श्लोक 1
अष्टक उवाच। यदाऽवसो नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम्। किं कारणं कार्तयुगप्रधान हित्वा च त्वं वसुधामन्वपद्यः।। (1-84-1)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— हे सतयुग के प्रधान राजा! जब आप नंदन कानन में इच्छा अनुसार रूप बदलने वाले बनकर लाखों वर्षों तक निवास कर चुके थे, तब ऐसा क्या कारण हुआ कि आप उसे छोड़कर पृथ्वी पर आ गए?
व्याख्या: राजर्षि अष्टक अपने नाना ययाति से यह जानना चाहते हैं कि जो व्यक्ति स्वर्ग के सबसे रमणीय नंदन वन में इतने लंबे काल तक आनंद और ऐश्वर्य का उपभोग कर चुका हो, उसे अचानक ऐसा कौन सा संकट या कारण देखना पड़ा कि उसे वह स्थान छोड़कर धरती पर गिरना पड़ा।
श्लोक 2
ययातिरुवाच। ज्ञातिः सुहृत्स्वजनो वा यथेह क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि। तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यं त्यजन्ति सद्यः सेश्वरा देवसङ्घाः।। (1-84-2)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— जिस प्रकार इस संसार में धन समाप्त हो जाने पर मनुष्य को उसके नाते-रिश्तेदार, मित्र और अपने लोग तुरंत छोड़ देते हैं, उसी प्रकार स्वर्ग में पुण्य क्षीण हो जाने पर देवताओं के समूह और इंद्र आदि देवता भी उस मनुष्य को तुरंत त्याग देते हैं।
व्याख्या: ययाति बहुत ही कड़वा और यथार्थ सत्य बताते हैं कि यह नियम केवल धरती पर ही नहीं, बल्कि स्वर्ग में भी लागू होता है। जब तक व्यक्ति के पास पुण्य रूपी 'धन' रहता है, तब तक सभी का आदर और साथ मिलता है; किंतु पुण्यों के समाप्त होते ही भगवान और देवता भी साथ छोड़ देते हैं।
श्लोक 3
अष्टक उवाच। तस्मिन्कथं क्षीणपुण्या भवन्ति संमुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्। किं वा विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति तद्वै ब्रूहि क्षेत्रवित्त्वं मतो मे।। (1-84-3)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— वहाँ स्वर्ग में लोगों के पुण्य कैसे क्षीण होते हैं? इस विषय में मेरा मन अत्यंत भ्रमित हो रहा है। वे पुण्यहीन होने पर किस प्रकार के होते हैं और किसके लोक (स्थान) को प्राप्त होते हैं? आप क्षेत्रज्ञ (आत्मा और कर्म के मर्म को जानने वाले) हैं, इसलिए मुझे यह सब विस्तार से बताइए।
व्याख्या: अष्टक के मन में यह जिज्ञासा उठती है कि जो लोग इतने महान पुण्य करके स्वर्ग पहुँचते हैं, उनके पुण्य वहाँ कैसे और क्यों समाप्त हो जाते हैं। इसके बाद उनकी क्या गति होती है, यह जानने के लिए वे ययाति से आध्यात्मिक और दार्शनिक व्याख्या की प्रार्थना करते हैं।
श्लोक 4
ययातिरुवाच। इमं भौमं नरकं ते पतन्ति ललाप्यमाना नरदेव सर्वे। ते कङ्कगोमायुबलाशनार्थे क्षीणे पुण्ये बहुधा प्रव्रजन्ति।। (1-84-4)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे नरदेव! पुण्य क्षीण होने पर वे सभी विलाप करते हुए इस पृथ्वी रूपी नरक में गिरते हैं। पुण्य समाप्त होने पर वे अनेक प्रकार से गीदड़, गिद्ध और मांस खाने वाले जीवों का आहार बनने की स्थिति में पहुँच जाते हैं।
व्याख्या: ययाति बताते हैं कि स्वर्ग से पतन के बाद जीवों को अत्यधिक कष्ट उठाना पड़ता है। धरती पर उनके शरीर का नाश होता है और वे विभिन्न योनियों तथा संकटों में फंस जाते हैं, जिससे उनका स्वर्ग का सारा सुख दुःख में बदल जाता है।
श्लोक 5
तस्मादेतद्वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयं च कर्म। आख्यातं ते पार्थिव सर्वमेव भूयश्चेदानीं वद किं ते वदामि।। (1-84-5)
हिंदी अनुवाद: इसलिए हे श्रेष्ठ राजा! संसार में जिस कर्म को दुष्ट और निंदनीय कहा गया है, उसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए। हे पृथ्वीनाथ! मैंने तुम्हें यह सब कह दिया है। अब बताओ, इसके बाद मैं तुम्हें और क्या बताऊँ?
