श्लोक 1-4
वैशंपायन उवाच। ततो मृगसहस्राणि हत्वा सबलवाहनः। तत्र मेघघनप्रख्यं सिद्धचारणसेवितम्।। (1-91-1) वनमालोकयामास नगराद्योजनद्वये। मृगाननुचरन्वन्याञ्श्रमेण परिपीडितः।। (1-91-2) मृगाननुचरन्राजा वेगेनाश्वानचोदयत्। राजा मृगप्रसङ्गेन वनमन्यद्विवेश ह।। (1-91-3) एक एवोत्तमबलः क्षुत्पिपासाश्रमान्वितः। स वनस्यान्तमासाद्य महच्छून्यं समासदत्।। (1-91-4)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तदनन्तर, सेना और वाहनों सहित हजारों मृगों को मारकर, राजा ने नगर से दो योजन की दूरी पर मेघों के समान सघन और सिद्ध-चारणों द्वारा सेवित उस वन को देखा। जंगली हिरणों का पीछा करते हुए राजा थकान से पीड़ित हो गए थे। मृगों के मोह में पड़कर राजा ने तेजी से अपने घोड़ों को हाँका और वे शिकार के प्रसंग में एक अन्य सघन वन में प्रवेश कर गए। उत्तम बल वाले वे अकेले ही भूख-प्यास और थकान से युक्त होकर वन के अंतभाग में जा पहुँचे और एक विशाल, शून्य (निर्जन) स्थान पर जा निकले।
व्याख्या: शिकार के उत्साह में राजा दुष्यंत अपनी सेना से बिछुड़ जाते हैं और अकेले ही भूख-प्यास व थकान से जूझते हुए एक शांत और निर्जन वन के छोर पर पहुँच जाते हैं।
श्लोक 5-10
तच्चाप्यतीत्य नृपतिरुत्तमाश्रमसंयुतम्। मनःप्रह्लादजननं दृष्टिकान्तमतीव च।। (1-91-5) सीतमारुतसंयुक्तं जगामान्यन्महद्वनम्। पुष्पितैः पादपैः कीर्णमतीव सुखशाद्वलम्।। (1-91-6) विपुलं मधुरारावैर्नादितं विहगैस्तथा। पुंस्कोकिलनिनादैश्च झिल्लीकगणनादितम्।। (1-91-7) प्रवृद्धविटपैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम्। षट्पदाघूर्णिततलं लक्ष्म्या परमया युतम्।। (1-91-8) नापुष्पः पादपः कश्चिन्नाफलो नापि कण्टकी। षट्पदैर्नाप्यपाकीर्णस्तस्मिन्वै काननेऽभवत्।। (1-91-9) विगहैर्नादितं पुष्पैरलङ्कृतमतीव च। सर्वर्तुकुसुमैर्वृक्षैः सुखच्छायैः समावृतम्।। (1-91-10)
हिंदी अनुवाद: उस स्थान को भी पार करके राजा एक अन्य उत्तम आश्रम से युक्त, मन को आनंद देने वाले, देखने में अत्यंत सुंदर, शीतल वायु से सुयुक्त तथा खिले हुए वृक्षों और सुखद हरियाली (घास) से भरे हुए एक महान वन में गए। वह वन पक्षियों की मधुर आवाज़ों, नर कोकिलों की कूक और झींगुरों के समूह के नाद से गूँज रहा था। वहाँ फैली हुई शाखाओं वाले, सुखद छाया प्रदान करने वाले वृक्ष थे, जिनकी भूमि भंवरों की गूँज से सुशोभित थी और जो परम लक्ष्मी (शारीरिक-प्राकृतिक सौंदर्य) से युक्त था। उस कानन में कोई भी ऐसा वृक्ष नहीं था जो बिना फूल का हो, बिना फल का हो, काँटेदार हो, या जिस पर भंवरे न मंडरा रहे हों। वह पक्षियों से मुखरित और फूलों से अत्यंत अलंकृत था, तथा सभी ऋतुओं के फूलों वाले सुखद छायादार वृक्षों से घिरा हुआ था।
