श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्विनवतितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि   संभवपर्वणि द्विनवतितमोऽध्यायः

श्लोक 1-4

वैशंपायन उवाच। ततो गच्छन्महाबाहुरेकोऽमात्यान्विसृज्य तान्। नापश्यच्चाश्रमे तस्मिंस्तमृषिं संशितव्रतम्।। (1-92-1) सोऽपश्यमानस्तमृषिं शून्यं दृष्ट्वा तथाऽऽश्रमम्। उवाच क इहेत्युच्चैर्वनं सन्नादयanniv।। (1-92-2) श्रुत्वाऽथ तस्य तं शब्दं कन्या श्रीरिव रूपिणी। निश्चक्रामाश्रमात्तस्मात्तापसीवेषधारिणी।। (1-92-3) सा तं दृष्ट्वैव राजानं दुष्यन्तमसितेक्षणा। सुप्रीताऽभ्यागतं तं तु पूज्यं प्राप्तमथेश्वरम्।। (1-92-4)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तदनन्तर महाबाहु राजा दुष्यंत अपने मंत्रियों को पीछे ही छोड़कर अकेले ही आगे बढ़े और उन्होंने उस आश्रम में संशितव्रत (कठोर व्रतधारी) महर्षि कण्व को नहीं देखा। उस ऋषि को न पाकर तथा आश्रम को सूना देखकर उन्होंने ऊँचे स्वर में वन को गुंजायमान करते हुए कहा— "यहाँ कौन है?" उनके उस शब्द को सुनकर लक्ष्मी के समान रूपवती और तापसी का वेष धारण किए एक कन्या उस आश्रम से बाहर निकली। काले नेत्रों वाली उस सुंदर कन्या ने आए हुए उन पूजनीय तथा श्रेष्ठ राजा दुष्यंत को देखते ही अत्यंत प्रसन्नता प्राप्त की।

व्याख्या: राजा दुष्यंत जब महर्षि कण्व की कुटी के पास अकेले पहुँचते हैं और महर्षि को वहाँ नहीं पाते, तब उनके पुकारने पर साक्षात श्रीलक्ष्मीरूपा शकुंतला तापसी वेश में बाहर आती हैं।

श्लोक 5-8

रूपयौवनसंपन्ना शीलाचारवती शुभा। सा तमायतपद्माक्षं व्यूढोरस्कं महाभुजम्।। (1-92-5) सिंहस्कन्धं दीर्घबाहुं सर्वलक्षणपूजितम्। स्पृष्टं मधुरया वाचा साऽब्रवीज्जनमेजया।। (1-92-6) स्वागतं त इति क्षिप्रमुवाच प्रतिपूज्य च। आसनेनार्चयित्वा च पाद्येनार्घ्येण चैव हि।। (1-92-7) पप्रच्छानामयं राजन्कुशलं च नराधिपम्। यथावदर्चयित्वाऽथ पृष्ट्वा चानामयं तदा।। (1-92-8)

हिंदी अनुवाद: रूप और यौवन से संपन्न, शील, आचार और शुभ लक्षणों से युक्त वह कन्या कमल के समान बड़े नेत्रों वाले, चौड़ी छाती वाले, महाबाहु, सिंह के समान कंधे वाले, लंबी भुजाओं वाले और सभी शुभ लक्षणों से पूजित उन राजा को देखकर मधुर वाणी से बोली। उसने शीघ्रातिशीघ्र उनका स्वागत किया, उचित आदर-सत्कार किया, उन्हें आसन दिया तथा पाद्य और अर्घ्य से उनकी पूजा की। तदनन्तर, यथार्थ रूप से सत्कार करने और कुशल-क्षेम पूछने के बाद उसने राजा से उनका अनामय (कल्याण) पूछा।

व्याख्या: शकुंतला अतिथि सत्कार की परंपरा का पालन करते हुए राजा दुष्यंत का यथोचित स्वागत, पाद्य-अर्घ्य प्रदान और कुशल-क्षेम पूछकर राजधर्म का परिचय देती हैं।

