अथर्ववेद तृतीय काण्ड अथर्ववेद भाष्य प्रथमोऽनुवाकः॥
सूक्त १
०३।००१।०१
अग्निर्नः शत्रून् प्रत्येतु विद्वान् पतिदहन्नभिशस्तिमरातिम्।
स सेनां मोहयतु परेषां निर्हस्तांश्च कृणवज्जातवैदाः॥ १॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अग्निः) अग्नि [के समान तेजस्वी] (विद्वान्) विद्वान् राजा (अभिशस्तिम्) मिथ्या अपवाद और (अरातिम्) शत्रुता को (प्रतिदहन्) सर्वथा भस्म करता हुआ, (नः) हमारे (शत्रून्) शत्रुओं पर (प्रति, एतु) चढ़ाई करे। (सः) वह (जातवेदाः) प्रजाओं का जाननेवाला वा बहुत धनवाला राजा (परेषाम्) शत्रुओं की (सेनाम्) सेना को (मोहयतु) व्याकुल कर देवे, (च) और [उन वैरियों को] (निर्हस्तान्) निहत्या (कृणवत्) कर डाले ॥१॥
भावार्थः जो मनुष्य प्रजा में अपकीर्ति और अशान्ति फैलावे, विद्वान् अर्थात् नीतिनिपुण राजा ऐसे दुष्टों और उनके साथियों को यथावत् दण्ड देवे, जिससे वे लोग निर्बल होकर उपद्रव न मचा सकें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से सूक्त २ मन्त्र १ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (विद्वान्) युद्धविद्या का जाननेवाला, (अभिशस्तिम्) संमुख होकर हिंसा करनेवाले, (अरातिम्) दानभावना से रहित, अतः शत्रुरूप को, (प्रतिदहन्) उसके प्रत्येक सैनिक को दग्ध करता हुआ (न:) हमारा (अग्निः) अग्रणी सेनाध्यक्ष, (शत्रून्) शत्रुओं के (प्रत्येक) प्रति जाय। (सः) बह (जातवेदाः) युद्ध विद्या को जाननेवाला (परेषाम् सेनाम्) शत्रुओं की सेना को (मोहयतु) मुग्ध कर दे, कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित कर दे, (च) और (निर्हस्तान्) निहत्थे (कृणवत्) कर दे।
टिप्पणी: [विद्वान् तथा जातवेदाः पदों द्वारा अग्नि चेतन प्रतीत है, वह है हमारा सेनाध्यक्ष। निहत्थे का अभिप्राय है आयुधों से रहित कर देना, हस्तव्यापार से रहित कर देना।]
०३।००१।०२
यूयमुग्रा मरुत ईदृशे स्थाभि प्रेत मृणत सहध्वम्।
अमीमृणत् वसंवो नाथिता इमे अग्निर्ह्येषां दूतः प्रत्येतु विद्वान् ॥२॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (मरुतः) हे शत्रुघातक शूरों ! (यूयम्) तुम (ईदृशे) ऐसे [कर्म, संग्राम] में (उग्राः) तीव्रस्वभाव (स्थ) हो। (अभि, प्र, इत) आगे बढ़ो, (मृणत) मारो और (सहध्वम्) जीत लो। (इमे) इन (नाथिताः) प्रार्थना किये हुए (वसवः) श्रेष्ठ पुरुषों [मरुत् गणों] ने [दुष्टों को] (अमीमृणन्) मरवा डाला है। (एषाम्) इन शत्रुओं का (दूतः) दाहकारी (अग्निः) अग्नि [समान] (विद्वान्) विद्वान् राजा (हि) अवश्य करके (प्रत्येतु) चढ़ाई करे ॥२॥
भावार्थः जो शूरवीर संग्रामविजयी हों, जो बैरियों के नाश करने में सहायक रहे हों, उन वीरों को अग्रगामी करें और उनका उत्साह बढ़ाते रहें और राजा विजयी सेनापतियों की पुष्टि करता हुआ शत्रुओं पर चढ़ाई करे ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (उग्राः) हे उग्र तथा (मरुतः) मारने में कुशल संनिको ! (यूयम) तुम (ईदृश) इस प्रकार के युद्ध कर्म में (स्थित) स्थित होओ, (अभिप्रेत) शत्रुओं अभिमुख प्रयाण करो, (मृणत) उन्हें मारो, (सहध्वम्) उनका पराभव करो। (नाथिताः) अपने-अपने स्वामियों सहित (इमे) इन (वसवः) वसुओं [रुद्र और आदित्यों] ने (अमीमृणन्) शत्रुओं को मार दिया है। (एषाम्) इन शत्रुओं का (विद्वान्) दूतकर्म जाननेवाला (अग्नि:) अग्रणी अर्थात् मुखिया (दूतः) दूत (प्रत्येतु) हमारे प्रति आए।
