ऋग्वेद और पद्मपुराण का सुक्ष्म विज्ञान आध्यात्मिक पदार्थों का भौतिक पदार्थों में रुपांतरण



ऋग्वेद १०.११७.९

सार्वभौमिक चेतना, चित्त-संस्कार और जीव की व्यक्तिगत यात्रा

मंत्र

ऋग्वेद १०.११७.८ — जीव-जगत की परस्परता और व्याप्तिज्ञान का सिद्धांत

एकपाद्भूयो द्विपदो वि चक्रमे द्विपात्त्रिपादमभ्येति पश्चात्।
चतुष्पादेति द्विपदामभिस्वरे सम्पश्यन्पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः॥ ८॥

१. पिछले मंत्र से संबंध : ‘अभि ष्यात्’ और सार्वभौमिक व्याप्ति

पिछले मंत्र में ऋषि ने कृषि का उदाहरण देकर जीव और अन्न के बीच स्थापित संबंध की ओर ध्यान आकर्षित किया था। उत्पादक की वृत्तियाँ उसके कर्मों में प्रकट होती हैं, कर्म उत्पादन की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं और उत्पादन से प्राप्त पदार्थ अपने गुणधर्मों के माध्यम से जीव के साथ संबंध स्थापित करता है। इस प्रकार जीव और अन्न केवल दो अलग-अलग वस्तुएँ नहीं रह जाते; वे एक-दूसरे की जीवन-प्रक्रिया में भाग लेते हैं।

मंत्र के अंतिम पद ‘अपृणन्तमभि ष्यात्’ में सामने आया भाव इस संबंध को व्यापक रूप में देखने की दिशा देता है। यहाँ प्रश्न केवल किसी एक मनुष्य के दान अथवा अदाने का नहीं है, बल्कि उस व्याप्ति का है जिसमें एक जीव की वृत्तियाँ, उसका आचरण और उसके द्वारा उत्पन्न परिणाम दूसरे जीवों तक पहुँचते हैं। यही संबंध वनस्पतियों, अन्न, पशुओं और मनुष्यों के बीच भी कार्य करता है।

जीव अपने परिवेश से प्रभावित होता है और स्वयं भी अपने परिवेश को प्रभावित करता है। वह जिस अन्न को ग्रहण करता है, जिस वातावरण में रहता है, जिन प्राणियों के साथ संबंध स्थापित करता है और जिनके व्यवहार के संपर्क में आता है, वे सभी उसके जीवन की परिस्थितियों का हिस्सा बनते हैं। इसी प्रकार उसके अपने कर्म और व्यवहार दूसरे जीवों की परिस्थितियों को प्रभावित करते हैं।

इसलिए ऋषि का ध्यान एक जीव से दूसरे जीव तक, एक जीवन-प्रक्रिया से दूसरी जीवन-प्रक्रिया तक और एक प्रकार के अस्तित्व से दूसरे प्रकार के अस्तित्व तक विस्तृत होता है। यह विस्तार ही व्याप्तिज्ञान का आधार है—अर्थात् किसी सिद्धांत को केवल एक सीमित उदाहरण में नहीं, बल्कि उसके व्यापक संबंधों और अनेक स्तरों पर कार्य करने वाली प्रक्रिया में पहचानना।

२. ‘एकपात्’ : जीवन की सरल अवस्था से आरंभ

मंत्र का पहला पद है—‘एकपात्’। इस पद को जीवन की उस अवस्था के उदाहरण से समझा जा सकता है जिसमें जीव की संरचना अपेक्षाकृत सरल होती है। एककोशिकीय जीव इसका उदाहरण हैं। अमीबा जैसे जीवों में नर और मादा की अलग-अलग भूमिकाएँ प्रत्येक प्रजनन प्रक्रिया के लिए अनिवार्य नहीं होतीं। उनका जीवन अपनी विशिष्ट जैविक व्यवस्था के अनुसार संचालित होता है।

यहाँ एककोशिकीय जीव का उदाहरण प्रस्तुत करने का उद्देश्य केवल उसके शरीर की संरचना बताना नहीं है। उद्देश्य यह देखना है कि जीवन की अभिव्यक्ति विभिन्न स्तरों पर भिन्न होने के बावजूद व्यापक प्राकृतिक व्यवस्था के भीतर संबंधित रहती है। सरल संरचना वाला जीव भी अपने परिवेश से पदार्थ ग्रहण करता है, बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होता है और अपनी जीवन-प्रक्रिया के माध्यम से परिवेश के साथ संबंध बनाए रखता है।

इस प्रकार जीवन का अध्ययन केवल मनुष्य से आरंभ करके अन्य जीवों तक सीमित नहीं किया जा सकता। जीवन की विविध अवस्थाओं को एक साथ देखने पर ही यह समझ विकसित होती है कि जीव-जगत में परस्परता कितनी व्यापक है।

३. ‘भूयः द्विपदो वि चक्रमे’ : जीवन की विविधता और सार्वभौमिक व्यवस्था

इसके आगे मंत्र में ‘द्विपदः’ का उल्लेख आता है। दो पैरों पर चलने वाले जीवों में मनुष्य प्रमुख उदाहरण है। मनुष्य की शारीरिक संरचना, उसकी बुद्धि, भाषा और सामाजिक व्यवस्था अन्य अनेक जीवों से भिन्न हैं। फिर भी उसका जीवन उन व्यापक प्राकृतिक संबंधों से अलग नहीं हो जाता जिनमें अन्य जीव भी सहभागी हैं।

‘वि चक्रमे’ के भाव में विस्तार और विविध दिशाओं में गति का विचार सामने आता है। जीवन की अभिव्यक्तियाँ अनेक रूपों में विकसित होती हैं। शरीरों की बनावट अलग होती है, उनकी क्षमताएँ अलग होती हैं, उनकी जीवन-प्रक्रियाएँ और आवश्यकताएँ भी अलग होती हैं। लेकिन इस विविधता के भीतर पदार्थ, पोषण, परिवेश और परस्पर प्रभावों के संबंध निरंतर कार्य करते हैं।

मनुष्य अपने ज्ञान और बुद्धि के कारण इस व्यवस्था को समझने की क्षमता रखता है। वह अपने जीवन को प्रभावित करने वाले संबंधों को पहचान सकता है और अपने आचरण में परिवर्तन करके दूसरों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को भी बदल सकता है। यही क्षमता उसके दायित्व को बढ़ाती है। यदि वह अपने को अन्य जीवों से पूर्णतः अलग मानकर व्यवहार करता है, तो वह उन संबंधों की उपेक्षा कर सकता है जिन पर उसका अपना जीवन भी निर्भर है।

अतः यहाँ विविधता का अर्थ अलगाव नहीं है। जीवन के विभिन्न रूप अपने-अपने गुणधर्मों के साथ उपस्थित रहते हुए भी व्यापक व्यवस्था के भीतर एक-दूसरे से संबंधित हैं।

४. ‘द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्’ : मनुष्य, त्रिगुणात्मक प्रकृति और ईश्वरीय व्यवस्था

मंत्र का अगला पद है—

‘द्विपात् त्रिपादमभ्येति पश्चात्।’

यहाँ द्विपद के आगे त्रिपाद का उल्लेख विचार को दूसरे स्तर पर ले जाता है। त्रिपाद को त्रिगुणात्मक प्रकृति—सत्त्व, रजस् और तमस्—के संदर्भ में समझने पर जीव के व्यवहार और प्रकृति के गुणों के बीच संबंध सामने आता है।

सत्त्व, रजस् और तमस् प्रकृति की तीन गुणात्मक प्रवृत्तियों के रूप में विचार की दिशा निर्धारित करते हैं। जीव का व्यवहार, उसकी वृत्तियाँ और उसकी क्रियाशीलता इन गुणों के विभिन्न प्रभावों के अंतर्गत प्रकट होती हैं। इस दृष्टि से मनुष्य का जीवन केवल उसकी बाहरी शारीरिक संरचना से निर्धारित नहीं होता; उसकी आंतरिक प्रवृत्तियाँ और प्रकृति के गुणात्मक संबंध भी महत्त्वपूर्ण हैं।

‘अभ्येति’ का भाव समीप पहुँचने अथवा किसी दिशा में अग्रसर होने का है। यहाँ इस संबंध को ईश्वरीय व्यवस्था के बोध से जोड़कर देखा जा सकता है। मनुष्य जब अपने भीतर की वृत्तियों, प्रकृति के गुणों और अपने कर्मों के परिणामों को समझने का प्रयास करता है, तब वह अपने जीवन को व्यापक व्यवस्था के संदर्भ में देखने की दिशा में आगे बढ़ता है।

‘पश्चात्’ का उल्लेख इस क्रम को आगे बढ़ाता है। विचार एक स्तर पर रुकता नहीं, बल्कि उसके प्रभाव और संबंध आगे तक विस्तृत होते हैं। मनुष्य की वृत्तियाँ उसके व्यवहार में प्रकट होती हैं; उसका व्यवहार उसके आसपास के जीवों को प्रभावित करता है; और उन प्रभावों के माध्यम से जीवन की परस्पर संबद्ध प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

५. ‘चतुष्पादेति’ : मनुष्य के साथ रहने वाले अन्य जीव

मंत्र आगे कहता है—‘चतुष्पाद् एति’। चार पैरों वाले जीवों में गाय, भैंस, बैल, घोड़ा, हाथी तथा अन्य पशु प्रमुख उदाहरण हैं। इनमें से अनेक जीव मनुष्य के साथ रहते हैं, उसके जीवन और कर्मों से जुड़े होते हैं तथा उसकी गतिविधियों से प्रत्यक्ष रूप में प्रभावित होते हैं।

पालतू पशुओं और मनुष्य के संबंध को केवल उपयोगिता के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य उनके लिए भोजन, आश्रय और सुरक्षा की व्यवस्था करता है; दूसरी ओर पशु भी अपने जीवन, व्यवहार और क्षमताओं के माध्यम से मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं। यह संबंध परस्पर निर्भरता का रूप ले सकता है।

इस संबंध में मनुष्य का व्यवहार निर्णायक महत्त्व रखता है। स्नेह, देखभाल और सुरक्षा से युक्त व्यवहार तथा उपेक्षा, भय और क्रूरता से युक्त व्यवहार एक जैसे परिणाम नहीं उत्पन्न करते। पशु जिस वातावरण में रहता है और मनुष्य उसके साथ जिस प्रकार का व्यवहार करता है, वे उसके जीवन की परिस्थितियों तथा उसके व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

इस प्रकार मनुष्य के कर्मों का प्रभाव केवल मनुष्यों के बीच सीमित नहीं रहता। उसके साथ रहने वाले अन्य जीव भी उसके आचरण से प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि जीव-जगत के संबंधों को समझते समय मनुष्य और अन्य प्राणियों के बीच स्थापित संबंधों को भी समग्र दृष्टि से देखना आवश्यक है।

६. ‘द्विपदामभिस्वरे’ : मनुष्य के विचार और व्यवहार का प्रभाव

मंत्र का अगला पद है—‘द्विपदाम् अभिस्वरे’। यहाँ मनुष्य के साथ रहने वाले जीवों और उसके प्रभाव के संबंध को आगे बढ़ाया जा सकता है। मनुष्य केवल अपने हाथों से किए गए कार्यों के माध्यम से ही दूसरों को प्रभावित नहीं करता; उसकी वाणी, व्यवहार और भावनात्मक प्रवृत्तियाँ भी उसके संबंधों का स्वरूप निर्धारित करती हैं।

प्रेम और सद्भाव से युक्त व्यवहार किसी जीव के लिए सुरक्षा और विश्वास का वातावरण निर्मित कर सकता है। इसके विपरीत, भय, घृणा और द्वेष से युक्त व्यवहार उसके लिए तनाव तथा असुरक्षा की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य का आंतरिक भाव उसके बाहरी व्यवहार में प्रकट होता है और वही व्यवहार दूसरे जीवों के अनुभव का हिस्सा बनता है।

यहाँ प्रभाव की दिशा एकतरफा नहीं है। मनुष्य अपने व्यवहार से दूसरे जीव को प्रभावित करता है, लेकिन दूसरे जीव की प्रतिक्रिया भी मनुष्य के व्यवहार और अनुभव को प्रभावित करती है। इस प्रकार दोनों के बीच एक निरंतर संबंध स्थापित रहता है।

यही बात अन्न के संदर्भ में भी लागू होती है। जीव जिस अन्न को ग्रहण करता है, उसके साथ पदार्थ और शरीर का संबंध स्थापित होता है। इसी प्रकार जीव जिस वातावरण में रहता है, उसमें उपस्थित दूसरे जीवों के व्यवहार से भी उसका संबंध बनता है। जीवन की प्रक्रिया को समझने के लिए इन संबंधों को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के स्थान पर उनके पारस्परिक प्रभाव को समझना आवश्यक है।

७. ‘सम्पश्यन् पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः’ : सम्यक् दृष्टि और जीव-जगत की श्रृंखला

मंत्र के अंतिम पद हैं—

‘सम्पश्यन् पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः।’

यहाँ ‘सम्पश्यन्’ सम्यक् दृष्टि की ओर ध्यान दिलाता है। सम्यक् दृष्टि का अर्थ केवल किसी एक जीव को देख लेना नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़े हुए संबंधों को भी पहचानना है। यदि मनुष्य केवल अपने तत्काल लाभ को देखता है, तो वह अपने कर्मों के व्यापक प्रभावों को नहीं समझ पाता। लेकिन जब वह अपने कर्म, अपने उत्पाद, अन्न, वनस्पति, पशु और दूसरे मनुष्यों के बीच स्थापित संबंधों को एक साथ देखता है, तब उसके सामने जीवन की अधिक व्यापक तस्वीर आती है।

‘पङ्क्तीन्’ को जीवों की श्रृंखला, क्रम अथवा परस्पर जुड़े समूहों के संदर्भ में समझा जा सकता है। जीव अकेले अस्तित्व में दिखाई दे सकता है, लेकिन उसका जीवन अनेक संबंधों के भीतर संचालित होता है। अन्न वनस्पति से प्राप्त होता है; वनस्पति अपने परिवेश से पदार्थ और ऊर्जा ग्रहण करती है; मनुष्य तथा अन्य जीव अन्न पर निर्भर रहते हैं; और उनके कर्म पुनः परिवेश तथा दूसरे जीवों को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार एक जीव की जीवन-प्रक्रिया अनेक दूसरी जीवन-प्रक्रियाओं से जुड़ी रहती है।

‘उपतिष्ठमानः’ का भाव इन संबंधों के समीप उपस्थित होने, उन्हें स्वीकार करने और उनके प्रति अपने आचरण को व्यवस्थित करने की दिशा में देखा जा सकता है। सम्यक् दृष्टि केवल संबंधों को पहचानने पर समाप्त नहीं होती; वह मनुष्य को उन संबंधों के प्रति उत्तरदायी व्यवहार की ओर भी ले जाती है।

इस दृष्टि से मनुष्य का दायित्व केवल अपने जीवन का पोषण करना नहीं, बल्कि उन संबंधों को भी समझना है जिनके भीतर उसका जीवन संभव होता है। वह अपने ज्ञान और विवेक का उपयोग करके अपने कर्मों के प्रभावों को पहचान सकता है तथा अपने व्यवहार को अधिक सम्यक् बना सकता है।

८. आचार्य जगदीशचंद्र बोस और वनस्पतियों की संवेदनशीलता

जीव-जगत की परस्परता को समझने के लिए आचार्य जगदीशचंद्र बोस के वनस्पति संबंधी अनुसंधानों का उदाहरण उपयोगी है। उन्होंने अपने प्रयोगों के माध्यम से दिखाया कि पौधों में बाहरी उद्दीपनों के प्रति मापने योग्य प्रतिक्रियाएँ होती हैं। उनके द्वारा विकसित क्रेस्कोग्राफ ने पौधों की अत्यंत सूक्ष्म वृद्धि और प्रतिक्रियाओं को दर्ज करने में सहायता की। इस कार्य ने वनस्पतियों के जीवन और उनकी प्रतिक्रियाओं के अध्ययन को एक नया आयाम दिया।

इस उदाहरण का महत्त्व यह है कि जीवन की अभिव्यक्ति को केवल मनुष्य और पशुओं के परिचित व्यवहार तक सीमित नहीं किया जा सकता। वनस्पतियाँ भी अपने परिवेश के प्रति प्रतिक्रियाएँ प्रदर्शित करती हैं। इससे जीव-जगत के विभिन्न रूपों को अधिक व्यापक दृष्टि से देखने की प्रेरणा मिलती है।

यहाँ वनस्पति की प्रतिक्रिया और मनुष्य की भावना को एक ही प्रकार की घटना मानना आवश्यक नहीं है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जीवन के विभिन्न रूप अपने-अपने गुणधर्मों के अनुसार परिवेश के साथ संबंध स्थापित करते हैं। मनुष्य का व्यवहार वनस्पति और पशु के जीवन की परिस्थितियों को प्रभावित कर सकता है; उसी प्रकार वनस्पतियाँ और अन्य जीव भी मनुष्य के जीवन तथा उसके परिवेश को प्रभावित करते हैं।

इस उदाहरण के माध्यम से मंत्र की विचार-दिशा को आधुनिक अनुसंधान के साथ समझने का अवसर मिलता है। मंत्र का व्यापक विषय किसी एक प्रजाति की विशेषता नहीं, बल्कि जीवों के बीच स्थापित संबंधों और उनके परस्पर प्रभाव की पहचान है।

९. निष्कर्ष : जीवन की परस्परता का बोध

ऋग्वेद १०.११७.८ में जीवन के विभिन्न रूपों का उल्लेख एक व्यापक विचार-क्रम के भीतर आता है। एकपाद, द्विपद, त्रिपाद और चतुष्पाद के संदर्भ में जीवन की विविध अवस्थाओं और उनके संबंधों को देखा जा सकता है। इन रूपों की संरचना, क्षमताएँ और जीवन-प्रक्रियाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन वे एक व्यापक प्राकृतिक व्यवस्था के भीतर परस्पर संबंधित हैं।

पिछले मंत्र में अन्न और जीव के संबंध से जो विचार आरंभ हुआ था, यहाँ वह जीव-जगत की व्यापक परस्परता तक पहुँचता है। उत्पादक की वृत्तियाँ उसके कर्मों को प्रभावित करती हैं; कर्मों से उत्पन्न पदार्थ जीव के साथ संबंध स्थापित करते हैं; जीव अपने परिवेश से प्रभावित होता है और अपने व्यवहार से दूसरे जीवों को प्रभावित करता है। इस प्रकार प्रभावों की एक श्रृंखला निर्मित होती है।

सम्यक् दृष्टि का अर्थ इसी श्रृंखला को पहचानना है। जब मनुष्य अपने जीवन को दूसरे जीवों से पूर्णतः अलग मानकर नहीं, बल्कि उनके साथ स्थापित संबंधों के भीतर समझता है, तभी वह अपने कर्मों के व्यापक प्रभाव को पहचान सकता है। यही व्याप्तिज्ञान की दिशा है—जीवन की विविध अभिव्यक्तियों में परस्पर संबंध को देखना और उस बोध के अनुसार अपने आचरण को व्यवस्थित करना।

ऋग्वेद १०.११७.७ — 

मूल मंत्र

कृषन्नित्फाल आशितं कृणोति यन्नध्वानमप वृङ्क्ते चरित्रैः।

वदन्ब्रह्मावदतो वनीयान्पृणन्नापिरपृणन्तमभि ष्यात्॥७॥

जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने अंतिम पद में केवलाधो भवति केवलादि रखा था इसमे दो शब्द के मध्य में एकं शब्द भवति होना है, जैसा कि पहला शब्द केवल+आधि मतलब जिसके पास केवल भौतिक वस्तुओं से संबंधित ज्ञान और संग्रह है, दुसरा शब्द बिल्कुल इसके विपरित है केवल+आदि जिसके पास के ईश्वरीय ज्ञान है दोनो आधुरे है, जैसे एक लंगड़ा बिना पैर के है, दुसरा दोनों आंखों से अंधा है पैर तो है लेकिन आंख नहीं है इसलिए संसार में यात्रा करना बहुत कठीन हो जाता है दुसरी तरफ आंख तो है लेकिन पैर नहीं है जिससे वह गतिशील नही हो सकता है एक ऐसा वायुमंडल निर्मित कर सकता है जिसमें कोई गतिविधि नहीं सब कुछ स्थित जड़ हो जहां कोई मोसन बाइब्रेसन संबेदनशिलता न है यह दो अपुर्ण है यही भाव पिछले मंत्र का था जबकि दोनों के मध्य भवति वह सामंजस्य हार्मोनी का काम करता है जिसको साखायाम् के रूप में अभिव्यक्त किया गया है। एक फिल्म आइ थी काफी पहले दोस्ती जिसमे दो दोस्त होते है एक अंधा दुसरा लंगड़ा रहता है इसमें अंधा आदमी लंगड़े को अपने कंधे पर बैठा लेता है, जिससे दोनों का जीवन सफर आसान हो जाता है। यही बात आइंस्टीन भी कही कहता है बिना आध्यात्मिक ज्ञान के विज्ञान अंधा है और बिना विज्ञान के आध्यात्मिक ज्ञान लंगड़ा है ऐसा ही भाव इस मंत्र का है। बहरहाल यह वर्तमान मंत्र की आधारशिला वही दो प्रकार के मनुष्य है जो ऐश्वर्य से संपन्न है दोनों अपनी अपनी उपलब्धियों का चरमोत्कर्ष है अब यह वर्तमान मंत्र उन्ही का दिशा निर्देश करते हुए कहता है कि जैसे कृषन्नित्फाल किसान का कर्म और फल पुरी तरह से उसके उपर निर्भर नहीं करता है भले ही वह कितना ही सयाना बुद्धि मान और संसाधन संपन्न हो, एक किसान जो प्रकृति के आश्रित करता है वहां फल उसके कर्म के बाद भी प्रकृति के परिणामस्वरूप प्रकट होते है जैसे प्राचिन काल में अतिवृष्टी या सुखा पड़ जाता था जिससे वह यज्ञ हवन और देवताओं को प्रसन्न करते थे। दुसरी तरफ आज के आधुनिक वैज्ञानिक द्वारा कृषि कार्य होता है जिसमें सबकुछ नियंत्रित लगभग कर लिया गया है उसमें जो उत्पादन हो रहा है उस अनाज फल सब्जी औषधि में रासायनिक मिलावट करके उत्पादन बढ़ा लिया गया है यद्यपि वह जैविक रूप से मानवजाति के हानिकारक सिद्ध हो रहा है। यहां भी फल पुरी तरह वैज्ञानिकों कै आश्रित नहीं है क्योंकि जैसा कि मंत्र कह रहा है। आशितं उनके उत्पादन के पिछे जो भावना कार्य कर रही है वह तम अज्ञानांधकार से आच्छादित है जिससे फल आशा जनक नहीं प्राप्त होते हैं। कृणोति कर्म तो दोनों करते है, लैकिन यन यह कर्म किस प्रकार की भावना से प्रेरित होकर किया जाता है, अध्वानम् यहा भी वही भावना की तरफ संकेत है अध्व आधा नम नाम रूप संस्कार विद्यमान है इसलिए अप जल भी जिससे फसल का सिंञ्चन किया जा रहा है यह भौतिक जल नहीं भावना है वृङ्के अलग अलग परिणाम फल को उत्पन्न करता है क्योंकि यहां चरित्रै: जो मनुष्य इस कृषि कार्य को कर रहा है उसके चरित्र पर जोर देने समझने के लिए है एक दुष्ट चरित्र वाला किसान सिर्फ अनाज का उत्पादन करके परिवार समाज स़सार तक नहीं पहुचाता उसकी वह भावना भी उसके उत्पादों के साथ सम्मिलित हो कर परिवार समाज संसार का निर्माण करती है, इसके विपरित एक सज्जन सद्भावना से प्रेरित सद्गुणी जैसा कि आर्यम शब्द पिछले मंत्र इसी भाव पर जो देने क लिए था। यहि नहीं इससे भी आगे उस उत्पाद पर कृषक के विचारो का भी प्रभाव फड़ता है, क्योंकि यह ब्रह्म से संबंधित तत्व है यह साधारण अनाज जैसा नहीं है यह ब्रह्म का बीज है इससे ब्रह्म ही विकसित होता है और इस पर उस उत्पादन करने वाले के चरित्र वाणी का गहरा प्रभाव पड़ता है जो फल के साथ जुड़ जाता है। अवदत इसके विपरित जो इसको जानने के बाद भी जिसकी चर्चा पिछे कि जारही है इसके बारे में लोगों को समाज में जागृति ना फैलाने वाले लोग है, वनीयान् वनीया व्यारी व्यवसायात्मिक बुद्धि को धारण करने वाले जंन के समान है फायदा नुकसान कि दृष्टि में बंधा ज्ञान विज्ञान का सुचक कि तरह इस शब्द को रखा गया है। पृणन् प्रणन प्राणन प्राण से रहित जड़ बुद्धि जन आपि: जिनकी आत्म मर चुकी है जो पापी दुष्टात्माएं है अपृणन्तम् सिर्फ अपने स्वार्थ के वशीभूत हो संसार के भौतिक पदार्थों का दोहन करते है। अभि आज के वर्तमान युग में ष्यात ऐसे लोग ही विश्व का संचालन कर रहे हैं।

पिछले मंत्र की निरंतरता : अपूर्णता से सामंजस्य तक

पिछले मंत्र के अंतिम पद में आए ‘केवलाघो भवति केवलादि’ को समझना वर्तमान मंत्र की आधारशिला है। यहाँ दो प्रकार के मनुष्यों का संकेत मिलता है। एक वह है जिसके पास केवल भौतिक वस्तुओं से संबंधित ज्ञान और उनका संग्रह है; दूसरा वह है जिसके पास ईश्वरीय ज्ञान है, लेकिन भौतिक संसार में उस ज्ञान को क्रियाशील बनाने के आवश्यक साधन नहीं हैं। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में उपलब्धियों के चरम तक पहुँच सकते हैं, फिर भी दोनों की अपूर्णता बनी रहती है।

इसे दो ऐसे व्यक्तियों के उदाहरण से समझा जा सकता है जिनमें एक लँगड़ा है और दूसरा अंधा। लँगड़े के पास आँखें हैं, वह देख सकता है, मार्ग पहचान सकता है, लेकिन पैरों के अभाव में स्वयं चल नहीं सकता। दूसरी ओर अंधे के पास पैर हैं, वह चल सकता है, लेकिन आँखों के अभाव में मार्ग देख नहीं सकता। एक के पास दिशा पहचानने की क्षमता है, पर गति नहीं; दूसरे के पास गति है, पर दिशा का ज्ञान नहीं। दोनों की क्षमताएँ अपने-अपने स्थान पर उपयोगी हैं, लेकिन अलग-अलग रहने पर जीवन की यात्रा कठिन हो जाती है।

पुरानी फिल्म दोस्ती में भी दो ऐसे मित्रों की कथा थी—एक अंधा और दूसरा लँगड़ा। अंधा व्यक्ति लँगड़े को अपने कंधे पर बैठाकर चलता है। इस प्रकार एक की गति और दूसरे की दृष्टि मिलकर दोनों की यात्रा को संभव बनाती हैं। यहाँ किसी एक की क्षमता दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रश्न नहीं है। प्रश्न यह है कि दोनों की अपूर्ण क्षमताएँ एक-दूसरे के सहयोग से किस प्रकार पूर्णता की दिशा में बढ़ सकती हैं।

यही बात विज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान के संबंध में भी सामने आती है। विज्ञान के पास भौतिक जगत को समझने, उसके नियमों को पहचानने और प्रकृति में परिवर्तन करने के साधन हैं। आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को अस्तित्व के मूल तत्त्व, जीवन के उद्देश्य और कर्म की दिशा का बोध कराता है। जब विज्ञान आध्यात्मिक ज्ञान से अलग हो जाता है, तो उसके पास साधन और क्रियाशीलता तो रह जाते हैं, लेकिन उनके उपयोग की समग्र दिशा धुँधली हो सकती है। जब आध्यात्मिक ज्ञान विज्ञान से अलग हो जाता है, तो उसके पास दृष्टि तो होती है, लेकिन उस दृष्टि को संसार में क्रियान्वित करने के साधन सीमित रह जाते हैं।

इसलिए यहाँ ‘भवति’ और ‘सखायम्’ के भाव को सामंजस्य तथा सहयोग के रूप में समझना आवश्यक है। यह संबंध दोनों को मिटाकर एक जैसा बना देने का नहीं, बल्कि उनकी विशिष्ट क्षमताओं को परस्पर सहयोगी बनाने का है। जब दृष्टि और गति, आध्यात्मिक ज्ञान और वैज्ञानिक क्षमता, उद्देश्य और साधन एक-दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित करते हैं, तभी उनकी उपलब्धियाँ व्यापक अर्थ प्राप्त करती हैं।

वर्तमान मंत्र की आधारशिला : कर्म समान, लेकिन परिणाम की दिशा अलग

पिछले मंत्र में ज्ञान के दो अधूरे स्वरूपों के बीच सामंजस्य की आवश्यकता सामने आई थी। वर्तमान मंत्र उसी प्रश्न को कर्म और उसके परिणामों के क्षेत्र में ले जाता है। यहाँ दो प्रकार के मनुष्य हैं, जो अपने-अपने ऐश्वर्य और उपलब्धियों के साथ संसार में सक्रिय हैं। दोनों कर्म करते हैं, दोनों उत्पादन करते हैं और दोनों अपने ज्ञान तथा साधनों का उपयोग करते हैं। लेकिन उनके कर्मों के पीछे कार्य करने वाली भावना, उनके चरित्र और उनके ज्ञान की दिशा में अंतर है। यही अंतर उनके कर्मों से उत्पन्न होने वाले परिणामों को अलग-अलग स्वरूप देता है।

मंत्र का आरंभ है—

कृषन्नित्फाल आशितं कृणोति यन्नध्वानमप वृङ्क्ते चरित्रैः।

इसमें कृषि का उदाहरण सामने आता है। किसान भूमि जोतता है, बीज बोता है, सिंचाई करता है और फसल उगाने के लिए परिश्रम करता है। उसके पास अनुभव हो सकता है, बुद्धि हो सकती है और पर्याप्त साधन भी हो सकते हैं। फिर भी कृषि का परिणाम केवल किसान की इच्छा और कर्म से निर्धारित नहीं होता। प्रकृति की दशाएँ, वर्षा, तापमान, भूमि की स्थिति और अनेक दूसरे कारक उत्पादन को प्रभावित करते हैं।

प्राचीन समय में अतिवृष्टि और अनावृष्टि के कारण फसलें नष्ट हो जाती थीं। किसान अपने श्रम के बावजूद इच्छित फल प्राप्त नहीं कर पाता था। ऐसी परिस्थितियों में यज्ञ, हवन और देवताओं की प्रसन्नता के लिए किए जाने वाले अनुष्ठान भी कृषि तथा जीवन की समृद्धि से जुड़े हुए थे। मनुष्य यह अनुभव करता था कि उसके कर्म का परिणाम किसी व्यापक व्यवस्था के भीतर प्रकट होता है।

आज आधुनिक विज्ञान ने कृषि के साधनों और प्रक्रियाओं को बहुत विकसित कर दिया है। सिंचाई, उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनियंत्रण, नियंत्रित वातावरण तथा आधुनिक मशीनों के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने के अनेक उपाय उपलब्ध हैं। मनुष्य ने प्रकृति की बहुत-सी प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने की क्षमता प्राप्त की है। फिर भी उत्पादन का प्रश्न केवल मात्रा तक सीमित नहीं रहता। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि किस उद्देश्य से उत्पादन किया जा रहा है, कौन-सी विधियाँ अपनाई जा रही हैं और उनसे प्राप्त अन्न, फल, सब्जियों तथा औषधियों का मानवजीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।

