महाभारत् -०१ आदिपर्व -२०५

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२०५

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत स्वयंवरपर्व के 205वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में अर्जुन और भीमसेन द्वारा क्रुद्ध राजाओं (कर्ण, शल्य, दुर्योधन आदि) को युद्ध में परास्त करने, भगवान श्रीकृष्ण द्वारा राजाओं को समझाने और पांडवों के अपनी माता कुंती के पास लौटने का अत्यंत रोमांचक वर्णन है।

श्लोक 1 से 9 (ब्राह्मणों का उत्साह और राजाओं का युद्ध के लिए आगे बढ़ना)

श्लोक 1, 2, 3 और 4:

वैशंपायन उवाच। अजिनानि विधुन्वन्तः करकाश्च द्विजर्षभाः। ऊचुस्ते भीर्न कर्तव्या वयं योत्स्यामहे परान्।। तानेवं वदतो विप्रानर्जुनः प्रहसन्निव। उवाच प्रेक्षका भूत्वा यूयं तिष्ठत पार्श्वतः।। अहमेनानजिह्माग्रैः शतशो विकिरञ्छरैः। वारयिष्यामि संक्रुद्धान्मन्त्रैराशीविषानिव।। इति तद्धनुरानम्य शुल्कावाप्तं महाबलः। भ्रात्रा भीमेन सहितस्तस्थौ गिरिरिवाचलः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— मृगचर्म और कमण्डलु हिलाते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने कहा— "तुम लोग भय मत करो, हम इन शत्रुओं से युद्ध करेंगे।" इस प्रकार बोलते हुए उन विप्रों से अर्जुन ने मानो हँसते हुए कहा— "आप लोग दर्शक बनकर पास ही खड़े रहिए। मैं इन क्रोधित राजाओं को अपने सीधे बाणों से सैकड़ों की संख्या में बिखेरते हुए उसी प्रकार रोक लूँगा जैसे मंत्रों से विषैले सर्पों को रोक लिया जाता है।" ऐसा कहकर उस महाबली ने शुल्क के रूप में प्राप्त उस धनुष को झुकाया और भाई भीमसेन के साथ पर्वत के समान अचल होकर खड़े हो गए।
  • व्याख्या: जब ब्राह्मणों ने देखा कि क्षत्रिय राजा क्रोध में भरकर आक्रमण करने आ रहे हैं, तो वे पांडवों की रक्षा के लिए आगे आए। तब अर्जुन ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे स्वयं अकेले ही इन सभी का सामना करेंगे।

श्लोक 5, 6, 7, 8 और 9:

ततः कर्णमुखान्दृष्ट्वा क्षत्रियान्युद्धदुर्मदान्। संपेततुरभीतौ तौ गजौ प्रतिगजानिव।। ऊचुश्च वाचः परुषास्ते राजानो युयुत्सवः। आहवे हि द्विजस्यापि वधो दृष्टो युयुत्सतः।। इत्येवमुक्त्वा राजानः सहसा दुद्रुवुर्द्विजान्। ततः कर्णो महातेजा जिष्णुं प्रति ययौ रणे।। युद्धार्थी वासिताहेतोर्गजः प्रतिगजं यथा। भीमसेनं ययौ शल्यो मद्राणामीश्वरो बली।। दुर्योधनादयः सर्वे ब्राह्मणैः सह संगताः। मृदुपूर्वमयत्नेन प्रत्ययुध्यंस्तदाऽऽहवे।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर युद्ध के लिए मतवाले कर्ण आदि क्षत्रियों को देखकर वे दोनों अभय वीर (अर्जुन और भीम) दो मतवाले हाथियों की तरह विरोधी हाथियों पर टूट पड़े। युद्ध की इच्छा रखने वाले उन राजाओं ने परुष (कठोर) वचन कहते हुए कहा— "युद्ध के लिए तत्पर होने पर ब्राह्मण का भी वध शास्त्र सम्मत देखा गया है।" ऐसा कहकर वे राजा अचानक ब्राह्मणों की ओर दौड़े। तब महातेजस्वी कर्ण युद्ध की इच्छा से जिष्णु (अर्जुन) की ओर ऐसे दौड़े जैसे कोई हाथी मादा हाथी के लिए दूसरे हाथी की ओर दौड़ता है। और बलवान मद्रराज शल्य भीमसेन की ओर झपड़े। दुर्योधन आदि सभी राजा ब्राह्मणों के साथ युद्ध में यत्नपूर्वक भिड़ गए।
  • व्याख्या: युद्ध छिड़ गया। कर्ण अर्जुन की ओर बढ़े, मद्रराज शल्य भीमसेन की ओर दौड़े, और दुर्योधनादि अन्य राजा भी ब्राह्मणों और पांडवों पर टूट पड़े।

