श्लोक 1
ययातिरुवाच। अहं ययातिर्नहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सर्वभूतावमानात्। प्रभ्रंशितः सुरसिद्धर्षिलोका- त्परिच्युतः प्रपताम्यल्पपुण्यः।। (1-83-1)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— मैं नहुष का पुत्र, पोरु का पिता और राजा ययाति हूँ। सभी जीवों का अनादर करने के कारण अपने पुण्य क्षीण हो जाने से मैं देवता, सिद्ध और ऋषियों के लोक से भ्रष्ट होकर नीचे गिर रहा हूँ।
व्याख्या: ययाति राजर्षि अष्टक के प्रश्नों का उत्तर देते हुए अपना पूरा परिचय देते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनके पतन का मूल कारण किसी अन्य की गलती नहीं, बल्कि सभी प्राणियों का अनादर करने का उनका अपना अहंकार था, जिसके फलस्वरूप उनके पुण्य समाप्त हो गए और उन्हें स्वर्ग से नीचे गिरना पड़ा।
श्लोक 2
अहं हि पूर्वो वयसा भवद्भ्य- स्तेनाभिवादं भवतां न प्रयुञ्जे। यो विद्यया तपसा जन्मना वा वृद्धः स पूज्यो भवति द्विजानाम्।। (1-83-2)
हिंदी अनुवाद: आयु में मैं आप सबसे बड़ा हूँ, इसीलिए मैं आप लोगों को प्रणाम नहीं कर रहा हूँ। शास्त्रों के अनुसार जो मनुष्य विद्या, तपस्या या जन्म से वृद्ध (श्रेष्ठ) होता है, वही ब्राह्मणों (श्रेष्ठ जनों) द्वारा पूजनीय होता है।
व्याख्या: ययाति अपनी आयु और अनुभव की श्रेष्ठता का उल्लेख करते हैं। यद्यपि वे वर्तमान में विपत्ति या पतन की स्थिति में हैं, तथापि आयु और पूर्व कृत्यों के आधार पर वे उम्र में उन राजाओं से बड़े हैं, इसलिए शिष्टाचार और मर्यादा के दृष्टिकोण से वे अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 3
अष्टक उवाच। अवादीस्त्वं वयसा यः प्रवृद्धः स वै राजन्नाभ्यधिकः कथ्यते च। यो विद्यया तपसा संप्रवृद्धः स एव पूज्यो भवति द्विजानाम्।। (1-83-3)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने कहा— हे राजन्! आपने जो यह कहा कि जो आयु में बड़ा है, वह श्रेष्ठ कहलाता है—यह ठीक है; किंतु जो मनुष्य अपनी विद्या और तपस्या से महान बनता है, वास्तव में वही श्रेष्ठ जनों द्वारा सबसे अधिक पूजनीय होता है।
व्याख्या: राजर्षि अष्टक विनम्रता किंतु दृढ़ता के साथ आयु के साथ-साथ विद्या और तपस्या के महत्व को रेखांकित करते हैं। उनका संकेत है कि केवल शारीरिक आयु बड़ी होने से कोई महान नहीं हो जाता, बल्कि उसका आंतरिक ज्ञान और तप ही उसकी वास्तविक महानता तय करता है।
श्लोक 4
ययातिरुवाच। प्रतिकूलं कर्मणां पापमाहु- स्तद्वर्ततेऽप्रवणे पापलोक्यम्। सन्तोऽसतां नानुवर्तन्ति चैत- द्यथा चैषामनुकूलास्तथाऽऽसन्।। (1-83-4)
हिंदी अनुवाद: धर्म और कर्म के अनुकूल न आचरण करना ही पाप कहलाता है, और ऐसा पाप करने वाले लोग पाप लोक को प्राप्त होते हैं। सज्जन पुरुष कभी भी असज्जनों (दुष्टों) के मार्ग का अनुसरण नहीं करते, बल्कि वे हमेशा धर्म के अनुकूल ही आचरण करते हैं।
व्याख्या: ययाति कर्म के सिद्धांत को समझाते हुए कहते हैं कि जो कार्य लोक-मर्यादा और धर्म के विपरीत होते हैं, वे पाप की श्रेणी में आते हैं। समझदार और संत प्रवृत्ति के लोग कभी भी गलत रास्तों पर नहीं चलते, बल्कि हमेशा सत्कर्मों का ही पालन करते हैं।
श्लोक 5
अभूद्धनं मे विपुलं गतं त- द्विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि। एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो यो वर्तते स विजानाति जीवः।। (1-83-5)
