श्लोक 1-3
जनमेजय उवाच। संभवं भरतस्याहं चरितं च महामतेः। शकुन्तलायाश्चोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।। (1-90-1) दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला। तं वै पुरुषसिंहस्य भगवन्विस्तरं त्वहम्।। (1-90-2) श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्वं मतिमतां वर। (1-90-3)
हिंदी अनुवाद: जनमेजय ने कहा— हे महामते! मैं महामनस्वी भरत के जन्म, उनके चरित्र तथा शकुंतला की उत्पत्ति के विषय में यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ। हे भगवन्! वीर दुष्यंत ने शकुंतला को किस प्रकार प्राप्त किया? हे तत्त्वज्ञ और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! पुरुषसिंह दुष्यंत का वह सारा इतिहास मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ।
व्याख्या: राजा जनमेजय शकुंतला के जन्म, उनके और दुष्यंत के मिलन की कथा तथा सम्राट भरत के प्राकट्य के ऐतिहासिक प्रसंग को पूरी तल्लीनता और विस्तार से जानने की इच्छा प्रकट करते हैं।
श्लोक 3-8
वैशंपायन उवाच। स कदाचिन्महाबाहुः प्रभूतबलवाहनः।। (1-90-3) वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृतः। बलेन चतुरङ्गेण वृतः परमवल्गुना।। (1-90-4) खड्गशक्तिधरैर्वीरैर्गदामुसलपाणिभिः। प्रासतोमरहस्तैश्च ययौ योधशतैर्वृतः।। (1-90-5) सिंहनादैश्च योधानां शङ्खदुनदुभिनिःस्वनैः। रथनेमिस्वनैश्चैव सनागवरबृंहितैः।। (1-90-6) नानायुधधरैश्चापि नानावेषधरैस्तथा। ह्रेषितस्वनमिश्रैश्च क्ष्वेडितास्फोटितस्वनैः।। (1-90-7) आसीत्किलकिलाशब्दस्तस्मिन्गच्छति पार्थिवे। (1-90-8)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— महाबाहु राजा दुष्यंत एक समय अपनी प्रचुर सेना और वाहनों के साथ सैकड़ों घोड़ों और हाथियों से घिरे हुए तथा अत्यंत सुंदर चतुरङ्गिणी सेना (पैदल, घुड़सवार, रथ और हाथी) के साथ एक सघन वन की ओर गए। तलवार और शक्ति धारण करने वाले, हाथों में गदा और मूसल तथा प्रास (भाले) और तोमर लिए हुए सैकड़ों वीर योद्धा उनके साथ थे। योद्धाओं के सिंहनाद, शंख और नगाड़ों की गूँज, रथों के पहियों की आवाज, श्रेष्ठ हाथियों की चिंघाड़, तथा विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और वेषभूषा धारण किए सैनिकों के कोलाहल से वह पूरा मार्ग गूँज उठा। घोड़ों की हिनहिनाहट और योद्धाओं की हुंकार के बीच जब वे पृथ्वीपति आगे बढ़ रहे थे, तब वहाँ चारों ओर भारी किलकिलाशब्द हो रहा था।
व्याख्या: राजा दुष्यंत के वॉक-आउट (शिकार या वन-विहार यात्रा) का भव्य और पराक्रमी दृश्य यहाँ प्रस्तुत किया गया है, जहाँ उनकी विशाल चतुरङ्गिणी सेना के साथ प्रस्थान करने का रोमांचक वर्णन है।
श्लोक 8-12
प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया नृपशोभया।। (1-90-8) ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम्। शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम्।। (1-90-9) पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं स्म मेनिरे। अयं स पुरुषव्याघ्रो रणे वसुपराक्रमः।। (1-90-10) यस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः। इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा नराधिपं।। (1-90-11) तुष्टुवुः पुष्पवृष्टीश्च ससृजुस्तस्य मूर्धनि। (1-90-12)
हिंदी अनुवाद: राजमहलों और ऊँचे शिखरों पर खड़ी स्त्रियाँ उस उत्तम राजशोभा से युक्त, शूरवीर, अपने यश को बढ़ाने वाले, देवराज इंद्र के समान, शत्रुओं का नाश करने वाले और शत्रु रूपी हाथियों को रोकने में सिंह के समान पराक्रमी राजा दुष्यंत को देख रही थीं। उन स्त्री-समूहों ने उन्हें देखकर ऐसा माना मानो साक्षात् वज्रपाणि (इंद्र) ही जा रहे हों। वे आपस में प्रेमपूर्वक कहने लगीं— 'ये वही पुरुषव्याघ्र हैं, जिनका पराक्रम युद्ध में अद्भुत है और जिनके बाहुबल के आगे कोई भी शत्रु टिक नहीं सकता।' ऐसा कहकर उन स्त्रियों ने प्रेमपूर्वक राजा की स्तुति की और उनके मस्तक पर फूलों की वर्षा की।