श्लोक 10 से 23 (अर्जुन और कर्ण का भीषण युद्ध तथा संवाद)

श्लोक 10, 11, 12, 13, 14 और 15:

ततोऽर्जुनः प्रत्यविध्यदापतन्तं शितैः शरैः। कर्णं वैकर्तनं श्रीमान्धृष्य बलवद्धनुः।। तेषां शराणां वेगेन शितानां तिग्मतेजसाम्। विमुह्यमानो राधेयो यत्नात्तमनुधावति।। तावुभावप्यनिर्देश्यौ लाघवाज्जयतां वरौ। अयुध्येतां सुसंरब्धावन्योन्यविजिगीषिणौ।। कृते प्रतिकृतं पश्य पश्य बाहुबलं च मे। इति शूरार्थवचनैरभाषेतां परस्परम्।। ततोऽर्जुनस्य भुजयोर्वीर्यमप्रतिमं भुवि। ज्ञात्वा वैकर्तनः कर्णः संरब्धः समयोधयत्।। अर्जुनेन प्रयुक्तांस्तान्बाणान्वेगवतस्तदा। प्रतिहत्य ननादोच्चैः सैन्यानि तदपूजयन्।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर श्रीमान् अर्जुन ने अपने बलवान धनुष को खींचकर आक्रमण करते हुए वैकर्तन कर्ण को तीखे बाणों से विध्नित कर दिया। उन तीखे और प्रखर तेज वाले बाणों के वेग से राधेय (कर्ण) विमुह्यमान (चक्रित) होकर यत्नपूर्वक उनका पीछा करने लगे। लाघव (फुर्ती) में श्रेष्ठ और विजय प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले वे दोनों वीर अत्यंत क्रोधित होकर आपस में युद्ध करने लगे। "मेरे किए हुए का प्रतिकार देखो और मेरा बाहुबल देखो"— इस प्रकार शूरवीरता के अर्थ वाले वचनों से वे दोनों आपस में बातें कर रहे थे। तदनंतर पृथ्वी पर अर्जुन की भुजाओं के अप्रतिम वीर्य को जानकर वैकर्तन कर्ण ने और अधिक क्रोधित होकर युद्ध किया। अर्जुन द्वारा छोड़े गए उन वेगवान बाणों को काटकर कर्ण ने ऊँची आवाज में गर्जना की, जिसकी सेनाओं ने प्रशंसा की।
  • व्याख्या: अर्जुन और कर्ण के बीच आमने-सामने का अत्यंत पराक्रमी और फुर्तीला द्वंद युद्ध शुरू हुआ। दोनों एक-दूसरे के प्रहारों का जवाब दे रहे थे और उनकी वीरता को देखकर सेनाएँ दंग रह गईं।

श्लोक 16, 17, 18, 19, 20, 21, 22 और 23:

कर्ण उवाच। तुष्यामि ते विप्रमुख्य भुजवीयर्स्य संयुगे। अविषादस्य चैवास्य शस्त्रास्त्रविजयस्य च।। किं त्वं साक्षाद्धनुर्वेदो रामो वा विप्रसत्तम। अथ साक्षाद्धरिहयः साक्षाद्वा विष्णुरच्युतः।। आत्मप्रच्छादनार्थं वै बाहुवीर्यमुपाश्रितः। विप्ररूपं विधायेदं मन्ये मां प्रतियुध्यसे।। न हि मामाहवे क्रुद्धमन्यः साक्षाच्छचीपतेः। पुमान्योधयितुं शक्तः पाण्डवाद्वा किरीटिनः।। दग्धा जतुगृहे सर्वे पाण्डवाः सार्जुनास्तदा। विनार्जुनं वा समरे मां निहन्तुमशक्नुवन्।।' तमेवंवादिनं तत्र फाल्गुनः प्रत्यभाषत। नास्मि कर्ण धनुर्वेदो नास्मि रामः प्रतापवान्।। ब्राह्मणोऽस्मि युधां श्रेष्ठः सर्वशस्त्रभृतां वरः। ब्राह्मे पौरन्दरे चास्त्रे निष्ठितोगुरुशासनात्।। स्थितोऽस्म्यद्य रणे जेतुं त्वां वै वीर स्थिरो भव। `निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूहि ततो व्रज यथासुखम्।।'

  • हिन्दी अनुवाद: कर्ण ने कहा— "हे विप्रमुख्य! युद्ध में तुम्हारे इस भुजाओं के वीर्य, तुम्हारे इस निर्भीकता और शस्त्रास्त्रों के विजय कौशल को देखकर मैं संतुष्ट हो गया हूँ। किंतु हे विप्रसत्तम! क्या तुम साक्षात् धनुर्वेद हो, या पराक्रमी परशुराम हो, अथवा साक्षात् इंद्र (हरिहय) या अच्युत विष्णु हो? तुम अपने बाहुबल को छिपाने के लिए ब्राह्मण का रूप धारण करके मुझसे युद्ध कर रहे हो, ऐसा मैं मानता हूँ। युद्ध में क्रोधित हुए मुझे शचीपति इंद्र या किरीटी पाण्डव के सिवाय दूसरा कोई पुरुष परास्त करने में समर्थ नहीं है। (यद्यपि) वे सभी पाण्डव अर्जुन सहित लाक्षागृह में जल चुके हैं, और अर्जुन के बिना दूसरा कोई समरे मुझे मारने में असमर्थ है।" ऐसा कहने वाले कर्ण को फाल्गुन (अर्जुन) ने उत्तर दिया— "हे कर्ण! न तो मैं धनुर्वेद हूँ, और न ही मैं प्रतापवान राम हूँ। मैं युद्ध में श्रेष्ठ और सभी शस्त्रधारियों में उत्तम एक ब्राह्मण हूँ, जो गुरु की आज्ञा से ब्रह्म और पौरंदर अस्त्रों में निपुण हूँ। आज मैं तुम्हें रण में जीतने के लिए खड़ा हूँ, हे वीर! स्थिर हो जाओ। या तो 'मैं पराजित हो गया हूँ' ऐसा कहो, और तब सुखपूर्वक यहाँ से जाओ।"
  • व्याख्या: कर्ण अर्जुन के पराक्रम से चकित होकर सोचते हैं कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हो सकता, या तो यह स्वयं भगवान विष्णु, परशुराम या अर्जुन हैं। तब अर्जुन अपनी असली स्थिति का संकेत देते हुए उन्हें युद्ध में स्थिर रहने या हार स्वीकार करने को कहते हैं।

श्लोक 24 से 29 (कर्ण का पराभव और युद्ध से हटना)

श्लोक 24, 25, 26, 27, 28 और 29:

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वाऽथ कर्णस्य धनुश्चिच्छेद पाण्डवः। ततोऽन्यद्धनुरादाय संयोद्धुं सन्दधे शरम्।। दृष्ट्वा तच्चापि कौन्तेयश्छित्वा तद्धनुराशुगैः। तथा वैकर्तनं कर्णं बिभेद समरेऽर्जुनः।। ततः कर्णस्तु राधेयः छिन्नछन्वा (च्छिन्नधन्वा) महाबलः। शरैरतीव विद्धाङ्गः पलायनमथाकरोत्।। पुनरायान्मुहूर्तेन गृहीत्वा सशरं धनुः। ववर्ष शरवर्षाणि पार्थं वैकर्तनस्तथा।। तानि वै शरजालानि कौन्तेयोऽभ्यहनच्छरैः। ज्ञात्वा सर्वाञ्शरान्घोरान्कर्णोऽदावद्द्रुतं बहिः।। ब्राह्मं तेजस्तदाऽजय्यं मन्यमानो महारथः। अपरस्मिन्वनोद्देशे वीरौ शल्यवृकोदरौ।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— ऐसा कहकर पाण्डव (अर्जुन) ने कर्ण का धनुष काट डाला। तब कर्ण ने दूसरा धनुष लेकर युद्ध करने के लिए बाण संधान किया। कौंतेय अर्जुन ने तीव्र बाणों से उनके उस दूसरे धनुष को भी काट दिया और समर में वैकर्तन कर्ण को बुरी तरह बींध डाला। तब महाबली राधेय कर्ण का धनुष कट जाने पर और बाणों से शरीर के अत्यधिक विद्ध (घायल) हो जाने पर वे वहाँ से पलायन कर गए (पीछे हट गए)। किंतु एक मुहूर्त (पल) बाद बाण और धनुष लेकर वे फिर लौट आए और पार्थ पर बाणों की वर्षा करने लगे। कौंतेय अर्जुन ने उनके उन बाणों के जालों को अपने बाणों से काट गिराया। कर्ण ने यह जान लिया कि यह कोई अजय ब्राह्मण का तेज है, इसलिए वे महारथी वहाँ से तुरंत अन्य वन प्रदेश की ओर हट गए।
  • व्याख्या: अर्जुन ने द्वंद युद्ध में कर्ण का धनुष काट दिया और उन्हें बुरी तरह परास्त कर दिया। कर्ण कुछ देर बाद दोबारा आए, किंतु अर्जुन के सामने टिक न सके और रणक्षेत्र से पीछे हट गए।

श्लोक 30 से 43 (भीम और शल्य का मल्लयुद्ध तथा दुर्योधन-युधिष्ठिर का संघर्ष)

श्लोक 30, 31, 32, 33, 34, 35, 36, 37 और 38:

बलिनौ युद्धसंपन्नौ विद्यया च बलेन च। अन्योन्यमाह्वयन्तौ तु मत्ताविव महागजौ।। मुष्टिभिर्जानुभिश्चैव निघ्नन्तावितरेतरम्। प्रकर्षणाकर्षणयोरभ्याकर्षविकर्षणैः।। आचकर्षतुरन्योन्यं मुष्टिभिश्चापि जघ्नतुः। ततश्चटचटाशब्दः सुघोरो ह्यभवत्तयोः।। पाषाणसंपातनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः। मुहूर्तं तौ तदाऽन्योन्यं समरे पर्यकर्षताम्।। ततो भीमः समुत्क्षिप्य बाहुभ्यां शल्यमाहवे। अपातयत्कुरुश्रेष्ठो ब्राह्मणा जहसुस्तदा।। तत्राश्चर्यं भीमसेनश्चकार पुरुषर्षभः। यच्छल्यं पातितं भूमौ नावधीद्बलिनं बली।। पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते। `विस्मयः परमो जज्ञे सर्वेषां पश्यतां नृणाम्।।' ततो राजसमूहस्य पश्यतो वृक्षमारुजत्। ततस्तु भीमं संज्ञाभिर्वारयामास धर्मराट्।। आकारज्ञस्तथा भ्रातुः पाण्डवोऽपि न्यवर्तत। धर्मराजश्च कौरव्य दुर्योधनममर्षणम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: (उधर दूसरी ओर) विद्या और बल से संपन्न दो बलवान वीर मद्रराज शल्य और वृकोदर भीमसेन दो मतवाले हाथियों की भाँति एक-दूसरे को ललकार रहे थे। वे दोनों मुक्कों (मुष्टि) और घुटनों से एक-दूसरे पर प्रहार कर रहे थे। खींचने और धक्का देने की क्रियाओं से वे एक-दूसरे को अपनी ओर खींच रहे थे और मुक्कों से मार रहे थे। तब उन दोनों के प्रहारों से अत्यंत घोर 'चटचट' शब्द हुआ। पत्थरों के प्रहार जैसी कठोर आवाज़ वाले उन प्रहारों से वे एक-दूसरे को रण में खींचते रहे। तदंतर कुरुश्रेष्ठ भीमसेन ने युद्ध में शल्य को अपनी भुजाओं पर उठाकर पृथ्वी पर पटक दिया, जिसे देखकर ब्राह्मण लोग हँस पड़े (प्रसन्न हुए)। पुरुषश्रेष्ठ भीमसेन ने वहाँ एक आश्चर्य किया कि भूमि पर गिराए गए उस बलवान शल्य का उन्होंने वध नहीं किया। भीमसेन द्वारा शल्य के गिराए जाने पर और कर्ण के शंकित (पराजित) होकर भागने पर देखते हुए सभी मनुष्यों के मन में परम विस्मय हुआ। तब राजाओं के समूह के देखते-देखते भीम ने एक वृक्ष उखाड़ लिया, किंतु धर्मराज युधिष्ठिर ने संकेतों से भीमसेन को रोक लिया। अपने भाई के मन की बात को जानने वाले वे पाण्डव (भीम) शांत हो गए।
  • व्याख्या: भीमसेन और मद्रराज शल्य के बीच भयंकर मल्लयुद्ध हुआ। भीम ने शल्य को उठाकर जमीन पर पटक दिया, किंतु उनका वध नहीं किया। यह देखकर सभी राजाओं में खलबली मच गई।