यदि उत्पादन बढ़ाने की भावना में केवल अधिक लाभ प्राप्त करना प्रधान हो जाए, तो उत्पादन की मात्रा बढ़ने के बावजूद उसके गुण, उपयोगिता और मानवजीवन के साथ उसके संबंध पर प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं। इस प्रकार कृषि का उदाहरण केवल खेत में बीज बोने और फसल काटने तक सीमित नहीं रहता। यह मनुष्य की उस संपूर्ण प्रक्रिया का उदाहरण बन जाता है जिसमें ज्ञान, उद्देश्य, भावना और कर्म मिलकर किसी परिणाम को जन्म देते हैं।

‘कृषन्नित्फाल’ : कर्म करने वाला और कर्मफल की सीमा

कृषन् कृषि करने, भूमि जोतने और उत्पादन के लिए परिश्रम करने की क्रिया को सामने रखता है। फालः उस उपकरण का संकेत करता है जिसके द्वारा भूमि को जोता जाता है। इस प्रकार मंत्र के आरंभ में ही मनुष्य के कर्म और उसके उपकरण सामने आ जाते हैं।

कृषि करने वाला मनुष्य अपने साधनों का उपयोग करता है, लेकिन साधन अपने आप में यह सुनिश्चित नहीं करते कि उनसे उत्पन्न परिणाम मानवजीवन के लिए कल्याणकारी ही होगा। एक ही साधन का उपयोग अलग-अलग उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है। इसलिए कर्म का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उससे कितना उत्पादन हुआ। यह भी देखना आवश्यक है कि उस कर्म के पीछे कौन-सी भावना कार्य कर रही थी और उसका परिणाम किस प्रकार के जीवन का निर्माण कर रहा है।

यहाँ से मंत्र का ध्यान कर्म की बाहरी क्रिया से हटकर उसके आंतरिक आधार की ओर बढ़ता है। दो किसान एक ही भूमि पर समान प्रकार के बीज बो सकते हैं, समान मात्रा में जल दे सकते हैं और लगभग समान साधनों का प्रयोग कर सकते हैं। फिर भी उनके कर्म का संपूर्ण अर्थ समान नहीं हो जाता, क्योंकि कर्म करने वाले मनुष्य की भावना, चरित्र और उद्देश्य भी उस प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

‘आशितम्’ : उत्पादन के पीछे छिपी भावना

आशितम् को यहाँ केवल तैयार अन्न या प्राप्त खाद्य पदार्थ के रूप में सीमित नहीं किया जा सकता। यह उस उत्पादन और उसके पोषणकारी परिणाम की ओर भी संकेत करता है, जिसे मनुष्य अपने कर्म से प्राप्त करना चाहता है। इस दृष्टि से प्रश्न केवल यह नहीं है कि अन्न कितना पैदा हुआ, बल्कि यह भी है कि उत्पादन के पीछे कौन-सी भावना सक्रिय थी।

यदि मनुष्य अज्ञान के अंधकार से आच्छादित होकर केवल संग्रह, लाभ और अपने स्वार्थ को सर्वोपरि रखता है, तो उसके कर्म से प्राप्त फल भी उसी सीमित दृष्टि के भीतर व्यवस्थित होता है। वह उत्पादन को जीवन के पोषण का साधन मानने के स्थान पर केवल लाभ बढ़ाने का साधन बना सकता है। ऐसी स्थिति में बाहरी उपलब्धि बढ़ने पर भी उसके भीतर वह व्यापक बोध विकसित नहीं होता, जो उत्पादन को मानवजीवन के वास्तविक कल्याण से जोड़ता है।

इसलिए मंत्र का संकेत केवल खाद्य पदार्थ की ओर नहीं, बल्कि उस भावना की ओर भी है जो उसके उत्पादन में सक्रिय रहती है। मनुष्य जो उत्पन्न करता है, उसका सामाजिक अर्थ केवल पदार्थ की मात्रा से निर्धारित नहीं होता। उसके कर्म का उद्देश्य और उसके चरित्र की दिशा भी उस परिणाम के अर्थ को प्रभावित करती है।

‘कृणोति’ और ‘यन्नध्वानम्’ : कर्म की दिशा और उसका आंतरिक मार्ग

कृणोति का अर्थ है—करता है, बनाता है अथवा उत्पन्न करता है। दोनों प्रकार के मनुष्य कर्म करते हैं। कोई कर्म से बचा हुआ नहीं है। अंतर कर्म करने और न करने का नहीं, बल्कि उस कर्म को संचालित करने वाली भावना का है।

यहीं ‘यन् अध्वानम्’ का भाव महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अध्वान केवल बाहरी रास्ते का नाम नहीं रह जाता; वह उस दिशा और प्रक्रिया का संकेत भी बनता है जिसके अनुसार मनुष्य अपने कर्म को आगे बढ़ाता है। मनुष्य किस उद्देश्य से कर्म कर रहा है, उसके भीतर कौन-से संस्कार सक्रिय हैं और उसकी बुद्धि किस परिणाम को प्राप्त करना चाहती है—ये सब उसके कर्म की दिशा निर्धारित करते हैं।

इस संदर्भ में ‘अप वृङ्क्ते’ अलग-अलग दिशाओं और परिणामों के उत्पन्न होने का संकेत देता है। कर्म की बाहरी क्रिया समान दिखाई दे सकती है, लेकिन उसके पीछे कार्य करने वाला आंतरिक मार्ग अलग हो सकता है। इसी कारण समान साधनों और समान प्रकार के श्रम से उत्पन्न परिणामों का जीवन पर प्रभाव भी अलग हो सकता है।

यहाँ जल का उदाहरण भी इसी भाव को स्पष्ट करता है। खेत में सिंचाई के लिए प्रयुक्त भौतिक जल एक आवश्यक साधन है, लेकिन जल उपलब्ध करा देना ही कृषि की पूरी प्रक्रिया नहीं है। जल का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है, उत्पादन की व्यवस्था कैसी है और उत्पाद को किस प्रकार समाज तक पहुँचाया जा रहा है—इन सबका संबंध उस व्यापक प्रक्रिया से है जिसके भीतर कृषि का परिणाम निर्मित होता है। बाहरी साधन आवश्यक हैं, लेकिन वे कर्म की संपूर्ण दिशा को अकेले निर्धारित नहीं करते।

‘चरित्रैः’ : कर्म करने वाले का चरित्र भी परिणाम का अंग है

मंत्र में ‘चरित्रैः’ के माध्यम से मनुष्य के आचरण और चरित्र पर विशेष बल दिया गया है। कृषि करने वाला व्यक्ति केवल खेत में अन्न उत्पन्न नहीं करता; उसके उद्देश्य और आचरण का प्रभाव उसके पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है। उसके कर्म का परिणाम केवल खेत की सीमा में समाप्त नहीं होता।

यदि किसान का चरित्र स्वार्थ और छल से संचालित है, तो वह उत्पादन को केवल अपने लाभ तक सीमित रख सकता है। वह यह विचार कर सकता है कि अधिक अनाज उत्पन्न करना ही उसकी सफलता है, चाहे उसके उत्पादन और व्यापार की प्रक्रिया में दूसरों के हित की उपेक्षा हो। ऐसी भावना उसके परिवार, समाज और व्यापक संसार के साथ उसके संबंधों को भी प्रभावित करती है।

इसके विपरीत, सद्भावना से प्रेरित और सद्गुणों से युक्त व्यक्ति अपने कर्म को केवल निजी लाभ का साधन नहीं मानता। उसके लिए उत्पादन जीवन के पोषण और दूसरों के कल्याण से भी जुड़ा होता है। यहाँ पिछले मंत्र में सामने आया आर्यत्व का भाव फिर से महत्त्वपूर्ण हो जाता है। मनुष्य का मूल्य केवल उसकी भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन गुणों से भी निर्धारित होता है जिनके आधार पर वह अपनी उपलब्धियों का उपयोग करता है।

इस प्रकार चरित्र का प्रभाव केवल मनुष्य के व्यक्तिगत व्यवहार तक सीमित नहीं रहता। वह उसके कर्मों के माध्यम से समाज में प्रवेश करता है और सामाजिक जीवन के निर्माण में भाग लेता है। मनुष्य जो कुछ उत्पन्न करता है, उसके साथ उसके उद्देश्य और आचरण का प्रभाव भी उसके संबंधों तथा सामाजिक व्यवस्था में आगे बढ़ता है।

‘वदन् ब्रह्मा’ : वाणी, ज्ञान और ब्रह्म से संबंधित उत्पादन

मंत्र का अगला चरण है—

वदन् ब्रह्मा अवदतः वनीयान्।

यहाँ विचार कृषि के उदाहरण से आगे बढ़कर ज्ञान, वाणी और ब्रह्म से संबंधित तत्त्व तक पहुँचता है। इस उत्पादन को साधारण भौतिक उत्पादन तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यहाँ बीज का अर्थ उस ज्ञान और तत्त्व से भी जुड़ता है, जिसके माध्यम से आगे चलकर जीवन और समाज का स्वरूप निर्मित होता है।

मनुष्य की वाणी उसके भीतर उपस्थित ज्ञान, भावना और चरित्र को व्यक्त करती है। वह जो कहता है, केवल ध्वनियों का समूह नहीं होता; उसके पीछे एक दृष्टि, उद्देश्य और आंतरिक संस्कार कार्य करते हैं। इसलिए ब्रह्मज्ञान से संबंधित वाणी का प्रभाव केवल सूचना देने तक सीमित नहीं रहता। वह सुनने वाले की चेतना, विचार और जीवन-दिशा को प्रभावित कर सकती है।

इसी कारण इस मंत्र में उत्पादन और वाणी के बीच संबंध स्थापित होता है। खेत में बोया गया बीज आगे चलकर अन्न उत्पन्न करता है; उसी प्रकार ज्ञान और वाणी के माध्यम से बोया गया विचार आगे चलकर व्यक्ति तथा समाज के जीवन में विकसित हो सकता है। यदि बीज का संबंध ब्रह्म से है, तो उससे विकसित होने वाले परिणाम को भी उस व्यापक तात्त्विक संबंध के भीतर समझना होगा।

यहाँ उत्पादक के चरित्र और वाणी का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है। जिस व्यक्ति के भीतर ज्ञान और सद्भावना का सामंजस्य है, उसकी वाणी दूसरों के जीवन में ज्ञान के विकास का माध्यम बन सकती है। इसके विपरीत, यदि ज्ञान का उपयोग केवल स्वार्थ, लाभ और प्रभुत्व के लिए किया जाता है, तो वही क्षमता संकीर्ण उद्देश्यों की पूर्ति में लग सकती है।

‘अवदतः वनीयान्’ : ज्ञान को जानते हुए भी उसका प्रसार न करना

अवदतः का भाव उस व्यक्ति की ओर संकेत करता है जो ज्ञान के विषय में बोलता नहीं, उसे व्यक्त नहीं करता अथवा उसके प्रसार के लिए आगे नहीं आता। यहाँ प्रश्न केवल इतना नहीं है कि किसी व्यक्ति के पास ज्ञान है या नहीं। प्रश्न यह भी है कि ज्ञान प्राप्त होने के बाद वह उसके साथ कैसा व्यवहार करता है।

यदि किसी मनुष्य को यह बोध हो जाए कि ज्ञान मानवजीवन और समाज की दिशा को प्रभावित करता है, फिर भी वह उसके संबंध में समाज में जागृति उत्पन्न करने से बचता रहे, तो उसकी चुप्पी भी परिणाम उत्पन्न करती है। ज्ञान को अपने तक सीमित रखने और उसे योग्य व्यक्तियों तक पहुँचाने में अंतर है। पहले मंत्रों में ज्ञानदान की आवश्यकता सामने आ चुकी है; वर्तमान मंत्र उसी विचार को कर्म, चरित्र और सामाजिक परिणाम के स्तर पर आगे बढ़ाता है।

वनीयान् को यहाँ लाभ-हानि की गणना में बँधी उस व्यवसायात्मक बुद्धि के संदर्भ में देखा गया है, जो प्रत्येक वस्तु और ज्ञान का मूल्य केवल निजी उपयोगिता तथा प्राप्त होने वाले लाभ से निर्धारित करती है। ऐसी बुद्धि ज्ञान को भी संग्रह की वस्तु बना सकती है। वह यह विचार करती है कि ज्ञान को व्यक्त करने से उसे क्या मिलेगा, उसका कितना लाभ होगा और उसे अपने नियंत्रण में रखने से कौन-सा स्वार्थ पूरा होगा।

इस प्रकार ज्ञान का मूल्य उसके जीवनदायी और कल्याणकारी स्वरूप के स्थान पर लाभ-हानि की गणना से तय होने लगता है। यह वही अपूर्णता है जिसका संकेत पिछले मंत्र में किया गया था। भौतिक साधनों और वैज्ञानिक क्षमता का चरम भी तब अधूरा रह जाता है, जब उसके साथ ज्ञान के व्यापक उद्देश्य का सामंजस्य नहीं होता।

‘पृणन् आपिः’ : प्राणमय ज्ञान और सखा-भाव

मंत्र का अगला पद है—

पृणन् आपिः।

यहाँ ज्ञान के उस स्वरूप का प्रश्न सामने आता है जो जीवन को पोषित करता है। ‘पृणन्’ को केवल किसी वस्तु से भर देने या किसी की भौतिक आवश्यकता पूरी करने तक सीमित करने के स्थान पर प्राण के भाव से जोड़कर देखने पर विचार की दिशा अधिक व्यापक हो जाती है। ज्ञान का कार्य केवल जानकारी बढ़ाना नहीं है; वह जीवन को दिशा देने, चेतना को जागृत करने और मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाने का माध्यम भी बन सकता है।

आपिः का भाव मित्र अथवा सहचर से संबंधित है। पिछले मंत्र में सखा-भाव के माध्यम से जिस सामंजस्य की आवश्यकता सामने आई थी, यहाँ उसी संबंध का विस्तार दिखाई देता है। वास्तविक मित्र वह नहीं जो केवल साथ उपस्थित हो, बल्कि वह है जो दूसरे के जीवन में उपयोगी और कल्याणकारी भूमिका निभाए। ज्ञान का सखा-भाव भी इसी प्रकार समझा जा सकता है—ज्ञान स्वयं तक सीमित न रहे, बल्कि दूसरे के जीवन में भी जागृति और सामर्थ्य उत्पन्न करने का माध्यम बने।

इसके विपरीत, जब ज्ञान और कर्म का उद्देश्य केवल निजी स्वार्थ की पूर्ति रह जाता है, तब मनुष्य संसार के भौतिक पदार्थों का दोहन तो कर सकता है, लेकिन अपने कर्म को व्यापक जीवन-कल्याण से जोड़ने में असफल रहता है। उसकी उपलब्धियाँ बाहरी ऐश्वर्य का रूप ले सकती हैं, पर उनमें वह सामंजस्य नहीं आता जो भौतिक क्षमता और आध्यात्मिक दृष्टि को एक-दूसरे का सहयोगी बनाता है।

‘अपृणन्तम् अभि ष्यात्’ : स्वार्थी संचालक और संसार की दिशा

मंत्र का अंतिम पद है—

अपृणन्तम् अभि ष्यात्।

यहाँ उस व्यक्ति का चित्र सामने आता है जो दूसरों को जीवनदायी ज्ञान और सामर्थ्य से पोषित करने के स्थान पर अपने स्वार्थ के अधीन होकर संसार के भौतिक पदार्थों का दोहन करता है। उसके पास साधन हो सकते हैं, उत्पादन की क्षमता हो सकती है और संसार की व्यवस्थाओं को प्रभावित करने की शक्ति भी हो सकती है। लेकिन यदि उसके कर्म के पीछे व्यापक कल्याण की भावना नहीं है, तो उसकी उपलब्धियाँ अपने आप में पूर्णता का प्रमाण नहीं बन जातीं।

इस विचार को वर्तमान युग के संदर्भ में देखें तो संसार की अनेक व्यवस्थाएँ ऐसे लोगों के निर्णयों से प्रभावित होती हैं जिनके पास आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और राजनीतिक शक्ति का बड़ा संग्रह है। उनके निर्णयों का प्रभाव केवल उनके निजी जीवन तक सीमित नहीं रहता; वे समाज, प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचते हैं। इसलिए यह आवश्यक हो जाता है कि शक्ति के साथ ज्ञान की समग्र दृष्टि और चरित्र का सामंजस्य भी उपस्थित हो।

जब साधनों का संचालन केवल लाभ, संग्रह और प्रभुत्व की भावना से होता है, तब उत्पादन और विकास की बाहरी गति के बावजूद जीवन का पोषण करने वाला उद्देश्य पीछे छूट सकता है। इसके विपरीत, जब ज्ञान, विज्ञान, चरित्र और सद्भावना एक-दूसरे के सहयोगी बनते हैं, तब मनुष्य अपनी उपलब्धियों को व्यापक जीवन-कल्याण की दिशा में ले जा सकता है।

इस प्रकार ऋग्वेद १०.११७.७ पिछले मंत्रों में स्थापित ज्ञानदान और सखा-भाव के सिद्धांत को कर्मफल की वास्तविक प्रक्रिया से जोड़ता है। कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं है; उसके पीछे भावना है, भावना के साथ संस्कार हैं, कर्म करने वाले का चरित्र है और उसके ज्ञान की दिशा है। इन सबका संबंध उस परिणाम से है जो व्यक्ति से आगे बढ़कर परिवार, समाज और संसार तक पहुँचता है।

मंत्र की केंद्रीय दिशा यही है कि भौतिक उत्पादन की क्षमता और ब्रह्मज्ञान की दृष्टि जब अलग-अलग रह जाती हैं, तो दोनों की अपूर्णता संसार को प्रभावित करती है। जब वे सखा-भाव में सामंजस्य स्थापित करती हैं, तभी कर्म और ज्ञान का संबंध व्यापक जीवन-पोषण की दिशा में आगे बढ़ता है।

समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः सम्मातरा चिन्न समं दुहाते। यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः॥ ९॥

अब दोनों दृष्टियों के बीच का मूल अंतर स्पष्ट है। यहाँ प्रश्न केवल जीव-जगत की परस्परता का वर्णन करने का नहीं है, बल्कि उस ज्ञान-दृष्टि को पहचानने का है जिससे ऋषि इस परस्परता को देख रहे हैं।

एक दृष्टि वस्तुओं को अलग-अलग पहचानती है, उनके गुणों का विश्लेषण करती है, उनकी उपलब्धता और आवश्यकता का आकलन करती है और फिर उनके लिए मूल्य निर्धारित करती है। दूसरी दृष्टि अंतर्दृष्टि के आधार पर उन वस्तुओं के बीच विद्यमान संबंध को देखती है। पहली दृष्टि में वस्तु स्वयं अध्ययन का केंद्र बनती है; दूसरी दृष्टि में वस्तु के साथ-साथ वह व्यापक तत्त्व और संबंध भी सामने आते हैं जिनके भीतर उसका अस्तित्व है।

इसे इस प्रकार समझ सकते हैं:

विज्ञान की पृथक् दृष्टि ऋषि की अंतर्दृष्टि
प्रत्येक वस्तु को अलग-अलग पहचानकर उसका विश्लेषण करती है। अलग-अलग दिखाई देने वाली वस्तुओं के बीच विद्यमान तात्त्विक संबंध को देखती है।
वस्तु के गुण, उपयोगिता, उपलब्धता और आवश्यकता का आकलन करती है। वस्तु के गुणधर्म के साथ उसके व्यापक अस्तित्वगत संबंध को पहचानती है।
आवश्यकता और उपलब्धता के आधार पर वस्तु का आर्थिक मूल्य निर्धारित किया जा सकता है। किसी वस्तु का तात्त्विक महत्त्व केवल उसके आर्थिक मूल्य से निर्धारित नहीं होता।
अध्ययन का केंद्र वस्तु की पहचान, उसके गुण और उसका उपयोग होता है। अध्ययन का केंद्र वस्तु, जीव, चेतना और उनके बीच विद्यमान संबंधों की व्यापकता भी होती है।
वस्तुओं का वर्गीकरण करके ज्ञान प्राप्त किया जाता है। विभिन्न रूपों के भीतर कार्यरत व्यापक सिद्धांत को पहचानने का प्रयास किया जाता है।

ऋषि की दृष्टि में वस्तु अकेली नहीं है

उदाहरण के लिए, अन्न को लिया जा सकता है। एक दृष्टि में अन्न खाद्य पदार्थ है। उसकी मात्रा, गुणवत्ता, उपलब्धता, उत्पादन-लागत और बाजार-मूल्य निर्धारित किए जा सकते हैं। यह दृष्टि अन्न के विशिष्ट गुणों और उपयोगिता का अध्ययन करती है।

लेकिन ऋषि जब अन्न और जीव के संबंध को देखते हैं, तो प्रश्न केवल इतना नहीं रहता कि अन्न क्या है और उसका मूल्य कितना है। यहाँ यह भी देखा जाता है कि अन्न जीव के पोषण से किस प्रकार जुड़ा है, जीव की वृत्तियाँ उसके उत्पादन की प्रक्रिया को किस प्रकार प्रभावित करती हैं और अन्न के गुणधर्म जीव के साथ स्थापित संबंध में क्या भूमिका निभाते हैं।

अर्थात् वस्तु का आर्थिक मूल्य और उसका तात्त्विक महत्त्व दो अलग-अलग स्तर हैं। आर्थिक मूल्य आवश्यकता, उपलब्धता और विनिमय की व्यवस्था के अनुसार निर्धारित हो सकता है; लेकिन उस वस्तु का व्यापक अस्तित्वगत संबंध केवल उस मूल्य से समाप्त नहीं हो जाता।

इसी प्रकार वनस्पति को केवल लकड़ी, फल, औषधि या व्यापार की वस्तु के रूप में देखने पर उसका एक पक्ष सामने आता है। उसे जीव-जगत के व्यापक संबंधों में देखने पर उसके जीवन, परिवेश और अन्य जीवों के साथ उसके संबंधों का दूसरा पक्ष खुलता है।

वर्तमान मंत्र को किस दृष्टि से पढ़ना है?

ऋग्वेद १०.११७.८ में एकपाद, द्विपद, त्रिपाद और चतुष्पद के उल्लेख को केवल अलग-अलग जीवों की सूची मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह समझना है कि ऋषि इन विविध रूपों को किस अंतर्दृष्टि से एक ही विचार-क्रम में देख रहे हैं और उनके बीच किस प्रकार का संबंध प्रकट कर रहे हैं।

यदि हम केवल बाहरी संरचना और वर्गीकरण पर ध्यान देंगे, तो हमें अलग-अलग जीव दिखाई देंगे। लेकिन यदि हम मंत्र की अंतर्दृष्टि को केंद्र में रखेंगे, तो अगला प्रश्न होगा—इन अलग-अलग रूपों के पीछे कौन-सा व्यापक सिद्धांत कार्य कर रहा है और वे एक-दूसरे के साथ किस प्रकार संबंधित हैं?

यही वह बिंदु है जहाँ हमें सामान्य वैज्ञानिक वर्गीकरण से आगे बढ़कर मंत्र की तात्त्विक विचार-यात्रा को समझना है। विज्ञान की दृष्टि से प्राप्त विशिष्ट ज्ञान को नकारना इसका उद्देश्य नहीं है; बल्कि यह पहचानना है कि वस्तु के अलग-अलग गुणों का ज्ञान और उन सबके बीच विद्यमान व्यापक संबंध का ज्ञान एक ही बात नहीं हैं।

इसलिए आगे मंत्र की व्याख्या में केवल यह नहीं देखना चाहिए कि एकपाद कौन है, द्विपद कौन है और चतुष्पद कौन है। पहले यह पहचानना होगा कि ऋषि इन पदों को किस अंतर्दृष्टि के आधार पर एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। उसी से मंत्र का वास्तविक तात्त्विक आशय खुलेगा।

बहुत सुंदर और अद्भुत बातें यहां व्यक्त कि जारही है जैसा कि पिछले मंत्र में ऋषि ने कहा सम्पश्यन् पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः।’ सम्यक सार्वभौमिक दृष्टि यह क्या देखती है तो कहते है एक रूप आकार प्रकार वाली पङक्ति श्रृंखला को निश्चित रूप से यह को जीवों की पङक्ति या श्रृंखला नहीं है यह उन सभी में एक अंतर्निहित संबंध स्थापित करने वाले नेटवर्किंग प्रणाली को देख रहे है, ऽतिष्ठमान: समान रूप से मान गुणधर्म व्यवस्थित उपस्थित है। जैसे हम साधारणतः एक विद्युत से जलने वाले झालर का उदाहरण ले सकते हैं जिसके बाहर रूप आकार प्रकार आलग दिखाई देते है जबकि उनमे एक विद्युत धारा प्रवाहित हो रही है तो ऋषि यहां उस विद्युतधारा का देख रहे है जो चेतना के रुप में समस्त जड़ चेतन में प्रवाहित हो रही है। अब इसी विस्तार अगले म़त्र में व्यापक रूप से किया गया है जैसा कि म़ंत्र का प्रारंभ ही समौ चिद्धस्तो यहां उसी पिछले तत्व कि वर्णनात्मक चित्रण कर रहे जिसकी बात पिछले मंत्र में पुर्ण की थी वह कहां है तो कहते जीव के चित्त में व्याप्त है समान रूप से व्याप्त हो रहा है अब यह समझना तो आसान है कि चित्त हर जीव के साथ है जों उस जीव का संग्रह है यहां ध्यान देने वाली बात है कि वह स्वयं किसी जीव का चित्त नही है चित्त स्मृति है और यह तभी सक्रिय होती है जब चेतन शक्ति शरीर में उपस्थित होती है, यहां सिधा सिधा चेतना या आत्मा भी कह सकते थे लेकिन ऋषि ने चित्त कहा इसके पिछे कारण है जीव की विभिन्नता का संकेत चेतना या आत्मा कहना वह विभिन्नता जो शरीर के स्तर पर जीवो के मध्य है वह समाप्त हो जाती है इसलिए ऋषि भेद को बनाये हुए यह ध्यान देने वाली बात है यहां चेतना में भेद नहीं है जिसे वह समौ कह रहे है यहा़ चित्त में भेद हे मतलब जीव और उसकी स्मृति और उसका परीणाम उसका वर्तमान की आवरण शरीर है। यहां शरीर धारण कर्ता है धस्तौ अर्थात जिसके अंतर्गत बुद्धि अहंकार स्मृति मन इंद्रियां और स्वयंं जीव है। न निश्चित रूप से यह सब समं समान गुण धर्म वाले नहीं हैं विविष्ट इन सब कि अपनी अलग अलग विशेषता और गुणधर्म हैं, एक तरफ आत्मा कि समानता सार्वभौमिक सत्य सिद्धांत है दूसरी तरफ व्यक्तिगण स्तर शरीर में जितने हिस्से है वह एक ही ऊर्जा शक्ति से चलते है उनका गुणधर्म और परिणाम अलल अलग है, उदाहरण के लिए स्मृति मन बुद्धि अहंकार और इन्द्रियां अपने अपने गुणधर्म के आधार पर अलग अलग परिणाम एक ही जीव के लिए उपस्थित करती है। इसको उदाहरण से दृष्टांत से समझाते हुए कहते हैं कि सम्मातरा चिन्न समं दुहाते एक ही मां के कयी पुत्र पुत्री होते है सबका पालन पोषण संरक्षण समान रूप से एक ही मां करती है फिर भी उन पुत्र पुत्रीयों में गुणधर्म समान नहीं होता है इसके पिछे वह स्मृति और संस्कार काम करते है जो जीव के पुनर्जन्म के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है यहां मां या बाप का चित्त पुत्र या पुत्री में हस्तांतरित नहीं हो रहा है। इसी प्रकार से या इसी उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि यमयोश्चिन्न चित्तवृत्ति ही वह आधार है जो जीव के भौतिक शरीर का काल निर्धारण करती है कि यह जीव कितने काल कितने समय तक इस शरीर में रहेगा समा विर्याणि उस चित्त के संस्कार के आधार पर ही जीव जिस शरीर में निवास करता है उसकी सीमा में हि अपने सभी कर्म करता है। जैसे एक कुत्ता अपने निर्धारित संस्कार के आधार पर ही कर्म करता है ना कि वह किसी मनुष्य कि तरह कर्म करता है। इसके विपरित जो ज्ञान वान जीव है ज्ञाती चितसन्तौ जिसे अपने चित्त संस्कार का ज्ञान है कि किस कर्म के परिणामस्वरूप उसको यह वर्तमान शरीर प्राप्त हुई है तो वह अपने जीवन की बागडोर अपने हाथ लै लेता है और अपने भावी जीवन और शरीर आधारशिला तैयार करने में लग जाता है। न समं पृणीत: यही मुल सिद्धांत निकल कर आता है वह सिर्फ व्यक्तिगत दृष्टि स्वार्थ के वशीभूत होकर कर्म नहीं करता है यद्यपि वह सार्वभौमिक सत्य में स्थित होने के लिए कल्याणार्थ निस्काम कर्म करता है पृणीत; जीवित जगत के जीता है ।

१. पिछले मंत्र से इस मंत्र का संबंध

पिछले मंत्र के अंतिम चरण में ऋषि कहते हैं—

सम्पश्यन् पङ्क्तीरुपतिष्ठमानः।

यहाँ सम्पश्यन् सम्यक् दृष्टि का बोध कराता है और पङ्क्ति उस क्रमबद्ध श्रृंखला का, जिसमें अनेक रूपों के भीतर एक अंतर्निहित संबंध विद्यमान है। यह केवल जीवों की पंक्ति नहीं है, बल्कि उस व्यापक नेटवर्क का संकेत है जो विभिन्न रूपों और गुणधर्मों को एक व्यवस्था में जोड़ता है।

इसे विद्युत से जलने वाली झालर के उदाहरण से समझ सकते हैं। झालर के प्रत्येक प्रकाश-बिंदु का रूप, आकार और स्थान अलग हो सकता है, लेकिन उन सबके भीतर एक ही विद्युतधारा प्रवाहित होती है। बाहरी भिन्नता के बावजूद उन्हें प्रकाशित करने वाली शक्ति एक है।

इसी प्रकार ऋषि की अंतर्दृष्टि केवल अलग-अलग रूपों को नहीं देखती, बल्कि उस चेतन तत्त्व को पहचानती है जो जड़-चेतन जगत में व्यापक रूप से विद्यमान है। बाहरी रूपों के भेद को मिटाए बिना उनके भीतर विद्यमान सार्वभौमिक संबंध को देखना ही इस सम्यक् दृष्टि का महत्त्व है।

नवें मंत्र में ऋषि इसी तात्त्विक संबंध को चार उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करते हैं।

२. समौ चिद्धस्तौ न समं विविष्टः — समान शक्ति और भिन्न गुणधर्म

समौ चिद्धस्तौ — दोनों हाथ समान हैं, लेकिन न समं विविष्टः — वे समान रूप से व्यवस्थित नहीं हैं।

यहाँ हाथों का उदाहरण केवल दो अंगों की तुलना करने के लिए नहीं है। इसके माध्यम से एक ही जीव के भीतर विद्यमान विभिन्न शक्तियों, अंगों और क्रियाओं के बीच के संबंध को समझा जा सकता है।

जीव के शरीर में बुद्धि, अहंकार, चित्त, मन और इंद्रियाँ अपने-अपने गुणधर्म के अनुसार कार्य करती हैं। इन सबकी क्रियाशीलता एक ही जीव के जीवन से संबंधित है, लेकिन उनके कार्य और परिणाम समान नहीं हैं।

स्मृति का कार्य बुद्धि के कार्य से अलग है। बुद्धि का कार्य मन की वृत्तियों से अलग है। अहंकार की भूमिका और इंद्रियों की भूमिका भी एक-दूसरे से भिन्न है। एक ही जीव के भीतर ये सभी अपनी विशिष्टता के अनुसार परिणाम उत्पन्न करते हैं।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। चेतना या आत्मा की सार्वभौमिक समानता और जीव के चित्त की व्यक्तिगत विशेषताएँ एक ही बात नहीं हैं। चेतना को शरीर और चित्त के व्यक्तिगत गुणधर्मों से सीमित नहीं किया जा सकता। चित्त जीव की स्मृतियों और संस्कारों का आधार है, जबकि उसकी सक्रियता चेतन शक्ति की उपस्थिति से संबंधित है।

