गुरु और गुरूडम
जीवन को संस्कारित करने में गुरू का महत्वपूर्णस्थान है। अत: गुरू के प्रति श्रद्धाभाव रखना उचित है ।लेकिन गुरू को अलौकिक दिव्य शक्ति से युक्त मानकर उसे भगवान का प्रतिनिधि मानकर उसका अथवा उसके चित्र की पूजा अर्चना करना उसके दर्शन या गुरू नाम का संकीर्तन करने मात्र से सब दु:खो व पापो से मुक्ति मानना आदि गुरूडम की विष - बेल है अर्थात वैदिक मान्यताओं के विरुद्ध है। अत: इसका परित्याग करना चाहिए
शास्त्रों में प्रत्येक मनुष्य के लिए गुरु का बड़ा ही महत्व बताया गया है। आध्यात्मिक क्षेत्र में जो आत्मिक उन्नति हेतू सद्ज्ञान और शास्त्रों की बातें बताता है, वह गुरु कहलाता है। शिष्यों को आत्मा-परमात्मा का ज्ञान देकर संवारता है।
वर्तमान समय में गुरुओं का बोलबाला अधिक है। गुरूओं की अनेक दुकानें खुल गई है। भोली-भाली जनता गुरूओं के भ्रम जाल में फंसी हुई है। आधुनिक गुरु ईश्वर के स्थान पर अपनी पूजा करवाते हैं। गुरु बनाने के नाम पर ज्यादातर लोग विशेषकर महिलाऐं भेड़ चाल की तरह तथाकथित गुरूओं की सेवा में स्वयं को समर्पित करके अनेक प्रकार की धोखाधड़ी, प्रताड़ना व यौन शोषण का शिकार हो जाती है।परिणामस्वरूप समाज में अनेक प्रकार के पापकर्म बढ़ते जा रहे हैं। बाद में ऐसे गुरूओं के कारनामों का भण्डफोड़ भी होता है।
सोचिये गुरु वह हैं जो नि:स्वार्थ भाव से शिष्यों की वास्तविक उन्नति के लिए कार्य करता है या वह जो अपने -अपने शिष्यों के तन-मन-धन का शोषण करता है ?
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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷ओ३म् शं न: सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्त म: शमु सन्तु गाव:।शं न ॠभव: सुकृत: सुहस्ता: शं नो भवन्तु पितरो हवेषु (ऋग्वेद ७|३५|१२)
💐अर्थ;- सत्य के पालन करने हारे हमें सुखदायक हो, उत्तम घोड़े और गौएं हमें सुखदायी हों, श्रेष्ठ बुद्धि वाले, बड़े- बड़े काम करने वाले शिल्प क्रिया में चतुर जन हमारे लिए सुख देने वाले हो, यज्ञादि उत्तमोत्तम कार्यों में रक्षक माता-पिता आदि पितर हमें सुखकारी हों।
मंत्र
ओ३म् शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु शं नो अर्वन्तः शमु सन्तु गावः। शं न ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः शं नो भवन्तु पितरो हवेषु॥
(ऋग्वेद 7.35.12)
पद-पदार्थ
- शं नः = हमारा कल्याण हो।
- सत्यस्य पतयः = सत्य के स्वामी, सत्य के रक्षक, सत्य का आचरण करने वाले श्रेष्ठ पुरुष।
- अर्वन्तः = वेगवान, प्रगतिशील, कर्मशील व्यक्ति।
- गावः = गौएँ अथवा ज्ञान की किरणें, पोषण देने वाली शक्तियाँ।
- ऋभवः = कुशल, परिश्रमी, सृजनशील विद्वान।
- सुकृतः = उत्तम कर्म करने वाले।
- सुहस्ताः = कुशल कर्मयोगी, जिनके हाथ श्रेष्ठ कार्यों में लगे हों।
