श्लोक १
ऋषय ऊचुः—
शप्ता गंधर्वपुत्रेण सुशंखेन महात्मना । तस्य शापात्कथं जाता किं किं कर्म कृतं तया ॥१॥
शब्दार्थ :
- शप्ता — शाप दी गई।
- गन्धर्वपुत्रेण — गन्धर्व के पुत्र द्वारा।
- सुशङ्खेन — सुशङ्ख नामक गन्धर्वपुत्र से।
- महात्मना — महात्मा, महान् आत्मबल वाले।
- तस्य शापात् — उसके शाप के कारण।
- कथम् — किस प्रकार।
- जाता — उत्पन्न हुई अथवा उस अवस्था को प्राप्त हुई।
- किं किं कर्म — कौन-कौन से कर्म।
- कृतं तया — उसके द्वारा किए गए।
भावार्थ : ऋषियों ने पूछा—महात्मा गन्धर्वपुत्र सुशङ्ख ने सुनीथा को शाप क्यों दिया? उस शाप के कारण उसके जीवन में क्या परिवर्तन हुआ और उसने ऐसे कौन-कौन से कर्म किए थे जिनके कारण यह परिस्थिति उत्पन्न हुई?
व्याख्या : अध्याय का आरम्भ किसी घटना का केवल वर्णन करने से नहीं, बल्कि उसके कारण को जानने की जिज्ञासा से होता है। ऋषि सुनीथा को मिले शाप, उसके पूर्ववर्ती कर्म और उससे उत्पन्न जीवन-परिणाम—इन तीनों को एक साथ समझना चाहते हैं।
यहाँ कथा का केन्द्र केवल शाप देने वाला व्यक्ति नहीं है। प्रश्न यह है कि सुनीथा के आचरण में ऐसा क्या था जिसने इस परिणाम को जन्म दिया। इस प्रकार कथा कर्म, उसके कारण और उसके फल के बीच संबंध स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ती है।
श्लोक २
सा लेभे कीदृशं पुत्रं तस्य शापाद्द्विजोत्तम । सुनीथायाश्च चरितं त्वं नो विस्तरतो वद ॥२॥
शब्दार्थ :
- सा — वह सुनीथा।
- लेभे — प्राप्त किया।
- कीदृशम् — कैसा।
- पुत्रम् — पुत्र।
- तस्य शापात् — उस शाप के परिणामस्वरूप।
- द्विजोत्तम — हे श्रेष्ठ द्विज।
- सुनीथायाः — सुनीथा का।
- चरितम् — चरित्र, जीवन-वृत्त।
- विस्तरतः — विस्तारपूर्वक।
- वद — कहिए।
भावार्थ : हे द्विजश्रेष्ठ! सुनीथा ने उस शाप के कारण किस प्रकार के पुत्र को जन्म दिया? उसके जीवन में आगे क्या हुआ? कृपया सुनीथा के संपूर्ण चरित्र का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
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पुत्र का उल्लेख इस कथा को वंश और पीढ़ियों की निरन्तरता से जोड़ता है। किसी व्यक्ति का आचरण उसके अपने जीवन तक सीमित नहीं रहता; उससे उत्पन्न परिस्थितियाँ आगे के जीवन-क्रम को भी प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए सुनीथा के चरित्र को समझने के लिए उसके पुत्र की कथा भी आवश्यक है।
श्लोक ३
सूत उवाच—
सुशंखेनापि तेनैव सा शप्ता तनुमध्यमा । पितुः स्थानं गता सा तु सुनीथा दुःखपीडिता ॥३॥
शब्दार्थ :
- सुशङ्खेन — सुशङ्ख द्वारा।
- अपि — भी।
- तेन एव — उसी के द्वारा।
- सा — वह सुनीथा।
- शप्ता — शापित हुई।
- तनुमध्यमा — पतली कमर वाली, सुन्दर देह वाली स्त्री।
- पितुः स्थानम् — पिता के स्थान पर, पिता के पास।
- गता — गई।
- दुःखपीडिता — दुःख से पीड़ित।
भावार्थ : सूतजी ने कहा—सुशङ्ख ने उस तनुमध्यमा सुनीथा को शाप दिया। शाप से दुःखी होकर वह अपने पिता मृत्यु के पास चली गई।
व्याख्या : ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देते हुए सूतजी कथा को उसके मूल प्रसंग पर ले आते हैं। शाप के पश्चात् सुनीथा अपने पिता के पास जाती है। यह केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, बल्कि उस परिस्थिति में मार्गदर्शन की आवश्यकता का संकेत भी है।
जब किसी कर्म का परिणाम सामने आता है, तब व्यक्ति को अपने आचरण और उसके प्रभाव को समझने की आवश्यकता होती है। सुनीथा का अपने पिता के पास जाना इसी क्रम का अगला चरण है। अब मृत्यु उसके कर्म और उसके परिणाम के विषय में उसे समझाएगा।
श्लोक ४
पितरं चात्मनश्चैव चरितं च प्रकाशितम् । श्रुतवान्सोपि धर्मात्मा मृत्युः सत्यवतां वरः ॥४॥
शब्दार्थ :
- पितरम् — पिता को।
- आत्मनः — अपने।
- च एव — और भी।
- चरितम् — चरित्र, आचरण का वृत्तान्त।
- प्रकाशितम् — प्रकट हुआ, बताया गया।
- श्रुतवान् — सुनने वाला हुआ, उसने सुना।
- सः अपि — उसने भी।
- धर्मात्मा — धर्मस्वरूप, धर्म का ज्ञाता।
- मृत्युः — मृत्यु।
- सत्यवताम् वरः — सत्य का पालन करने वालों में श्रेष्ठ।
भावार्थ : सुनीथा ने अपने पिता के सामने अपना और संबंधित घटना का वृत्तान्त प्रकट किया। धर्मात्मा तथा सत्यवादियों में श्रेष्ठ मृत्यु ने उसकी बात सुनी।
व्याख्या : यहाँ सुनीथा के जीवन की घटना उसके पिता के सामने स्पष्ट होती है। किसी परिस्थिति का सही आकलन करने के लिए पहले उसके वास्तविक वृत्तान्त को जानना आवश्यक है। मृत्यु उसकी बात सुनता है और आगे उसके आचरण का विश्लेषण करते हुए उसे उसके कर्म का स्वरूप समझाता है।
इस प्रसंग में मृत्यु केवल जीवन के अंत का नाम नहीं, बल्कि कथा का ऐसा पात्र है जो कर्म और परिणाम के संबंध को स्पष्ट करता है। उसका कथन सुनीथा को उसके व्यवहार के नैतिक और आध्यात्मिक परिणामों से परिचित कराता है।
श्लोक ५
तामुवाच सुनीथां तु सुतां शप्तां महात्मना । भवत्या दुष्कृतं पापं धर्मतेजः प्रणाशनम् ॥५॥
शब्दार्थ :
- ताम् — उस सुनीथा को।
- उवाच — कहा।
- सुताम् — पुत्री को।
- शप्ताम् — शापित हुई।
- महात्मना — महात्मा द्वारा।
- भवत्या — तुम्हारे द्वारा।
- दुष्कृतम् — अनुचित कर्म किया गया।
- पापम् — पाप, दोषपूर्ण आचरण।
- धर्मतेजः — धर्म का तेज, धर्म से उत्पन्न शक्ति।
- प्रणाशनम् — नष्ट करने वाला।
भावार्थ : मृत्यु ने शापित हुई अपनी पुत्री सुनीथा से कहा—तुमने ऐसा अनुचित कर्म किया है जो धर्म के तेज का नाश करने वाला है।
व्याख्या : मृत्यु सुनीथा के कर्म को केवल एक साधारण भूल नहीं मानता। वह उसके आचरण को धर्मतेज के विनाश से जोड़ता है। धर्मतेज का अर्थ केवल बाहरी प्रतिष्ठा या शक्ति नहीं, बल्कि वह आंतरिक सामर्थ्य भी है जो संयम, सत्य, तप और धर्माचरण से उत्पन्न होता है।
किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति अनुचित व्यवहार करना जो संयम और तप में स्थित है, उसके प्रति किए गए आचरण से आगे बढ़कर धर्म के प्रति किए गए आचरण का प्रश्न बन जाता है। इसी कारण मृत्यु सुनीथा को उसके कर्म की गंभीरता समझाता है।
श्लोक ६
कस्मात्कृतं महाभागे सुशांतस्य हि ताडनम् । विरुद्धं सर्वलोकस्य भवत्या परिकल्पितम् ॥६॥
शब्दार्थ :
- कस्मात् — क्यों।
- कृतम् — किया गया।
- महाभागे — हे सौभाग्यवती।
- सुशान्तस्य — सुशान्त नामक व्यक्ति का।
- हि — निश्चय ही।
- ताडनम् — मारना, दण्ड देना, आघात पहुँचाना।
- विरुद्धम् — प्रतिकूल, अनुचित।
- सर्वलोकस्य — समस्त लोक के धर्म और मर्यादा के विरुद्ध।
- भवत्या — तुम्हारे द्वारा।
- परिकल्पितम् — किया गया, ठहराया गया।
भावार्थ : मृत्यु ने पूछा—हे महाभागे! तुमने सुशान्त को क्यों मारा? तुम्हारे द्वारा किया गया यह आचरण समस्त लोक की मर्यादा के प्रतिकूल है।
व्याख्या : यहाँ मृत्यु उस विशेष कर्म की ओर संकेत करता है जिसके कारण सुनीथा को शाप मिला। सुशान्त का ताड़न केवल किसी व्यक्ति के शरीर पर आघात करना नहीं, बल्कि उसके आचरण और अवस्था की उपेक्षा करके उसके प्रति अनुचित व्यवहार करना है।
अगले श्लोक में सुशान्त की विशेषताओं का वर्णन आता है। इससे स्पष्ट होगा कि मृत्यु का प्रश्न केवल दण्ड देने या न देने का नहीं, बल्कि यह समझने का है कि किसी व्यक्ति के साथ व्यवहार करते समय उसके वास्तविक स्वभाव और आचरण को पहचानना कितना आवश्यक है।
श्लोक ७
कामक्रोधविहीनं तं सुशान्तं धर्मवत्सलम् । तपोमार्गे विलीनं च परब्रह्मणि संस्थितम् ॥७॥
शब्दार्थ :
- काम — इच्छा अथवा वासना।
- क्रोध — रोष।
- विहीनम् — रहित।
- तम् — उस व्यक्ति को।
- सुशान्तम् — अत्यन्त शांत।
- धर्मवत्सलम् — धर्म से प्रेम करने वाला।
- तपोमार्गे — तपस्या के मार्ग में।
- विलीनम् — पूर्णतः निमग्न।
- परब्रह्मणि — परब्रह्म में।
- संस्थितम् — स्थित।
भावार्थ : सुशान्त काम और क्रोध से रहित, अत्यन्त शांत, धर्मप्रिय तथा तपस्या के मार्ग में पूर्णतः निमग्न था। उसका चित्त परब्रह्म में स्थित था।
व्याख्या : यह श्लोक सुशान्त की आंतरिक अवस्था का परिचय देता है। उसकी विशेषता केवल बाहरी शांति नहीं, बल्कि काम और क्रोध से मुक्ति, धर्म के प्रति अनुराग तथा परब्रह्म में चित्त की स्थिरता है।
काम और क्रोध से संचालित व्यक्ति की वृत्तियाँ प्रायः तत्काल प्रतिक्रिया करती हैं; इसके विपरीत, तप और आत्मसंयम में स्थित व्यक्ति अपनी वृत्तियों को नियंत्रित करता है। सुशान्त की स्थिति इसी संयम की ओर संकेत करती है।
मृत्यु सुनीथा को बताता है कि उसने ऐसे व्यक्ति को आघात पहुँचाया जो तपस्या और ब्रह्मचिन्तन में स्थित था। इस प्रकार अनुचित ताड़न का कारण केवल बाहरी घटना नहीं, बल्कि सुनीथा की उस समय की वृत्ति भी है जिसने उसे सामने वाले की अवस्था का विचार किए बिना कर्म करने के लिए प्रेरित किया।
श्लोक ८
तमेवघातयेद्यो वै तस्य पापं शृणुष्व हि । पापात्मा जायते पुत्रः किल्बिषं लभते बहु ॥८॥
शब्दार्थ :
- तम् एव — उसी को।
- घातयेत् — मारे अथवा आघात पहुँचाए।
- यः — जो व्यक्ति।
- तस्य — उसका।
- पापम् — पाप का परिणाम।
- शृणुष्व — सुनो।
- हि — निश्चय ही।
- पापात्मा — पापपूर्ण वृत्तियों वाला।
- जायते — उत्पन्न होता है।
- पुत्रः — पुत्र।
- किल्बिषम् — पाप, दोष।
- लभते — प्राप्त करता है।
- बहु — बहुत अधिक।
भावार्थ : मृत्यु कहता है—जो ऐसे व्यक्ति का वध करता है अथवा उसे आघात पहुँचाता है, उसके कर्म का परिणाम सुनो। वह पापपूर्ण वृत्तियों वाले पुत्र को प्राप्त करता है और बहुत से दोषों का भागी बनता है।
व्याख्या : इस श्लोक में कर्म के परिणाम को वंश और संतान के प्रसंग से जोड़ा गया है। सुनीथा के चरित्र की कथा में यह बात आगे विशेष महत्त्व प्राप्त करेगी, क्योंकि उसके पुत्र का जीवन भी इस कथा की अगली कड़ी है।
यहाँ पुत्र का पापात्मा होना कर्मफल के व्यापक परिणाम के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसे कथा के भीतर कर्म, संस्कार और वंशगत जीवन-क्रम के संबंध में पढ़ना चाहिए। अनुचित कर्म केवल तत्कालीन घटना तक सीमित नहीं रहता; उसके फल कथा में आगे की पीढ़ी के माध्यम से भी प्रकट होते हैं।
श्लोक ९
ताडंतं ताडयेद्यो वै क्रोशंतं क्रोशयेत्पुनः । तस्य पापं स वै भुंक्ते ताडितस्य न संशयः ॥९॥
शब्दार्थ :
- ताडन्तम् — आघात सहते हुए अथवा आघात करने वाले को।
- ताडयेत् — मारे, आघात पहुँचाए।
- यः — जो।
- वै — निश्चय ही।
- क्रोशन्तम् — चिल्लाते हुए व्यक्ति को।
- क्रोशयेत् — उसे और रुलाए अथवा चिल्लाने पर विवश करे।
- पुनः — फिर।
- तस्य पापम् — उस कर्म का पाप।
- सः — वह।
- भुङ्क्ते — भोगता है।
- ताडितस्य — जिस पर आघात किया गया।
- न संशयः — इसमें संदेह नहीं।
भावार्थ : जो व्यक्ति पहले से आघात सह रहे व्यक्ति को फिर आघात पहुँचाता है, अथवा दुःख से चिल्ला रहे व्यक्ति को और कष्ट देता है, वह उस कर्म के पाप का भागी बनता है। इसमें संदेह नहीं है।
व्याख्या : यह श्लोक पीड़ा के प्रति संवेदनशीलता का सिद्धान्त सामने रखता है। किसी व्यक्ति को पहले से कष्ट हो रहा हो और उसके बाद भी उसे और पीड़ा दी जाए, तो यह केवल प्रारम्भिक आघात की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसकी पीड़ा की उपेक्षा भी है।
कथा में सुशान्त तपस्या और शांति में स्थित था। उसके प्रति किया गया अनुचित व्यवहार इसी कारण अधिक गंभीर माना गया है। किसी की दुर्बल अवस्था का लाभ उठाकर उसे और कष्ट पहुँचाना आचरण की उस वृत्ति को प्रकट करता है जो संयम और करुणा के विपरीत है।
श्लोक १०
स वै शान्तः स जितात्मा ताडयन्तं न ताडयेत् । निर्दोषं प्रति येनापि ताडनं च कृतं सुते ॥१०॥
शब्दार्थ :
- सः वै — वही निश्चय ही।
- शान्तः — शांत।
- जितात्मा — जिसने अपने मन और इन्द्रियों को जीत लिया हो।
- ताडयन्तम् — आघात करने वाले को।
- न ताडयेत् — स्वयं आघात न करे।
- निर्दोषम् — निर्दोष व्यक्ति को।
- प्रति — के प्रति।
- येन अपि — जिसके द्वारा भी।
- ताडनम् — आघात।
- कृतम् — किया गया।
- सुते — हे पुत्री।
भावार्थ : हे पुत्री! वास्तविक शांत और जितेन्द्रिय व्यक्ति प्रतिआघात करने की वृत्ति से संचालित नहीं होता। निर्दोष व्यक्ति पर आघात करना अनुचित है; आत्मसंयम का अर्थ है कि व्यक्ति अपनी प्रतिक्रिया को भी नियंत्रित रखे।
व्याख्या : इस श्लोक का मुख्य विषय आत्मसंयम है। शांत व्यक्ति होने का अर्थ केवल बाहरी रूप से शांत दिखाई देना नहीं, बल्कि उस समय भी अपनी वृत्तियों को नियंत्रित रखना है जब कोई दूसरा व्यक्ति अनुचित व्यवहार करे।
यहाँ कथा दो अवस्थाओं के बीच अंतर स्पष्ट करती है—एक ओर आवेग में किया गया कर्म है और दूसरी ओर जितात्मा की स्थिति। जितात्मा अपने व्यवहार का निर्धारण केवल दूसरे की प्रतिक्रिया से नहीं करता; वह अपने भीतर संयम और विवेक बनाए रखता है।
श्लोक ११
पश्चान्मोहेन पापेन निर्दोषेऽपि च ताडयेत् । निर्दोषं प्रति येनापि हृद्रोगः क्रियते वृथा ॥११॥
शब्दार्थ :
- पश्चात् — बाद में।
- मोहेन — मोह के कारण।
- पापेन — पापपूर्ण वृत्ति से।
- निर्दोषे अपि — निर्दोष व्यक्ति के प्रति भी।
- ताडयेत् — आघात करे।
- हृद्रोगः — हृदय का रोग; यहाँ मानसिक पीड़ा अथवा आंतरिक क्लेश।
- क्रियते — उत्पन्न किया जाता है।
- वृथा — व्यर्थ, बिना उचित कारण।
भावार्थ : जो व्यक्ति मोह और पापपूर्ण वृत्ति से निर्दोष को आघात पहुँचाता है, वह उसके भीतर व्यर्थ ही हृदय-क्लेश उत्पन्न करता है।
व्याख्या : यहाँ हृद्रोग का अर्थ केवल शारीरिक रोग तक सीमित नहीं है। निर्दोष व्यक्ति को अनुचित आघात पहुँचाने से उसके भीतर दुःख, भय, क्षोभ और मानसिक पीड़ा भी उत्पन्न हो सकती है।
मोह व्यक्ति को वास्तविक स्थिति का सही ज्ञान नहीं होने देता। वह अपनी वृत्ति के प्रभाव में दूसरे को दोषी मान बैठता है और बिना उचित कारण उसे कष्ट देता है। इसलिए मृत्यु सुनीथा को समझाता है कि किसी पर आघात करने से पहले उसके दोष और निर्दोषता का विचार आवश्यक है।
श्लोक १२
निर्दोषं ताडयेत्पश्चान्मोहात्पापेन केनचित् । स पापी पापमाप्नोति निर्दोषस्य शरीरजम् ॥१२॥
शब्दार्थ :
- निर्दोषम् — दोषरहित व्यक्ति को।
- ताडयेत् — आघात पहुँचाए।
- पश्चात् — बाद में।
- मोहात् — मोह के कारण।
- पापेन — पापपूर्ण वृत्ति से।
- केनचित् — किसी कारण अथवा किसी प्रकार।
- सः पापी — वह पाप करने वाला।
- पापम् आप्नोति — पाप का फल प्राप्त करता है।
- निर्दोषस्य — निर्दोष व्यक्ति का।
- शरीरजम् — शरीर से उत्पन्न, शरीर पर किए गए आघात से संबंधित।
भावार्थ : जो व्यक्ति मोह के कारण किसी निर्दोष को आघात पहुँचाता है, वह पाप का भागी बनता है और निर्दोष के शरीर को पहुँचाई गई पीड़ा से संबंधित कर्मफल प्राप्त करता है।
व्याख्या : यहाँ निर्दोष व्यक्ति के शरीर का उल्लेख कर्म की प्रत्यक्षता को सामने लाता है। आचरण का प्रभाव केवल विचार में नहीं रहता; वह दूसरे के शरीर, मन और जीवन पर भी पड़ता है।
मोह में किया गया कर्म भी कर्म ही है। यदि व्यक्ति बिना उचित कारण किसी निर्दोष को पीड़ा पहुँचाता है, तो केवल यह कहना कि उसने मोहवश ऐसा किया, उसके कर्म के परिणाम को समाप्त नहीं कर देता। कथा इसी कारण कर्म करने से पहले विवेक और आत्मसंयम की आवश्यकता पर बल देती है।
श्लोक १३
