शौनकजी बोले —
भृगुवंशात्प्रभृत्येव त्वया मे कीर्तितं महत्। आख्यानमखिलं तात सौते प्रीतोऽस्मितेन ते।।
हिन्दी: शौनकजी ने कहा — हे तात सौतनन्दन! तुमने भृगुवंश से लेकर यह संपूर्ण महान आख्यान मुझे विस्तार से सुना दिया है, मैं इससे अत्यंत प्रसन्न हूँ।
प्रक्ष्यामि चैव भूयस्त्वां यथावत्सूतनन्दन। याः कथा व्याससंपन्नास्ताश्च भूयो विचक्ष्व मे।।
हिन्दी: हे सूतनन्दन! अब मैं तुमसे फिर भली-भांति पूछता हूँ; व्यासजी द्वारा रचित जो अन्य कथाएँ हैं, उन्हें भी मुझे सुनाओ।
तस्मिन्परमदुष्पारे सर्पसत्रे महात्मनाम्। कर्मान्तरेषु यज्ञस्य सदस्यानां तथाऽध्वरे।।
हिन्दी: महात्मनाओं के उस परम दुष्पार सर्पसत्र में यज्ञ के बीच के अवकाश के समय (कर्मान्तरों में) तथा यज्ञ में उपस्थित सदस्यों के बीच—
या बभूवुः कथाश्चित्रा येष्वर्थेषु यथातथम्। त्वत्त इच्छामहे श्रोतुं सौते त्वं वै प्रचक्ष्व नः।।
हिन्दी: जो-जो विचित्र कथाएँ यथातथ्य हुईं और जिन-जिन विषयों पर चर्चा हुई, हे सौते! उन्हें हम तुमसे सुनना चाहते हैं, अतः तुम हमें वह सब सुनाओ।
सूतजी बोले — कर्मान्तरेष्वकथयन्द्विजा वेदाश्रयाः कथाः। व्यासस्त्वकथयच्चित्रमाख्यानं भारतं महत्।।
हिन्दी: सूतजी ने कहा — यज्ञ के अवकाश के समय विद्वान ब्राह्मणों ने वेदों पर आधारित कथाएँ कहीं और व्यासजी ने उस विचित्र महान भारत आख्यान को सुनाया।
शौनकजी बोले — महाभारतमाख्यानं पाण्डवानां यशस्करम्। जनमेजयेन पृष्टः सन्कृष्णद्वैपायनस्तदा।।
हिन्दी: शौनकजी ने कहा — पाण्डवों का यश बढ़ाने वाले महाभारत आख्यान को, जब राजा जनमेजय ने पूछा था, तब कृष्णद्वैपायन (व्यासजी) ने—
श्रावयामास विधिवत्तदा कर्मान्तरे तु सः।
हिन्दी: उस समय यज्ञ के बीच के अवकाश में विधिपूर्वक उसे श्रवण कराया था।
तामहं विधिवत्पुण्यां श्रोतुमिच्छामि वै कथाम्।।
हिन्दी: उस पुण्यमयी कथा को मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ।
मनःसागरसंभूतां महर्षेर्भावितात्मनः।
हिन्दी: जितेन्द्रिय महर्षि के मन रूपी समुद्र से उत्पन्न हुई—
कथयस्व सतां श्रेष्ठ सर्वरत्नमयीमिमाम्।।
हिन्दी: हे संतों में श्रेष्ठ! सब प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण उस कथा को मुझसे कहिए।
सूतजी बोले — हन्त ते कथयिष्यामि महदाख्यानमुत्तमम्। कृष्णद्वैपायनमतं महाभारतमादितः।।
हिन्दी: सूतजी ने कहा — अच्छा, अब मैं तुम्हें कृष्णद्वैपायन के मत के अनुसार उस उत्तम एवं महान महाभारत आख्यान को आदि से कहता हूँ।
शृणु सर्वमशेषेण कथ्यमानं मया द्विज। शंसितुं तन्महान्हर्षो ममापीह प्रवर्तते।।
हिन्दी: हे द्विज! मेरे द्वारा कहे जा रहे इस आख्यान को तुम संपूर्ण रूप से सुनो। इसे कहने के लिए मेरे मन में भी महान हर्ष हो रहा है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि एकोनषष्टितमोऽध्यायः।। 59 ।।
