श्लोक 1
जनमेजय उवाच। भगवन्विस्तरेणेह भरतस्य महात्मनः। जन्म कर्म च सुश्रूषोस्तन्मे शंसितुमर्हसि।। (1-89-1)
हिंदी अनुवाद: जनमेजय ने कहा— हे भगवन्! मैं महात्मा भरत का जन्म और उनके कर्मों को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। आप मुझे इसका वर्णन करके अनुगृहीत करें।
व्याख्या: राजा जनमेजय महर्षि वैशंपायन से चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मकथा और उनके महान कार्यों के बारे में विस्तार से बताने का अनुरोध करते हैं।
श्लोक 2-5
वैशंपायन उवाच। पौरवाणां वंशकरो दुष्यन्तो नाम वीर्यवान्। पृथिव्याश्चतुरन्ताया गोप्ता भरतसत्तम।। (1-89-2) चतुर्भागं भुवः कृत्स्नं यो भुङ्क्ते मनुजेश्वरः। समुद्रावरणांश्चापि देशान्स समितिंजयः।। (1-89-3) आम्लेच्छावधिकान्सर्वान्स भुङ्क्ते रिपुमर्दनः। रत्नाकरसमुद्रान्तांश्चातुर्वर्ण्यजनावृतान्।। (1-89-4) न वर्णسङ्करकरो न कृष्याकरकृज्जनः। न पापकृत्कश्चिदासीत्तस्मिन्राजनि शासति।। (1-89-5)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे भरतश्रेष्ठ! पौरव वंश को बढ़ाने वाले वीर राजा दुष्यंत चारों समुद्रों तक फैली इस पृथ्वी के रक्षक थे। वह समितिंजय (युद्ध में विजय पाने वाले) मनुजेश्वर संपूर्ण पृथ्वी के चतुर्थ भाग का उपभोग करते थे। वे रिपुमर्दन (शत्रुओं का नाश करने वाले) राजा समुद्रों तक तथा म्लेच्छ देशों की सीमाओं तक फैले हुए, चारों वर्णों के जनों से आक्रांत और रत्नाकरों से घिरे हुए संपूर्ण भूभाग पर शासन करते थे। उनके राज्यकाल में कोई भी वर्णसंकर (अधार्मिक विवाह या आचरण करने वाला), कृषि को हानि पहुँचाने वाला अथवा किसी भी प्रकार का पाप करने वाला मनुष्य नहीं था।
व्याख्या: यहाँ राजा दुष्यंत के प्रतापी शासन, उनकी विशाल सीमाओं और उनके राज्य की नैतिक व सामाजिक व्यवस्था का उत्कृष्ट चित्रण किया गया है, जहाँ रामराज्य की तरह पूरी तरह धर्म का पालन होता था।
श्लोक 6-9
धर्मे रतिं सेवमाना धर्मार्थावभिपेदिरे। तदा नरा नरव्याघ्र तस्मिञ्जनपदेश्वरे।। (1-89-6) नासीच्चोरभयं तात न क्षुधाभयमण्वपि। नासीद्व्याधिभयं चापि तस्मिञ्जनपदेश्वरे।। (1-89-7) स्वधर्मै रेमिरे वर्णा दैवे कर्मणि निःस्पृहाः। तमाश्रित्य महीपालमासंश्चैवाकुतोभयाः।। (1-89-8) कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि रसवन्ति च। सर्वरत्नसमृद्धा च मही पशुमती तथा।। (1-89-9)
हिंदी अनुवाद: हे नरव्याघ्र जनमेजय! उस जनपदेश्वर के राज्यकाल में मनुष्य धर्म में प्रेम रखते हुए धर्म और अर्थ दोनों का सेवन करते थे। उनके शासन में न तो चोरों का कोई भय था, न रत्ती भर भूख (अकाल) का भय था और न ही किसी प्रकार की बीमारी (व्याधि) का भय था। सभी वर्णों के लोग अपने-अपने स्वधर्म में आनंदित रहते थे और दैव कर्मों (भाग्य) के प्रति अनासक्त रहकर पुरुषार्थ करते थे। उस राजा की शरण में रहकर सभी प्रजाजन पूरी तरह निर्भय हो गए थे। मेघ समय पर वर्षा करते थे, फसलें रसदार और उपजाऊ होती थीं, तथा पृथ्वी समस्त रत्नों और पशु-संपदा से परिपूर्ण थी।
व्याख्या: राजा दुष्यंत के सुशासन में प्रकृति भी प्रसन्न रहती थी। किसी भी प्रकार का भय, रोग या अभाव समाज में नहीं था, और प्रजा अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करती थी।
श्लोक 10-14
स्वकर्मनिरता विप्रा नानृतं तेषु विद्यते। स चाद्भुतमहावीर्यो वज्रसंहननो युवा।। (1-89-10) उद्यम्य मन्दरं दोर्भ्यां वहेत्सवनकाननम्। चतुष्पथगदायुद्धे सर्वप्रहरणेषु च।। (1-89-11) नागपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च बभूव परिनिष्ठतः। बले विष्णुसमश्चासीत्तेजसा भास्करोपमः।। (1-89-12) अक्षोभ्यत्वेऽर्णवसमः सहिष्णुत्वे धरासमः। संमतः स महीपालः प्रसन्नपुरराष्ट्रवान्।। (1-89-13) भूयो धर्मपरैर्भावैर्मुदितं जनमादिशत्।। (1-89-14)
हिंदी अनुवाद: ब्राह्मणगण अपने कर्मों में निरंतर तत्पर रहते थे और उनके मुख से कभी असत्य नहीं निकलता था। वे राजा दुष्यंत अद्भुत महावीर्यवान, वज्र के समान मजबूत शरीर वाले और युवा थे। वे अपनी दोनों भुजाओं से मन्दराचल पर्वत को वनों सहित उठाकर ले जा सकते थे। चौराहे के गदायुद्ध में, सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के चलाने में, हाथी की पीठ पर तथा घोड़े की सवारी में वे पूर्ण रूप से निपुण थे। वे बल में भगवान विष्णु के समान, तेज में सूर्य के समान, क्षोभित न होने में समुद्र के समान और सहनशीलता में पृथ्वी के समान थे। उनके नगर और राष्ट्र के सभी लोग अत्यंत प्रसन्न थे। इस प्रकार वे महिपाल सभी से सम्मानित होकर धर्मयुक्त भावों से आनंदित अपनी प्रजा को उचित आदेश देते थे।
व्याख्या: राजा दुष्यंत की शारीरिक शक्ति, पराक्रम, अस्त्र-शस्त्रों में निपुणता और उनके दिव्य गुणों की तुलना देवताओं से की गई है। वे केवल बलवान ही नहीं, बल्कि सहनशील, स्थिर और प्रजाप्रिय सम्राट थे।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि एकोननवतितमोऽध्यायः।। 89 ।।