निर्दोषो घातयेत्तं वै ताडयन्तं पापचेतसम् । पुनरुत्थाय वेगेन साहसात्पापचेतनम् ॥१३॥
शब्दार्थ :
- निर्दोषः — निर्दोष व्यक्ति।
- घातयेत् — मार डाले अथवा घात करे।
- तम् — उस व्यक्ति को।
- ताडयन्तम् — आघात करने वाले को।
- पापचेतसम् — पापपूर्ण चित्त वाला।
- पुनः — फिर।
- उत्थाय — उठकर।
- वेगेन — वेगपूर्वक।
- साहसात् — आवेग अथवा दुस्साहस से।
भावार्थ : यह श्लोक उस परिस्थिति का उल्लेख करता है जिसमें निर्दोष व्यक्ति पर पापपूर्ण चित्त वाला व्यक्ति आघात करता है और उसके प्रत्युत्तर में हिंसक प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में आवेग से उठाया गया कदम स्वयं एक नई कर्म-श्रृंखला को जन्म दे सकता है।
व्याख्या : इस श्लोक का पाठ कुछ स्थानों पर वाक्य-संरचना की दृष्टि से अस्पष्ट है। इसके बाद के श्लोक में पाप के परिणाम और निर्दोष के प्रति ताड़न की निषेधात्मक शिक्षा आती है। इसलिए इस श्लोक को भी उसी प्रसंग में पढ़ना उचित है—अनुचित आघात, उसके प्रत्युत्तर और उससे उत्पन्न होने वाले कर्मफल के संदर्भ में।
कथा का उद्देश्य हिंसक प्रतिक्रिया को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करना है कि पापपूर्ण वृत्ति से उत्पन्न कर्म किस प्रकार आगे नए कर्मों को जन्म दे सकता है।
श्लोक १४
पापकर्तुश्च यत्पापं निर्दोषं प्रति गच्छति । ताडनं नैव तस्माद्वै कार्यं दोषवतोऽपि च ॥१४॥
शब्दार्थ :
- पापकर्तुः — पाप करने वाले का।
- यत् पापम् — जो पाप अथवा दोष।
- निर्दोषम् प्रति — निर्दोष व्यक्ति के प्रति।
- गच्छति — पहुँचता है, आरोपित होता है।
- ताडनम् — आघात अथवा दण्ड।
- न एव — कदापि नहीं।
- तस्मात् — इसलिए।
- कार्यम् — किया जाना चाहिए।
- दोषवतः अपि — दोषयुक्त व्यक्ति के प्रति भी।
भावार्थ : पाप करने वाले का दोष निर्दोष व्यक्ति पर नहीं थोपा जाना चाहिए। इसलिए किसी व्यक्ति को आघात पहुँचाना उचित नहीं है; दण्ड देने के प्रसंग में भी दोष और निर्दोषता का विचार आवश्यक है।
व्याख्या : यहाँ कथा एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त स्थापित करती है—कर्म का दोष उसी के साथ संबंधित होना चाहिए जिसने वह कर्म किया है। किसी निर्दोष को दूसरे के अपराध का भागी बनाना स्वयं अन्याय है।
श्लोक में ताड़न के विषय में व्यापक निषेध का भाव है। इसका केंद्र यह है कि आवेग, मोह अथवा गलत आरोप के आधार पर किसी को पीड़ा न दी जाए। न्याय का आधार वास्तविक आचरण और विवेक होना चाहिए, न कि क्रोध या अनुमान।
श्लोक १५
दुष्कृतं च महत्पुत्रि त्वयैव परिपालितम् । शप्ता तेनापि याद्यैव तस्मात्पुण्यं समाचर ॥१५॥
शब्दार्थ :
- दुष्कृतम् — बुरा कर्म, अनुचित आचरण।
- महत् — बड़ा, गंभीर।
- पुत्रि — हे पुत्री।
- त्वया एव — तुम्हारे द्वारा ही।
- परिपालितम् — किया गया, बनाए रखा गया।
- शप्ता — शापित हुई।
- तेन अपि — उसके द्वारा भी।
- यत्/याद्यैव — यहाँ पाठ में पद कुछ अस्पष्ट है; प्रसंग शापित होने की घटना से संबंधित है।
- तस्मात् — इसलिए।
- पुण्यम् — पुण्य, शुभ कर्म।
- समाचर — आचरण करो।
भावार्थ : मृत्यु अपनी पुत्री से कहता है—हे पुत्री! तुमने गंभीर अनुचित कर्म किया है और उसी के परिणामस्वरूप शापित हुई हो। अब उस कर्म से शिक्षा लेकर पुण्याचरण करो।
व्याख्या : यहाँ पिता का उद्देश्य केवल सुनीथा को दोषी ठहराना नहीं है। वह उसे उसके आचरण का परिणाम दिखाकर परिवर्तन की दिशा भी बताता है। शाप उसके जीवन में घटित हो चुका है; अब उसके सामने प्रश्न है कि वह इस अनुभव के बाद किस मार्ग को अपनाती है।
कर्मफल का बोध तभी उपयोगी होता है जब वह व्यक्ति को अपनी वृत्तियों की समीक्षा और आचरण के परिवर्तन की ओर ले जाए। इसी कारण मृत्यु अगले श्लोकों में सुनीथा को सत्संग, योग, ध्यान और ज्ञान का मार्ग बताता है।
श्लोक १६
सतां संगं समासाद्य सदैव परिवर्तय । योगध्यानेन ज्ञानेन परिवर्तय नंदिनि ॥१६॥
शब्दार्थ :
- सताम् — सज्जनों, संतों और सत्य में स्थित व्यक्तियों का।
- सङ्गम् — संगति।
- समासाद्य — प्राप्त करके।
- सदा एव — सदैव।
- परिवर्तय — स्वयं को बदलो।
- योग — आत्मसंयम और योगाभ्यास।
- ध्यानेन — ध्यान द्वारा।
- ज्ञानेन — ज्ञान द्वारा।
- नन्दिनि — हे प्रिय पुत्री।
भावार्थ : हे पुत्री! सत्पुरुषों की संगति प्राप्त करके अपने आचरण और चित्त को बदलो। योग, ध्यान और ज्ञान के द्वारा अपनी वृत्तियों को परिवर्तित करो।
व्याख्या : यह श्लोक सुनीथा के जीवन में परिवर्तन का स्पष्ट मार्ग प्रस्तुत करता है। उसके सामने केवल अपने पूर्वकर्म पर पछताने का विकल्प नहीं है; वह अपने चित्त को नई दिशा दे सकती है।
सत्संग का अर्थ केवल संतों के निकट बैठना नहीं, बल्कि उनके आचरण, संयम, विचार और जीवन-पद्धति से प्रभावित होकर स्वयं में परिवर्तन लाना है। योग चित्त को अनुशासित करता है, ध्यान उसे स्थिर करता है और ज्ञान सही तथा गलत के बीच विवेक उत्पन्न करता है।
इस प्रकार सत्संग, योग, ध्यान और ज्ञान परस्पर जुड़े हुए साधन हैं। इनका उद्देश्य केवल बाहरी व्यवहार बदलना नहीं, बल्कि उस वृत्ति को बदलना है जिससे व्यवहार उत्पन्न होता है।
श्लोक १७
सतां संगो महापुण्यो बहुश्रेयो विधायकः । बाले पश्य सुदृष्टांतं सतां संगस्य यद्गुणम् ॥१७॥
शब्दार्थ :
- सताम् सङ्गः — सज्जनों की संगति।
- महापुण्यः — महान् पुण्य देने वाला।
- बहुश्रेयः — अनेक प्रकार का कल्याण।
- विधायकः — उत्पन्न करने वाला।
- बाले — हे बालिके।
- पश्य — देखो।
- सु-दृष्टान्तम् — अच्छा उदाहरण।
- यत् गुणम् — जो गुण अथवा प्रभाव।
भावार्थ : हे पुत्री! सत्पुरुषों का संग महान् पुण्य और अनेक प्रकार का कल्याण उत्पन्न करता है। अब सत्संग के गुण को एक अच्छे उदाहरण से समझो।
व्याख्या : मृत्यु अब अपने कथन को उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करने की तैयारी करता है। केवल उपदेश देने की अपेक्षा किसी परिचित प्राकृतिक प्रक्रिया के माध्यम से सिद्धान्त को समझाना अधिक प्रभावशाली होता है।
सत्संग का प्रभाव व्यक्ति की वृत्तियों पर पड़ता है। जिस प्रकार किसी शुद्ध वस्तु के संपर्क से दूसरी वस्तु में परिवर्तन हो सकता है, उसी प्रकार सत्य, संयम और ज्ञान में स्थित व्यक्तियों के संपर्क से मनुष्य के आचरण में भी परिवर्तन आ सकता है। अगले श्लोकों में जल और अग्नि के उदाहरण इसी बात को स्पष्ट करते हैं।
श्लोक १८
अपां संस्पर्शनात्पानात्स्नानात्तत्र महाधियः । मुनयः सिद्धिमायांति बाह्याभ्यंतरक्षालिताः ॥१८॥
शब्दार्थ :
- अपाम् — जल का।
- संस्पर्शनात् — स्पर्श करने से।
- पानात् — पीने से।
- स्नानात् — स्नान करने से।
- तत्र — उस जल में अथवा उसके माध्यम से।
- महाधियः — महान् बुद्धि वाले।
- मुनयः — मुनिजन।
- सिद्धिम् — सिद्धि, आध्यात्मिक उपलब्धि।
- आयान्ति — प्राप्त करते हैं।
- बाह्य-अभ्यन्तर — बाहर और भीतर।
- क्षालिताः — शुद्ध किए हुए।
भावार्थ : पवित्र जल के स्पर्श, पान और स्नान से मुनिजन बाहरी तथा भीतरी शुद्धि प्राप्त करते हैं और साधना में सिद्धि की ओर बढ़ते हैं।
व्याख्या : यहाँ जल को शुद्धि के उदाहरण के रूप में रखा गया है। स्नान शरीर को स्वच्छ करता है, जल का पान शरीर की आवश्यकता पूरी करता है और पवित्र जल से संबंधित धार्मिक आचरण मनुष्य के भीतर श्रद्धा तथा शुद्धता की भावना उत्पन्न करता है।
श्लोक का अगला भाग बाह्य और आंतरिक शुद्धि को एक साथ रखता है। कथा इसी आधार पर सत्पुरुषों की संगति का उदाहरण प्रस्तुत करेगी। जिस प्रकार जल के संपर्क को शुद्धि से जोड़ा गया है, उसी प्रकार सत्संग को चित्त और आचरण के शुद्धीकरण से जोड़ा गया है।
श्लोक १९
शुचिष्मंतो भवन्त्येते लोकाः सर्वे चराचराः । आपः शान्ताः सुशीताश्च मृदुगात्राः प्रियंकराः ॥१९॥
शब्दार्थ :
- शुचिष्मन्तः — शुद्धता से युक्त।
- भवन्ति — हो जाते हैं।
- एते लोकाः — ये लोक अथवा प्राणी।
- सर्वे — सभी।
- चराचराः — चलने वाले और स्थिर रहने वाले।
- आपः — जल।
- शान्ताः — शांत, शीतल प्रभाव वाले।
- सुशीताः — अत्यन्त शीतल।
- मृदुगात्राः — कोमल स्पर्श वाले।
- प्रियंकराः — सुखद और हितकारी।
भावार्थ : जल के संपर्क से चर और अचर जगत् के प्राणी शुद्धता का अनुभव करते हैं। जल शीतल, शांत, कोमल स्पर्श वाला और सुख देने वाला है।
व्याख्या : जल का स्वभाव यहाँ शीतलता, कोमलता और शुद्धि के माध्यम से वर्णित है। यह उदाहरण बताता है कि किसी वस्तु का स्वभाव उसके संपर्क में आने वाले पर प्रभाव डालता है।
इस प्रसंग में जल का वर्णन सत्संग के गुण को समझाने के लिए किया गया है। जिस प्रकार जल अपनी शीतलता और शुद्धिकारक उपयोग से लाभ पहुँचाता है, उसी प्रकार सत्पुरुष अपने शांत, संयमित और ज्ञानमय आचरण से दूसरे के चित्त को प्रभावित करते हैं।
श्लोक २०
निर्मला रसवत्यश्च पुण्यवीर्या मलापहाः । तथा संतस्त्वया ज्ञेया निषेव्याश्च प्रयत्नतः ॥२०॥
शब्दार्थ :
- निर्मलाः — स्वच्छ।
- रसवत्यः — रसयुक्त, जीवनदायिनी।
- पुण्यवीर्याः — पुण्यदायी सामर्थ्य से युक्त।
- मलापहाः — मल दूर करने वाली।
- तथा — उसी प्रकार।
- सन्तः — संत, सत्पुरुष।
- त्वया — तुम्हारे द्वारा।
- ज्ञेयाः — समझे जाने चाहिए।
- निषेव्याः — जिनका संग और सेवा करनी चाहिए।
- प्रयत्नतः — प्रयत्नपूर्वक।
भावार्थ : जल निर्मल, रसयुक्त, जीवनदायी और मल को दूर करने वाला है। उसी प्रकार संतों को भी शुद्धता, कल्याणकारी सामर्थ्य और दोषों को दूर करने वाले प्रभाव से युक्त समझो तथा प्रयत्नपूर्वक उनका संग करो।
व्याख्या : इस श्लोक में जल और संतों के बीच स्पष्ट उपमा स्थापित होती है। जल शरीर की अशुद्धि को दूर करता है; संतों की संगति मनुष्य के आचरण और चित्त में उपस्थित दोषों को पहचानने तथा उनसे मुक्त होने में सहायता करती है।
यहाँ निषेव्य शब्द महत्त्वपूर्ण है। इसका आशय केवल संतों को सम्मान देना नहीं, बल्कि उनके संग, सेवा और शिक्षाओं को अपने जीवन में स्थान देना भी है। सत्संग तभी फलदायी होता है जब उससे व्यक्ति के भीतर वास्तविक परिवर्तन उत्पन्न हो।
श्लोक २१
यथा वह्निप्रसंगाच्च मलं त्यजति कांचनम् । तथा सतां हि संसर्गात्पापं त्यजति मानवः ॥२१॥
शब्दार्थ :
- यथा — जिस प्रकार।
- वह्नि — अग्नि।
- प्रसङ्गात् — संपर्क से।
- मलम् — अशुद्धि।
- त्यजति — छोड़ देता है।
- काञ्चनम् — सोना।
- तथा — उसी प्रकार।
- सताम् संसर्गात् — सत्पुरुषों के संपर्क से।
- पापम् — पापपूर्ण वृत्ति और आचरण।
- त्यजति — छोड़ देता है।
- मानवः — मनुष्य।
भावार्थ : जिस प्रकार अग्नि के संपर्क में आने पर सोना अपनी अशुद्धि छोड़कर शुद्ध होता है, उसी प्रकार सत्पुरुषों की संगति से मनुष्य अपनी पापपूर्ण वृत्तियों को त्याग सकता है।
व्याख्या : यहाँ अग्नि शुद्धीकरण का प्रतीक है। सोने को अग्नि में तपाने की प्रक्रिया से उसकी अशुद्धियाँ अलग की जाती हैं। इसी प्रकार सत्संग मनुष्य को अपने दोषों का सामना करने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है।
जल और अग्नि के दोनों उदाहरण एक-दूसरे के पूरक हैं। जल शीतलता और शुद्धि का बोध कराता है, जबकि अग्नि तप, परीक्षण और अशुद्धि के निष्कासन का। सत्संग में भी स्नेह और शांति के साथ आत्मपरीक्षण तथा अनुशासन की आवश्यकता होती है।
श्लोक २२
सत्यवह्निः प्रदीप्तश्च प्रज्वलेत्पुण्यतेजसा । सत्येन दीप्ततेजास्तु ज्ञानेनापि सुनिर्मलः ॥२२॥
शब्दार्थ :
- सत्य-वह्निः — सत्यरूपी अग्नि।
- प्रदीप्तः — प्रज्वलित।
- प्रज्वलेत् — और अधिक प्रकाशित हो।
- पुण्यतेजसा — पुण्य के तेज से।
- सत्येन — सत्य के द्वारा।
- दीप्ततेजाः — प्रकाशित तेज वाला।
- ज्ञाननेन/ज्ञानेन — ज्ञान से।
- अपि — भी।
- सुनिर्मलः — अत्यन्त शुद्ध।
भावार्थ : सत्यरूपी अग्नि पुण्य के तेज से प्रज्वलित होती है। सत्य से मनुष्य का तेज प्रकाशित होता है और ज्ञान से उसका अंतःकरण अधिक निर्मल बनता है।
व्याख्या : यहाँ सत्य, पुण्य और ज्ञान को आंतरिक प्रकाश के तीन परस्पर संबंधित आयामों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सत्य आचरण को सीधा और स्पष्ट करता है, पुण्य उस आचरण को कल्याणकारी दिशा देता है और ज्ञान मनुष्य को अपने कर्म तथा उसकी वास्तविकता पहचानने की क्षमता देता है।
सत्य को अग्नि कहना इसलिए सार्थक है कि वह भ्रम और असत्य को दूर करने की शक्ति रखता है। ज्ञान इस प्रक्रिया को और गहरा करता है, क्योंकि केवल सत्य बोलना पर्याप्त नहीं; सत्य के स्वरूप और उसके अनुसार आचरण का ज्ञान भी आवश्यक है।
श्लोक २३
अत्युष्णो ध्यानभावेन अस्पृश्यः पापजैर्नरैः । सत्यवह्नेः प्रसंगाच्च पापं सर्वं विनश्यति ॥२३॥
शब्दार्थ :
- अत्युष्णः — अत्यन्त तप्त।
- ध्यानभावेन — ध्यान की अवस्था अथवा ध्यानमय भाव से।
- अस्पृश्यः — जिसे स्पर्श करना कठिन हो; यहाँ पापपूर्ण वृत्तियों के लिए दुर्गम।
- पापजैः नरैः — पापपूर्ण वृत्तियों वाले लोगों के लिए।
- सत्यवह्नेः — सत्यरूपी अग्नि का।
- प्रसङ्गात् — संपर्क से।
- पापम् सर्वम् — समस्त पाप।
- विनश्यति — नष्ट होता है।
भावार्थ : सत्यरूपी अग्नि ध्यान और तप के प्रभाव से अत्यन्त प्रखर हो जाती है। उसके संपर्क से पापपूर्ण वृत्तियों का नाश होता है और मनुष्य शुद्धता की ओर बढ़ता है।
व्याख्या : इस श्लोक में सत्यरूपी अग्नि के ताप और उसकी शुद्धिकारक शक्ति का वर्णन है। यहाँ ताप का अर्थ केवल भौतिक गर्मी नहीं, बल्कि साधना, आत्मसंयम और सत्यनिष्ठा से उत्पन्न आंतरिक प्रखरता भी है।
ध्यान चित्त को स्थिर करता है और सत्य के प्रति दृढ़ता व्यक्ति को अपनी भूलों से बचने की शक्ति देती है। जब सत्य जीवन का आधार बन जाता है, तब मनुष्य के भीतर पापपूर्ण वृत्तियों के लिए स्थान कम होता जाता है।
श्लोक २४
तस्मात्सत्यस्य संसर्गः कर्तव्यः सर्वथा त्वया । पापभारं परित्यज्य पुण्यमेवं समाश्रय ॥२४॥
शब्दार्थ :
- तस्मात् — इसलिए।
- सत्यस्य संसर्गः — सत्य का संग, सत्य के संपर्क में रहना।
- कर्तव्यः — करना चाहिए।
- सर्वथा — हर प्रकार से।
- त्वया — तुम्हारे द्वारा।
- पापभारम् — पाप का भार।
- परित्यज्य — त्यागकर।
- पुण्यम् — पुण्य।
- एवम् — इस प्रकार।
- समाश्रय — आश्रय ग्रहण करो।
भावार्थ : इसलिए हे सुनीथा! हर प्रकार से सत्य का संग करो। पाप के भार को त्यागकर पुण्य का आश्रय ग्रहण करो।
व्याख्या : मृत्यु के उपदेश का यह पहला निष्कर्ष है। सुनीथा के लिए परिवर्तन का मार्ग सत्य, सत्संग, ध्यान और ज्ञान से होकर जाता है। वह अपने पूर्वकर्म को बदल नहीं सकती, लेकिन आगे का आचरण बदल सकती है।
यहाँ सत्य का संग करने का अर्थ सत्यनिष्ठ व्यक्तियों के संपर्क में रहना, सत्य के अनुसार सोचना और अपने कर्मों को सत्य के अनुरूप बनाना है। पापभार का त्याग केवल अपराधबोध छोड़ देने से नहीं होता; उसके लिए उन वृत्तियों को बदलना आवश्यक है जो अनुचित कर्म को जन्म देती हैं।
श्लोक २५
सूत उवाच—
एवं पित्रा सुनीथा सा दुःखिता प्रतिबोधिता । नमस्कृत्य पितुः पादौ गता सा निर्जनं वनम् ॥२५॥
शब्दार्थ :
- एवम् — इस प्रकार।
- पित्रा — पिता द्वारा।
- सुनीथा — सुनीथा।
- दुःखिता — दुःखी।
- प्रतिबोधिता — समझाई गई, जागरूक की गई।
- नमस्कृत्य — प्रणाम करके।
- पितुः पादौ — पिता के चरणों में।
- गता — गई।
- निर्जनम् वनम् — एकांत वन।
