श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षडधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत आदिपर्व अध्याय १०६ संस्कृत हिन्दी व्याख्या

श्लोक 1-3

शान्तनुरुवाच। आपवो नाम कोन्वेष वसूनां किं च दुष्कृतम्। शशाप यस्मात्कल्याणि स वसूंश्चारुदर्शने।। (1-106-1) अनेन च कुमारेण त्वया दत्तेन किं कृतम्। यस्य चैव कृतेनायं मानुषेषु निवत्स्यति।। (1-106-2) ईशा वै सर्वलोकस्य वसवस्ते च वै कथम्। मानुषेषूदपद्यन्त तन्ममाचक्ष्व जाह्नवि।। (1-106-3)

हिंदी अनुवाद: शांतनु ने पूछा— हे चारुदर्शने कल्याणि! यह आपव नाम का कौन ऋषि है और वसुओं का वह कौन-सा दुष्कर्म (अपराध) था, जिसके कारण उसने वसुओं को शाप दिया? तुम्हारे द्वारा दिए गए इस कुमार ने ऐसा कौन-सा कार्य किया है, जिसके कारण इसे मनुष्यों के बीच रहना पड़ेगा? समस्त लोकों के स्वामी (ईश्वर) वे वसवः (देवता) भी किस प्रकार मनुष्य योनि में उत्पन्न हो गए? हे जाह्नवि! मुझे यह सब विस्तार से बताओ।

व्याख्या: राजा शांतनु गंगा से वशिष्ठ (आपव) के परिचय, अष्टवसुओं द्वारा किए गए अपराध और उनके शाप की पूरी कथा तथा जीवित बचे आठवें पुत्र (भीष्म) के बारे में जिज्ञासा प्रकट करते हैं।

श्लोक 4-10

वैशंपायन उवाच। एवमुक्ता तदा गङ्गा राजानमिदमब्रवीत्। भर्तारं जाह्नवी देवी शान्तनुं पुरुषर्षभ।। (1-106-4) गङ्गोवाच। यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भरतसत्तम। वसिष्ठनामा स मुनिः ख्यात आपव इत्युत।। (1-106-5) तस्याश्रमपदं पुण्यं मृगपक्षिसमन्वितम्। मेरोः पार्श्वे नगेन्द्रस्य सर्वर्तुकुसुमावृतम्।। (1-106-6) स वारुणिस्तपस्तेपे तस्मिन्भरतसत्तम। वने पुण्यकृतां श्रेष्ठः स्वादुमूलफलोदके।। (1-106-7) दक्षस्य दुहिता या तु सुरभीत्यभिशब्दिता। गां प्रजाता तु सा देवी कश्यपाद्भरतर्षभ।। (1-106-8) अनुग्रहार्थं जगतः सर्वकामदुहां वराम्। तां लेभे गां तु धर्मात्मा होमधेनुं स वारुणिः।। (1-106-9) सा तस्मिंस्तापसारण्ये वसन्ती मुनिसेविते। चचार पुण्ये रम्ये च गौरपेतभया तदा।। (1-106-10)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— पुरुषर्षभ राजा शांतनु द्वारा ऐसा कहे जाने पर जाह्नवी देवी गंगा ने अपने पति से कहना आरंभ किया। गंगा बोलीं— हे भरतसत्तम! प्राचीन काल में वरुण ने जिन्हें पुत्र रूप में प्राप्त किया था, वे ही प्रसिद्ध मुनि वसिष्ठ 'आपव' नाम से जाने जाते हैं। पर्वतों के राजा मेरु की तलहटी में उनका पवित्र आश्रम था, जो मृग और पक्षियों से सुसज्जित तथा सभी ऋतुओं के फूलों से आच्छादित रहता था। हे भरतसत्तम! पुण्यकर्ताओं में श्रेष्ठ वे वारुणि (वरुणपुत्र वसिष्ठ) स्वादिष्ट मूल-फलों और जल वाले उस वन में तपस्या करते थे। हे भरतर्षभ! दक्ष की जो पुत्री सुरभि नाम से विख्यात हैं, उन्होंने कश्यप के द्वारा कामधेनु को जन्म दिया। जगत पर अनुग्रह करने के लिए सब प्रकार की मनोकामनाएँ पूरी करने वाली उस श्रेष्ठ होमधेनु को धर्मात्मा वारुणि (वसिष्ठ) ने प्राप्त किया था। मुनियों द्वारा सेवित उस तापस अरण्य में निवास करती हुई वह गौ भय से रहित होकर उस पवित्र तथा रमणीय वन में विचरती थी।

