अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २६ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ

अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २६ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ


येऽस्यां स्थ प्राच्यां दिशि हेतयो नाम देवास्तेषां वो अग्निरिषवः । ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥१॥

०३।०२६।०१

अथर्ववेद काण्ड ३ सुक्त २६ सरल संस्कृत शब्दार्थ और हिन्दी भावार्थ

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ये) जो तुम (अस्याम्) इस (प्राच्याम्) पूर्व वा सन्मुख (दिशि) दिशा में (हेतयः) वज्ररूप (नाम) नाम (देवाः) विजय चाहनेवाले (स्थ) हो (तेषाम् वः) उन तुम्हारी (अग्निः) अग्नि [अग्नि विद्या] (इषवः) तीर हैं, (ते) वे तुम (नः) हमें (मृडत) सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमारे लिये (अधि) अधिकारपूर्वक (ब्रूत) बोलो, (तेभ्यः वः) उन तुम्हारे लिए (नमः) सत्कार वा अन्न होवे, (तेभ्यः वः) उन तुम्हारे लिए (स्वाहा) सुन्दर वाणी [प्रशंसा] होवे ॥१॥

भावार्थः सेनानी अपनी सेना का व्यूह करके आग्नेय अस्त्रवाले शूरवीरों को पूर्व दिशा में वा अपने सन्मुख स्थान में रक्खें, वे लोग शत्रुओं को जीतकर अपने राजा की दुहाई वा जयघोषणा करें, और राजा सत्कारपूर्वक ऊँचे-२ अधिकार देकर उनका उत्साह बढ़ावे ॥१॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (अस्याम् प्राच्यां दिशि) [हमारे राष्ट्र की] इस पूर्व की दिशा में (ये) जो तुम (हेतयः) हननकर्ता (नाम) नामवाले (देवाः) विजिगीषु सैनिक (स्थ) हो, (तेषाम् वः) उन तुम्हारे (इषवः) इषु (अग्नि:) आग्नेय हैं। (ते) वे तुम (नः मृडत) हमें सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमें (अधिबूत) राष्ट्र रक्षा के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान का कथन करो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (नमः) नमस्कार हो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (स्वाहा) हमारी सम्पत्तियों की आहुति हो, प्रदान हो।

टिप्पणी: [देवा:=दिवु क्रीड़ा विजिगीषा आदि (दिवादि)।]
 
येऽस्यां स्थ दक्षिणायां दिश्यविष्यवो नाम देवास्तेषां वः काम इषवः । ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥२॥

०३।०२६।०२

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ये) जो तुम (अस्याम्) इस (दक्षिणायाम्) दक्षिण वा दाहिनी (दिशि) दिशा में (अविष्यवः) रक्षा की इच्छावाले (नाम) नाम (देवाः) विजय चाहनेवाले वीर (स्थ) हो, (तेषाम् नः) उन तुम्हारा (कामः) मनोरथ (इषवः) तीर हैं, (ते) वे तुम (नः) हमें.... [म० १] ॥२॥

भावार्थः दक्षिण दिशा वा दाहिनी ओर वाले रक्षक विजयी वीर दृढ़ मनोरथ से शत्रुओं को जीतकर... [म० १] ॥२॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (अस्याम् दक्षिणायाम् दिशि) [हमारे राष्ट्र की] इस दक्षिण दिशा में (ये) जो तुम (अविष्यवः) "स्वेच्छापूर्वक रक्षा करनेवाले" (नाम) अर्थात् इस नामवाले (देवाः) विजिगीषु सैनिक हो, (तेषाम् वः) उन तुम की (काम:) कामना अर्थात् इच्छा ही (इषवः) इषु हैं। (ते) वे तुम (नः मृडत) हमें सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमें (अधिबूत) राष्ट्र रक्षा के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान का कथन करो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (नमः) नमस्कार हो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (स्वाहा) हमारी सम्पत्तियों की आहुति हो, प्रदान हो।

टिप्पणी: [काम:=राष्ट्र रक्षा के लिए स्वेच्छापूर्वक कामना। अविष्यवः=अव (रक्षणे, भ्वादिः) +असुन्+क्यच् (इच्छा) +उः। स्वेच्छापूर्वक राष्ट्र रक्षा करना, न की भृती के कारण। स्वेच्छापूर्वक राष्ट्र रक्षा की कामना राष्ट्रीय शत्रुओं के विनाश में सर्वोत्तम स्वरूप है।]
 
येऽस्यां स्थ प्रतीच्यां दिशि वैराजा नाम देवास्तेषां व आप इषवः । ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥३॥

०३।०२६।०३

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ये) जो तुम (अस्याम्) इस (प्रतीच्याम्) पश्चिम वा पीछेवाली (दिशि) दिशा में (वैराजाः) विविध ऐश्वर्यवाले क्षत्रिय (नाम) नाम (देवाः) विजय चाहनेवाले वीर (स्थ) हो, (तेषाम् वः) उन तुम्हारा (आपः) जल [जल विद्या] (इषवः) तीर हैं, (ते) वे तुम (नः) हमें.... [म० १] ॥३॥