टिप्पणी: [मरुतः = शत्रुओं को मारने में कुशल (यजु० १७।४०) सैनिक। राष्ट्र पर शत्रुसेना ने यदि आक्रमण किया है तो राष्ट्र के वसु आदि कोटि के विद्वान् भी, निज-निज अध्यक्षों सहित, युद्ध करते हैं। परिणाम यह होता है कि शत्रुपक्ष का दूत, समझौते के लिये, विजयी राष्ट्राधिपति की सेवा में उपस्थित होता है। अग्निः अग्रणीर्भवति (निरुक्त ७।४।१४) अग्निः= सेनाग्निरत्र विवक्षितः (सायण)।]
०३।००१।०३
अमित्रसेनां मघवन्नस्मान् छत्रूयतीमभि।
युवं तानिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च दहतं प्रति।।३॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (मघवन्) हे धनवान्, (वृत्रहन्) अन्धकार वा शत्रुओं के नाश करनेवाले, (इन्द्र) सूर्य [समान तेजस्वी] (च) और (अग्निः) हे अग्नि [समान शत्रुदाहक] ! (युवम्) तुम दोनों (अस्मान्) हमपर (शत्रूयतीम्) शत्रुओं के समान आचरण करती हुई (अमित्रसेनाम्) बैरियों की सेना को (अभि=अभिभूय) हराकर (तान्) चोरों वा म्लेच्छों की (प्रति, दहतम्) जला डालो ॥३॥
भावार्थः जैसे सूर्य अन्धकार का नाश करके और अग्नि अशुद्धतादि दुर्गुणों को जलाकर हटाते और अनेक प्रकार से उपयोगी होते हैं, ऐसे ही धनी और प्रतापी राजा कुमार्गियों को हटाकर उपकारी होवें ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (मघवन्) हे धनिक [इन्द्र !] (अस्मान्) हमारे साथ (शत्रूयतीम्) शत्रुता का आचरण करनेवाली, (अमित्रसेनाम्, अभि) शत्रु की सेना के अभिमुख [न जा] । (वृत्रहन्) हे वृक्रों अर्थात् हमारे राष्ट्र पर आवरण डालनेवाले, उसे घेरनेवाले का (इन्द्र) हनन करनेवाले सम्राट् ! (च) और (अग्निः) अग्रणी प्रधानमंत्री (युवम्) तुम दोनों (ताम्) उस सेना को, (प्रति) प्रतिकूल होकर, (दहतम्) दग्ध करो, भस्मीभूत करो। [इन्द्र= इन्द्रश्च सम्राट् (यजु० ८।३७)।
०३।००१।०४
प्रसूत इन्द्र प्रवता हरिभ्यां प्र ते वज्रः प्रमृणन्नेतु शत्रून्।
जहि प्रतीचो अनूचः पराचो विष्वक् सत्यं कृणुहि चित्तमेषाम् ॥४॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले0 राजन् ! (प्रवता) उत्तम गति वा मार्ग से (हरिभ्याम्) स्वीकरण और प्रापण [ग्रहण और दान] के साथ (ते) तेरा (प्रसूतः) चलाया हुआ (वज्रः) वज्र अर्थात् दण्ड (शत्रून्) शत्रुओं को (प्रमृणन्) पीड़ा देता हुआ (प्र, एतु) आगे चले। (प्रतीचः) सन्मुख आते हुए, (अनूचः) पीछे से आते हुए और (पराचः) तिरस्कार करके चलते हुए [शत्रुओं] को (जहि) नाश कर दे और (एषाम्) इन [शत्रुओं] के (चित्तम्) चित्त को (विऽवक्) सब प्रकार (सत्यम्) सत्पुरुषों का हितकारी (कृणु) बना दे ॥४॥
भावार्थः नीतिज्ञ राजा-प्रजा और शत्रुओं से कर लेकर उनके हितकार्य में लगावे, जिससे सब बाहिरी-भीतरी शत्रु लोग नष्ट होकर दबे रहें और श्रेष्ठों का पालन किया करें ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (इन्द्र) हे सम्राट् ! (प्रसूतः) प्रेरित हुआ तू (हरिभ्याम्) दो अश्वों से युक्त (प्रवता) प्रकृष्ट गतिवाले रथ द्वारा [प्रयाण कर], (ते) तेरा (वज्रः) वध (शत्रून् प्रमृणन्) शत्रुओं को मारता हुआ (प्र एतु) प्रगति करे। (जहि) विनष्ट कर (प्रतिचः) हमारे प्रति गमन करनेवालों को, (अनुचः) हमारा पीछा करनेवालों को, (पराचः) युद्धस्थल छोड़कर परे भाग जाने वालों को। (एषाम्) इन शत्रुओं के (विष्वक्) नानामुखी (चित्तम्) चित्त को (सत्यम्) सत्यमार्गी (कृणुहि) तू कर दे।
