समस्त सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा यजुर्वेद 36.8 का सार्वभौमिक कल्याण का संदेश

समस्त सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा यजुर्वेद 36.8 का सार्वभौमिक कल्याण का संदेश
समस्त सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा यजुर्वेद 36.8 का सार्वभौमिक कल्याण का संदेश

     जन्म व मरण का यह नियम हम सभी जीवों पर लागू होता है और सबके जीवन में जन्म व मृत्यु का समय अवश्य ही आना है। जब हमें पता है कि हमारी व हमारे सभी सगे सम्बन्धियों की मृत्यु होनी है तो हमें मृत्यु आने व होने पर दुःखी नहीं होना चाहिये। हमें जानना चाहिये कि मृत्यु के समय जीवात्मा शरीर से निकल कर ईश्वर की प्रेरणा से आकाश व वायुमण्डल में रहता है। ईश्वर उस मृतक जीवात्मा का उसके कर्मानुसार माता-पिता का चयन कर उनके द्वारा पुनर्जन्म प्रदान करता है। यह अटल सत्य व वैदिक सनातन सिद्धान्त है। वस्तुतः सभी के साथ ऐसा ही होना है। मृत्यु होने पर मृतक आत्मा के अपने परिवारजनों से सभी सम्बन्ध टूट जाते हैं। मृतक आत्मा को मृत्यु हो जाने पर अपने पूर्व सम्बन्धों व परिजनों का किंचित ज्ञान नहीं रहता। 

    मृत्यु के बाद एक क्षण से 12 दिवस के समय आत्मा को नया गर्भ या शरीर प्रदान हीं जाता हैं I मृत्यु होने पर नया शरीर मिलता है। पुराने शरीर के मस्तिष्क, मन व बुद्धि आदि अंग होते हैं वह शरीर सहित सभी नष्ट हो जाते हैं। पुराना शरीर छूट जाने पर नया शरीर मिलता है जो १२ वर्ष तक बाल व किशोर अवस्था में होता है। अतः पुनर्जन्म में पूर्वजन्म की स्मृतियां विस्मृत हो जाती हैं। ऐसा होना मनुष्य के लाभकारी ही होता है। योगियों को इनका साक्षात्कार होना सम्भव होता है। अतः जिन परिवारों में कभी वियोग की कोई घटना हो तो ईश्वर के इस जन्म-मरण-पुनर्जन्म की व्यवस्था को विचार कर विषाद रहित रहना चाहिये। 

ईश्वर की उपासना व भक्ति में संलग्न रहना चाहिये। स्वाध्याय करने में कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये। दुःख कितना ही बड़ा क्यों न हो व वह कैसा भी हो, समय के साथ उसमें न्यूनता आती जाती है। कुछ समय बाद तो आहत मनुष्य उस दुःख को भूल ही जाता है। अतः जब कभी कोई वियोग आदि का दुःख आये तो मनुष्य को उससे विचलित नहीं होना चाहिये और वेद व वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय सहित ईश्वर के ‘ओ३म्’ नाम के जप सहित गायत्री मन्त्र आदि के जप से अपने मन व आत्मा को शुद्ध कर उन्हें ईश्वर में लगाना चाहिये। इससे मनुष्य व परिवारजन अपने किसी प्रिय के वियोग के दुःख को कम व नष्ट कर सकते हैं।

हम सब को जीवन में परमात्मा और आत्मा आदि का सत्य ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। परमात्मा हमारे माता-पिता, आचार्य, मित्र, सखा, बन्धु, हितैषी, सुखदाता तथा प्रेरणाओं के स्रोत है। उनकी शरण में जाकर सबको उनकी स्तुति, प्रार्थना, उपासना व भक्ति करनी चाहिये। इसी से हमारा कल्याण होगा।

 🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️

🌷 ओ३म्  इन्द्रो विश्वस्य राजति।  शं नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे  ( यजुर्वेद  ३६\८ )

💐 अर्थ  :- हे परमेश्वर  ! आप सारे जगत् के स्वामी रूप में प्रकाशमान है।  आपकी कृपा से हमारे पुत्रादि, मनुष्यादि व दोपाये सुख प्राप्त करें तथा गौ आदि चौपाये कल्याण को प्राप्त हों ।

समस्त सृष्टि का स्वामी एक परमात्मा

यजुर्वेद 36.8 का सार्वभौमिक कल्याण का संदेश

मन्त्र

ओ३म् इन्द्रो विश्वस्य राजति।
शं नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे॥

— यजुर्वेद 36.8


भूमिका

यजुर्वेद का यह संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त गूढ़ मन्त्र सम्पूर्ण विश्व के लिए शान्ति, सुरक्षा और सार्वभौमिक कल्याण का संदेश देता है। वेद किसी एक जाति, देश, सम्प्रदाय अथवा वर्ग के लिए नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और समस्त प्राणिजगत् के कल्याण के लिए हैं। इस मन्त्र में परमात्मा के सार्वभौम शासन और सभी प्राणियों के मंगल की प्रार्थना की गई है।

आज संसार में मनुष्य अपने सुख के लिए प्रकृति और पशु-पक्षियों का अत्यधिक शोषण कर रहा है। परिणामस्वरूप पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास और अनेक प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। ऐसे समय में यह वैदिक मन्त्र हमें स्मरण कराता है कि इस पृथ्वी पर केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि प्रत्येक प्राणी को सुखपूर्वक जीने का अधिकार है।


मन्त्र

ओ३म् इन्द्रो विश्वस्य राजति।
शं नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे॥