श्लोक 9-13

उवाच स्मयमानेव किं कार्यं क्रियतामिति। आश्रमस्याभिगमने किं त्वं कार्यं चिकीर्षसि।। (1-92-9) कस्त्वमद्येह संप्राप्तो महर्षेराश्रमं शुभम्।' तामब्रवीत्ततो राजा कन्यां मधुरभाषिणीम्।। (1-92-10) दृष्ट्वा सर्वानवद्याङ्गीं यथावत्प्रतिपूजितः। `राजर्षेस्तस्य पुत्रोऽहमिलिनस्य महात्मनः।। (1-92-11) दुष्यन्त इति मे नाम सत्यं पुष्करलोचने। आगतोऽहं महाभागमृषिं कण्वमुपासितुम्।। (1-92-12) क्व गतो भगवान्भद्रे गन्ममाचक्ष्व शोभने। शकुन्तलोवाच। गतः पिता मे भगवान्फलान्याहर्तुमाश्रमात्। मुहूर्तं संप्रतीक्षस्व द्रष्टास्येनमुपागतम्।। (1-92-13)

हिंदी अनुवाद: मुस्कुराती हुई सी उसने पूछा— "आपका क्या कार्य है, बताइए? इस आश्रम में आने की आपकी क्या इच्छा है? आज महर्षि के इस शुभ आश्रम में आप कौन पधारे हैं?" तब सर्वथा निर्दोष अंगों वाली उस मधुर भाषिणी कन्या को देखकर और उसके द्वारा यथोचित सत्कार पाकर राजा ने कहा— "हे कमल नयनी! महात्मा राजर्षि ईलिन के पुत्र दुष्यंत मेरा नाम है। मैं इन महाभाग महर्षि कण्व के दर्शन करने आया हूँ। हे भद्रे शोभने! भगवान कण्व कहाँ गए हैं, मुझे बताओ।" शकुंतला बोली— "मेरे पिता भगवान कण्व आश्रम के लिए फल लाने वास्ते गए हैं। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए, वे अभी आते ही होंगे।"

व्याख्या: शकुंतला के पूछने पर राजा दुष्यंत अपना परिचय देते हैं और महर्षि कण्व के बारे में पूछते हैं, जिसपर शकुंतला बताती हैं कि उनके पिता फल लेने गए हैं और शीघ्र ही लौटेंगे।

श्लोक 14-17

वैशंपायन उवाच। अपश्यमानस्तमृषिं तथा चोक्तस्तया च सः। तां दृष्ट्वा च वरारोहां श्रीमतीं चारुहासिनीम्।। (1-92-14) विभ्राजमानां वपुषा तपसा च दमेन च। रूपयौवनसंपन्नामित्युवाच महीपतिः।। (1-92-15) का त्वं कस्यासि सुश्रोणि किमर्थं चागता वनम्। एवंरूपगुणोपेता कुतस्त्वमसि शोभने।। (1-92-16) दर्शनादेव हि शुभे त्वया मेऽपहृतं मनः। इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने।। (1-92-17)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— ऋषि को न पाकर और उस कन्या द्वारा ऐसा कहे जाने पर, शरीर, तप और संयम से प्रदीप्त, रूप-यौवन संपन्न, सुंदर हँसी वाली, श्रीमती तथा उत्तम कटिप्रदेश वाली उस श्रेष्ठ कन्या को देखकर महीपति दुष्यंत ने कहा— "हे सुश्रोणि! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किस प्रयोजन से इस वन में आई हो? इस प्रकार के रूप और गुणों से संपन्न होने पर भी हे शोभने! तुम कहाँ से हो? हे शुभे! तुम्हारे दर्शन मात्र से ही मेरा मन हर लिया गया है। मैं तुम्हारे विषय में जानना चाहता हूँ, अतः हे शोभने! मुझे सच-सच बताओ।"

व्याख्या: शकुंतला के अलौकिक सौंदर्य, शालीनता और उनके प्रभाव को देखकर राजा दुष्यंत का मन उनकी ओर आकर्षित हो जाता है और वे उनका परिचय जानने के लिए व्याकुल हो उठते हैं।