टिप्पणी: [प्रसूतः= प्रेरित हुआ। प्र+ षू प्रेरण (तुदादि); प्रजा द्वारा या सैन्य द्वारा युद्धार्थ प्रेरित हुआ सम्राट्। सत्यम्="युद्ध न करना" यह चित्त का सत्यमार्गी होना है। विषु + अक्=विष्बक्; युद्ध करें या न करें, यह चित्तवृत्ति नानामुखी है।]
०३।००१।०५
इन्द्र सेनां मोहयामित्राणाम्।
अग्नेर्वातस्य ध्राज्या तान् विषूचो वि नाशय ॥५॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इन्द्र) हे बड़े ऐश्वर्यवाले राजन् (अमित्राणाम्) शत्रुओं की (सेनाम्) सेना को (मोहय) व्याकुल कर दे। (अग्नेः) अग्नि के और (वातस्य) पवन के (ध्राज्या) झोंके से (विषूचः) सब ओर फिरनेवाले (तान्) चोरों को (वि, नाशय) नाश कर डाल ॥५॥
भावार्थः राजा अपनी सेना के बल से शत्रुसेना को जीते और जैसे दावानल वन को भस्म करता और प्रचण्ड वायु वृक्षादि को गिरा देता है, वैसे ही विघ्नकारी बैरियों को मिटाता रहे ॥५॥ इस मन्त्र का दूसरा आधा अ० ३।२।३। में आया है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (इन्द्र) हे सम्राट् ! (अमित्राणाम् सेनाम्) शत्रुओं की सेना को (मोहय) कर्त्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित कर। (विषूचः) सर्वत: पलायमान (तान्) उन सैनिकों को (अग्नि: वातस्य) अग्नि के तथा वायु के (ध्राज्या) वेग द्वारा (वि नाशय) विनष्ट कर।
टिप्पणी: [मोहय=देखो अथर्व० सूक्त २। मन्त्र १-४; तथा ५,६ अग्नेः = आग्नेय अस्त्र, तथा वातस्य=वायवीय अस्त्र।]
०३।००१।०६
इन्द्रः॒ सेनां॑ मोहयतु म॒रुतो॑ घ्न॒न्त्वोज॑सा ।
चक्षूं॑स्य॒ग्निरा द॑त्तां॒ पुन॑रेतु॒ परा॑जिता॥६॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इन्द्रः) प्रतापी सूर्य (सेनाम्) [शत्रु] सेना को (मोहयतु) व्याकुल कर दे। (मरुतः) दोषनाशक पवन के झोंके (ओजसा) बल से (घ्नन्तु) नाश कर दें। (अग्निः) अग्नि (चक्षूंषि) नेत्रों को (आ, दत्ताम्) निकाल देवे। [जिससे] (पराजिता) हारी हुई सेना (पुनः) पीछे (एतु) चली जावे ॥६॥
भावार्थः युद्धकुशल सेनापति राजा अपनी सेना का व्यूह ऐसा करे जिससे उसकी सेनासूर्य, वायु और अग्नि वा बिजुली और जल के प्रयोगवाले अस्त्र, शस्त्र, विमान, रथ, नौकादि के बल से शत्रुसेना को नेत्रादि से अङ्ग-भङ्ग करके सर्वदा हराकर भगा दे ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (इन्द्रः) सम्राट् (सेनाम्) शत्रुसेना को (मोहयतु) कर्त्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से रहित करे, (मरुत:) मारने में कुशल हमारे सैनिक (ओजसा) बल द्वारा (घ्नन्तु) सेना का हवन करें। (अग्नि:) अग्नि (चक्षुंषि) शत्रुओं की दृष्टियों का (आ धत्तम्) अपहरण करे, (पुनः) तत्पश्चात् (पराजिता) पराजित हुई अवशिष्ट-शिवसेना (एतु) हमारी शरण में आ जाए।
टिप्पणी: [मरुतः=सैनिका: (यजु०१७।४०)। अग्निः=सौराग्नि, सौर रश्मियां। सौर रश्मियों को यन्त्रित करके सैनिकों की चक्षुओं में डालने से चक्षु चुन्धिया जाती हैं और कुछ काल तक सैनिक देख नहीं सकते और इन्द्र के वश में होकर शरणागत हो जाते हैं। मोहयतु=मुह वैचित्ये (दिवादिः) वैचित्यम्=चिति अर्थात् चेतना से राहित्य।]

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