भावार्थ : सूतजी कहते हैं—पिता मृत्यु के उपदेश से सुनीथा दुःखी हुई और उसे अपने कर्म का बोध हुआ। वह पिता के चरणों में प्रणाम करके एकांत वन में चली गई।
व्याख्या : इस श्लोक में सुनीथा के भीतर परिवर्तन की प्रारम्भिक अवस्था दिखाई देती है। पिता का उपदेश सुनकर वह अपने कर्म और उसके परिणाम के प्रति सजग होती है। इसके बाद वह एकांत वन की ओर जाती है।
एकांत यहाँ बाहरी संसार से दूरी बनाने का माध्यम है। जब मनुष्य अपने आचरण और उसकी परिणतियों पर विचार करना चाहता है, तब बाहरी गतिविधियों से अलग होकर अपने भीतर देखने का अवसर प्राप्त कर सकता है। सुनीथा का वनगमन इसी प्रक्रिया का आरम्भ है।
श्लोक २६
कामं क्रोधं परित्यज्य बाल्यभावं तपस्विनी । मोहद्रोहौ च मायां च त्यक्त्वा एकान्तमास्थिता ॥२६॥
शब्दार्थ :
- कामम् — कामना, वासना।
- क्रोधम् — क्रोध।
- परित्यज्य — त्यागकर।
- बाल्यभावम् — बालसुलभ अपरिपक्वता।
- तपस्विनी — तप करने वाली स्त्री।
- मोह-द्रोहौ — मोह और वैरभाव।
- मायाम् — माया, भ्रम उत्पन्न करने वाली वृत्ति।
- त्यक्त्वा — छोड़कर।
- एकान्तम् — एकांत।
- आस्थिता — आश्रय लिया, स्थित हुई।
भावार्थ : सुनीथा काम और क्रोध का त्याग करने का संकल्प लेकर, बालसुलभ अपरिपक्वता, मोह, द्रोह और माया से दूर होकर एकांत में स्थित हुई।
व्याख्या : यहाँ एकांतवास के साथ आंतरिक वृत्तियों के परिवर्तन का वर्णन भी है। केवल वन में चले जाने से चित्त शुद्ध नहीं होता; काम, क्रोध, मोह और द्रोह जैसी वृत्तियों का त्याग भी आवश्यक है।
बाल्यभाव का उल्लेख अपरिपक्वता और आवेगपूर्ण आचरण की ओर संकेत करता है। सुनीथा अब उस अवस्था से आगे बढ़ना चाहती है जिसमें प्रतिक्रिया विचार पर हावी हो जाती है। तपस्विनी शब्द बताता है कि वह अब अपने भीतर अनुशासन और संयम विकसित करने के मार्ग पर है।
श्लोक २७
तस्याः सख्यः समाजग्मुः क्रीडार्थं लीलयान्विताः । तां ददृशुर्विशालाक्ष्यः सुनीथां दुःखभागिनीम् ॥२७॥
शब्दार्थ :
- तस्याः — उसकी।
- सख्यः — सखियाँ।
- समाजग्मुः — एकत्र आईं।
- क्रीडार्थम् — खेलने के लिए।
- लीलया अन्विताः — सहज प्रसन्नता और क्रीड़ा के भाव से युक्त।
- ताम् — उसे।
- ददृशुः — उन्होंने देखा।
- विशालाक्ष्यः — विशाल नेत्रों वाली।
- सुनीथाम् — सुनीथा को।
- दुःखभागिनीम् — दुःख से ग्रस्त।
भावार्थ : सुनीथा की सखियाँ खेल-क्रीड़ा के लिए एकत्र हुईं। उन्होंने विशाल नेत्रों वाली सुनीथा को दुःखी अवस्था में देखा।
व्याख्या : यहाँ कथा में नया प्रसंग प्रवेश करता है। सुनीथा एकांत में है, जबकि उसकी सखियाँ सामान्य क्रीड़ा और प्रसन्नता की अवस्था में उसके पास आती हैं। दोनों अवस्थाओं का अंतर सखियों को सुनीथा की चिंता का कारण पूछने के लिए प्रेरित करता है।
यह दृश्य बाहरी जीवन और भीतरी अवस्था के बीच अंतर को सामने लाता है। बाहर से व्यक्ति अपने परिचित संसार में उपस्थित हो सकता है, लेकिन भीतर किसी घटना, स्मृति या आशंका से व्याकुल रह सकता है। सुनीथा की सखियाँ उसके इसी आंतरिक दुःख को पहचानती हैं।
श्लोक २८
ध्यायन्तीं चिन्तयानां तामूचुश्चिन्तापरायणाः । कस्माच्चिन्तसि भद्रे त्वमनया चिन्तयान्विता ॥२८॥
शब्दार्थ :
- ध्यायन्तीम् — ध्यान करती हुई।
- चिन्तयानाम् — विचार में डूबी हुई।
- ताम् — उसे।
- ऊचुः — उन्होंने कहा।
- चिन्तापरायणाः — चिंता में लीन।
- कस्मात् — क्यों।
- चिन्तसि — चिंता करती हो।
- भद्रे — हे कल्याणी।
- त्वम् — तुम।
- अनया चिन्तया — इस चिंता से।
- अन्विता — युक्त, घिरी हुई।
भावार्थ : सखियों ने सुनीथा को विचार और चिंता में डूबा हुआ देखकर पूछा—हे भद्रे! तुम इस प्रकार चिंता में क्यों डूबी हुई हो?
व्याख्या : इस श्लोक में ध्यान और चिंता के बीच का अंतर समझने योग्य है। दोनों में मन किसी विषय पर केंद्रित हो सकता है, लेकिन उनकी दिशा अलग होती है। ध्यान चित्त को स्थिर और एकाग्र करता है, जबकि चिंता मन को बार-बार उसी विषय की ओर ले जाकर व्याकुल कर सकती है।
सखियाँ सुनीथा की अवस्था देखकर उससे उसका कारण पूछती हैं। इस प्रश्न के माध्यम से कथा अब चिंता के स्वरूप की चर्चा की ओर बढ़ती है। आगे के श्लोकों में सखियाँ चिंता के उपयोगी और अनुपयोगी रूपों में भेद करती हैं।
श्लोक २९
तन्नो वै कारणं ब्रूहि चिन्तादुःखप्रदायिनी । एकैव सार्थकी चिन्ता धर्मस्यार्थे विचिन्त्यते ॥२९॥
शब्दार्थ :
- तत् — वह।
- नः — हमें।
- वै — निश्चय ही।
- कारणम् — कारण।
- ब्रूहि — बताओ।
- चिन्ता-दुःखप्रदायिनी — चिंता, जो दुःख देती है।
- एका एव — एक ही।
- सार्थकी — सार्थक।
- चिन्ता — विचार, मनन।
- धर्मस्य अर्थे — धर्म के उद्देश्य से, धर्म के विषय में।
- विचिन्त्यते — विचार किया जाता है।
भावार्थ : सखियाँ कहती हैं—हमें अपनी चिंता का कारण बताओ। चिंता सामान्यतः दुःख देने वाली होती है, लेकिन धर्म के विषय में किया गया विचार सार्थक हो सकता है।
व्याख्या : यहाँ चिंता को एक ही अर्थ में नहीं लिया गया है। किसी विषय के बारे में गंभीरता से सोचना और किसी बात को लेकर निरंतर व्याकुल बने रहना अलग-अलग अवस्थाएँ हैं।
धर्म के विषय में विचार करना सार्थक है, क्योंकि उससे सही आचरण, कर्तव्य और जीवन की दिशा स्पष्ट हो सकती है। इसके विपरीत, ऐसा मानसिक चक्र जो केवल दुःख बढ़ाता रहे और कोई विवेकपूर्ण दिशा न दे, व्यक्ति की शक्ति को क्षीण कर सकता है।
इस प्रकार कथा विचार और चिंता के बीच भेद की भूमिका तैयार करती है।
श्लोक ३०
द्वितीया सार्थका चिन्ता योगिनां धर्मनन्दिनि । अन्या निरर्थिका चिन्ता तां नैव परिकल्पयेत् ॥३०॥
शब्दार्थ :
- द्वितीया — दूसरी।
- सार्थका चिन्ता — उपयोगी और उद्देश्यपूर्ण विचार।
- योगिनाम् — योगियों का।
- धर्मनन्दिनि — हे धर्मप्रिय कन्या।
- अन्या — दूसरी प्रकार की।
- निरर्थिका — निष्फल, उद्देश्यहीन।
- चिन्ता — चिंता।
- ताम् — उसे।
- न एव — कदापि नहीं।
- परिकल्पयेत् — मन में स्थान देना चाहिए।
भावार्थ : हे धर्मनन्दिनि! योगियों की साधना और आत्मचिन्तन से संबंधित विचार भी सार्थक होते हैं। इसके अतिरिक्त जो चिंता निष्फल है, उसे अपने मन में स्थान नहीं देना चाहिए।
व्याख्या : पिछले श्लोक में धर्म के विषय में सार्थक विचार की बात थी; यहाँ योगियों के आत्मचिन्तन को दूसरी सार्थक अवस्था के रूप में रखा गया है।
योगी का मनन केवल किसी घटना को बार-बार याद करने के लिए नहीं होता। उसका उद्देश्य चित्त की प्रकृति को समझना, वृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करना और आत्मज्ञान की दिशा में आगे बढ़ना है।
इसके विपरीत, निरर्थक चिंता व्यक्ति को उसी मानसिक उलझन में बाँधे रखती है। कथा इसीलिए चिंता की उपयोगिता को उसके उद्देश्य और परिणाम के आधार पर पहचानने की शिक्षा देती है।
श्लोक ३१
कायनाशकरी चिन्ता बलतेजः प्रणाशिनी । नाशयेत्सर्वसौख्यं तु रूपहानिं निदर्शयेत् ॥३१॥
शब्दार्थ :
- काय — शरीर।
- नाशकरी — नाश करने वाली।
- चिन्ता — चिंता।
- बल — शक्ति।
- तेजः — तेज, आंतरिक ऊर्जा।
- प्रणाशिनी — पूरी तरह नष्ट करने वाली।
- नाशयेत् — नष्ट कर देती है।
- सर्वसौख्यम् — समस्त सुख।
- रूपहानिम् — रूप अथवा कांति की हानि।
- निदर्शयेत् — प्रकट कर देती है, दिखाती है।
भावार्थ : निरंतर चिंता शरीर को क्षीण कर सकती है, बल और तेज को नष्ट कर सकती है तथा सुख और कांति को कम कर सकती है।
व्याख्या : यह श्लोक चिंता के प्रभावों को शरीर, शक्ति, तेज और सुख के स्तर पर प्रस्तुत करता है। जब मनुष्य लंबे समय तक व्याकुलता में रहता है, तो उसकी मानसिक शांति और जीवन के प्रति सहज प्रसन्नता प्रभावित हो सकती है।
यहाँ चिंता का अर्थ किसी समस्या पर विचार करना मात्र नहीं, बल्कि ऐसी निरंतर मानसिक व्यग्रता है जो मनुष्य की शक्ति को भीतर ही भीतर क्षीण करती है। सखियाँ सुनीथा को इसी अवस्था से बाहर निकालना चाहती हैं।
श्लोक ३२
तृष्णां मोहं तथा लोभमेतांश्चिन्ता हि प्रापयेत् । पापमुत्पादयेच्चिन्ता चिन्तिता च दिने दिने ॥३२॥
शब्दार्थ :
- तृष्णाम् — अतृप्त लालसा।
- मोहम् — भ्रम, आसक्ति।
- तथा — और।
- लोभम् — संग्रह की अतृप्त इच्छा।
- एतान् — इन सबको।
- चिन्ता — चिंता।
- हि — निश्चय ही।
- प्रापयेत् — उत्पन्न कर सकती है, पहुँचा सकती है।
- पापम् — अनुचित कर्म।
- उत्पादयेत् — उत्पन्न कर सकती है।
- चिन्तिता — बार-बार चिंतन की गई।
- दिने दिने — प्रतिदिन।
भावार्थ : प्रतिदिन बार-बार की जाने वाली चिंता मनुष्य को तृष्णा, मोह और लोभ की ओर ले जा सकती है तथा उससे अनुचित कर्म भी उत्पन्न हो सकते हैं।
व्याख्या : यहाँ चिंता को वृत्तियों के विकास से जोड़ा गया है। जब मन किसी इच्छा या आशंका पर लगातार अटका रहता है, तो वह उसी विषय के प्रति अधिक आसक्त हो सकता है। आसक्ति से तृष्णा और तृष्णा से लोभ की वृत्ति बढ़ सकती है।
इसका अर्थ यह है कि चिंता केवल मन की एक क्षणिक अवस्था नहीं रहती; यदि उसे लगातार पोषित किया जाए, तो वह व्यक्ति की इच्छाओं, निर्णयों और कर्मों को प्रभावित कर सकती है।
सुनीथा के लिए यह शिक्षा विशेष महत्त्व रखती है। उसे अपने पूर्वकर्म के कारण दुःख है, लेकिन यदि वह उसी दुःख को लगातार दोहराती रहे, तो उससे नई आसक्तियाँ और नई व्याकुलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए उसे चिंता के चक्र से बाहर निकलकर विवेकपूर्ण आचरण अपनाने की आवश्यकता है।
श्लोक ३३
चिन्ताव्याधिप्रकाशाय नरकाय प्रकल्पयेत् । तस्माच्चिन्तां परित्यज्य चानुवर्तस्व शोभने ॥३३॥
शब्दार्थ :
- चिन्ता — निरंतर व्याकुलता।
- व्याधि — रोग।
- प्रकाशाय — प्रकट होने के लिए अथवा रोग को बढ़ाने के लिए।
- नरकाय — नरक जैसी दुःखद अवस्था के लिए।
- प्रकल्पयेत् — कारण बन सकती है।
- तस्मात् — इसलिए।
- परित्यज्य — त्यागकर।
- अनु-वर्तस्व — उचित मार्ग का अनुसरण करो।
- शोभने — हे सुन्दरी, हे कल्याणी।
भावार्थ : चिंता रोग और नरक जैसी दुःखद मानसिक अवस्था का कारण बन सकती है। इसलिए हे कल्याणी! निरर्थक चिंता को त्यागकर उचित मार्ग का अनुसरण करो।
व्याख्या : यहाँ नरक का उल्लेख उस दुःखद अवस्था के रूप में भी समझा जा सकता है जिसमें मनुष्य अपनी ही मानसिक व्याकुलता से घिर जाता है। चिंता बढ़ने पर व्यक्ति वर्तमान परिस्थिति को स्पष्ट रूप से देखने में कठिनाई अनुभव कर सकता है और उसका चित्त लगातार दुःख की ओर लौटता रहता है।
सखियाँ सुनीथा को केवल चिंता छोड़ने के लिए नहीं कहतीं; वे उसे उचित मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती हैं। इसका अर्थ है कि चिंता का त्याग किसी निष्क्रियता का नाम नहीं, बल्कि मन को व्यर्थ व्याकुलता से हटाकर सार्थक कर्म और विवेक की ओर ले जाना है।
श्लोक ३४
अर्जितं कर्मणा पूर्वं स्वयमेव नरेण तु । तदेव भुङ्क्तेऽसौ जन्तुर्ज्ञानवान्न विचिन्तयेत् ॥३४॥
शब्दार्थ :
- अर्जितम् — प्राप्त किया हुआ।
- कर्मणा — कर्म से।
- पूर्वम् — पहले।
- स्वयम् एव — स्वयं ही।
- नरेण — मनुष्य द्वारा।
- तु — निश्चय ही।
- तत् एव — उसी को।
- भुङ्क्ते — भोगता है।
- असौ जन्तुः — वह जीव।
- ज्ञानवान् — ज्ञान रखने वाला व्यक्ति।
- न विचिन्तयेत् — व्यर्थ चिंता नहीं करनी चाहिए।
भावार्थ : मनुष्य ने पूर्व में अपने कर्मों से जो अर्जित किया है, जीव उसी के परिणामों का अनुभव करता है। इसलिए ज्ञानवान व्यक्ति को कर्मफल के विषय में निरर्थक चिंता में डूबे रहने के बजाय ज्ञान और विवेक के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
व्याख्या : यह श्लोक कर्म और उसके फल के संबंध को स्पष्ट करता है। मनुष्य के जीवन में जो परिणाम सामने आते हैं, वे उसके कर्मों से जुड़े होते हैं। इस बोध का उद्देश्य व्यक्ति को असहाय बनाना नहीं, बल्कि उसे अपने कर्मों की जिम्मेदारी समझाना है।
ज्ञानवान व्यक्ति अपने सामने आए परिणाम को समझता है, उससे शिक्षा ग्रहण करता है और आगे के कर्मों को अधिक विवेकपूर्ण बनाता है। वह अतीत को लेकर निरंतर व्याकुल रहने के स्थान पर वर्तमान में सही आचरण करने पर ध्यान देता है।
सुनीथा की परिस्थिति में यह शिक्षा निर्णायक है। उसका शाप और उससे उत्पन्न दुःख बीत चुकी घटना का परिणाम है। अब उसके सामने अपने चित्त को संभालने और आगे के जीवन को उचित दिशा देने का प्रश्न है।
श्लोक ३५
तस्माच्चिन्तां परित्यज्य सुखदुःखादिकं वद । तासां तद्वचनं श्रुत्वा सुनीथा वाक्यमब्रवीत् ॥३५॥
शब्दार्थ :
- तस्मात् — इसलिए।
- चिन्ताम् — निरर्थक चिंता को।
- परित्यज्य — त्यागकर।
- सुख-दुःख-आदिकम् — सुख, दुःख आदि के विषय में।
- वद — कहो, बताओ।
- तासाम् — उन सखियों का।
- तत् वचनम् — वह कथन।
- श्रुत्वा — सुनकर।
- सुनीथा — सुनीथा ने।
- वाक्यम् — वचन।
- अब्रवीत् — कहा।
भावार्थ : सखियों ने सुनीथा से कहा—इसलिए निरर्थक चिंता छोड़कर सुख-दुःख आदि के विषय में अपना विचार स्पष्ट करो। उनकी बातें सुनकर सुनीथा ने उत्तर दिया।
व्याख्या : अध्याय का अंतिम श्लोक सुनीथा की प्रतिक्रिया की भूमिका तैयार करता है। पिता मृत्यु ने उसे कर्म, सत्संग, सत्य और ज्ञान का मार्ग बताया था। अब उसकी सखियाँ उसे चिंता के प्रभाव और उसके त्याग की आवश्यकता समझाती हैं।
इस प्रकार सुनीथा के सामने दो स्तरों पर शिक्षा रखी गई है। पहला, कर्म के परिणाम को समझना और आगे पुण्याचरण अपनाना। दूसरा, उस परिणाम के कारण उत्पन्न मानसिक व्याकुलता में फँसे रहने के बजाय चित्त को विवेकपूर्ण दिशा देना।
अंत में सुनीथा बोलने के लिए तैयार होती है। उसके उत्तर से आगे कथा में उसके दुःख का वास्तविक स्वरूप और उसके मन में चल रहे विचार प्रकट होंगे।
अध्याय का समापन :
इति श्रीपद्मपुराणे पञ्चपञ्चाशत्सहस्रसंहितायां भूमिखण्डे वेनोपाख्याने सुनीथाचरितं नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥३३॥
देवताओं का निर्णय, सुनीथा की विद्या और गंगातट पर तपस्वी का दर्शन
श्लोक 1
मूल श्लोक
यथा शप्ता वने पूर्वं सुशंखेन महात्मना । तासु सर्वं समाख्यातं सखीष्वेव विचेष्टितम् ॥१॥
शब्दार्थ
- यथा — जिस प्रकार।
- शप्ता — शापित हुई।
- वने — वन में।
- पूर्वम् — पहले।
- सुशंखेन — सुशंख नामक महात्मा द्वारा।
- महात्मना — महान आत्मा वाले पुरुष द्वारा।
- तासु सखीषु — उन सखियों के सामने।
- सर्वम् — सब कुछ।
- समाख्यातम् — विस्तार से बताया गया।
- विचेष्टितम् — आचरण और घटनाएँ।
भावार्थ
सूत कहते हैं कि सुनीथा ने अपनी सखियों को पहले वन में महात्मा सुशंख द्वारा शापित होने की घटना और उसके बाद घटित अपने समस्त आचरण एवं घटनाओं का विवरण सुनाया।
व्याख्या
यह श्लोक पूर्ववर्ती अध्याय और वर्तमान अध्याय के बीच संबंध स्थापित करता है। कथा केवल शाप की घटना पर समाप्त नहीं होती, बल्कि उसके परिणाम सुनीथा के जीवन, उसके पिता के निर्णय और उसके भविष्य की दिशा तक पहुँचते हैं।
श्लोक 2
मूल श्लोक
आत्मनश्च महाभागा दुःखेनातिप्रपीडिता । सुनीथोवाच — अन्यच्चैव प्रवक्ष्यामि सख्यः शृण्वंतु सांप्रतम् ॥२॥
शब्दार्थ
- आत्मनः — अपने विषय में।
- महाभागा — सौभाग्यशालिनी।
- दुःखेन — दुःख से।
- अतिप्रपीडिता — अत्यंत पीड़ित।
- सुनीथा उवाच — सुनीथा ने कहा।
- अन्यत् च एव — एक दूसरी बात भी।
- प्रवक्ष्यामि — मैं बताऊँगी।
- सख्यः — हे सखियो!