भावार्थः पश्चिम वा पीछेवाली दिशा के क्षत्रिय लोग वारुणास्त्र वा जलास्त्रों से शत्रुओं को जीतकर.... [म० १] ॥३॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (ये) जो (अस्याम् प्रतीच्याम् दिशि) इस पश्चिम दिशा में (वैराजाः नाम) अन्नस्वामी, अर्थात् इस नामवाले, (देवाः) व्यवहारी अर्थात् व्यापारी (स्थ) तुम हो (तेषां वः) उन तुम्हारे (इषवः) इषु (आप:) जल हैं। (ते) वे तुम (नः मृडत) हमें सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमें (अधिबूत) राष्ट्र रक्षा के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान का कथन करो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (नमः) नमस्कार हो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (स्वाहा) हमारी सम्पत्तियों की आहुति हो, प्रदान हो।

टिप्पणी: [मन्त्रोक्त देव वैश्य हैं, जोकि अन्नस्वामी हैं। विराट= अन्नम् (सायण)। इषु है आप: अर्थात् जल। जल के द्वारा अन्नोत्पत्ति होती है। इसलिए सूक्त २७, मन्त्र ३ में प्रतीची दिशा का अधिपति वरुण कहा है, "वरुण अपामधिपतिः" (अथर्व० ५।२४।४)। राष्ट्र-रक्षा के लिए अन्न पर्याप्त चाहिए, ताकि अन्न द्वारा परिपुष्ट सैनिक और प्रजाजन राष्ट्र-रक्षा कर सकें। स्वाहा=सूक्तियाँ, प्रशंसाएँ। वैश्यों से अन्न प्राप्त कर राष्ट्राधिकारी उनकी प्रशंसा करते हैं। स्वाहा=सु आह (निरुक्त ८।३।२०; पदसंख्या १३)।]
 
येऽस्यां स्थोदीच्यां दिशि प्रविध्यन्तो नाम देवास्तेषां वो वात इषवः । ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥४॥

०३।०२६।०४

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ये) जो तुम (अस्याम्) इस (उदीच्याम्) उत्तर वा बायीं ओर वाली (दिशि) दिशा में (प्रविध्यन्तः) वेधनेवाले (नाम) नाम (देवाः) विजय चाहनेवाले वीर (स्थ) हो, (तेषाम् वः) उन तुम्हारा (वातः) पवन (इषवः) तीर हैं, (ते) वे तुम (नः) हमें.... [म० १] ॥४॥

भावार्थः उत्तर वा बायीं ओर वाली दिशा में बरछी, भाले, गोली आदि से छेदनेवाले वायुविद्या में कुशल योद्धा, वायव्य अस्त्र शस्त्र, विमानों द्वारा वैरियों को जीतकर... [म० १] ॥४॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (ये) जो (अस्याम् उदीच्यां दिशि) इस उत्तर की दिशा में (प्रविध्यन्तः) प्रकर्षेण बींधनेवाले, (नाम) अर्थात् इस नामवाले (देवाः) विजिगीषु सैनिक (स्थ) हो, (तेषां वः) उन तुम्हारे (इषवः) इषु (वात) वायु हैं, या वायव्यास्त्र हैं। (ते) वे तुम (नः मृडत) हमें सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमें (अधिबूत) राष्ट्र रक्षा के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान का कथन करो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (नमः) नमस्कार हो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (स्वाहा) हमारी सम्पत्तियों की आहुति हो, प्रदान हो।

टिप्पणी: [वात:= निरुक्तकार ने" अप्वा" का कथन किया है (६।३।१२, पदसंख्या ४८) अप्वा=यह अस्त्र है शत्रु पर फैंकने के लिए। यह प्रक्षेप्ता से अपगत हुआ, वा=वायुरूप होकर, या गतिवाला होकर शत्रु की ओर जाता है। अप्वा१=अपूर्वा (गतौ, अदादिः)। निरुक्तकार ने इसे "व्याधिर्वा भयं वा" कहा है और निर्वचन दिया है "यदनया विद्धोऽपवीयते" (६।३।१२)। यह वायुरूप हुआ शत्रु की ओर जाता है। देखो (अथर्व० ३।१।३,५,६, तथा ३।२।१,५,६)। अप्वा वस्तुत: भयरूप है शत्रुओं के लिए।] [१. अप्वा और अपवीयते में शब्दसाम्य भी है और अर्थसाम्य भी। अप्वा=अप्+वा (गतौ); अपवीयते=अप्+वा (गतौ; अदादिः) ।]
 
येऽस्यां स्थ ध्रुवायां दिशि निलिम्पा नाम देवास्तेषां व ओषधीरिषवः । ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥५॥