व्याख्या: राजा दुष्यंत जिस नए वन क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, उसका प्राकृतिक सौंदर्य और दिव्य वातावरण नंदनकानन के समान मनमोहक तथा शांतिदायक है।
श्लोक 11-15
मनोरमं सहेष्वासो विवेश वनमुत्तमम्। मारुता कलितास्तत्र द्रुमाः कुसुमशाखिनः।। (1-91-11) पुष्पवृष्टिं विचित्रां तु व्यसजंस्ते पुनः पुनः। दिवस्पृशोऽथ संघुष्टाः पक्षिभिर्मधुरस्वनैः।। (1-91-12) विरेजुः पादपास्तत्र विचित्रकुसुमाम्बराः। तेषां तत्र प्रवालेषु पुष्पभारावनामिषु।। (1-91-13) रुवन्ति रावान्मधुरान्षट्पदा मधुलिप्सवः। तत्र प्रदेशांश्च बहून्कुसुमोत्करमण्डितान्।। (1-91-14) लतागृहपरिक्षिप्तान्मनसः प्रीतिवर्धनान्। संपश्यन्सुमहातेजा बभूव मुदितस्तदा।। (1-91-15)
हिंदी अनुवाद: धनुर्धर महातेजस्वी राजा दुष्यंत ने उस मनोरम उत्तम वन में प्रवेश किया। हवा के झोंकों से हिलते हुए फूलों से लदे वे वृक्ष बार-बार एक विचित्र पुष्प-वर्षा कर रहे थे। आकाश को छूने वाले और मधुर स्वर वाले पक्षियों से गुंजित वे वृक्ष भांति-भांति के फूलों के वस्त्र पहने हुए से सुशोभित हो रहे थे। फूलों के भार से झुकी हुई उनकी नई कोपलों पर रस की लालसा वाले भंवरे मधुर गुंजार कर रहे थे। फूलों के ढेरों से मंडित, लता-गृहों से घिरे हुए और मन को प्रसन्नता देने वाले अनेक प्रदेशों को देखते हुए वे महातेजा राजा अत्यंत मुदित (प्रसन्न) हो गए।
व्याख्या: वन की अलौकिक सुंदरता और पुष्प-वर्षा करने वाले वृक्षों का यह सौंदर्य थके-हारे राजा की थकान को दूर कर उनके मन को प्रफुल्लित कर देता है।
श्लोक 16-20
परस्पराश्लिष्टशाखैः पादपैः कुसुमान्वितैः। अशोभत वनं तत्तु महेन्द्रध्वजसन्निभैः।। (1-91-16) सिद्धचारणसङ्घैश्च गन्धर्वाप्सरसां गणैः। सेवितं वनमत्यर्थं मत्तवानरकिन्नरैः।। (1-91-17) सुखः शीतः सुगन्धी च पुष्परेणुवहोऽनिलः। परिक्रामन्वने वृक्षानुपैतीव रिरंसया।। (1-91-18) एवंगुणसमायुक्तं ददर्श स वनं नृपः। नदीकच्छोद्भं कान्तमुच्छ्रितध्वजसन्निभम्।। (1-91-19) प्रेक्षमाणो वनं तत्तु सुप्रहृष्टविहङ्गमम्। आश्रमप्रवरं रम्यं ददर्श च मनोरमम्।। (1-91-20)
हिंदी अनुवाद: आपस में लिपटी शाखाओं वाले और फूलों से लदे हुए उन वृक्षों से वह वन देवराज इंद्र की ध्वजा के समान सुशोभित हो रहा था। वह वन सिद्धों और चारणों के संघों, गंधर्वों व अप्सराओं के गणों, तथा मत्त वानरों और किन्नरों द्वारा अत्यधिक सेवित था। सुखद, शीतल, सुगंधित और फूलों के पराग को ढोने वाली वायु वन के वृक्षों के चारों ओर ऐसे घूम रही थी मानो प्रेम-क्रीड़ा की इच्छा रखती हो। इन समस्त गुणों से युक्त उस वन को राजा ने देखा। नदी के तटों पर उत्पन्न, ऊँची ध्वजा के समान कांत और प्रसन्न पक्षियों से युक्त उस मनोरम वन को देखते हुए राजा ने एक अत्यंत श्रेष्ठ और रमणीय आश्रम देखा।