- शृण्वन्तु — सुनो।
- साम्प्रतम् — अब, इस समय।
भावार्थ
दुःख से अत्यंत पीड़ित सुनीथा अपनी सखियों से कहती है—हे सखियो! अब मैं तुम्हें अपने जीवन की एक और घटना सुनाती हूँ। इसे ध्यानपूर्वक सुनो।
व्याख्या
सुनीथा का कथन उसके निजी दुःख से आगे बढ़कर उन परिस्थितियों का वर्णन करने वाला है, जिनमें उसके पिता मृत्यु को अपनी पुत्री के भविष्य के संबंध में देवताओं और ऋषियों से संवाद करना पड़ता है।
श्लोक 3
मूल श्लोक
मदीयरूपसंपत्तिं वयः सगुणसंपदः । विलोक्य तातश्चिंतात्मा संजातो मम कारणात् ॥३॥
शब्दार्थ
- मदीय — मेरी।
- रूपसंपत्तिम् — रूप की संपन्नता।
- वयः — आयु, यौवन।
- सगुणसंपदः — गुणों सहित संपन्नता।
- विलोक्य — देखकर।
- तातः — पिता।
- चिन्तात्मा — चिंतित मन वाला।
- संजातः — हो गया।
- मम कारणात् — मेरे कारण।
भावार्थ
सुनीथा कहती है कि मेरे रूप, यौवन और गुणों से संपन्न अवस्था को देखकर मेरे पिता मेरे भविष्य के विषय में चिंतित हो उठे।
व्याख्या
यहाँ रूप और यौवन केवल बाहरी आकर्षण के रूप में नहीं आते। विवाह योग्य कन्या के भविष्य, उसके गुणों और उसके लिए उपयुक्त वर की व्यवस्था भी पिता की चिंता का विषय है। सुनीथा के शाप से जुड़ी घटना इस चिंता को और गंभीर बना देती है।
श्लोक 4
मूल श्लोक
देवेभ्यो दातुकामोऽसौ मुनिभ्यस्तु महायशाः । मां च हस्ते विगृह्यैव सर्वान्वाक्यमुदाहरत् ॥४॥
शब्दार्थ
- देवेभ्यः — देवताओं के समक्ष।
- दातुकामः — देने की इच्छा रखने वाला।
- असौ — वह।
- मुनिभ्यः — मुनियों के समक्ष।
- महायशाः — महान यश वाला।
- माम् — मुझे।
- च — और।
- हस्ते विगृह्य — हाथ पकड़कर अथवा अपने हाथ में लेकर।
- सर्वान् — सबके सामने।
- वाक्यम् उदाहरत् — वचन कहा।
भावार्थ
मेरे पिता मृत्यु ने देवताओं और मुनियों के समक्ष मेरा हाथ पकड़कर मेरे विवाह के विषय में अपनी बात कही।
व्याख्या
इस प्रसंग में मृत्यु अपनी पुत्री के विवाह को व्यक्तिगत निर्णय तक सीमित नहीं रखते, बल्कि देवताओं और मुनियों के सामने रखते हैं। इससे कथा में विवाह का प्रश्न सामाजिक, नैतिक और दैवी व्यवस्था से जुड़ जाता है।
श्लोक 5
मूल श्लोक
गुणयुक्ता सुता बाला ममेयं चारुलोचना । दातुकामोऽस्मि भद्रं वो गुणिने सुमहात्मने ॥५॥
शब्दार्थ
- गुणयुक्ता — गुणों से युक्त।
- सुता — पुत्री।
- बाला — कन्या।
- मम इयम् — मेरी यह।
- चारुलोचना — सुंदर नेत्रों वाली।
- दातुकामः अस्मि — मैं देना चाहता हूँ।
- भद्रम् वः — आपका कल्याण हो।
- गुणिने — गुणवान पुरुष को।
- सुमहात्मने — महान आत्मा वाले पुरुष को।
भावार्थ
मृत्यु देवताओं और मुनियों से कहते हैं—मेरी यह पुत्री गुणों से संपन्न और सुंदर नेत्रों वाली है। मैं इसका विवाह किसी ऐसे महान पुरुष से करना चाहता हूँ, जो स्वयं भी गुणवान हो। आप सबका कल्याण हो।
व्याख्या
यहाँ पिता की अपेक्षा स्पष्ट है कि पुत्री के गुणों के अनुरूप ही उसका पति होना चाहिए। विवाह के लिए केवल रूप अथवा पद पर्याप्त नहीं, बल्कि वर में भी गुण और महानता अपेक्षित हैं।
श्लोक 6
मूल श्लोक
मृत्योर्वाक्यं ततो देवा ऋषयः शुश्रुवुस्तदा । तमूचुर्भाषमाणं ते देवा इंद्रपुरोगमाः ॥६॥
शब्दार्थ
- मृत्योः वाक्यम् — मृत्यु का कथन।
- ततः — तब।
- देवाः — देवताओं ने।
- ऋषयः — ऋषियों ने।
- शुश्रुवुः — सुना।
- तम् — उनसे।
- ऊचुः — कहा।
- भाषमाणम् — बोलते हुए।
- इन्द्रपुरोगमाः — इन्द्र को आगे रखने वाले, इन्द्र के नेतृत्व में।
भावार्थ
मृत्यु का कथन सुनकर देवताओं और ऋषियों ने विचार किया। तब इन्द्र के नेतृत्व में देवताओं ने मृत्यु से अपना निर्णय कहना आरंभ किया।
व्याख्या
यह श्लोक अगले श्लोकों में आने वाले निर्णय की भूमिका है। मृत्यु ने अपनी पुत्री के गुणों का वर्णन किया, किंतु देवताओं के सामने उसके भविष्य से जुड़ा एक दूसरा पक्ष भी था—उसके ऊपर लगा ऋषिशाप और उससे संबंधित भावी संतान का प्रश्न।
श्लोक 7
मूल श्लोक
तव कन्या गुणाढ्येयं शीलानां परमो निधिः । दोषेणैकेन संदुष्टा ऋषिशापेन तेन वै ॥७॥
शब्दार्थ
- तव — तुम्हारी।
- कन्या — पुत्री।
- गुणाढ्या — गुणों से संपन्न।
- इयम् — यह।
- शीलानाम् — सद्गुणों और सदाचारों का।
- परमः निधिः — परम खजाना।
- दोषेण एकेन — एक दोष से।
- संदुष्टा — दूषित हुई।
- ऋषिशापेन — ऋषि के शाप से।
- तेन वै — उसी के कारण।
भावार्थ
देवता मृत्यु से कहते हैं—तुम्हारी पुत्री गुणों से संपन्न है और सदाचारों का भंडार है, किंतु ऋषि के शाप के कारण वह एक दोष से प्रभावित हो गई है।
व्याख्या
इस कथन में दो पक्ष साथ रखे गए हैं। एक ओर सुनीथा के गुणों की स्वीकृति है, दूसरी ओर शाप के कारण उत्पन्न कठिनाई। देवता उसके समस्त गुणों को नकार नहीं रहे, बल्कि उसके भविष्य से संबंधित एक विशिष्ट समस्या की ओर संकेत कर रहे हैं।
श्लोक 8
मूल श्लोक
अस्यामुत्पत्स्यते पुत्रो यस्य वीर्यात्पुमान्किल । भविता स महापापी पुण्यवंशविनाशकः ॥८॥
शब्दार्थ
- अस्याम् — इससे, इस कन्या से।
- उत्पत्स्यते — उत्पन्न होगा।
- पुत्रः — पुत्र।
- यस्य वीर्यात् — जिसके वीर्य से।
- पुमान् — पुरुष।
- किल — निश्चय ही।
- भविता — होगा।
- सः — वह।
- महापापी — अत्यंत पापाचारी।
- पुण्यवंशविनाशकः — पुण्य वंश का नाश करने वाला।
भावार्थ
देवता कहते हैं कि सुनीथा से उत्पन्न होने वाला पुत्र अत्यंत पापाचारी होगा और पुण्यशील वंश के विनाश का कारण बनेगा।
व्याख्या
यहाँ कथा का केंद्र सुनीथा के व्यक्तिगत शाप से आगे बढ़कर उसकी भावी संतान तक पहुँच जाता है। देवताओं की चिंता केवल वर्तमान दोष को लेकर नहीं है, बल्कि उस भावी वंशगत परिणाम को लेकर भी है, जिसका संकेत उन्हें प्राप्त है।
यह कथन आगे वेन के चरित्र और उसके वंश के प्रसंग को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका तैयार करता है।
श्लोक 9
मूल श्लोक
गंगातोयेन संपूर्णः कुंभ एव प्रदृश्यते । सुरायाबिन्दुनालिप्तो मद्यकुंभः प्रजायते ॥९॥
शब्दार्थ
- गंगातोयेन — गंगा के जल से।
- संपूर्णः — पूरा भरा हुआ।
- कुम्भः — घड़ा।
- एव — ही।
- प्रदृश्यते — दिखाई देता है।
- सुरायाः — मदिरा का।
- बिन्दुना — एक बूँद से।
- आलिप्तः — स्पर्श से युक्त अथवा लिप्त।
- मद्यकुम्भः — मदिरा का पात्र।
- प्रजायते — हो जाता है।
भावार्थ
देवता उदाहरण देते हैं कि कोई घड़ा गंगा के जल से पूरा भरा हुआ दिखाई दे, लेकिन उसमें मदिरा की एक बूँद मिल जाए, तो उसका स्वरूप बदल जाता है और वह मदिरा से दूषित पात्र के समान हो जाता है।
व्याख्या
यह उपमा गुणों और दोष के संबंध को स्पष्ट करने के लिए दी गई है। पात्र में जल की मात्रा अधिक होने पर भी उसमें मिली मदिरा की बूँद उसके उपयोग और पहचान को बदल देती है।
कथा में इस उदाहरण का उद्देश्य सुनीथा के सभी गुणों को मिटा देना नहीं, बल्कि यह बताना है कि किसी विशेष दोष के परिणाम दूर तक पहुँच सकते हैं। अगले श्लोक में यही बात वंश और संतान के संदर्भ में कही जाती है।
श्लोक 10
मूल श्लोक
पापस्य पापसंसर्गात्कुलं पापि प्रजायते । आरनालस्य वै बिंदुः क्षीरमध्ये प्रयाति चेत् ॥१०॥
शब्दार्थ
- पापस्य — पाप का।
- पापसंसर्गात् — पाप के संसर्ग से।
- कुलम् — वंश।
- पापि — पापयुक्त।
- प्रजायते — हो जाता है।
- आरनालस्य — खट्टे किण्वित द्रव का; यहाँ खट्टे पदार्थ का।
- वै — निश्चय ही।
- बिन्दुः — बूँद।
- क्षीरमध्ये — दूध के भीतर।
- प्रयाति चेत् — यदि पहुँच जाए।
भावार्थ
देवता कहते हैं कि पाप के संसर्ग से वंश भी पाप से प्रभावित हो सकता है। जैसे खट्टे द्रव की एक बूँद दूध में पड़ जाए, तो वह दूध को प्रभावित कर सकती है।
व्याख्या
यहाँ आरनाल का उल्लेख खट्टे अथवा किण्वित द्रव के अर्थ में है। उपमा का आधार यह है कि किसी पदार्थ में दूसरे पदार्थ का थोड़ा-सा अंश मिल जाने पर भी उसके गुणों में परिवर्तन हो सकता है।
वंश के प्रसंग में इसका आशय यह है कि किसी कर्म का प्रभाव केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता; उसके परिणाम अगली पीढ़ियों तक पहुँच सकते हैं।
श्लोक 11
मूल श्लोक
पश्चान्नाशयते क्षीरमात्मरूपं प्रकाशयेत् । तद्वद्विनाशयेद्वंशं पापः पुत्रो न संशयः ॥११॥
शब्दार्थ
- पश्चात् — बाद में।
- नाशयते — नष्ट कर देता है।
- क्षीरम् — दूध को।
- आत्मरूपम् — अपना वास्तविक स्वरूप।
- प्रकाशयेत् — प्रकट कर देता है।
- तद्वत् — उसी प्रकार।
- विनाशयेत् — नष्ट कर सकता है।
- वंशम् — वंश को।
- पापः पुत्रः — पापाचारी पुत्र।
- न संशयः — इसमें संदेह नहीं।
भावार्थ
जिस प्रकार खट्टे द्रव का प्रभाव दूध के मूल स्वरूप को बदल देता है, उसी प्रकार पापाचारी पुत्र अपने वंश को नष्ट कर सकता है। देवता इस परिणाम को निश्चित बताते हैं।
व्याख्या
यह श्लोक पिछली उपमा को उसके निष्कर्ष तक पहुँचाता है। यहाँ वंश का विनाश केवल शारीरिक समाप्ति के अर्थ में नहीं, बल्कि वंश की प्रतिष्ठा, धर्मपरायणता और पुण्यपरंपरा के नष्ट होने के अर्थ में भी समझा जा सकता है।
आगे वेन के प्रसंग में यह कथन विशेष महत्त्व ग्रहण करता है, क्योंकि कथा में उसके आचरण और पृथु के प्रादुर्भाव के बीच संबंध स्थापित किया जाता है।
श्लोक 12
मूल श्लोक
अनेनापि हि दोषेण तवेयं पापभागिनी । अन्यस्मै दीयतां गच्छ देवैरुक्तः पिता मम ॥१२॥
शब्दार्थ
- अनेन अपि — इस कारण भी।
- हि — निश्चय ही।
- दोषेण — दोष से।
- तव — तुम्हारी।
- इयम् — यह।
- पापभागिनी — पाप का भाग पाने वाली अथवा दोष से प्रभावित।
- अन्यस्मै — किसी दूसरे को।
- दीयताम् — दी जाए।
- गच्छ — जाओ।
- देवैः उक्तः — देवताओं द्वारा कहा गया।
- पिता मम — मेरे पिता।
भावार्थ
सुनीथा बताती है कि देवताओं ने उसके पिता से कहा—तुम्हारी पुत्री इस दोष के कारण प्रभावित है। इसका विवाह किसी दूसरे पुरुष से कर दो।
व्याख्या
देवताओं का निर्णय सुनीथा के विवाह की दिशा बदल देता है। पिता उसे किसी गुणवान पुरुष को देना चाहते थे, लेकिन देवताओं ने भावी संतान के विषय में अपनी आशंका प्रकट करके विवाह के लिए अलग निर्णय दिया।
इस निर्णय का सुनीथा पर गहरा प्रभाव पड़ता है, क्योंकि अब वह अपने भविष्य को लेकर स्वयं भी चिंता और दुःख से घिर जाती है।
श्लोक 13
मूल श्लोक
देवैश्चापि सगंधर्वैर्ऋषिभिश्च महात्मभिः । तैश्चापि संपरित्यक्तः पिता मे दुःखपीडितः ॥१३॥
शब्दार्थ
- देवैः — देवताओं द्वारा।
- च अपि — और भी।
- सगन्धर्वैः — गंधर्वों सहित।
- ऋषिभिः — ऋषियों द्वारा।
- महात्मभिः — महान आत्माओं द्वारा।
- तैः च अपि — उनके द्वारा भी।
- संपरित्यक्तः — पूरी तरह त्यागा गया।
- पिता मे — मेरे पिता।
- दुःखपीडितः — दुःख से पीड़ित।
भावार्थ
सुनीथा कहती है कि देवताओं, गंधर्वों और महान ऋषियों ने भी उसके पिता को स्वीकार नहीं किया। इस कारण उसके पिता दुःख से पीड़ित हो गए।
व्याख्या
यहाँ पिता का दुःख केवल पुत्री के विवाह की समस्या से उत्पन्न नहीं होता। देवताओं और ऋषियों के साथ उनका संबंध भी प्रभावित हुआ है। सुनीथा अपने ऊपर आए संकट को अपने पिता के दुःख से जोड़कर देखती है।
श्लोक 14
मूल श्लोक
ममान्ये चापि स्वीकारं न कुर्वंति हि सज्जनाः । एवं पापमयं कर्म मया चैव पुरा कृतम् ॥१४॥
शब्दार्थ
- मम — मेरा।
- अन्ये — दूसरे लोग।
- च अपि — भी।
- स्वीकारम् — स्वीकार।
- न कुर्वन्ति — नहीं करते।
- सज्जनाः — सज्जन लोग।
- एवम् — इस प्रकार।
- पापमयम् कर्म — पापपूर्ण कर्म।
- मया — मेरे द्वारा।
- एव — ही।
- पुरा — पहले।
- कृतम् — किया गया।
भावार्थ
सुनीथा कहती है कि अब दूसरे सज्जन भी मुझे स्वीकार नहीं करते। वह अपने पूर्वकृत कर्म को इस स्थिति का कारण मानती है।
व्याख्या
सुनीथा की दृष्टि अब अपने ऊपर लगे शाप और उससे उत्पन्न सामाजिक परिणामों पर केंद्रित है। वह अपने दुःख को अपने कर्म का फल समझती है।
इस अवस्था में उसके भीतर आत्मग्लानि बढ़ती है और वह संसार से दूर जाकर तपस्या करने का निश्चय करती है।
श्लोक 15
मूल श्लोक
संतप्ता दुःखशोकेन वनमेव समाश्रिता । तप एव चरिष्यामि करिष्ये कायशोषणम् ॥१५॥
शब्दार्थ
- संतप्ता — संतप्त, व्याकुल।
- दुःखशोकेन — दुःख और शोक से।
- वनम् एव — वन को ही।
- समाश्रिता — आश्रय लिया।
- तपः एव — केवल तपस्या।
- चरिष्यामि — करूँगी।
- करिष्ये — करूँगी।
- कायशोषणम् — शरीर को तपाकर क्षीण करना।
भावार्थ
दुःख और शोक से संतप्त सुनीथा वन में चली जाती है। वह निश्चय करती है कि अब तपस्या करेगी और अपने शरीर को कठोर तप से तपाएगी।
व्याख्या
वन यहाँ संसार के सामान्य व्यवहार से दूर एकांत का स्थान है। सुनीथा अपनी परिस्थिति से बाहर निकलने का उपाय तपस्या में खोजती है।
लेकिन कथा आगे दिखाती है कि उसकी सखियाँ उसके इस निश्चय से सहमत नहीं हैं। वे उसे शारीरिक कष्ट देने के स्थान पर उसके भविष्य का दूसरा मार्ग दिखाने का प्रयास करती हैं।
श्लोक 16
मूल श्लोक
भवतीभिः सुपृष्टाहं कार्यकारणमेव हि । मम चिंतानुगं कर्म मया तद्वः प्रकाशितम् ॥१६॥
शब्दार्थ