- पितरः = पूर्वज, आचार्य, श्रेष्ठ मार्गदर्शक।
- हवेषु = यज्ञ, उपासना तथा श्रेष्ठ कर्मों में।
भावार्थ
हे परमात्मन्! सत्य के रक्षक और सत्य का उपदेश देने वाले श्रेष्ठ पुरुष हमारा कल्याण करें। कर्मशील और प्रगतिशील जन हमारे लिए मंगलकारी हों। ज्ञान और पोषण प्रदान करने वाली शक्तियाँ हमें सुख दें। उत्तम कर्म करने वाले कुशल विद्वान हमारा हित करें तथा हमारे पूर्वज और महान आचार्य यज्ञ, उपासना और श्रेष्ठ कर्मों में हमारा मार्गदर्शन करें।
गुरु और "गुरुडम" के संदर्भ में मंत्र की व्याख्या
यह मंत्र हमें सच्चे गुरु और गुरुडम (झूठे गुरु-वाद) के बीच का अंतर समझाता है।
1. सच्चा गुरु "सत्यस्य पतिः" होता है
मंत्र कहता है — "शं नः सत्यस्य पतयो भवन्तु" अर्थात् सत्य के रक्षक हमारा कल्याण करें।
सच्चा गुरु वह है जो:
- स्वयं सत्य का आचरण करे।
- शिष्य को वेद, तर्क और धर्म के आधार पर शिक्षा दे।
- अपनी नहीं, सत्य की प्रतिष्ठा करे।
- शिष्य को स्वतंत्र चिंतन की प्रेरणा दे।
वह कभी यह नहीं कहता कि "मेरी बात ही अंतिम सत्य है", बल्कि कहता है — "सत्य को स्वयं जानो, परखो और स्वीकार करो।"
2. गुरुडम सत्य नहीं, व्यक्तिपूजा चाहता है
गुरुडम में व्यक्ति स्वयं को सत्य से ऊपर स्थापित कर लेता है।
- वहाँ प्रश्न पूछना अपराध माना जाता है।
- शिष्य को ज्ञान नहीं, अंध-भक्ति सिखाई जाती है।
- गुरु का प्रचार अधिक और सत्य का प्रचार कम होता है।
ऐसा व्यक्ति "सत्यस्य पतिः" नहीं, बल्कि सत्य का बाधक बन जाता है।
3. ऋभवः सुकृतः सुहस्ताः
मंत्र कहता है कि कुशल, परिश्रमी और श्रेष्ठ कर्म करने वाले लोग हमारा कल्याण करें।
इसका अर्थ है कि गुरु की पहचान उसके:
- ज्ञान से,
- चरित्र से,
- सेवा से,
- और कर्म से होनी चाहिए,
न कि उसके वस्त्र, चमत्कार, भीड़, आश्रम या प्रचार से।
4. पितरो हवेषु
पूर्वजों और आचार्यों का सम्मान उनके आदर्शों के कारण होता है, न कि व्यक्तिपूजा के कारण।
वेदिक परंपरा में गुरु का सम्मान इसलिए है क्योंकि वह ज्ञान का माध्यम है। यदि गुरु स्वयं को ईश्वर के स्थान पर बैठा दे, तो वह वैदिक गुरु नहीं रह जाता।
वैदिक दृष्टि से निष्कर्ष
यह मंत्र सिखाता है कि:
- गुरु का आधार सत्य होना चाहिए।
- गुरु का लक्ष्य ज्ञान और चरित्र निर्माण होना चाहिए।
- गुरु शिष्य को स्वतंत्र और विवेकशील बनाए।
- व्यक्तिपूजा, अंधविश्वास और चमत्कारवाद पर आधारित गुरुडम वैदिक आदर्श नहीं है।
सच्चा गुरु शिष्य को अपने से नहीं, सत्य और परमात्मा से जोड़ता है; जबकि गुरुडम शिष्य को सत्य से हटाकर व्यक्ति-विशेष का अनुयायी बना देता है।
इसीलिए ऋग्वेद की यह प्रार्थना है कि हमारे जीवन में ऐसे "सत्यस्य पतयः" आएँ जो सत्य, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर हमारा कल्याण करें। ॥ ओम् ॥

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