हिंदी अनुवाद: मेरा बहुत बड़ा धन और वैभव था, जो अब नष्ट हो चुका है और बहुत प्रयास करने पर भी मैं उसे वापस पाने में असमर्थ हूँ। इस प्रकार की अनित्यता को समझकर जो मनुष्य अपने आत्म-कल्याण में लीन रहता है, वही असली जीवन के मर्म को जानता है।
व्याख्या: संसार की नश्वरता का सुंदर चित्रण यहाँ है। ययाति बताते हैं कि राजपाट, धन और वैभव हमेशा साथ नहीं रहते। जब सब कुछ छिन जाए, तब शोक करने के बजाय अपने आत्मिक विकास और कल्याण पर ध्यान देना ही एक बुद्धिमान जीव का लक्षण है।
श्लोक 6
महाधनो यो यजते सुयज्ञै- र्यः सर्वविद्यासु विनीतबुद्धिः। वेदानधीत्य तपसा योज्य देहं दिवं स यायात्पुरुषो वीतमोहः।। (1-83-6)
हिंदी अनुवाद: जो धनी पुरुष महान यज्ञों का अनुष्ठान करता है, सभी विद्याओं में जिसकी बुद्धि विनम्र और परिपक्व है, जो वेदों का अध्ययन करके अपने शरीर को तपस्या में लगाता है, वह मोह से मुक्त होकर अंततः स्वर्ग को प्राप्त होता है।
व्याख्या: ययाति उस उच्च कोटि के मनुष्य का मार्ग बताते हैं जो अपने जीवन में धर्म, यज्ञ, विद्या और तप का समन्वय करता है। मोह-माया से ऊपर उठकर जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसका जीवन और मरण दोनों सार्थक हो जाते हैं।
श्लोक 7-9
दिष्टं बलीय इति मत्वाऽऽत्मबुद्ध्या।। (1-83-7f) सुखं हि जन्तुर्यदि वाऽपि दुःखं दैवाधीनं विन्दते नात्मशक्त्या। तस्माद्दिष्टं बलवन्मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत्कथंचित्।। (1-83-8) दुःखैर्न तप्येन्न सुखैः प्रहृष्ये- त्समेन वर्तेत सदैव धीरः। दिष्टं बलीय इति मन्यमानो न संज्वरेन्नापि हृष्येत्कथंचित्।। (1-83-9)
हिंदी अनुवाद: प्राणी को मिलने वाला सुख हो या दुःख, वह सब अपनी शक्ति से नहीं बल्कि भाग्य (दैव) के अधीन प्राप्त होता है। इसलिए प्रारब्ध (भाग्य) को ही बलवान मानते हुए बुद्धिमान मनुष्य को न तो अत्यधिक संताप करना चाहिए और न ही कभी हर्षित (अहम में चूर) होना चाहिए। धीर पुरुष न तो दुःखों से घबराता है और न सुखों में बहुत प्रसन्न होता है, बल्कि दोनों परिस्थितियों में समान भाव से रहता है।
व्याख्या: यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के स्थितप्रज्ञ दर्शन की नींव जैसा है। जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि सब कुछ भाग्य और कर्म के चक्र के अधीन है, वह न तो विपत्ति में टूटता है और न ही संपत्ति (सुख) में अंधा होता है।
श्लोक 10
भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचि- त्सन्तापो मे मानसो नास्ति कश्चित्। धाता यथा मां विदधीत लोके ध्रुवं तथाऽहं भवितेति मत्वा।। (1-83-10)
हिंदी अनुवाद: हे अष्टक! मैं किसी भी भय के उपस्थित होने पर विचलित नहीं होता और मेरे मन में कोई संताप (चिंता) नहीं है। विधाता (ईश्वर) इस संसार में मेरे साथ जैसा विधान करेंगे, निश्चित रूप से वैसा ही होगा—ऐसा मानकर मैं संतुष्ट रहता हूँ।
व्याख्या: ययाति अपने मानसिक संयम और दृढ़ता का परिचय देते हैं। स्वर्ग से नीचे गिरने और सब कुछ खो देने के बावजूद उनके मन में कोई शिकवा या दुख नहीं है। वे पूरी तरह ईश्वर के विधान और प्रकृति के नियमों पर भरोसा करते हुए शांतचित्त हैं।
श्लोक 11
संस्वेदजा अण्डजाश्चोद्भिदश्च सरीसृपाः कृमयोऽथाप्सु मत्स्याः। तथाश्मनस्तृणकाष्ठं च सर्वे दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति।। (1-83-11)