व्याख्या: नगर की स्त्रियाँ और प्रजा अपने प्रतापी राजा दुष्यंत की झाँकी को देखकर मुग्ध हो जाती हैं और उनकी तुलना देवराज इंद्र से करते हुए उनपर पुष्प वर्षा करती हैं।
श्लोक 12-16
तत्रतत्र च विप्रेन्द्रैः स्तूयमानः समन्ततः।। (1-90-12) निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया। तं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम्।। (1-90-13) द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे। ददृशुर्वर्धमानास्ते आशीर्भिश्च जयेन च।। (1-90-14) सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा। न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह।। (1-90-15) सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिपः। महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा।। (1-90-16)
हिंदी अनुवाद: मार्ग में जगह-जगह श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा स्तुति किए जाते हुए वे राजा अत्यंत प्रसन्नता के साथ मृग-वध (शिकार) की इच्छा से वन के लिए प्रस्थान कर गए। देवराज इंद्र के समान मत्त हाथी की सवारी पर निकले उन राजा के पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—चारों वर्णों के लोग गए। वे सब जय-जयकार और आशीर्वाद देते हुए उनके साथ आगे बढ़े। नगर और जनपद के लोग बहुत दूर तक उनके पीछे गए और राजा की आज्ञा पाकर फिर वापस लौटे। गरुड़ के समान वेगवान अपने दिव्य रथ पर सवार होकर वसुधाधिप दुष्यंत ने अपने रथ के गंभीर घोष से पृथ्वी और स्वर्गलोक दोनों को गुंजायमान कर दिया।
व्याख्या: राजा दुष्यंत प्रजा और ब्राह्मणों के आशीर्वाद के साथ आखेट (शिकार) के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं, जहाँ उनके रथ की गड़गड़ाहट से संपूर्ण दिशाएँ गूँज उठती हैं।
श्लोक 17-20
स गच्छन्ददृशे धीमान्नन्दनप्रतिमं वनम्। बिल्वार्कखदिराकीर्णं कपित्थधवसंकुलम्।। (1-90-17) विषमं पर्वतस्रस्तै रश्मभिश्च समावृतम्। निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम्।। (1-90-18) मृगसिंहैर्वृतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः। तद्वनं मनुजव्याघ्रः सभृत्यबलवाहनः।। (1-90-19) लोडयामास दुष्यन्तः सूदयन्विविधान्मृगान्न। बाणगोचरसंप्राप्तांस्तत्र व्याघ्रगणान्बहून्।। (1-90-20)
हिंदी अनुवाद: आगे बढ़ते हुए बुद्धिमान राजा दुष्यंत ने देवराज इंद्र के नन्दन कानन के समान एक सुंदर वन को देखा, जो बेल, आक, खदिर (खैर), कैथ और धव के वृक्षों से भरा हुआ था। पर्वतों से घिरे होने के कारण वह क्षेत्र ऊबड़-खाबड़, अनेक योजन तक फैला हुआ, निर्जल और मनुष्य-रहित था। वह भयानक सिंहों, मृगों और अन्य जंगली जीवों से भरा हुआ था। अपने सेवकों, सेना और वाहनों के साथ उन मनुजव्याघ्र दुष्यंत ने उस वन में प्रवेश किया और अपने बाणों के निशाने पर आने वाले विभिन्न प्रकार के मृगों तथा बाघों का वध करते हुए उस वन को मथ डाला (वहाँ विचरने लगे)।
व्याख्या: राजा दुष्यंत अपनी सेना के साथ एक घने, निर्जन और वन्य जीवों से भरे वन में पहुँचते हैं, जहाँ वे शिकार करते हुए अपनी वीरता का परिचय देते हैं।
श्लोक 21-24
पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकैः। दूरस्थान्सायकैः कांश्चिदभिनत्स नराधिपः।। (1-90-21) अभ्याशमागतांश्चान्यान्खड्गेन निरकृन्तत। कांश्चिदेणान्समाजघ्ने शक्त्या शक्तिमतां वरः।। (1-90-22) गदामण्डलतत्त्वज्ञश्चचारामितविक्रमः। तोमरैरसिभिश्चापि गदामुसलकम्पनैः।। (1-90-23) चचार स विनिघ्नन्वै वन्यांस्तत्र मृगद्विजान्। राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधैश्च समरप्रियैः।। (1-90-24)