इसलिए ऋषि यहाँ केवल चेतना की समानता का उल्लेख करके नहीं रुकते। वे चित्त और उसके परिणामों की ओर संकेत करते हैं, जिससे जीवों के बीच विद्यमान भिन्नता को भी समझा जा सके।

सार्वभौमिक चेतना की समानता के साथ व्यक्तिगत चित्त-संस्कारों की भिन्नता विद्यमान है। यही इस उदाहरण का तात्त्विक आधार है।

३. सम्मातरा चिन्न समं दुहाते — एक माता, अनेक संताने, भिन्न संस्कार

सम्मातरा चिन्न समं दुहाते — एक ही माता से उत्पन्न संतानों में समानता होते हुए भी उनके गुणधर्म समान नहीं होते।

एक माता अपनी अनेक संतानों का पालन-पोषण करती है। वह उन्हें समान रूप से प्रेम, संरक्षण और पोषण प्रदान कर सकती है। फिर भी उसकी प्रत्येक संतान की प्रवृत्ति, रुचि, स्वभाव, बुद्धि और व्यवहार दूसरी संतान से भिन्न हो सकते हैं।

यदि केवल माता के पालन-पोषण को ही इन भिन्नताओं का संपूर्ण आधार मान लिया जाए, तो संतानों के व्यक्तिगत संस्कारों और उनकी अपनी जीवन-यात्रा का पक्ष छूट जाएगा।

इस तात्त्विक विवेचन में जीव अपने पूर्वजन्मों से प्राप्त चित्त-संस्कारों के साथ वर्तमान शरीर धारण करता है। इसलिए एक ही माता-पिता से जन्म लेने और समान पारिवारिक वातावरण में पलने के बाद भी संतानों की वृत्तियाँ तथा कर्म करने की प्रवृत्तियाँ अलग-अलग हो सकती हैं।

यहाँ एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है—माता का चित्त अपनी संतान के चित्त में हस्तांतरित नहीं हो जाता। माता का अपना चित्त और संतान का अपना चित्त है। दोनों के बीच संबंध है, लेकिन दोनों की स्मृतियाँ, संस्कार और उनसे उत्पन्न होने वाली प्रवृत्तियाँ एक नहीं हैं।

इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि समान बाहरी परिस्थिति अपने आप समान आंतरिक संस्कार उत्पन्न नहीं करती। जीव की व्यक्तिगत यात्रा उसके अपने संस्कारों और प्रवृत्तियों से भी संबंधित है।

४. यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि — समान जन्म, भिन्न जीवन-शक्ति और कर्म-सीमा

यमयोश्चिन्न समा वीर्याणि — जुड़वाँ संतानों में भी समान शक्ति, सामर्थ्य अथवा कर्मगत विशेषताएँ आवश्यक नहीं हैं।

जुड़वाँ संतानों का जन्म एक ही समय के आसपास होता है और उनका पारिवारिक वातावरण भी समान हो सकता है। फिर भी उनके स्वभाव, शारीरिक सामर्थ्य, रुचियों और व्यवहार में अंतर दिखाई दे सकता है।

यह उदाहरण पिछले उदाहरण को आगे बढ़ाता है। पहले एक माता की अनेक संतानों के माध्यम से व्यक्तिगत संस्कारों की भिन्नता सामने आती है। अब जुड़वाँ संतानों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि जन्म की निकट समानता भी जीवों की संपूर्ण आंतरिक समानता सिद्ध नहीं करती।

यहाँ वीर्याणि को जीव की सामर्थ्य और कर्मगत क्षमता के संदर्भ में समझा जा सकता है। जीव जिस शरीर में निवास करता है, उसकी क्षमताओं और सीमाओं के भीतर ही उसके कर्म अभिव्यक्त होते हैं। उसके चित्त-संस्कार और वर्तमान शरीर की संरचना उसके कर्मों की अभिव्यक्ति में भूमिका निभाते हैं।

इसी संदर्भ में शरीर धारण करने की अवधि और जीव की वर्तमान जीवन-यात्रा का प्रश्न भी सामने आता है। चित्त-संस्कारों से संबंधित कर्मगत व्यवस्था जीव की यात्रा के व्यापक संदर्भ का हिस्सा है।

एक कुत्ते का उदाहरण लें। वह अपने शरीर, इंद्रियों, प्रवृत्तियों और संस्कारों की सीमा में रहकर कर्म करता है। उससे मनुष्य जैसी बुद्धि, भाषा और विवेकपूर्ण निर्णय-क्षमता की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उसके कर्मों की अभिव्यक्ति उसके जीवगत स्वरूप और उपलब्ध क्षमताओं के अनुरूप होती है।

इस प्रकार विभिन्न जीवों के भीतर चेतन तत्त्व की समानता स्वीकार करते हुए भी उनके शरीर, संस्कार, क्षमताओं और कर्मों की भिन्नता को समझना आवश्यक है।

५. ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः — अपने चित्त-संस्कारों को जानने वाला जीव

मंत्र का अंतिम चरण है—

ज्ञाती चित्सन्तौ न समं पृणीतः।

यहाँ विचार की दिशा एक महत्त्वपूर्ण बिंदु पर पहुँचती है। पहले तीन उदाहरणों में समानता और भिन्नता को समझाया गया है। अब ज्ञाती के माध्यम से उस जीव की ओर संकेत मिलता है जो अपने चित्त-संस्कारों को जानने की स्थिति में पहुँचता है।

जीव अपने वर्तमान शरीर में केवल शरीर की आवश्यकताओं और तत्कालिक प्रवृत्तियों के अनुसार कर्म करता रहे, तो उसकी जीवन-यात्रा उन्हीं सीमाओं में चलती रहती है। लेकिन जब उसे अपने चित्त, संस्कारों और कर्मों के परिणामों का ज्ञान होने लगता है, तब उसके सामने अपने जीवन की दिशा को बदलने की संभावना उपस्थित होती है।

ऐसा ज्ञानवान जीव अपने वर्तमान जीवन को केवल भोगने की वस्तु नहीं मानता। वह यह समझने का प्रयास करता है कि उसके कर्म किन वृत्तियों से उत्पन्न होते हैं, वे उसके जीवन को किस दिशा में ले जा रहे हैं और उनके भावी परिणाम क्या हो सकते हैं।

यहीं से वह अपने जीवन की बागडोर स्वयं सँभालने की दिशा में आगे बढ़ता है। वह केवल तत्कालिक सुख, भय, इच्छा या स्वार्थ के वशीभूत होकर कर्म नहीं करता, बल्कि अपने भावी जीवन की आधारशिला तैयार करने के लिए सचेत होकर कर्म करता है।

६. न समं पृणीतः — व्यक्तिगत स्वार्थ से सार्वभौमिक कल्याण तक

इस मंत्र का अंतिम पद पूरे विचार को उसके व्यापक निष्कर्ष तक पहुँचाता है।

न समं पृणीतः के संदर्भ में जीवों के बीच विद्यमान व्यक्तिगत भिन्नताओं को समझना आवश्यक है। प्रत्येक जीव अपने चित्त-संस्कारों, शरीर, क्षमताओं और प्रवृत्तियों के अनुसार कर्म करता है। इसलिए सभी जीवों के कर्म, उनकी दिशाएँ और उनके परिणाम समान नहीं होते।

लेकिन अपने चित्त-संस्कारों को जानने वाला जीव इस भिन्नता को केवल व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति का साधन नहीं बनाता। वह अपने कर्मों के व्यापक परिणामों को समझकर सार्वभौमिक सत्य और कल्याण के अनुकूल जीवन जीने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

यहीं निष्काम कर्म का तात्त्विक महत्त्व सामने आता है। ऐसा जीव केवल अपने शरीर, अपनी इच्छाओं और अपने सीमित लाभ के लिए कर्म नहीं करता। वह अपने कर्मों को व्यापक अस्तित्व के संदर्भ में देखता है और कल्याण की भावना से कर्म करता है।

इस प्रकार ज्ञान का परिणाम केवल व्यक्तिगत सामर्थ्य की वृद्धि नहीं है। उसका महत्त्व इस बात में है कि जीव अपनी व्यक्तिगत सीमाओं और संस्कारों को पहचानकर उनके अधीन रहने के बजाय अपने कर्मों को व्यापक सत्य के अनुरूप व्यवस्थित कर सके।

७. दान सूक्त का अंतिम तात्त्विक निष्कर्ष

ऋग्वेद १०.११७ का यह अंतिम मंत्र पिछले मंत्रों की विचार-यात्रा को एक व्यापक संदर्भ प्रदान करता है। दान केवल किसी वस्तु को दूसरे व्यक्ति को दे देने तक सीमित नहीं है। इसके भीतर ज्ञान, चित्त-संस्कार, जीव की व्यक्तिगत यात्रा और कर्मों के परिणामों का प्रश्न भी उपस्थित है।

जीवों के भीतर चेतना की सार्वभौमिक समानता है, लेकिन उनके चित्त-संस्कार, शरीर, प्रवृत्तियाँ और कर्मगत क्षमताएँ समान नहीं हैं। इस भिन्नता को समझे बिना सभी जीवों के व्यवहार और परिणामों को एक ही मानक से नहीं समझा जा सकता।

जब जीव अपने चित्त-संस्कारों और कर्मों के परिणामों को जानने लगता है, तब वह अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत इच्छाओं के अधीन रखने के बजाय सार्वभौमिक सत्य और कल्याण के अनुरूप व्यवस्थित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

यही दान सूक्त की अंतिम विचार-यात्रा का महत्त्वपूर्ण बिंदु है—ज्ञान का संबंध केवल जानने से नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, अपने कर्मों और उनके व्यापक परिणामों को समझने से है। इस समझ से प्रेरित कर्म व्यक्तिगत स्वार्थ की सीमा से ऊपर उठकर व्यापक कल्याण की दिशा में अग्रसर होता है।

अब अंतिम पद का तात्त्विक क्रम स्पष्ट हो रहा है। यहाँ निर्णायक बात केवल जीव और उसके संस्कारों की भिन्नता नहीं, बल्कि जीव को अपने चित्त-संस्कारों का ज्ञान हो जाने पर उन संस्कारों को निष्क्रिय करने की दिशा में उसका आगे बढ़ना है। पिछले प्रारूप में यह केंद्रीय बात छूट गई थी।

तुम्हारे बताए क्रम को इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है:

१. ज्ञाती — जीव को अपने चित्त-संस्कारों का ज्ञान

यहाँ ज्ञाती को केवल संबंधियों अथवा परिचित व्यक्तियों के अर्थ में सीमित नहीं किया जा रहा। इसे ज्ञान की दृष्टि से समझने पर जीवात्मा के जाग्रत ज्ञान और अपने चित्त-संस्कारों के ज्ञान का प्रश्न सामने आता है।

जीवात्मा और उसके संस्कार एक ही सत्ता नहीं हैं। जीव अपने चित्त-संस्कारों के प्रभाव में शरीर धारण करता है और उन्हीं के अनुसार उसकी प्रवृत्तियाँ तथा कर्म प्रभावित होते हैं। जब जीव को अपने संस्कारों का ज्ञान होता है, तब वह अपने वर्तमान जीवन की परिस्थितियों और उनकी पृष्ठभूमि के बीच संबंध पहचानने लगता है।

२. चित्सन्तौ — चित्त को शांत और निष्क्रिय करने की दिशा

यहाँ तुम्हारे विवेचन में चित् का संबंध चित्त-संस्कारों से है। जीव के जन्म-मरण के चक्र में संस्कारों की भूमिका होने के कारण केवल उनके अस्तित्व का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उनके प्रभाव को समाप्त करने की विधि भी आवश्यक है।

इसलिए चित्त को शांत और निष्क्रिय करने का आशय केवल विचारों को कुछ समय के लिए रोक देना नहीं है। इसका संबंध उन संस्कारगत वृत्तियों को निष्क्रिय करने से है, जो जीव को बार-बार भौतिक बंधन और जन्म-मरण की ओर ले जाती हैं।

३. न समं पृणीतः — भौतिक परिपूर्ति से भिन्न तात्त्विक पूर्णता

तुम्हारे बताए अक्षर-विभाजन और तात्त्विक संबंध में पृणीतः का आशय सामान्य भौतिक परिपूर्ति तक सीमित नहीं है। यहाँ ऋषि-दृष्टि से प्राप्त व्यापक सार्वभौमिक ज्ञान का संबंध सामने आता है।

जीव और उसके चित्त-संस्कार शरीर में एक साथ विद्यमान होते हैं, लेकिन उनके गुणधर्म अलग हैं। शरीर और चित्त-संस्कारों से संबंधित भौतिक ज्ञान जीव को उनके बंधनकारी प्रभाव से मुक्त करने के लिए अपने आप पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए उस व्यापक ईश्वरीय ज्ञान से संबंध आवश्यक है, जो जीव को अपने संस्कारों की सीमा से ऊपर उठने की दिशा देता है।

इस प्रकार पृणीतः को केवल दान देने या दूसरे को परिपूर्ण करने के सामान्य अर्थ में रख देने से मंत्र का तात्त्विक आशय पूरा नहीं होता। यहाँ भौतिक परिपूर्ति से भिन्न, ऋषि-दृष्टि से संबंधित ज्ञान और उसके परिणाम को समझना आवश्यक है।

इस मंत्र के अंतिम पद का केंद्रीय निष्कर्ष

जीवात्मा का ज्ञान, चित्त-संस्कारों का ज्ञान और उन संस्कारों को निष्क्रिय करने की विधि—ये तीनों इस विचार-क्रम के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। जीव जब अपने संस्कारों को पहचानकर उनके बंधनकारी प्रभाव से मुक्त होने की दिशा में बढ़ता है, तभी उसके लिए भौतिक बंधन से भिन्न तात्त्विक पूर्णता का मार्ग खुलता है।

जैसा कि हमने पिछले मंत्र के शब्द से ऋषि ने यह व्यक्त किया कि एक प्रकार का राय: धन इसके दो अर्थ है एक लौकिक दुसरा पारलौकिक जैसा कि वैषेशिक दर्शनकार कणाद कहते हैं
"यतो अभ्युदय निःश्रेयस सिद्धिः सः धर्मः" ! यहां धर्म का मतलब वैज्ञानिक सार्वभौमिक धर्म कि बात कि जारही है जैसा कि इस सुक्त में ही ईश्वर की सख्यता साधक को प्राप्त हो चुकी है दूसरी बात प्रेयान्न प्रेय मार्ग में ज्ञान उपलब्ध मनुष्य भी ज्ञान को स्वयं तक संचित रखने के भाव से ग्रस्त हो सकता है उससे कयी सूक्ष्म विषय पर विचार करते हुए यह सुक्त आगे बढ़ता है, इसमें जो ध्यान देने वाली बात है इसका मुल धर्म ईश्वर से संबंधित है और धर्म के मुल आधार पर आगे बढ़ रहा है और धर्म लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकार के ऐश्वर्य को उपलब्ध कराने में समर्थ है अब प्रश्न उठता है कि जो यह राय: धन है लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकार के ऐश्वर्य से परिपूर्ण है इसके लिए यह वर्तमान मंत्र क्या दिशा निर्देश करता है जैसा कि इस मंत्र का प्रारंभ ही मोघमन्नं मोघ अमोघ अतुलनीय सामर्थ्य प्रदान करने वाला है और यह सामर्थ्य कैसे प्राप्त होता है तो मंत्र कहता अन्नं अन्न से अन्न दो प्रकार से कार्य करता है प्रथम स्तर भौतिक शरीर को शक्तिशाली बनाता है दूसरा का यह आध्यात्मिक स्तर पर भी कार्य करता जैसा कि उपनिषद कहता है
अन्नं ब्रह्म तैत्तिरीयोपनिषद अन्नमय हि मनःछान्दोग्य उपनिषद अन्नं न निन्द्यात्" अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्‌
इन सब प्रमाणों को देखते हुए अन्न का महत्व के शरीर के लिए नहीं यद्यपि आत्मा और ब्रह्म भी इसी से जुड़े है इसलिए ऋग्वेद का मंत्र कोई सामान्य अन्य कि बात नहीं कर रहा है वह शरीर आत्मा ब्रह्म को एक साथ मोघ अमोघ शक्ति रूपी धन ऐश्वर्य कि उपलब्धि कि तरफ संकेत कर रहा है। विन्दते जो इस अन्न का दान करता है या प्राप्त करता है कहां से प्राप्त करता वह इस प्रकृति ईश्वर कि व्यवस्था में से प्राप्त करता है इसलिए अप्रचेता: कृत्रिम रुप उसका उत्पादन और उसका संचय करता है जब उस पर मान्यता को गढ़कर उसका नीश्चित मुल्यांकन करता है तो समस्या उत्पन्न हती है, जो उसके पिछे गुढ़ रहस्य सत्य से उसका संबंध था वह छिप जाता है क्योंकि वह मुल्य आधारित वस्तु बना दिया गया जिससे उसकी बहुमूल्यता समाप्त हो जाती है और जो मुल्यहिन वस्तये थी उसको अत्यधिक मुल्यवान बना देता है लोहा पितल सोना चांदी हिरा मोती इत्यादि और वह कहता है कि मै कहता हूं ब्रवीमि यही सत्य और बहुल्य पदार्थ है जो मानव जीवन को समृद्ध करता ऐश्वर्य उपलब्ध कराता है यहा ज्ञान का आधार बदल दिया गया है यह मानव को उसके मुल अस्तित्व से अलग रखने के लिए एक विपरित सिद्धांत गढ़ दिया है। जिससे उसका केवल भौतिक विकास एक तरफा होता है अस्तित्व गत आध्यात्मिक उन्नति उसकी रुक जाती है यही नहीं इस सिद्धांत को मजबूती प्रदान करने के ऐसी भौतिक वस्तुओं के बहुमुल्यता को सिद्ध करने वाली शिक्षा पद्धति को भी विकसित करता है। जिससे बहुत ही ख़तरनाक स्थिति उत्पन्न होती है मुल अस्तित्व के हनन कि वध: इत् जिसके परिणामस्वरूप स: मनुष्य तस्य अपनी मान्यताओं के आधार पर न निश्चित रूप से अर्यमणम् आर्य श्रेष्ठ गुणों के स्थान पर मणम मरणधर्मा गुणग्राही मनुष्य मानवजाति बनती है। और इसके ही पुष्यति पालन पोषण संरक्षण को मुल उद्देश्य लक्ष्य निर्धारित करके नो अपना निश्चित मार्ग राजपथ बनाती है जिसका लक्ष्य भौतिक चर्मोत्कर्ष उपलब्ध करना है, अब यहां पिछली कड़ी से फिर मंत्र हमे जोड़ते हुए कहता सखायम् ईश्वर के साथ जीव की जो घनिष्ठता अंतर्संबंध है केवलाध: वह केवल आधा पाप पुर्ण कर्म और परिणाम को उपलब्ध समर्थ होता है इसलिए भवति केवलादी मनुष्य केवलादि अनादिकालिन सत्ता से दुर हो जाता है।

पद्मपुराण — भूमिखण्ड

अध्याय ४० : नैमित्तिक दान, श्रद्धा, कर्मफल और मृत्यु के समय मोह

प्रथम खण्ड : राजा वेन का प्रश्न और नैमित्तिक दान का आरम्भ

श्लोक १

वेन उवाच—

नित्यदानफलं देव त्वत्तः पूर्वं मया श्रुतम्। नैमित्तिकस्य दानस्य दत्तस्यापि हि यत्फलम्॥ १॥

शब्दार्थ

  • नित्यदानफलम् — नियमित रूप से किए जाने वाले दान का फल।
  • देव — हे देव!
  • त्वत्तः — आपसे।
  • पूर्वम् — पहले।
  • मया श्रुतम् — मैंने सुना है।
  • नैमित्तिकस्य दानस्य — विशेष निमित्त अथवा अवसर पर किए जाने वाले दान का।
  • दत्तस्य अपि — दिए जाने पर भी।
  • यत् फलम् — जो फल प्राप्त होता है।

भावार्थ

राजा वेन कहते हैं—हे देव! मैंने आपसे पहले नित्य दान का फल सुना है। अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि विशेष निमित्त अथवा अवसर पर किए जाने वाले दान का क्या फल होता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ नित्य और नैमित्तिक दान के बीच भेद स्थापित किया गया है। नित्य दान नियमित कर्तव्य के रूप में किया जाता है, जबकि नैमित्तिक दान किसी विशेष अवसर, पर्व अथवा धार्मिक निमित्त से संबंधित होता है।

राजा वेन का प्रश्न केवल दान की वस्तु के विषय में नहीं है। वे जानना चाहते हैं कि दान के समय, अवसर और परिस्थिति का उसके परिणाम से क्या संबंध है।

यह प्रश्न आगे आने वाले पूरे अध्याय का आधार बनता है। भगवान विष्णु दान की वस्तु के साथ-साथ उसके समय, पात्र, श्रद्धा और दाता की भावना का भी विवेचन करते हैं।


श्लोक २

तत्फलं मे समाचक्ष्व त्वत्प्रसादात्प्रयत्नतः। महातृप्तिं न गच्छामि श्रोतुं श्रद्धा प्रवर्तते॥ २॥

शब्दार्थ

  • तत् फलम् — उस दान का फल।
  • मे — मुझे।
  • समाचक्ष्व — विस्तार से बताइए।
  • त्वत्प्रसादात् — आपकी कृपा से।
  • प्रयत्नतः — यथोचित विस्तार से।
  • महातृप्तिम् न गच्छामि — मुझे अभी पूर्ण तृप्ति नहीं हुई है।
  • श्रोतुम् — सुनने के लिए।
  • श्रद्धा प्रवर्तते — श्रद्धा और जानने की इच्छा बढ़ रही है।

भावार्थ

राजा वेन कहते हैं—हे प्रभु! अपनी कृपा से मुझे नैमित्तिक दान का फल विस्तारपूर्वक बताइए। इसे सुनने के प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ रही है, लेकिन अभी मेरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ श्रद्धा और जिज्ञासा का संबंध सामने आता है। राजा वेन पहले नित्य दान का फल सुन चुके हैं, लेकिन उसी जानकारी से संतुष्ट होकर नहीं रुकते। वे दान के दूसरे स्वरूप को भी समझना चाहते हैं।

श्रद्धा का अर्थ यहाँ केवल किसी कथन को स्वीकार कर लेना नहीं, बल्कि विषय को और अधिक जानने की तत्परता भी है।

इस प्रकार प्रश्न करने वाला व्यक्ति प्राप्त ज्ञान को अंतिम सीमा नहीं मानता। वह उसके अगले पक्ष को जानना चाहता है। यही जिज्ञासा भगवान विष्णु के विस्तृत उत्तर का कारण बनती है।


श्लोक ३

विष्णुरुवाच—

नैमित्तिकं प्रवक्ष्यामि दानमेव नृपोत्तम। महापर्वणि संप्राप्ते येन दानानि श्रद्धया॥ ३॥

शब्दार्थ

  • नैमित्तिकम् — विशेष निमित्त से संबंधित।
  • प्रवक्ष्यामि — मैं बताऊँगा।
  • दानम् एव — दान के विषय में।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजा!
  • महापर्वणि संप्राप्ते — महान पर्व आने पर।
  • येन — जिस प्रकार।
  • दानानि — दान।
  • श्रद्धया — श्रद्धापूर्वक।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—हे श्रेष्ठ राजा! अब मैं नैमित्तिक दान का वर्णन करता हूँ। महान पर्व के अवसर पर श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले दान का स्वरूप और उसका फल सुनो।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान के तीन पक्ष सामने आते हैं—विशेष अवसर, दान की क्रिया और श्रद्धा।

किसी अवसर पर दान देना केवल उस अवसर की उपस्थिति से पूर्ण नहीं होता। मंत्र का क्रम श्रद्धा को भी उसके साथ रखता है।

इससे दान को एक ऐसी क्रिया के रूप में समझा जा सकता है, जिसमें बाहरी परिस्थिति और आंतरिक भावना दोनों सम्मिलित हैं। आगे भगवान विष्णु विभिन्न वस्तुओं और अवसरों के उदाहरण देकर इस विषय को विस्तार देते हैं।


श्लोक ४

सत्पात्रेभ्यः प्रदत्तानि तस्य पुण्यफलं शृणु। गजं रथं प्रदत्ते यो ह्यश्वं चापि नृपोत्तम॥ ४॥

शब्दार्थ

  • सत्पात्रेभ्यः — योग्य पात्रों को।
  • प्रदत्तानि — दिए गए।
  • तस्य — उसका।
  • पुण्यफलम् — पुण्य का फल।
  • शृणु — सुनो।
  • गजम् — हाथी।
  • रथम् — रथ।
  • प्रदत्ते — प्रदान करता है।
  • यः — जो व्यक्ति।
  • अश्वम् च अपि — और घोड़ा भी।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजा!

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—हे राजा! पहले यह समझो कि योग्य पात्रों को दान देने का क्या फल होता है। जो व्यक्ति हाथी, रथ और घोड़े जैसी मूल्यवान वस्तुओं का दान करता है, उसके फल का वर्णन सुनो।

तात्त्विक व्याख्या

हाथी, रथ और घोड़ा प्राचीन राजकीय व्यवस्था में सामर्थ्य, आवागमन, युद्ध-क्षमता और प्रतिष्ठा से संबंधित थे। इनका दान सामान्य वस्तु देने के समान नहीं था; इसके लिए दाता को पर्याप्त साधन और उदारता चाहिए थी।

यहाँ सत्पात्र का उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण है। दान की वस्तु मूल्यवान होने के साथ उसका उचित प्राप्तकर्ता भी आवश्यक है।

इस प्रकार दान का मूल्य केवल वस्तु की कीमत से निर्धारित नहीं होता। वस्तु का स्वरूप, दान की परिस्थिति और प्राप्तकर्ता की पात्रता भी उसके संदर्भ का हिस्सा हैं।


श्लोक ५

स च भृत्यैस्तु संयुक्तः पुण्यदेशे नृपोत्तमः। जायते हि महाराज मत्प्रसादान्न संशयः॥ ५॥

शब्दार्थ

  • सः — वह दाता।
  • भृत्यैः संयुक्तः — सेवकों अथवा सहायकों सहित।
  • पुण्यदेशे — पुण्यभूमि में।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजा!
  • जायते — जन्म लेता है।
  • हि — निश्चय ही।
  • महाराज — हे महाराज!
  • मत्प्रसादात् — मेरी कृपा से।
  • न संशयः — इसमें संदेह नहीं।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं कि ऐसा दाता अपने पुण्य के फलस्वरूप शुभ स्थान में सेवकों और सहायकों से युक्त होकर जन्म प्राप्त करता है। यह फल मेरी कृपा से प्राप्त होता है।

तात्त्विक व्याख्या

पिछले श्लोक में राजकीय सामर्थ्य से संबंधित वस्तुओं के दान का उल्लेख था। यहाँ उसके फल को ऐसी परिस्थिति के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें दाता को साधन, सहयोग और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।

इस प्रसंग में दान और भविष्य की जीवन-परिस्थितियों के बीच कर्मफल का संबंध स्थापित किया गया है।

यहाँ पुण्य का फल केवल किसी वस्तु की पुनः प्राप्ति नहीं है। इसके साथ अनुकूल परिस्थितियों और सहयोगी व्यवस्था का भाव भी जुड़ा हुआ है।


श्लोक ६

राजा भवति धर्मात्मा ज्ञानवान्बलवान्सुधीः। अजेयः सर्वभूतानां महातेजाः प्रजायते॥ ६॥

शब्दार्थ

  • राजा भवति — राजा बनता है।
  • धर्मात्मा — धर्मपरायण।
  • ज्ञानवान् — ज्ञान से संपन्न।
  • बलवान् — शक्तिशाली।
  • सुधीः — अच्छी बुद्धि वाला।
  • अजेयः — जिसे पराजित करना कठिन हो।
  • सर्वभूतानाम् — सभी प्राणियों के बीच।
  • महातेजाः — महान तेज वाला।
  • प्रजायते — उत्पन्न होता है।

भावार्थ

ऐसा व्यक्ति राजा बनता है, धर्मपरायण, ज्ञानवान्, शक्तिशाली और बुद्धिमान होता है। वह महान तेज से युक्त होता है तथा उसे पराजित करना कठिन होता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान के फल में अनेक प्रकार की संपन्नताओं का उल्लेख है—राजसत्ता, धर्म, ज्ञान, बल, बुद्धि और तेज।

इन सबको एक ही गुण नहीं माना जा सकता। शारीरिक बल और बौद्धिक सामर्थ्य अलग हैं; राजकीय शक्ति और धर्मपरायणता भी अलग हैं। फिर भी श्लोक इन्हें एक ही जीवन-परिणाम में एकत्र करता है।

इससे दान के फल का व्यापक स्वरूप सामने आता है। उसके परिणाम को केवल धन की प्राप्ति तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि सामाजिक स्थिति, आंतरिक गुणों और प्रभाव-क्षमता तक विस्तारित किया गया है।


श्लोक ७

महापर्वणि संप्राप्ते भूमिदानं ददाति यः। गोदानं वा महाराज सर्वभोगपतिर्भवेत्॥ ७॥

शब्दार्थ

  • महापर्वणि संप्राप्ते — महान पर्व आने पर।
  • भूमिदानम् — भूमि का दान।
  • ददाति यः — जो व्यक्ति देता है।
  • गोदानम् वा — अथवा गौ का दान।
  • महाराज — हे महाराज!
  • सर्वभोगपतिर्भवेत् — समस्त भोगों और सुख-साधनों का स्वामी होता है।

भावार्थ

जो व्यक्ति महान पर्व के अवसर पर भूमि अथवा गौ का दान करता है, वह पुण्य के फलस्वरूप समस्त भोगों और सुख-साधनों से संपन्न होता है।

तात्त्विक व्याख्या

भूमि और गौ दोनों का संबंध जीवन-निर्वाह से है। भूमि उत्पादन, निवास और आजीविका का आधार है। गौ कृषि, दुग्ध और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से संबंधित रही है।

इनका दान तत्काल उपयोग की किसी छोटी वस्तु को देने के समान नहीं है। यह जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले साधन प्रदान करने का कार्य है।

इस संदर्भ में दान का संबंध केवल दाता की उदारता से नहीं, बल्कि उस साधन से भी है जिसके द्वारा दूसरे का जीवन और आजीविका समर्थ हो सकती है।


श्लोक ८

ब्राह्मणाय सुपुण्याय दानं दद्यात्प्रयत्नतः। महादानानि यो दद्यात्तीर्थे पर्वणि पात्रवित्॥ ८॥

शब्दार्थ

  • ब्राह्मणाय — ब्राह्मण को।
  • सुपुण्याय — पुण्यशील अथवा श्रेष्ठ गुणों से युक्त व्यक्ति को।
  • दानम् दद्यात् — दान देना चाहिए।
  • प्रयत्नतः — यत्नपूर्वक।
  • महादानानि — महान दान।
  • यः दद्यात् — जो देता है।
  • तीर्थे — तीर्थ में।
  • पर्वणि — पर्व के अवसर पर।
  • पात्रवित् — पात्र की पहचान रखने वाला।

भावार्थ

व्यक्ति को प्रयत्नपूर्वक पुण्यशील ब्राह्मण को दान देना चाहिए। जो व्यक्ति पात्र की पहचान रखते हुए तीर्थ और पर्व के अवसर पर महादान करता है, उसके दान का फल आगे बताया जाएगा।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में पात्रवित् विशेष महत्त्व रखता है। इसका आशय है कि दाता को यह पहचान हो कि दान किसे दिया जा रहा है।

केवल दान देने की इच्छा पर्याप्त नहीं है। दान का उचित उपयोग करने वाले पात्र को पहचानना भी आवश्यक है।

यहाँ दान की तीन परिस्थितियाँ एक साथ आती हैं—योग्य प्राप्तकर्ता, उपयुक्त अवसर और दाता का प्रयत्न। इनका समन्वय दान को व्यवस्थित कर्म बनाता है।


श्लोक ९

तेषां चिह्नं प्रवक्ष्यामि भूपतित्वं प्रजायते। तीर्थे पर्वणि संप्राप्ते गुप्तदानं ददाति यः॥ ९॥

शब्दार्थ

  • तेषाम् — उन दानों के।
  • चिह्नम् — लक्षण अथवा परिणाम का संकेत।
  • प्रवक्ष्यामि — मैं बताऊँगा।
  • भूपतित्वम् — भूमि अथवा राज्य का स्वामित्व।
  • प्रजायते — प्राप्त होता है।
  • तीर्थे — तीर्थ में।
  • पर्वणि संप्राप्ते — पर्व आने पर।
  • गुप्तदानम् — गुप्त रूप से किया जाने वाला दान।
  • ददाति यः — जो देता है।

भावार्थ

भगवान विष्णु बताते हैं कि ऐसे दानों का फल भूपतित्व के रूप में प्रकट हो सकता है। इसके बाद वे तीर्थ और पर्व के अवसर पर गुप्त दान करने वाले व्यक्ति के फल का वर्णन आरम्भ करते हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दो विचार जुड़े हैं। पहले महादान का फल राज्य अथवा भूमि के स्वामित्व से संबंधित बताया गया है। फिर गुप्त दान का उल्लेख आता है।

गुप्त दान में दान देने की क्रिया को सार्वजनिक प्रदर्शन से अलग रखा जाता है। इससे दान और उसकी घोषणा के बीच अंतर सामने आता है।

दान का एक पक्ष वस्तु का हस्तांतरण है, जबकि दूसरा पक्ष दाता की भावना है। गुप्त दान में सार्वजनिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की संभावना को पीछे रखकर दान करने का स्वरूप सामने आता है।


श्लोक १०

निधीनामाशुसंप्राप्तिरक्षरा परिजायते। महापर्वणि संप्राप्ते तीर्थेषु ब्राह्मणाय च॥ १०॥

शब्दार्थ

  • निधीनाम् — निधियों अथवा खजानों का।
  • आशु — शीघ्र।
  • संप्राप्तिः — प्राप्ति।
  • अक्षरा — अक्षय अथवा स्थायी।
  • परिजायते — उत्पन्न होती है।
  • महापर्वणि संप्राप्ते — महान पर्व आने पर।
  • तीर्थेषु — तीर्थों में।
  • ब्राह्मणाय च — और ब्राह्मण को।

भावार्थ

तीर्थ में महान पर्व के अवसर पर ब्राह्मण को दान देने वाले व्यक्ति के लिए निधियों की शीघ्र प्राप्ति और अक्षय संपदा का फल बताया गया है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में संपदा की प्राप्ति के साथ उसकी स्थिरता का विचार भी आता है। केवल किसी संपत्ति का प्राप्त होना और उसका अक्षय बने रहना अलग बातें हैं।

दान के फल को यहाँ ऐसी संपन्नता के रूप में चित्रित किया गया है जो निरंतर उपलब्ध रहने वाली हो।

यहाँ अक्षरा का भाव अक्षयता से जोड़ा गया है। इस कारण श्लोक में दान और दीर्घकालिक संपन्नता के बीच संबंध स्थापित होता है।


श्लोक ११

सुचैलं च महादानं कांचनेन समन्वितम्। पुण्यं फलं प्रवक्ष्यामि तस्य दानस्य भूपते॥ ११॥

शब्दार्थ

  • सुचैलम् — स्वच्छ अथवा उत्तम वस्त्र सहित।
  • च — और।
  • महादानम् — महान दान।
  • कांचनेन समन्वितम् — सोने से युक्त।
  • पुण्यम् फलम् — पुण्यफल।
  • प्रवक्ष्यामि — मैं बताऊँगा।
  • तस्य दानस्य — उस दान का।
  • भूपते — हे राजा!