- भवतीभिः — आप सबके द्वारा।
- सुपृष्टा — अच्छी तरह पूछी गई।
- अहम् — मैं।
- कार्यकारणम् — कार्य और कारण।
- एव हि — ही।
- मम — मेरे।
- चिन्तानुगम् — मेरी चिंता से संबंधित।
- कर्म — घटना अथवा आचरण।
- मया — मेरे द्वारा।
- तत् — वह।
- वः — तुम सबके सामने।
- प्रकाशितम् — प्रकट किया गया।
भावार्थ
सुनीथा कहती है कि तुम सबने मुझसे मेरी परिस्थिति के कारणों के बारे में पूछा था। मैंने अपनी चिंता से जुड़ी सारी घटनाएँ तुम्हारे सामने स्पष्ट कर दी हैं।
व्याख्या
यह कथन सुनीथा के वृत्तांत को पूर्ण करता है। उसने अपनी सखियों के सामने उन घटनाओं का क्रम रख दिया है, जिनके कारण वह दुःख और आत्मग्लानि से घिर गई।
अब सखियाँ उसे उत्तर देती हैं और उसके विचारों की दिशा बदलने का प्रयास करती हैं।
श्लोक 17
मूल श्लोक
एवमुक्त्वा सुनीथा सा मृत्योः कन्या यशस्विनी । विरराम च दुःखार्ता किंचिन्नोवाच वै पुनः ॥१७॥
शब्दार्थ
- एवम् उक्त्वा — ऐसा कहकर।
- सुनीथा सा — वह सुनीथा।
- मृत्योः कन्या — मृत्यु की पुत्री।
- यशस्विनी — यशस्विनी।
- विरराम — चुप हो गई।
- दुःखार्ता — दुःख से पीड़ित।
- किञ्चित् न उवाच — कुछ नहीं बोली।
- पुनः — फिर।
भावार्थ
मृत्यु की पुत्री यशस्विनी सुनीथा ने अपनी बात पूरी की और दुःख से व्याकुल होकर चुप हो गई। इसके बाद उसने कुछ नहीं कहा।
व्याख्या
सुनीथा का मौन उसके मानसिक दुःख को प्रकट करता है। उसने अपनी परिस्थिति का वर्णन कर दिया, लेकिन उसके सामने आगे बढ़ने का कोई स्पष्ट मार्ग नहीं था। अब सखियाँ उसे सांत्वना देती हैं।
श्लोक 18
मूल श्लोक
सख्य ऊचुः — दुःखमेव महाभागे त्यज कायविनाशनम् । नास्ति कस्य कुले दोषो देवैः पापं समाश्रितम् ॥१८॥
शब्दार्थ
- सख्यः ऊचुः — सखियों ने कहा।
- दुःखम् एव — इस दुःख को ही।
- महाभागे — हे सौभाग्यशालिनी!
- त्यज — छोड़ दो।
- कायविनाशनम् — शरीर को नष्ट करने अथवा अत्यधिक कष्ट देने का विचार।
- नास्ति — नहीं है।
- कस्य — किसके।
- कुले — कुल में।
- दोषः — दोष।
- देवैः — देवताओं द्वारा।
- पापम् समाश्रितम् — पाप का आश्रय लिया गया अथवा पाप किया गया।
भावार्थ
सखियाँ सुनीथा से कहती हैं—हे महाभागे! इस दुःख को छोड़ दो और शरीर को नष्ट करने वाली तपस्या का विचार मत करो। संसार में ऐसा कौन-सा कुल है जिसमें कोई दोष न हो? देवताओं के जीवन में भी पाप और दोष के प्रसंग मिलते हैं।
व्याख्या
सखियाँ सुनीथा को यह समझाती हैं कि किसी एक दोष के कारण अपने पूरे अस्तित्व को दोषपूर्ण मान लेना उचित नहीं। वे आगे देवताओं और महापुरुषों के उदाहरण देकर बताती हैं कि महान पद पर स्थित व्यक्तियों के जीवन में भी कठिन कर्म और उनके परिणाम उपस्थित होते हैं।
उनका उद्देश्य पाप को उचित ठहराना नहीं, बल्कि सुनीथा को निराशा से बाहर निकालना है।
श्लोक 19
मूल श्लोक
जिह्ममुक्तं पुरा तेन ब्रह्मणा हरसंनिधौ । देवैश्चापि स हि त्यक्तो ब्रह्माऽपूज्यतमोऽभवत् ॥१९॥
शब्दार्थ
- जिह्मम् — कुटिल अथवा अनुचित।
- उक्तम् — कहा गया।
- पुरा — पहले।
- तेन ब्रह्मणा — उस ब्रह्मा द्वारा।
- हरसंनिधौ — हर अर्थात् शिव की उपस्थिति में।
- देवैः च अपि — देवताओं द्वारा भी।
- सः — वह।
- हि — निश्चय ही।
- त्यक्तः — त्याग दिया गया।
- ब्रह्मा — ब्रह्मा।
- अपूज्यतमः — पूजा के अयोग्य अथवा अत्यंत अपूज्य।
- अभवत् — हो गया।
भावार्थ
सखियाँ ब्रह्मा का उदाहरण देती हैं। वे कहती हैं कि ब्रह्मा ने कभी शिव की उपस्थिति में अनुचित अथवा कुटिल कथन किया था, जिसके कारण उन्हें देवताओं द्वारा भी त्यागे जाने और अपूज्य होने का प्रसंग झेलना पड़ा।
व्याख्या
यहाँ सखियाँ पुराणों में वर्णित ब्रह्मा और शिव से संबंधित प्रसंगों की ओर संकेत करती हैं। उनका तर्क है कि देवताओं के बीच भी ऐसे प्रसंग मिलते हैं जिनमें किसी के आचरण के कारण उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित होती है।
इस उदाहरण का प्रयोजन सुनीथा को यह समझाना है कि एक घटना अथवा दोष किसी व्यक्ति के समस्त गुणों को स्वतः समाप्त नहीं कर देता।
श्लोक 20
मूल श्लोक
ब्रह्महत्या प्रयुक्तोऽसौ देवराजोपि पश्य भोः । देवैः सार्धं महाभागस्त्रैलोक्यं परिभुंजति ॥२०॥
शब्दार्थ
- ब्रह्महत्या — ब्राह्मण अथवा ब्रह्मज्ञानी की हत्या का पाप।
- प्रयुक्तः — आरोपित अथवा उससे संबंधित।
- असौ — वह।
- देवराजः अपि — देवताओं का राजा भी।
- पश्य — देखो।
- भोः — हे सखि!
- देवैः सार्धम् — देवताओं के साथ।
- महाभागः — महान भाग्य वाला।
- त्रैलोक्यम् — तीनों लोकों को।
- परिभुंजति — भोगता अथवा शासन करता है।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि देवराज इन्द्र पर भी ब्रह्महत्या से संबंधित पाप का प्रसंग आया था, फिर भी वे देवताओं के साथ तीनों लोकों के शासन और भोग में प्रतिष्ठित रहे।
व्याख्या
यहाँ इन्द्र के जीवन में वृत्र-वध के बाद उत्पन्न ब्रह्महत्या-दोष के प्रसंग का संकेत समझा जा सकता है। कथा का उद्देश्य यह दिखाना है कि महान पद पर प्रतिष्ठित व्यक्ति भी कर्म के परिणामों से अछूता नहीं रहता।
सखियाँ इसी उदाहरण से सुनीथा को आश्वस्त करती हैं कि दोष का होना और व्यक्ति के जीवन की संपूर्ण संभावना का समाप्त हो जाना एक ही बात नहीं है।
श्लोक 21
मूल श्लोक
गौतमस्य प्रियां भार्यामहल्यां गतवान्पुरा । परदाराभिगामी स देवत्वे परिवर्तते ॥२१॥
शब्दार्थ
- गौतमस्य — गौतम ऋषि की।
- प्रियां भार्याम् — प्रिय पत्नी।
- अहल्याम् — अहल्या को।
- गतवान् — गया।
- पुरा — पहले।
- परदाराभिगामी — दूसरे की पत्नी के पास जाने वाला।
- सः — वह।
- देवत्वे — देवत्व में।
- परिवर्तते — प्रतिष्ठित रहता है अथवा स्थित होता है।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि इन्द्र ने पूर्वकाल में गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ अनुचित संबंध स्थापित किया था, फिर भी वे देवताओं के राजा बने रहे।
व्याख्या
यह उदाहरण इन्द्र और अहल्या की प्रसिद्ध कथा से जुड़ा है। इसमें इन्द्र के आचरण के कारण उत्पन्न दोष और उसके परिणामों का वर्णन मिलता है।
सखियों की दृष्टि में यह उदाहरण बताता है कि किसी उच्च पद पर स्थित व्यक्ति का भी आचरण दोषरहित नहीं होता। इसलिए सुनीथा को अपने ऊपर लगे दोष के कारण निराश होकर जीवन का त्याग करने की दिशा में नहीं जाना चाहिए।
श्लोक 22
मूल श्लोक
ब्रह्महत्योपमं कर्म दारुणं कृतवान्हरः । ब्रह्मणस्तु कपालेन चाद्यापि परिवर्तते ॥२२॥
शब्दार्थ
- ब्रह्महत्या-उपमम् — ब्रह्महत्या के समान।
- कर्म — कर्म।
- दारुणम् — भयानक।
- कृतवान् — किया।
- हरः — शिव।
- ब्रह्मणः — ब्रह्मा का।
- तु — और।
- कपालेन — कपाल के साथ।
- च — तथा।
- अद्य अपि — आज भी।
- परिवर्तते — विचरण करते हैं अथवा जुड़े हुए हैं।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि शिव से भी ब्रह्महत्या के समान गंभीर कर्म का प्रसंग जुड़ा है और वे ब्रह्मा के कपाल से संबंधित कथा के कारण विचरण करते रहे।
व्याख्या
यहाँ शिव के ब्रह्मा का एक मस्तक काटने और उसके बाद कपाल से जुड़े रहने की पुराणप्रसिद्ध कथा की ओर संकेत है। इस कथा में कपालमोचन और प्रायश्चित्त का प्रसंग भी आता है।
सखियाँ यह दिखाती हैं कि देवताओं के जीवन में भी कर्म, दोष और उसके परिणामों से संबंधित कथाएँ हैं। इसलिए दोष की उपस्थिति को जीवन की अंतिम सीमा नहीं मानना चाहिए।
श्लोक 23
मूल श्लोक
देवानमंतितं देवमृषयो वेदपारगाः । आदित्यः कुष्ठसंयुक्तस्त्रैलोक्यं च प्रकाशयेत् ॥२३॥
शब्दार्थ
- देवान् अमन्तितम् — देवताओं द्वारा अनादृत अथवा अपमानित।
- देवम् — देव को।
- ऋषयः — ऋषियों ने।
- वेदपारगाः — वेदों के पारगामी, वेदज्ञ।
- आदित्यः — आदित्य।
- कुष्ठसंयुक्तः — कुष्ठ अथवा त्वचा-रोग से ग्रस्त।
- त्रैलोक्यम् — तीनों लोकों को।
- च — भी।
- प्रकाशयेत् — प्रकाशित करता है।
भावार्थ
सखियाँ आदित्य का उदाहरण देती हैं। वे कहती हैं कि देवताओं और वेदज्ञ ऋषियों के प्रसंगों में भी अनादर अथवा रोग से जुड़ी घटनाएँ मिलती हैं, फिर भी आदित्य तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं।
व्याख्या
इस श्लोक का पाठ और उसका पौराणिक संदर्भ अपेक्षाकृत कठिन है। विशेषतः “देवानमंतितं देवम्” पद का सटीक अन्वय प्रसंग के आधार पर स्पष्ट किया जाना चाहिए। आदित्य के कुष्ठ अथवा रोग से संबंधित उल्लेख भी विभिन्न पुराणकथाओं के संदर्भ में जाँचा जा सकता है।
श्लोक का कथा में कार्य स्पष्ट है: सखियाँ उदाहरणों के माध्यम से यह बता रही हैं कि किसी दोष, रोग अथवा अपमान के कारण किसी सत्ता के सभी गुण और कार्य समाप्त नहीं हो जाते।
श्लोक 24
मूल श्लोक
लोकानमंतितं देवं देवाद्याः सचराचराः । कृष्णो भुंक्ते महाशापं भार्गवेण कृतं पुरा ॥२४॥
शब्दार्थ
- लोकान् अमन्तितम् — लोकों द्वारा अनादृत अथवा अपमानित।
- देवम् — देव को।
- देवाद्याः — देव आदि।
- सचराचराः — चर और अचर सहित।
- कृष्णः — कृष्ण।
- भुङ्क्ते — भोगते हैं अथवा सहन करते हैं।
- महाशापम् — महान शाप।
- भार्गवेण — भृगुवंशी द्वारा।
- कृतम् — दिया गया।
- पुरा — पहले।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि कृष्ण भी पूर्वकाल में भृगुवंशी ऋषि द्वारा दिए गए महान शाप से संबंधित प्रसंग में आते हैं। इससे वे समझाती हैं कि महान देवसत्ताओं के जीवन में भी शाप और उसके परिणामों की कथाएँ मिलती हैं।
व्याख्या
यहाँ भार्गव का उल्लेख भृगुवंशी ऋषि की ओर संकेत करता है। कृष्ण और भार्गव के बीच शाप का कौन-सा विशिष्ट प्रसंग अभिप्रेत है, यह अन्य पुराण-संदर्भों से मिलाकर निश्चित करना होगा।
इस श्लोक को पिछले उदाहरणों की ही कड़ी के रूप में पढ़ना चाहिए: सखियाँ सुनीथा को यह समझा रही हैं कि शाप अथवा दोष किसी व्यक्ति के समस्त स्वरूप का अंतिम निर्धारण नहीं है।
श्लोक 25
मूल श्लोक
गुरुभार्यांगतश्चंद्रः क्षयी तेन प्रजायते । भविष्यति महातेजा राजराजः प्रतापवान् ॥२५॥
शब्दार्थ
- गुरु-भार्याम् — गुरु की पत्नी को।
- गतः — प्राप्त हुआ अथवा उसके पास गया।
- चन्द्रः — चन्द्रमा।
- क्षयी — क्षय से ग्रस्त।
- तेन — उसी कारण।
- प्रजायते — होता है।
- भविष्यति — होगा।
- महातेजाः — महान तेज वाला।
- राजराजः — राजाओं में श्रेष्ठ अथवा राजाओं का राजा।
- प्रतापवान् — प्रतापशाली।
भावार्थ
सखियाँ चन्द्रमा का उदाहरण देती हैं। वे कहती हैं कि चन्द्रमा का गुरु की पत्नी से संबंधित अनुचित प्रसंग हुआ, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें क्षय का शाप मिला। इसके बाद वे एक प्रतापशाली राजपुरुष का उल्लेख करती हैं।
व्याख्या
चन्द्रमा और गुरु की पत्नी तारा का प्रसंग पुराणों में प्रसिद्ध है। इस कथा में बृहस्पति की पत्नी तारा और चन्द्रमा के संबंध से बुध का जन्म बताया जाता है। चन्द्रमा पर क्षय का प्रसंग भी विभिन्न पौराणिक आख्यानों में मिलता है।
दूसरी पंक्ति में “राजराजः” किस भावी पुरुष अथवा राजवंशीय प्रसंग को सूचित करता है, इसे आगे के संदर्भ से जोड़कर देखना आवश्यक है। श्लोक का व्यापक तर्क यही है कि दोष अथवा शाप के बाद भी जीवन का क्रम आगे बढ़ता है।
श्लोक 26
मूल श्लोक
पांडुपुत्रो महाप्राज्ञो धर्मात्मा स युधिष्ठिरः । गुरोश्चैव वधार्थाय अनृतं स वदिष्यति ॥२६॥
शब्दार्थ
- पाण्डुपुत्रः — पाण्डु का पुत्र।
- महाप्राज्ञः — अत्यंत बुद्धिमान।
- धर्मात्मा — धर्मात्मा।
- सः युधिष्ठिरः — वही युधिष्ठिर।
- गुरोः च एव — गुरु के विषय में भी।
- वधार्थाय — वध के उद्देश्य से।
- अनृतम् — असत्य।
- सः वदिष्यति — वह कहेगा।
भावार्थ
सखियाँ धर्मात्मा और महाप्राज्ञ युधिष्ठिर का उदाहरण देती हैं। वे कहती हैं कि युद्ध में गुरु द्रोण के वध का मार्ग खोलने के लिए युधिष्ठिर को भी असत्य से संबंधित कथन कहना पड़ा।
व्याख्या
महाभारत के द्रोणपर्व में अश्वत्थामा के मारे जाने की सूचना से संबंधित प्रसंग आता है। युधिष्ठिर का कथन द्रोण को शस्त्र त्यागने की स्थिति तक ले जाता है और अंततः द्रोण का वध होता है।
यहाँ युधिष्ठिर को धर्मात्मा कहने के साथ उनके जीवन के कठिन नैतिक प्रसंग का उल्लेख किया गया है। सखियों का तर्क है कि महापुरुष भी जटिल परिस्थितियों में ऐसे कर्मों से जुड़ सकते हैं जिनका नैतिक मूल्यांकन सरल नहीं होता।
श्लोक 27
मूल श्लोक
एतेष्वेव महत्पापं वर्तते च महत्सु च । वैगुण्यं कस्य वै नास्ति कस्य नास्ति च लांछनम् ॥२७॥
शब्दार्थ
- एतेषु एव — इन्हीं में।
- महत्पापम् — बड़ा पाप।
- वर्तते — विद्यमान है।
- महत्सु च — महान व्यक्तियों में भी।
- वैगुण्यम् — कमी अथवा दोष।
- कस्य — किसका।
- वै — निश्चय ही।
- नास्ति — नहीं है।
- लाञ्छनम् — कलंक अथवा दोष का चिह्न।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि महान व्यक्तियों के जीवन में भी गंभीर दोषों के प्रसंग मिलते हैं। ऐसा कौन है जिसमें कोई कमी न हो? किसके जीवन पर कभी कोई कलंक न लगा हो?