हिंदी अनुवाद: पसीने से उत्पन्न होने वाले जीव, अंडे से जन्म लेने वाले, धरती को फाड़कर निकलने वाले (पेड़-पौधे), रेंगने वाले जीव, कीड़े, जल के जीव (मछलियां), तथा पत्थर, तिनके और लकड़ी—ये सभी अपने नियत समय (प्रारब्ध के क्षय) पर अपनी मूल प्रकृति को प्राप्त हो जाते हैं।
व्याख्या: प्रकृति के इस महान नियम को समझाते हुए ययाति कहते हैं कि इस संसार में चाहे छोटे से छोटा कीड़ा हो या बड़े से बड़ा तत्व, सबकी उत्पत्ति और उसका अंत एक निश्चित नियम के तहत होता है। कोई भी इस शाश्वत नियम से बंधा होने के कारण अमर नहीं है।
श्लोक 12
अनित्यतां सुखदुःस्वस्य बुद्ध्वा कस्मात्संतापमष्टकाहं भजेयम्। किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये तस्मात्सन्तापं वर्जयाम्यप्रमत्तः।। (1-83-12)
हिंदी अनुवाद: हे अष्टक! सुख और दुःख की इस अनित्यता को अच्छी तरह जानकर भला मैं किस बात के लिए संताप करूँ? मुझे क्या करना चाहिए और क्या करने से दुःख नहीं होता—यह सोचकर मैं पूरी सावधानी के साथ संताप (शोक) का सर्वथा त्याग कर देता हूँ।
व्याख्या: ययाति का यह दृष्टिकोण जीवन का सबसे बड़ा दर्शन है। जब यह तय है कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, तो किसी हानि या पतन पर रोना या पछताना व्यर्थ है। समझदारी इसी में है कि मनुष्य हर परिस्थिति में अपनी मानसिक शांति बनाए रखे।
श्लोक 13
वैशंपायन उवाच। एवं व्रुवाणं नृपतिं ययाति- मथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छत्। मातामहं सर्वगुणोपपन्नं तत्रस्थितं स्वर्गलोके यथावत्।। (1-83-13)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— इस प्रकार उपदेश दे रहे अपने नाना (जो सर्वगुण संपन्न थे और वहाँ स्वर्ग लोक के प्रसंग से संबंधित थे) उन राजा ययाति से राजर्षि अष्टक ने तब पुनः विस्तार से पूछा।
व्याख्या: यहाँ वैशंपायन जी एक बहुत महत्वपूर्ण पारिवारिक संबंध का खुलासा करते हैं। राजा ययाति राजर्षि अष्टक के नाना (मातामह) हैं। अष्टक अपने नाना की इन ज्ञानी बातों को सुनकर उनके अनुभव और स्वर्ग के संपूर्ण वृत्तांत को और अधिक गहराई से जानना चाहते हैं।
श्लोक 14
अष्टक उवाच। ये ये लोकाः पार्थिवेन्द्रप्रधाना- स्त्वया भुक्ता यं च कालं यथावत्। तान्मे राजन्ब्रूहि सर्वान्यथाव- त्क्षेत्रज्ञवद्भाषसे त्वं हि धर्मान्।। (1-83-14)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने कहा— हे राजन्! राजाओं में श्रेष्ठ आपने जिन-जिन लोकों का उपभोग किया है और जितने-जितने समय तक वहाँ रहे हैं, उन सबका मुझे यथासत्य वर्णन सुनाइए; क्योंकि आप आत्मा और धर्म के रहस्यों को जानने वाले (क्षेत्रज्ञ) की तरह धर्म की बातें कर रहे हैं।
व्याख्या: अष्टक अपने नाना ययाति से आग्रह करते हैं कि वे अपने स्वर्ग और अन्य उच्च लोकों के अनुभवों को विस्तार से बताएं। वे यह भी मानते हैं कि ययाति साधारण राजा नहीं हैं, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक और धर्म के गूढ़ रहस्यों का पूरा ज्ञान है।
श्लोक 15
ययातिरुवाच। राजाऽहमासमिह सार्वभौम- स्ततो लोकान्महतश्चाजयं वै। तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः।। (1-83-15)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— मैं इस पृथ्वी पर सार्वभौम (समस्त धरती का सम्राट) राजा था और तत्पश्चात मैंने अपने महान कर्मों से उच्च लोकों को जीता। वहाँ मैंने एक हजार वर्ष तक निवास किया और उसके बाद उससे भी परे के उच्च लोक को प्राप्त हुआ।