हिंदी अनुवाद: राजा दुष्यंत ने अपने बाणों से वन्य जीवों को जमीन पर गिरा दिया और उन्हें बींध डाला। उन नराधिप ने दूर खड़े कुछ पशुओं को अपने बाणों से छिन्न-भिन्न कर दिया। जो अन्य जीव निकट आ गए, उन्हें शक्तिमानों में श्रेष्ठ दुष्यंत ने अपनी तलवार से काट डाला और कुछ हिरणों को शक्ति (हथियार) से मार गिराया। गदा-युद्ध के रहस्यों को जानने वाले अमित पराक्रमी राजा ने तोमर, तलवार, गदा और मूसल को हिलाते हुए तथा समरप्रिय योद्धाओं के साथ वन में विचरते हुए वहाँ के विभिन्न वन्य जीवों और पक्षियों का संहार किया।
व्याख्या: राजा दुष्यंत की अस्त्र-शस्त्रों में निपुणता और उनके भीषण पराक्रम का वर्णन यहाँ किया गया है, जहाँ वे तीर, तलवार, गदा और शक्ति जैसे आयुधों से निपुणतापूर्वक शिकार करते हैं।
श्लोक 25-28
लोड्यमानं महारण्यं तत्यजुः स्म मृगाधिपाः। तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च।। (1-90-25) मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्ततः। शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिताः।। (1-90-26) व्यायामक्लान्तहृदयाः पतन्ति स्म विचेतसः। क्षुत्पिपासापरीताश्च श्रान्ताश्च पतिता भुवि।। (1-90-27) केचित्तत्र नरव्याघ्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितैः। केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचराः।। (1-90-28)
हिंदी अनुवाद: राजा द्वारा मथे जा रहे उस महारण्य को बड़े-बड़े मृगों और सिंहों ने छोड़ दिया। वहाँ जिनके यूथ (झुंड) बिखर गए थे और जिनके यूथपति मारे जा चुके थे, वे मृगों के झुंड व्याकुल होकर चारों ओर आवाजें करने लगे। पानी की आशा न रहने के कारण वे सूखी नदियों की ओर गए, जहाँ दौड़-भाग और परिश्रम से जिनके हृदय क्लांत हो चुके थे, ऐसे वे अचेत होकर पृथ्वी पर गिरने लगे। भूख-प्यास से पीड़ित और अत्यंत थके हुए वे जीव जमीन पर गिर पड़े। उनमें से कुछ जीवों को तो वहाँ भूखे शिकारी सैनिकों द्वारा खाया गया, और कुछ को वनेचरों (सैनिकों) ने अग्नि प्रज्वलित कर विधिपूर्वक पकाकर खाया।
व्याख्या: राजा दुष्यंत के आक्रमण और सेना की हलचल से पूरे वन में त्राहि-त्राहि मच जाती है। वन्य जीव प्यास और थकान से बेहाल होकर इधर-उधर भागते हैं और सेना उनका शिकार करती है।
श्लोक 29-31
भक्षयन्ति स्म मांसानि प्रकुट्य विधिवत्तदा। तत्र केचिद्गजा मत्ता बलिनः शस्त्रविक्षताः।। (1-90-29) संकोच्याग्रकरान्भीताः प्राद्रवन्ति स्म वेगिताः। शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु।। (1-90-30) वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान्बहून्। तद्वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम्। व्यरोचत मृगाकीर्णं राज्ञा हतमृगाधिपम्।। (1-90-31)
हिंदी अनुवाद: वहाँ कुछ मत्त, बलवान और शस्त्रों से घायल हुए जंगली हाथी अपनी सूंड को सिकोड़कर तथा भयभीत होकर तेजी से भागने लगे। वे डर के मारे मल-मूत्र त्यागते हुए और अपने शरीर से बहुत सा खून बहाते हुए दौड़ रहे थे। उन जंगली हाथियों ने क्रोध में आकर वहाँ कई मनुष्यों को कुचल डाला। सेना रूपी मेघों और बाणों की धाराओं से घिरा हुआ, मृगों से भरा तथा राजा द्वारा मारे गए मृगपतियों से युक्त वह वन इस प्रकार सुशोभित हो रहा था।
व्याख्या: यहाँ शिकार के दौरान मत्त हाथियों के कुचलने से हुई अफरा-तफरी का सजीव चित्रण है। सैनिकों के बाणों और सेना के जमावड़े से वह पूरा वन एक युद्धक्षेत्र जैसा प्रतीत होने लगा था।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि नवतितमोऽध्यायः।। 90 ।।