व्याख्या: ययाति अपने उपदेश का सार बताते हुए राजाओं को सचेत करते हैं कि मनुष्य को हमेशा ऐसे बुरे और गर्हित कर्मों से दूर रहना चाहिए जो पतन का कारण बनते हैं। इसके बाद वे अष्टक से पूछते हैं कि उनकी जिज्ञासा का और कौन सा समाधान वे चाहते हैं।
श्लोक 6
अष्टक उवाच। यदा तु तान्वितुदन्ते वयांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः। कथं भवन्ति कथमाभवन्ति न भौममन्यं नरकं शृणोमि।। (1-84-6)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— जब पक्षी, गिद्ध, नीलकंठ और अन्य पतंगे उन जीवों को नोचते-खाते हैं, तब उनका जन्म कैसे होता है और वे इस अवस्था में कैसे पहुँचते हैं? मैं इसके अलावा पृथ्वी के किसी अन्य नरक के बारे में नहीं सुनना चाहता (बल्कि इसी जन्म-मरण के चक्र को समझना चाहता हूँ)।
व्याख्या: अष्टक जीवों के इस योनि-परिवर्तन और कष्टदायक चक्र के वैज्ञानिक व दार्शनिक स्वरूप को समझना चाहते हैं कि कैसे एक जीव विभिन्न योनियों में भटकता है और कैसे उसका पुनर्जन्म होता है।
श्लोक 7
ययातिरुवाच। ऊर्ध्वं देहात्कर्मणो जृम्भमाणा- व्यक्तं पृथिव्यामनुसंचरन्ति। इमं भौमं नरकं ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगाननेकान्।। (1-84-7)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— शरीर के अंत के बाद उनके अपने कर्मों के प्रभाव से वे जीव इस पृथ्वी पर स्पष्ट रूप से भटकते रहते हैं। वे इस भौम (पृथ्वी संबंधी) नरक में गिरते हैं और अनेकों वर्षों तक अपनी उस स्थिति की सुध नहीं ले पाते।
व्याख्या: जीव अपने कर्मों के बंधन में बंधा हुआ मृत्यु के बाद विभिन्न योनियों और कष्टों को भोगता है। कर्म का यह सिद्धांत ही उसे अलग-अलग शरीरों और परिस्थितियों में धकेलता है, जहाँ वह अज्ञानता में कष्ट सहता है।
श्लोक 8
षष्टिं सहस्राणि पतन्ति व्योम्नि तथा अशीतिं परिवत्सराणि। तान्वै तुदन्ति पततः प्रपातं भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः।। (1-84-8)
हिंदी अनुवाद: वे जीव साठ हजार या अस्सी वर्षों तक अंतरिक्ष में गिरते रहते हैं। जब वे नीचे की ओर गिरते हैं, तब नुकीले दांतों वाले भयानक और दुष्ट राक्षस व जीव उन्हें लगातार प्रताड़ित करते (नोचते) हैं।
व्याख्या: यहाँ जीवों के पतन और उनकी आत्मा की यात्रा का प्रतीकात्मक या पौराणिक वर्णन है, जिसमें कर्मों के फलस्वरुप मिलने वाले मानसिक और शारीरिक संतापों को डरावनी अवस्थाओं के रूप में दर्शाया गया है।
श्लोक 9
अष्टक उवाच। यदेनसस्ते पततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदंष्ट्राः। कथं भवन्ति कथमाभवन्ति कथंभूता गर्भभूता भवन्ति।। (1-84-9)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— जब वे पापी जीव नीचे गिरते हैं और ये भयानक दांतों वाले राक्षस उन्हें सताते हैं, तब वे दोबारा किस प्रकार उत्पन्न होते हैं और किस तरह माता के गर्भ में प्रवेश करके गर्भ रूप बनते हैं?
