श्लोक 1
अष्टक उवाच। चरन्गृहस्थः कथमेति धर्मान्कथं भिक्षुः कथमाचार्यकर्मा। वानप्रस्थः सत्पथे सन्निविष्टो बहून्यस्मिन्संप्रति वेदयन्ति।। (1-85-1)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— गृहस्थ आश्रम में आचरण करने वाला व्यक्ति किस प्रकार धर्म का पालन करता है? भिक्षु (संन्यासी) और आचार्य का कर्तव्य कैसा होता है? तथा सन्मार्ग पर स्थित वानप्रस्थ आश्रम का पालन करने वाला व्यक्ति कैसे चलता है? इस विषय में लोग इस समय अनेक प्रकार की बातें जानते हैं, अतः आप इसका यथार्थ वर्णन करें।
व्याख्या: राजर्षि अष्टक चारों आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास) के धर्म और उनके आचरण की विधियों के बारे में अपने नाना ययाति से स्पष्ट मार्गदर्शन मांगते हैं ताकि विभिन्न आश्रमों के कर्तव्यों का सही भेद समझ में आ सके।
श्लोक 2
ययातिरुवाच। आहूताध्यायी गुरुकर्मस्वचोद्यः पूर्वोत्थायी चरमं चोपशायी। मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्तः स्वाध्याशीलः सिध्यति ब्रह्मचारी।। (1-85-2)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— जो ब्रह्मचारी गुरु द्वारा बुलाए जाने पर अध्ययन करता है, गुरु के कार्यों में बिना कहे तत्पर रहता है, सबसे पहले जागता है और सबसे अंत में सोता है, जो कोमल स्वभाव का, जितेन्द्रिय, धैर्यवान, असावधानी से रहित और स्वाध्याय में सदा तत्पर रहता है, वही ब्रह्मचारी अपनी सिद्धि को प्राप्त करता है।
व्याख्या: यहाँ आदर्श ब्रह्मचारी के लक्षणों और उसके दैनिक आचरण का वर्णन है। गुरु-सेवा, अनुशासन, विनय, और निरंतर विद्या का अध्ययन ही ब्रह्मचर्य आश्रम की सबसे बड़ी सफलता है।
श्लोक 3
धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत दद्यात्सदैवातिथीन्भोजयेच्च। अनाददानश्च परैरदत्तं सैषा गृहस्थोपनिषत्पुराणी।। (1-85-3)
हिंदी अनुवाद: धर्मपूर्वक प्राप्त किए गए धन से यज्ञ करे, सदा दान दे, अतिथियों को भोजन कराए, और दूसरों के द्वारा न दी गई (अन्याय से प्राप्त) वस्तु को ग्रहण न करे—यही गृहस्थ आश्रम का पुराना और सनातन उपदेश (रहस्य) है।
व्याख्या: गृहस्थ जीवन की मूल मर्यादा यह है कि धन की कमाई नीति और धर्म के मार्ग से हो। इसके बाद उस धन का उपयोग यज्ञ, परोपकार, अतिथि-सत्कार और दान-पुण्य में किया जाए। दूसरों का हक न मारना गृहस्थ का सबसे बड़ा धर्म है।
श्लोक 4
स्ववीर्यजीवी वृजिनान्निवृत्तो दाता परेभ्यो न परोपतापी। तादृङ्मुनिः सिद्धिमुपैति मुख्यां वसन्नरण्ये नियताहारचेष्टः।। (1-85-4)
हिंदी अनुवाद: जो अपने पुरुषार्थ (परिश्रम) से आजीविका चलाता है, पाप कर्मों से दूर रहता है, दूसरों को दान देता है किंतु किसी को कष्ट नहीं पहुँचाता, तथा जंगल में निवास करते हुए अपने आहार और चेष्टाओं को नियंत्रित रखता है—ऐसा मुनि मुख्य सिद्धि को प्राप्त होता है।
व्याख्या: वानप्रस्थ आश्रम के नियमों को समझाते हुए ययाति कहते हैं कि जंगल में रहकर स्व-परिश्रम पर जीने वाला, अहिंसक और संयमी व्यक्ति ही वानप्रस्थ की उच्च अवस्था और सिद्धि को प्राप्त करता है।
श्लोक 5
अशिल्पजीवी गुणवांश्चैव नित्यं जितेन्द्रियः सर्वतो विप्रयुक्तः। अनोकशायी लघुरल्पप्रसार- श्चरन्देशानेकचरः स भिक्षुः।। (1-85-5)
हिंदी अनुवाद: जो किसी प्रकार के शिल्प या व्यवसाय से आजीविका नहीं चलाता, जो हमेशा गुणवान, जितेन्द्रिय, सभी मोह-माया से पूरी तरह विरक्त, वृक्ष के नीचे सोने वाला, अल्पाहारी, सीमित आवश्यकताओं वाला और विभिन्न देशों में अकेला विचरने वाला है—वही सच्चा भिक्षु (संन्यासी) है।
