महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत हिडिम्बवधपर्व के 165वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।
श्लोक 1 से 4 (हिडिम्ब का क्रोध में आकर वृक्ष से उतरना)
श्लोक 1:
तां विदित्वा चिरगतां हिडिम्बो राक्षसेश्वरः। अवतीर्य द्रुमात्तस्मादाजगामाशु पाण्डवान्।।
- हिन्दी अनुवाद: राक्षसेश्वर हिडिम्ब ने जब यह देखा कि उसकी बहन (हिडिम्बा) को गए बहुत देर हो गई है, तब वह उस वृक्ष से नीचे उतरकर शीघ्रता से पाण्डवों के पास आ पहुँचा।
- व्याख्या: हिडिम्बा को भीम के प्रेम में पड़े हुए और लौटने में देर होते देख हिडिम्ब का संदेह बढ़ गया और वह स्वयं क्रोध में भरकर वहाँ आ पहुँचा।
श्लोक 2:
लोहिताक्षो महाबाहुरूर्ध्वकेशो महाननः। मेघसङ्घातवर्ष्मा च तीक्ष्णदंष्ट्रो भयानकः।।
- हिन्दी अनुवाद: उसकी आँखें लाल थीं, भुजाएँ लंबी थीं, बाल ऊपर की ओर खड़े थे और उसका मुख बहुत बड़ा था। उसका शरीर बादलों के समूह के समान श्याम और विशाल था, दाँतें तीखी थीं तथा वह अत्यंत भयानक दिखाई देता था।
- व्याख्या: यहाँ हिडिम्ब के भयंकर और क्रूर रूप का वर्णन किया गया है, जो उसकी राक्षसी प्रवृत्ति को पूरी तरह उजागर करता है।
श्लोक 3:
तलं तलेन संहत्य बाहू विक्षिप्य चासकृत्। उद्वृत्तनेत्रः संक्रुद्धो दन्तान्दन्तेषु निष्कुषन्।।
- हिन्दी अनुवाद: वह बार-बार अपनी दोनों हथेलियों को आपस में पीट रहा था, भुजाओं को झटक रहा था, उसकी आँखें गुस्से से बाहर निकल रही थीं और वह क्रोध में अपने दाँतों को आपस में रगड़ रहा था।
- व्याख्या: राक्षस का यह आक्रामक हाव-भाव उसकी उग्रता और हिंसा की भूख को स्पष्ट रूप से दर्शा रहा था।
श्लोक 4:
कोऽद्य मे भोक्तुकामस्य विघ्नं चरति दुर्मतिः। न बिभेति हिडिम्बी च प्रेषिता किमनागता।।
- हिन्दी अनुवाद: "भोजन करने के लिए उत्सुक मेरे इस काम में आज कौन दुर्मति विघ्न डाल रहा है? और हिडिम्बी को जो भेजा था, वह क्यों नहीं लौटी? क्या वह मुझसे डरती नहीं है?"
- व्याख्या: हिडिम्ब बड़बड़ाते हुए सोच रहा था कि उसकी इच्छा के मार्ग में कौन रुकावट बन रहा है और उसकी बहन अभी तक क्यों नहीं आई।
श्लोक 5 से 8 (हिडिम्बा का भयभीत होकर भीम को समझाना)
श्लोक 5:
तमापतन्तं दृष्ट्वै तथा विकृतदर्शनम्। हिडिम्बोवाच वित्रस्ता भीमसेनमिदं वचः।।
- हिन्दी अनुवाद: उस प्रकार विकृत रूप में अपनी ओर आते हुए हिडिम्ब को देखकर, भयभीत हुई हिडिम्बा ने भीमसेन से यह वचन कहा—
- व्याख्या: अपने भाई को भयानक रूप में गुस्से से आते देख हिडिम्बा घबरा गई और उसने भीम को चेतावनी दी।
श्लोक 6:
आपतत्येष दुष्टात्मा संक्रुद्धः पुरुषादकः। साऽहं त्वां भ्रातृभिः सार्धं यद्ब्रवीमि तथा कुरु।।
- हिन्दी अनुवाद: "वह दुष्टात्मा और क्रोधी नर-भक्षी राक्षस तेजी से आ रहा है। इसलिए मैं आपसे जो कहती हूँ, आप अपने भाइयों के साथ वैसा ही कीजिए।"
- व्याख्या: हिडिम्बा अपनी जान बचाने और भीम व उनके परिवार की रक्षा के लिए उपाय सुझाती है।
श्लोक 7:
अहं कामगमा वीर रक्षोबलसमन्विता। आरुहेमां मम श्रोणिं नेष्यामि त्वां विहायसा।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे वीर! मैं इच्छा अनुसार कहीं भी जाने वाली (कामगामी) और राक्षसी शक्तियों से संपन्न हूँ। आप मेरी इस कटि (कमर या पीठ) पर सवार हो जाइए, मैं आपको आकाशमार्ग से सुरक्षित स्थान पर ले चलूँगी।"
- व्याख्या: हिडिम्बा अपनी अलौकिक शक्तियों के बल पर भीम को हवा में उड़ाकर सुरक्षित ले जाने का प्रस्ताव रखती है।
श्लोक 8:
प्रबोधयैतान्संसुप्तान्मातरं च परन्तप। सर्वांसि एव गमिष्यामि गृहीत्वा वो विहायसा।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे परंतप! इन गहरी नींद में सोए हुए भाइयों और माता को जगा दीजिए। मैं आप सबको साथ लेकर आकाशमार्ग से सुरक्षित ले जाऊँगी।"
