🔥त्यागपूर्वक भोग !!!
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यजुर्वेद के ४० वे अध्याय के प्रथम मंत्र का अश " तेन त्यक्तेन भुंजीथा " ईश्वर हम सब मनुष्यों को त्यागपूर्वक भोग करने का आदेश देता है । सुनने और देखने में त्याग और भोग दोनों विपरीतधर्मी प्रतीत होते हैं ।सामान्य मनुष्य यही सोचता है कि यदि किसी साधन ,सुविधा या वस्तु का भोग ही कर लिया तो उसका त्याग कैसे सम्भव है और यदि त्याग कर दिया तो तो भोग कैसे कर सकते हैं ।परन्तु यदि चिंतन करे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि, ना भोगने का नाम त्याग नही है अपितु भोग से ना चिपटने, भोग्य पदार्थों में अनासक्ति, भोग्य पदार्थों के छोडने का नाम ही त्याग है ।
जगत के उपयोग में त्यागभाव धर्म का मुख्य अंग है ।त्याग के बिना लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव ही नही है ।संसार के समस्त अधिकार सेवा व त्याग से प्राप्त होते हैं ।मनुष्य का जीवन सदा देने के लिए होता है लेने के लिए नही ।जैसे बादल ऊंचाई को पाकर सबके उपकार के लिए बरसते हैं । वैसे ही मनुष्य भी अपने जीवन में ऊपर उठकर दूसरों का उपकार किया करें ।
खुशी का सबसे बड़ा यही रहस्य त्याग की भावना है ।खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि आप दुसरे को क्या दे सकते है? त्याग के बिना न तो ईश्वर की प्रेरणा होती हैं और न ही प्रार्थना ।त्याग के समान कोई सुख नही है।इसलिए मनुष्य को एक साधक के रूप में ईश्वर प्रदत्त साधनों का उपयोग, उपभोग त्यागपूर्वक करते हुए अपने लक्ष्य साध्य प्राप्ति के लिए करना चाहिए ।
ओ३म् सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।हत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु (यजुर्वेद ३४|६|)
अर्थ :- हें सर्वान्तर्यामिन्! जो मन रस्सी से घोड़ो के समान अथवा घोड़ो के नियन्ता सारथी के तुल्य लोगों को अत्यन्त इधर-उधर ले जाता है, वह मेरा मन सब इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोक कर धर्म- पथ में सदा चलाया करे।
( १) चतुर लोग निन्दा करें या स्तुति, धन आए या जाये, आज ही मरना हो या वर्षों के बाद, धर्मात्मा लोग धर्म पथ से कभी नहीं हटते।
( २) न काम से, न भय से, न लोभ से, न जीवन के मोह से धर्म को कभी न छोड़े, धर्म ही सदा रहने वाला है। सुख दुख तो अनित्य या आने जाने वाले हैं। आत्मा अमर है, इसलिए सदा रहने वाले धर्म से ही प्यार करो।
( ३) पशु पक्षियों को मोतियों से क्या काम, अन्धे को दीपक से क्या लाभ और मूर्ख को सत्य की चर्चा से क्या काम।
( ४) वह सभा नहीं जिसमें बूढ़े न हों और वह बूढ़े नहीं जो धर्म की बात न करें। वह धर्म नहीं कि जिसमें सच्चाई न हो और वह सत्य नहीं जिसमें छल–कपट और धोखा हो।
( ४) बुद्धिमान थोड़े के लिए बहुत का नाश न करे। बुद्धिमता इसी में है कि थोड़े से अधिक की रक्षा करे।
ओ३म् तन्तुना रायस्पोषेण रायस्पोषं जिन्व संसर्पेण श्रुताय श्रुतं जिन्वैडेनौषधीभिरोषधीर्जिन्वोत्तमेन तनूभिस्तनूर्जिन्व वयोधसाधींतेनाधीतं जिन्वाभिजिता तेजसा तेजो जिन्व॥
यजुर्वेद १५-७॥
हे मनुष्य, तुम धन और वैभव का विस्तार धन और वैभव से ही करो। अपने ज्ञान का विस्तार वैदिक ज्ञान को सुनकर करो। औषधि विज्ञान का विस्तार वनस्पति और वृक्षों के विस्तार से करो। उत्तम शरीर का विस्तार धर्म युक्त आचरण से करो। जीवन को धारण करने वाली शक्तियों का विस्तार विद्या की प्राप्ति से सत्य का साक्षात्कार करे।
अपरिग्रह―साधना
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केवल अपने शरीर के लिए, पारिवारिक जीवन चलाने, पारिवारिक व्यवस्था ठीक रखने और अपनी जिम्मेदारियों को निभानए और लोक-कल्याण के कार्यों को चलाने के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता है, तदतिरिक्त वस्तुओं का त्याग करना ही अपरिग्रह है। अधिक वस्तुओं की इच्छा अच्छी नहीं है। प्रयोजन के अतिरिक्त वस्तुओं की आवश्यकता रहने, अधिक भोग्य पदार्थ सम्मुख रहने से योग सिद्धि नहीं होती। तब अपरिग्रह सिद्धि होगी