व्याख्या
यह श्लोक सखियों के तर्क का निष्कर्ष है। वे सुनीथा को उसके दोष के कारण स्वयं को पूरी तरह अस्वीकार करने से रोकना चाहती हैं।
यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी दोष का होना और उसे उचित ठहराना अलग बातें हैं। सखियों का मुख्य उद्देश्य सुनीथा को आत्मविनाशकारी निराशा से बचाकर उसके गुणों और भविष्य की संभावनाओं की ओर लौटाना है।
श्लोक 28
मूल श्लोक
भवती स्वल्पदोषेण विलिप्तासि वरानने । उपकारं करिष्यामस्तवैव वरवर्णिनि ॥२८॥
शब्दार्थ
- भवती — तुम।
- स्वल्पदोषेण — छोटे दोष से।
- विलिप्तासि — प्रभावित हुई हो।
- वरानने — हे सुंदर मुख वाली!
- उपकारम् — सहायता।
- करिष्यामः — हम करेंगी।
- तव एव — तुम्हारे ही लिए।
- वरवर्णिनि — हे सुंदर वर्ण वाली!
भावार्थ
सखियाँ सुनीथा से कहती हैं—हे सुंदर मुख वाली! तुम एक छोटे दोष से प्रभावित हुई हो। हम तुम्हारी सहायता करेंगी और तुम्हारे भविष्य के लिए उपाय खोजेंगी।
व्याख्या
यहाँ सखियाँ सुनीथा की समस्या को उसके पूरे व्यक्तित्व के समान नहीं मानतीं। वे उसे आश्वस्त करती हैं कि उसके गुण अब भी उसके भीतर विद्यमान हैं और उसकी सहायता की जा सकती है।
इससे कथा का क्रम आत्मग्लानि से समाधान की ओर मुड़ने लगता है।
श्लोक 29
मूल श्लोक
तवांगे ये गुणाः सन्ति सत्यस्त्रीणां यथा शुभे । अन्यत्रापि न पश्यामस्तान्गुणांश्चारुलोचने ॥२९॥
शब्दार्थ
- तव अंगे — तुम्हारे शरीर अथवा व्यक्तित्व में।
- ये गुणाः — जो गुण।
- सन्ति — हैं।
- सत्यस्त्रीणाम् — सत्यनिष्ठ स्त्रियों के।
- यथा — जैसे।
- शुभे — हे शुभे!
- अन्यत्र अपि — अन्यत्र भी।
- न पश्यामः — हम नहीं देखतीं।
- तान् गुणान् — उन गुणों को।
- चारुलोचने — हे सुंदर नेत्रों वाली!
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि हे सुनीथा! तुम्हारे भीतर वे गुण विद्यमान हैं जो सत्यनिष्ठ और सद्गुणी स्त्रियों में होते हैं। ऐसे गुण हमें अन्यत्र भी दुर्लभ दिखाई देते हैं।
व्याख्या
यह श्लोक सुनीथा के व्यक्तित्व के गुणात्मक पक्ष को सामने लाता है। देवताओं ने उसके शाप और भावी संतान के विषय में चिंता व्यक्त की थी, लेकिन सखियाँ उसके वर्तमान गुणों को पहचानती हैं।
उनकी दृष्टि में किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल उसके ऊपर लगे दोष से नहीं, बल्कि उसके संपूर्ण आचरण और गुणों से होना चाहिए।
श्लोक 30
मूल श्लोक
रूपमेव गुणः स्त्रीणां प्रथमं भूषणं शुभे । शीलमेव द्वितीयं च तृतीयं सत्यमेव च ॥३०॥
शब्दार्थ
- रूपम् एव — रूप ही।
- गुणः — गुण।
- स्त्रीणाम् — स्त्रियों का।
- प्रथमम् — पहला।
- भूषणम् — आभूषण।
- शुभे — हे शुभे!
- शीलम् एव — शील ही।
- द्वितीयम् — दूसरा।
- तृतीयम् — तीसरा।
- सत्यम् एव — सत्य ही।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि स्त्री के तीन प्रमुख आभूषण हैं—पहला रूप, दूसरा शील और तीसरा सत्य।
व्याख्या
यहाँ आभूषण का अर्थ केवल शरीर पर धारण की जाने वाली वस्तु नहीं, बल्कि व्यक्तित्व को सुशोभित करने वाले गुणों से है। रूप बाहरी सौंदर्य का परिचायक है, शील आचरण की मर्यादा को प्रकट करता है और सत्य व्यक्ति के कथन तथा व्यवहार की विश्वसनीयता का आधार है।
सखियाँ इन गुणों का उल्लेख करके सुनीथा को उसके भीतर विद्यमान श्रेष्ठ पक्षों का स्मरण कराती हैं।
श्लोक 31
मूल श्लोक
आर्जवत्वं चतुर्थं च पञ्चमं धर्ममेव हि । मधुरत्वं ततः प्रोक्तं षष्ठमेव वरानने ॥३१॥
शब्दार्थ
- आर्जवत्वम् — सरलता, निष्कपटता।
- चतुर्थम् — चौथा।
- पञ्चमम् — पाँचवाँ।
- धर्मम् — धर्मपरायणता।
- एव हि — ही।
- मधुरत्वम् — मधुरता।
- ततः — उसके बाद।
- प्रोक्तम् — कहा गया है।
- षष्ठम् — छठा।
- वरानने — हे सुंदर मुख वाली!
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि सरलता चौथा, धर्मपरायणता पाँचवाँ और मधुरता छठा गुण है।
व्याख्या
इन गुणों का क्रम स्त्री के व्यक्तित्व की व्यापक संरचना को सामने लाता है। सरलता व्यक्ति को छल-कपट से दूर रखती है, धर्मपरायणता उसे कर्तव्य और मर्यादा से जोड़ती है तथा मधुरता उसके व्यवहार को सौम्य बनाती है।
सखियाँ सुनीथा को इन गुणों से संपन्न मानती हैं और इसी आधार पर उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त करती हैं।
श्लोक 32
मूल श्लोक
शुद्धत्वं सप्तमं बाले अंतर्बाह्येषु योषितम् । अष्टमं हि पितुर्भावः शुश्रूषा नवमं किल ॥३२॥
शब्दार्थ
- शुद्धत्वम् — शुद्धता।
- सप्तमम् — सातवाँ।
- बाले — हे बालिके!
- अन्तर्बाह्येषु — भीतर और बाहर।
- योषितम् — स्त्री का।
- अष्टमम् — आठवाँ।
- हि — निश्चय ही।
- पितुः भावः — पिता के प्रति भाव अथवा सम्मान।
- शुश्रूषा — सेवा और आदरपूर्वक देखभाल।
- नवमम् — नौवाँ।
- किल — निश्चय ही।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि स्त्री का सातवाँ गुण भीतर और बाहर की शुद्धता है। आठवाँ गुण पिता के प्रति उचित भाव और सम्मान तथा नौवाँ गुण सेवा-भाव है।
व्याख्या
शुद्धता का संबंध केवल बाहरी स्वच्छता से नहीं, बल्कि आंतरिक भाव और आचरण से भी है। पिता के प्रति सम्मान और सेवा का उल्लेख उस पारिवारिक व्यवस्था को दर्शाता है जिसमें माता-पिता के प्रति कर्तव्य को महत्त्व दिया गया है।
यहाँ “पितुर्भावः” पद का सटीक आशय संदर्भानुसार पिता के प्रति सम्मानपूर्ण भाव के रूप में लिया जा सकता है।
श्लोक 33
मूल श्लोक
सहिष्णुर्दशमं प्रोक्तं रतिश्चैकादशं तथा । पातिव्रत्यं ततः प्रोक्तं द्वादशं वरवर्णिनि ॥३३॥
शब्दार्थ
- सहिष्णुः — सहनशीलता।
- दशमम् — दसवाँ।
- प्रोक्तम् — कहा गया है।
- रतिः — अनुराग अथवा प्रेम।
- च — और।
- एकादशम् — ग्यारहवाँ।
- तथा — उसी प्रकार।
- पातिव्रत्यम् — पति के प्रति निष्ठा।
- ततः — उसके बाद।
- द्वादशम् — बारहवाँ।
- वरवर्णिनि — हे सुंदर वर्ण वाली!
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि सहनशीलता दसवाँ गुण है, अनुराग ग्यारहवाँ और पातिव्रत्य बारहवाँ गुण है।
व्याख्या
यहाँ स्त्री के बारह गुणों की सूची पूर्ण होती है। सहनशीलता कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखने का गुण है, अनुराग संबंधों में प्रेम का परिचायक है और पातिव्रत्य पति के प्रति निष्ठा को व्यक्त करता है।
इन गुणों की सूची उसी सांस्कृतिक और पारिवारिक आदर्श को प्रस्तुत करती है जिसके आधार पर सखियाँ सुनीथा के व्यक्तित्व को गुणसंपन्न मानती हैं।
श्लोक 34
मूल श्लोक
तैस्त्वं संभूषिता बाले मा बिभेषि वरानने । येनोपायेन ते भर्ता भविष्यति सुधर्मधृक् ॥३४॥
शब्दार्थ
- तैः — उन गुणों से।
- त्वम् — तुम।
- संभूषिता — सुशोभित।
- बाले — हे बालिके!
- मा बिभेषि — भय मत करो।
- वरानने — हे सुंदर मुख वाली!
- येन उपायेन — जिस उपाय से।
- ते — तुम्हारा।
- भर्ता — पति।
- भविष्यति — होगा।
- सुधर्मधृक् — उत्तम धर्म धारण करने वाला।
भावार्थ
सखियाँ सुनीथा से कहती हैं—हे बालिके! तुम इन बारह गुणों से सुशोभित हो, इसलिए भय मत करो। हम ऐसा उपाय खोजेंगी जिससे तुम्हें धर्मपरायण पति प्राप्त हो सके।
व्याख्या
यह श्लोक सखियों के आश्वासन को स्पष्ट करता है। वे सुनीथा के गुणों को उसके भविष्य की संभावना से जोड़ती हैं और उसे बताती हैं कि उसके विवाह की समस्या का समाधान खोजा जा सकता है।
कथा अब एक नए मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ सखियाँ केवल सांत्वना नहीं देतीं, बल्कि एक विशेष विद्या प्रदान करने का प्रस्ताव भी रखती हैं।
श्लोक 35
मूल श्लोक
तमुपायं प्रपश्यामस्तवार्थं वयमेव हि । तामूचुस्ता वराः सख्यो मा त्वं वै साहसं कुरु ॥३५॥
शब्दार्थ
- तम् उपायम् — उस उपाय को।
- प्रपश्यामः — हम खोजती हैं अथवा विचार करती हैं।
- तव अर्थम् — तुम्हारे हित के लिए।
- वयम् एव — हम स्वयं।
- हि — निश्चय ही।
- ताम् ऊचुः — उससे कहा।
- ताः वराः सख्यः — वे श्रेष्ठ सखियाँ।
- मा — मत।
- त्वम् — तुम।
- वै — निश्चय ही।
- साहसम् कुरु — उतावली अथवा दुस्साहस मत करो।
भावार्थ
सखियाँ कहती हैं कि हम तुम्हारे हित के लिए उपाय खोजेंगी। इसलिए तुम कोई उतावला कदम मत उठाना और अपने शरीर को कष्ट देने का विचार छोड़ दो।
व्याख्या
यहाँ साहस शब्द का आशय केवल वीरता नहीं, बल्कि परिस्थिति से व्याकुल होकर कोई कठोर अथवा अविवेकपूर्ण निर्णय लेने से भी है। सखियाँ सुनीथा को धैर्य रखने के लिए कहती हैं।
श्लोक 36
मूल श्लोक
सूत उवाच — एवमुक्ता सुनीथा सा पुनरूचे सखीस्तु ताः । कथयध्वं ममोपायं येन भर्ता भविष्यति ॥३६॥
शब्दार्थ
- सूतः उवाच — सूत ने कहा।
- एवम् उक्ता — ऐसा कहे जाने पर।
- सुनीथा सा — वह सुनीथा।
- पुनः — फिर।
- ऊचे — बोली।
- सखीः तु ताः — उन सखियों से।
- कथयध्वम् — बताओ।
- मम उपायम् — मेरा उपाय।
- येन — जिससे।
- भर्ता — पति।
- भविष्यति — प्राप्त होगा।
भावार्थ
सूत कहते हैं कि सखियों की बातें सुनकर सुनीथा ने उनसे फिर कहा—मुझे वह उपाय बताओ जिससे मुझे धर्मपरायण पति प्राप्त हो सके।
व्याख्या
सुनीथा अब अपनी सखियों की सहायता स्वीकार करती है। पहले वह दुःख के कारण वन में जाकर तपस्या और शरीर को क्षीण करने का निश्चय कर चुकी थी; अब वह समाधान जानना चाहती है।
यह परिवर्तन कथा की दिशा बदल देता है—आत्मग्लानि से उपाय की खोज की ओर।
श्लोक 37
मूल श्लोक
तामूचुस्ता वरा नार्यो रंभाद्याश्चारुलोचनाः । रूपमाधुर्यसंयुक्ता भवती भूतिवर्द्धनी ॥३७॥
शब्दार्थ
- ताम् ऊचुः — उससे कहा।
- ताः वराः नार्यः — वे श्रेष्ठ स्त्रियाँ।
- रम्भाद्याः — रम्भा आदि।
- चारुलोचनाः — सुंदर नेत्रों वाली।
- रूपमाधुर्यसंयुक्ता — रूप और मधुरता से युक्त।
- भवती — तुम।
- भूतिवर्धनी — ऐश्वर्य अथवा समृद्धि बढ़ाने वाली।
भावार्थ
रम्भा आदि सुंदर और श्रेष्ठ सखियाँ सुनीथा से कहती हैं कि तुम रूप और मधुरता से संपन्न हो तथा समृद्धि बढ़ाने वाली हो।
व्याख्या
रम्भा का नाम आने से स्पष्ट होता है कि यहाँ अप्सराओं का समूह सुनीथा के साथ है। वे उसे उसके रूप, गुण और संभावनाओं का स्मरण कराती हैं।
“भूतिवर्धनी” पद का अर्थ समृद्धि, वैभव अथवा उन्नति बढ़ाने वाली के रूप में लिया जा सकता है। सखियों की दृष्टि में सुनीथा में ऐसा आकर्षण और सामर्थ्य है जो उसके भविष्य के निर्माण में सहायक हो सकता है।
श्लोक 38
मूल श्लोक
ब्रह्मशापेन संभीता वयमत्र समागताः । तां प्रोचुश्च विशालाक्षीं मृत्योः कन्यां सुलोचनाम् ॥३८॥
शब्दार्थ
- ब्रह्मशापेन — ब्रह्मा के शाप से।
- संभीताः — भयभीत।
- वयम् — हम।
- अत्र — यहाँ।
- समागताः — एकत्र आई हैं।
- ताम् — उससे।
- प्रोचुः — कहा।
- विशालाक्षीम् — विशाल नेत्रों वाली।
- मृत्योः कन्याम् — मृत्यु की पुत्री।
- सुलोचनाम् — सुंदर नेत्रों वाली।
भावार्थ
रम्भा आदि अप्सराएँ बताती हैं कि वे ब्रह्मा के शाप के कारण यहाँ एकत्र हुई हैं। वे विशाल नेत्रों वाली मृत्यु-पुत्री सुनीथा से अपनी बात कहती हैं।
व्याख्या
इस श्लोक में अप्सराओं के अपने जीवन से संबंधित एक अन्य प्रसंग का संकेत मिलता है। वे केवल सुनीथा को सांत्वना देने वाली सखियाँ नहीं हैं, बल्कि स्वयं भी ब्रह्मशाप से जुड़ी परिस्थिति में उपस्थित हैं।
इससे कथा में शाप का विषय व्यापक हो जाता है—सुनीथा का ऋषिशाप और अप्सराओं का ब्रह्मशाप, दोनों घटनाएँ पात्रों की वर्तमान स्थिति को प्रभावित करती हैं।
श्लोक 39
मूल श्लोक
विद्यामेकां प्रदास्यामः पुरुषाणां प्रमोहिनीम् । सर्वमायाविदां भद्रे सर्वभद्रप्रदायिनीम् ॥३९॥
शब्दार्थ
- विद्याम् एकाम् — एक विशेष विद्या।
- प्रदास्यामः — हम प्रदान करेंगी।
- पुरुषाणाम् — पुरुषों को।
- प्रमोहिनीम् — मोहित करने वाली।
- सर्वमायाविदाम् — समस्त माया के ज्ञान से संबंधित; अथवा माया की विद्या में समर्थ।
- भद्रे — हे कल्याणमयी!
- सर्वभद्रप्रदायिनीम् — समस्त कल्याण प्रदान करने वाली।
भावार्थ
अप्सराएँ सुनीथा से कहती हैं—हे भद्रे! हम तुम्हें एक ऐसी विद्या देंगी जो पुरुषों को मोहित करने में समर्थ है और मायावी प्रभाव उत्पन्न कर सकती है।
व्याख्या
यहाँ विद्या का स्वरूप स्पष्टतः आकर्षण और सम्मोहन से संबंधित है। कथा इसे सुनीथा की भावी परिस्थिति के समाधान के रूप में प्रस्तुत करती है।
“सर्वमायाविदाम्” पद का सटीक अन्वय पाठ के आधार पर जाँचा जा सकता है। उपलब्ध प्रसंग में मुख्य आशय यह है कि अप्सराएँ सुनीथा को ऐसी विद्या देने का वचन देती हैं, जिसके द्वारा वह अपने इच्छित पुरुष को आकर्षित कर सके।
श्लोक 40
मूल श्लोक
विद्याबलं ततो दद्युस्तस्यैताः सुखदायकम् । यं यं मोहयितुं भद्रे इच्छस्येवं सुरादिकम् ॥४०॥
शब्दार्थ
- विद्याबलम् — विद्या का बल।
- ततः — तब।
- ददुः — दिया।
- तस्यै — उसे।
- एताः — इन सखियों ने।
- सुखदायकम् — सुख देने वाला।
- यम् यम् — जिस-जिसको।
- मोहयितुम् — मोहित करने के लिए।
- भद्रे — हे भद्रे!