श्लोक 18-21

स्थितोस्म्यमितसौभाग्ये विवक्षुश्चास्मि किंचन। शृणु मे नागनासोरु वचनं मत्तकाशिनि।। (1-92-18) राजर्षेरन्वये जातः पूरोरस्मि विशेषतः। वृण्वे त्वामद्य सुश्रोणि दुष्यन्तो वरवर्णिनि।। (1-92-19) न मेऽन्यत्र क्षत्रियाया मनो जातु प्रवर्तते। ऋषिपुत्रीषु चान्यासु नावरासु परासु च।। (1-92-20) तस्मात्प्रणिहितात्मानं विद्दि मां कलभाषिणि। यस्यां मे त्वयि भावोऽस्ति क्षत्रिया ह्यसि का वदा।। (1-92-21)

हिंदी अनुवाद: "हे अमित सौभाग्यशालिनी! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ, इसलिए यहाँ खड़ा हूँ। हे मत्तकाशिनी! मेरा वचन सुनो। मैं राजर्षियों के वंश में, विशेषतः पुरु के वंश में उत्पन्न हुआ हूँ। हे वरवर्णिनि सुश्रोणि! दुष्यंत नामक मैं आज तुम्हारा वरण करता हूँ (तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ)। मेरा मन कभी भी अन्यत्र किसी क्षत्रिया के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों में—चाहे वे अन्य ऋषिपुत्रियाँ हों, नीची या ऊँची कोटि की हों—प्रवृत्त नहीं होता। अतः हे कलभाषिणि! तुम मुझे समर्पित चित्त वाला ही समझो, क्योंकि मेरा प्रेम तुम पर आ गया है। तुम कौन हो, सच-सच बताओ, क्या तुम क्षत्रिया हो?"

व्याख्या: राजा दुष्यंत पहली ही नजर में शकुंतला पर मुग्ध होकर उन्हें अपना परिचय देते हैं और गांधर्व विवाह की इच्छा प्रकट करते हुए उनका परिचय व उनकी जाति के बारे में पूछते हैं।

श्लोक 22-25

न हि मे भीरु विप्रायां मनः प्रसहते गतिम्। भजे त्वामायतापाङ्गे भक्तं भजितुमर्हसि। भुङ्क्ष राज्यं विशालाक्षि बुद्धिं मात्वन्यथा कृथाः'।। (1-92-22) एवमुक्ता तु सा कन्या तेन राज्ञा तमाश्रमे। उवाच हसती वाक्यमिदं सुमधुराक्षरम्।। (1-92-23) कण्वस्याहं भगवतो दुष्यन्त दुहिता मता। तपस्विनो धृतिमतो धर्मज्ञस्य महात्मनः।। (1-92-24) `अस्वतन्त्रास्मि राजेन्द्र काश्यपो मे गुरुः पिता। तमेव प्रार्थय स्वार्थं नायुक्तं कर्तुमर्हसि।।' (1-92-25)

हिंदी अनुवाद: "हे भीरु! मेरा मन किसी ब्राह्मणी में कभी प्रवृत्त नहीं होता। हे आयतापाङ्गे (विशाल नेत्रों वाली)! मैं तुम्हारा भक्त होकर तुम्हें भजता हूँ, अतः तुम्हें भी भक्त का भजन करना चाहिए (मेरे प्रेम को स्वीकार करना चाहिए)। हे विशालाक्षि! तुम मेरे साथ राज्य का उपभोग करो, अपनी बुद्धि को अन्यथा मत करना।" राजा द्वारा आश्रम में ऐसा कहे जाने पर उस कन्या ने हँसते हुए सुमधुर अक्षरों में यह वाक्य कहा— "हे दुष्यंत! मैं तपस्वी, धीर, धर्मज्ञ और महात्मन भगवान कण्व की पुत्री मानी गई हूँ। हे राजेन्द्र! मैं स्वतंत्र नहीं हूँ, काश्यप ही मेरे गुरु और पिता हैं। आप अपने प्रयोजन के लिए उन्हीं से प्रार्थना कीजिए, अनुचित कार्य करना आपके लिए उचित नहीं है।"

