श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि ऊनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 159) के इन सभी श्लोकों (श्लोक 1 से 20) का क्रमवार संस्कृत मूल, हिंदी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 1

मूल: वैशंपायन उवाच। विदुरस्य सुहृत्कश्चित्खनकः कुशलः क्वचित्। विविक्ते पाण्डवान्राजन्निदं वचनमब्रवीत्।। (1-159-1) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे राजन् (जनमेजय)! विदुर जी का एक अत्यंत विश्वसनीय, कुशल और सुरंग खोदने में प्रवीण (खनक) व्यक्ति एकांत में पांडवों के पास आया और उनसे इस प्रकार बोला। व्याख्या: विदुर जी ने पांडवों की रक्षा के लिए अपनी कूटनीति के तहत एक विशेषज्ञ सुरंग खोदने वाले (खनक) को पहले ही वारणावत भेज दिया था, जो सही समय पर पांडवों से मिलता है।

श्लोक 2

मूल: प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो ह्यहम्। पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः।। (1-159-2) हिंदी अनुवाद: (उस खनक ने कहा)—मुझे विदुर जी ने भेजा है। मैं सुरंग खोदने में अत्यंत कुशल खनक हूँ। पांडवों का प्रिय कार्य करने के लिए मैं आया हूँ, बताइए मैं आप लोगों के लिए क्या करूँ? व्याख्या: वह खनक पूरी तरह भरोसेमंद था और विदुर जी का संदेश लेकर पांडवों की सहायता के लिए उपस्थित हुआ था ताकि लाक्षागृह के षड्यंत्र से उन्हें बचाया जा सके।

श्लोक 3

मूल: प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तं प्रियं यन्म्लेच्छभाषया। त्वया च तत्तथेत्युक्तमेतद्विश्वासकारणम्।। (1-159-3) हिंदी अनुवाद: गुप्त रूप से म्लेच्छ भाषा में विदुर जी ने आपसे जो गोपनीय बात कही थी और आपने उसके उत्तर में जो 'तथास्तु' (वैसा ही हो) कहा था, वही हमारे बीच विश्वास का मुख्य कारण है। व्याख्या: अपनी पहचान और विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए खनक ने वह गुप्त प्रसंग दोहराया जो हस्तिनापुर में विदुर जी और पांडवों के बीच सांकेतिक भाषा में तय हुआ था।

श्लोक 4

मूल: कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्यां पुरोचनः। भवनस्य तव द्वारि प्रदास्यति हुताशनम्।। (1-159-4) हिंदी अनुवाद: (खनक ने आगे कहा)—इसी कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को यह पुरोचन आपके इस भवन के द्वार पर अग्नि (आग) लगाएगा। व्याख्या: खनक ने पांडवों को ठीक उस तिथि और समय से सावधान कर दिया जिस दिन दुर्योधन और पुरोचन ने लाक्षागृह को जलाने की योजना बनाई थी।

श्लोक 5

मूल: मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः। इति व्यवसितं तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः।। (1-159-5) हिंदी अनुवाद: पुरुषसिंह पांडवों को माता (कुंती) के साथ इसी में जला देना चाहिए—दुष्ट बुद्धि वाले धृतराष्ट्र पुत्र (दुर्योधन) का यही पक्का निश्चय है। व्याख्या: खनक ने स्पष्ट कर दिया कि यह पूरा षड्यंत्र पांडवों और माता कुंती को एक साथ जीवित भस्म करने के लिए रचा गया है।

श्लोक 6

मूल: वैशंपायन उवाच। उवाच तं सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै।। (1-159-6) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—सत्यप्रतिज्ञ कुंतीपुत्र युधिष्ठिर ने उस खनक से कहा—हे सौम्य! मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि तुम विदुर जी के सच्चे मित्र और हितैषी हो। व्याख्या: युधिष्ठिर ने उसकी बातों और संकेतों से तुरंत पहचान लिया कि यह व्यक्ति विदुर जी का ही भेजा हुआ है और पूरी तरह आश्वस्त हो गए।

श्लोक 7

मूल: शुचिमाप्तं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम्। न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम्।। (1-159-7) हिंदी अनुवाद: तुम पवित्र, आप्त (विश्वासपात्र), प्रिय और विदुर जी के प्रति हमेशा दृढ़ भक्ति रखने वाले हो। ज्ञानी विदुर जी का कोई भी प्रयोजन ऐसा नहीं है जो मुझसे अज्ञात हो (अर्थात मैं सब समझता हूँ)। व्याख्या: युधिष्ठिर ने खनक की निष्ठा की प्रशंसा की और कहा कि विदुर जी की हर चाल और योजना से वे पहले ही भली-भांति परिचित हैं।