- इच्छसि — तुम चाहती हो।
- एवम् — इस प्रकार।
- सुरादिकम् — देव आदि पुरुषों को।
भावार्थ
तब उन अप्सराओं ने सुनीथा को उस विद्या का बल प्रदान किया। उन्होंने कहा कि हे भद्रे! तुम जिस देव अथवा अन्य पुरुष को मोहित करना चाहो, इस विद्या के माध्यम से उसे मोहित कर सकती हो।
व्याख्या
इस श्लोक में विद्या केवल सैद्धांतिक ज्ञान नहीं रहती, बल्कि प्रभाव उत्पन्न करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत होती है। अप्सराएँ सुनीथा को उसकी प्रयोगात्मक क्षमता बताती हैं।
कथा में यह घटना आगे आने वाले पुरुष-दर्शन और सुनीथा की प्रतिक्रिया की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
श्लोक 41
मूल श्लोक
तं तं सद्यो मोहय वा इत्युक्ता सा तथाऽकरोत् । विद्यायां हि सुसिद्धायां सा सुनीथा सुनंदिता ॥४१॥
शब्दार्थ
- तम् तम् — उस-उसको।
- सद्यः — तत्काल।
- मोहय — मोहित करो।
- इति उक्ता — ऐसा कहे जाने पर।
- सा — उसने।
- तथा अकरोत् — वैसा ही किया।
- विद्यायाम् — विद्या में।
- हि — निश्चय ही।
- सुसिद्धायाम् — पूर्णतः सिद्ध होने पर।
- सा सुनीथा — वह सुनीथा।
- सुनन्दिता — प्रसन्न हुई।
भावार्थ
अप्सराओं ने सुनीथा से कहा कि तुम जिस पुरुष को चाहो, उसे तत्काल मोहित कर सकती हो। उनकी बात सुनकर सुनीथा ने वैसा ही किया। जब वह विद्या में सिद्ध हो गई, तब वह प्रसन्न हुई।
व्याख्या
यहाँ विद्या की सिद्धि और उसके प्रयोग का वर्णन है। सुनीथा को अब अपने आकर्षण को प्रभावशाली बनाने वाली शक्ति प्राप्त हो चुकी है।
इस प्रसंग में यह ध्यान देने योग्य है कि कथा सुनीथा के दुःख से आरंभ होकर उसे एक विशेष क्षमता मिलने तक पहुँचती है। आगे यही क्षमता उसे उस तपस्वी ब्राह्मण के सामने ले जाती है, जिसका वर्णन अगले श्लोकों में है।
श्लोक 42
मूल श्लोक
भ्रमत्येवं सखीभिस्तु पुरुषान्सा विपश्यति । अटमानागता पुण्यं नंदनं वनमुत्तमम् ॥४२॥
शब्दार्थ
- भ्रमति — विचरण करती है।
- एवम् — इस प्रकार।
- सखीभिः तु — अपनी सखियों के साथ।
- पुरुषान् — पुरुषों को।
- सा — वह।
- विपश्यति — देखती है।
- अटमाना — घूमती हुई।
- आगता — पहुँच गई।
- पुण्यम् — पुण्यदायक।
- नन्दनम् वनम् — नन्दन वन।
- उत्तमम् — श्रेष्ठ।
भावार्थ
इस प्रकार सुनीथा अपनी सखियों के साथ विचरण करती हुई विभिन्न पुरुषों को देखती रहती है। घूमते-घूमते वह पुण्यदायक और श्रेष्ठ नन्दन वन में पहुँच जाती है।
व्याख्या
नन्दन वन देवताओं के लोक से संबंधित प्रसिद्ध दिव्य वन है। कथा में इसका उल्लेख सुनीथा की यात्रा के अगले चरण के रूप में आता है।
यहाँ स्थान-परिवर्तन के साथ कथा का परिवेश भी बदलता है। सुनीथा अब वन में तपस्या करने वाली दुःखी कन्या के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष विद्या प्राप्त कर अपने भावी जीवन के लिए मार्ग खोजती हुई दिखाई देती है।
श्लोक 43
मूल श्लोक
गंगातीरे ततो दृष्ट्वा ब्राह्मणं रूपसंयुतम् । सर्वलक्षणसंपन्नं सूर्यतेजः समप्रभम् ॥४३॥
शब्दार्थ
- गंगातीरे — गंगा के तट पर।
- ततः — तब।
- दृष्ट्वा — देखकर।
- ब्राह्मणम् — ब्राह्मण को।
- रूपसंयुतम् — सुंदर रूप से युक्त।
- सर्वलक्षणसंपन्नम् — सभी शुभ लक्षणों से संपन्न।
- सूर्यतेजः — सूर्य के तेज के समान।
- समप्रभम् — समान प्रभा वाला।
भावार्थ
नन्दन वन में विचरण करते हुए सुनीथा ने गंगा के तट पर एक सुंदर ब्राह्मण को देखा। वह सभी शुभ लक्षणों से संपन्न था और उसका तेज सूर्य के समान चमक रहा था।
व्याख्या
यहाँ गंगा के तट का उल्लेख अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। कथा में गंगा केवल एक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उस स्थान का परिचायक है जहाँ सुनीथा का सामना एक असाधारण तपस्वी से होता है।
इस स्थान को तत्काल पृथ्वी की किसी निश्चित नदी अथवा भौगोलिक क्षेत्र से जोड़ना आवश्यक नहीं। पहले कथा में वर्णित गंगा, नन्दन वन और ब्राह्मण के तपस्वी स्वरूप को एक साथ समझना होगा।
ब्राह्मण के रूप और तेज का वर्णन उसके सामान्य व्यक्तित्व से आगे बढ़कर उसके विशिष्ट आध्यात्मिक प्रभाव को प्रकट करता है।
श्लोक 44
मूल श्लोक
रूपेणाप्रतिमं लोके द्वितीयमिव मन्मथम् । देवरूपं महाभागं भाग्यवंतं सुभाग्यदम् ॥४४॥
शब्दार्थ
- रूपेण — रूप में।
- अप्रतिमम् — जिसकी कोई समानता न हो।
- लोके — संसार में।
- द्वितीयम् इव — मानो दूसरा।
- मन्मथम् — कामदेव।
- देवरूपम् — देवता के समान रूप वाला।
- महाभागम् — अत्यंत सौभाग्यशाली।
- भाग्यवन्तम् — भाग्यवान।
- सुभाग्यदम् — शुभ भाग्य देने वाला।
भावार्थ
वह ब्राह्मण संसार में अनुपम रूप वाला था, मानो दूसरा कामदेव हो। उसका रूप देवता के समान था और वह स्वयं महान भाग्यशाली तथा दूसरों के लिए भी शुभ भाग्य का कारण बनने वाला दिखाई देता था।
व्याख्या
कामदेव से तुलना उसके असाधारण सौंदर्य और आकर्षण को व्यक्त करती है। इससे स्पष्ट होता है कि सुनीथा ने जिस पुरुष को देखा, उसका रूप सामान्य नहीं था।
कथा में यह वर्णन उसके बाहरी सौंदर्य तक सीमित नहीं है। अगले श्लोकों में उसके विष्णु के तेज के समान प्रभाव, वैष्णव स्वरूप और तपस्या में लीन होने का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार सौंदर्य, तेज और तप—तीनों गुण उसके व्यक्तित्व में एक साथ उपस्थित हैं।
श्लोक 45
मूल श्लोक
अनौपम्यं महात्मानं विष्णुतेजः समप्रभम् । वैष्णवं सर्वपापघ्नं विष्णुतुल्यपराक्रमम् ॥४५॥
शब्दार्थ
- अनौपम्यम् — जिसकी कोई उपमा न हो।
- महात्मानम् — महान आत्मा वाले पुरुष को।
- विष्णुतेजः — विष्णु के तेज के समान।
- समप्रभम् — समान प्रभा वाला।
- वैष्णवम् — विष्णु से संबंधित अथवा वैष्णव स्वरूप वाला।
- सर्वपापघ्नम् — समस्त पापों का नाश करने वाला।
- विष्णुतुल्यपराक्रमम् — विष्णु के समान पराक्रम वाला।
भावार्थ
वह पुरुष अनुपम और महान आत्मा वाला था। उसका तेज विष्णु के समान था। वह वैष्णव स्वरूप से युक्त, पापों का नाश करने वाला और पराक्रम में विष्णु के समान था।
व्याख्या
यह श्लोक उस ब्राह्मण की आध्यात्मिक महत्ता को स्पष्ट करता है। पिछले श्लोकों में उसका रूप कामदेव के समान बताया गया था, जबकि यहाँ उसका तेज और पराक्रम विष्णु के समान कहा गया है।
इससे कथा में एक महत्त्वपूर्ण भेद सामने आता है—केवल आकर्षक रूप ही नहीं, बल्कि तप, तेज, वैष्णव संबंध और आध्यात्मिक सामर्थ्य भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।
श्लोक 46
मूल श्लोक
कामक्रोधविहीनं तमत्रिवंशविभूषणम् ॥४६॥
शब्दार्थ
- काम — इच्छा अथवा कामना।
- क्रोध — क्रोध।
- विहीनम् — रहित।
- तम् — उस पुरुष को।
- अत्रिवंशविभूषणम् — अत्रि के वंश का आभूषण।
भावार्थ
वह पुरुष काम और क्रोध से रहित था तथा अत्रि के वंश का आभूषण था।
व्याख्या
यह श्लोक उस ब्राह्मण के चरित्र की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में से एक को सामने रखता है। उसका रूप अत्यंत आकर्षक था, लेकिन वह स्वयं काम और क्रोध से रहित था।
इस प्रकार कथा बाहरी आकर्षण और आंतरिक संयम को एक ही व्यक्तित्व में रखती है। अत्रि वंश का आभूषण कहे जाने से उसके वंश, तप और प्रतिष्ठा का भी संकेत मिलता है।
श्लोक 47
मूल श्लोक
दृष्ट्वा सुरूपं तपसां स्वरूपं दिव्यप्रभावं परितप्यमानम् । पप्रच्छ रंभां सुसखीं सरागा कोऽयं दिविष्ठः प्रवरो महात्मा ॥४७॥
शब्दार्थ
- दृष्ट्वा — देखकर।
- सुरूपम् — सुंदर रूप वाले।
- तपसाम् स्वरूपम् — तप का मूर्त स्वरूप।
- दिव्यप्रभावम् — दिव्य प्रभाव से युक्त।
- परितप्यमानम् — तपस्या करते हुए।
- पप्रच्छ — पूछा।
- रम्भाम् — रम्भा से।
- सुसखीम् — प्रिय सखी।
- सरागा — अनुराग से युक्त।
- कः अयम् — यह कौन है?
- दिविष्ठः — दिव्य लोक में स्थित अथवा दिव्य पुरुष।
- प्रवरः — श्रेष्ठ।
- महात्मा — महान आत्मा वाला।
भावार्थ
उस सुंदर, दिव्य प्रभाव से संपन्न और तपस्या में लीन पुरुष को देखकर सुनीथा उसके प्रति अनुराग अनुभव करने लगी। उसने अपनी प्रिय सखी रम्भा से पूछा—यह दिव्य पुरुष कौन है, जो इतना श्रेष्ठ और महान आत्मा वाला है तथा तपस्या में लीन है?
व्याख्या
यह अध्याय इसी प्रश्न पर समाप्त होता है। सुनीथा ने एक ऐसे पुरुष को देखा है जिसमें असाधारण रूप, दिव्य तेज, विष्णु के समान पराक्रम, अत्रि वंश की प्रतिष्ठा और काम-क्रोध से रहित तपस्वी स्वभाव एक साथ विद्यमान हैं।
इस वर्णन में एक विशेष विरोधाभास भी है: सुनीथा को पुरुषों को मोहित करने वाली विद्या प्राप्त हुई है, जबकि जिस पुरुष को वह देखती है, वह स्वयं काम और क्रोध से रहित बताया गया है। आगे की कथा में यही अंतर महत्त्वपूर्ण होगा।
“दिविष्ठः” पद का सटीक अर्थ पाठ और प्रसंग के आधार पर निश्चित किया जाना चाहिए; यहाँ इसे दिव्य पुरुष अथवा दिव्य लोक से संबंधित पुरुष के अर्थ में लिया गया है।
अध्याय का समग्र भावार्थ
इस अध्याय में सुनीथा के जीवन की दिशा तीन चरणों में बदलती है।
पहला चरण—दोष और उसके परिणाम: मृत्यु अपनी पुत्री के विवाह के लिए देवताओं और ऋषियों के समक्ष प्रस्ताव रखते हैं। देवता सुनीथा के गुणों को स्वीकार करते हुए भी ऋषिशाप और उससे उत्पन्न होने वाली भावी संतान के विषय में चिंता प्रकट करते हैं। वे उपमाओं के माध्यम से बताते हैं कि एक दोष का प्रभाव व्यक्ति से आगे वंश तक पहुँच सकता है।
दूसरा चरण—आत्मग्लानि से समाधान की ओर: देवताओं के निर्णय से सुनीथा और उसका पिता दुःखी होते हैं। सुनीथा वन में जाकर कठोर तपस्या करने का निश्चय करती है, लेकिन उसकी सखियाँ उसे समझाती हैं कि महान व्यक्तियों के जीवन में भी दोष और शाप के प्रसंग मिलते हैं। वे सुनीथा के बारह गुणों का वर्णन करके उसे उसके व्यक्तित्व की वास्तविक संपन्नता का स्मरण कराती हैं।
तीसरा चरण—विद्या और दिव्य पुरुष का दर्शन: रम्भा आदि अप्सराएँ सुनीथा को पुरुषों को मोहित करने वाली विद्या देती हैं। उस विद्या में सिद्ध होने के बाद सुनीथा अपनी सखियों के साथ विचरण करती हुई नन्दन वन पहुँचती है। वहाँ गंगा के तट पर उसे एक असाधारण ब्राह्मण दिखाई देता है—सुंदर, दिव्य तेज से संपन्न, विष्णु के समान पराक्रमी, अत्रि वंश का आभूषण और काम-क्रोध से रहित तपस्वी।
अध्याय का अंतिम प्रश्न—“यह दिव्य पुरुष कौन है?”—अगले अध्याय की कथा का द्वार खोलता है। अभी उसका नाम नहीं बताया गया है; पहले उसके रूप, तेज, वंश और तपस्वी स्वभाव का विस्तार किया गया है।
अध्याय 35 — अंग और सुनीथा का संबंध
श्लोक 1
मूल श्लोक
रंभोवाच— ब्रह्मा अव्यक्तसंभूतस्तस्माज्जज्ञे प्रजापतिः । अत्रिर्नाम स धर्मात्मा तस्य पुत्रो महामनाः ॥१॥
शब्दार्थ
- रम्भा उवाच — रम्भा ने कहा।
- ब्रह्मा — ब्रह्मा।
- अव्यक्तसंभूतः — अव्यक्त से उत्पन्न।
- तस्मात् — उनसे अथवा उससे।
- जज्ञे — उत्पन्न हुआ।
- प्रजापतिः — प्रजापति।
- अत्रिः नाम — अत्रि नामक।
- सः — वह।
- धर्मात्मा — धर्मात्मा।
- तस्य पुत्रः — उसका पुत्र।
- महामनाः — महान मन वाला।
भावार्थ
रम्भा सुनीथा को बताती है कि ब्रह्मा अव्यक्त से उत्पन्न हुए और उनसे प्रजापति अत्रि उत्पन्न हुए। अत्रि धर्मात्मा थे और उनके पुत्र महान मन वाले थे।
व्याख्या
रम्भा सबसे पहले उस वंश का परिचय देती है जिससे गंगातट पर तपस्या करने वाला पुरुष संबंधित है। कथा में उसका परिचय केवल नाम बताकर नहीं दिया जाता, बल्कि उसके वंश की उत्पत्ति और धर्मपरायणता के साथ जोड़ा जाता है।
यहाँ अव्यक्त से ब्रह्मा की उत्पत्ति और फिर प्रजापति अत्रि का उल्लेख सृष्टि-परंपरा की ओर संकेत करता है। इसके बाद कथा अत्रि के पुत्र अंग की पहचान कराती है।
श्लोक 2
मूल श्लोक
अंगो नाम अयं भद्रे नंदनं वनमागतः । इंद्रस्य संपदं दृष्ट्वा लीलातेजसमुत्तमाम् ॥२॥
शब्दार्थ
- अंगः नाम — अंग नामक।
- अयम् — यह।
- भद्रे — हे कल्याणमयी!