व्याख्या: राजा दुष्यंत जब शकुंतला के प्रति अपना प्रेम प्रकट करते हैं और उन्हें अपने साथ चलने का आमंत्रण देते हैं, तब शकुंतला अत्यंत शालीनता और बुद्धिमत्ता से उत्तर देती हैं कि वे महर्षि कण्व की पुत्री हैं और स्वतंत्र नहीं हैं, अतः राजा को उनके विवाह के लिए उनके पिता (महर्षि कण्व) से ही अनुमति लेनी चाहिए।

श्लोक 26-31

दुष्यन्त उवाच। ऊर्ध्वरेता महाभागे भगवाँल्लोकपूजितः। चलेद्धि वृत्ताद्धर्मोपि न चलेत्संशितव्रतः।। (1-92-26) कथं त्वं तस्य दुहिता संभूता वरवर्णिनी। संशो मे महानत्र तन्मे छेत्तुमिहार्हसि।। (1-92-27) शकुन्तलोवाच। यथाऽयमागमो मह्यं यथा चेदमभूत्पुरा। शृणु राजन्यथातत्त्वं यथाऽस्मि दुहिता मुनेः।। (1-92-29) ऋषिः कश्चिदिहागम्य मम जन्माभ्यचोदयत्। पुत्री त्वत्तः कथं जाता तत्त्वं मे ब्रूहि काश्यप।' तस्मै प्रोवाच भगवान्यथा तच्छृणु पार्थिवा।। (1-92-31)

हिंदी अनुवाद: दुष्यंत ने कहा— "हे महाभागे वरवर्णिनी! भगवान कण्व तो लोकपूजित और ऊर्ध्वरेता (आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले) हैं। संशितव्रत (कठोर व्रतधारी) मुनि अपने व्रत से कभी विचलित नहीं हो सकते, भले ही धर्म ही क्यों न डिग जाए। फिर ऐसी स्थिति में तुम उनकी पुत्री किस प्रकार उत्पन्न हुई? मेरे मन में इस बात का महान संदेह है, अतः तुम मेरे इस संदेह को दूर करने की कृपा करो।" शकुंतला बोली— "हे राजन्! मेरा जन्म जिस प्रकार यहाँ हुआ और प्राचीन काल में जैसी घटना घटी थी, उसे मैं जैसी हूँ और जैसी मुनि की पुत्री हूँ, वैसा सब सच-सच सुनाती हूँ, आप सुनिए। यहाँ एक बार कोई ऋषि आकर मेरे जन्म के विषय में पूछने लगे— 'हे काश्यप! आप तो ऊर्ध्वरेता हैं, फिर यह शकुंतला कहाँ से आई? आपकी यह पुत्री किस प्रकार उत्पन्न हुई? मुझे इसका सत्य बताइए।' तब भगवान कण्व ने उन्हें जो प्रसंग सुनाया था, हे पार्थिव! आप उसे सुनिए।"

व्याख्या: राजा दुष्यंत यह जानकर आश्चर्यचकित होते हैं कि आजानबाहु ब्रह्मचारी महर्षि कण्व की पुत्री शकुंतला कैसे हो सकती है। तब शकुंतला उन्हें अपने जन्म का वास्तविक इतिहास (विश्वामित्र और मेनका की कथा) सुनाने के लिए तैयार होती हैं।

श्लोक 32-38

कण्व उवाच। तप्यमानः किल पुरा विश्वामित्रो महत्तपः। सुभृशं तापयामास शक्रं सुरगणेश्वरम्।। (1-92-32) तपसा दीप्तवीर्योऽयं स्थानान्मां च्यावयेदिति। भीतः पुरन्दरस्तस्मान्मेनकामिदमब्रवीत्।। (1-92-33) गुणैरप्सरसां दिव्यैर्मेनके त्वं विशिष्यसे। श्रेयो मे कुरु कल्याणि यत्त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु।। (1-92-34) असावादित्यशङ्काशो विश्वामित्रो महातपाः। तप्यमानस्तपो घोरं मम कम्पयते मनः।। (1-92-35) मेनके तव भारोऽयं विश्वामित्रः सुमध्यमे। शंसितात्मा सुदुर्धर्ष उग्रे तपसि वर्तते।। (1-92-36) स मां न च्यावयेत्स्थानात्तं वै गत्वा प्रलोभय। चर तस्य तपोविघ्नं कुरु मे प्रियमुत्तमम्।। (1-92-37) रूपयौवनमाधुर्यचेष्टितस्मितभाषणैः। लोभयित्वा वरारोहे तपसस्तं निवर्तय।। (1-92-38)