श्लोक 39, 40, 41, 42 और 43:

अयोधयत्सभामध्ये पश्यतां वै महीक्षिताम्। ततो दुर्योधनस्तं तु ह्यवज्ञाय युधिष्ठिरम्।। नायोधयत्तदा तेन बलवान्वै सुयोधनः। एतस्मिन्तरेऽविध्यद्बाणेनानतपर्वणा।। दुर्योधनममित्रघ्नं धर्मराजो युधिष्ठिरः। ततो दुर्योधनः क्रुद्धो दण्डाहत इवोरगः।। प्रत्ययुध्यत राजानं यत्नं परममास्थितः। छित्त्वा राजा धनुः सज्यं धार्तराष्ट्रस्य संयुगे।। अभ्यवर्षच्छरौघैस्तं स हित्वा प्राद्रवद्रणम्। दुःशासनस्तु संक्रुद्धः सहदेवेन पार्थिव।।

  • हिन्दी अनुवाद: धर्मराज युधिष्ठिर ने वहाँ उपस्थित सभी महीपतों (राजाओं) के देखते-देखते अमर्षण (क्रोधित) दुर्योधन से युद्ध करना शुरू किया। किंतु बलवान सुयोधन ने युधिष्ठिर को तुच्छ समझकर उनके साथ अधिक युद्ध नहीं किया। इसी बीच धर्मराज युधिष्ठिर ने एक अनात पर्व वाले बाण से शत्रुओं का नाश करने वाले दुर्योधन को बींध डाला। तब लाठी से ताड़ित हुए सर्प के समान क्रोधित होकर दुर्योधन राजा युधिष्ठिर से अत्यंत यत्न के साथ युद्ध करने लगे। युद्ध में राजा युधिष्ठिर ने धार्तराष्ट्र (दुर्योधन) के सज्य (प्रत्यंचा चढ़ाए हुए) धनुष को काट दिया और बाणों की वर्षा करके उन्हें वहाँ से भगा दिया (वे रणभूमि छोड़कर भाग खड़े हुए)। उधर क्रोधी दुःशासन सहदेव के साथ भिड़ गए...
  • व्याख्या: युधिष्ठिर ने भी दुर्योधन का मुकाबला किया और उनके धनुष को काटकर उन्हें रणक्षेत्र से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

श्लोक 44 से 58 (दुःशासन की हार, कौरवों की वापसी और राजाओं की चर्चा)

श्लोक 44, 45, 46, 47, 48 और 49:

युद्ध्वा च सुचिरं कालं सहदेवेन निर्जितः। उत्सृज्य च धनुः सङ्ख्ये जानुभ्यामवनीं गतः। उत्थाय सोऽभिदुद्राव सोसिं जग्राह चर्म च।। विकर्णचित्रसेनाभ्यां निगृहीतश्च कौरवः। मा युद्धमिति कौरव्य ब्राह्मणेनाबलेन वै।। दुःसहो नकुलश्चोभौ युद्धं कर्तुं समुद्यतै। तौ दृष्ट्वा कौरवा युद्धं वाक्यमूचुर्महाबलौ।। निवर्तन्तां भवन्तो वै कुतो विप्रेषु क्रूरता। दुर्बला ब्राह्मणाश्चेमे भवन्तो वै महाबलाः।। द्वावत्र ब्राह्मणौ क्रूरौ वाय्विन्द्रसदृशौ बले। ये वा के वा नमस्तेभ्यो गच्छामः स्वपुरं वयम्।। एवं संभाषमाणास्ते न्यवर्तन्ताथ कौरवाः। जहृषुर्ब्राह्मणास्तत्र समेतास्तत्र सङ्घशः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "...और सहदेव के साथ बहुत देर तक युद्ध करके दुःशासन पराजित हो गए। वे रण में अपना धनुष छोड़कर घुटनों के बल पृथ्वी पर आ गिरे, और फिर उठकर तलवार और ढाल (चर्म) लेकर दौड़ पड़े। तब विकर्ण और चित्रसेन ने उस कौरव (दुःशासन) को पकड़ लिया और कहा— "हे कौरव्य! इन अबल ब्राह्मणों के साथ युद्ध मत करो!" दुसह और नकुल दोनों भी युद्ध करने के लिए उद्यत हो गए। उन दोनों महाबलियों को युद्ध के लिए तैयार देखकर कौरवों ने आपस में कहा— "आप लोग युद्ध से निवृत्त हो जाइए, ब्राह्मणों के प्रति क्रूरता कैसी? ये ब्राह्मण दुर्बल हैं और आप लोग महाबली हैं। किंतु यहाँ दो ऐसे क्रूर ब्राह्मण हैं जिनका बल वायु और इंद्र के समान है! जो भी हो, उन सबको नमस्कार है, अब हम अपने नगर को चलते हैं।" इस प्रकार आपस में चर्चा करते हुए वे कौरव युद्ध से पीछे हट गए। वहाँ एकत्र हुए ब्राह्मण समूह हर्षित हुए।
  • व्याख्या: दुःशासन भी सहदेव से हारकर मैदान छोड़ने लगे। कौरवों ने आपस में महसूस किया कि साधारण दिखने वाले ये ब्राह्मण (भीम और अर्जुन) वास्तव में वायु और इंद्र के समान असाधारण बलशाली हैं, इसलिए अब युद्ध बंद करके लौट जाना ही ठीक है।

श्लोक 50, 51, 52, 53, 54, 55, 56, 57 और 58:

बहुशस्ते ततस्तत्र क्षत्रिया रणमूर्धनि। प्रेक्षमाणास्तथाऽतिष्ठन्ब्राह्मणांश्च समन्ततः।। ब्राह्मणाश्च जयं प्राप्ताः कन्यामादाय निर्ययुः। विजिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च निर्जिते।। दुर्योधने चापयाते तथा दुःशासने रणात्।' शङ्किताः सर्वराजानः परिवव्रुर्वृकोदरम्।। ऊचुश्च सहितास्तत्र साध्विमौ ब्राह्मणर्षभौ। विज्ञायेतां क्वजन्मानौ क्वनिवासौ तथैव च।। को हि राधासुतं कर्णं शक्तो योधयितुं रणे। अन्यत्र रामाद्द्रोणाद्वा पाण्डवाद्वा किरीटिनः।। कृष्णाद्वा देवकीपुत्रात्कृपाद्वापि शरद्वतः। को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतियोथयितुं रणे।। तथैव मद्राधिपतिं शल्यं बलवतांवरम्। बलदेवादृते वीरात्पाण्डवाद्वा वृकोदरात्।। वीराद्दुर्योधनाद्वाऽन्यः शक्तः पातयितुं रणे। क्रियतामवहारोऽस्माद्युद्धाद्ब्राह्मणसंवृतात्।। ब्राह्मणा हि सदा रक्ष्याः सापराधाऽपिनित्यदा। अथैनानुपलभ्येह पुनर्योत्स्याम हृष्टवत।।