व्याख्या: वन के भीतर का यह दिव्य और पवित्र परिवेश मुनियों के वास स्थल यानी आश्रम की उपस्थिति का संकेत देता है, जिसे राजा दुष्यंत अपनी दृष्टि से निहारते हैं।
श्लोक 21-25
नानावृक्षसमाकीर्णं संप्रज्वलितपावकम्। तं तदाऽप्रतिमं श्रीमानाश्रमं प्रत्यपूजयत्।। (1-91-21) यतिभिर्वालखिल्यैश्च वृतं मुनिगणान्वितम्। अग्न्यगारैश्च बहुभिः पुष्पसंस्तरसंस्तृतम्।। (1-91-22) महाकच्छैर्बृहद्भिश्च विभ्राजितमतीव च। मालिनीमभितो राजन्नदीं पुण्यां सुखोदकाम्।। (1-91-23) नैकपक्षिगणाकीर्णां तपोवनमनोरमाम्। तत्रव्यालमृगान्सैम्यान्पश्यन्प्रीतिमवाप सः।। (1-91-24) तं चाप्रतिरथः श्रीमानाश्रमं प्रत्यपद्यत। देवलोकप्रतीकाशं सर्वतः सुमनोहरम्।। (1-91-25)
हिंदी अनुवाद: विभिन्न प्रकार के वृक्षों से घिरे हुए और प्रज्वलित अग्नि (यज्ञाग्नि) से युक्त उस अप्रतिम एवं श्रीमान आश्रम को राजा ने प्रणाम किया (उसकी पूजा की)। वह आश्रम यतियों, बालखिल्य ऋषियों और अन्य मुनिगणों से घिरा हुआ था। वहाँ अनेक अग्न्यगार (यज्ञशालाएँ) थीं और भूमि फूलों के बिस्तरों से ढकी हुई थी। हे राजन्! वह आश्रम महान और विशाल तटों वाली, पवित्र तथा सुखद जल वाली मालिनी नदी के दोनों ओर अत्यंत शोभा दे रहा था। वह नदी अनेक पक्षी-समूहों से आक्रांत और तपोवन के रूप में मनोरम थी। वहाँ शांत स्वभाव के वन्य जीवों और मृगों को देखकर राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई। अप्रतिरथ (शत्रुओं को रोकने वाले) और श्रीमान राजा दुष्यंत देवलोक के समान सर्वत्र सुंदर उस आश्रम में जा पहुँचे।
व्याख्या: राजा दुष्यंत घूमते-घूमते महर्षि कण्व के उस पवित्र और शांत तपोवन में पहुँच जाते हैं, जो मालिनी नदी के तट पर स्थित है और जहाँ प्रकृति तथा आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम है।
श्लोक 26-30
नदीं चाश्रमसंश्लिष्टां पुण्यतोयां ददर्श सः। सर्वप्राणभृतां तत्र जननीमिव धिष्ठिताम्।। (1-91-26) सचक्रवाकपुलिनां पुष्पफेनप्रवाहिनीम्। सकिन्नरगणावासां वारनर्क्षनिषेविताम्।। (1-91-27) पुण्यस्वाध्यायसंघुष्टा पुलिनैरुपशोभिताम्। मत्तवारणशार्दूलभुजगेन्द्रनिषेविताम्।। (1-91-28) तस्यास्तीरे भगवतः काश्यपस्य महात्मनः। आश्रमप्रवरं रम्यं महर्षिगणसेवितम्।। (1-91-29) नदीमाश्रमसंबद्धां दृष्ट्वाश्रमपदं तथा। चकाराभिप्रवेशाय मतिं स नृपतिस्तदा।। (1-91-30)