व्याख्या: संन्यास आश्रम का स्वरूप पूरी तरह विरक्ति पर आधारित है। जो व्यक्ति सांसारिक प्रपंचों, व्यापार और धन-संग्रह से मुक्त होकर केवल आत्म-साधना में जुटा रहता है और घुमक्कड़ जीवन जीते हुए ईश्वर में लीन रहता है, वह संन्यासी कहलाता है।
श्लोक 6
रात्र्या यया वाऽभिजिताश्च लोका भवन्ति कामाभिजिताः सुखाश्च। तामेव रात्रिं प्रयतेत विद्वा- नरण्यसंस्थो भवितुं यतात्मा।। (1-85-6)
हिंदी अनुवाद: जिस रात्रि या काल में मनुष्य अपने श्रेष्ठ लोकों को और समस्त सुखों-कामनाओं को जीत लेता है, उसी अवस्था (वानप्रस्थ) को प्राप्त होने के लिए विद्वान और संयमी पुरुष को वन में निवास करने का प्रयास करना चाहिए।
व्याख्या: जीवन के अंतिम पड़ावों में भौतिक सुखों और मोह से ऊपर उठकर आत्मिक शांति की तलाश करना मनुष्य का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। इसके लिए वानप्रस्थ या वनवास का आश्रय लेना उत्तम माना गया है।
श्लोक 7
दशैव पूर्वान्दश चापरांश्च ज्ञातीनथात्मानमथैकविंशम्। अरण्यवासी सुकृते दधाति विमुच्यारण्ये स्वशरीरधातून्।। (1-85-7)
हिंदी अनुवाद: वन में निवास करने वाला और अपने शरीर के तत्वों (मल-मूत्रादि विकारों व मोह) का परित्याग करने वाला संन्यासी/वानप्रस्थी अपनी कुल की दस पीढ़ियों पहले की, दस पीढ़ियों बाद की और इक्कीसवें स्वयं अपनी आत्मा—इन सबको अपने सत्कर्मों से पवित्र कर देता है (तार देता है)।
व्याख्या: तपस्या और वानप्रस्थ-संन्यास का प्रभाव केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसकी साधना से उसके पूरे पूर्वज और भावी पीढ़ियाँ भी आध्यात्मिक रूप से लाभान्वित और मुक्त हो जाती हैं।
श्लोक 8
अष्टक उवाच। कतिस्विदेव मुनयः कति मौनानि चाप्युत। भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम्।। (1-85-8)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— मुनि कितने प्रकार के होते हैं और मौन धारण करने के कितने प्रकार हैं? यह सब हम सुनना चाहते हैं, अतः आप हमें बताइए।
व्याख्या: अष्टक के मन में यह तकनीकी जिज्ञासा उठती है कि साधना और मौन के कितने रूप होते हैं, क्योंकि संत और मुनि अलग-अलग तरीकों से साधना करते हैं।
श्लोक 9
ययातिरुवाच। अरण्ये वसतो यस्य ग्रामो भवति पृष्ठतः। ग्रामे वा वसतोऽरण्यं स मुनिः स्याज्जनाधिप।। (1-85-9)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— हे राजा! जो वन में रहता हुआ भी अपने मन से ग्राम (संसार व उसके विषयों) को पीछे छोड़ चुका है, अथवा जो गाँव (संसार) में रहता हुआ भी अपने मन से वन के समान अंसग और विरक्त रहता है, वही सच्चा मुनि है।
व्याख्या: मुनि होने का संबंध केवल शारीरिक रूप से जंगल में रहने से नहीं है, बल्कि आंतरिक चेतना से है। यदि कोई शहर या गाँव में रहकर भी मोह-माया से पूरी तरह अछूता है, तो वह जंगलवासी मुनि के समान ही श्रेष्ठ है।
श्लोक 10
अष्टक उवाच। कथंस्विद्वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः। ग्रामे वा वसतोऽरण्यं कथं भवति पृष्ठतः।। (1-85-10)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— वन में निवास करते हुए भी गाँव पीछे कैसे हो जाता है? और गाँव में रहते हुए भी वन किस प्रकार पीछे (दूर) माना जाता है? इसे स्पष्ट कीजिए।
व्याख्या: इस विरोधाभासी और दार्शनिक कथन को और अधिक गहराई से समझने के लिए अष्टक अपने नाना से इसकी व्यावहारिक व्याख्या मांगते हैं।