  • हिन्दी अनुवाद: रणभूमि में बहुत से क्षत्रिय चारों ओर खड़े होकर ब्राह्मणों को देखने लगे। भीमसेन द्वारा शल्य और कर्ण के पराजित किए जाने पर, तथा दुर्योधन और दुःशासन के रण से भाग जाने पर, विजय प्राप्त करके ब्राह्मण कन्या (द्रौपदी) को लेकर वहाँ से प्रस्थान करने लगे। तब सभी राजाओं ने शंकित होकर वृकोदर (भीमसेन) को घेर लिया और एक साथ मिलकर कहा— "शाबाश! ये दोनों ब्राह्मणर्षभ कौन हैं, इनका जन्म कहाँ हुआ है और इनका निवास कहाँ है, यह जानना चाहिए। कर्ण जैसे योद्धा को रण में कौन युद्ध कर सकता है?— सिवाय परशुराम, द्रोणाचार्य, किरीटी अर्जुन, देवकीपुत्र कृष्ण या कृपाचार्य के! और दुर्योधन को रण में कौन प्रतियोध कर सकता है? इसी प्रकार बलवानों में श्रेष्ठ मद्रराज शल्य तथा दुर्योधन को रण में गिराने में बलदाऊ, पाण्डव वृकोदर या वीर दुर्योधन के सिवाय दूसरा कौन समर्थ हो सकता है? इसलिए ब्राह्मणों से घिरे हुए इस युद्ध से हमें अब पीछे हट जाना चाहिए। ब्राह्मण चाहे अपराधी भी हों, वे सदा रक्षा करने योग्य होते हैं। इसलिए इन्हें जाने दें, और अवसर मिलने पर हम इन्हें ढूँढकर हर्षपूर्वक पुनः युद्ध करेंगे।"
  • व्याख्या: सभी राजाओं को अब यह पक्का विश्वास होने लगा कि ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हैं, बल्कि ये वही वीर (या उनके जैसे महान योद्धा) हैं जो कर्ण, शल्य और दुर्योधन जैसे महारथियों को हरा सकते हैं। वे युद्ध रोककर पीछे हटने का निर्णय लेते हैं।

श्लोक 59 से 69 (श्रीकृष्ण का हस्तक्षेप, पांडवों का प्रस्थान और कुंती के पास पहुँचना)

श्लोक 59, 60, 61, 62, 63 और 64:

वैशंपायन उवाच। तांस्तथावादिनः सर्वान्प्रसमीक्ष्य क्षितीश्वरान्। अथान्यान्पुरुषांश्चापि कृत्वा तत्कर्म संयुगे।। तत्कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः। निवारयामास महीपतींस्ता- न्धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वان्‍।। एवं ते विनिवृत्तास्तु युद्धाद्युद्धविशारदाः। यथावासं ययुः सर्वे विस्मिता राजसत्तमाः।। वृत्तो ब्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली ब्राह्मणैर्वृता। इति ब्रुवन्तः प्रययुर्ये तत्रासन्समागताः।। ब्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नौ रौरवाजिनवासिभिः। क्रच्छ्रेण जग्मतुस्तौ तु भीमसेनधनञ्जयौ।। विमुक्तौ जनसंबाधाच्छत्रुभिः परिविक्षतौ। कृष्णयानुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— युद्ध में उन राजाओं को तथा अन्य पुरुषों को इस प्रकार बातें करते हुए देखकर और भीम के उस पराक्रम को समझकर, भगवान श्रीकृष्ण ने उन कुंतीपुत्रों (पांडवों) की पहचान को सुरक्षित रखने की आशंका से, उन सभी महीपतों को समझा-बुझाकर शांत किया और कहा कि "यह कन्या धर्मपूर्वक (स्वयंवर की शर्त जीतकर) प्राप्त की गई है।" इस प्रकार युद्ध में विशारद वे सभी राजसत्तम युद्ध से निवृत्त होकर अपने-अपने आवास को लौट गए और विस्मित हो गए। "यह रंगभूमि ब्राह्मणों के पक्ष में रही और पाञ्चाली ब्राह्मणों से घिर गई"— ऐसा कहते हुए वहाँ एकत्र हुए लोग चले गए। मृगचर्म (रौरव अजिना) धारण किए हुए ब्राह्मणों के वेश में छिपे हुए वे दोनों वीर भीमसेन और अर्जुन अत्यंत कठिनाई से वहाँ से आगे बढ़े। जनसमूह की भीड़ और शत्रुओं से विमुक्त होकर, द्रौपदी द्वारा अनुगत हुए वे दोनों नृवीर ऐसे सुशोभित हो रहे थे...
  • व्याख्या: भगवान श्रीकृष्ण ने चतुराई से आगे आकर राजाओं को शांत किया और समझाया कि स्वयंवर की शर्त नियमों के तहत जीती गई है, जिससे बड़ा रक्तपात टल गया। इसके बाद भीम, अर्जुन और द्रौपदी ब्राह्मणों के वेश में वहाँ से रवाना हुए।

श्लोक 65, 66, 67, 68 और 69:

पौर्णमास्यां घनैर्मुक्तौ चन्द्रसूर्याविवोदितौ। तेषां माता बहुविधं विनाशं पर्यचिन्तयत्।। अनागच्छत्सु पुत्रेषु भैक्षकालै च लिङ्घिते। धार्तराष्ट्रैर्हताश्च स्युर्विज्ञाय कुरुपुङ्गवाः।। मायान्वितैर्वा रक्षोभिः सुघोरैर्दृढवैरिभिः। विपरीतं मतं जातं व्यासस्यापि महात्मनः।। इत्येवं चिन्तयामासं सुतस्नेहावृता पृथा। ततः सुप्तजनप्राये दुर्दिने मेघसंप्लुते।। महत्यथापराह्णे तु घनैः सूर्य इवावृतः। ब्राह्मणैः प्राविशत्तत्र जिष्णुर्भार्गववेश्म तत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: ...मानो पूर्णिमा के दिन बादलों से मुक्त होकर चंद्रमा और सूर्य उदित हुए हों। उधर उनकी माता (कुंती) उनके विनाश के विषय में अनेक प्रकार की चिंता कर रही थीं। भिक्षा माँगने के निर्धारित समय के बीत जाने पर भी जब पुत्र वापस नहीं आए, तो पुत्र-स्नेह से विह्वल पृथा (कुंती) सोचने लगीं— "कहीं ऐसा तो नहीं कि कुरुश्रेष्ठ धृतराष्ट्र के पुत्रों ने इन्हें पहचान कर मार डाला हो? अथवा किसी मायावी और घोर शत्रु राक्षसों ने इन्हें हानि पहुँचाई हो? लगता है महात्मा व्यासजी की बात भी विपरीत हो गई है।" पुत्र-स्नेह से घिरी हुई कुंती इस प्रकार की चिंता कर ही रही थीं कि तभी, रात होने के समय (जब लोग सोने की तैयारी में थे), बादलों से घिरे हुए उस दुर्दिन (वर्षा वाले दिन) के महान अपराह्न में, बादलों से ढके सूर्य के समान जिष्णु (अर्जुन), भीम और द्रौपदी ब्राह्मणों के साथ भार्गव (कुम्हार/ब्राह्मण) के उस निवास स्थान पर पहुँचे।
  • व्याख्या: कुंभकार की शाला (कुटिया) में बैठी माता कुंती अपने पुत्रों के लौटने में देर होने के कारण अत्यंत भयभीत और चिंतित थीं, तभी अर्जुन, भीम और द्रौपदी सकुशल वहाँ लौट आए। इसी के साथ स्वयंवरपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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