श्लोक 8

मूल: यथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि। भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान्यथा कविः।। (1-159-8) हिंदी अनुवाद: जैसे तुम विदुर जी के हो, वैसे ही हमारे भी हो; हम तुममें और उनमें कोई भेद नहीं मानते। जैसे वे हमारी रक्षा करते हैं, वैसे ही अब तुम भी कवि (विदुर जी) की तरह हमारी रक्षा करो। व्याख्या: युधिष्ठिर ने उस साधारण खनक को पूरा सम्मान दिया और उसे अपने परिवार का हिस्सा मानते हुए संकट से उबारने की विनती की।

श्लोक 9

मूल: इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः। पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात्।। (1-159-9) हिंदी अनुवाद: मेरा ऐसा मानना है कि धृतराष्ट्र के आदेश से पुरोचन द्वारा विशेष रूप से हमारे लिए बनवाया गया यह आवास पूरी तरह आग्नेय (ज्वलनशील पदार्थों से युक्त) है। व्याख्या: युधिष्ठिर ने पुष्टि की कि उनका यह अनुमान बिल्कुल सही है कि यह घर उन्हें जलाने के लिए ही जाल के रूप में तैयार किया गया है।

श्लोक 10

मूल: स पापः कोशवांश्चैव ससहायश्च दुर्मतिः। अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रबाधते।। (1-159-10) हिंदी अनुवाद: वह पापी दुर्योधन खजाने से संपन्न है, सहायकों से युक्त है और दुष्ट बुद्धि का है। वह पापी स्वभाव वाला मनुष्य सदा ही हम पर अत्याचार करता रहता है। व्याख्या: युधिष्ठिर ने शत्रु की आर्थिक और राजनीतिक ताकत का जिक्र करते हुए उसकी क्रूर मानसिकता पर प्रकाश डाला।

श्लोक 11

मूल: स भवान्भोक्षयत्वस्मान्यत्नेनास्माद्धुताशनात्। अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात्सुयोधनः।। (1-159-11) हिंदी अनुवाद: इसलिए आप पूरी तरह यत्न करके हम सबको इस अग्नि (लाक्षागृह की आग) से बचाइए। यदि हम यहाँ जल गए, तो दुर्योधन की मनोकामना पूरी हो जाएगी। व्याख्या: पांडवों ने अपनी जान बचाने के लिए उस सुरंग खोदने वाले विशेषज्ञ से पूरी तन्मयता से सहायता करने का आग्रह किया।

श्लोक 12

मूल: समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः। वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत्।। (1-159-12) हिंदी अनुवाद: उस दुरात्मा का यह आयुधागार (शस्त्रागार) चारों तरफ से किले की दीवार के अंत तक बिना किसी बाधा के पूरी भव्यता के साथ बनाया गया है। व्याख्या: लाक्षागृह के आसपास की बनावट और उसकी रणनीतिक स्थिति का यहाँ वर्णन किया गया है कि कैसे उसे सुनियोजित तरीके से बनाया गया था।

श्लोक 13

मूल: इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम्। प्रागेव विदुरो वेद तेनास्मानन्वबोधयत।। (1-159-13) हिंदी अनुवाद: शत्रु का यह वही अशुभ कृत्य है जिसे वह करना चाहता था। इस बात को विदुर जी पहले ही जान गए थे, इसलिए उन्होंने हमें पहले ही सचेत कर दिया था। व्याख्या: विदुर जी की दूरदर्शिता के कारण पांडव समय रहते सतर्क हो गए और शत्रु के मंसूबों को नाकाम करने की स्थिति में आ गए।

श्लोक 14

मूल: सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान्पुरा। पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं प्रतिमोचय।। (1-159-14) हिंदी अनुवाद: क्षत्ता (विदुर जी) ने भविष्य में जिस विपत्ति को पहले ही देख लिया था, आज वही संकट हमारे सामने आ पहुँचा है। अतः पुरोचन को बिना पता चले, आप हमें इस संकट से सुरक्षित बाहर निकालिए। व्याख्या: युधिष्ठिर खनक से अपेक्षा करते हैं कि वह ऐसा गुप्त उपाय करे कि पुरोचन को कानोकान खबर भी न हो और वे सुरक्षित निकल सकें।