श्लोक 11-13
ययातिरुवाच। न ग्राम्यमुपयुञ्जीत य आरण्यो मुनिर्भवेत्। तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठतः।। (1-85-11) अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनिः। कौपीनाच्छादनं यावत्तावदिच्छेच्च चीवरम्।। (1-85-12) यावत्प्राणाभिसन्धानं तावदिच्छेच्च भोजनम्। तथाऽस्य वसतो ग्रामेऽरण्यं भवति पृष्ठतः।। (1-85-13)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— जो अरण्यवासी मुनि है, वह यदि ग्राम्य विषयों (भोग-विलास व संसार की वस्तुओं) का उपभोग नहीं करता, तो वन में रहते हुए भी उसके लिए ग्राम पीछे छूटा हुआ माना जाता है। इसी प्रकार, जो अग्नि और घर से रहित है, जिसका कोई कुल या चरण (निश्चित गृहस्थ बंधन) नहीं है, जो केवल लंगोट या वस्त्र का एक टुकड़ा और प्राण रक्षा के लिए जितना आवश्यक हो उतना ही भोजन ग्रहण करता है—वह गाँव में रहता हुआ भी वनवासी (विरक्त) के समान ही रहता है।
व्याख्या: सांसारिक सुख-सुविधाओं और आसक्ति का त्याग ही असली 'अरण्य' (वन) है। व्यक्ति भले ही शरीर से समाज के बीच रहे, पर यदि उसकी इच्छाएँ और मोह समाप्त हो चुके हैं, तो वह संसार से पूरी तरह विरक्त है।
श्लोक 14
यस्तु कामान्परित्यज्य त्यक्तकर्मा जितेन्द्रियः। आतिष्ठेच्च मुनिर्मौनं स लोके सिद्धिमाप्नुयात्।। (1-85-14)
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य सभी कामनाओं को त्यागकर, निष्काम भाव से कर्म करता हुआ और अपनी इंद्रियों को पूरी तरह वश में रखकर मुनि के समान मौन (संयम) का पालन करता है, वही इस संसार में परम सिद्धि को प्राप्त करता है।
व्याख्या: इच्छाओं का दमन और मन का मौन ही साधना की असली कसौटी है। जो व्यक्ति कामनाओं से मुक्त हो जाता है, उसके लिए संसार का हर बंधन स्वतः समाप्त हो जाता है।
श्लोक 15
धौतदन्तं कृत्तनखं सदा स्नातमलङ्कृतम्। असितं सितकर्माणं कस्तमर्हति नार्चितुम्।। (1-85-15)
हिंदी अनुवाद: जिसके दाँत और नाखून स्वच्छ हैं, जो हमेशा स्नान से पवित्र रहता है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है और जो सदा सत्कर्म (पवित्र कार्य) करता है—भला ऐसे महापुरुष की कौन पूजा नहीं करना चाहेगा? (अर्थात सभी लोग उसका आदर करते हैं)।
व्याख्या: तपस्वी या मुनि का जीवन केवल मैला-कुचैला होने से महान नहीं बनता। सच्ची पवित्रता आंतरिक शुद्धता, स्वच्छता और सदाचरण में निहित होती है, जिससे समाज में हर कोई उसका सम्मान करता है।
श्लोक 16
तपसा कर्शितः क्षामः क्षीणमांसास्थिशोणितः। स च लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम्।। (1-85-16)
हिंदी अनुवाद: जो अपनी तपस्या के द्वारा शरीर को कृश (पतला व संयमी) बना लेता है, जिसका मांस, अस्थि और रक्त साधना में लीन होकर दुर्बल हो गया है (अर्थात जिसने भोगों का पूरी तरह क्षय कर दिया है), वह इस लोक को जीतकर परलोक को भी जीत लेता है।
व्याख्या: कठोर तपस्या और इंद्रिय-संयम से शरीर के मोह को त्यागकर जो साधक अपनी ऊर्जा को आध्यात्मिक उन्नति में लगाता है, वह इस जीवन और परलोक दोनों में विजयी होता है।
श्लोक 17
यदा भवति निर्द्वन्द्वो मुनिर्मौनं समास्थितः। अथ लोकमिमं जित्वा लोकं विजयते परम्।। (1-85-17)
हिंदी अनुवाद: जब वह मुनि सुख-दुःख, मान-अपमान आदि द्वंद्वों से पूरी तरह मुक्त हो जाता है और अपने मौन (संयम) में स्थित रहता है, तब वह इस लोक को जीतकर परम लोक पर विजय प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या: द्वंद्वों से ऊपर उठना ही योग और साधना की पराकाष्ठा है। जब मन में राग-द्वेष समाप्त हो जाते हैं, तब साधक को ब्रह्मांडीय शांति और मुक्ति मिल जाती है।