- नन्दनम् वनम् — नन्दन वन।
- आगतः — आया है।
- इन्द्रस्य — इन्द्र की।
- संपदम् — संपत्ति, वैभव अथवा ऐश्वर्य।
- दृष्ट्वा — देखकर।
- लीला-तेजसः — लीला और तेज से संबंधित; पाठ का यह पद संदर्भानुसार समझना होगा।
- उत्तमाम् — श्रेष्ठ।
भावार्थ
रम्भा कहती है—हे भद्रे! यह अंग है। यह इन्द्र के अद्भुत वैभव और श्रेष्ठ तेज को देखकर नन्दन वन आया है।
व्याख्या
यह श्लोक अंग के नन्दन वन में आने का कारण बताता है। उसने इन्द्र के वैभव और पद की प्रतिष्ठा देखी, जिससे उसके भीतर भी वैसा ही सामर्थ्य और पद प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हुई।
अंग की इच्छा केवल बाहरी संपत्ति तक सीमित नहीं है। अगले श्लोकों में स्पष्ट होता है कि वह इन्द्र के समान पद के साथ धर्मयुक्त पुत्र भी चाहता है। इस प्रकार उसके लक्ष्य में पद, तेज, धर्म और वंश की निरंतरता एक साथ उपस्थित हैं।
श्लोक 3
मूल श्लोक
कृता स्पृहा अनेनापि इंद्रस्य सदृशे पदे । ईदृशो हि यदा पुत्रो मम स्याद्धर्मसंयुतः ॥३॥
शब्दार्थ
- कृता स्पृहा — इच्छा की गई।
- अनेन अपि — इसके द्वारा भी।
- इन्द्रस्य — इन्द्र के।
- सदृशे पदे — समान पद के लिए।
- ईदृशः — ऐसा।
- हि — निश्चय ही।
- यदा — जब।
- पुत्रः — पुत्र।
- मम — मेरा।
- स्यात् — हो।
- धर्मसंयुतः — धर्म से युक्त।
भावार्थ
अंग के मन में इन्द्र के समान पद प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हुई। वह चाहता था कि उसका पुत्र भी इन्द्र के समान तेजस्वी और धर्मयुक्त हो।
व्याख्या
यहाँ अंग की इच्छा दो स्तरों पर दिखाई देती है—एक, इन्द्र के समान प्रतिष्ठित पद; दूसरा, ऐसे पुत्र की प्राप्ति जो धर्म और सामर्थ्य से संपन्न हो।
यह अंतर महत्त्वपूर्ण है। अंग अपने लिए केवल पद की इच्छा नहीं रखता, बल्कि भावी पुत्र के गुणों को भी अपनी साधना का लक्ष्य बनाता है। आगे विष्णु की आराधना इसी कामना को पूरा करने के लिए की जाती है।
श्लोक 4
मूल श्लोक
सुश्रेयो मे भवेज्जन्म यशः कीर्ति समन्वितम् । आराधितो हृषीकेशस्तपोभिर्नियमैस्तथा ॥४॥
शब्दार्थ
- सुश्रेयः — उत्तम कल्याण अथवा श्रेष्ठ फल।
- मे — मेरे लिए।
- भवेत् — हो।
- जन्म — जन्म अथवा वंश में जन्म लेने का फल।
- यशः — यश।
- कीर्ति — प्रतिष्ठा।
- समन्वितम् — युक्त।
- आराधितः — आराधना किया गया।
- हृषीकेशः — हृषीकेश, विष्णु।
- तपोभिः — तपस्याओं द्वारा।
- नियमैः — नियमों द्वारा।
- तथा — और।
भावार्थ
अंग चाहता है कि उसकी साधना से ऐसा श्रेष्ठ फल प्राप्त हो जो यश और कीर्ति से युक्त हो। इस उद्देश्य से उसने तपस्या और नियमों के द्वारा हृषीकेश की आराधना की।
व्याख्या
यहाँ तप और नियम अंग की कामना को साधने के साधन हैं। वह केवल इच्छा प्रकट करके नहीं रुकता, बल्कि अनुशासनपूर्वक आराधना करता है।
हृषीकेश नाम विष्णु के उस स्वरूप को सूचित करता है जो इन्द्रियों के अधिपति हैं। अंग उन्हीं की आराधना करके अपने भावी पुत्र के लिए आवश्यक गुणों का वरदान चाहता है।
श्लोक 5
मूल श्लोक
सुप्रसन्ने हृषीकेशे वरं याचितवानयम् । इंद्रस्य सदृशं पुत्रं विष्णुतेजः पराक्रमम् ॥५॥
शब्दार्थ
- सुप्रसन्ने — अत्यंत प्रसन्न होने पर।
- हृषीकेशे — हृषीकेश के।
- वरम् — वरदान।
- याचितवान् — माँगा।
- अयम् — इसने।
- इन्द्रस्य सदृशम् — इन्द्र के समान।
- पुत्रम् — पुत्र।
- विष्णुतेजः — विष्णु के तेज से युक्त।
- पराक्रमम् — पराक्रम वाला।
भावार्थ
हृषीकेश के प्रसन्न होने पर अंग ने उनसे वरदान माँगा कि उसे इन्द्र के समान तेजस्वी और पराक्रमी पुत्र प्राप्त हो, जिसमें विष्णु के तेज का प्रभाव हो।
व्याख्या
अंग की कामना अब स्पष्ट रूप लेती है। वह ऐसे पुत्र की इच्छा करता है जिसमें इन्द्र के समान पद और सामर्थ्य प्राप्त करने की योग्यता हो तथा विष्णु के तेज और पराक्रम का प्रभाव विद्यमान हो।
यहाँ पुत्र के गुणों का निर्धारण पिता की इच्छा और विष्णु के वरदान से जुड़ता है। अगले श्लोक में वरदान की प्राप्ति का उल्लेख है।
श्लोक 6
मूल श्लोक
वैष्णवं सर्वपापघ्नं देहि मे मधुसूदन । दत्तवान्स तदा पुत्रमीदृशं सर्वधारकम् ॥६॥
शब्दार्थ
- वैष्णवम् — विष्णु से संबंधित अथवा वैष्णव गुणों से युक्त।
- सर्वपापघ्नम् — समस्त पापों का नाश करने वाला।
- देहि मे — मुझे प्रदान करें।
- मधुसूदन — विष्णु का नाम।
- दत्तवान् — दे दिया।
- सः — उन्होंने।
- तदा — तब।
- पुत्रम् — पुत्र।
- ईदृशम् — ऐसा।
- सर्वधारकम् — सबको धारण करने वाला अथवा सबका आधार बनने वाला।
भावार्थ
अंग ने मधुसूदन से प्रार्थना की—मुझे ऐसा वैष्णव गुणों से युक्त पुत्र प्रदान करें जो पापों का नाश करने वाला और सबका आधार बनने की क्षमता रखता हो। तब विष्णु ने उसे ऐसा पुत्र प्रदान करने का वरदान दिया।
व्याख्या
इस श्लोक में भावी पुत्र के गुणों का विस्तार होता है। वह केवल पराक्रमी नहीं, बल्कि वैष्णव तेज से युक्त और व्यापक आधार बनने की क्षमता वाला होना चाहिए।
“सर्वधारकम्” पद का अर्थ प्रसंगानुसार सबको धारण करने वाला, सबका पालन करने वाला अथवा व्यापक व्यवस्था को संभालने वाला लिया जा सकता है। इस पद का संबंध आगे भावी पुत्र के धर्म और योग से जुड़े वर्णन के साथ समझना चाहिए।
श्लोक 7
मूल श्लोक
तदाप्रभृति विप्रेंद्रः पुण्यां कन्यां प्रपश्यति । यथा त्वं चारुसर्वांगी तथायं परिपश्यति ॥७॥
शब्दार्थ
- तदाप्रभृति — तभी से, उसके बाद से।
- विप्रेन्द्रः — ब्राह्मणों में श्रेष्ठ।
- पुण्याम् कन्याम् — पुण्यशील कन्या को।
- प्रपश्यति — देखता है।
- यथा — जिस प्रकार।
- त्वम् — तुम।
- चारुसर्वाङ्गी — सभी अंगों से सुंदर।
- तथा — उसी प्रकार।
- अयम् — यह।
- परिपश्यति — पूर्ण रूप से देखता है अथवा देखता रहता है।
भावार्थ
रम्भा कहती है कि उस समय से यह श्रेष्ठ ब्राह्मण पुण्यशील कन्या को देखने लगा। जैसे तुम सुंदर अंगों वाली हो, वैसे ही यह तुम्हें देखता है।
व्याख्या
इस श्लोक में अंग और सुनीथा के बीच संबंध की भूमिका सामने आती है। रम्भा बताती है कि अंग सुनीथा को देखता है और उसके रूप से प्रभावित होता है।
पिछले अध्याय में सुनीथा ने अंग को गंगातट पर तपस्या करते देखा था। अब रम्भा उसके वंश, तपस्या और वरदान की कथा सुनाकर इस भेंट को व्यापक घटनाक्रम से जोड़ती है।
श्लोक 8
मूल श्लोक
एनं गच्छ वरारोहे अस्मात्पुत्रो भविष्यति । पुण्यात्मा पुण्यधर्मज्ञो विष्णुतेजः पराक्रमः ॥८॥
शब्दार्थ
- एनम् — इसके पास।
- गच्छ — जाओ।
- वरारोहे — हे श्रेष्ठ रूप वाली!
- अस्मात् — इससे।
- पुत्रः — पुत्र।
- भविष्यति — उत्पन्न होगा।
- पुण्यात्मा — पुण्यात्मा।
- पुण्यधर्मज्ञः — पुण्य और धर्म को जानने वाला।
- विष्णुतेजः — विष्णु के तेज से युक्त।
- पराक्रमः — पराक्रमी।
भावार्थ
रम्भा सुनीथा से कहती है—हे सुंदर रूप वाली! तुम इस पुरुष के पास जाओ। इससे उत्पन्न होने वाला पुत्र पुण्यात्मा, धर्म का ज्ञाता, विष्णु के तेज से युक्त और पराक्रमी होगा।
व्याख्या
यह श्लोक रम्भा की सलाह का मुख्य आधार है। वह अंग को केवल सुंदर अथवा आकर्षक पुरुष के रूप में प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि उसकी तपस्या, विष्णु की आराधना और प्राप्त वरदान का उल्लेख करती है।
रम्भा के अनुसार, सुनीथा और अंग के मिलन से उत्पन्न पुत्र में वे गुण होंगे जिनकी कामना अंग ने तपस्या के समय की थी। इस प्रकार कथा भावी पुत्र के चरित्र को माता-पिता के संयोग और विष्णु के वरदान से जोड़ती है।
श्लोक 9
मूल श्लोक
एतत्ते सर्वमाख्यातं तथाहं पृच्छिता त्वया । अयं भर्ता भवत्यर्हो भवेदेव न संशयः ॥९॥
शब्दार्थ
- एतत् — यह।
- ते — तुम्हें।
- सर्वम् — सब कुछ।
- आख्यातम् — बताया गया।
- तथा — इस प्रकार।
- अहम् — मैंने।
- पृच्छिता — पूछे जाने पर।
- त्वया — तुम्हारे द्वारा।
- अयम् — यह।
- भर्ता — पति।
- भवती — तुम्हारा।
- अर्हः — योग्य।
- भवेत् — होगा।
- एव — ही।
- न संशयः — कोई संदेह नहीं।
भावार्थ
रम्भा कहती है—तुमने मुझसे जो पूछा था, उसका पूरा विवरण मैंने तुम्हें बता दिया। यह पुरुष तुम्हारे लिए योग्य पति होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।
व्याख्या
रम्भा अब अंग के परिचय और उसके तप का विवरण पूरा करती है। उसका निष्कर्ष है कि अंग सुनीथा के लिए योग्य पति है, क्योंकि वह धर्म, तप, तेज और विष्णु के वरदान से संपन्न है।
इस कथन में विवाह का निर्णय केवल रूप के आकर्षण पर आधारित नहीं है। रम्भा ने अंग की वंशपरंपरा, तपस्या और भावी पुत्र के गुणों को आधार बनाया है।
श्लोक 10
मूल श्लोक
सुशंखस्यापि यः शापो वृथा सोऽपि भविष्यति । अस्माज्जाते महाभागे पुत्रे धर्मप्रचारिणि ॥१०॥
शब्दार्थ
- सुशंखस्य अपि — सुशंख का भी।
- यः शापः — जो शाप।
- वृथा — निष्फल।
- सः अपि — वह भी।
- भविष्यति — हो जाएगा।
- अस्मात् — इससे।
- जाते — उत्पन्न होने पर।
- महाभागे — हे महाभागे!
- पुत्रे — पुत्र।
- धर्मप्रचारिणि — धर्म का प्रचार करने वाला।
भावार्थ
रम्भा कहती है कि हे महाभागे! इस पुरुष से धर्म का प्रचार करने वाला पुत्र उत्पन्न होगा और उसके जन्म से सुशंख का शाप भी निष्फल हो जाएगा।
व्याख्या
यह श्लोक कथा में शाप और वरदान के संबंध को सामने लाता है। पहले सुशंख के शाप के कारण सुनीथा के भविष्य पर संकट आया था। अब रम्भा बताती है कि अंग से उत्पन्न होने वाला पुत्र धर्म का प्रचार करेगा और इस प्रकार शाप से जुड़ी नकारात्मक आशंका निष्फल हो जाएगी।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात है: कथा शाप को केवल तत्काल घटना नहीं मानती, बल्कि उसके भविष्यगत परिणामों को भी सामने रखती है। उसी प्रकार वरदान भी भविष्य में उत्पन्न होने वाले पुत्र के गुणों के माध्यम से अपना फल प्रकट करेगा।
श्लोक 11
मूल श्लोक
भविष्यसि सुखी भद्रे सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । सुक्षेत्रे कृषिकारस्तु बीजं वपति तत्परः ॥११॥
शब्दार्थ
- भविष्यसि — तुम हो जाओगी।
- सुखी — सुखी।
- भद्रे — हे कल्याणमयी!
- सत्यम् सत्यम् — निश्चय ही सत्य।
- वदामि — मैं कहती हूँ।
- अहम् — मैं।
- सुक्षेत्रे — उत्तम खेत में।
- कृषिकारः — किसान।
- तु — निश्चय ही।
- बीजम् — बीज।
- वपति — बोता है।
- तत्परः — तत्पर होकर।
भावार्थ
रम्भा सुनीथा से कहती है—हे भद्रे! तुम सुखी होगी, मैं सत्य कहती हूँ। जैसे किसान उत्तम खेत में तत्परता से बीज बोता है, वैसे ही इस संबंध से शुभ फल उत्पन्न होगा।
व्याख्या
यहाँ कृषि का उदाहरण अगले श्लोक की भूमिका तैयार करता है। खेत और बीज का संबंध संतानोत्पत्ति के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है।
उत्तम क्षेत्र और बीज की उपमा यह संकेत करती है कि भावी संतान के गुणों को समझने के लिए माता-पिता की प्रकृति और उनके संयोग को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। कथा इस उपमा के माध्यम से भावी पुत्र की गुणवत्ता समझाती है।
श्लोक 12
मूल श्लोक
स तथा भुंजते देवि यथा बीजं तथा फलम् । अन्यथा नैव जायेत तत्सर्वं सदृशं भवेत् ॥१२॥
शब्दार्थ
- सः तथा — वह उसी प्रकार।
- भुंजते — भोगता है अथवा प्राप्त करता है; इस पद का अन्वय पाठ के अनुसार जाँचना होगा।
- देवि — हे देवि!
- यथा बीजम् — जैसा बीज।
- तथा फलम् — वैसा फल।
- अन्यथा — अन्य प्रकार से।
- न एव जायेत — उत्पन्न नहीं होगा।
- तत् सर्वम् — वह सब।
- सदृशम् — समान अथवा अनुरूप।
- भवेत् — होता है।
भावार्थ
रम्भा कृषि की उपमा को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि जैसा बीज होता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है। उत्पन्न होने वाला परिणाम अपने कारण के अनुरूप होता है।
व्याख्या
इस श्लोक का केंद्रीय सिद्धांत कारण और परिणाम की अनुरूपता है। बीज में जो क्षमता होती है, उसी के अनुसार पौधे और फल का विकास होता है।
कथा में यही उपमा माता-पिता और भावी संतान के संबंध पर लागू होती है। रम्भा का तर्क है कि अंग के तप, धर्म, विष्णु-तेज और वरदान से जुड़ा यह संबंध एक विशिष्ट गुणसंपन्न पुत्र को जन्म देगा।
यहाँ संस्कृत पाठ में “भुंजते” पद का व्याकरणिक अन्वय कुछ कठिन है; इसलिए भावार्थ में मुख्य उपमा—बीज और फल की अनुरूपता—को केंद्र में रखा गया है।
श्लोक 13
मूल श्लोक
अयमेष महाभागस्तपस्वी पुण्यवीर्यवान् । अस्य वीर्यात्समुत्पन्नो अस्यैवगुणसंपदा ॥१३॥
शब्दार्थ
- अयम् एषः — यही यह पुरुष।
- महाभागः — महाभाग्यशाली।
- तपस्वी — तपस्या करने वाला।
- पुण्यवीर्यवान् — पुण्यबल से युक्त।
- अस्य वीर्यात् — इसके वीर्य से।
- समुत्पन्नः — उत्पन्न हुआ।
- अस्य एव — इसी के।
- गुणसंपदा — गुणों की संपन्नता से।
भावार्थ
रम्भा कहती है कि यह पुरुष महाभाग्यशाली, तपस्वी और पुण्यबल से युक्त है। इससे उत्पन्न होने वाला पुत्र इसके गुणों की संपन्नता से युक्त होगा।
व्याख्या
यहाँ अंग के तप और पुण्यबल को भावी पुत्र के गुणों से जोड़ा गया है। पिछले श्लोक में बीज और फल की उपमा दी गई थी; अब उसी सिद्धांत को सीधे अंग के व्यक्तित्व पर लागू किया गया है।
अंग की तपस्या, विष्णु की आराधना और वरदान कथा में पुत्र के गुणों की पूर्वभूमि बनते हैं।
श्लोक 14
मूल श्लोक
युक्तः पुत्रो महातेजाः सर्वदेहभृतां वरः । भविष्यति महाभाग्यो युक्तात्मा योगतत्त्ववित् ॥१४॥
शब्दार्थ
- युक्तः — युक्त, संपन्न।
- पुत्रः — पुत्र।
- महातेजाः — महान तेज वाला।
- सर्वदेहभृताम् — समस्त देहधारियों में।
- वरः — श्रेष्ठ।
- भविष्यति — होगा।
- महाभाग्यः — महान भाग्य वाला।
- युक्तात्मा — संयमित अथवा एकाग्रचित्त।
- योगतत्त्ववित् — योग के तत्त्व को जानने वाला।
भावार्थ
रम्भा कहती है कि इससे उत्पन्न होने वाला पुत्र महान तेज वाला, सभी देहधारियों में श्रेष्ठ, महाभाग्यशाली, संयमित और योगतत्त्व का ज्ञाता होगा।
व्याख्या
यह श्लोक भावी पुत्र के गुणों का सार प्रस्तुत करता है। उसके भीतर केवल शारीरिक बल या राजकीय सामर्थ्य नहीं होगा, बल्कि योग के तत्त्व का ज्ञान और आत्मसंयम भी होगा।
यहाँ “योगतत्त्ववित्” विशेष महत्त्व रखता है। इससे भावी पुत्र की पहचान केवल राजवंशीय उत्तराधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि योग और धर्म के ज्ञान से संबंधित व्यक्तित्व के रूप में भी स्थापित होती है।
श्लोक 15
मूल श्लोक
एवं हि वाक्यं तु निशम्य बाला रंभाप्रियोक्तं शिवदायकं तत् । विचिंत्य बुद्ध्येह सुनीथया तदा तत्त्वार्थमेतत्परिसत्यमेव हि ॥१५॥
शब्दार्थ
- एवम् — इस प्रकार।
- हि — निश्चय ही।
- वाक्यम् — वचन।
- निशम्य — सुनकर।
- बाला — युवती।
- रम्भा-प्रियोक्तम् — रम्भा द्वारा प्रिय भाव से कहा गया।
- शिवदायकम् — कल्याण प्रदान करने वाला।
- तत् — वह।
- विचिन्त्य — विचार करके।
- बुद्ध्या — बुद्धि से।
- इह — यहाँ।
- सुनीथया — सुनीथा द्वारा।
- तदा — तब।
- तत्त्वार्थम् — तत्त्व का अर्थ अथवा वास्तविक आशय।
- एतत् — यह।
- परिसत्यम् एव — अत्यंत सत्य अथवा सत्य ही।
भावार्थ
रम्भा के कल्याणकारी वचन सुनकर सुनीथा ने उन पर विचार किया। उसने अपनी बुद्धि से उनके तत्त्वार्थ को समझने का प्रयास किया और उन वचनों को सत्य माना।
व्याख्या
यह अध्याय सुनीथा के विचारशील निर्णय के साथ समाप्त होता है। वह केवल रम्भा के आकर्षक कथन सुनकर तत्काल कोई कदम नहीं उठाती, बल्कि उन पर विचार करती है।
रम्भा ने अंग की वंशपरंपरा, तपस्या, विष्णु के वरदान और भावी पुत्र के गुणों का विवरण दिया है। सुनीथा इन बातों को अपने भविष्य से जोड़कर देखती है।
इस प्रकार कथा का यह अध्याय अंग और सुनीथा के संभावित संबंध को केवल रूप के आकर्षण के आधार पर नहीं, बल्कि तप, वरदान, धर्म और भावी संतान के गुणों के आधार पर प्रस्तुत करता है।
अध्याय का समग्र भावार्थ
इस अध्याय में रम्भा, सुनीथा को अंग की पहचान और उसके तप का कारण बताती है। अंग प्रजापति अत्रि का पुत्र है। उसने इन्द्र के वैभव को देखकर इन्द्र के समान पद और धर्मयुक्त पुत्र की कामना की। इसके लिए उसने हृषीकेश की तपस्या और नियमों के साथ आराधना की। विष्णु ने उसे वैष्णव तेज, पराक्रम और व्यापक आधार बनने की क्षमता से युक्त पुत्र का वरदान दिया।
रम्भा के अनुसार, अंग से उत्पन्न होने वाला पुत्र धर्म का प्रचार करेगा और सुशंख के शाप से उत्पन्न आशंका को निष्फल कर देगा। वह इस परिणाम को बीज और खेत की उपमा से समझाती है—जैसा बीज, वैसा फल। अंग के तप, पुण्यबल और गुणों के अनुरूप भावी पुत्र में महान तेज, आत्मसंयम और योगतत्त्व का ज्ञान होगा।
अध्याय का अंतिम श्लोक सुनीथा के विचार को सामने रखता है। वह रम्भा के वचनों को सुनकर उनके तत्त्वार्थ पर विचार करती है। इस प्रकार कथा में विवाह, तपस्या, वरदान और भावी संतान के गुण एक क्रमबद्ध घटनाक्रम में जुड़ जाते हैं।
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