श्लोक 15

मूल: वैशंपायन उवाच। स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः। परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाबिलम्।। (1-159-15) हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—उस खनक ने 'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूंगा' यह वचन देकर तुरंत पूरी मेहनत शुरू कर दी। उसने किले की खाई (परिखा) की ओर ले जाती हुई एक बहुत बड़ी सुरंग (बिल) खोद डाली। व्याख्या: सुरंग विशेषज्ञ खनक ने बिना देर किए रात के अंधेरे में अपनी कला का उपयोग करते हुए लाक्षागृह के अंदर से बाहर सुरक्षित स्थान तक गुप्त मार्ग बनाना शुरू कर दिया।

श्लोक 16

मूल: चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्ये नातिमहद्बिलम्। कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत।। (1-159-16) हिंदी अनुवाद: हे भरतवंशी जनमेजय! उस खनक ने उस भवन के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा न सही, किंतु लकड़ी के किवाड़ (कपाट) से युक्त, जमीन के बिल्कुल समतल और किसी को भी अज्ञात रहने वाला एक गुप्त मार्ग (बिल) बना दिया। व्याख्या: सुरंग का मुँह घर के भीतर ऐसी जगह छिपाकर बनाया गया था कि ऊपर से देखने पर वह जमीन बिल्कुल सामान्य लगे और किसी को उस पर शक न हो।

श्लोक 17

मूल: पुरोचनभयादेव व्यदधात्संवृतं मुखम्। स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा। तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप।। (1-159-17) हिंदी अनुवाद: पुरोचन के भय से उसने उस गुप्त मार्ग के मुख को बहुत अच्छी तरह ढँककर सुरक्षित कर दिया था। वह अशुभ बुद्धि वाला पुरोचन सदा उस घर के द्वार पर ही निवास करता था और हे राजन्! पांडव लोग भी रात के समय वहीं शस्त्रों से लैस होकर सतर्क रहते थे। व्याख्या: शत्रु ठीक दरवाजे पर पहरा दे रहा था और भीतर पांडव अपनी रक्षा और सुरंग निर्माण के कार्य में पूरी तरह सतर्कता बरत रहे थे।

श्लोक 18

मूल: दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनाद्वनम्। विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चयन्तः पुरोचनम्।। (1-159-18) हिंदी अनुवाद: पांडुपुत्र पांडव दिन के समय बिल्कुल बेफिक्र (विश्वस्त) दिखाई देते हुए, किंतु अंदर से पूरी तरह सतर्क (अविश्वस्त) रहकर, पुरोचन को चकमा देते हुए एक वन से दूसरे वन में शिकार खेलने के लिए घूमते थे। व्याख्या: पांडवों ने अपनी चाल से पुरोचन को यह विश्वास दिला रखा था कि वे साधारण जीवन जी रहे हैं, जबकि वे पूरी चतुराई से अपनी सुरक्षा की तैयारी कर रहे थे।

श्लोक 19

मूल: अतुष्टास्तुष्टवद्राजन्नूषुः परमविस्मिताः।। (1-159-19) हिंदी अनुवाद: हे राजन्! वे अंदर से बिल्कुल असंतुष्ट (संकटग्रस्त) होने पर भी बाहर से ऐसे रहते थे मानो बहुत संतुष्ट और प्रसन्न हों, तथा वे अत्यंत विस्मय के साथ वहाँ निवास कर रहे थे। व्याख्या: विकट परिस्थिति होने के बावजूद पांडवों ने गजब का मानसिक संयम और धैर्य बनाए रखा, जिससे शत्रु को उनकी किसी योजना की भनक नहीं लगी।

श्लोक 20

मूल: न चैनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः। अन्यत्र विदुरामात्यात्तस्मात्खनकसत्तमात्।। (1-159-20) हिंदी अनुवाद: विदुर जी के उस विश्वासपात्र मंत्री (खनक) के अतिरिक्त नगर का अन्य कोई भी मनुष्य पांडवों के उस रहस्य को नहीं जान सका। व्याख्या: यह योजना इतनी गोपनीय और सफलतापूर्वक क्रियान्वित की गई कि वारणावत का कोई भी नागरिक या पुरोचन इस गुप्त सुरंग और षड्यंत्र की सच्चाई को नहीं भाँप सका।

 ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि

जतुगृहपर्वणि ऊनषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः।। 159 ।।

            Previous.        index.        Next