व्याख्या: अष्टक का प्रश्न अब पुनर्जन्म की प्रक्रिया पर केंद्रित है। वे यह जानना चाहते हैं कि कष्ट भोगने के बाद वह जीवात्मा दोबारा माता के गर्भ में कैसे आती है और उसका नया शरीर कैसे बनता है।
श्लोक 10
ययातिरुवाच। अस्रं रेतः पुष्पफलानुपृक्त- मन्वेति तद्वै पुरुषेण सृष्टम्। स वै तस्या रज, आपद्यते वै स गर्भभूतः समुपैति तत्र।। (1-84-10)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— पुरुष के शरीर से उत्पन्न होने वाला रक्त, वीर्य और अन्न-जल का सार (पुष्प-फल आदि) आपस में मिलकर आगे बढ़ता है। स्त्री के रज के साथ मिलकर वह जीवात्मा उसमें प्रवेश करती है और इस प्रकार वह गर्भ रूप धारण कर लेता है।
व्याख्या: यहाँ गर्भधारण और जीव के पुनर्जन्म की शारीरिक प्रक्रिया का प्राचीन आयुर्वेद और दर्शन के अनुसार वर्णन किया गया है कि किस प्रकार माता-पिता के तत्वों के माध्यम से जीवात्मा भौतिक शरीर धारण करती है।
श्लोक 11
वनस्पतीनोषधीश्चाविशन्ति आपो वायुं पृथिवीं चान्तरिक्षम्। चतुष्पदं द्विपदं चाति सर्व- मेवंभूता गर्भभूता भवन्ति।। (1-84-11)
हिंदी अनुवाद: वे जीव वनस्पतियों, औषधियों, जल, वायु, पृथ्वी और अंतरिक्ष में प्रवेश करते हैं (अर्थात अन्न-जल के माध्यम से शरीर में आते हैं)। इसके बाद वे चौपायों, दोपायों (मनुष्यों) तथा अन्य सभी योनियों में गर्भ रूप होकर जन्म लेते हैं।
व्याख्या: जीवात्मा की यात्रा प्रकृति के तत्वों (जल, अन्न, वनस्पति) से होकर गुजरती है। जीव जो अन्न-जल ग्रहण करता है, वही शरीर के निर्माण में सहायक बनता है, और इस प्रकार वह विभिन्न योनियों (पशु, पक्षी, मनुष्य आदि) में गर्भ धारण करता है।
श्लोक 12
अष्टक उवाच। अन्यद्वपुर्विदधातीह गर्भ- मुताहोस्वित्स्वेन कायेन याति। आपद्यमानो नरयोनिमेता- माचक्ष्व मे संशयात्प्रब्रवीमि।। (1-84-12)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— क्या वह जीव गर्भ में कोई दूसरा नया शरीर धारण करता है या अपने ही पुराने शरीर के साथ वहाँ जाता है? जब वह मनुष्य योनि को प्राप्त होता है, तो यह सब कैसे होता है? मेरे इस संशय को दूर कीजिए।
व्याख्या: अष्टक के मन में यह तकनीकी प्रश्न है कि मृत्यु के बाद जब नया जन्म होता है, तो क्या आत्मा नया शरीर पाती है या उसका पुराना स्वरूप ही बदलता है। इस सूक्ष्म दार्शनिक शंका का समाधान वे ययाति से मांगते हैं।
श्लोक 13
शरीरदेहातिसमुच्छ्रयं च चक्षुःश्रोत्रे लभते केन संज्ञाम्। एतत्तत्त्वं सर्वमाचक्ष्व पृष्टः क्षेत्रज्ञं त्वां तात मन्याम सर्वे।। (1-84-13)
हिंदी अनुवाद: इस शरीर की वृद्धि कैसे होती है और वह आँख, कान आदि इंद्रियों तथा चेतना को किस प्रकार प्राप्त करता है? हे तात! हम सब आपको क्षेत्रज्ञ (सब कुछ जानने वाला) मानते हैं, इसलिए मेरे द्वारा पूछे जाने पर इस संपूर्ण तत्व को समझाइए।