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—हे राजा! अब मैं स्वच्छ वस्त्र और स्वर्ण से युक्त महादान का पुण्यफल बताता हूँ।

तात्त्विक व्याख्या

दान का स्वरूप यहाँ एक वस्तु तक सीमित नहीं है। वस्त्र, स्वर्ण और अन्य उपयोगी वस्तुओं का समावेश उसे अधिक व्यापक बनाता है।

इस प्रकार दान की संरचना में वस्तुओं का संयोजन भी महत्त्वपूर्ण है। वस्त्र शरीर की आवश्यकता से संबंधित है, जबकि स्वर्ण संपदा का प्रतीक है।

अगले श्लोकों में इस दान का फल संतान, विद्या, आयु, यश, संपन्नता और सुख के रूप में विस्तार से बताया जाता है।


श्लोक १२

जायंते बहवः पुत्राः सुगुणा वेदपारगाः। आयुष्मंतः प्रजावंतो यशः पुण्यसमन्विताः॥ १२॥

शब्दार्थ

  • जायन्ते — उत्पन्न होते हैं।
  • बहवः पुत्राः — अनेक पुत्र।
  • सुगुणाः — उत्तम गुणों वाले।
  • वेदपारगाः — वेदों का गहन ज्ञान रखने वाले।
  • आयुष्मन्तः — दीर्घायु।
  • प्रजावन्तः — संतति से संपन्न।
  • यशः — यश।
  • पुण्यसमन्विताः — पुण्य से युक्त।

भावार्थ

ऐसे दान के फलस्वरूप अनेक उत्तम गुणों वाले, वेदों के ज्ञाता, दीर्घायु और संतति से संपन्न पुत्र उत्पन्न होते हैं। परिवार यश और पुण्य से युक्त होता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान का फल अगली पीढ़ी तक विस्तारित होता है। संपन्नता का अर्थ केवल धन प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसी संतति प्राप्त करना भी है जिसमें गुण, विद्या और दीर्घजीवन का समन्वय हो।

वेदपारगता का उल्लेख विशेष है। इससे ज्ञान को परिवार की उपलब्धियों में स्थान दिया गया है।

इस प्रकार दान के फल में पारिवारिक निरंतरता, विद्या और सामाजिक प्रतिष्ठा तीनों का समावेश होता है।


श्लोक १३

विपुलाश्चैव जायंते स्फीता लक्ष्मीर्महामते। सौख्यं च लभते पुण्यं धर्मवान्परिजायते॥ १३॥

शब्दार्थ

  • विपुलाः — बहुतायत में।
  • जायन्ते — उत्पन्न होते हैं।
  • स्फीता लक्ष्मीः — विस्तृत और समृद्ध संपदा।
  • महामते — हे बुद्धिमान!
  • सौख्यम् — सुख।
  • लभते — प्राप्त करता है।
  • पुण्यम् — पुण्य।
  • धर्मवान् — धर्मपरायण।
  • परिजायते — बनता है अथवा उत्पन्न होता है।

भावार्थ

ऐसे दान से विपुल संपत्ति और समृद्धि प्राप्त होती है। व्यक्ति सुखी होता है और धर्मपरायण जीवन की ओर अग्रसर होता है।

तात्त्विक व्याख्या

पिछले श्लोक में परिवार, संतान और विद्या का उल्लेख था। यहाँ संपत्ति, सुख और धर्मपरायणता को जोड़ा गया है।

इस क्रम में बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार की उपलब्धियाँ आती हैं। संपत्ति जीवन के भौतिक साधनों को बढ़ाती है, जबकि धर्मपरायणता जीवन के आचरण से संबंधित है।

इसलिए वर्णित फल को केवल आर्थिक समृद्धि तक सीमित नहीं किया गया। उसमें जीवन की गुणवत्ता और धर्म के साथ संबंध भी सम्मिलित हैं।


श्लोक १४

महापर्वणि संप्राप्ते तीर्थे गत्वा प्रयत्नतः। कपिलां कांचनीं दद्याद्ब्राह्मणाय महात्मने॥ १४॥

शब्दार्थ

  • महापर्वणि संप्राप्ते — महान पर्व आने पर।
  • तीर्थे गत्वा — तीर्थ में जाकर।
  • प्रयत्नतः — यत्नपूर्वक।
  • कपिलाम् — कपिला गौ।
  • कांचनीम् — स्वर्ण से संबंधित अथवा स्वर्णाभूषणों से युक्त।
  • दद्यात् — देनी चाहिए।
  • ब्राह्मणाय — ब्राह्मण को।
  • महात्मने — महात्मा अथवा श्रेष्ठ गुणों वाले व्यक्ति को।

भावार्थ

महान पर्व के अवसर पर व्यक्ति को तीर्थ जाकर प्रयत्नपूर्वक स्वर्ण से संबंधित अलंकरणों से युक्त कपिला गौ किसी महात्मा ब्राह्मण को दान देनी चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ पहले वर्णित गोदान का विशिष्ट रूप प्रस्तुत किया गया है। कपिला गौ, स्वर्ण और तीर्थ का उल्लेख दान को एक विशेष धार्मिक अवसर तथा विधि से जोड़ता है।

दान की वस्तु के साथ उसकी तैयारी और प्राप्तकर्ता की पात्रता भी महत्त्वपूर्ण हैं।

यहाँ दान की क्रिया में प्रयत्न का उल्लेख यह बताता है कि इसे आकस्मिक या असावधानी से किए गए कार्य के रूप में नहीं देखा गया। दाता को दान के स्वरूप और उसके अवसर का ध्यान रखना है।


श्लोक १५

तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि दानस्य च महामते। कपिलादो महाराज सर्वसौख्यान्प्रभुंजति॥ १५॥

शब्दार्थ

  • तस्य दानस्य — उस दान का।
  • पुण्यम् — पुण्यफल।
  • प्रवक्ष्यामि — मैं बताऊँगा।
  • महामते — हे बुद्धिमान!
  • कपिलादः — कपिला गौ का दान करने वाला।
  • महाराज — हे महाराज!
  • सर्वसौख्यान् — सभी प्रकार के सुख।
  • प्रभुंजति — भोगता है, अनुभव करता है।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं कि कपिला गौ का दान करने वाला व्यक्ति अनेक प्रकार के सुखों का अनुभव करता है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में दान का फल सुख की व्यापक उपलब्धि के रूप में बताया गया है।

दान का कर्म वर्तमान में किया जाता है, जबकि उसका फल भविष्य की परिस्थितियों में प्रकट होने वाला बताया गया है। इस प्रकार यहाँ कर्म और परिणाम के बीच समयगत संबंध स्थापित है।

अगले श्लोक में इसी फल की अवधि का उल्लेख आता है, जिससे कथा का दृष्टिकोण वर्तमान जीवन से आगे बढ़ता है।


श्लोक १६

यावद्ब्रह्मा प्रजीवेत्स तावत्तिष्ठति तत्र सः। महापर्वणि संप्राप्ते अलंकृत्य च गां तदा॥ १६॥

शब्दार्थ

  • यावत् — जब तक।
  • ब्रह्मा प्रजीवेत् — ब्रह्मा जीवित रहें।
  • सः — वह दाता अथवा फल का भोक्ता।
  • तावत् — तब तक।
  • तिष्ठति — रहता है।
  • तत्र — वहाँ।
  • महापर्वणि संप्राप्ते — महान पर्व आने पर।
  • अलंकृत्य — अलंकृत करके।
  • गाम् — गौ को।
  • तदा — उस समय।

भावार्थ

कपिला गौ के दान के फल का वर्णन करते हुए कहा गया है कि दानकर्ता उस पुण्यलोक में ब्रह्मा के जीवनकाल तक रहता है। महान पर्व के अवसर पर गौ को अलंकृत करके दान देने की बात आगे कही जाती है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ पुण्यफल की अवधि को अत्यंत दीर्घ काल के रूप में व्यक्त किया गया है। इससे कथा का समय-बोध सामान्य मानवीय जीवनकाल से आगे जाता है।

दान के फल को केवल कुछ समय के सुख के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पुण्यफल के रूप में चित्रित किया गया है।

अगले श्लोक में गौ को अलंकृत करने और स्वर्ण, वस्त्र तथा आभूषणों से युक्त करने का विवरण पूरा होता है।


श्लोक १७

कांचनेनापि संयुक्तां वस्त्रालंकारभूषणैः। तस्य दानस्य राजेंद्र फलभोगं वदाम्यहम्॥ १७॥

शब्दार्थ

  • कांचनेन — स्वर्ण से।
  • अपि संयुक्ताम् — युक्त भी।
  • वस्त्र — वस्त्रों से।
  • अलंकारभूषणैः — अलंकारों और आभूषणों से।
  • तस्य दानस्य — उस दान का।
  • राजेन्द्र — हे राजाओं में श्रेष्ठ!
  • फलभोगम् — फल का अनुभव।
  • वदामि अहम् — मैं बताता हूँ।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—हे राजेन्द्र! स्वर्ण, वस्त्र, अलंकार और आभूषणों से सुसज्जित गौ का दान करने पर प्राप्त होने वाले फल का वर्णन सुनो।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में दान की पूर्णता का विवरण है। गौ को केवल दान की वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि वस्त्र और अलंकारों से सुसज्जित करके प्रस्तुत किया गया है।

यहाँ दान की तैयारी और उसकी प्रस्तुति भी वर्णन का हिस्सा हैं। इसके बाद भगवान विष्णु दान के परिणामों को संपत्ति, विद्या, भक्ति और विष्णुलोक की प्राप्ति तक विस्तारित करते हैं।


श्लोक १८

विपुला जायते लक्ष्मीर्दानभोगसमाकुला। सर्वविद्यापतिर्भूत्वा विष्णुभक्तो भवेत्किल॥ १८॥

शब्दार्थ

  • विपुला — विशाल अथवा बहुतायत वाली।
  • जायते — उत्पन्न होती है।
  • लक्ष्मीः — संपदा और समृद्धि।
  • दानभोगसमाकुला — दान तथा भोग-साधनों से संपन्न।
  • सर्वविद्यापतिः — सभी विद्याओं में निपुण अथवा उनका स्वामी।
  • भूत्वा — होकर।
  • विष्णुभक्तः — विष्णु का भक्त।
  • भवेत् किल — होता है।

भावार्थ

ऐसे दान से विपुल संपत्ति और सुख-साधन प्राप्त होते हैं। दाता सभी विद्याओं में निपुण होता है और विष्णु का भक्त बनता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान के फल में चार पक्षों का समावेश है—संपत्ति, भोग-साधन, विद्या और भक्ति।

इनमें विद्या और भक्ति का उल्लेख विशेष महत्त्व रखता है। संपत्ति बाहरी साधनों से संबंधित है, जबकि विद्या ज्ञान और भक्ति ईश्वर के साथ संबंध से संबंधित हैं।

इस प्रकार दान का फल केवल भौतिक उपलब्धियों में समाप्त नहीं होता। कथा उसे ज्ञान और ईश्वरभक्ति से भी जोड़ती है।


श्लोक १९

विष्णुलोके वसेन्मर्त्यो यावत्तिष्ठति मेदिनी। तीर्थं गत्वा तु यो दद्याद्ब्राह्मणाय विभूषणम्॥ १९॥

शब्दार्थ

  • विष्णुलोके — विष्णुलोक में।
  • वसेत् — निवास करता है।
  • मर्त्यः — मनुष्य।
  • यावत् तिष्ठति मेदिनी — जब तक पृथ्वी विद्यमान रहती है।
  • तीर्थम् गत्वा — तीर्थ जाकर।
  • यः दद्यात् — जो देता है।
  • ब्राह्मणाय — ब्राह्मण को।
  • विभूषणम् — आभूषण।

भावार्थ

जो व्यक्ति तीर्थ जाकर ब्राह्मण को आभूषण दान करता है, वह विष्णुलोक में पृथ्वी के अस्तित्वकाल तक निवास करता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान के फल को विष्णुलोक में दीर्घकालिक निवास के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पहले के श्लोकों में भौतिक संपन्नता और विद्या का वर्णन था। अब कथा ऐसे लोक की प्राप्ति का उल्लेख करती है जो सामान्य भौतिक जीवन से भिन्न है।

इस प्रकार अध्याय में दान के फलों को लौकिक संपन्नता से लेकर धार्मिक और पारलौकिक उपलब्धियों तक क्रमशः विस्तारित किया गया है।


श्लोक २०

भुक्त्वा तु विपुलान्भोगानिन्द्रेण क्रीडते सह। महापर्वणि संप्राप्ते वस्त्रं च द्विजपुंगवे॥ २०॥

शब्दार्थ

  • भुक्त्वा — भोग करके।
  • विपुलान् भोगान् — अनेक प्रकार के सुख-साधनों को।
  • इन्द्रेण — इन्द्र के साथ।
  • क्रीडते सह — साथ में क्रीड़ा करता है।
  • महापर्वणि संप्राप्ते — महान पर्व आने पर।
  • वस्त्रम् च — और वस्त्र।
  • द्विजपुंगवे — श्रेष्ठ द्विज को।

भावार्थ

दानकर्ता अनेक सुखों का अनुभव करके इन्द्र के साथ क्रीड़ा करता है। इसके बाद महान पर्व के अवसर पर श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र दान देने का उल्लेख आता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ स्वर्गीय भोगों का चित्रण है। इन्द्र के साथ क्रीड़ा करना स्वर्गीय ऐश्वर्य और उच्च लोकों में सुख प्राप्त करने का संकेत है।

श्लोक का उत्तरार्ध अगले दान-विवरण से जुड़ता है। इसलिए इसे केवल स्वर्गीय भोग की समाप्ति नहीं मानना चाहिए; कथा यहाँ से वस्त्र और अन्न के दान की ओर बढ़ती है।


श्लोक २१

दत्त्वान्नं भूमिसंयुक्तं पात्रे श्रद्धासमन्वितः। मोदते स तु वैकुंठे विष्णुतुल्यपराक्रमः॥ २१॥

शब्दार्थ

  • दत्त्वा — देकर।
  • अन्नम् — अन्न।
  • भूमिसंयुक्तम् — भूमि सहित अथवा भूमि से संबंधित।
  • पात्रे — योग्य पात्र को।
  • श्रद्धासमन्वितः — श्रद्धा से युक्त होकर।
  • मोदते — आनंद अनुभव करता है।
  • वैकुण्ठे — वैकुण्ठ में।
  • विष्णुतुल्यपराक्रमः — विष्णु के समान पराक्रम वाला।

भावार्थ

जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक योग्य पात्र को अन्न और भूमि से संबंधित दान देता है, वह वैकुण्ठ में आनंद प्राप्त करता है और विष्णु के समान पराक्रम से युक्त होता है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में अन्न और भूमि का संबंध सामने आता है। अन्न जीवन-निर्वाह की मूल आवश्यकता है, जबकि भूमि उसके उत्पादन और उपलब्धता का आधार हो सकती है।

दान का यह स्वरूप केवल संपत्ति देने तक सीमित नहीं रहता। इसमें जीवन को बनाए रखने वाले साधनों का हस्तांतरण भी सम्मिलित है।

श्रद्धा और पात्रता का उल्लेख बताता है कि दान की वस्तु के साथ उसकी दिशा भी महत्त्वपूर्ण है।


श्लोक २२

सवस्त्रं कांचनं दत्त्वा द्विजाय परिशांतये। स्वेच्छया अग्निसदृशो वैकुंठे स वसेत्सुखी॥ २२॥

शब्दार्थ

  • सवस्त्रम् — वस्त्र सहित।
  • कांचनम् — स्वर्ण।
  • दत्त्वा — देकर।
  • द्विजाय — द्विज को।
  • परिशान्तये — शांति अथवा संतोष के लिए।
  • स्वेच्छया — अपनी इच्छा से।
  • अग्निसदृशः — अग्नि के समान तेजस्वी।
  • वैकुण्ठे — वैकुण्ठ में।
  • सः वसेत् — वह निवास करता है।
  • सुखी — सुखपूर्वक।

भावार्थ

जो व्यक्ति अपनी इच्छा से वस्त्र सहित स्वर्ण का दान द्विज को देता है, वह अग्नि के समान तेजस्वी होकर वैकुण्ठ में सुखपूर्वक निवास करता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान की वस्तुओं के साथ दाता की स्वेच्छा का उल्लेख है। दान केवल बाहरी दबाव अथवा बाध्यता से किया गया कार्य नहीं, बल्कि स्वेच्छा से किया गया समर्पण भी हो सकता है।

अग्नि के समान तेजस्वी होने का वर्णन दान के फल को तेज और सामर्थ्य के रूप में प्रस्तुत करता है।

इस श्लोक में वस्त्र, स्वर्ण, दाता की इच्छा और दान के फल के बीच संबंध स्थापित किया गया है।


द्वितीय खण्ड : सुवर्णकुम्भ और महादान की विधि

श्लोक २३

सुवर्णस्य सुकुंभं च घृतेन परिपूरयेत्। पिधानं रौप्यं कर्तव्यं वस्त्रहारैरलंकृतम्॥ २३॥

शब्दार्थ

  • सुवर्णस्य — स्वर्ण का।
  • सुकुम्भम् — सुंदर अथवा उत्तम कलश।
  • घृतेन — घी से।
  • परिपूरयेत् — पूरा भरना चाहिए।
  • पिधानम् — ढक्कन अथवा आवरण।
  • रौप्यम् — चाँदी का।
  • कर्तव्यम् — बनाना चाहिए।
  • वस्त्रहारैः — वस्त्रों और मालाओं से।
  • अलंकृतम् — सुसज्जित।

भावार्थ

स्वर्ण का एक सुंदर कलश बनाकर उसे घी से भरना चाहिए। उसका ढक्कन चाँदी का हो और उसे वस्त्रों तथा मालाओं से सुसज्जित करना चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ महादान की एक विशिष्ट विधि बताई गई है। स्वर्ण का कलश, घी, चाँदी का आवरण और सजावट—इन सभी का संयोजन दान की वस्तु को एक निर्धारित स्वरूप देता है।

इस वर्णन में दान केवल वस्तु के हस्तांतरण तक सीमित नहीं है। उसकी तैयारी, पूर्णता और प्रस्तुति भी विधि का हिस्सा हैं।

कलश में घी भरने का निर्देश यह भी दिखाता है कि दान की वस्तु को केवल धातु के पात्र के रूप में नहीं, बल्कि उपयोगी पदार्थ से युक्त रूप में प्रस्तुत किया जाता है।


श्लोक २४

पुष्पमालान्वितं कुर्याद्ब्रह्मसूत्रेण शोभितम्। प्रतिष्ठितं वेदमंत्रैस्तं संपूज्य महामते॥ २४॥

शब्दार्थ

  • पुष्पमालान्वितम् — पुष्पमालाओं से युक्त।
  • कुर्यात् — बनाना चाहिए।
  • ब्रह्मसूत्रेण — ब्रह्मसूत्र अथवा पवित्र सूत्र से।
  • शोभितम् — सुशोभित।
  • प्रतिष्ठितम् — प्रतिष्ठित।
  • वेदमंत्रैः — वेदमंत्रों से।
  • तम् — उस कलश को।
  • संपूज्य — अच्छी तरह पूजन करके।
  • महामते — हे बुद्धिमान!

भावार्थ

कलश को पुष्पमालाओं से सजाना चाहिए, पवित्र सूत्र से सुशोभित करना चाहिए और वेदमंत्रों द्वारा उसकी प्रतिष्ठा करके उसका पूजन करना चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

पिछले श्लोक में कलश की भौतिक तैयारी बताई गई थी। यहाँ उसकी धार्मिक प्रतिष्ठा का वर्णन है।

इस क्रम में दो पक्ष स्पष्ट हैं—वस्तु का निर्माण और उसका संस्कार। स्वर्ण, घी और चाँदी से कलश तैयार होता है; वेदमंत्र और पूजा उसे निर्धारित धार्मिक विधि से जोड़ते हैं।

इस प्रकार दान की विधि में भौतिक वस्तु और धार्मिक संस्कार दोनों सम्मिलित हैं।


श्लोक २५

उपचारैः पवित्रैश्च षोडशैः परिपूजयेत्। स्वलंकृत्य ततो दद्याद्ब्राह्मणाय महात्मने॥ २५॥

शब्दार्थ

  • उपचारैः — पूजन की विधियों से।
  • पवित्रैः — पवित्र।
  • षोडशैः — सोलह।
  • परिपूजयेत् — पूर्ण रूप से पूजन करना चाहिए।
  • स्वलंकृत्य — अच्छी तरह सजाकर।
  • ततः — उसके बाद।
  • दद्यात् — देना चाहिए।
  • ब्राह्मणाय — ब्राह्मण को।
  • महात्मने — महात्मा अथवा श्रेष्ठ गुणों वाले व्यक्ति को।

भावार्थ

उस कलश का सोलह पवित्र उपचारों से पूर्ण पूजन करना चाहिए। फिर उसे अच्छी तरह सुसज्जित करके महात्मा ब्राह्मण को दान देना चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान की प्रक्रिया का क्रम पूरा होता है—निर्माण, पूर्ति, सजावट, प्रतिष्ठा, पूजन और अंत में दान।

इससे स्पष्ट होता है कि वर्णित महादान एक विधिपूर्वक संपन्न किया जाने वाला कर्म है।

दान की वस्तु को तैयार करके सीधे दे देने के स्थान पर पहले उसके साथ धार्मिक क्रियाएँ संपन्न की जाती हैं। इस प्रकार दान की विधि में वस्तु, संस्कार और पात्र तीनों का समावेश है।


श्लोक २६

षोडशैव ततो गावः सवस्त्राः कांस्यदोहनाः। कुंभयुक्ताश्च चत्वारो दक्षिणां च सकांचनाम्॥ २६॥

शब्दार्थ

  • षोडश एव गावः — सोलह गौएँ।
  • ततः — इसके बाद।
  • सवस्त्राः — वस्त्रों सहित।
  • कांस्यदोहनाः — कांस्य के दुग्धपात्रों से युक्त।
  • कुंभयुक्ताः च चत्वारः — और चार कलशों से युक्त।
  • दक्षिणाम् च — तथा दक्षिणा भी।
  • सकांचनाम् — स्वर्ण सहित।

भावार्थ

इसके बाद सोलह गौएँ वस्त्रों सहित दान में दी जाएँ। उनके साथ कांस्य के दुग्धपात्र हों। चार कलश भी दिए जाएँ और स्वर्ण सहित दक्षिणा प्रदान की जाए।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में दान की मात्रा और उसके साथ दी जाने वाली वस्तुओं का विवरण है।

गौ के साथ दुग्धपात्र देने का अर्थ है कि दान में केवल जीव ही नहीं, बल्कि उसके उपयोग से संबंधित साधन भी सम्मिलित किए जा रहे हैं।

चार कलश और स्वर्णयुक्त दक्षिणा इस दान को अधिक विस्तृत बनाते हैं। यहाँ दान की पूर्णता उसके घटकों के संयोजन में दिखाई देती है।


श्लोक २७

तथा द्वादशका गावो वस्त्रालंकारभूषणाः। पृथग्भूताय विप्राय दातव्या नात्र संशयः॥ २७॥

शब्दार्थ

  • तथा — इसी प्रकार।
  • द्वादशका गावः — बारह गौएँ।
  • वस्त्रालंकारभूषणाः — वस्त्र, अलंकार और आभूषणों से युक्त।
  • पृथग्भूताय — अलग से अथवा पृथक् रूप में निर्धारित।
  • विप्राय — विप्र को।
  • दातव्याः — दी जानी चाहिए।
  • न अत्र संशयः — इसमें कोई संशय नहीं।

भावार्थ

इसी प्रकार बारह गौएँ वस्त्र, अलंकार और आभूषणों से सुसज्जित करके विप्र को अलग से दान देनी चाहिए। इस विषय में संदेह नहीं है।

तात्त्विक व्याख्या

पिछले श्लोक में सोलह गौओं और उनसे संबंधित वस्तुओं का उल्लेख था। यहाँ बारह गौओं का अतिरिक्त दान बताया गया है।

इससे महादान की संरचना में विभिन्न समूहों और निर्धारित संख्याओं का महत्त्व सामने आता है।

दान की विधि यहाँ सामान्य इच्छा पर नहीं छोड़ी गई, बल्कि वस्तुओं की संख्या और उनके स्वरूप का स्पष्ट विवरण दिया गया है।


श्लोक २८

एवमादीनि दानानि अन्यानि नृपनंदन। तीर्थकालं सुसंप्राप्य विप्रावसथमेव च॥ २८॥

शब्दार्थ

  • एवमादीनि — इस प्रकार के अन्य।
  • दानानि — दान।
  • अन्यानि — दूसरे भी।
  • नृपनन्दन — हे राजपुत्र!
  • तीर्थकालम् — तीर्थ का उपयुक्त समय।
  • सुसंप्राप्य — उचित अवसर प्राप्त करके।
  • विप्रावसथम् — विप्र के निवास अथवा आश्रय पर।
  • एव च — तथा।

भावार्थ

हे राजपुत्र! ऐसे अनेक अन्य दान भी हैं। तीर्थ और उपयुक्त समय प्राप्त होने पर विप्र के निवास अथवा आश्रय पर जाकर दान किया जा सकता है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में पहले वर्णित विशिष्ट महादानों से व्यापक दान-परंपरा की ओर संक्रमण होता है।

यहाँ तीर्थ, समय और विप्र के निवास का उल्लेख है। दान के लिए उचित स्थान और अवसर को भी महत्त्व दिया गया है।

अगले श्लोक में भगवान विष्णु स्पष्ट करते हैं कि इन दानों का महत्त्व श्रद्धाभाव से जुड़ा हुआ है।


श्लोक २९

श्रद्धाभावेन दातव्यं बहुपुण्यकरं भवेत्। विष्णुरुवाच— विष्णुमुद्दिश्य यद्दानं कामनापरिकल्पितम्॥ २९॥

शब्दार्थ

  • श्रद्धाभावेन — श्रद्धा की भावना से।
  • दातव्यम् — दान देना चाहिए।
  • बहुपुण्यकरम् — बहुत पुण्य उत्पन्न करने वाला।
  • भवेत् — होता है।
  • विष्णुम् उद्दिश्य — विष्णु को उद्देश्य बनाकर।
  • यत् दानम् — जो दान।
  • कामना-परिकल्पितम् — किसी कामना अथवा इच्छा के साथ निर्धारित किया गया।

भावार्थ

दान श्रद्धाभाव से देना चाहिए, क्योंकि ऐसा दान बहुत पुण्यकारी होता है। भगवान विष्णु आगे कहते हैं कि जो दान विष्णु को उद्देश्य बनाकर किसी कामना के साथ किया जाता है, उसके फल को समझना चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान की भावना और उसके उद्देश्य का प्रश्न सामने आता है।

दान करने वाला व्यक्ति किसी विशेष फल की कामना कर सकता है। वह धन, सुख, ज्ञान, प्रतिष्ठा अथवा अन्य किसी उपलब्धि की इच्छा से दान कर सकता है।

श्लोक इस कामना को दान की प्रक्रिया के भीतर रखता है। आगे बताया जाएगा कि दाता की भावना और उसके उद्देश्य के अनुसार दान का फल किस प्रकार निर्धारित होता है।


श्लोक ३०

तस्य दानस्य भावेन भावनापरिभावितः। तादृक्फलं समश्नाति मानुषो नात्र संशयः॥ ३०॥

शब्दार्थ

  • तस्य दानस्य — उस दान का।
  • भावेन — भावना के अनुसार।
  • भावनापरिभावितः — भावना से प्रभावित अथवा अनुप्राणित।
  • तादृक् फलम् — उसी प्रकार का फल।
  • समश्नाति — प्राप्त करता है, अनुभव करता है।
  • मानुषः — मनुष्य।
  • न अत्र संशयः — इसमें कोई संदेह नहीं।

भावार्थ

दान करने वाला मनुष्य जिस भावना और उद्देश्य से दान करता है, उसी के अनुरूप फल प्राप्त करता है। इसमें संदेह नहीं है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक अध्याय के प्रमुख सिद्धांतों में से एक प्रस्तुत करता है—दान का फल केवल बाहरी वस्तु से निर्धारित नहीं होता, बल्कि दान की भावना भी महत्त्वपूर्ण है।

दो व्यक्ति समान वस्तु दान कर सकते हैं, लेकिन उनके उद्देश्य अलग हो सकते हैं। एक व्यक्ति किसी विशेष सांसारिक उपलब्धि की इच्छा से दान करता है, जबकि दूसरा ईश्वरभक्ति अथवा व्यापक कल्याण की भावना से।

यहाँ दान के परिणाम को दाता की भावना के अनुरूप बताया गया है। इसलिए कर्म की बाहरी समानता से उसके फल की पूर्ण समानता आवश्यक नहीं होती।


तृतीय खण्ड : अभ्युदय, ज्ञानवृद्धि और पारिवारिक फल

श्लोक ३१

अभ्युदयं प्रवक्ष्यामि यज्ञादिषु प्रवर्तते। तेन दानेन तस्यापि श्रद्धया च द्विजोत्तम॥ ३१॥

शब्दार्थ

  • अभ्युदयम् — उन्नति, समृद्धि अथवा उत्कर्ष।
  • प्रवक्ष्यामि — मैं बताऊँगा।
  • यज्ञादिषु — यज्ञ आदि धार्मिक कर्मों में।
  • प्रवर्तते — प्रवृत्त होता है।
  • तेन दानेन — उस दान से।
  • तस्य अपि — उसके लिए भी।
  • श्रद्धया च — और श्रद्धा के साथ।
  • द्विजोत्तम — हे श्रेष्ठ द्विज!