हिंदी अनुवाद: राजा ने आश्रम से सटी हुई, पवित्र जल वाली और समस्त प्राणियों की माता के समान स्थित उस नदी को देखा। वह चक्रवाक पक्षियों से युक्त तटों वाली, फूलों के फेन को बहाने वाली, किन्नर समूहों के निवास से तथा जल-जंतुओं से सेवित थी। वह पवित्र वेदों के स्वाध्याय की ध्वनियों से गूँजती हुई और सुंदर तटों से सुशोभित थी, जहाँ मत्त हाथी, बाघ और बड़े सर्प भी विचरते थे। उसी नदी के तट पर भगवान महात्मा काश्यप (कण्व) का महर्षिगणों द्वारा सेवित वह अत्यंत रमणीय श्रेष्ठ आश्रम था। नदी और आश्रम के इस पावन स्वरूप को देखकर राजा ने उस आश्रम में प्रवेश करने का मन बनाया।
व्याख्या: राजा दुष्यंत मालिनी नदी और महर्षि कण्व (काश्यप) के इस दिव्य व शांत तपोवन के प्राकृतिक वैभव से मुग्ध होकर अंदर प्रवेश करने का निर्णय लेते हैं।
श्लोक 31-35
अलङ्कृतं द्वीपवत्या मालिन्या रम्यतीरया। नरनारायणस्थानं गङ्गयेवोपशोभितम्।। (1-91-31) मत्तबर्हिणसंघुष्टं प्रविवेश महद्वनम्। तत्स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरर्षभः।। (1-91-32) अतीव गुणसंपन्नमनिर्देश्यं च वर्चसा। महर्षिं काश्यपं द्रष्टुमथ कण्वं तपोधनम्।। (1-91-33) ध्वजिनीमश्वसंबाधां पदातिगजसङ्कुलाम्। अवस्थाप्य वनद्वारि सेनामिदमुवाच सः।। (1-91-34) मुनिं विरजसं द्रष्टुं गमिष्यामि तपोधनम्। काश्यपं स्थीयतामत्र यावदागमनं मम।। (1-91-35)
हिंदी अनुवाद: सुंदर तटों वाली मालिनी नदी से अलंकृत वह आश्रम ऐसा सुशोभित हो रहा था जैसे गंगाजी से नर-नारायण का स्थान सुशोभित होता हो। मत्त मयूरों की गूँज वाले उस महद्वन और नंदनकानन के समान सुंदर स्थान पर पहुँचकर नरर्षभ दुष्यंत ने अतीव गुणसंपन्न तथा अपने तेज से अप्रमेय तपोधन महर्षि कण्व (काश्यप) के दर्शन करने की इच्छा की। घोड़ों, हाथियों और पैदल सैनिकों से भरी अपनी विशाल सेना को वन के द्वार पर ही रोककर उन्होंने सेना से कहा— "मैं तपोधन और निष्कलुष मुनि काश्यप (कण्व) के दर्शन करने जा रहा हूँ, अतः मेरे लौटने तक तुम सब यहीं ठहरौ।"
व्याख्या: तपोवन की पवित्रता का सम्मान करते हुए राजा दुष्यंत अपनी सेना को वन के द्वार पर ही रोक देते हैं और अकेले या सीमित सहयोगियों के साथ भीतर जाने का निर्णय लेते हैं।
श्लोक 36-39
तद्वनं नन्दनप्रख्यमासाद्य मनुजेश्वरः।। क्षुत्पिपासे जहौ राजा मुदं चावाप पुष्कलाम्।। (1-91-36) सामात्यो राजलिङ्गानि सोपनीय नराधिपः। पुरोहितसहायश्च जगामाश्रममुत्तमम्।। (1-91-37) दिदृक्षुस्तत्र तमृषिं तपोराशिमथाव्ययम्। ब्रह्मलोकप्रतीकाशमाश्रमं सोऽभिवीक्ष्य ह। षट्पदोद्गीतसंघुष्टं नानाद्विजगणायुतम्।। (1-91-38) विस्मयोत्फुल्लनयनो राजा प्रीतो बभूवह।