शब्दार्थ

  • इन्द्रः — परम ऐश्वर्यवान, सर्वशक्तिमान परमात्मा।
  • विश्वस्य — सम्पूर्ण विश्व का।
  • राजति — शासन करता है, सर्वोच्च स्वामी है।
  • शम् — कल्याण, शान्ति, सुख और मंगल।
  • नः — हमारा।
  • अस्तु — हो।
  • द्विपदे — दो पैरों वाले प्राणी, विशेषतः मनुष्य।
  • चतुष्पदे — चार पैरों वाले प्राणी, जैसे गौ, अश्व, वन्य पशु आदि।

भावार्थ

सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और ऐश्वर्यसम्पन्न परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का वास्तविक शासक है। उसी के नियमों से यह सृष्टि संचालित होती है। हम प्रार्थना करते हैं कि दो पैरों वाले समस्त प्राणियों तथा चार पैरों वाले सभी जीवों का कल्याण, सुख, शान्ति और संरक्षण हो।


'इन्द्र' का वास्तविक अर्थ

वेदों में 'इन्द्र' शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। जहाँ वह परमात्मा के गुणों का वर्णन करता है, वहाँ उसका अर्थ होता है—सर्वशक्तिमान, परम ऐश्वर्यवान, समस्त जगत का स्वामी।

इस मन्त्र में 'इन्द्रो विश्वस्य राजति' का अर्थ किसी विशेष देवता का शासन नहीं, बल्कि यह है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का वास्तविक नियन्ता केवल एक परमात्मा है। वही सृष्टि की रचना, पालन और न्याय की व्यवस्था का आधार है। मनुष्य चाहे स्वयं को कितना ही शक्तिशाली समझे, अन्ततः वह भी उसी परम सत्ता के नियमों के अधीन है।


सभी प्राणियों के प्रति समान दृष्टि

इस मन्त्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पशुओं के लिए भी मंगल की कामना की गई है।

वेद का दृष्टिकोण अत्यन्त व्यापक है। वह कहता है कि जो सुख हम अपने लिए चाहते हैं, वही सुख अन्य प्राणियों को भी प्राप्त हो। पशु हमारे जीवन, कृषि, पर्यावरण और प्राकृतिक संतुलन के महत्वपूर्ण अंग हैं। उनका संरक्षण करना केवल दया नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए भी आवश्यक है।


वैदिक पर्यावरण दर्शन

यह मन्त्र हमें बताता है कि प्रकृति और प्राणी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि पशु सुरक्षित रहेंगे तो पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, और यदि पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तो मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा।

आज जंगलों का विनाश, पशुओं का अत्यधिक शिकार और प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग अनेक वैश्विक समस्याओं का कारण बन रहा है। वेद हजारों वर्ष पहले ही यह शिक्षा दे चुके हैं कि समस्त सृष्टि का संरक्षण ही वास्तविक धर्म है।


मानव का कर्तव्य

मनुष्य को अपनी बुद्धि और शक्ति का उपयोग दूसरों पर अत्याचार करने के लिए नहीं, बल्कि उनकी रक्षा और सेवा के लिए करना चाहिए।

इस मन्त्र से हमें प्रेरणा मिलती है कि—

  • सभी जीवों के प्रति करुणा रखें।
  • पशुओं पर अनावश्यक अत्याचार न करें।
  • पर्यावरण की रक्षा करें।
  • प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग करें।
  • ईश्वर के बनाए नियमों का सम्मान करें।
  • समस्त प्राणियों के सुख में अपना सुख देखें।

आज के समय में मन्त्र की प्रासंगिकता

आज विश्व युद्ध, हिंसा, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के संकट से जूझ रहा है। मनुष्य केवल अपने हित के बारे में सोच रहा है, जबकि वेद हमें सम्पूर्ण सृष्टि के हित की शिक्षा देते हैं।

यदि प्रत्येक व्यक्ति इस मन्त्र की भावना को अपने जीवन में उतार ले, तो समाज में हिंसा के स्थान पर करुणा, स्वार्थ के स्थान पर सेवा और शोषण के स्थान पर संरक्षण की भावना विकसित होगी।


इस मन्त्र की मुख्य शिक्षाएँ

  • सम्पूर्ण विश्व का वास्तविक स्वामी केवल परमात्मा है।
  • परमात्मा के शासन में सभी प्राणी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
  • मनुष्य और पशु दोनों के कल्याण की कामना करनी चाहिए।
  • प्रकृति और जीव-जंतुओं की रक्षा करना वैदिक धर्म है।
  • सार्वभौमिक शान्ति तभी सम्भव है जब सभी प्राणियों का हित सुनिश्चित हो।
  • ईश्वर के बनाए नियमों का पालन ही वास्तविक धर्म है।

उपसंहार

यजुर्वेद 36.8 का यह मन्त्र हमें संकीर्णता से ऊपर उठकर सम्पूर्ण सृष्टि को अपना परिवार मानने की प्रेरणा देता है। यह केवल प्रार्थना नहीं, बल्कि मानव जीवन का आदर्श है। परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है और हम सब उसी की सन्तान हैं। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम मनुष्य, पशु, पक्षी और समस्त जीव-जगत के प्रति करुणा, प्रेम और संरक्षण का भाव रखें।

जब मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना से कार्य करेगा, तभी पृथ्वी पर वास्तविक शान्ति, समृद्धि और सुख की स्थापना होगी। यही इस वैदिक मन्त्र का अमर संदेश है।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥


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