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं कि अब मैं अभ्युदय का वर्णन करूँगा। श्रद्धा से किए गए दान के फलस्वरूप व्यक्ति यज्ञ आदि पुण्यकर्मों में प्रवृत्त होता है।

तात्त्विक व्याख्या

अभ्युदय का आशय उन्नति और समृद्धि से है। यहाँ दान के परिणाम को केवल संपत्ति प्राप्त करने तक सीमित नहीं किया गया, बल्कि आगे अच्छे कर्मों में प्रवृत्त होने से भी जोड़ा गया है।

दान के फलस्वरूप व्यक्ति के जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ बन सकती हैं जिनमें वह धार्मिक और कल्याणकारी कार्यों में भाग ले सके।

इस प्रकार अभ्युदय को केवल बाहरी संपन्नता के रूप में नहीं, बल्कि श्रेष्ठ कर्मों की दिशा में आगे बढ़ने के अवसर के रूप में भी समझा जा सकता है।


श्लोक ३२

प्रज्ञावृद्धिं समाप्नोति न च दुःखं प्रविंदति। भोगान्भुनक्ति धर्मात्मा जीवमानस्तु सांप्रतम्॥ ३२॥

शब्दार्थ

  • प्रज्ञावृद्धिम् — प्रज्ञा अथवा विवेक की वृद्धि।
  • समाप्नोति — प्राप्त करता है।
  • न च — और नहीं।
  • दुःखम् — दुःख।
  • प्रविंदति — प्राप्त करता है, अनुभव करता है।
  • भोगान् भुनक्ति — सुख-साधनों का अनुभव करता है।
  • धर्मात्मा — धर्मपरायण व्यक्ति।
  • जीवमानः — जीवित रहते हुए।
  • सांप्रतम् — वर्तमान जीवन में।

भावार्थ

ऐसा धर्मपरायण व्यक्ति प्रज्ञा की वृद्धि प्राप्त करता है, दुःखों से बचा रहता है और वर्तमान जीवन में सुख-साधनों का अनुभव करता है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में तीन फल बताए गए हैं—प्रज्ञा की वृद्धि, दुःख से मुक्ति अथवा उसकी कमी, और जीवन में सुख-साधनों की प्राप्ति।

प्रज्ञा केवल जानकारी की मात्रा नहीं है। यह विवेकपूर्ण समझ से संबंधित है। इसलिए यहाँ दान के फल को ज्ञानात्मक विकास से भी जोड़ा गया है।

इसके साथ भोग और सुख का उल्लेख यह बताता है कि अभ्युदय में जीवन की बाहरी परिस्थितियाँ तथा आंतरिक समझ दोनों सम्मिलित हैं।


श्लोक ३३

ऐंद्रांस्तु भुंक्ते भोगान्स दाता दिव्यां गतिं गतः। स्वकुलं नयते स्वर्गं कल्पानां च सहस्रकम्॥ ३३॥

शब्दार्थ

  • ऐन्द्रान् भोगान् — इन्द्रलोक से संबंधित सुख।
  • भुंक्ते — अनुभव करता है।
  • सः दाता — वह दाता।
  • दिव्याम् गतिम् — दिव्य गति अथवा उच्च अवस्था।
  • गतः — प्राप्त करके।
  • स्वकुलम् — अपने कुल को।
  • नयते — ले जाता है।
  • स्वर्गम् — स्वर्ग।
  • कल्पानाम् सहस्रकम् — हजारों कल्पों तक।

भावार्थ

दानकर्ता दिव्य गति प्राप्त करके इन्द्रलोक के सुखों का अनुभव करता है। वह अपने कुल को भी स्वर्ग की प्राप्ति कराता है और हजारों कल्पों तक स्वर्गीय सुखों का फल प्राप्त करता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान के फल का विस्तार व्यक्तिगत जीवन से आगे बढ़कर कुल और दीर्घकालिक पारलौकिक परिणामों तक किया गया है।

पहले श्लोक में प्रज्ञा और वर्तमान जीवन के सुखों की बात थी। अब दान के फल को दिव्य गति और कुल के कल्याण से जोड़ा गया है।

इस प्रकार अध्याय में कर्मफल की अवधारणा अनेक स्तरों पर प्रस्तुत होती है—व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और पारलौकिक।


श्लोक ३४

एवमाभ्युदयं प्रोक्तं प्राप्तं तेषु वदाम्यहम्। कायस्य च क्षयं ज्ञात्वा जरया परिपीडितः॥ ३४॥

शब्दार्थ

  • एवम् — इस प्रकार।
  • आभ्युदयम् — अभ्युदय अथवा उन्नति से संबंधित फल।
  • प्रोक्तम् — कहा गया।
  • प्राप्तम् — प्राप्त होने वाला।
  • तेषु — उन दानों के संदर्भ में।
  • वदामि अहम् — मैं बताता हूँ।
  • कायस्य क्षयम् — शरीर का क्षय।
  • ज्ञात्वा — जानकर।
  • जरया — बुढ़ापे से।
  • परिपीडितः — पीड़ित।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं कि इस प्रकार अभ्युदय से संबंधित फल बताए गए। अब मैं दूसरे पक्ष का वर्णन करता हूँ। जब मनुष्य शरीर के क्षय को जानता है और बुढ़ापे से पीड़ित होता है, तब उसे अपने जीवन के संबंध में क्या करना चाहिए, यह समझना आवश्यक है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ अध्याय की दिशा बदलती है।

पहले दान के शुभ अवसरों, वस्तुओं और उनसे प्राप्त होने वाले फलों का वर्णन था। अब शरीर की नश्वरता और बुढ़ापे का प्रश्न सामने आता है।

यह परिवर्तन महत्त्वपूर्ण है। मनुष्य अपने जीवन को स्थायी मानकर धन, परिवार और संबंधों में उलझा रह सकता है। लेकिन शरीर का क्षय उसे यह स्मरण कराता है कि वर्तमान जीवन सीमित है।

इसलिए अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि दान करने से क्या फल मिलेगा, बल्कि यह भी है कि मनुष्य को दान कब करना चाहिए और उसे किसके भरोसे छोड़ना चाहिए।


चतुर्थ खण्ड : मृत्यु का भय, पारिवारिक मोह और दान में विलम्ब

श्लोक ३५

दानं तेन प्रदातव्यमाशां कस्य न कारयेत्। मृते च मयि मे पुत्रा अन्ये स्वजनबांधवाः॥ ३५॥

शब्दार्थ

  • दानम् — दान।
  • तेन — उस व्यक्ति द्वारा।
  • प्रदातव्यम् — दिया जाना चाहिए।
  • आशाम् — आशा अथवा अपेक्षा।
  • कस्य न कारयेत् — किस पर आशा रखनी चाहिए अथवा किसके भरोसे रहना चाहिए।
  • मृते मयि — मेरे मर जाने पर।
  • मे पुत्राः — मेरे पुत्र।
  • अन्ये — अन्य।
  • स्वजनबान्धवाः — अपने लोग और संबंधी।

भावार्थ

जब मनुष्य शरीर के क्षय और मृत्यु को समझ ले, तब उसे स्वयं दान करना चाहिए। उसे यह आशा करके नहीं बैठना चाहिए कि उसके मरने के बाद उसके पुत्र अथवा अन्य संबंधी उसके लिए दान कर देंगे।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में दान के समय और दायित्व का प्रश्न सामने आता है।

मनुष्य अपने जीवनकाल में दान कर सकता है, लेकिन मृत्यु के बाद वह स्वयं कोई नया कर्म नहीं कर सकता। उस समय उसके पुत्रों और संबंधियों के निर्णय उनके अपने होंगे।

इसलिए अपने कर्तव्य को भविष्य के किसी दूसरे व्यक्ति पर छोड़ देना निश्चित व्यवस्था नहीं है। दान की इच्छा यदि केवल मन में बनी रहती है और जीवनकाल में कर्म का रूप नहीं लेती, तो उसके पूरा होने की गारंटी नहीं होती।

यहाँ कथा मनुष्य को अपने कर्म का उत्तरदायित्व स्वयं स्वीकार करने की दिशा देती है।


श्लोक ३६

कथमेते भविष्यंति मां विना सुहृदो मम। तेषां मोहात्प्रमुग्धो वै न ददाति स किंचन॥ ३६॥

शब्दार्थ

  • कथम् — कैसे।
  • एते — ये।
  • भविष्यन्ति — रहेंगे अथवा होंगे।
  • माम् विना — मेरे बिना।
  • सुहृदः मम — मेरे प्रियजन।
  • तेषाम् मोहात् — उनके प्रति मोह के कारण।
  • प्रमुग्धः — अत्यधिक मोहित अथवा भ्रमित।
  • वै — निश्चय ही।
  • न ददाति — नहीं देता।
  • सः किञ्चन — वह कुछ भी।

भावार्थ

मनुष्य सोचता है कि मेरे मर जाने के बाद मेरे प्रियजन मेरे बिना कैसे रहेंगे। इस मोह में अत्यधिक डूबा हुआ व्यक्ति अपने जीवनकाल में कुछ भी दान नहीं करता।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ परिवार के प्रति प्रेम और परिवार के मोह के बीच अंतर समझना आवश्यक है।

अपने प्रियजनों की चिंता करना स्वाभाविक है, लेकिन जब यही चिंता मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्तव्य से रोकने लगे, तब वह मोह का रूप ले सकती है।

व्यक्ति अपने धन और साधनों को परिवार के लिए सुरक्षित रखने में इतना उलझ जाता है कि वह जीवनकाल में दान करने का विचार भी टाल देता है।

इस प्रकार भविष्य की चिंता वर्तमान कर्म को रोक देती है। श्लोक इसी मानसिक स्थिति को सामने रखता है।


श्लोक ३७

मृत्युं प्रयाति मोहात्मा रुदंति मित्रबांधवाः। दुःखेन पीडिताः सर्वे मायामोहेन पीडिताः॥ ३७॥

शब्दार्थ

  • मृत्युम् प्रयाति — मृत्यु को प्राप्त होता है।
  • मोहात्मा — मोह में डूबा हुआ व्यक्ति।
  • रुदन्ति — रोते हैं।
  • मित्रबान्धवाः — मित्र और संबंधी।
  • दुःखेन पीडिताः — दुःख से पीड़ित।
  • सर्वे — सभी।
  • मायामोहेन — माया और मोह से।
  • पीडिताः — प्रभावित अथवा पीड़ित।

भावार्थ

मोह में डूबा हुआ मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता है। उसके मित्र और संबंधी दुःख में रोते हैं और सभी माया-मोह से प्रभावित रहते हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ मनुष्य की मृत्यु और पीछे रह जाने वाले संबंधियों की मानसिक स्थिति का चित्रण है।

मृत्यु के समय शरीर का संबंध समाप्त होता है, लेकिन जीवित संबंधियों के भीतर स्मृतियाँ, भावनाएँ और मोह बने रहते हैं। वे अपने प्रियजन के चले जाने से दुःख अनुभव करते हैं।

श्लोक इस स्थिति को माया-मोह से जोड़ता है। मनुष्य अपने संबंधों को स्थायी मानकर उनसे गहरा लगाव रखता है, लेकिन मृत्यु उस संबंध के वर्तमान शारीरिक रूप को समाप्त कर देती है।

यहाँ प्रश्न संबंधों को अस्वीकार करने का नहीं, बल्कि उनकी अनित्यता को समझने का है।


श्लोक ३८

संकल्पयंति दानानि मोक्षं वै चिंतयंति च। तस्मिन्मृते महाराज मायामोहे गते सति॥ ३८॥

शब्दार्थ

  • संकल्पयन्ति — संकल्प करते हैं।
  • दानानि — दान देने के कार्य।
  • मोक्षम् — मुक्ति।
  • वै — निश्चय ही।
  • चिन्तयन्ति च — विचार भी करते हैं।
  • तस्मिन् मृते — उस व्यक्ति के मर जाने पर।
  • महाराज — हे महाराज!
  • मायामोहे गते सति — माया और मोह से प्रभावित होने पर।

भावार्थ

जब व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उसके संबंधी दान करने और मोक्ष की कामना करने के संकल्प लेते हैं। लेकिन यह संकल्प मृत्यु के बाद उत्पन्न हुई मानसिक स्थिति से जुड़ा होता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। व्यक्ति के जीवनकाल में उसके संबंधी उसके धन और संपत्ति को लेकर सामान्य जीवन जीते रहते हैं, लेकिन उसकी मृत्यु के बाद वे दान और मोक्ष के विषय में विचार करने लगते हैं।

मृत्यु का प्रत्यक्ष अनुभव और उससे उत्पन्न दुःख मनुष्य को क्षणिक रूप से अपने जीवन की नश्वरता का बोध करा सकता है।

लेकिन केवल संकल्प कर लेना और उस संकल्प को कर्म में बदल देना अलग बातें हैं। अगले श्लोक में कथा बताती है कि समय बीतने पर मोह और लोभ के कारण ये संकल्प कैसे भुला दिए जाते हैं।


श्लोक ३९

विस्मरंति च दानानि लोभात्मानो ददंति न। योऽसौ मृतो महाराज यमपंथं सुदुःखितः॥ ३९॥

शब्दार्थ

  • विस्मरन्ति — भूल जाते हैं।
  • दानानि — दान के संकल्प।
  • लोभात्मानः — लोभ से प्रभावित व्यक्ति।
  • ददन्ति न — दान नहीं देते।
  • यः असौ मृतः — जो व्यक्ति मर चुका है।
  • महाराज — हे महाराज!
  • यमपन्थम् — यम का मार्ग।
  • सुदुःखितः — अत्यंत दुःख का अनुभव करता हुआ।

भावार्थ

मृत्यु के बाद संबंधी दान के संकल्पों को भूल जाते हैं। लोभ से प्रभावित होकर वे दान नहीं करते। दूसरी ओर, मृत व्यक्ति यममार्ग पर अत्यंत दुःख का अनुभव करता है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में पहले बताए गए संकल्प और उनके वास्तविक परिणाम के बीच अंतर स्पष्ट होता है।

मृत्यु के बाद संबंधी भावुक होकर दान का विचार कर सकते हैं, लेकिन समय बीतने पर उनकी प्राथमिकताएँ बदल सकती हैं। संपत्ति, स्वार्थ और लोभ उनके निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति के भविष्य के निर्णय पर निर्भर रहना अनिश्चित है।

कथा के भीतर यममार्ग का वर्णन इस बात को और तीव्र करता है कि मृत्यु के बाद जीव की यात्रा को केवल पीछे रह गए लोगों की भावनाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।


श्लोक ४०

तृषाक्षुधासमाक्रांतो बहुदुःखैः प्रपीडितः। तस्माद्दानं प्रदातव्यं स्वयमेव न संशयः॥ ४०॥

शब्दार्थ

  • तृषा — प्यास।
  • क्षुधा — भूख।
  • समाक्रान्तः — से घिरा हुआ।
  • बहुदुःखैः — अनेक दुःखों से।
  • प्रपीडितः — अत्यंत पीड़ित।
  • तस्मात् — इसलिए।
  • दानम् प्रदातव्यम् — दान देना चाहिए।
  • स्वयम् एव — स्वयं ही।
  • न संशयः — इसमें संदेह नहीं।

भावार्थ

यममार्ग पर जीव प्यास, भूख और अनेक प्रकार के दुःखों से पीड़ित होता है। इसलिए मनुष्य को दान स्वयं करना चाहिए। इस विषय में कोई संदेह नहीं है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक इस खण्ड का मुख्य निष्कर्ष प्रस्तुत करता है।

पहले मनुष्य का मोह, मृत्यु के बाद संबंधियों का संकल्प और फिर उन संकल्पों को भूल जाना बताया गया। अब निष्कर्ष यह है कि दान का दायित्व स्वयं निभाना चाहिए।

प्यास और भूख का उल्लेख मृत्यु के बाद की यात्रा को एक ऐसी स्थिति के रूप में प्रस्तुत करता है जिसमें जीव को सहायता की आवश्यकता है।

इस कथा में दान को केवल सामाजिक उदारता नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद की यात्रा से संबंधित कर्म के रूप में भी समझाया गया है।

स्वयं दान करने का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने जीवनकाल में ही अपने कर्तव्य को कर्म का रूप दे, न कि उसे केवल भविष्य की आशा बनाकर छोड़ दे।


पंचम खण्ड : संबंधों की अनित्यता और दान का व्यक्तिगत उत्तरदायित्व

श्लोक ४१

कस्य पुत्राश्च पौत्राश्च कस्य भार्या नृपोत्तम। संसारे नास्ति कः कस्य तस्माद्दानं प्रदीयते॥ ४१॥

शब्दार्थ

  • कस्य — किसके।
  • पुत्राः — पुत्र।
  • पौत्राः — पौत्र।
  • भार्या — पत्नी।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजा!
  • संसारे — संसार में।
  • नास्ति — नहीं है।
  • कः कस्य — कौन किसका है।
  • तस्मात् — इसलिए।
  • दानम् प्रदीयते — दान देना चाहिए।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—हे राजा! संसार में कौन किसका पुत्र, पौत्र अथवा पत्नी है? संसार के संबंध स्थायी नहीं हैं। इसलिए मनुष्य को स्वयं दान करना चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ संबंधों की अनित्यता का प्रश्न सामने आता है। मनुष्य परिवार और संबंधों को अपने जीवन का स्थायी आधार मान सकता है, लेकिन शरीर की मृत्यु इन संबंधों के वर्तमान स्वरूप को बदल देती है।

इस कथन का उद्देश्य पारिवारिक संबंधों के अस्तित्व को नकारना नहीं, बल्कि उनके आधार पर अपने कर्तव्य को स्थगित करने की प्रवृत्ति को समझाना है।

यदि मनुष्य यह मानकर चलता है कि उसके बाद उसके पुत्र, पौत्र अथवा अन्य संबंधी उसके सभी धार्मिक कर्तव्यों को पूरा कर देंगे, तो वह अपने जीवनकाल में कर्म करने की आवश्यकता को भूल सकता है।

इसलिए श्लोक पुनः व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर बल देता है।


श्लोक ४२

ज्ञानवता प्रदातव्यं स्वयमेव न संशयः। अन्नं पानं च तांबूलमुदकं कांचनं तथा॥ ४२॥

शब्दार्थ

  • ज्ञानवता — ज्ञानवान व्यक्ति द्वारा।
  • प्रदातव्यम् — दिया जाना चाहिए।
  • स्वयम् एव — स्वयं ही।
  • न संशयः — इसमें संदेह नहीं।
  • अन्नम् — भोजन।
  • पानम् — पीने की वस्तु अथवा पेय।
  • ताम्बूलम् — ताम्बूल।
  • उदकम् — जल।
  • कांचनम् — स्वर्ण।
  • तथा — और।

भावार्थ

ज्ञानवान व्यक्ति को स्वयं दान करना चाहिए। दान की वस्तुओं में अन्न, पेय, ताम्बूल, जल और स्वर्ण आदि सम्मिलित हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ ज्ञानवता का उल्लेख महत्त्वपूर्ण है। दान का दायित्व उस व्यक्ति पर रखा गया है जो अपने जीवन, कर्म और उनके परिणामों को समझने में सक्षम है।

इसके बाद दान की वस्तुओं की सूची आरम्भ होती है। अन्न और जल जीवन की मूल आवश्यकताओं से संबंधित हैं, जबकि स्वर्ण संपत्ति का प्रतिनिधित्व करता है।

इस प्रकार दान की सूची में दैनिक जीवन की आवश्यकताओं और मूल्यवान संपदा दोनों का समावेश है।


श्लोक ४३

युग्मं वस्त्रं च छत्रं च स्वयमेव न संशयः। जलपात्राण्यनेकानि सोदकानि नृपोत्तम॥ ४३॥

शब्दार्थ

  • युग्मम् वस्त्रम् — वस्त्रों का जोड़ा।
  • छत्रम् — छाता।
  • च — और।
  • स्वयम् एव — स्वयं ही।
  • न संशयः — निश्चय ही।
  • जलपात्राणि — जल रखने के पात्र।
  • अनेकानि — अनेक।
  • सोदकानि — जल सहित।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजा!

भावार्थ

मनुष्य को स्वयं वस्त्रों का जोड़ा, छाता और जल से भरे अनेक जलपात्र दान करने चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान की वस्तुएँ जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं से संबंधित हैं।

वस्त्र शरीर की रक्षा करते हैं। छाता धूप और वर्षा से बचाव का साधन है। जलपात्र जल रखने और उसे उपलब्ध कराने में सहायक हैं।

इन वस्तुओं का उल्लेख दान के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाता है। दान केवल मूल्यवान संपदा का हस्तांतरण नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले साधन उपलब्ध कराना भी है।


श्लोक ४४

वाहनानि विचित्राणि यानान्येव महामते। नानागंधान्सकर्पूरं यमपंथ सुखप्रदे॥ ४४॥

शब्दार्थ

  • वाहनानि — वाहन।
  • विचित्राणि — अनेक प्रकार के।
  • यानानि एव — विभिन्न प्रकार के यात्रा-साधन।
  • महामते — हे बुद्धिमान!
  • नानागन्धान् — अनेक प्रकार के सुगंधित पदार्थ।
  • सकर्पूरम् — कपूर सहित।
  • यमपन्थे — यममार्ग में।
  • सुखप्रदे — सुख प्रदान करने वाले।

भावार्थ

मनुष्य को अनेक प्रकार के वाहन, यात्रा-साधन, सुगंधित पदार्थ और कपूर आदि दान करने चाहिए। ये दान यममार्ग की यात्रा में सुख देने वाले बताए गए हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ दान की वस्तुओं का संबंध यात्रा और सुविधा से जुड़ता है। वाहन तथा यान यात्रा में सहायक साधन हैं, जबकि सुगंधित पदार्थ और कपूर अन्य प्रकार की सुविधाओं अथवा धार्मिक उपयोग से संबंधित हैं।

यममार्ग के संदर्भ में इनका उल्लेख मृत्यु के बाद की यात्रा के वर्णन को आगे बढ़ाता है।

इस प्रकार दान की वस्तुओं की सूची अब भोजन, जल, वस्त्र और स्वर्ण से आगे बढ़कर यात्रा-साधनों तथा अन्य उपयोगी वस्तुओं तक पहुँचती है।


श्लोक ४५

उपानहौ प्रदातव्ये यदीच्छेद्विपुलं सुखम्। एतैर्दानैर्महाराज यमपंथं सुखेन वै॥ ४५॥

शब्दार्थ

  • उपानहौ — जूते अथवा पादत्राणों का जोड़ा।
  • प्रदातव्ये — दान देना चाहिए।
  • यदि इच्छेत् — यदि इच्छा हो।
  • विपुलम् सुखम् — बहुत अधिक सुख।
  • एतैः दानैः — इन दानों से।
  • महाराज — हे महाराज!
  • यमपन्थम् — यममार्ग को।
  • सुखेन — सुखपूर्वक।
  • वै — निश्चय ही।

भावार्थ

यदि मनुष्य अधिक सुख की इच्छा रखता है, तो उसे जूते अथवा पादत्राणों का जोड़ा दान करना चाहिए। इन दानों के फलस्वरूप यममार्ग की यात्रा सुखपूर्वक होती है।

तात्त्विक व्याख्या

पादत्राणों का दान यात्रा के लिए उपयोगी साधन देने का उदाहरण है।

इससे दान का व्यावहारिक स्वरूप और स्पष्ट होता है। अन्न, जल, वस्त्र, छाता, वाहन और पादत्राण—ये सभी यात्रा में अथवा जीवन-निर्वाह में उपयोगी वस्तुएँ हैं।

कथा इन वस्तुओं को यममार्ग की यात्रा के सुख से जोड़ती है। इस प्रकार मृत्यु के बाद की यात्रा के लिए आवश्यक साधनों का विचार दान के विधान में शामिल किया गया है।


श्लोक ४६

प्रयाति मानवो राजन्यमदूतैरलंकृतम्॥ ४६॥

शब्दार्थ

  • प्रयाति — जाता है अथवा यात्रा करता है।
  • मानवः — मनुष्य।
  • राजन् — हे राजन्!
  • यमदूतैः — यमदूतों के साथ अथवा यमदूतों द्वारा।
  • अलंकृतम् — सुसज्जित अथवा युक्त।

भावार्थ

हे राजा! इन दानों के फलस्वरूप मनुष्य यमदूतों से संबंधित मार्ग पर यात्रा करता है। पूर्ववर्ती श्लोकों के संदर्भ में यह यात्रा सुखपूर्वक संपन्न होने वाली बताई गई है।

तात्त्विक व्याख्या

यह अंतिम श्लोक पूरे अध्याय के उत्तरार्ध का समापन करता है।

पहले शरीर की नश्वरता, फिर मृत्यु के बाद संबंधियों के मोह, दान के संकल्पों को भूल जाने और अंततः स्वयं दान करने की आवश्यकता बताई गई। इसके बाद दान की उन वस्तुओं की सूची दी गई है जिन्हें कथा यममार्ग की यात्रा में सहायक मानती है।

इस प्रकार अध्याय का अंतिम विचार व्यक्तिगत उत्तरदायित्व पर लौटता है। मनुष्य को अपने जीवनकाल में ही अपने कर्मों का निर्णय करना चाहिए और केवल दूसरों के संकल्पों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।


अध्याय ४० का समग्र तात्त्विक निष्कर्ष

इस अध्याय को तीन प्रमुख विचार-क्रमों में समझा जा सकता है।

पहला—दान का स्वरूप और उसकी परिस्थिति।

नित्य दान और नैमित्तिक दान के बीच अंतर करते हुए भगवान विष्णु बताते हैं कि दान के समय, अवसर, वस्तु, पात्र और श्रद्धा का महत्त्व है। भूमि, गौ, स्वर्ण, वस्त्र, अन्न और अन्य साधनों के दान का उल्लेख इस बात को सामने लाता है कि दान अनेक स्वरूपों में किया जा सकता है।

दूसरा—दान की भावना और उसका फल।

दान के फल को केवल वस्तु की मात्रा से निर्धारित नहीं किया गया। श्रद्धा, कामना और दाता की भावना को भी महत्त्व दिया गया है। इसी कारण दान के परिणामों में संपत्ति, विद्या, प्रज्ञा, सुख, धर्मपरायणता और पारलौकिक उपलब्धियों का वर्णन मिलता है।

तीसरा—मृत्यु, मोह और स्वयं कर्म करने का दायित्व।

अध्याय का उत्तरार्ध विशेष रूप से इस प्रश्न पर केंद्रित है कि मनुष्य अपने जीवनकाल में दान क्यों करे। शरीर के क्षय और मृत्यु का बोध होने पर भी यदि वह अपने परिवार के मोह में उलझा रहता है, तो वह दान को भविष्य के लिए टाल सकता है। मृत्यु के बाद संबंधी संकल्प तो ले सकते हैं, लेकिन लोभ और मोह के कारण उन्हें भूल भी सकते हैं।

इसीलिए भगवान विष्णु बार-बार कहते हैं कि मनुष्य को स्वयं दान करना चाहिए। इस कथन का संबंध अपने कर्तव्य को पहचानने और उसे समय रहते कर्म में परिणत करने से है।

इस अध्याय का केंद्रीय सूत्र है—दान की वस्तु, दान का अवसर, पात्र, श्रद्धा, भावना और दाता का व्यक्तिगत उत्तरदायित्व एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। दान को केवल वस्तु देने की घटना मानने के बजाय उसके पूरे कर्म-क्रम और फल के संदर्भ में समझना आवश्यक है।

इस अध्याय में राजा वेन का प्रश्न है कि पुत्र, पत्नी, माता-पिता और गुरु किस प्रकार तीर्थ हैं। भगवान विष्णु इसके उत्तर में कृकल वैश्य और उसकी पत्नी सुकला की कथा सुनाते हैं। कथा का अधिकांश भाग पति-पत्नी के सम्बन्ध, तीर्थयात्रा, धर्माचरण और पतिव्रत धर्म के विषय में है। अन्त में सुकला अपने विचारों के समर्थन में प्राचीन इतिहास का उल्लेख करती है।

इस अध्याय में 84 श्लोक हैं। इसे क्रमशः मूल श्लोक, शब्दार्थ, भावार्थ और तात्त्विक व्याख्या के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। मूल पाठ में जहाँ शब्द-पाठ या वाक्य-विन्यास असामान्य है, वहाँ उपलब्ध पाठ के अनुसार अर्थ स्पष्ट किया जाएगा; श्लोकों का क्रम नहीं छोड़ा जाएगा।

पद्मपुराण — भूमिखण्ड

एकचत्वारिंशोऽध्यायः (41)

विषय : पुत्र, पत्नी, माता-पिता और गुरु तीर्थ कैसे हैं? — सुकला चरित

भाग 1 : राजा वेन का प्रश्न और कृकल-सुकला का परिचय

श्लोक 1–8

श्लोक 1

वेन उवाच—

पुत्रो भार्या कथं तीर्थं पितामाता कथं वद। गुरुश्चैव कथं तीर्थं तन्मे विस्तरतो वद॥ १॥

शब्दार्थ

  • पुत्रः — पुत्र।
  • भार्या — पत्नी।
  • कथम् — किस प्रकार।
  • तीर्थम् — तीर्थ, पवित्रता अथवा आध्यात्मिक उन्नति का साधन।
  • पिता, माता — माता-पिता।
  • गुरुः — गुरु, ज्ञान प्रदान करने वाला।
  • विस्तरतः — विस्तारपूर्वक।
  • वद — कहिए।

भावार्थ

राजा वेन पूछते हैं—पुत्र और पत्नी किस प्रकार तीर्थ हैं? माता-पिता तथा गुरु किस प्रकार तीर्थ माने जाते हैं? कृपया मुझे इसका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।

तात्त्विक व्याख्या

यह प्रश्न तीर्थ की अवधारणा को केवल भौगोलिक स्थान तक सीमित नहीं रखता। यदि कोई व्यक्ति अथवा सम्बन्ध जीव के जीवन में धर्म, ज्ञान और आत्मिक उन्नति का माध्यम बनता है, तो वह किस अर्थ में तीर्थ हो सकता है—राजा वेन का प्रश्न इसी दिशा में कथा का आरम्भ करता है।

यहाँ तीर्थ का मूल प्रश्न है कि मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा में उसके जीवन से जुड़े सम्बन्धों की क्या भूमिका है।


श्लोक 2

श्रीविष्णुरुवाच—

अस्ति वाराणसी रम्या गंगायुक्ता महापुरी। तस्यां वसति वैश्यैकः कृकलो नाम नामतः॥ २॥

शब्दार्थ

  • अस्ति — है।
  • वाराणसी — काशी।
  • रम्या — सुन्दर।
  • गंगायुक्ता — गंगा से युक्त।
  • महापुरी — महान नगरी।
  • तस्याम् — उसमें।
  • वसति — रहता था।
  • वैश्यः — वैश्य।
  • एकः — एक।
  • कृकलः — कृकल नाम का व्यक्ति।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—गंगा से सुशोभित रमणीय काशी नाम की महान नगरी में कृकल नाम का एक वैश्य रहता था।