हिंदी अनुवाद: नंदनकानन के समान उस वन में पहुँचते ही राजा की क्षुधा और पिपासा (भूख-प्यास) शांत हो गई और उन्हें प्रचुर आनंद की प्राप्ति हुई। मन्त्रियों और पुरोहित को साथ लेकर, तथा अपने राजसी चिन्हों (आभूषणों आदि) को उतारकर वे नराधिप उस उत्तम आश्रम में गए। ब्रह्मलोक के समान प्रतीत होने वाले, भंवरों के गीत और नाना प्रकार के पक्षियों के समूहों से गुंजायमान उस आश्रम में अक्षय तपोराशि उन महर्षि के दर्शन की इच्छा से राजा विस्मय और प्रसन्नता से खुले नेत्रों वाले हो गए।
व्याख्या: तपोवन के दिव्य प्रभाव से राजा की सारी थकान और भूख-प्यास मिट जाती है। वे अपने राजसी अहंकार और आभूषणों को त्यागकर एक साधारण साधक की भाँति उस पवित्र आश्रम में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 39-43
ऋचो बह्वृचमुख्यैश्च प्रेर्यमाणाः पदक्रमैः। शुश्राव मनुजव्याघ्रो विततेष्विह कर्मसु।। (1-91-39) यज्ञविद्याङ्गविद्भिश्च यजुर्विद्भिश्च शोभितम्। मधुरैः सामगीतैश्च ऋषिभिर्नियतव्रतैः।। (1-91-40) भारुण्डसामगीताभिरथर्वशिरसोद्गतैः। यतात्मभिः सुनियतैः शुशुभे स तदाश्रमः।। (1-91-41) अथर्ववेदप्रवराः पूगयज्ञियसामगाः। संहितामीरयन्ति स्म पदक्रमयुतां तु ते।। (1-91-42) शब्दसंस्कारसंयुक्तर्ब्रुवद्भिश्चापरैर्द्विजैः। नादितः स बभौ श्रीमान्ब्रह्मलोक इवापरः।। (1-91-43)
हिंदी अनुवाद: मनुजव्याघ्र राजा ने यज्ञ-कर्मों के अवसर पर मुख्य ऋग्वेदियों द्वारा पद और क्रम के साथ उच्चारित की जाने वाली ऋचाओं को सुना। वह आश्रम यज्ञ की विभिन्न विद्याओं के अंगों के ज्ञाताओं, यजुर्वेद के वेत्ताओं तथा नियत व्रतों वाले ऋषियों के मधुर सामगान से शोभित था। संयमी और जितेन्द्रिय ऋषियों द्वारा अथर्ववेद के शिरोभाग से उद्गत भारुण्ड साम के गीतों से वह आश्रम सुशोभित हो रहा था। अथर्ववेद के श्रेष्ठ ज्ञाता तथा यज्ञीय साम गाने वाले विद्वान पद और क्रम से युक्त संहिताओं का उच्चारण कर रहे थे। शुद्ध शब्द-संस्कारों से युक्त वाणियों का उच्चारण करते हुए अन्य द्विजों से गूँजता हुआ वह श्रीमान आश्रम दूसरे ब्रह्मलोक के समान सुशोभित हो रहा था।
व्याख्या: आश्रम के भीतर चारों तरफ वेदों की ऋचाओं, सामवेद के मधुर गान और यज्ञीय मंत्रों के सस्वर पाठ की ध्वनियाँ गूँज रही थीं, जिससे पूरा वातावरण अध्यात्ममय हो गया था।
श्लोक 44-48
यज्ञसंस्तरविद्भिश्च क्रमशिक्षाविशारदैः। न्यायतत्त्वात्मविज्ञानसंपन्नैर्वेदपारगैः।। (1-91-44) नानावाक्यसमाहारसमवायविशारदैः। विशेषकार्यविद्भिश्च मोक्षधर्मपरायणैः।। (1-91-45) स्तापनाक्षेपसिद्धान्तपरमार्थज्ञतां गतैः। शब्दच्छन्दोनिरुक्तज्ञैः कालज्ञानविशारदैः।। (1-91-46) द्रव्यकर्मगुणज्ञैश्च कार्यकारणवेदिभिः। पक्षिवानररुतज्ञैश्च व्यासग्रन्थसमाश्रितैः।। (1-91-47) नानाशास्त्रेषु मुख्यैश्च शुश्राव स्वनमीरितम्। लोकायतिकमुख्यैश्च समन्तादनुनादितम्।। (1-91-48)