हिंदी अनुवाद: कण्व जी ने उस ऋषि से कहा— "प्राचीन काल में महर्षि विश्वामित्र ने जब महान तपस्या की, तो उनका वह घोर तप सुरगणों के स्वामी देवराज इंद्र को बहुत अधिक संताप देने लगा। 'अपनी तपस्या के तेज से प्रदीप्त यह महर्षि कहीं मुझे मेरे स्थान (इन्द्रपद) से न हटा दे'—ऐसा सोचकर उनसे भयभीत हुए पुरन्दर (इंद्र) ने मेनका से यह बात कही— 'हे कल्याणि मेनका! तुम दिव्य अप्सराओं के गुणों में सबसे बढ़कर हो। तुम मेरा कल्याण करो और मैं जो कहता हूँ, उसे ध्यान से सुनो। सूर्य के समान तेजस्वी और महातपस्वी ये विश्वामित्र जो घोर तपस्या कर रहे हैं, वह मेरे मन को कंपा रही है। हे सुमध्यमे मेनका! ये शंसितात्मा (संयमी) और सुदुर्धर्ष विश्वामित्र अब तुम्हारे जिम्मे हैं, क्योंकि ये उग्र तपस्या में लगे हुए हैं। ये कहीं मुझे मेरे स्थान से न हटा दें, इसलिए तुम जाकर इन्हें प्रलोभित करो। तुम इनकी तपस्या में विघ्न डालो और मेरा यह उत्तम प्रिय कार्य करो। हे वरारोहे! अपने रूप, यौवन, माधुर्य, चेष्टा, मुस्कान और भाषणों से इन्हें प्रलोभित करके इनकी तपस्या से इन्हें विचलित कर दो।'

व्याख्या: कण्व ऋषि बताते हैं कि कैसे देवराज इंद्र विश्वामित्र की उग्र तपस्या से भयभीत होकर अप्सरा मेनका को उनकी तपस्या भंग करने के लिए पृथ्वी पर भेजते हैं, जिसकी अगली कड़ी में शकुंतला का जन्म होता है।

श्लोक 39-42

मेनकोवाच। महातेजाः स भगवांस्तथैव च महातपाः। कोपनश्च तथा ह्येनं जानाति भगवानपि।। (1-92-39) तेजस्तपसश्चैव कोपस्य च महात्मनः। त्वमप्युद्विजसे यस्य नोद्विजेयमहं कथम्।। (1-92-40) महाभागं वसिष्ठं यः पुत्रैरिष्टैर्व्ययोजयत्। क्षत्रजातश्च यः पूर्वमभवद्ब्राह्मणो बलात्।। (1-92-41) शौचार्थं यो नदीं चक्रे दुर्गमां बहुभिर्जलैः। यां तां पुण्यतमां लोके कौशिकीति विदुर्जनाः।। (1-92-42)

हिंदी अनुवाद: मेनका ने कहा— "वे भगवान (विश्वामित्र) महातेजस्वी, महातपस्वी और अत्यंत क्रोधी स्वभाव के हैं; इस बात को आप (इंद्र) भी भलीभांति जानते हैं। उन महात्मा के तेज, तप और क्रोध से जब आप स्वयं भी भय खाते हैं, तो भला मैं क्यों न भयभीत होऊँ? जो महापुरुष अपने इष्ट पुत्रों से महान वसिष्ठ जी को वियोजित कर चुके हैं, जो पहले क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होकर अपने बल (तपबल) से ब्राह्मण हो गए, और जिन्होंने अपने पवित्र जल से स्नान आदि के लिए एक दुर्गम नदी प्रकट की, जिसे लोग इस संसार में 'कौशिकी' के नाम से जानते हैं..."