तात्त्विक व्याख्या

कथा का परिवेश काशी है, जो भारतीय तीर्थ-परम्परा में विशेष स्थान रखती है। इसी पवित्र नगरी में रहने वाले कृकल की कथा के माध्यम से आगे यह प्रश्न उठता है कि तीर्थ का महत्त्व केवल किसी पवित्र स्थान तक पहुँचने में है या जीवन के सम्बन्धों और कर्तव्यों में भी उसकी कोई भूमिका है।


श्लोक 3

तस्य भार्या महासाध्वी पतिव्रतपरायणा। धर्माचारपरा नित्यं सा वै पतिपरायणा॥ ३॥

शब्दार्थ

  • तस्य — उसकी।
  • भार्या — पत्नी।
  • महासाध्वी — अत्यन्त सदाचारिणी।
  • पतिव्रतपरायणा — पतिव्रत धर्म में निष्ठावान।
  • धर्माचारपरा — धर्माचरण में तत्पर।
  • नित्यम् — सदैव।
  • पतिपरायणा — पति के प्रति समर्पित।

भावार्थ

कृकल की पत्नी अत्यन्त सदाचारिणी थी। वह पतिव्रत धर्म में निष्ठावान, सदैव धर्म का आचरण करने वाली और पति के प्रति समर्पित थी।

तात्त्विक व्याख्या

कथा आरम्भ से ही सुकला के चरित्र को धर्मनिष्ठा और निष्ठापूर्ण सम्बन्ध के आधार पर प्रस्तुत करती है। आगे तीर्थयात्रा के प्रसंग में उसके आचरण और कृकल के निर्णय के बीच जो संवाद होगा, उसी से इस निष्ठा की परीक्षा सामने आएगी।


श्लोक 4

सुकला नाम पुण्यांगी सुपुत्रा चारुमंगला। सत्यंवदा सदा शुद्धा प्रियाकारा प्रियप्रिया॥ ४॥

शब्दार्थ

  • सुकला — उसका नाम।
  • पुण्यांगी — पुण्यशील, शुभ गुणों से युक्त।
  • सुपुत्रा — उत्तम सन्तान वाली।
  • चारुमंगला — सुन्दर और मंगलमयी।
  • सत्यंवदा — सत्य बोलने वाली।
  • सदा शुद्धा — सदैव शुद्ध आचरण वाली।
  • प्रियाकारा — प्रिय व्यवहार करने वाली।
  • प्रियप्रिया — प्रियजनों के प्रति स्नेह रखने वाली।

भावार्थ

उसका नाम सुकला था। वह शुभ गुणों से सम्पन्न, उत्तम सन्तान वाली, मंगलमयी, सत्य बोलने वाली, शुद्ध आचरण करने वाली तथा प्रिय व्यवहार करने वाली स्त्री थी।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला के चरित्र का वर्णन केवल उसके बाहरी रूप के आधार पर नहीं किया गया। सत्यवादिता, शुद्ध आचरण और प्रिय व्यवहार उसके व्यक्तित्व के प्रमुख गुण हैं। इस प्रकार कथा में उसके चरित्र का आधार उसके गुण और व्यवहार हैं।


श्लोक 5

एवं गुणैः समायुक्ता सुभगा चारुकारिणी। स वैश्य उत्तमो नाना धर्मज्ञो ज्ञानवान्गुणी॥ ५॥

शब्दार्थ

  • एवम् — इस प्रकार।
  • गुणैः समायुक्ता — गुणों से युक्त।
  • सुभगा — सौभाग्यशालिनी।
  • चारुकारिणी — अच्छे कार्य करने वाली।
  • वैश्यः — वैश्य।
  • उत्तमः — श्रेष्ठ।
  • नाना धर्मज्ञः — अनेक धर्मों का ज्ञाता।
  • ज्ञानवान् — ज्ञान से युक्त।
  • गुणी — गुणवान।

भावार्थ

इस प्रकार अनेक उत्तम गुणों से सम्पन्न सुकला सौभाग्यशालिनी और अच्छे कार्य करने वाली थी। उसका पति कृकल भी श्रेष्ठ वैश्य, धर्मों का ज्ञाता, ज्ञानवान और गुणवान था।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ पति और पत्नी दोनों के गुणों का उल्लेख है। सुकला धर्माचरण में निष्ठावान है और कृकल भी धर्म तथा ज्ञान में रुचि रखने वाला व्यक्ति है। आगे तीर्थयात्रा के प्रसंग में दोनों के बीच जो मतभेद दिखाई देता है, वह धर्म के प्रति विरोध का नहीं, बल्कि धर्माचरण के स्वरूप और उसके निर्वाह का प्रश्न बनता है।


श्लोक 6

पुराणे श्रौतधर्मे च सदा श्रवणतत्परः। तीर्थयात्राप्रसंगेन बहुपुण्यप्रदायकम्॥ ६॥

शब्दार्थ

  • पुराणे — पुराणों में।
  • श्रौतधर्मे — श्रौत धर्म में, वैदिक यज्ञ-परम्परा से सम्बन्धित धर्म में।
  • सदा — सदैव।
  • श्रवणतत्परः — सुनने में तत्पर।
  • तीर्थयात्राप्रसंगेन — तीर्थयात्रा के प्रसंग में।
  • बहुपुण्यप्रदायकम् — बहुत पुण्य देने वाला।

भावार्थ

कृकल पुराणों और श्रौत धर्म से सम्बन्धित विषयों को सदैव सुनने में तत्पर रहता था। तीर्थयात्रा को वह बहुत पुण्य प्रदान करने वाला धार्मिक कार्य मानता था।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल धर्मग्रन्थों का श्रवण करता है और तीर्थयात्रा के पुण्य में विश्वास रखता है। कथा में उसका निर्णय किसी धर्मविरोधी वृत्ति से उत्पन्न नहीं होता। वह धर्म के एक मान्य रूप—तीर्थयात्रा—का पालन करना चाहता है।

यहीं से कथा का मुख्य प्रश्न विकसित होता है: धार्मिक कर्म करते समय व्यक्ति अपने निकटवर्ती सम्बन्धों और उत्तरदायित्वों को किस प्रकार समझे?


श्लोक 7

श्रद्धया निर्गतो यात्रां तीर्थानां पुण्यमंगलाम्। ब्राह्मणानां प्रसंगेन सार्थवाहेन तेन च॥ ७॥

शब्दार्थ

  • श्रद्धया — श्रद्धापूर्वक।
  • निर्गतः — निकल पड़ा।
  • यात्राम् — यात्रा के लिए।
  • तीर्थानाम् — तीर्थों की।
  • पुण्यमंगलाम् — पुण्यदायक और मंगलमयी।
  • ब्राह्मणानाम् प्रसंगेन — ब्राह्मणों के साथ अथवा उनके प्रसंग में।
  • सार्थवाहेन — यात्रियों के समूह अथवा सार्थ के साथ।
  • तेन — उस कृकल द्वारा।

भावार्थ

कृकल श्रद्धापूर्वक पुण्यदायक तीर्थों की यात्रा के लिए निकल पड़ा। वह ब्राह्मणों के सम्पर्क में और यात्रियों के समूह के साथ यात्रा पर गया।

तात्त्विक व्याख्या

तीर्थयात्रा व्यक्तिगत श्रद्धा के साथ-साथ उस समय की सामूहिक धार्मिक व्यवस्था से भी जुड़ी थी। यात्रियों के समूह में चलना कठिन मार्गों को पार करने और धार्मिक यात्रा को सम्पन्न करने का साधन था।

कृकल का प्रस्थान इस कथा में वह घटना है जिसके कारण पति-पत्नी के सम्बन्ध और धर्माचरण के स्वरूप पर प्रश्न उठता है।


श्लोक 8

प्रस्थितो धर्ममार्गं तु तमुवाच पतिव्रता। पतिस्नेहेन संमुग्धा भर्तारं वाक्यमब्रवीत्॥ ८॥

शब्दार्थ

  • प्रस्थितः — प्रस्थान कर चुका।
  • धर्ममार्गम् — धर्म के मार्ग पर।
  • तम् — उसे।
  • उवाच — कहा।
  • पतिव्रता — पतिव्रत धर्म में निष्ठावान स्त्री।
  • पतिस्नेहेन — पति के प्रति स्नेह से।
  • संमुग्धा — भाव-विभोर।
  • भर्तारम् — पति से।
  • वाक्यम् अब्रवीत् — वचन कहा।

भावार्थ

जब कृकल धर्ममार्ग पर तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान करने लगा, तब पति के प्रति स्नेह से भाव-विभोर सुकला ने उससे कुछ कहा।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला का संवाद केवल पति से दूर होने की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है। आगे वह अपने वैवाहिक सम्बन्ध को धर्माचरण और तीर्थ के प्रश्न से जोड़कर प्रस्तुत करेगी। इसलिए उसके कथन को समझने के लिए उसके वचनों का क्रम महत्त्वपूर्ण है।


भाग 2 : सुकला का कथन—पति को तीर्थ मानने का आधार

श्लोक 9–18

श्लोक 9

सुकलोवाच—

अहं ते धर्मतः पत्नी सहपुण्यकरा प्रिय। पतिमार्गं प्रतीक्ष्याहं पतिदेवं यजाम्यहम्॥ ९॥

शब्दार्थ

  • अहम् — मैं।
  • ते — आपकी।
  • धर्मतः — धर्म के अनुसार।
  • पत्नी — पत्नी।
  • सहपुण्यकरा — साथ में पुण्य करने वाली।
  • प्रिय — हे प्रिय।
  • पतिमार्गम् प्रतीक्ष्य — पति के मार्ग अथवा आगमन की प्रतीक्षा करके।
  • पतिदेवम् — पति को देवतुल्य मानकर।
  • यजामि — उपासना करती हूँ।

भावार्थ

सुकला कहती है—हे प्रिय! मैं धर्म के अनुसार आपकी पत्नी हूँ और आपके साथ पुण्यकर्म करने वाली हूँ। मैं आपकी प्रतीक्षा करते हुए पति को देवतुल्य मानकर उनकी सेवा और उपासना करती हूँ।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने वैवाहिक सम्बन्ध को केवल सामाजिक बन्धन नहीं मानती। वह इसे धर्माचरण और संयुक्त पुण्यकर्म से जोड़ती है। उसके लिए पति-पत्नी का सम्बन्ध जीवन की धार्मिक यात्रा का भी हिस्सा है।


श्लोक 10

कदा नैव मया त्याज्यं सामीप्यं ते द्विजोत्तम। तवच्छायां समाश्रित्य करिष्ये धर्ममुत्तमम्॥ १०॥

शब्दार्थ

  • कदा नैव — कभी भी नहीं।
  • मया — मेरे द्वारा।
  • त्याज्यम् — छोड़े जाने योग्य।
  • सामीप्यम् — निकटता।
  • ते — आपकी।
  • द्विजोत्तम — हे श्रेष्ठ पुरुष।
  • तव छायाम् — आपकी छाया अथवा संरक्षण।
  • समाश्रित्य — आश्रय लेकर।
  • करिष्ये — करूँगी।
  • धर्मम् उत्तमम् — उत्तम धर्माचरण।

भावार्थ

हे श्रेष्ठ पुरुष! मैं कभी भी आपका साथ छोड़ना नहीं चाहती। आपके संरक्षण और निकटता में रहकर ही उत्तम धर्माचरण करना चाहती हूँ।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला के कथन में पति का साथ उसके धर्माचरण की आधारभूमि है। वह अलग-अलग धार्मिक कर्म करने की अपेक्षा पति के साथ रहकर धर्म का पालन करना चाहती है।


श्लोक 11

पतिव्रताख्यं पापघ्नं नारीणां गतिदायकम्। पुण्यस्त्री कथ्यते लोके या स्यात्पतिपरायणा॥ ११॥

शब्दार्थ

  • पतिव्रताख्यम् — पतिव्रत कहलाने वाला धर्म।
  • पापघ्नम् — पाप का नाश करने वाला।
  • नारीणाम् — स्त्रियों के लिए।
  • गतिदायकम् — सद्गति देने वाला।
  • पुण्यस्त्री — पुण्यशील स्त्री।
  • कथ्यते — कही जाती है।
  • लोके — संसार में।
  • पतिपरायणा — पति के प्रति निष्ठावान।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पतिव्रत धर्म स्त्रियों के लिए पापों का नाश करने वाला और सद्गति प्रदान करने वाला माना गया है। संसार में उसी स्त्री को पुण्यशील कहा जाता है जो पति के प्रति निष्ठावान हो।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ पतिव्रत को सुकला एक धार्मिक साधना के रूप में प्रस्तुत करती है। उसके कथन में वैवाहिक निष्ठा और आध्यात्मिक फल एक-दूसरे से जुड़े हैं।


श्लोक 12

युवतीनां पृथक्तीर्थं विना भर्तुर्न शोभते। सुखदं नास्ति वै लोके स्वर्गमोक्षप्रदम्॥ १२॥

शब्दार्थ

  • युवतीनाम् — युवतियों के लिए।
  • पृथक् तीर्थम् — अलग तीर्थ।
  • विना भर्तुः — पति के बिना।
  • न शोभते — शोभा नहीं देता।
  • सुखदम् — सुख देने वाला।
  • नास्ति — नहीं है।
  • स्वर्गमोक्षप्रदम् — स्वर्ग और मोक्ष देने वाला।

भावार्थ

सुकला कहती है कि युवती के लिए पति से पृथक् तीर्थ का आचरण शोभनीय नहीं माना गया है। उसके अनुसार पति के साथ सम्बन्ध ही स्त्री के लिए सुख और धार्मिक गति का साधन है।

तात्त्विक व्याख्या

यह कथन सुकला के पतिव्रत धर्म सम्बन्धी दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। वह तीर्थयात्रा को पति से पृथक् होकर किए जाने वाले कर्म के रूप में नहीं देखती। उसके लिए पति के साथ रहना स्वयं धर्माचरण की प्रमुख शर्त है।


श्लोक 13

सव्यं पादं च भर्तुश्च प्रयागं विद्धि सत्तम। वामं च पुष्करं तस्य या नारी परिकल्पयेत्॥ १३॥

शब्दार्थ

  • सव्यम् पादम् — बायाँ अथवा पाठानुसार एक पक्ष का चरण; यहाँ चरणों के प्रतीकात्मक विभाजन का वर्णन है।
  • भर्तुः — पति का।
  • प्रयागम् — प्रयाग तीर्थ।
  • विद्धि — जानो।
  • सत्तम — हे श्रेष्ठ पुरुष।
  • वामम् — दूसरा पक्ष।
  • पुष्करम् — पुष्कर तीर्थ।
  • तस्य — उसका।
  • नारी — स्त्री।
  • परिकल्पयेत् — ऐसा माने अथवा कल्पना करे।

भावार्थ

सुकला कहती है कि स्त्री अपने पति के एक चरण को प्रयाग और दूसरे को पुष्कर तीर्थ के समान माने।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ पति के चरणों को तीर्थों के समान मानने की प्रतीकात्मक भाषा है। सुकला का उद्देश्य यह बताना है कि जिस धार्मिक पुण्य के लिए स्त्री दूर-दूर के तीर्थों में जाती है, उसे वह पति की सेवा और निकटता में भी देख सकती है।


श्लोक 14

तस्य पादोदकस्नानात्तत्पुण्यं परि जायते। प्रयागपुष्करसमं स्नानं स्त्रीणां न संशयः॥ १४॥

शब्दार्थ

  • तस्य — उसके।
  • पादोदक — चरणों को धोने से प्राप्त जल।
  • स्नानात् — स्नान करने से।
  • तत्पुण्यम् — वह पुण्य।
  • परि जायते — प्राप्त होता है।
  • प्रयाग-पुष्कर-समम् — प्रयाग और पुष्कर के समान।
  • स्नानम् — स्नान।
  • स्त्रीणाम् — स्त्रियों के लिए।
  • न संशयः — इसमें सन्देह नहीं, ऐसा कथन है।

भावार्थ

सुकला के अनुसार पति के चरणों के जल से स्नान करने पर स्त्री को प्रयाग और पुष्कर में स्नान करने के समान पुण्य प्राप्त होता है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक पति को तीर्थ के रूप में स्थापित करने वाले कथन को आगे बढ़ाता है। यहाँ तीर्थ का धार्मिक फल पति के प्रति सेवा और निष्ठा से जोड़ा गया है।


श्लोक 15

सर्वतीर्थमयो भर्ता सर्वपुण्यमयः पतिः। मखानां यजनात्पुण्यं यद्वै भवति दीक्षिते॥ १५॥

शब्दार्थ

  • सर्वतीर्थमयः — सभी तीर्थों के समान अथवा सभी तीर्थों का सार।
  • भर्ता — पति।
  • सर्वपुण्यमयः — समस्त पुण्यों से युक्त।
  • पतिः — पति।
  • मखानाम् — यज्ञों का।
  • यजनात् — अनुष्ठान करने से।
  • पुण्यम् — पुण्य।
  • यत् — जो।
  • दीक्षिते — दीक्षित व्यक्ति को।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति सभी तीर्थों और पुण्यों का सार है। यज्ञों के अनुष्ठान से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह भी पति की सेवा और निष्ठा से प्राप्त हो सकता है।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला धार्मिक कर्मों के फल को वैवाहिक सम्बन्ध के भीतर स्थापित करती है। उसके कथन में पति की सेवा को अनेक बाहरी धार्मिक अनुष्ठानों के समतुल्य महत्त्व दिया गया है।


श्लोक 16

तत्फलं समवाप्नोति सेवया भर्तुरेव हि। गयादीनां सुतीर्थानां यात्रां कृत्वा हि यद्भवेत्॥ १६॥

शब्दार्थ

  • तत्फलम् — वही फल।
  • समवाप्नोति — प्राप्त करता है।
  • सेवया — सेवा से।
  • भर्तुः — पति की।
  • एव हि — ही।
  • गयादीनाम् — गया आदि तीर्थों के।
  • सुतीर्थानाम् — उत्तम तीर्थों के।
  • यात्राम् कृत्वा — यात्रा करके।
  • यत् भवेत् — जो फल प्राप्त होता है।

भावार्थ

सुकला के अनुसार गया आदि उत्तम तीर्थों की यात्रा से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पति की सेवा से भी प्राप्त हो सकता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ तीर्थयात्रा और पति-सेवा के फल की तुलना की गई है। सुकला के लिए धार्मिक यात्रा का मूल्य उसके पुण्यफल में है, और वह उसी फल को पति की सेवा में भी सम्भव मानती है।


श्लोक 17

समासेन प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः शृणु॥ १७॥

शब्दार्थ

  • समासेन — संक्षेप में।
  • प्रवक्ष्यामि — कहूँगी।
  • तत् — वह बात।
  • मे — मेरी।
  • निगदतः — कहते हुए।
  • शृणु — सुनिए।

भावार्थ

सुकला कहती है—अब मैं इस विषय को संक्षेप में कहती हूँ; मेरी बात सुनिए।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक आगे आने वाले निष्कर्ष की भूमिका है। सुकला अब तक दिए गए उदाहरणों को एक सामान्य सिद्धान्त में समेटने जा रही है।


श्लोक 18

नास्त्यासां हि पृथग्धर्मः पतिशुश्रूषणं विना। तस्मात्कांतसहायं ते कुर्वाणा सुखदायिनी॥ १८॥

शब्दार्थ

  • नास्ति — नहीं है।
  • आसाम् — इनके लिए।
  • पृथक् धर्मः — अलग धर्म।
  • पतिशुश्रूषणम् — पति की सेवा।
  • विना — बिना।
  • तस्मात् — इसलिए।
  • कान्तसहायम् — पति का साथ।
  • कुर्वाणा — करते हुए।
  • सुखदायिनी — सुख देने वाली।

भावार्थ

सुकला कहती है कि स्त्रियों के लिए पति की सेवा से पृथक् कोई धर्म नहीं है। इसलिए पति का साथ देते हुए स्त्री सुख प्रदान करने वाली बनती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह सुकला के कथन का स्पष्ट निष्कर्ष है। वह अपने धर्म को पति के साथ और उसकी सेवा में केन्द्रित करती है। इस विचार के आधार पर वह कृकल से तीर्थयात्रा में अपने साथ ले चलने का आग्रह करेगी।


भाग 3 : कृकल का विचार और पत्नी को साथ न ले जाने का निर्णय

श्लोक 19–32

श्लोक 19

विष्णुरुवाच—

रूपं शीलं गुणं भक्तिं समालोक्य वयस्तथा। सौकुमार्यं विचार्यैवं कृकलः स पुनःपुनः॥ १९॥

शब्दार्थ

  • रूपम् — रूप।
  • शीलम् — स्वभाव और आचरण।
  • गुणम् — गुण।
  • भक्तिम् — श्रद्धा और भक्ति।
  • समालोक्य — भलीभाँति देखकर।
  • वयः — आयु।
  • सौकुमार्यम् — कोमलता।
  • विचार्य — विचार करके।
  • कृकलः — कृकल।
  • पुनःपुनः — बार-बार।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—कृकल ने अपनी पत्नी के रूप, शील, गुण, भक्ति, आयु और शारीरिक कोमलता पर बार-बार विचार किया।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल का निर्णय पत्नी के प्रति प्रेम अथवा अनादर के साधारण प्रश्न से नहीं जुड़ा है। वह यात्रा की कठिनाइयों और अपनी पत्नी की स्थिति को ध्यान में रखकर विचार कर रहा है।


श्लोक 20

यद्येवं हि नयिष्यामि दुर्गमार्गं सुदुःखदम्॥ २०॥

शब्दार्थ

  • यदि — यदि।
  • एवम् — इस प्रकार।
  • नयिष्यामि — ले जाऊँगा।
  • दुर्गमार्गम् — कठिन मार्ग।
  • सुदुःखदम् — अत्यन्त कष्टदायक।

भावार्थ

कृकल सोचता है—यदि मैं इसे अपने साथ ले जाऊँगा, तो इसे अत्यन्त कठिन और कष्टदायक मार्ग से गुजरना पड़ेगा।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ कृकल का विचार पत्नी की शारीरिक सुविधा और यात्रा की कठिनाइयों पर केन्द्रित है। वह तीर्थयात्रा को पुण्यदायक मानता है, लेकिन उसके मार्ग की कठिनाइयों को भी वास्तविक समझता है।


श्लोक 21

रूपनाशो भवेच्चास्याः शीतातपविलोडनात्। पद्मगर्भप्रतीकाशमस्याश्चांगं प्रवर्णकम्॥ २१॥

शब्दार्थ

  • रूपनाशः — रूप को क्षति।
  • भवेत् — हो सकती है।
  • अस्याः — इसकी।
  • शीतातप — ठंड और धूप।
  • विलोडनात् — प्रभाव से, झेलने के कारण।
  • पद्मगर्भप्रतीकाशम् — कमल के भीतरी भाग के समान।
  • अङ्गम् — शरीर।
  • प्रवर्णकम् — सुन्दर वर्ण वाला।

भावार्थ

कृकल सोचता है कि ठंड और धूप की कठिनाइयों से उसकी पत्नी के सुन्दर रूप को क्षति पहुँच सकती है। उसका शरीर कमल के भीतरी भाग के समान कोमल और सुन्दर है।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल अपनी पत्नी की कोमलता और यात्रा की कठोर परिस्थितियों के बीच अन्तर देखता है। उसके लिए पत्नी को कठिनाई से बचाना भी विचारणीय है।


श्लोक 22

झंझावातेन शीतेन कृष्णवर्णं भविष्यति। पंथाः कर्कश सुग्रावा पादौचास्याः सुकोमलौ॥ २२॥

शब्दार्थ

  • झंझावातेन — तेज आँधी से।
  • शीतेन — ठंड से।
  • कृष्णवर्णम् — काला अथवा मलिन वर्ण।
  • भविष्यति — हो जाएगा।
  • पन्थाः — मार्ग।
  • कर्कशः — कठोर।
  • सुग्रावा — पाठानुसार कठिन अथवा ऊबड़-खाबड़ मार्ग।
  • पादौ — पैर।
  • अस्याः — इसके।
  • सुकोमलौ — अत्यन्त कोमल।

भावार्थ

कृकल सोचता है कि तेज हवा और ठंड से उसकी पत्नी का वर्ण मलिन पड़ सकता है। यात्रा का मार्ग कठोर है, जबकि उसके पैर अत्यन्त कोमल हैं।

तात्त्विक व्याख्या

कथा में मार्ग की कठिनाइयों को शारीरिक कष्ट के रूप में प्रस्तुत किया गया है। कृकल की चिन्ता यह है कि तीर्थयात्रा का धार्मिक उद्देश्य पत्नी के लिए असहनीय शारीरिक पीड़ा का कारण न बन जाए।


श्लोक 23

एष्यते वेदनां तीव्रामथो गंतुं न च क्षमा। क्षुत्तृष्णाभिपरीतांगी कीदृशीयं भविष्यति॥ २३॥

शब्दार्थ

  • एष्यते — प्राप्त करेगी।
  • वेदनाम् — पीड़ा।
  • तीव्राम् — तीव्र।
  • अथ — और।
  • गन्तुम् — चलने में।
  • न क्षमा — समर्थ नहीं।
  • क्षुत् — भूख।
  • तृष्णा — प्यास।
  • अभिपरीतांगी — जिससे शरीर घिर जाए।
  • कीदृशी — कैसी।
  • भविष्यति — हो जाएगी।

भावार्थ

कृकल सोचता है कि उसकी पत्नी को तीव्र पीड़ा होगी और वह आगे चलने में असमर्थ हो सकती है। भूख और प्यास से उसका शरीर व्याकुल हो जाएगा; तब उसकी स्थिति कैसी होगी?

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ कृकल यात्रा के व्यावहारिक पक्षों—भूख, प्यास, थकान और शारीरिक पीड़ा—को ध्यान में रखता है। उसके विचार में तीर्थयात्रा का उद्देश्य महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उसे पूरा करने के लिए व्यक्ति की क्षमता का भी ध्यान रखना चाहिए।


श्लोक 24

वामांगी मम च स्थानं सुखस्थानं वरानना। मम प्राणप्रिया नित्यं नित्यं धर्मस्य चाश्रयः॥ २४॥

शब्दार्थ

  • वामांगी — बाईं ओर रहने वाली पत्नी; पत्नी के लिए सम्बोधन।
  • मम — मेरी।
  • स्थानम् — स्थान।
  • सुखस्थानम् — सुख का स्थान।
  • वरानना — सुन्दर मुख वाली।
  • मम प्राणप्रिया — मेरे प्राणों के समान प्रिय।
  • नित्यम् — सदैव।
  • धर्मस्य आश्रयः — धर्म का आधार।

भावार्थ

कृकल अपनी पत्नी को अपने सुख का स्थान, प्राणों के समान प्रिय और धर्म का आधार मानता है। वह उसके प्रति अपने स्नेह को स्मरण करता है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक से स्पष्ट होता है कि कृकल अपनी पत्नी को तुच्छ नहीं समझता। वह उसे अपने जीवन और धर्म का महत्त्वपूर्ण आधार मानता है। उसकी दुविधा पत्नी से सम्बन्ध तोड़ने की नहीं, बल्कि उसे कठिन यात्रा में साथ ले जाने की है।


श्लोक 25

नाशमेति यदा बाला मम नाशो भवेदिह। इयं मे जीविका नित्यमियं प्राणस्य चेश्वरी॥ २५॥

शब्दार्थ

  • नाशम् एति — नष्ट हो जाती है।
  • यदा — यदि।
  • बाला — युवती, पत्नी।
  • मम नाशः — मेरा नाश।
  • भवेत् — हो जाएगा।
  • इयम् — यह।
  • मे — मेरी।
  • जीविका — जीवन का आधार।
  • नित्यम् — सदैव।
  • प्राणस्य ईश्वरी — प्राणों के समान प्रिय, जीवन पर अधिकार रखने वाली।

भावार्थ

कृकल सोचता है कि यदि उसकी पत्नी को कुछ हो गया, तो उसका अपना जीवन भी संकट में पड़ जाएगा। वह उसके जीवन का आधार और प्राणों के समान प्रिय है।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल पत्नी की सुरक्षा को अपने जीवन से जोड़कर देखता है। यह सम्बन्ध उसके लिए केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि गहरा भावनात्मक और जीवनगत सम्बन्ध है।


श्लोक 26

न नयिष्ये वनं तीर्थमेकश्चैवाप्यहं व्रजे। चिंतयित्वा क्षणं नूनं कृकलेन महात्मना॥ २६॥

शब्दार्थ

  • न नयिष्ये — नहीं ले जाऊँगा।
  • वनम् — वन अथवा कठिन मार्ग।
  • तीर्थम् — तीर्थयात्रा।
  • एकः — अकेला।
  • एव — ही।
  • अहम् — मैं।
  • व्रजे — जाऊँ।
  • चिन्तयित्वा — विचार करके।
  • क्षणम् — कुछ समय।
  • कृकलेन — कृकल द्वारा।
  • महात्मना — उदार अथवा श्रेष्ठ विचार वाले व्यक्ति द्वारा।

भावार्थ

कृकल विचार करता है कि वह अपनी पत्नी को कठिन तीर्थयात्रा में साथ नहीं ले जाएगा, बल्कि स्वयं अकेला ही जाएगा।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल का निर्णय पत्नी को कष्ट से बचाने की भावना से उत्पन्न होता है। लेकिन कथा में यही निर्णय आगे विवाद का कारण बनता है, क्योंकि सुकला पति से अलग रहकर धर्माचरण करने को उचित नहीं मानती।


श्लोक 27

तस्य चित्तानुगो भावस्तया ज्ञातो नृपोत्तम। पुनरूचे महाभागा भर्त्तारं प्रस्थितं तदा॥ २७॥

शब्दार्थ

  • तस्य — उसके।
  • चित्तानुगः भावः — मन में चल रहा विचार।
  • तया ज्ञातः — उसके द्वारा जान लिया गया।
  • नृपोत्तम — हे श्रेष्ठ राजा।
  • पुनः उवाच — फिर कहा।
  • महाभागा — सौभाग्यशालिनी।
  • भर्तारम् — पति से।
  • प्रस्थितम् — प्रस्थान करते हुए।
  • तदा — तब।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—हे श्रेष्ठ राजा! सुकला ने कृकल के मन का विचार जान लिया और प्रस्थान करते हुए पति से फिर कहा।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने पति की बाहरी बातों के पीछे छिपे विचार को समझ लेती है। उसके लिए प्रश्न केवल यात्रा में साथ जाने का नहीं, बल्कि पति से पृथक् रहकर धर्माचरण करने की मान्यता का है।


श्लोक 28

अनघा नैव वै त्याज्या पुरुषैः शृणु सत्तम। मूलमेवं हि धर्मस्य पुरुषस्य महामते॥ २८॥

शब्दार्थ

  • अनघा — निष्पाप, निर्दोष।
  • नैव त्याज्या — नहीं छोड़ी जानी चाहिए।
  • पुरुषैः — पुरुषों द्वारा।
  • शृणु — सुनिए।
  • सत्तम — श्रेष्ठ पुरुष।
  • मूलम् — आधार।
  • एवम् — इस प्रकार।
  • धर्मस्य — धर्म का।
  • पुरुषस्य — पुरुष के लिए।
  • महामते — हे बुद्धिमान।

भावार्थ

सुकला कहती है—हे श्रेष्ठ पुरुष! निर्दोष पत्नी को पुरुष द्वारा नहीं छोड़ा जाना चाहिए। हे बुद्धिमान! पत्नी का साथ धर्म का आधार है।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने कथन को धर्म के मूल सिद्धान्त के रूप में प्रस्तुत करती है। उसके अनुसार पत्नी का साथ छोड़ना केवल वैवाहिक दूरी नहीं, बल्कि धर्म के आधार से अलग होना है।


श्लोक 29

विष्णुरुवाच—

श्रुत्वा सर्वं हि तेनापि प्रियाया भाषितं बहु। प्रहस्यैव वचो ब्रूते तामेवं कृकलः पुनः॥ २९॥