०३।०२६।०५

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ये) जो तुम (अस्याम्) इस (ध्रुवायाम्) स्थिर वा निश्चित (दिशि) दिशा में (निलिम्पाः) लेप करनेवाले वैद्य (नाम) नाम (देवाः) विजय चाहनेवाले वीर (स्थ) हों, (तेषाम् वः) उन तुम्हारी (ओषधीः) अन्न, सोमलतादि ओषधियाँ (इषवः) तीर है, (ते) वे तुम (नः) हमें... [म० १] ॥५॥

भावार्थः लेप पट्टी आदि करनेवाले सद्वैद्य दृढ़ निश्चित स्थान में औषधालय बनाकर सैनिकों को स्वस्थ रखकर शत्रुओं को जीतकर... [म० १] ॥५॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (ये) जो (अस्याम् ध्रुवायां दिशि) इस स्थिर भूमिरूपा दिशा में (निलिम्पा:) नितरां लिप्त, (नाम) अर्थात् इस नामवाले (देवाः) मोदप्रमोद में रत रहते (स्थ) हो (तेषाम् वः) उन तुम्हारे (इषवः) इषु हैं (औषधि:) औषधियां। (ते) वे तुम (नः मृडत) हमें सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमें (अधिबूत) राष्ट्र रक्षा के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान का कथन करो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (नमः) नमस्कार हो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (स्वाहा) हमारी सम्पत्तियों की आहुति हो, प्रदान हो।

टिप्पणी: [ध्रुवा दिशा है पृथिवी, अतः पार्थिव जीवनों में लिप्त मनुष्य। दिवु=मोद-प्रमोदरूप जीवनोंवाले (दिवादिः)। ये औषधियां उत्पन्न कर राष्ट्र की सेवा करते हैं। अन्नरूपी ओषधियों का वर्णन मन्त्र ३ में हुआ है। अत: औषधि: पद रोगनिवारक औषधियों के लिए है, युद्ध में आहत सैनिकों के लिए तथा सब प्रजा के लिए रोगोपचार में औषधियां चाहिएँ। स्वाहा=प्रशंसावचन हो उनके लिए।]
 
येऽस्यां स्थोर्ध्वायां दिश्यवस्वन्तो नाम देवास्तेषां वो बृहस्पतिरिषवः । ते नो मृडत ते नोऽधि ब्रूत तेभ्यो वो नमस्तेभ्यो वः स्वाहा ॥६॥

०३।०२६।०६

✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉

भाषार्थ: (ये) जो तुम (अस्याम्) इस (ऊर्ध्वायाम्) ऊपरवाली (दिशि) दिशा में (अवस्वन्तः) रक्षा के अधिकारी (नाम) नाम (देवाः) विजय चाहनेवाले वीर (स्थ) हो, (तेषाम् वः) उन तुम्हारा (बृहस्पतिः) बड़ों का स्वामी, मुख्य सेनापति (इषवः) तीर हैं, (ते) वे तुम (नः) हमें (मृडत) सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमारे लिए (अधि) अधिकारपूर्वक (ब्रूत) बोले, (तेभ्यः वः) उन तुम्हारे लिए (नमः) सत्कार वा अन्न होवे, (तेभ्यः वः) उन तुम्हारे लिए (स्वाहा) सुन्दर वाणी [प्रशंसा] होवे ॥६॥

भावार्थः बड़े साहसी रक्षाधिकारी, युद्ध विद्या में कुशल योधा लोग ऊँचे स्थान पर रहकर मुख्य सेनापति की सहायता से वैरियों को जीतकर अपने राजा की दुहाई वा जय घोषणा करें, और राजा सत्कार पूर्वक ऊँचे-२ अधिकार देकर उनका उत्साह बढ़ावे ॥६॥
 
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉

भाषार्थ: (ये) जो (अस्याम् ऊर्ध्वायाम् दिशि) इस ऊर्ध्व दिशा में (अवस्वन्तः) रक्षा करनेवाले, (नाम) अर्थात् इस नामवाले, (देवा: स्थ) विजिगीषु सैनिक तुम हो, (तेषाम् वः) उन तुम्हारे (इषवः) इषु (बृहस्पति:) बृहद्-ब्रह्माण्ड-का पति परमेश्वर है। (ते) वे तुम (नः मृडत) हमें सुखी करो, (ते) वे तुम (नः) हमें (अधिबूत) राष्ट्र रक्षा के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान का कथन करो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (नमः) नमस्कार हो, (तेभ्यः वः) उन तुम के लिए (स्वाहा) हमारी सम्पत्तियों की आहुति हो, प्रदान हो। (स्वाहा) उनकी रक्षा के लिए सर्वस्व समर्पण हो।

टिप्पणी: [ऊर्ध्वादिशा द्युलोक की ओर अपरिमित परिमाण में विस्तृत है, अत: उसका पति बृहस्पति कहा है, जबकि "बृहतामपि-पति" है। वह ही इषुरूप होकर सबकी रक्षा कर रहा है। अवस्वन्तः= अवनं रक्षणं तद्वन्तः (सायण)]
 





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