हिंदी अनुवाद: वहाँ यज्ञ की वेदी और बिस्तरों के मर्मज्ञ, क्रम और शिक्षा के विशेषज्ञ, न्याय, तत्त्व और आत्मज्ञान से संपन्न, वेद के पारंगत विद्वान थे। वे विभिन्न वाक्यों के संकलन, विशेष कार्यों के ज्ञाता और मोक्षधर्म के परायण थे। वे स्थापना, आक्षेप, सिद्धांत और परमार्थ के मर्म को जानने वाले, शब्द, छंद, निरुक्त और काल के ज्ञान में विशारद थे। द्रव्य, कर्म और गुणों के ज्ञाता, कार्य-कारण के वेत्ता, पक्षियों और वानरों की बोलियों को समझने वाले तथा व्यास ग्रंथों का आश्रय लेने वाले थे। विभिन्न मुख्य शास्त्रों के उच्चारित स्वर और लोकायत (दर्शन) के मुख्य आचार्यों की चर्चाओं से वह स्थान चारों ओर से गुंजायमान था।
व्याख्या: यहाँ तपोवन के ऋषियों और मुनियों की विद्वत्ता का व्यापक वर्णन है, जो व्याकरण, न्याय, ज्योतिष, वेद-वेदांग, दर्शन और लोकविद्या के महान पंडित थे।
श्लोक 49-53
तत्रतत्र च विप्रेन्द्रान्नियतान्संशितव्रतान्। जपहोमपरान्विप्रान्ददर्श परवीरहा।। (1-91-49) आसनानि विचित्राणि रुचिराणि महीपतिः। प्रयत्नोपहितानि स्म दृष्ट्वा विस्मयमागमत्।। (1-91-50) देवतायतनानां च प्रेक्ष्य पूजां कृतां द्विजैः। ब्रह्मलोकस्थमात्मानं मेने स नृपसत्तमः।। (1-91-51) स काश्यपतपोगुप्तमाश्रमप्रवरं शुभम्। नातृप्यत्प्रेक्षमाणो वै तपोवनगुणैर्युतम्।। (1-91-52) स काश्यपास्ययतनं महाव्रतै- र्वृतं समान्तादृषिभिस्तपोधनैः। विवेश सामात्यपुरोहितोऽरिहा विविक्तमत्यर्थमनोहरं शुभम्।। (1-91-53)
हिंदी अनुवाद: शत्रुओं का नाश करने वाले उन राजा ने जगह-जगह संयमी, संशितव्रत (कठोर व्रत वाले), जप और होम में तत्पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखा। वहाँ यत्नपूर्वक रखे गए विभिन्न सुंदर आसनों को देखकर महीपति विस्मय में पड़ गए। ब्राह्मणों द्वारा देवताओं के आयतनों (मंदिरों/स्थानों) की की जाने वाली पूजा को देखकर उस नृपसत्तम ने अपने को मानो ब्रह्मलोक में स्थित मान लिया। महर्षि काश्यप (कण्व) के तप से सुरक्षित उस शुभ और तपोवन के गुणों से युक्त श्रेष्ठ आश्रम को देखते-देखते उनकी तृप्ति नहीं हो रही थी। महान व्रतों और तपोधन ऋषियों से चारों ओर से घिरे हुए, अत्यंत विविक्त (शांत), मनोहर और शुभ ऐसे काश्यप (कण्व) के उस आश्रम में मन्त्रियों और पुरोहित के साथ शत्रुहंता राजा ने प्रवेश किया।
व्याख्या: राजा दुष्यंत तपोवन के अलौकिक अनुशासन, ऋषियों की साधना और पवित्रता को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं और अपने मंत्रियों व पुरोहित के साथ महर्षि कण्व की कुटी (आश्रम) के अंदर प्रवेश करते हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि एकनवतितमोऽध्यायः।। 91 ।।