व्याख्या: शरीर रचना, चेतना का विकास और इंद्रियों की प्राप्ति कैसे होती है—इन सभी गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए अष्टक अपने नाना ययाति से सविस्तार उत्तर देने का आग्रह करते हैं।
श्लोक 14
ययातिरुवाच। वायुः समुत्कर्षति गर्भयोनि- मृतौ रेतः पुष्पफलानुपृक्तम्। स तत्र तन्मात्रकृताधिकारः क्रमेण संवर्धयतीह गर्भम्।। (1-84-14)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— वायु (प्राण शक्ति) मृत जीव के उस बीज (वीर्य और अन्न-रस) को गर्भ योनि तक पहुँचाती है। वहाँ वह जीवात्मा अपने कर्मों के अनुसार अधिकार प्राप्त करके क्रमशः उस गर्भ को बढ़ाती और विकसित करती है।
व्याख्या: प्राण और कर्म के प्रभाव से गर्भ का विकास होता है। प्रकृति के नियमों के अंतर्गत किस प्रकार भ्रूण का क्रमिक विकास होता है, उसका यहाँ वैज्ञानिक व आध्यात्मिक संकेत दिया गया है।
श्लोक 15
स जायमानो विगृहीतमात्रः संज्ञामधिष्ठाय ततो मनुष्यः। स श्रोत्राभ्यां वेदयतीह शब्दं स वै रूपं पश्यति चक्षुषा च।। (1-84-15)
हिंदी अनुवाद: जब वह जन्म लेता है और अपने अंगों को ग्रहण करता है, तब चेतना (संज्ञा) को पाकर वह मनुष्य बनता है। इसके बाद वह अपने कानों से शब्दों को सुनता है और अपनी आँखों से रूपों को देखता है।
व्याख्या: गर्भ से बाहर आकर जब शिशु जन्म लेता है, तो उसमें चेतना जागृत होती है। वह संसार की ध्वनियों को सुनने और दृश्यों को देखने योग्य इंद्रियां प्राप्त करता है, और इस प्रकार उसकी नई जीवन यात्रा आरंभ होती है।
श्लोक 16
घ्राणेन गन्धं जिह्वयाऽथो रसं च त्वचा स्पर्शं मनसा वेदभावम्। इत्यष्टकेहोपहितं हि विद्धि महात्मनः प्राणभृतः शरीरे।। (1-84-16)
हिंदी अनुवाद: हे अष्टक! इस प्रकार नाक से गंध, जीभ से रस, त्वचा से स्पर्श और मन से विभिन्न भावों को अनुभव किया जाता है—प्राण धारण करने वाले महात्माओं के शरीर में इन इंद्रियों की स्थिति को ऐसा ही जानो।
व्याख्या: ययाति शारीरिक इंद्रियों और मन के कार्यों को स्पष्ट करते हैं। मनुष्य का यह शरीर आत्मा के रहने का घर है, जहाँ प्रत्येक इंद्री (नाक, जीभ, त्वचा और मन) अपने-अपने विषयों (गंध, रस, स्पर्श और विचार) का अनुभव करती है।
श्लोक 17
अष्टक उवाच। यः संस्थितः पुरुषो दह्यते वा निखन्यते वापि निकृष्यते वा। अभावभूतः स विनाशमेत्य केनात्मानं चेतयते परस्तात्।। (1-84-17)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— जो पुरुष मृत हो जाने पर जला दिया जाता है, या जमीन में गाड़ दिया जाता है, अथवा काट-छांट दिया जाता है, वह पूरी तरह नष्ट होकर जब अभाव को प्राप्त हो जाता है, तब वह इसके बाद किस शक्ति से अपनी आत्मा को चेतित (जागृत) करता है?