व्याख्या: इंद्र जब मेनका को विश्वामित्र की तपस्या भंग करने का आदेश देते हैं, तब मेनका विश्वामित्र के उग्र स्वभाव, असीम तपस्या के तेज और उनके भयानक क्रोध का स्मरण कराते हुए जाने से डरती हैं।

श्लोक 43-46

बभार यत्रास्य पुरा काले दुर्गे महात्मनः। दारान्मतङ्गो धर्मात्मा राजर्षिर्व्याधतां गतः।। (1-92-43) अतीतकाले दुर्भिक्षे अभ्येत्य पुनराक्षमम्। मुनिः पारेति नद्या वै नाम चक्रे तदा प्रभुः।। (1-92-44) मतङ्गं याजयाञ्चक्रे यत्र प्रीतमनाः स्वयम्। त्वं च सोमं भयाद्यस्य गतः पातुं सुरेश्वर।। (1-92-45) चकारान्यं च लोकं वै क्रुद्धो नक्षत्रसंपदा। प्रतिश्रवणपूर्वाणि नक्षत्राणि चकार यः। गुरुशापहतस्यापि त्रिशङ्कोः शरणं ददौ।। (1-92-46)

हिंदी अनुवाद: "...अतीत काल में दुर्भिक्ष के समय धर्मात्मा राजर्षि मतङ्ग, जो व्याध (शिकारी) की योनि को प्राप्त हो गए थे, उन्होंने उस दुर्गे (कठिन समय) में उन महात्मा (विश्वामित्र) की पत्नियों का पालन-पोषण किया था। तब प्रभु विश्वामित्र ने वहाँ आकर उस नदी का नाम 'पारा' रखा और प्रसन्नचित्त होकर स्वयं मतङ्ग को यज्ञ कराया था। हे सुरेश्वर! जिनके भय से आप सोमपान करने भी छिपकर गए थे, तथा क्रोध में आकर जिन्होंने अपनी नक्षत्र-संपदा (नक्षत्रों की नई व्यवस्था) से दूसरा ही लोक बना डाला था, और प्रतिश्रवण (धनिष्ठ्रा) आदि नक्षत्रों की रचना की थी, तथा गुरु के शाप से आहत हुए त्रिशंकु को भी जिन्होंने शरण दे दी थी..."

व्याख्या: मेनका इंद्र को विश्वामित्र के महात्म्य, उनके द्वारा किए गए अद्भुत कार्यों (जैसे त्रिशंकु के लिए नया स्वर्ग बनाना और देवताओं को चुनौती देना) का हवाला देकर अपने मन का भय प्रकट करती हैं।

श्लोक 47-50

ब्रह्मर्षिशापं राजर्षिः कथं मोक्ष्यति कौशिकः। अवमत्य तदा देवैर्यज्ञाङ्गं तद्विनाशितम्।। (1-92-47) अन्यानि च महातेजा यज्ञाङ्गान्यसृजत्प्रभुः। निनाय च तदा स्वर्गं त्रिशङ्कुं स महातपाः।। (1-92-48) एतानि यस्य कर्माणि तस्याहं भृशमुद्विजे। यथाऽसौ न दहेत्क्रुद्धस्तथाऽऽज्ञापय मां विभो।। (1-92-49) तेजसा निर्दहेल्लोकान्कम्पयेद्धरणीं पदा। संक्षिपेच्च महामेरुं तूर्णमावर्तयेद्दिशः।। (1-50)

हिंदी अनुवाद: "...वे कौशिक (विश्वामित्र) ब्रह्मर्षि का शाप कैसे मुक्त करेंगे? देवताओं द्वारा अपमानित किए जाने पर उन्होंने यज्ञ के अंगों को नष्ट कर दिया था और उन महातेजस्वी प्रभु ने दूसरे यज्ञांगों की सृष्टि करके उस महातपा ऋषि के प्रभाव से त्रिशंकु को शरीर सहित स्वर्ग पहुँचा दिया था। ऐसे भयंकर कर्मों वाले महर्षि से मैं बहुत अधिक भयभीत हूँ। हे विभो! आप मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे वे क्रुद्ध होकर मुझे जला न डालें।"