व्याख्या: ययाति अपने जीवन की यात्रा का वर्णन करते हुए बताते हैं कि पृथ्वी का सम्राट बनने के बाद उन्होंने अपने पुण्यों के बल पर दिव्य लोकों की प्राप्ति की। वे एक लोक में एक हजार वर्ष तक रहे और फिर उससे भी आगे के उच्चतर लोकों की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 16
ततः पुरीं पुरुहूतस्य रम्यां सहस्रद्वारां शतयोजनायताम्। अध्यावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः।। (1-83-16)
हिंदी अनुवाद: इसके पश्चात, मैंने इंद्र (पुरुहूत) की उस रमणीय पुरी (अमरावती) में निवास किया, जो हजारों दरवाजों वाली और सौ योजन लंबी है। वहाँ भी मैंने एक हजार वर्ष बिताए और तत्पश्चात उससे भी उत्कृष्ट लोक को प्राप्त हुआ।
व्याख्या: ययाति आगे बताते हैं कि उन्हें देवराज इंद्र की राजधानी अमरावती में भी रहने का अवसर मिला। वह पुरी अत्यंत भव्य और विशाल थी, जहाँ उन्होंने एक लंबा कालखंड (एक हजार वर्ष) बिताया और फिर और आगे के दिव्य लोकों में प्रवेश किया।
श्लोक 17
ततः दिव्यमजरं प्राप्य लोकं प्रजापतेर्लोकपतेर्दुरापम्। तत्रावसं वर्षसहस्रमात्रं ततो लोकं परमस्म्यभ्युपेतः।। (1-83-17)
हिंदी अनुवाद: इसके बाद मैंने प्रजापति (ब्रह्मा जी) के उस दिव्य, जरा-रहित (बुढ़ापे से मुक्त) और आम लोगों के लिए अत्यंत दुर्लभ लोक को प्राप्त किया। वहाँ भी मैंने एक हजार वर्ष तक निवास किया और फिर उससे भी श्रेष्ठ लोक को प्राप्त हुआ।
व्याख्या: ययाति की यह यात्रा साधारण स्वर्ग से ऊपर उठकर प्रजापति के ब्रह्मलोक तक पहुँचती है। यह स्थान साधारण जीवों के लिए आसानी से प्राप्य नहीं है, किंतु अपने महान तप और पुण्यों के बल पर ययाति वहाँ भी एक हजार वर्ष तक रहे।
श्लोक 18
स देवदेवस्य निवेशने च विहृत्य लोकानवसं यथेष्टम्। संपूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तै- स्तुल्यप्रभावद्युतिरीश्वराणाम्।। (1-83-18)
हिंदी अनुवाद: मैंने देवों के देव महादेव या नारायण के निवास-स्थान तथा अन्य लोकों में अपनी इच्छा के अनुसार विचरण किया। समस्त देवताओं द्वारा मेरी पूजा की गई और मैं ईश्वर (देवताओं) के समान ही प्रभाव और कांति से युक्त होकर वहाँ रहा।
व्याख्या: ययाति अपने उन स्वर्णिम दिनों का स्मरण करते हैं जब वे देवताओं के बीच उनके समकक्ष माने जाते थे। सभी देवता उनका आदर करते थे और उनका तेज किसी दिव्य देवता या ईश्वर के समान देदीप्यमान था।
श्लोक 19
तथाऽऽवसं नन्दने कामरूपी संवत्सराणामयुतं शतानाम्। सहाप्सरोभिर्विहरन्पुण्यगन्धा- न्पश्यन्नगान्पुष्पितांश्चारुरूपान्।। (1-83-19)
हिंदी अनुवाद: इसी प्रकार, मैं नंदन कानन वन में अपनी इच्छा अनुसार रूप बदलने वाला (कामरूपी) बनकर और सुगंधित पुष्पों से सुसज्जित सुंदर वृक्षों को देखते हुए तथा अप्सराओं के साथ विहार करते हुए लाखों वर्षों तक (अनेक युगों तक) निवास करता रहा।
व्याख्या: यह स्वर्ग के सबसे विलासितापूर्ण और आनंददायक हिस्से (नंदन वन) का वर्णन है। ययाति लंबे समय तक दिव्य अप्सराओं के साथ उस रमणीय वातावरण में सुख-भोग करते रहे, जहाँ किसी प्रकार का दुःख या कष्ट नहीं था।
श्लोक 20
तत्र स्थितं मां देव सुखेषु सक्तं कालेऽतीते महति ततोऽतिमात्रम्। दूतो देवानामब्रवीदुग्ररूपो ध्वंसेत्युच्चैस्त्रिः प्लुतेन स्वरेण।। (1-83-20)
हिंदी अनुवाद: वहाँ देवताओं के उन दिव्य सुखों में बहुत अधिक आसक्त होकर जब एक लंबा समय बीत गया, तब देवताओं के एक उग्र रूप वाले दूत ने ऊँचे और तीन बार खींचे हुए स्वर में कहा— 'अब तुम्हारा पतन हो गया है (तुम्हारा पुण्य क्षीण हो गया है)!'