व्याख्या: अष्टक का यह बहुत ही गहरा दार्शनिक प्रश्न है कि जब स्थूल शरीर मृत्यु के बाद अग्नि में जल जाता है या मिट्टी में मिल जाता है, तो सब कुछ समाप्त होने जैसा प्रतीत होता है। ऐसे में वह कौन सी चेतना या तत्व है जो पुनर्जन्म लेता है और अपनी पहचान बनाए रखता है।
श्लोक 18
ययातिरुवाच। हित्वा सोऽसून्सुप्तवन्निष्टनित्वा पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा। अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी हित्वा देहं भजते राजसिंह।। (1-84-18)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे राजसिंह! वह जीव इस पुराने शरीर को छोड़कर, सोते हुए की भांति कुछ कष्ट अनुभव करते हुए, अपने द्वारा किए गए अच्छे और बुरे कर्मों को साथ लेकर, प्राण वायु (पवन) के पीछे-पीछे चलते हुए किसी नई योनि को प्राप्त करता है।
व्याख्या: भौतिक शरीर के नष्ट होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होती। उसके संचित कर्म (पुण्य और पाप) और प्राण-शक्तिजगत के नियमों के अनुसार उसे एक नया शरीर और नई योनि प्राप्त करवाते हैं।
श्लोक 19
पुण्यां योनिं पुण्यकृतो व्रजन्ति पापां योनिं पापकृतो व्रजन्ति। कीटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापा न मे विवक्षास्ति महानुभाव।। (1-84-19)
हिंदी अनुवाद: पुण्य कर्म करने वाले लोग पुण्य योनियों (उच्च जन्म) को प्राप्त होते हैं, और पाप कर्म करने वाले पापी योनियों में जाते हैं। पापी लोग कीड़े और पतंगे आदि बनते हैं—हे महानुभाव! इसके बारे में मेरी और अधिक कहने की इच्छा नहीं है (अर्थात नियम स्पष्ट है)।
व्याख्या: यह कर्म फल का शाश्वत सिद्धांत है। जैसा कोई कर्म करता है, वैसी ही योनि उसे मिलती है। अच्छे कर्म मनुष्य को उच्च स्थान दिलाते हैं, जबकि निकृष्ट कर्म जीव को निम्न योनियों (कीड़े-मकोड़े आदि) में धकेल देते हैं।
श्लोक 20
चतुष्पदा द्विपदाः षट्पदाश्च तथाभूता गर्भभूता भवन्ति। आख्यातमेतन्निखिलेन सर्वं भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह।। (1-84-20)
हिंदी अनुवाद: चौपाये (पशु), दोपाये (मनुष्य) और षट्पद (भ्रमर आदि कीट)—ये सभी जीव गर्भ रूप होकर ही जन्म लेते हैं। मैंने यह सब तुम्हें विस्तार से बता दिया है। अब हे राजसिंह! तुम इसके अलावा और क्या पूछना चाहते हो?
व्याख्या: संसार के सभी प्रकार के जीव-जंतु गर्भ धारण करके ही उत्पन्न होते हैं। ययाति ने सृष्टि और पुनर्जन्म के इस चक्र को पूरी तरह समझाकर अष्टक के समक्ष प्रश्न का समापन किया है।
श्लोक 21
अष्टक उवाच। किंस्वित्कृत्वा लभते तात लोका- न्मर्त्यः श्रेष्ठांस्तपसा विद्यया च। तन्मे पृष्टः शंस सर्वं यथाव- च्छुभाँल्लोकान्येन गच्छेत्क्रमेण।। (1-84-21)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— हे तात! मनुष्य तपस्या और विद्या के द्वारा कौन-से कर्म करके श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त करता है? मेरे पूछने पर आप वह सब यथार्थ रूप से कहिए, जिससे वह क्रमानुसार शुभ लोकों को जा सके।
व्याख्या: अष्टक अब यह जानना चाहते हैं कि यदि मनुष्य को भवसागर से पार उतरना है और उच्च तथा शुभ लोकों की प्राप्ति करनी है, तो उसे अपनी विद्या और तपस्या के साथ जीवन में किस प्रकार के आचरण और कर्म करने चाहिए।
श्लोक 22-23
ययातिरुवाच। पुंसः सदैवेति वदन्ति सन्तः।। (1-84-22f) अधीयानः पण्डितंमन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परेषाम्। तस्यान्तवन्तश्च भवन्ति लोका न चास्य तद्ब्रह्म फलं ददाति।। (1-84-23)