व्याख्या: गंगा राजा शांतनु को बताती हैं कि 'आपव' कोई और नहीं बल्कि वरुण के पुत्र महर्षि वसिष्ठ ही हैं, जिनके पास जगत के कल्याण के लिए प्रकट हुई अद्भूत होमधेनु (नन्दिनी) थी।

श्लोक 11-20

अथ तद्वनमाजग्मुः कदाचिद्भरतर्षभ। पृथ्वाद्या वसवः सर्वे देवा देवर्षिसेवितम्।। (1-106-11) ते सदारा वनं तच्च व्यचरन्त समन्ततः। रेमिरे रमणीयेषु पर्वतेषु वनेषु च।। (1-106-12) तत्रैकस्याथ भार्या तु वसोर्वासवविक्रम। संचरन्ती वने तस्मिन्गां ददर्श सुमध्यमा।। (1-106-13) नन्दिनीं नाम राजेन्द्र सर्वकामधुगुत्तमाम्। सा विस्मयसमाविष्टा शीलद्रविणसंपदा।। (1-106-14) द्यवे वै दर्शयामास तां गां गोवृषभेक्षण। आपीनां च सुदोग्ध्रीं च सुवालधिखुरां शुभां।। (1-106-15) उपपन्नां गुणैः सर्वैः शीलेनानुत्तमेन च। एवंगुणसमायुक्तां वसवे वसुनन्दिनी।। (1-106-16) दर्शयामास राजेन्द्र पुरा पौरवनन्दन। द्यौस्तदा तां तु दृष्ट्वा गां गजेन्द्रेन्द्रविक्रम।। (1-106-17) उवाच राजंस्तां देवीं तस्या रूपगुणान्वदन्। एषा गौरुत्तमा देवी वारुणेरसितेक्षणा।। (1-106-18) ऋषेस्तस्य वरारोहे यस्येदं वनमुत्तमम्। अस्याः क्षीरं पिबेन्मर्त्यः स्वादु यो वै सुमध्यमे।। (1-106-19) दशवर्षसहस्राणि स जीवेत्स्थिरयौवनः। वैशंपायन उवाच। एतच्छ्रुत्वा तु सा देवी नृपोत्तम सुमध्यमा।। (1-106-20)

हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ! तदनंतर किसी समय पृथु आदि आठों वसवः देवर्षियों द्वारा सेवित उस वन में आए। वे सभी अपनी पत्नियों के साथ उस वन में चारों ओर विहार करने लगे और रमणीय पर्वतों तथा वनों में रमण करने लगे। हे वासव के समान पराक्रमी राजेन्द्र! उनमें से एक वसु (द्यौ नामक वसु) की सुमध्यमा पत्नी ने उस वन में विचरते हुए नन्दिनी नाम की उस उत्तम सर्वकामधेनु को देखा। वह गौ अपनी शील और संपत्ति के कारण विस्मय से भर गई। हे गोवृषभेक्षण! उस द्यु (द्यौ) नामक वसु ने पीन (दूध से भरे हुए) स्तनों वाली, उत्तम दूध देने वाली, सुंदर पूँछ और खुरों वाली तथा सभी शुभ एवं अनुत्तरम गुणों से युक्त उस गौ को अपनी पत्नी को दिखाया। हे पौरवनन्दन राजेन्द्र! द्यु नामक वसु ने उस देवी (अपनी पत्नी) को उस गौ के रूप और गुणों का वर्णन करते हुए कहा— "हे वरारोहे सुमध्यमे! यह उत्तम गौ उस वारुणि (वसिष्ठ) ऋषि की है, जिनका यह उत्तम वन है। हे सुमध्यमे! जो मनुष्य इस गौ का स्वादिष्ट दूध पी लेता है, वह स्थिर यौवन के साथ दस हजार वर्षों तक जीवित रहता है।"

व्याख्या: अष्टवसुओं में से 'द्यौ' नामक वसु की पत्नी जब महर्षि वसिष्ठ की कामधेनु (नन्दिनी) को देखती है, तो उसके मन में उसे पाने का लोभ जाग जाता है, और वह अपने पति से उस अद्भुत गौ के गुणों का वर्णन करती है।