व्याख्या: अत्यधिक सुख-भोग में मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप और सीमाओं को भूल जाता है। ययाति के साथ भी यही हुआ। जब उनके पुण्य का समय पूरा होने को आया, तो देवदूत ने कठोर स्वर में चेतावनी दी कि अब उनके स्वर्ग के दिन समाप्त हो चुके हैं।
श्लोक 21
एतावन्मे विदितं राजसिंह ततो भ्रष्टोऽहं नन्दनात्क्षीणपुण्यः। वाचोऽश्रौषं चान्तरिक्षे सुराणां सानुक्रोंशाः शोचतां मां नरेन्द्र।। (1-83-21)
हिंदी अनुवाद: हे राजसिंह! बस, मुझे यहीं तक का ज्ञान है। इसके बाद पुण्य क्षीण होने के कारण मैं नंदन वन से भ्रष्ट होकर नीचे गिरा। उस समय मैंने अंतरिक्ष में देवताओं की उन दयालु आवाजों को सुना, जो मुझ पर तरस खाते हुए शोक प्रकट कर रहे थे।
व्याख्या: ययाति बताते हैं कि जब वे स्वर्ग से नीचे धकेले जा रहे थे, तब देवलोक के देवता भी उनकी इस दशा को देखकर दुखी हो रहे थे और अंतरिक्ष में उनके प्रति सहानुभूति भरे शब्द गूंज रहे थे।
श्लोक 22
अहो कष्टं क्षीणपुण्यो ययातिः पतत्यसौ पुण्यकृत्पुण्यकीर्तिः। तानब्रुवं पतमानस्ततोऽहं सतां मध्ये निपतेयं कथं नु।। (1-83-22)
हिंदी अनुवाद: देवता कह रहे थे— 'अरे कष्ट की बात है! इतने बड़े पुण्यात्मा और पवित्र कीर्ति वाले राजा ययाति के पुण्य क्षीण हो गए हैं और वे नीचे गिर रहे हैं।' तब नीचे गिरते हुए मैंने उन देवताओं से कहा था— 'मैं गिर तो रहा हूँ, पर कृपा करके ऐसा हो कि मैं सत्पुरुषों (संतों) के बीच ही गिरूँ।'
व्याख्या: ययाति उस भयानक और दुखद क्षण का स्मरण करते हैं जब वे स्वर्ग से गिर रहे थे। उस संकट की घड़ी में भी उनकी एकमात्र प्रार्थना यही थी कि भले ही उनका पतन हो जाए, किंतु उनका गिरना दुर्जनों के बीच न होकर हमेशा संतों और सत्पुरुषों के सानिध्य में हो।
श्लोक 23
तैराख्याता भवतां यज्ञभूमिः समीक्ष्य चेमां त्वरितमुपागतोऽस्मि। हविर्गन्धं देशिकं यज्ञभूमे- र्धूमापाङ्गं प्रतिगृह्य प्रतीतः।। (1-83-23)
हिंदी अनुवाद: उन्हीं देवताओं द्वारा आपकी इस यज्ञ-भूमि के बारे में बताए जाने पर, मैं इस यज्ञशाला के हविष्य की सुगंध और हवन के धुएँ के संकेतों को पहचानकर तुरंत आपके पास आ गया हूँ और अब मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।
व्याख्या: ययाति अपनी कथा का समापन करते हुए अष्टक और अन्य राजाओं को बताते हैं कि कैसे वे अंतरिक्ष से सीधे उनके यज्ञ स्थल पर पहुँचे। यज्ञ की पवित्र अग्नि के धुएँ और हवन सामग्री की सुगंध ने उन्हें उस स्थान तक खींच लिया, जहाँ उनके अपने ही परिवार के धर्मिष्ठ राजा (अष्टक आदि) यज्ञ कर रहे थे।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि त्र्यशीतितमोऽध्यायः।। 83 ।।