जब हम एकत्रित धन और भोग्य वस्तुएँ दूसरे अभाव ग्रस्त व्यक्तियों को दे देंगे, क्योंकि अर्थ के हम रक्षक हैं, ट्रस्टी हैं, केवल भक्षक नहीं हैं। जगत् की सब वस्तुएँ भगवान् की हैं, दूसरे को वंचित करके किसी वस्तु का भोग और प्रयोग करना महापाप है, प्रभु का अर्थ लोक-कल्याण में ही खर्च करना चाहिये। प्रयोजन के अतिरिक्त सभी विषयों का त्याग कर देने से भोग्य वस्तुओं के मानसिक बन्धन से मुक्त हो जाने से चित्त निर्मल हो जायेगा।
इच्छाओं की पूर्ति करते-करते हम सारा जीवन अशान्ति से गुजार देते हैं। और जरुरतें बढती ही जाती हैं। दो रोटी खाकर तो तृप्ति हो सकती है, पर छत्तीस पदार्थ खाकर भी लालसा बनी रहती है। इच्छाएँ तो कभी पूरी नहीं हो सकतीं और इनकी पूर्ति के चक्कर में सारी आयु व्यतीत हो जाती है।
भर्तृहरि जी का एक श्लोक है―
भोगा: न भुक्ता वयम् एव भुक्ता: तापो न तप्त: वयम् एव तपाता: ।
कालो न यातो वयम् एव याता: तृष्णा न जीर्णा वयम् एव जीर्णा: ।।
अर्थात्― भोग कम न हुए, भोगते भोगते हम ही भुगते गए। हम तप कर न सके, विषय वासनाएँ हमें ही तपा गई। समय समाप्त नहीं हुआ पर हम ही मृत्यु का ग्रास बन गये, तृष्णा नहीं घटी हम ही बूढे हो गये, और हमारी आसक्ति बढती ही गई, इच्छा की पूर्ति कभी न हुई।
ओ३म् शं नो अग्निर्ज्योतिरनीको अस्तु शं नो मित्रावरूणावश्विना शम्। शं न सुकृतां सुकृतानि सन्तु शं न इषिरो अभि वातु वात:।। (ऋग्वेद ७|३५|४)
💐अर्थ :- ज्योतियों की ज्योति ज्ञास्वरूप परमेश्वर हमारे लिए शान्तिदायक हो, दिन और रात हमें शान्ति कारक हो, सूर्य और चन्द्रमा हमें शान्ति देने वाले हो, धर्मात्माओं के सुकर्म हमें शान्ति कारक हो, गतिशील पवन हमारे लिए सब ओर से शान्ति देने वाली हो।
सात्विक भोजन, नियमित दिनचर्या, ब्रह्मचर्य का पालन, पूर्ण निद्रा, व्यायाम, अच्छी पुस्तकों का पढना , सत्संग, विद्वान और श्रेष्ठ मनुष्यों के साथ मित्रता, ईश्वर पर श्रद्धा और विश्वास, सतर्कता, सावधानी, शान्ति प्रियता , प्रशन्नता, धैर्य, दया , क्षमा आदि जिसके अन्दर ये सभी गुण होते है वह मनुष्य अपनी आयु को बढ़ा सकता है।
तामसिक भोजन, अनियमित दिनचर्या, असंयम, व्यभिचार, अधिक जागना, स्वाध्याय- सत्संग न करना, बुरे व्यक्तियों के साथ मित्रता, नास्तिकता, असावधानी, क्रूरता, अशान्ति, चिन्ता, शोक , भय , रोग आदि से मनुष्य की शारीरिक मानसिक अध्यात्मिक शक्तियां कम हो जाती हैं और वह अल्प आयु में - अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
ओ३म् नम: कपर्दिने च व्युप्तकेशाय च नम: सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मीढुष्टमाय चेषुमते च॥ यजुर्वेद १६-२९॥
भावार्थ हमें उन सन्यासियों का आदर करना चाहिए जो हमें जीवन का सही रास्ता दिखाते हैं। हमें अपनी श्रद्धा उन विद्वानों में रखनी चाहिए जो हजारों विषयों के ज्ञाता हैं और हमें ज्ञान देते हैं। हमें उन प्रशिक्षकों का सत्कार करना चाहिए जो अस्त्र शस्त्र का प्रशिक्षण देते हैं। हमें उस किसान का सत्कार करना चाहिए जो हम सबके लिए अन्न उगाता है।
ईशवर एक, अनादि, निराकार और सर्वव्यापी चेतन तत्व ( वस्तु ) है
जो इस जगत का निमित्त कारण है और सबका आधार है ।ईशवर सत +चित + आनन्द है , अनन्त स्वरूप है तथा शुद्ध- बुद्ध मुक्त स्वभाव वाला है ।वह सबसे महान एवं सर्वशक्तिमान् है ।जँहा तक हम सभी अपनी कल्पना कर सकते है ईशवर की सत्ता उससे अधिक है , अनन्त है ।असंख्य सृष्टियाँ तथा आत्माएँ उसी एक परमेश्वर में निवास करतीं है और वह परमात्मा स्वयं भी इन सब में विधमान रहता है ।ब्रह्माण्ड में कोई ऐसा स्थान नही है जहाँ ईशवर की सत्ता न हो ।
ओ३म् ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किचं जगत्वां जगत् ( यजुर्वेद ४०\१ )
अर्थ - इस गतिशील संसार में जो कुछ भी है ईशवर उस सब में बसा हुआ है ।
न तस्य् प्रतमाऽस्ति यस्य नाम महधश : ।( यजुर्वेद। ३२\३ )
अर्थ - उस परमात्मा की कोई आकृति या मूर्ति नही है ।उसे नापा या तोला नही जा सकता । उस परमात्मा का नाम स्मरण अर्थात उसकी आज्ञा का पालन करना अर्थात धर्मयुक्त कर्मों का करना बड़ी कीर्ति देने वाला है ।

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