श्लोक 18
आस्येन तु यदाऽहारं गोवन्मृगयते मुनिः। अथास्य लोकः सर्वोऽयं सोऽमृतत्वाय कल्पते।। (1-85-18)
हिंदी अनुवाद: जब वह मुनि गाय के समान (बिना किसी लालच या स्वाद की आसक्ति के केवल पेट भरने के लिए) मुख से आहार की खोज करता है (यानी अत्यंत सादा और सीमित भोजन करता है), तब उसका यह संपूर्ण लोक अमृतत्व (मोक्ष) की प्राप्ति के योग्य हो जाता है।
व्याख्या: भोजन में स्वाद का लोभ छोड़कर केवल शरीर रक्षा के लिए जीने की प्रवृत्ति ही साधक को अमरत्व (मोक्ष) के मार्ग पर अग्रसर करती है।
श्लोक 19
सामान्यधर्मः सर्वेषां क्रोधो लोभो द्रुहाऽक्षमा। विहाय मत्सरं शाठ्यं दर्पं दम्भं च पैशुनम्। क्रोधं लोभं ममत्वं च यस्य नास्ति स धर्मवित्।। (1-85-19)
हिंदी अनुवाद: क्रोध, लोभ, दूसरों से द्वेष और अक्षमा (क्षमा न करना)—ये सभी के लिए सामान्य पाप या दोष हैं। जो मनुष्य मत्सर (ईर्ष्या), शठता (धूर्तता), दर्प (अहम), दम्भ (दिखावा) और चुगली का त्याग कर देता है, तथा जिसके भीतर क्रोध, लोभ और ममत्व (मोह) नहीं रहता—वही वास्तव में धर्म का सच्चा ज्ञाता है।
व्याख्या: यह श्लोक सभी आश्रमों और धर्मों का सार प्रस्तुत करता है। असली धार्मिकता बाहरी वेशभूषा में नहीं, बल्कि दुर्गुणों (क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, अहंकार) से मुक्ति पाने में है।
श्लोक 20
अष्टक उवाच। नित्याशनो ब्रह्मचारी गृहस्थो वनगो मुनिः। नाधर्ममशनात्प्राप्येत्कथं ब्रूहीह पृच्छते।। (1-85-20)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— सदा भोजन करने वाले ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वनवासी (वानप्रस्थी) और मुनि—ये सभी अपने भोजन के माध्यम से कहीं अधर्म को तो प्राप्त नहीं होते? (अर्थात किस आश्रम के लिए भोजन की क्या सीमा या नियम है, जिससे अधर्म न हो?) आप मुझे यह बताइए।
व्याख्या: अष्टक यह जानना चाहते हैं कि भोजन ग्रहण करने के मामले में विभिन्न आश्रमों के क्या नियम हैं, ताकि भोजन से किसी प्रकार का पाप या अधर्म न लगे।
श्लोक 21
ययातिरुवाच। अष्टौ ग्रासा मुनेः प्रोक्ताः षोडशारण्यवासिनः। द्वात्रिंशत्तु गृहस्थस्य अमितं ब्रह्मचारिणः।। (1-85-21)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— मुनि (संन्यासी) के लिए आठ ग्रास (न्यौर), अरण्यवासी (वानप्रस्थी) के लिए सोलह ग्रास, गृहस्थ के लिए बत्तीस ग्रास भोजन कहा गया है; और ब्रह्मचारी के लिए भोजन की कोई निश्चित सीमा (अमित) नहीं होती (वह अपनी आवश्यकतानुसार अध्ययन व विकास के लिए ग्रहण करता है)।
व्याख्या: यहाँ प्राचीन परंपरा के अनुसार विभिन्न आश्रमों के आहार की मात्रा और अनुशासन का सुंदर व व्यावहारिक गणित बताया गया है, जो संयमित जीवनशैली का प्रतीक है।
श्लोक 22
इत्येवं कारणैर्ज्ञेयमष्टकैतच्छुभाशुभम्।। (1-85-22)
हिंदी अनुवाद: हे अष्टक! इस प्रकार इन विभिन्न कारणों और लक्षणों से शुभ और अशुभ कर्मों के भेद को भली-भांति जान लेना चाहिए।
व्याख्या: ययाति अपने उपदेश का उपसंहार करते हुए अष्टक से कहते हैं कि धर्म, आश्रमों के कर्तव्य, आहार और आचरण के इन भेदों को समझकर ही मनुष्य को अपने जीवन का कल्याण करना चाहिए।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि पञ्चाशीतितमोऽध्यायः।। 85 ।।