श्लोक 21-26

तमुवाचानवद्याङ्गी भर्तारं दीप्ततेजसम्। अस्ति मे मानुषे लोके नरदेवात्मजा सखी।। (1-106-21) नाम्नाजितवती नाम रूपयौवनशालिनी। उशीनरस्य राजर्षेः सत्यसन्धस्य धीमतः।। (1-106-22) दुहिता प्रथिता लोके मानुषे रूपसंपदा। तस्या हेतोर्महाभाग सवत्सां गां ममेप्सिताम्।। (1-106-23) आनयस्वामरश्रेष्ठ त्वरितं पुण्यवर्धन। यावदस्याः पयः पीत्वा सा सखी मम मानद।। (1-106-24) मानुषेषु भवत्वेका जरारोगविवर्जिता। एतन्मम महाभाग कर्तुमर्हस्यनिन्दित।। (1-106-25) प्रियात्प्रियतरं ह्यस्मान्नास्ति मेऽन्यत्कथंचन। एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्या देव्याः प्रियचिकीर्षया।। (1-106-26)

हिंदी अनुवाद: अनवद्याङ्गी (दोषरहित अंगों वाली) उस देवी ने अपने दीप्ततेजस्वी पति (द्यौ वसु) से कहा— "मानवलोक में सत्यसंध और बुद्धिमान राजर्षि उशीनर की एक पुत्री मेरी सखी है, जो रूप और यौवन से संपन्न है तथा इस संसार में अपनी रूप-संपदा के लिए प्रसिद्ध है, उसका नाम जितवती है। हे महाभाग! मेरी उस सखी के लिए आप बछड़े सहित इस वाञ्छित गौ को ले आइए। हे अमरश्रेष्ठ पुण्यवर्धन मानद! आप इसे शीघ्र ले चलिए, ताकि मेरी वह सखी इस गौ का दूध पीकर मनुष्यलोक में वृद्धावस्था और रोगों से सर्वथा रहित हो जाए। हे महाभाग अनिन्दित! आप मेरे लिए यह कार्य अवश्य कीजिए। इससे बढ़कर मेरे लिए कोई दूसरी प्रिय वस्तु नहीं है।" अपनी उस पत्नी को प्रिय करने की इच्छा से द्यु ने उसकी वह बात सुनी।

व्याख्या: द्यौ वसु की पत्नी अपने पति से हठ करती है कि वह अपनी मानवी सखी (जितवती) को अमर और रोगमुक्त बनाने के लिए वसिष्ठ की यह चमत्कारिक कामधेनु बछड़े समेत चुराकर ले आए। यहीं से महर्षि वसिष्ठ के कोप और वसुओं के शाप की नींव पड़ती है।

श्लोक 27-35

पृथ्वाद्यैर्भ्रातृभिः सार्धं द्यौस्तदा तां जहार गाम्। तया कमलपत्राक्ष्या नियुक्तो द्यौस्तदा नृप।। (1-106-27) ऋषेस्तस्य तपस्वीव्रं न शशाक निरीक्षितुम्। हृता गौः सा तदा तेन प्रपातस्तु न तर्कितः।। (1-106-28) अथाश्रमपदं प्राप्तः फलान्यादाय वारुणिः। न चापश्यत्स गां तत्र सवत्सां काननोत्तमे।। (1-106-29) ततः स मृगयामास वने तस्मिंस्तपोधनः। नाध्यागमच्च मृगयंस्तां गां मुनिरुदारधीः।। (1-106-30) ज्ञात्वा तथाऽपनीतां तां वसुभिर्दिव्यदर्शनः। ययौ क्रोधवशं सद्यः शशाप च वसूंस्तदा।। (1-106-31) यस्मान्मे वसवो जह्रुर्गां वै दोग्ध्रीं सुवालधिम्। तस्मात्सर्वे जनिष्यन्ति मानुषेषु न संशयः।। (1-106-32) एवं शशाप भगवान्वसूंस्तान्भरतर्षभ। वशं क्रोधस्य संप्राप्त आपवो मुनिसत्तमः।। (1-106-33) शप्त्वा च तान्महाभागस्तपस्येव मनो दधे। एवं शप्तवान्राजन्वसूनष्टौ तपोधनः।। (1-106-34) महाप्रभावो ब्रह्मर्षिर्देवान्क्रोधसमन्वितः। एवं शप्तास्ततस्तेन मुनिना यामुनेन वै।। (1-106-35)

