष्टि में मरुतों की शक्ति केवल स्थिर पदार्थ नहीं, बल्कि ऐसी गतिशील व्यवस्था है जिसमें प्राण और गति के सम्बन्ध से प्रभाव उत्पन्न होता है।

इस पद के माध्यम से स्थिरता और परिवर्तन के बीच का सम्बन्ध सामने आता है।

६. अच्युता — दृढ़ संकल्प की शक्ति

अच्युता का भाव है—जो अपने स्थान से विचलित न हो, जो दृढ़ बना रहे।

मन जब किसी संकल्प में स्थिर हो जाता है, तब वह कठिन से कठिन लक्ष्य को साधने का सामर्थ्य उत्पन्न कर सकता है। उसकी दृढ़ता उसे सामान्य अवस्था से असामान्य कार्य की ओर ले जाती है।

यहाँ अच्युता का सम्बन्ध मन की उसी स्थिरता से स्थापित होता है जिसके कारण संकल्प बार-बार बदलने के स्थान पर एक दिशा में बना रहता है।

७. चित् ओजसा — चेतना की छाया और संचित शक्ति

मन्त्र में चित् और ओजसा का सम्बन्ध विशेष ध्यान देने योग्य है।

चित् चेतना, चित्त अथवा बोध से सम्बन्धित है; ओजस् शक्ति और सामर्थ्य का बोध कराता है। इस प्रसंग में चेतना से सम्बन्धित शक्ति की अभिव्यक्ति पर विचार किया जा रहा है।

इसे सूर्य और चन्द्रमा के उदाहरण से समझ सकते हैं। चन्द्रमा स्वयं सूर्य के समान प्रकाश का स्रोत नहीं है, फिर भी सूर्य का प्रकाश ग्रहण करके वह अन्धकारमय रात्रि में प्रकाश देने वाला बन जाता है।

इसी प्रकार विद्युत् बैटरी में संचित होकर एक निश्चित अवधि तक विद्युत्-शक्ति के उपयोग का माध्यम बनती है। यहाँ मुख्य बात शक्ति का स्रोत, उसका ग्रहण, उसका संचय और उसका उपयोग है।

इस प्रकार चित् ओजसा के अन्तर्गत चेतना, शक्ति और उसके प्रकट प्रभाव के सम्बन्ध पर विचार किया जा सकता है।

८. मनोजुवः — मन के समान तीव्र गति

मनोजुवः का अर्थ है—मन के समान तीव्र गति वाले।

मन की गति को यहाँ मरुतों की तीव्रता समझने का आधार बनाया गया है। मन किसी स्थान या वस्तु का विचार करते ही वहाँ पहुँच जाता है, जबकि स्थूल शरीर को वहाँ पहुँचने के लिए समय और दूरी से गुजरना पड़ता है।

इस पद में मरुतों की गति का वर्णन करते हुए मन की गतिशीलता को विशेष महत्त्व दिया गया है।

९. यन्मरुतो रथेष्वा — मरुत और जीव का शरीर

इस पद में मरुतों का रथों के साथ सम्बन्ध आता है। आपकी व्याख्या में मरुतों की शक्ति जीव के शरीर और उसकी क्रियाशील व्यवस्था से जुड़ती है।

रथ गति का माध्यम है। उसी प्रकार शरीर जीव की स्थूल क्रियाओं का माध्यम बनता है। मन की गति, संकल्प और शरीर की क्रियाओं के बीच सम्बन्ध स्थापित होने पर जीव अपने संकल्पों को कर्म में परिणत कर सकता है।

यहाँ रथ को केवल वाहन के रूप में देखने के स्थान पर शक्ति के संचालन का माध्यम मानकर विचार आगे बढ़ता है।

१०. वृषव्रातासः — शक्ति का समूह और वर्षा का उदाहरण

वृषव्रातासः शक्तिशाली समूह का बोध कराता है। आपकी विचार-यात्रा में इसे वर्षा और जल-संचरण के उदाहरण से समझा जा सकता है।

सागर में जल का विशाल भण्डार रहता है। वर्षा की प्रक्रिया में वही जल वाष्प, बादल और वर्षा के विभिन्न रूपों से होकर उन स्थानों तक पहुँचता है जहाँ सागर प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित नहीं होता।

इस उदाहरण में मूल स्रोत, परिवर्तन, संचरण और दूरस्थ स्थान पर प्रकट होने की प्रक्रिया एक साथ दिखाई देती है। आकाश में बादलों का समूह किसी स्थान पर जल से भरे सागर जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है, जबकि उसका मूल स्रोत कहीं और होता है।

इसी प्रकार मरुतों के समूह को एक ऐसी शक्ति-व्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है जो अपने मूल से सम्बन्ध रखते हुए विभिन्न स्थानों और अवस्थाओं में कार्य करती है।

११. पृषतीरयुग्ध्वम् — मरुतों के मूल स्रोत की ओर संकेत

मन्त्र का अन्तिम पद है—पृषतीरयुग्ध्वम्।

पृषतीः मरुतों के रथों से सम्बन्धित पृषती शक्तियों या वाहनों का बोध कराता है, और अयुग्ध्वम् का अर्थ है—जोता, जोड़ा अथवा रथ में लगाया।

आपकी व्याख्या में यहाँ विचार मरुतों के मूल उद्गम की ओर लौटता है। पिछले मन्त्र में मूल ध्वनि और वाणी से पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं के प्रकट होने की जो विचार-यात्रा आरम्भ हुई थी, उसी के सन्दर्भ में मरुतों के स्रोत को ध्वनि और वाणी से जोड़ा जा रहा है।

इस क्रम में ध्वनि मूल अभिव्यक्ति का आधार है। उससे सम्बन्धित शक्ति जब विभिन्न अवस्थाओं में प्रकट होती है, तो गति, संचरण और संयोजन के रूप सामने आते हैं। इस प्रकार मन्त्र का अन्तिम पद मरुतों की गतिशील व्यवस्था को उनके मूल उद्गम से जोड़ने का संकेत देता है।

समग्र भावार्थ

ऋग्वेद १.८५.४ में विशेष बुद्धि, मन की द्विमुखी प्रवृत्ति, दृढ़ संकल्प, चेतना और शक्ति के सम्बन्ध तथा मरुतों की गतिशील व्यवस्था पर विचार किया गया है।

मन पुण्य और पाप, उन्नति और पतन—दोनों दिशाओं में गति कर सकता है। इसलिए उसकी गति को विवेक और कल्याणकारी संकल्प से निर्देशित करना आवश्यक है। यजुर्वेद के शिवसंकल्प मन्त्र इसी आवश्यकता को स्पष्ट करते हैं।

मरुतों की शक्ति का वर्णन करते हुए मन्त्र गति, स्थिरता पर प्रभाव, शक्ति के संचय और उसके संयोजन को सामने रखता है। रथ और पृषती के उल्लेख से यह विचार मूल स्रोत से निकलकर विभिन्न माध्यमों में कार्य करने वाली व्यवस्था तक पहुँचता है।

इस प्रकार मन्त्र की विचार-यात्रा में मन केवल व्यक्तिगत विचार का साधन नहीं रहता; वह संकल्प, कर्म, शक्ति और सृष्टि को समझने की प्रक्रिया का केन्द्र बन जाता है।

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