व्याख्या: मेनका इंद्र से कहती हैं कि विश्वामित्र इतने शक्तिशाली हैं कि वे अपने तेज से तीनों लोकों को जला सकते हैं, पृथ्वी को कंपा सकते हैं और सुमेरु पर्वत तक को छोटा कर सकते हैं, इसलिए उनके सामने जाना मृत्यु के समान है।

श्लोक 51-56

तादृशं तपसा युक्तं प्रदीप्तमिव पावकम्। कथमस्मद्विधा नारी जितेन्द्रियमभिस्पृशेत्।। (1-92-51) हुताशनमुखं दीप्तं सूर्यचन्द्राक्षितारकम्। कालजिह्वं सुरश्रेष्ठ कथमस्मद्विधा स्पृशेत्।। (1-52) यमश्च सोमश्च महर्षयश्च साध्या विश्वे वालस्विल्याश्च सर्वे। एतेऽपि यस्योद्विजन्ते प्रभावा- त्तस्मात्कस्मान्मादृशी नोद्विजेत।। (1-92-53) त्वयैवमुक्ता च कथं समीप- मृषेर्न गच्छेयमहं सुरेन्द्र। रक्षां च मे चिन्तय देवराज यथा त्वदर्थं रक्षिताऽहं चरेयम्।। (1-92-54) कामं तु मे मारुतस्तत्र वासः प्रक्रीडिताया विवृणोतु देव। भवेच्च मे मन्मथस्तत्र कार्ये सहायभूतस्तु तव प्रसादात्।। (1-92-55) वनाच्च वायुः सुरभिः प्रवाया- त्तस्मिन्काले तमृषिं लोभयन्त्याः। तथेत्युक्त्वा विहिते चैव तस्मिं- ततो ययौ साऽऽश्रमं कौशिकस्य।। (1-92-56)

हिंदी अनुवाद: "तपस्या से युक्त, प्रज्वलित अग्नि के समान जितेन्द्रिय महर्षि के समीप मुझ जैसी स्त्री कैसे जा सकती है? हे सुरश्रेष्ठ! प्रज्वलित अग्नि के मुख, सूर्य-चंद्रमा रूपी नेत्रों और काल की जिह्वा वाले उनके पास मुझ जैसी दुर्बल नारी कैसे फटक सकती है? यम, सोम, महर्षिगण, साध्यगण, विश्वेदेव और बालखिल्य ऋषि तक जिनके प्रभाव से भय खाते हैं, ऐसी स्थिति में मुझ जैसी स्त्री क्यों न डरे? तथापि हे सुरेन्द्र! आपके इस प्रकार कहने पर मैं उन ऋषि के पास क्यों न जाऊँ? हे देवराज! आप मेरी ऐसी रक्षा का उपाय सोचिए, जिससे मैं आपके कार्य के लिए सुरक्षित रहकर वहाँ विचर सकूँ। हे देव! क्रीड़ा करती हुई मुझ पर वहाँ पवन देवता अपनी सुगंधित वायु से मेरे वस्त्रों को खोलें, और आपकी कृपा से कामदेव उस कार्य में मेरे सहायक बनें।" ऐसा कहकर और सारी व्यवस्था करके मेनका विश्वामित्र के आश्रम की ओर प्रस्थान कर गई।

व्याख्या: इंद्र के आदेश पर मेनका अपनी रक्षा और कामदेव तथा वायु की सहायता का वर माँगकर विश्वामित्र की तपस्या को भंग करने के लिए उनके आश्रम की ओर चल देती हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि

संभवपर्वणि द्विनवतितमोऽध्यायः।। 92 ।।

संभवपर्वणि एकनवतितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि त्रिनवतितमोऽध्यायः