हिंदी अनुवाद: हे नृप! उन कमलपत्राक्षी (सुंदरी पत्नी) की प्रेरणा से द्यौ नामक वसु ने पृथु आदि अन्य भाइयों के साथ मिलकर उस गौ (नन्दिनी) का अपहरण कर लिया। उस समय वे द्यौ उस ऋषि के तीव्र तप को देखने में भी समर्थ नहीं हो सके। उनके द्वारा वह गौ तो चुरा ली गई, किंतु इसके परिणाम (पतन) का विचार उन्होंने नहीं किया। तदनंतर वनों और फलों को लेकर जब वारुणि (वसिष्ठ) अपने आश्रम के पद पर पहुँचे, तो उन्होंने उस उत्तम वन में बछड़े सहित उस गौ को वहाँ नहीं देखा। तब उन उदारधीः तपोधन मुनि ने उस वन में उसकी खोज की, किंतु बहुत ढूँढने पर भी वे उस गौ को पा नहीं सके। दिव्य दृष्टि वाले मुनि ने यह जान लिया कि वसुओं द्वारा उसे ले जाया गया है, जिससे वे तुरंत क्रोध के वश में हो गए और उन्होंने उन सभी वसुओं को शाप दे दिया— "चूँकि वसुओं ने मेरी इस दूध देने वाली सुंदर पूँछ वाली गौ को चुराया है, इसलिए ये सब-के-सब बिना किसी संशय के मनुष्य योनि में जन्म लेंगे।" हे भरतर्षभ! मुनिसत्तम आपव (वसिष्ठ) ने क्रोध के वश में होकर भगवान उन वसुओं को इस प्रकार शाप दिया। महाभाग तपोधन ब्रह्मर्षि ने उन आठों वसुओं को शाप देकर पुनः अपनी तपस्या में ही मन लगा दिया। महाप्रभावशाली क्रोधयुक्त ब्रह्मर्षि द्वारा वे सभी देवता इस प्रकार शापित हो गए।

व्याख्या: द्यौ वसु अपनी पत्नी के बहकावे में आकर महर्षि वसिष्ठ की कामधेनु का अपहरण कर लेते हैं। जब वसिष्ठ को इसका पता चलता है, तो वे क्रोधित होकर सभी आठों वसुओं को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे देते हैं।

श्लोक 36-43

अष्टौ समस्ता वंसवो दिवो दोषेण सत्तम।' अथाश्रमपदं प्राप्तास्ते वै भूयो महात्मनः।। (1-106-36) शप्ताः स्म इति जानन्त ऋषिं तमुपचक्रमुः। प्रसादयन्तस्तमृषिं वसवः पार्थिवर्षभ।। (1-106-37) लेभिरे न च तस्मात्ते प्रसादमृषिसत्तमात्। आपवात्पुरुषव्याघ्र सर्वधर्मविशारदात्।। (1-106-38) उवाच च स धर्मात्मा शप्ता यूयं धरादयः। अनुसंवत्सरात्सर्वे शापमोक्षमवाप्स्यथ।। (1-106-39) अयं तु यत्कृते यूयं मया शप्ताः स वत्स्यति। द्यौस्तदा मानुषे लोके दीर्घकालं स्वकर्मणः।। (1-106-40) नानृतं तच्चिकीर्षामि क्रुद्धो युष्मान्यदब्रुवम्। न प्रजास्यति चाप्येष मानुषेषु महामनाः।। (1-106-41) भविष्यति च धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः। पितुः प्रियहिते युक्तः स्त्रीभोगान्वर्जयिष्यति।। (1-106-42) एवमुक्त्वा वसून्सर्वान्सजगाम महानृषिः। ततो मामुपजग्मुस्ते समेता वसवस्तदा।। (1-106-43)

हिंदी अनुवाद: हे सत्तम पार्थिवर्षभ! द्यु (द्यौ) के अपराध के कारण वे सभी आठों वसवः महात्मा वसिष्ठ के आश्रम में पुनः पहुँचे। "हम शापित हो चुके हैं"— यह जानते हुए वे सब पुरुषव्याघ्र वसु सर्वधर्मविशारद उन महर्षि आपव को प्रसन्न करने के लिए उनके पास गए, किंतु उन ऋषिसত্তম से उन्हें प्रसाद (शाप की पूरी निवृत्ति) प्राप्त नहीं हुआ। तब उन धर्मात्मा ऋषि ने कहा— "पृथ्वी आदि तुम सब लोग शापित हो चुके हो, किंतु वर्ष पूरा होने पर तुम सब शाप से मुक्त हो जाओगे। परंतु जिसके कारण तुम सब मेरे द्वारा शापित हुए हो, वह द्यु नामक वसु अपने कर्म के कारण इस मनुष्य लोक में दीर्घकाल तक निवास करेगा। क्रोधित होने पर मैंने जो बात कही थी, उसे मैं असत्य नहीं करना चाहता हूँ, अतः यह महामना मनुष्य योनि में संतान उत्पन्न नहीं करेगा। वह धर्मात्मा, सभी शास्त्रों में विशारद, पिता की प्रिय और हित में तत्पर तथा आजीवन स्त्री-भोगों का त्याग करने वाला होगा।" सभी वसुओं से ऐसा कहकर महान ऋषि वहाँ से चले गए। तदनंतर वे सभी वसवः एकसाथ मेरे (गंगा के) पास आए।