शब्दार्थ

  • श्रुत्वा — सुनकर।
  • सर्वम् — सब कुछ।
  • तेन अपि — उसने भी।
  • प्रियायाः — प्रिय पत्नी के।
  • भाषितम् — कहा हुआ।
  • बहु — बहुत कुछ।
  • प्रहस्य — मुस्कराकर।
  • वचः — वचन।
  • ब्रूते — कहा।
  • ताम् — उससे।
  • पुनः — फिर।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—सुकला की सारी बातें सुनकर कृकल मुस्कराया और फिर अपनी प्रिय पत्नी से बोला।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल पत्नी की बात सुनकर क्रोधित नहीं होता। उसका उत्तर आगे स्पष्ट करेगा कि वह पत्नी के साथ और उसके धर्माचरण के महत्त्व को स्वीकार करता है।


श्लोक 30

नैव त्याज्या भवेद्भार्या प्राप्ता धर्मेण वै प्रिये। येन भार्या परित्यक्ता सुनीता धर्मचारिणी॥ ३०॥

शब्दार्थ

  • नैव त्याज्या — नहीं छोड़ी जानी चाहिए।
  • भवेत् — होनी चाहिए।
  • भार्या — पत्नी।
  • प्राप्ता धर्मेण — धर्मपूर्वक प्राप्त हुई।
  • प्रिये — हे प्रिय।
  • येन — जिसके द्वारा।
  • परित्यक्ता — छोड़ दी गई।
  • सुनीता — सदाचारिणी अथवा उत्तम आचरण वाली।
  • धर्मचारिणी — धर्म का पालन करने वाली।

भावार्थ

कृकल कहता है—हे प्रिय! धर्मपूर्वक प्राप्त पत्नी को नहीं छोड़ना चाहिए। जो पुरुष सदाचारिणी और धर्मपरायण पत्नी को छोड़ देता है, वह उचित आचरण नहीं करता।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ कृकल सुकला के मूल कथन से सहमत होता है कि धर्मपरायण पत्नी का परित्याग नहीं करना चाहिए। इससे कथा में पति-पत्नी के सम्बन्ध की धार्मिक मान्यता स्पष्ट होती है।


श्लोक 31

दशांगधर्मस्तेनापि परित्यक्तो वरानने। तस्मात्त्वामेव भद्रं ते नैव त्यक्ष्ये कदा प्रिये॥ ३१॥

शब्दार्थ

  • दशांगधर्मः — धर्म के दस अंगों वाला धर्म; यहाँ धर्म के पूर्ण आचरण का संकेत।
  • तेन अपि — उसके द्वारा भी।
  • परित्यक्तः — त्याग दिया गया।
  • वरानने — हे सुन्दर मुख वाली।
  • तस्मात् — इसलिए।
  • त्वाम् एव — तुम्हें ही।
  • भद्रम् ते — तुम्हारा कल्याण हो।
  • नैव त्यक्ष्ये — नहीं छोड़ूँगा।
  • कदा — कभी।
  • प्रिये — हे प्रिय।

भावार्थ

कृकल कहता है—हे सुन्दर मुख वाली! जो धर्मपरायण पत्नी को छोड़ देता है, वह धर्म के अंगों का भी त्याग करता है। इसलिए मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा।

तात्त्विक व्याख्या

कृकल अब स्पष्ट करता है कि वह सुकला को परित्यक्त नहीं करेगा। पति-पत्नी का सम्बन्ध उसके लिए धर्म से पृथक् नहीं है। कथा में यह कथन उनके सम्बन्ध की पुष्टि करता है।


श्लोक 32

विष्णुरुवाच—

एवमाभाष्य तां भार्यां संबोध्य च पुनःपुनः॥ ३२॥

शब्दार्थ

  • एवम् — इस प्रकार।
  • आभाष्य — कहकर।
  • ताम् — उस।
  • भार्याम् — पत्नी को।
  • सम्बोध्य — समझाकर।
  • पुनःपुनः — बार-बार।

भावार्थ

भगवान विष्णु कहते हैं—इस प्रकार पत्नी से बात करके और उसे बार-बार समझाकर कृकल ने अपनी बात समाप्त की।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक संवाद के प्रथम चरण को समाप्त करता है। कृकल ने पत्नी को न छोड़ने की बात कही, लेकिन कथा में आगे एक नई स्थिति उत्पन्न होती है।


भाग 4 : कृकल का प्रस्थान और सुकला का वियोग

श्लोक 33–48

श्लोक 33

तस्या अज्ञातमात्रेण ससार्थेन समं गतः। गते तस्मिन्महाभागे कृकले पुण्यकर्मणि॥ ३३॥

शब्दार्थ

  • तस्याः — उसके।
  • अज्ञातमात्रेण — उसके अनजान रहते।
  • ससार्थेन — यात्रियों के समूह के साथ।
  • समम् — साथ।
  • गतः — चला गया।
  • गते तस्मिन् — उसके चले जाने पर।
  • महाभागे — सौभाग्यशाली।
  • कृकले — कृकल के।
  • पुण्यकर्मणि — पुण्यकर्म करने वाले।

भावार्थ

कृकल पुण्यकर्म के उद्देश्य से यात्रियों के समूह के साथ चला गया, जबकि सुकला को उसके प्रस्थान का पता नहीं चला।

तात्त्विक व्याख्या

कथा का निर्णायक मोड़ यही है। कृकल ने पत्नी को न छोड़ने का आश्वासन दिया था, लेकिन वह उसके अनजान रहते यात्रा पर निकल गया। इससे सुकला की धारणा और वास्तविक परिस्थिति के बीच अन्तर उत्पन्न हो गया।


श्लोक 34

देवकर्मसुवेलायां काले पुण्ये शुभानना। नैव पश्यति भर्तारं कृकलं निजमंदिरे॥ ३४॥

शब्दार्थ

  • देवकर्म — देवताओं से सम्बन्धित धार्मिक कर्म।
  • सुवेलायाम् — शुभ समय पर।
  • काले पुण्ये — पुण्य समय में।
  • शुभानना — सुन्दर मुख वाली सुकला।
  • नैव पश्यति — नहीं देखती।
  • भर्तारम् — पति को।
  • निजमन्दिरे — अपने घर में।

भावार्थ

शुभ समय में जब सुकला देवकर्म करने के लिए उठी, तो उसने अपने घर में पति कृकल को नहीं पाया।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने नियमित धार्मिक जीवन के समय पति को अनुपस्थित पाती है। उसके लिए यह केवल घर में पति का न होना नहीं, बल्कि उसके साथ धर्माचरण की अपेक्षा का टूटना है।


श्लोक 35

समुत्थाय त्वरायुक्ता रुदमाना सुदुःखिता। वयस्यान्पृच्छते भर्तुर्दुःखशोकाधिपीडिता॥ ३५॥

शब्दार्थ

  • समुत्थाय — उठकर।
  • त्वरायुक्ता — शीघ्रता से।
  • रुदमाना — रोती हुई।
  • सुदुःखिता — अत्यन्त दुखी।
  • वयस्यान् — सखियों अथवा परिचितों से।
  • पृच्छते — पूछती है।
  • भर्तुः — पति के विषय में।
  • दुःखशोकाधिपीडिता — दुःख और शोक से पीड़ित।

भावार्थ

सुकला अत्यन्त दुखी होकर उठी और रोती हुई अपने परिचितों से पति के विषय में पूछने लगी। वह दुःख और शोक से व्याकुल थी।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला की मानसिक स्थिति उसके पति के प्रति गहरे लगाव और उसके अचानक अनुपस्थित हो जाने से उत्पन्न हुई है। कथा उसके वियोग को धार्मिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर प्रस्तुत करती है।


श्लोक 36

युष्माभिर्वा महाभागा दृष्टोऽसौ कृकलो मम। प्राणेश्वरो गतः क्वापि भवंतो मम बांधवाः॥ ३६॥

शब्दार्थ

  • युष्माभिः — आप लोगों द्वारा।
  • दृष्टः — देखा गया।
  • असौ — वह।
  • कृकलः — कृकल।
  • मम — मेरा।
  • प्राणेश्वरः — प्राणों के समान प्रिय पति।
  • गतः — चला गया।
  • क्वापि — कहीं।
  • भवन्तः — आप लोग।
  • मम बान्धवाः — मेरे सम्बन्धी।

भावार्थ

सुकला पूछती है—हे प्रियजनों! क्या आप लोगों ने मेरे पति कृकल को देखा है? वे मेरे प्राणों के समान प्रिय हैं। वे कहाँ चले गए? आप सब मेरे सम्बन्धी हैं, इसलिए मुझे बताइए।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने पति को अपने जीवन का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण आधार मानती है। वह परिचितों से सहायता और सूचना की अपेक्षा करती है।


श्लोक 37

यदि दृष्टो महाभागाः कृकलो मम सांप्रतम्। भर्तारं पुण्यकर्तारं सर्वज्ञं सत्यपंडितम्॥ ३७॥

शब्दार्थ

  • यदि — यदि।
  • दृष्टः — देखा हो।
  • महाभागाः — हे सौभाग्यशाली जनो।
  • कृकलः — कृकल।
  • मम — मेरा।
  • साम्प्रतम् — अभी।
  • भर्तारम् — पति।
  • पुण्यकर्तारम् — पुण्यकर्म करने वाला।
  • सर्वज्ञम् — सर्वज्ञ, सब कुछ जानने वाला।
  • सत्यपण्डितम् — सत्य का ज्ञाता।

भावार्थ

सुकला कहती है—यदि आप लोगों ने मेरे पति कृकल को देखा हो, तो बताइए। वे पुण्यकर्म करने वाले, ज्ञानवान और सत्य के ज्ञाता हैं।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने पति के गुणों को याद करती है। वह उसे केवल प्रिय व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि धर्म और पुण्य का पालन करने वाले व्यक्ति के रूप में भी देखती है।


श्लोक 38

कथयंतु महात्मानं यदि दृष्टो महामतिः। तस्यास्तद्भाषितं श्रुत्वा तामूचुस्ते महामतिम्॥ ३८॥

शब्दार्थ

  • कथयन्तु — बताइए।
  • महात्मानम् — महान व्यक्ति को।
  • यदि दृष्टः — यदि देखा हो।
  • महामतिः — बुद्धिमान।
  • तस्याः भाषितम् — उसके वचन।
  • श्रुत्वा — सुनकर।
  • ताम् ऊचुः — उससे कहा।
  • ते — उन्होंने।

भावार्थ

सुकला ने अपने पति के विषय में पूछते हुए कहा कि यदि किसी ने उस महान और बुद्धिमान व्यक्ति को देखा हो तो बताए। उसकी बात सुनकर उन लोगों ने उसे उत्तर दिया।

तात्त्विक व्याख्या

कथा में अब सुकला के परिचितों का उत्तर आता है। वे उसे समझाते हैं कि उसका पति किसी अनुचित उद्देश्य से नहीं, बल्कि धर्मयात्रा के लिए गया है।


श्लोक 39

धर्मयात्राप्रसंगेन नाथस्ते कृकलः शुभे। तीर्थयात्रां चकारासौ कस्माच्छोचसि सुव्रते॥ ३९॥

शब्दार्थ

  • धर्मयात्राप्रसंगेन — धर्मयात्रा के उद्देश्य से।
  • नाथः — पति, स्वामी।
  • ते — तुम्हारा।
  • कृकलः — कृकल।
  • शुभे — हे शुभे।
  • तीर्थयात्राम् — तीर्थयात्रा।
  • चकार — की।
  • कस्मात् — क्यों।
  • शोचसि — शोक करती हो।
  • सुव्रते — हे उत्तम व्रत वाली।

भावार्थ

वे सुकला से कहते हैं—हे शुभे! तुम्हारे पति कृकल धर्मयात्रा के उद्देश्य से तीर्थयात्रा पर गए हैं। हे सुव्रते! तुम उनके जाने पर इतना शोक क्यों करती हो?

तात्त्विक व्याख्या

परिचित लोग कृकल के प्रस्थान को सामान्य धार्मिक कर्तव्य के रूप में देखते हैं। उनके लिए तीर्थयात्रा पुण्यकर्म है, इसलिए वे सुकला को शोक छोड़ने की सलाह देते हैं।


श्लोक 40

साधयित्वा महातीर्थं पुनरेष्यति शोभने। एवमाश्वासिता सा च पुरुषैराप्तकारिभिः॥ ४०॥

शब्दार्थ

  • साधयित्वा — पूरा करके।
  • महातीर्थम् — महान तीर्थ।
  • पुनः एष्यति — फिर लौट आएगा।
  • शोभने — हे सुन्दरी।
  • एवम् — इस प्रकार।
  • आश्वासिता — आश्वस्त की गई।
  • सा — वह।
  • पुरुषैः — लोगों द्वारा।
  • आप्तकारिभिः — विश्वसनीय व्यक्तियों द्वारा।

भावार्थ

वे उसे आश्वस्त करते हैं कि उसका पति महान तीर्थों की यात्रा पूरी करके लौट आएगा। विश्वसनीय लोगों के समझाने पर सुकला को ढाढ़स बँधाया जाता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला के दुःख को कम करने का प्रयास किया जाता है। उसके परिचित यात्रा को अस्थायी वियोग मानते हैं, जबकि सुकला के लिए पति का साथ उसके धार्मिक जीवन का मूल आधार है।


श्लोक 41

पुनर्गेहं गता राजन्सुकला चारुभाषिणी। रुरोद करुणं दुःखं सुकलापि परायणा॥ ४१॥

शब्दार्थ

  • पुनः — फिर।
  • गृहम् — घर।
  • गता — गई।
  • राजन् — हे राजा।
  • सुकला — सुकला।
  • चारुभाषिणी — मधुर बोलने वाली।
  • रुरोद — रोई।
  • करुणम् — करुणापूर्वक।
  • दुःखम् — दुःख में।
  • परायणा — निष्ठावान।

भावार्थ

हे राजा! मधुरभाषिणी सुकला घर लौट आई, लेकिन पति के वियोग में करुणापूर्वक रोती रही।

तात्त्विक व्याख्या

दूसरों के आश्वासन से सुकला का दुःख समाप्त नहीं होता। उसके लिए पति की अनुपस्थिति उसके जीवन की स्थापित धार्मिक और भावनात्मक व्यवस्था में परिवर्तन है।


श्लोक 42

यावदायाति मे भर्त्ता भूमौ स्वप्स्यामि संस्तरे। घृतं तैलं न भोक्ष्येऽहं दधिक्षीरं तथैव च॥ ४२॥

शब्दार्थ

  • यावत् — जब तक।
  • आयाति — लौटते हैं।
  • मे भर्त्ता — मेरे पति।
  • भूमौ — भूमि पर।
  • स्वप्स्यामि — सोऊँगी।
  • संस्तरे — बिछौने पर अथवा बिछावन पर।
  • घृतम् — घी।
  • तैलम् — तेल।
  • न भोक्ष्ये — सेवन नहीं करूँगी।
  • दधि — दही।
  • क्षीरम् — दूध।
  • तथैव — उसी प्रकार।

भावार्थ

सुकला संकल्प करती है कि जब तक उसके पति लौट नहीं आते, वह भूमि पर सोएगी और घी, तेल, दही तथा दूध का सेवन नहीं करेगी।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने पति के वियोग को तपस्या और संयम के रूप में व्यक्त करती है। भोजन और शयन की सुविधाओं का त्याग उसके लिए पति के प्रति निष्ठा का प्रतीक बनता है।


श्लोक 43

लवणं च परित्यक्तं तथा तांबूलमेव च। मधुरं च तथा राजंस्त्यक्तं गुडादिकं तथा॥ ४३॥

शब्दार्थ

  • लवणम् — नमक।
  • परित्यक्तम् — त्याग दिया।
  • ताम्बूलम् — पान।
  • मधुरम् — मीठा पदार्थ।
  • गुडादिकम् — गुड़ आदि।
  • त्यक्तम् — छोड़ दिया।
  • राजन् — हे राजा।

भावार्थ

सुकला नमक, पान, मिठाई और गुड़ आदि पदार्थों का भी त्याग कर देती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक उसके संयम-व्रत का विस्तार करता है। सुकला अपने दैनिक सुख-साधनों को सीमित करके पति के प्रति निष्ठा और वियोग की गंभीरता व्यक्त करती है।


श्लोक 44

एकाहारा निराहारा तावत्स्थास्ये न संशयः। यावच्चागमनं भर्तुः पुनरेव भविष्यति॥ ४४॥

शब्दार्थ

  • एकाहारा — दिन में एक बार भोजन करने वाली।
  • निराहारा — उपवास करने वाली।
  • तावत् — तब तक।
  • स्थास्ये — रहूँगी।
  • न संशयः — निःसन्देह।
  • यावत् — जब तक।
  • आगमनम् — आगमन।
  • भर्तुः — पति का।
  • पुनः — फिर।

भावार्थ

सुकला कहती है कि जब तक उसके पति वापस नहीं आते, वह कभी एक बार भोजन करके और कभी उपवास करके रहेगी।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ वियोग को तप और आहार-संयम के माध्यम से व्यक्त किया गया है। सुकला की दृष्टि में उसका व्रत पति के लौटने तक जारी रहेगा।


श्लोक 45

एवं दुःखान्विता भूत्वा एकवेणीधरा पुनः। एककंचुकसंवीता मलिना च बभूव सा॥ ४५॥

शब्दार्थ

  • एवम् — इस प्रकार।
  • दुःखान्विता — दुःख से युक्त।
  • एकवेणीधरा — एक चोटी धारण करने वाली।
  • एककञ्चुकसंवीता — एक ही कंचुकी अथवा वस्त्र पहने हुए।
  • मलिना — मलिन।
  • बभूव — हो गई।
  • सा — वह।

भावार्थ

इस प्रकार दुःख से व्याकुल होकर सुकला ने एक ही वेणी रखी, एक वस्त्र धारण किया और अपने रूप-सज्जा का त्याग कर दिया।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला का बाहरी रूप उसके आन्तरिक वियोग का प्रतीक बन जाता है। वह श्रृंगार और सामान्य सुख-साधनों को छोड़कर अपने दुःख को व्रत के रूप में जीती है।


श्लोक 46

मलिनेनापि वस्त्रेण एकेनैव स्थिता पुनः। हाहाकारं प्रमुंचंती निःश्वसंती सुदुःखिता॥ ४६॥

शब्दार्थ

  • मलिनेन वस्त्रेण — मैले वस्त्र से।
  • एकेन एव — केवल एक।
  • स्थिता — रही।
  • हाहाकारम् — विलाप।
  • प्रमुञ्चन्ती — करती हुई।
  • निःश्वसन्ती — आहें भरती हुई।
  • सुदुःखिता — अत्यन्त दुखी।

भावार्थ

सुकला एक ही मलिन वस्त्र में रहने लगी। वह अत्यन्त दुखी होकर विलाप करती और आहें भरती रहती थी।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक उसके वियोग की तीव्रता को और स्पष्ट करता है। उसका शोक केवल मन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके दैनिक आचरण और बाहरी अवस्था में भी प्रकट होता है।


श्लोक 47

वियोगानलसंदग्धा कृष्णांगी मलधारिणी। एवं दुःखसमाचारा सुकृशा विह्वला तदा॥ ४७॥

शब्दार्थ

  • वियोगानल — वियोग की अग्नि।
  • संदग्धा — जली हुई, संतप्त।
  • कृष्णांगी — मलिन अथवा श्याम शरीर वाली।
  • मलधारिणी — मलिन वस्त्र धारण करने वाली।
  • दुःखसमाचारा — दुःखपूर्ण आचरण वाली।
  • सुकृशा — अत्यन्त दुर्बल।
  • विह्वला — व्याकुल।
  • तदा — उस समय।

भावार्थ

पति के वियोग की अग्नि से संतप्त सुकला मलिन वस्त्र धारण करने लगी। वह अत्यन्त दुर्बल और व्याकुल हो गई।

तात्त्विक व्याख्या

कथा यहाँ वियोग के शारीरिक और मानसिक प्रभावों को एक साथ प्रस्तुत करती है। सुकला का जीवन पति की प्रतीक्षा और दुःख के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो जाता है।


श्लोक 48

रोदमाना दिवारात्रौ निद्रा लेभे न वै निशि। क्षुधां न विंदते राजन्दुःखेन विदलीकृता॥ ४८॥

शब्दार्थ

  • रोदमाना — रोती हुई।
  • दिवा-रात्रौ — दिन-रात।
  • निद्रा — नींद।
  • लेभे न — प्राप्त नहीं हुई।
  • निशि — रात में।
  • क्षुधाम् — भूख।
  • न विन्दते — अनुभव नहीं करती।
  • राजन् — हे राजा।
  • दुःखेन — दुःख से।
  • विदलीकृता — भीतर से टूट चुकी।

भावार्थ

सुकला दिन-रात रोती रहती थी। उसे रात में नींद नहीं आती थी और दुःख से व्याकुल होने के कारण उसे भूख भी नहीं लगती थी।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में वियोग का चरम प्रभाव दिखाया गया है। सुकला की मानसिक व्याकुलता उसके शरीर और दैनिक जीवन को प्रभावित कर रही है। कथा उसके पतिव्रत धर्म को इस गहन वियोग के माध्यम से प्रस्तुत करती है।


भाग 5 : सखियों का उपदेश और सुकला का उत्तर

श्लोक 49–63

श्लोक 49

अथ सख्यः समायाताः पप्रच्छुः सुकलां तदा। सुकले चारुसर्वांगि कस्माद्रोदिषि संप्रति॥ ४९॥

शब्दार्थ

  • अथ — इसके बाद।
  • सख्यः — सखियाँ।
  • समायाताः — एकत्र आईं।
  • पप्रच्छुः — पूछा।
  • सुकलाम् — सुकला से।
  • चारुसर्वाङ्गि — हे सुन्दर अंगों वाली।
  • कस्मात् — क्यों।
  • रोदिषि — रोती हो।
  • सम्प्रति — इस समय।

भावार्थ

इसके बाद सुकला की सखियाँ उसके पास आईं और पूछने लगीं—हे सुन्दर अंगों वाली सुकला! तुम इस समय क्यों रो रही हो?

तात्त्विक व्याख्या

सखियाँ सुकला की स्थिति देखकर उसके दुःख का कारण जानना चाहती हैं। उनके प्रश्न से कथा में एक नया संवाद आरम्भ होता है, जिसमें वैवाहिक निष्ठा और व्यक्तिगत जीवन के विषय में अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आएँगे।


श्लोक 50

ततस्त्वं कारणं ब्रूहि दुःखस्यास्य वरानने।

शब्दार्थ

  • ततः — तब।
  • त्वम् — तुम।
  • कारणम् — कारण।
  • ब्रूहि — बताओ।
  • दुःखस्य अस्य — इस दुःख का।
  • वरानने — हे सुन्दर मुख वाली।

भावार्थ

सखियाँ कहती हैं—हे सुन्दर मुख वाली! अपने इस दुःख का कारण हमें बताओ।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक सखियों के प्रश्न को पूरा करता है। अब सुकला अपने दुःख का कारण स्वयं बताएगी।


श्लोक 51

सुकलोवाच—

स मां त्यक्त्वा गतो भर्ता धर्मार्थं धर्मतत्परः। तीर्थयात्राप्रसंगेन अटते मेदिनीं ततः॥ ५१॥

शब्दार्थ

  • सः — वह।
  • माम् त्यक्त्वा — मुझे छोड़कर।
  • गतः — चला गया।
  • भर्ता — पति।
  • धर्मार्थम् — धर्म के उद्देश्य से।
  • धर्मतत्परः — धर्म में तत्पर।
  • तीर्थयात्राप्रसंगेन — तीर्थयात्रा के प्रसंग में।
  • अटते — घूमता है।
  • मेदिनीम् — पृथ्वी पर।
  • ततः — वहाँ, फिर।

भावार्थ

सुकला कहती है—मेरा पति धर्म में तत्पर होकर तीर्थयात्रा के लिए मुझे छोड़कर चला गया है और अब पृथ्वी पर तीर्थों में घूम रहा है।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला के लिए पति का धर्मयात्रा पर जाना अपने आप में दोष नहीं है। उसका दुःख इस बात से है कि वह उसे अपने साथ नहीं ले गया और इस प्रकार पति-पत्नी के संयुक्त धर्माचरण की उसकी अपेक्षा टूट गई।


श्लोक 52

मां त्यक्त्वा स गतः स्वामी निर्दोषां पापवर्जिताम्। अहं साध्वी समाचारा सदा पुण्या पतिव्रता॥ ५२॥

शब्दार्थ

  • माम् त्यक्त्वा — मुझे छोड़कर।
  • गतः — चला गया।
  • स्वामी — पति।
  • निर्दोषाम् — दोषरहित।
  • पापवर्जिताम् — पाप से रहित।
  • अहम् — मैं।
  • साध्वी — सदाचारिणी।
  • समाचारा — उत्तम आचरण वाली।
  • सदा पुण्या — सदैव पुण्यशील।
  • पतिव्रता — पतिव्रत धर्म में निष्ठावान।

भावार्थ

सुकला कहती है—मेरे पति मुझे छोड़कर चले गए, जबकि मैं निर्दोष, पापरहित, सदाचारिणी और पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली हूँ।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला अपने आचरण को पति के निर्णय से अलग करके देखती है। वह मानती है कि उसने धर्म के प्रति निष्ठा रखी है, इसलिए उसे पति के साथ धर्मयात्रा करने का अवसर मिलना चाहिए था।


श्लोक 53

मां त्यक्त्वा स गतो भर्ता तीर्थ साधनतत्परः। तेनाहं दुःखिता सख्यो वियोगेनाति पीडिता॥ ५३॥

शब्दार्थ

  • माम् त्यक्त्वा — मुझे छोड़कर।
  • गतः — चला गया।
  • भर्ता — पति।
  • तीर्थसाधनतत्परः — तीर्थयात्रा के साधन में तत्पर।
  • तेन — उससे, इस कारण।
  • अहम् — मैं।
  • दुःखिता — दुखी।
  • सख्यः — हे सखियो।
  • वियोगेन — वियोग से।
  • अति पीडिता — अत्यन्त पीड़ित।

भावार्थ

सुकला कहती है—मेरे पति तीर्थयात्रा करने के लिए मुझे छोड़कर चले गए हैं। हे सखियो! इसी कारण मैं उनके वियोग से अत्यन्त दुखी हूँ।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला अपनी स्थिति को स्पष्ट करती है। उसके लिए तीर्थयात्रा और पति का साथ अलग-अलग नहीं हैं। वह धर्म के मार्ग पर पति के साथ चलना चाहती है।


श्लोक 54

जीवनाशो वरं श्रेष्ठो वरं वै विषभक्षणम्। वरमग्निप्रवेशश्च वरं कायविनाशनम्॥ ५४॥

शब्दार्थ

  • जीवनाशः — जीवन का नाश।
  • वरम् — बेहतर।
  • श्रेष्ठः — उत्तम।
  • विषभक्षणम् — विष खाना।
  • अग्निप्रवेशः — अग्नि में प्रवेश।
  • कायविनाशनम् — शरीर का नाश।

भावार्थ

सुकला अत्यन्त दुःख में कहती है कि पति-वियोग सहने की अपेक्षा जीवन का नाश, विषपान, अग्निप्रवेश अथवा शरीर का विनाश भी उसे बेहतर लगता है।

तात्त्विक व्याख्या

यह कथन सुकला के वियोग की चरम भावनात्मक स्थिति को व्यक्त करता है। यह उसके दुःख की तीव्रता का वर्णन है, न कि जीवन समाप्त करने का कोई अनुकरणीय निर्देश।


श्लोक 55

नारीं प्रियां परित्यज्य भर्ता याति सुनिष्ठुरः। भर्तृत्यागो वरं नैव प्राणत्यागो वरं सखि॥ ५५॥

शब्दार्थ

  • नारीम् — स्त्री को।
  • प्रियम् — प्रिय।
  • परित्यज्य — छोड़कर।
  • भर्ता — पति।
  • याति — चला जाता है।
  • सुनिष्ठुरः — अत्यन्त कठोर।
  • भर्तृत्यागः — पति का त्याग।
  • वरम् नैव — किसी प्रकार अच्छा नहीं।
  • प्राणत्यागः — प्राणों का त्याग।
  • सखि — हे सखि।

भावार्थ

सुकला कहती है—प्रिय पत्नी को छोड़कर चला जाने वाला पति अत्यन्त कठोर है। हे सखि! पति का परित्याग सहने की अपेक्षा प्राण त्याग देना बेहतर लगता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला अपने पति के प्रस्थान को कठोरता के रूप में अनुभव कर रही है। उसके लिए पति-पत्नी का सम्बन्ध इतना गहरा है कि वियोग जीवन के आधार को टूटने जैसा लगता है।


श्लोक 56

वियोगं न समर्थाहं सहितुं नित्यदारुणम्। तेनाहं दुःखिता सख्यो वियोगेनापि नित्यशः॥ ५६॥

शब्दार्थ

  • वियोगम् — बिछोह।
  • न समर्था — समर्थ नहीं।
  • अहम् — मैं।
  • सहितुम् — सहने में।
  • नित्यदारुणम् — अत्यन्त कठोर।
  • तेन — इस कारण।
  • दुःखिता — दुखी।
  • सख्यः — हे सखियो।
  • नित्यशः — निरन्तर।

भावार्थ

सुकला कहती है—हे सखियो! मैं इस कठोर वियोग को सहने में समर्थ नहीं हूँ। इसी कारण मैं निरन्तर दुःखी रहती हूँ।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला के लिए वियोग केवल कुछ समय की दूरी नहीं है। वह इसे अपने जीवन और धर्माचरण की स्थापित व्यवस्था से अलग हो जाने के रूप में अनुभव करती है।


श्लोक 57

सख्य ऊचुः—

तीर्थयात्रां गतो भर्ता पुनरेष्यति ते पतिः। वृथा शोषयसे कायं वृथा शोकं करोषि वै॥ ५७॥

शब्दार्थ

  • तीर्थयात्राम् गतः — तीर्थयात्रा पर गया।
  • भर्ता — पति।
  • पुनः एष्यति — फिर लौट आएगा।
  • ते पतिः — तुम्हारा पति।
  • वृथा — व्यर्थ।
  • शोषयसे — शरीर को दुर्बल करती हो।
  • कायम् — शरीर।
  • शोकम् — शोक।
  • करोषि — करती हो।

भावार्थ

सखियाँ कहती हैं—तुम्हारा पति तीर्थयात्रा पर गया है और वापस लौट आएगा। तुम व्यर्थ ही अपने शरीर को दुर्बल कर रही हो और शोक कर रही हो।

तात्त्विक व्याख्या

सखियाँ परिस्थिति को अस्थायी वियोग के रूप में देखती हैं। वे सुकला को अपने स्वास्थ्य और सामान्य जीवन की उपेक्षा न करने की सलाह देती हैं।


श्लोक 58

वृथा त्वं तप्यसे बाले वृथा भोगान्परित्यजेः। पिबस्व पानं भुंक्ष्व त्वं स्वप्रदत्तं हि पूर्वकम्॥ ५८॥

शब्दार्थ

  • वृथा — व्यर्थ।
  • त्वम् — तुम।
  • तप्यसे — कष्ट सहती हो।
  • बाले — हे बालिके।
  • भोगान् — सुख-साधन।
  • परित्यजेः — छोड़ती हो।
  • पिबस्व — पियो।
  • पानम् — पेय।
  • भुंक्ष्व — भोजन करो।
  • स्वप्रदत्तम् पूर्वकम् — पहले से उपलब्ध अपने भोजन आदि का उपभोग करो।

भावार्थ

सखियाँ कहती हैं—हे सुकला! तुम व्यर्थ ही तप कर रही हो और सुख-साधनों को छोड़ रही हो। भोजन करो, पेय ग्रहण करो और अपने सामान्य जीवन को बनाए रखो।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सखियों की दृष्टि जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर है। वे सुकला को यह समझाना चाहती हैं कि पति के लौटने की प्रतीक्षा करते हुए अपने शरीर को कष्ट देना आवश्यक नहीं है।


श्लोक 59

कस्य भर्ता सुताः कस्य कस्य स्वजनबांधवाः। कः कस्य नास्ति संसारे संबंधः केन चैव हि॥ ५९॥

शब्दार्थ

  • कस्य — किसका।
  • भर्ता — पति।
  • सुताः — पुत्र।
  • स्वजनबान्धवाः — अपने सम्बन्धी।
  • कः कस्य — कौन किसका।
  • संसारे — संसार में।
  • सम्बन्धः — सम्बन्ध।
  • केन — किसके साथ।

भावार्थ

सखियाँ कहती हैं—इस संसार में कौन किसका पति है, किसके पुत्र हैं और कौन किसका सम्बन्धी है? संसार में सम्बन्ध किस प्रकार स्थायी हो सकते हैं?