हिंदी अनुवाद: संत लोग हमेशा ऐसा कहते हैं— जो मनुष्य स्वयं को बहुत बड़ा विद्वान मानकर अपनी विद्या से दूसरों का यश और सम्मान नष्ट करता है, उसके लोक नाशवान होते हैं और उसकी वह विद्या व ब्रह्म-ज्ञान उसे कोई भी वास्तविक फल नहीं देता।
व्याख्या: अहंकार और विद्या का दुरुपयोग मनुष्य के सारे पुण्यों को नष्ट कर देता है। जो ज्ञानी व्यक्ति अपनी विद्वत्ता का घमंड दिखाकर दूसरों को नीचा दिखाता है या उनका अपमान करता है, उसे वेदों और विद्या का सच्चा फल प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 24
चत्वारि कर्माण्यभयङ्कराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि। मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः।। (1-84-24)
हिंदी अनुवाद: ये चार कर्म यदि अहंकार (मान) के साथ किए जाएं, तो जो कर्म सामान्यतः भय दूर करने वाले होते हैं, वे ही भारी भय पैदा कर देते हैं—अंकारयुक्त अग्निहोत्र, अहंकारयुक्त मौन व्रत, अहंकार के साथ किया गया स्वाध्याय (अध्ययन), और अहंकार से किया गया यज्ञ।
व्याख्या: धार्मिक अनुष्ठान और तपस्या यदि दिखावे या अहंकार के लिए की जाएं, तो वे पुण्य के बजाय पाप और भय का कारण बन जाती हैं। धर्म का आधार सादगी और विनम्रता होना चाहिए, न कि दंभ।
श्लोक 25
न मानमान्यो मुदमाददीत न सन्तापं प्राप्नुयाच्चावमानात्। सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुबुद्धिं लभन्ते।। (1-84-25)
हिंदी अनुवाद: मान-सम्मान मिलने पर बुद्धिमान मनुष्य को बहुत अधिक प्रसन्न नहीं होना चाहिए, और अपमानित होने पर संताप (दुःख) नहीं करना चाहिए। इस संसार में संत लोग ही सत्पुरुषों का आदर करते हैं, क्योंकि असाधु (दुष्ट) लोग कभी भी साधुता की बुद्धि को नहीं समझ सकते।
व्याख्या: मान और अपमान संसार के चक्र हैं। इनसे विचलित न होना ही एक धीर पुरुष का लक्षण है। दुष्ट लोग कभी भी सज्जनों के आचरण और विचारों की गहराई को नहीं समझ पाते।
श्लोक 26
इति दद्यामिति यज इत्यदीय इति व्रतम्। इत्येतानि भयान्याहुस्तानि वर्ज्यानि सर्वशः।। (1-84-26)
हिंदी अनुवाद: 'मैं दान देता हूँ', 'मैं यज्ञ करता हूँ', या 'मैंने यह व्रत किया है'—इस प्रकार का अहंकारयुक्त अभिमान ही सबसे बड़ा भय कहा गया है। इन सभी दंभपूर्ण भावों का पूरी तरह त्याग कर देना चाहिए।
व्याख्या: दान, यज्ञ और व्रत जैसे पुण्य कर्म भी यदि कर्ता के मन में यह अहंकार पैदा कर दें कि "मैं बहुत बड़ा दानी हूँ", तो वे अपना पुण्य खो बैठते हैं। अहंकारमुक्त होकर हीनता और दिखावे से दूर रहकर ही सत्कर्म करने चाहिए।
श्लोक 27
ये चाश्रयं वेदयन्ते पुराणं मनीषिणो मानसमार्गरुद्धम्। तन्निःश्रेयस्तेन संयोगमेत्य परां शान्तिं प्रत्युः प्रेत्य चेह।। (1-84-27)
हिंदी अनुवाद: जो बुद्धिमान लोग मन के आवेगों और विकारों को रोककर उस सनातन शाश्वत आश्रय (परमात्मा या आत्म-तत्त्व) को जान लेते हैं, वे उस परम कल्याणकारी मार्ग से जुड़कर इस लोक में और परलोक में भी परम शांति को प्राप्त करते हैं।
व्याख्या: ययाति अपने उपदेश का समापन करते हुए कहते हैं कि मन और इंद्रियों के विकारों पर विजय पाना ही असली साधना है। जो व्यक्ति आंतरिक संयम और आत्म-ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, वह इस जीवन में भी और मृत्यु के पश्चात भी परम शांति का अधिकारी बनता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि चतुरशीतितमोऽध्यायः।। 84 ।।
संभवपर्वणि त्र्यशीतितमोऽध्यायः