व्याख्या: वसुओं द्वारा क्षमा मांगने पर महर्षि वसिष्ठ शांत होते हैं और कृपा करके उनके शाप की अवधि घटाकर एक वर्ष कर देते हैं, किंतु मुख्य अपराधी 'द्यौ' को मनुष्य योनि में दीर्घकाल तक रहना होगा और वह ब्रह्मचारी रहकर महान गुणों से संपन्न होगा।

श्लोक 44-51

अयाचन्त च मां राजन्वरं तच्च मया कृतम्। जाताञ्जातान्प्रक्षिपास्मान्स्वयं गङ्गे त्वमम्भसि।। (1-106-44) एवं तेषामहं सम्यक् शप्तानां राजसत्तम। मोक्षार्थं मानुषाल्लोकाद्यथावत्कृतवत्यहम्।। (1-106-45) अयं शापादृषेस्तस्य एक एव नृपोत्तम। द्यौ राजन्मानुषे लोके चिरं वत्स्यति भारत।। (1-106-46) अयं कुमारः पुत्रस्ते विवृद्धः पुनरेष्यति। अहं च ते भविष्यामि आह्वानोपगता नृप।। (1-106-47) वैशंपायन उवाच। एतदाख्याय सा देवी तत्रैवान्तरधीयत। आदाय च कुमारं तं जगामाथ यथेप्सितम्।। (1-106-48) स तु देवव्रतो नाम गाङ्गेय इति चाभवत्। द्युनामा शान्तनोः पुत्रः शान्तनोरधिको गुणैः।। (1-106-49) शान्तनुश्चापि शोकार्तो जगाम स्वपुरं ततः। तस्याहं कीर्तयिष्यामि शान्तनोरधिकान्गुणान्।। (1-106-50) महाभाग्यं च नृपतेर्भारतस्य महात्मनः। यस्येतिहासो द्युतिमान्महाभारतमुच्यते।। (1-106-51)

हिंदी अनुवाद: हे राजन्! उन्होंने मुझसे यह वर माँगा और मैंने वैसा ही किया— "हे गंगे! हम शापितों को जन्म लेते ही तुम अपने जल में प्रवाहित कर देना।" हे राजसत्तम! शापित हुए उन वसुओं को मनुष्य लोक से मोक्ष दिलाने के लिए मैंने यथावत वैसा ही किया। हे नृपोत्तम भारत! उन ऋषि के शाप के कारण केवल वही 'द्यौ' नामक वसु मनुष्य लोक में चिरकाल तक निवास करेगा। तुम्हारा यह पुत्र कुमार बड़ा होकर तुम्हारे पास लौट आएगा और हे नृप! मैं भी तुम्हारे बुलाने पर तुम्हारे पास आ जाऊँगी। वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा कहकर वे देवी वहीं अंतर्धान हो गईं और उस कुमार को लेकर अपनी इच्छा के अनुसार चली गईं। द्यु नामक वे ही शांतनु के पुत्र आगे चलकर 'देवव्रत' और 'गांगेय' नाम से प्रसिद्ध हुए, जो गुणों में शांतनु से भी बढ़कर थे। राजा शांतनु भी शोकातुर होकर अपने नगर को लौट गए। अब मैं आगे उन महाभाग महाराज शांतनु के गुणों तथा महामना भारत के उस महाभाग्य का वर्णन करूँगा, जिनके इस दीप्तिमान इतिहास को 'महाभारत' कहा जाता है।

व्याख्या: गंगा राजा शांतनु को पूरा रहस्य समझाकर अंतर्धान हो जाती हैं। आठवें वसु (द्यौ) ही आगे चलकर शांतनु के महान पुत्र 'देवव्रत' (भीष्म) के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं, और यहीं से महाभारत की मुख्य कथा का विस्तार होता है।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षडधिकशततमोऽध्यायः।। 106 ।।

संभवपर्वणि पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः

संभवपर्वणि सप्ताधिकशततमोऽध्यायः