तात्त्विक व्याख्या

यह कथन संसार की अस्थिरता और सम्बन्धों की परिवर्तनशीलता पर बल देता है। सखियाँ सुकला को समझाती हैं कि संसार में सम्बन्ध स्थायी नहीं हैं और किसी एक सम्बन्ध के कारण जीवन की अन्य आवश्यकताओं को छोड़ देना उचित नहीं है।


श्लोक 60

भक्ष्यते भुज्यते बाले संसारस्य हि तत्फलम्। मृते प्राणिनि कोऽश्नाति को हि पश्यति तत्फलम्॥ ६०॥

शब्दार्थ

  • भक्ष्यते — खाया जाता है।
  • भुज्यते — भोग किया जाता है।
  • बाले — हे बालिके।
  • संसारस्य — संसार का।
  • तत्फलम् — उसका फल।
  • मृते प्राणिनि — प्राणी के मर जाने पर।
  • कः अश्नाति — कौन खाता है।
  • कः पश्यति — कौन देखता है।

भावार्थ

सखियाँ कहती हैं—हे सुकला! संसार में लोग भोजन करते और सुख भोगते हैं; यही सांसारिक जीवन का एक पक्ष है। किसी प्राणी की मृत्यु के बाद उसके भोजन और भोग का उपयोग वही नहीं कर सकता।

तात्त्विक व्याख्या

सखियाँ जीवन की नश्वरता को सामने रखकर सुकला को सामान्य जीवन जीने के लिए प्रेरित करती हैं। उनके अनुसार जीवित रहते हुए शरीर की आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिए।


श्लोक 61

सुकलोवाच—

भवतीभिः प्रयुक्तं यत्तन्न स्याद्वेदसंमतम्। यातु भर्तुः पृथग्भूता तिष्ठत्येका सदैव हि॥ ६१॥

शब्दार्थ

  • भवतीभिः — आप लोगों द्वारा।
  • प्रयुक्तम् — कहा गया।
  • यत् — जो।
  • तत् — वह।
  • न स्यात् — नहीं है।
  • वेदसम्मतम् — वेदों द्वारा मान्य।
  • भर्तुः पृथक्भूता — पति से अलग हुई।
  • तिष्ठति — रहती है।
  • एका — अकेली।
  • सदैव — सदा।

भावार्थ

सुकला कहती है—आप लोगों ने जो कहा, वह वेदसम्मत नहीं है। पति से पृथक् होकर स्त्री अकेली रहती है; यह मेरे लिए धर्मसम्मत स्थिति नहीं है।

तात्त्विक व्याख्या

सुकला सखियों के संसार-सम्बन्धी तर्क को स्वीकार नहीं करती। वह अपने वैवाहिक सम्बन्ध को केवल परिवर्तनशील सांसारिक सम्बन्ध नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ा सम्बन्ध मानती है।


श्लोक 62

पापभूता भवेन्नारी तां न मन्यंति सज्जनाः। भर्तुः सार्धं सदा सख्यो दृष्टो वेदेषु सर्वदा॥ ६२॥

शब्दार्थ

  • पापभूता — पाप की भागी।
  • भवेत् — होती है।
  • नारी — स्त्री।
  • ताम् — उसे।
  • न मन्यन्ति — स्वीकार नहीं करते।
  • सज्जनाः — सज्जन।
  • भर्तुः सार्धम् — पति के साथ।
  • सदा — सदैव।
  • सख्यः — हे सखियो।
  • दृष्टः — देखा गया।
  • वेदेषु — वेदों में।
  • सर्वदा — सर्वदा।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति से अलग रहने वाली स्त्री को सज्जन उचित नहीं मानते। वह अपने कथन के समर्थन में पति के साथ रहने को धर्मसम्मत बताती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक सुकला के वैवाहिक धर्म सम्बन्धी विश्वास को आगे बढ़ाता है। उसके लिए पति के साथ रहना धर्म का स्थायी आधार है।


श्लोक 63

संबंधः पुण्यसंसर्गाज्जायते नात्र संशयः। नारीणां च सदा तीर्थं भर्ता शास्त्रेषु पठ्यते॥ ६३॥

शब्दार्थ

  • सम्बन्धः — सम्बन्ध।
  • पुण्यसंसर्गात् — पुण्य के संयोग से।
  • जायते — उत्पन्न होता है।
  • न अत्र संशयः — इसमें सन्देह नहीं।
  • नारीणाम् — स्त्रियों के लिए।
  • सदा — सदैव।
  • तीर्थम् — तीर्थ।
  • भर्ता — पति।
  • शास्त्रेषु — शास्त्रों में।
  • पठ्यते — कहा गया है।

भावार्थ

सुकला कहती है—सम्बन्ध पुण्य के संयोग से उत्पन्न होता है, इसमें सन्देह नहीं। शास्त्रों में पति को स्त्रियों का तीर्थ कहा गया है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक राजा वेन के मूल प्रश्न से सीधे जुड़ता है। सुकला के अनुसार पति-पत्नी का सम्बन्ध केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि पुण्य से जुड़ा धार्मिक सम्बन्ध है। इसी आधार पर वह पति को तीर्थ मानती है।


भाग 6 : पति-सेवा, पुण्य और धार्मिक फल

श्लोक 64–76

श्लोक 64

तमेवावाहयेन्नित्यं वाचा कायेन कर्मभिः। मनसा पूजयेन्नित्यं भावसत्येन तत्परा॥ ६४॥

शब्दार्थ

  • तम् एव — उसी को।
  • आवाहयेत् — आवाहन करे, उपस्थित माने।
  • नित्यम् — सदैव।
  • वाचा — वाणी से।
  • कायेन — शरीर से।
  • कर्मभिः — कर्मों से।
  • मनसा — मन से।
  • पूजयेत् — पूजा करे।
  • भावसत्येन — सच्ची भावना से।
  • तत्परा — उसमें निष्ठावान।

भावार्थ

सुकला कहती है कि स्त्री को पति के प्रति वाणी, शरीर, कर्म और मन से निष्ठावान रहना चाहिए तथा सच्ची भावना से उसका सम्मान करना चाहिए।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ निष्ठा को केवल बाहरी आचरण तक सीमित नहीं रखा गया है। वाणी, कर्म और मन—तीनों में एकरूपता को महत्त्व दिया गया है। सुकला के लिए धर्माचरण का आधार आन्तरिक भावना और बाहरी व्यवहार की संगति है।


श्लोक 65

भर्तुः पार्श्वं महातीर्थं दक्षिणांगं सदैव हि। तमाश्रित्य यदा नारी गृहस्था परिवर्त्तयेत्॥ ६५॥

शब्दार्थ

  • भर्तुः पार्श्वम् — पति का निकटवर्ती स्थान।
  • महातीर्थम् — महान तीर्थ।
  • दक्षिणाङ्गम् — दाहिना अंग अथवा निकटता का प्रतीक।
  • सदैव — सदैव।
  • तम् आश्रित्य — उसका आश्रय लेकर।
  • यदा — जब।
  • नारी — स्त्री।
  • गृहस्था — गृहस्थ जीवन में स्थित।
  • परिवर्तयेत् — जीवन-व्यवहार चलाती है।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति का साथ महान तीर्थ के समान है। पति का आश्रय लेकर गृहस्थ जीवन चलाने वाली स्त्री अपने दैनिक जीवन में भी धर्माचरण कर सकती है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में तीर्थ की अवधारणा गृहस्थ जीवन से जोड़ी गई है। सुकला के अनुसार धार्मिक जीवन केवल तीर्थस्थलों तक जाने से नहीं बनता; गृहस्थ जीवन के भीतर भी धर्माचरण का अवसर है।


श्लोक 66

यजते दानपुण्यैश्च तस्य दानस्य यत्फलम्। वाराणस्यां च गंगायां यत्फलं न च पुष्करे॥ ६६॥

शब्दार्थ

  • यजते — यज्ञ अथवा धार्मिक कर्म करती है।
  • दानपुण्यैः — दान और पुण्यकर्मों से।
  • तस्य दानस्य — उस दान का।
  • यत्फलम् — जो फल है।
  • वाराणस्याम् — वाराणसी में।
  • गंगायाम् — गंगा में।
  • पुष्करे — पुष्कर में।

भावार्थ

सुकला कहती है कि गृहस्थ जीवन में पति के साथ धर्माचरण और दान-पुण्य करने से जो फल मिलता है, उसकी तुलना वाराणसी, गंगा और पुष्कर जैसे तीर्थों में प्राप्त पुण्य से की जा सकती है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ धार्मिक कर्मों के फल को गृहस्थ जीवन के भीतर स्थापित किया गया है। तीर्थयात्रा के पुण्य और गृहस्थ धर्म के पुण्य के बीच तुलना करके सुकला अपने कथन को आगे बढ़ाती है।


श्लोक 67

द्वारकायां न चावन्त्यां केदारे शशिभूषणे। लभते नैव सा नारी यजमाना सदा किल॥ ६७॥

शब्दार्थ

  • द्वारकायाम् — द्वारका में।
  • अवन्त्याम् — अवन्ती में।
  • केदारे — केदार तीर्थ में।
  • शशिभूषणे — चन्द्रशेखर अथवा शिव से सम्बद्ध तीर्थ में।
  • लभते — प्राप्त करती है।
  • नारी — स्त्री।
  • यजमाना — धार्मिक कर्म करती हुई।
  • सदा — सदैव।
  • किल — निश्चय ही, ऐसा कथन है।

भावार्थ

सुकला कहती है कि द्वारका, अवन्ती और केदार जैसे तीर्थों में धार्मिक कर्म करने से जो फल प्राप्त होता है, वह उसके मत में पति के साथ धर्माचरण से भी प्राप्त किया जा सकता है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक पिछले श्लोक का विस्तार है। सुकला तीर्थों की सूची देकर यह स्थापित करना चाहती है कि गृहस्थ जीवन और पति के प्रति निष्ठा को धार्मिक पुण्य से अलग नहीं किया जा सकता।


श्लोक 68

तादृशं फलमेवं सा न प्राप्नोति कदा सखि। सुमुखं पुत्रसौभाग्यं स्नानं दानं च भूषणम्॥ ६८॥

शब्दार्थ

  • तादृशम् फलम् — वैसा फल।
  • न प्राप्नोति — प्राप्त नहीं करती।
  • कदा — कभी।
  • सखि — हे सखि।
  • सुमुखम् — सुन्दर मुख अथवा शुभता।
  • पुत्रसौभाग्यम् — पुत्र और सौभाग्य।
  • स्नानम् — स्नान।
  • दानम् — दान।
  • भूषणम् — आभूषण।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति से पृथक् होकर रहने वाली स्त्री को वैसा फल प्राप्त नहीं होता। वह पुत्र-सौभाग्य, स्नान, दान और आभूषण जैसे शुभ पक्षों का उल्लेख करती है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में सुकला गृहस्थ जीवन के सुख और धार्मिक फल को पति के साथ सम्बन्धित करती है। उसके कथन में पति-पत्नी की एकता को शुभता और सौभाग्य का आधार माना गया है।


श्लोक 69

वस्त्रालंकारसौभाग्यं रूपं तेजः फलं सदा। यशः कीर्तिमवाप्नोति गुणं च वरवर्णिनी॥ ६९॥

शब्दार्थ

  • वस्त्र — कपड़े।
  • अलंकार — आभूषण।
  • सौभाग्यम् — सौभाग्य।
  • रूपम् — सुन्दरता।
  • तेजः — तेज।
  • फलम् — फल।
  • यशः — यश।
  • कीर्तिम् — कीर्ति।
  • अवाप्नोति — प्राप्त करती है।
  • गुणम् — गुण।
  • वरवर्णिनी — हे सुन्दर वर्ण वाली।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति के अनुग्रह से स्त्री को वस्त्र, आभूषण, सौभाग्य, रूप, तेज, यश, कीर्ति और गुण प्राप्त होते हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला पति के अनुग्रह को स्त्री के सामाजिक और पारिवारिक सौभाग्य से जोड़ती है। यह कथन उसके वैवाहिक धर्म की परम्परागत अवधारणा को व्यक्त करता है।


श्लोक 70

भर्तुः प्रसादात्सर्वं च लभते नात्र संशयः। विद्यमाने यदा कांते अन्यं धर्मं करोति या॥ ७०॥

शब्दार्थ

  • भर्तुः प्रसादात् — पति की प्रसन्नता अथवा अनुग्रह से।
  • सर्वम् — सब कुछ।
  • लभते — प्राप्त करती है।
  • न अत्र संशयः — इसमें सन्देह नहीं।
  • विद्यमाने — उपस्थित रहते हुए।
  • कान्ते — प्रिय पति।
  • अन्यं धर्मम् — अन्य धार्मिक कर्म।
  • करोति — करती है।
  • या — जो स्त्री।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति की प्रसन्नता से स्त्री को सब कुछ प्राप्त होता है। यदि पति उपस्थित हो और स्त्री उसे छोड़कर अन्य धार्मिक कर्मों को प्रधानता दे, तो उसके अनुसार उस कर्म की सार्थकता पर प्रश्न उठता है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला की दृष्टि में धार्मिक कर्म और वैवाहिक उत्तरदायित्व का क्रम स्पष्ट होता है। वह पति के प्रति अपने धर्म को दूसरे धार्मिक अनुष्ठानों से पृथक् नहीं मानती।


श्लोक 71

निष्फलं जायते तस्याः पुंश्चली परिकथ्यते। नारीणां यौवनं रूपमवतारं स्मृतं ध्रुवम्॥ ७१॥

शब्दार्थ

  • निष्फलम् — फलहीन।
  • जायते — हो जाता है।
  • तस्याः — उसका।
  • पुंश्चली — यहाँ परम्परागत पाठ में पति से विमुख स्त्री के लिए प्रयुक्त कठोर संज्ञा।
  • परिकथ्यते — कही जाती है।
  • नारीणाम् — स्त्रियों का।
  • यौवनम् — युवावस्था।
  • रूपम् — रूप।
  • अवतारम् — पाठानुसार रूप अथवा अवस्था का संकेत।
  • स्मृतम् — माना गया है।
  • ध्रुवम् — निश्चित रूप से।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति की उपेक्षा करके किए गए धार्मिक कर्म निष्फल माने जाते हैं और ऐसी स्त्री के लिए शास्त्रीय परम्परा में कठोर संज्ञा का प्रयोग किया गया है। वह स्त्री के यौवन और रूप का भी उल्लेख करती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक कथा की परम्परागत पतिव्रत-धारणा को कठोर रूप में व्यक्त करता है। इसका कथन सुकला के धार्मिक विश्वास और उस समय की सामाजिक मान्यताओं के सन्दर्भ में समझना चाहिए।


श्लोक 72

एकस्यापि हि भर्तुश्च तस्यार्थे भूमिमंडले। सुपुत्रा सुयशा नारी परिकथ्येत वै सदा॥ ७२॥

शब्दार्थ

  • एकस्य भर्तुः — एक पति के।
  • तस्य अर्थे — उसके लिए, उसके सम्बन्ध में।
  • भूमिमण्डले — पृथ्वी पर।
  • सुपुत्रा — उत्तम सन्तान वाली।
  • सुयशा — अच्छे यश वाली।
  • नारी — स्त्री।
  • परिकथ्येत — कही जाती है।
  • सदा — सदैव।

भावार्थ

सुकला कहती है कि एक पति के प्रति निष्ठावान स्त्री को उत्तम सन्तान वाली और यशस्विनी माना जाता है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक एकनिष्ठ वैवाहिक सम्बन्ध को सामाजिक प्रतिष्ठा और पारिवारिक शुभता से जोड़ता है। सुकला के कथन में पति के प्रति निष्ठा स्त्री के चरित्र की प्रमुख पहचान है।


श्लोक 73

तुष्टे भर्तरि संसारे दृश्या नारी न संशयः। पतिहीना भवेन्नारी भवेत्सा भूमिमंडले॥ ७३॥

शब्दार्थ

  • तुष्टे भर्तरि — पति के प्रसन्न होने पर।
  • संसारे — संसार में।
  • दृश्या — सम्मानित अथवा प्रशंसनीय।
  • नारी — स्त्री।
  • न संशयः — निःसन्देह।
  • पतिहीना — पति से रहित।
  • भवेत् — हो।
  • भूमिमण्डले — पृथ्वी पर।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति के प्रसन्न होने पर स्त्री संसार में सम्मानित मानी जाती है। वह पति-विहीन स्त्री की स्थिति को इसके विपरीत रखती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह कथन उस सामाजिक दृष्टिकोण को व्यक्त करता है जिसमें स्त्री का सौभाग्य पति के साथ जोड़ा गया है। इसे कथा के परम्परागत सामाजिक सन्दर्भ में पढ़ना आवश्यक है।


श्लोक 74

कुतस्तस्याः सुखं रूपं यशः कीर्तिः सुता भुवि। सुदौर्भाग्यं महद्दुःखं संसारे परिभुज्यते॥ ७४॥

शब्दार्थ

  • कुतः — कहाँ से।
  • तस्याः — उसका।
  • सुखम् — सुख।
  • रूपम् — रूप।
  • यशः — यश।
  • कीर्तिः — कीर्ति।
  • सुता — पुत्री अथवा सन्तान।
  • भुवि — पृथ्वी पर।
  • सुदौर्भाग्यम् — बड़ा दुर्भाग्य।
  • महादुःखम् — बड़ा दुःख।
  • संसारे — संसार में।
  • परिभुज्यते — भोगती है।

भावार्थ

सुकला के कथन के अनुसार पति-विहीन स्त्री के लिए सुख, यश और सौभाग्य प्राप्त करना कठिन है; वह संसार में दुःख और दुर्भाग्य का अनुभव करती है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ वैवाहिक स्थिति को स्त्री के सामाजिक सौभाग्य से जोड़ा गया है। कथा इस मान्यता को सुकला के कथन के माध्यम से प्रस्तुत करती है।


श्लोक 75

पापभागा भवेत्सा च दुःखाचारा सदैव हि। तुष्टे भर्तरि तस्यास्तु तुष्टाः सर्वाश्च देवताः॥ ७५॥

शब्दार्थ

  • पापभागा — पाप की भागी।
  • भवेत् — होती है।
  • सा — वह।
  • दुःखाचारा — दुःखपूर्ण जीवन जीने वाली।
  • सदैव — सदैव।
  • तुष्टे भर्तरि — पति के प्रसन्न होने पर।
  • तस्याः — उसके लिए।
  • तुष्टाः — प्रसन्न।
  • सर्वाः देवताः — सभी देवता।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति के प्रति धर्माचरण न करने वाली स्त्री दुःख की भागी बनती है, जबकि पति के प्रसन्न होने पर सभी देवता भी प्रसन्न होते हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक पति की प्रसन्नता को धार्मिक पुण्य और देवताओं की प्रसन्नता से जोड़ता है। इससे सुकला की मान्यता सामने आती है कि गृहस्थ धर्म का पालन धार्मिक जीवन का प्रमुख अंग है।


श्लोक 76

तुष्टे भर्तरि तुष्यंति ऋषयो देवमानवाः। भर्ता नाथो गुरुर्भर्ता देवता दैवतैः सह॥ ७६॥

शब्दार्थ

  • तुष्टे भर्तरि — पति के प्रसन्न होने पर।
  • तुष्यन्ति — प्रसन्न होते हैं।
  • ऋषयः — ऋषि।
  • देवमानवाः — देवता और मनुष्य।
  • भर्ता — पति।
  • नाथः — स्वामी अथवा रक्षक।
  • गुरुः — गुरु।
  • देवता — देवता।
  • दैवतैः सह — देवताओं के साथ।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति के प्रसन्न होने पर ऋषि, देवता और मनुष्य भी प्रसन्न होते हैं। उसके कथन में पति को नाथ, गुरु और देवता के समान स्थान दिया गया है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक सुकला के पति-केन्द्रित धार्मिक दृष्टिकोण का चरम रूप प्रस्तुत करता है। वह पति को केवल गृहस्थ सम्बन्ध का अंग नहीं, बल्कि धर्म और उपासना के केन्द्र के रूप में स्थापित करती है।


भाग 7 : श्रृंगार, पति की उपस्थिति और पतिव्रत धर्म का निष्कर्ष

श्लोक 77–84

श्लोक 77

भर्ता तीर्थश्च पुण्यश्च नारीणां नृपनंदन। शृंगारं भूषणं रूपं वर्णं सौगंधमेव च॥ ७७॥

शब्दार्थ

  • भर्ता — पति।
  • तीर्थः — तीर्थ।
  • पुण्यः — पुण्य का साधन।
  • नारीणाम् — स्त्रियों के लिए।
  • नृपनन्दन — हे राजा के पुत्र।
  • श्रृंगारम् — श्रृंगार।
  • भूषणम् — आभूषण।
  • रूपम् — रूप।
  • वर्णम् — वर्ण अथवा आभा।
  • सौगन्धम् — सुगन्ध।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति स्त्रियों के लिए तीर्थ और पुण्य का साधन है। वह आगे श्रृंगार, आभूषण, रूप, आभा और सुगन्ध का उल्लेख करती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक पति को तीर्थ मानने वाले विचार को दोहराता है और उसके साथ स्त्री के श्रृंगार तथा सौभाग्य को जोड़ता है। यह कथा के पारम्परिक वैवाहिक आदर्श का हिस्सा है।


श्लोक 78

कृत्वा सा तिष्ठते नित्यं वर्जयित्वा सुपर्वसु। शृंगारैर्भूषणैः सा तु शुशुभे सा यदा पतिः॥ ७८॥

शब्दार्थ

  • कृत्वा — करके।
  • सा — वह स्त्री।
  • तिष्ठते — रहती है।
  • नित्यम् — सदैव।
  • वर्जयित्वा — छोड़कर।
  • सुपर्वसु — विशेष पर्वों पर अथवा पाठानुसार शुभ अवसरों पर।
  • श्रृंगारैः — श्रृंगार से।
  • भूषणैः — आभूषणों से।
  • शुशुभे — सुशोभित होती है।
  • यदा पतिः — जब पति उपस्थित हो।

भावार्थ

सुकला कहती है कि स्त्री अपने पति की उपस्थिति में श्रृंगार और आभूषणों से सुशोभित होती है। विशेष अवसरों पर वह इनका उपयोग करती है।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ श्रृंगार को वैवाहिक सौभाग्य के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। सुकला के कथन में स्त्री की सज्जा और पति की उपस्थिति के बीच सम्बन्ध स्थापित किया गया है।


श्लोक 79

पत्याविना भवत्येवं क्षीरं सर्पमुखे यथा। भर्तुरर्थे महाभागा सुव्रता चारुमंगला॥ ७९॥

शब्दार्थ

  • पत्या विना — पति के बिना।
  • भवति — होता है।
  • एवम् — इस प्रकार।
  • क्षीरम् — दूध।
  • सर्पमुखे — साँप के मुख में।
  • यथा — जैसे।
  • भर्तुः अर्थे — पति के लिए।
  • महाभागा — हे सौभाग्यशालिनी।
  • सुव्रता — उत्तम व्रत वाली।
  • चारुमंगला — मंगलमयी।

भावार्थ

सुकला एक उपमा देती है कि पति के बिना श्रृंगार उसी प्रकार निष्फल हो जाता है, जैसे साँप के मुख में दूध। वह पति के प्रति निष्ठा को स्त्री के सौभाग्य से जोड़ती है।

तात्त्विक व्याख्या

यह उपमा वैवाहिक जीवन में श्रृंगार के परम्परागत अर्थ को व्यक्त करती है। सुकला के अनुसार श्रृंगार का उद्देश्य केवल बाहरी सौन्दर्य नहीं, बल्कि वैवाहिक सम्बन्ध की अभिव्यक्ति भी है।


श्लोक 80

गते भर्तरि या नारी शृंगारं कुरुते यदि। रूपं वर्णं च तत्सर्वं शवरूपेण जायते॥ ८०॥

शब्दार्थ

  • गते भर्तरि — पति के चले जाने पर।
  • या नारी — जो स्त्री।
  • श्रृंगारम् — श्रृंगार।
  • कुरुते — करती है।
  • यदि — यदि।
  • रूपम् — रूप।
  • वर्णम् — आभा।
  • तत् सर्वम् — वह सब।
  • शवरूपेण — शव के समान।
  • जायते — हो जाता है।

भावार्थ

सुकला कहती है कि पति के दूर रहने पर जो स्त्री श्रृंगार करती है, उसका रूप और आभा उसके लिए अर्थहीन हो जाते हैं।

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला श्रृंगार का मूल्य पति की उपस्थिति से जोड़ती है। यह कथन उसके व्यक्तिगत पतिव्रत आदर्श को प्रकट करता है।


श्लोक 81

वदंति भूतले लोकाः पुंश्चलीयं न संशयः। तस्माद्भर्तुर्वियुक्ता या नार्याः शृणुत भूतले॥ ८१॥

शब्दार्थ

  • वदन्ति — कहते हैं।
  • भूतले — पृथ्वी पर।
  • लोकाः — लोग।
  • पुंश्चली — परम्परागत पाठ में प्रयुक्त कठोर सामाजिक संज्ञा।
  • न संशयः — निःसन्देह।
  • तस्मात् — इसलिए।
  • भर्तुः वियुक्ता — पति से अलग हुई।
  • नारी — स्त्री।
  • शृणुत — सुनिए।

भावार्थ

सुकला कहती है कि संसार में लोग ऐसी स्त्री के विषय में कठोर बातें कहते हैं जो पति से अलग रहते हुए श्रृंगार करती है। वह इसे अपने पतिव्रत सम्बन्धी विचार के समर्थन में प्रस्तुत करती है।

तात्त्विक व्याख्या

इस श्लोक में सामाजिक प्रतिष्ठा और स्त्री के आचरण के बीच सम्बन्ध दिखाया गया है। इसमें प्रयुक्त संज्ञा कठोर है और इसे कथा में व्यक्त सामाजिक मान्यता के रूप में समझना चाहिए।


श्लोक 82

इच्छंत्या वै महासौख्यं भवितव्यं कदाचन। सुजायायाः परो धर्मो भर्ता शास्त्रेषु गीयते॥ ८२॥

शब्दार्थ

  • इच्छन्त्या — इच्छा करने वाली।
  • महा-सौख्यम् — महान सुख।
  • भवितव्यम् — प्राप्त होना।
  • कदाचन — कभी।
  • सुजायायाः — उत्तम पत्नी के लिए।
  • परः धर्मः — श्रेष्ठ धर्म।
  • भर्ता — पति।
  • शास्त्रेषु — शास्त्रों में।
  • गीयते — गाया अथवा कहा गया है।

भावार्थ

सुकला कहती है कि महान सुख की इच्छा रखने वाली उत्तम पत्नी के लिए पति को शास्त्रों में श्रेष्ठ धर्म का आधार बताया गया है।

तात्त्विक व्याख्या

यह श्लोक सुकला के कथन का सार प्रस्तुत करता है। उसके अनुसार स्त्री के धार्मिक और पारिवारिक जीवन का केन्द्र पति के प्रति निष्ठा है।


श्लोक 83

तस्माद्वै शाश्वतो धर्मो न त्याज्यो भार्यया किल। एवं धर्मं विजानामि कथं भर्ता परित्यजेत्॥ ८३॥

शब्दार्थ

  • तस्मात् — इसलिए।
  • शाश्वतः धर्मः — सनातन अथवा स्थायी धर्म।
  • न त्याज्यः — नहीं छोड़ा जाना चाहिए।
  • भार्यया — पत्नी द्वारा।
  • किल — निश्चय ही।
  • एवम् — इस प्रकार।
  • धर्मम् — धर्म।
  • विजानामि — मैं जानती हूँ।
  • कथम् — कैसे।
  • भर्ता — पति।
  • परित्यजेत् — छोड़ सकता है।

भावार्थ

सुकला कहती है—इसलिए पत्नी को इस सनातन धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। मैं धर्म को इसी प्रकार जानती हूँ; फिर पति अपनी पत्नी को कैसे छोड़ सकता है?

तात्त्विक व्याख्या

यहाँ सुकला अपने कथन को पति-पत्नी के परस्पर उत्तरदायित्व पर समाप्त करती है। वह जिस धर्म को स्थायी मानती है, उसके अनुसार पत्नी की निष्ठा के साथ पति का भी कर्तव्य है कि वह अपनी धर्मपरायण पत्नी का परित्याग न करे।


श्लोक 84

इत्यर्थे श्रूयते सख्य इतिहासः पुरातनः। सुदेवायाश्च चरितं सुपुण्यं पापनाशनम्॥ ८४॥

शब्दार्थ

  • इति अर्थे — इसी विषय में।
  • श्रूयते — सुना जाता है।
  • सख्यः — हे सखियो।
  • इतिहासः पुरातनः — प्राचीन इतिहास।
  • सुदेवायाः — सुदेवा का।
  • चरितम् — चरित्र अथवा कथा।
  • सुपुण्यम् — अत्यन्त पुण्यदायक।
  • पापनाशनम् — पाप का नाश करने वाला।

भावार्थ

सुकला कहती है—हे सखियो! इसी विषय में सुदेवा का प्राचीन इतिहास सुना जाता है, जो अत्यन्त पुण्यदायक और पापों का नाश करने वाला है।

तात्त्विक व्याख्या

अध्याय का अन्त एक अन्य प्राचीन कथा के संकेत से होता है। सुकला अपने विचार को अकेला उदाहरण नहीं मानती, बल्कि उसे पुरानी धार्मिक परम्परा से जोड़ती है। इससे आगे सुदेवा के चरित्र की कथा आने की भूमिका बनती है।


अध्याय 41 का समग्र तात्त्विक निष्कर्ष

इस अध्याय में राजा वेन का प्रश्न है कि पुत्र, पत्नी, माता-पिता और गुरु किस प्रकार तीर्थ हैं। भगवान विष्णु कृकल और सुकला की कथा के माध्यम से उत्तर प्रस्तुत करते हैं। कथा का केन्द्र पति-पत्नी का सम्बन्ध और उसके भीतर धर्माचरण का स्थान है।

सुकला के लिए पति के साथ रहना केवल भावनात्मक निकटता नहीं, बल्कि धर्मपालन का आधार है। वह तीर्थयात्रा, यज्ञ, दान और पुण्यकर्मों के फल को पति की सेवा और उसके साथ रहने से जोड़ती है। कृकल भी पत्नी को धर्मपरायण मानता है और उसके परित्याग को अनुचित स्वीकार करता है। लेकिन वह उसे यात्रा की कठिनाइयों से बचाने के विचार से अकेले प्रस्थान करता है। इस निर्णय से दोनों के बीच धर्म के निर्वाह को लेकर तनाव उत्पन्न होता है।

कथा के भीतर दो दृष्टियाँ सामने आती हैं। सखियाँ संसार की नश्वरता और जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं पर बल देती हैं। सुकला वैवाहिक सम्बन्ध की धार्मिक महत्ता को प्रधानता देती है। इस प्रकार कथा तीर्थ की अवधारणा को भौगोलिक स्थान से आगे बढ़ाकर गृहस्थ जीवन और सम्बन्धों के क्षेत्र में रखती है।

इस अध्याय का मूल प्रश्न यही है कि क्या तीर्थ केवल किसी विशेष स्थान पर जाकर प्राप्त होता है, अथवा धर्मपूर्ण सम्बन्ध और उत्तरदायित्व भी मनुष्य की धार्मिक यात्रा का आधार बन सकते हैं? सुकला का उत्तर है कि उसके लिए पति के साथ धर्माचरण ही तीर्थ का सार है।

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