- व्याख्या: वह केवल भीम ही नहीं, बल्कि कुन्ती और अन्य पांडवों को भी अपनी पीठ पर बिठाकर ले जाने की बात कहती है।
श्लोक 9 से 13 (भीम का आश्वस्त करना और हिडिम्बा का उत्तर)
श्लोक 9:
भीम उवाच। मा भैस्त्वं पृथुसुश्रोणि नैष कश्चिन्मयि स्थिते। अहमेनं हनिष्यामि पश्यन्त्यास्ते सुमध्यमे।।
- हिन्दी अनुवाद: भीम बोले— "हे सुंदर कटि और सुंदर मध्यम अंगों वाली! तुम डरो मत। मेरे यहाँ रहते हुए यह कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। हे सुमध्यमे! तुम्हारे देखते-देखते ही मैं आज इस राक्षस को मार डालूँगा।"
- व्याख्या: भीम अपने असीम बाहुबल पर पूरा भरोसा रखते हुए हिडिम्बा को ढांढस बंधाते हैं कि उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।
श्लोक 10:
नायं प्रतिबलो भीरु राक्षसापसदो मम। सोढुं युधि परिस्पन्दमथवा सर्वराक्षसाः।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे भीरु! राक्षसों में अधम यह प्राणी युद्ध में मेरे पराक्रम के वेग को सहने में बिल्कुल समर्थ नहीं है, और यदि सारे राक्षस भी आ जाए, तो भी वे मेरे सामने टिक नहीं सकते।"
- व्याख्या: भीम अपनी वीरता का परिचय देते हुए कहते हैं कि एक तो दूर की बात, यदि सारे राक्षस भी एकसाथ आ जाएं तो भी वे उनका मुकाबला करने में सक्षम हैं।
श्लोक 11:
पश्य बाहू सुवृत्तौ मे हस्तिहस्तनिभाविमौ। ऊरू परिघसङ्काशौ संहतं चाप्युरो महत्।।
- हिन्दी अनुवाद: "मेरी इन सुडौल और हाथी की सूँड के समान शक्तिशाली दोनों भुजाओं को देखो। मेरी जंघाएँ लोहे की परिघ (गदा) के समान पुष्ट हैं और मेरा यह वक्षस्थल अत्यंत विशाल एवं सुदृढ़ है।"
- व्याख्या: भीम अपने शरीर की बनावट और उसकी अपार शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अपनी शारीरिक क्षमता का बखान करते हैं।
श्लोक 12:
विक्रमं मे यथेन्द्रस्य साऽद्य द्रक्ष्यसि शोभने। माऽवमंस्थाः पृथुश्रोणि मत्वा मामिह मानुषम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे शोभने! आज तुम देवराज इंद्र के समान मेरा पराक्रम देखोगी। हे पृथुश्रोणि! मुझे केवल साधारण मनुष्य समझकर मेरी अवमानना मत करना।"
- व्याख्या: भीम हिडिम्बा से कहते हैं कि वे खुद को कमजोर या साधारण मानव न समझें, उनका पराक्रम देवताओं के समान है।
श्लोक 13:
हिडिम्보वाच। नावमन्ये नरव्याघ्र त्वामहं देवरूपिणम्। दृष्टप्रभावस्तु मया मानुषेष्वेव राक्षसः।।
- हिन्दी अनुवाद: हिडिम्बा बोली— "हे नरव्याघ्र! देवताओं के समान रूप वाले आपका मैं अपमान नहीं करती हूँ। किंतु मनुष्यों में (भीम के रूप में) मैंने इस प्रकार के राक्षस जैसे पराक्रम को देख लिया है।"
- व्याख्या: हिडिम्बा स्पष्ट करती है कि वह भीम के सामर्थ्य को जानती है और उनका कोई अपमान नहीं कर रही है।
श्लोक 14 से 21 (हिडिम्ब का क्रुद्ध होकर हिडिम्बा को डाँटना)
श्लोक 14:
तथा संजल्पतस्तस्य भीमसेनस्य भारत। वाचः शुश्राव ताः क्रुद्धो राक्षसः पुरुषादकः।।
- हिन्दी अनुवाद: हे भारत (जनमेजय)! जब भीमसेन और हिडिम्बा आपस में इस प्रकार बातें कर रहे थे, तभी उस क्रोधी नर-भक्षी राक्षस हिडिम्ब ने उनकी वे बातें सुन लीं।
- व्याख्या: हिडिम्ब जब पास पहुँचा, तो उसने भीम और अपनी बहन की बातचीत अपने कानों से सुन ली।
श्लोक 15 और 16:
अवेक्षमाणस्तस्याश्च हिडिम्बो मानुषं वपुः। स्रग्दामपूरितशिखां समग्रेन्दुनिभाननाम्।। सुभ्रूनासाक्षिकेशान्तां सुकुमारनखत्वचम्। सर्वाभरणसंयुक्तां सुसूक्ष्माम्बरधारिणीम्।।
- हिन्दी अनुवाद: हिडिम्ब ने जब देखा कि उसकी बहन ने सुंदर मानवीय रूप धारण कर रखा है— जिसके बालों में फूलों की मालाएँ सजी हैं, जिसका मुख पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सुंदर है, जिसकी भौहें, नाक, आँखें और केश अत्यंत मनमोहक हैं, जिसके नाखून और त्वचा सुकुमार हैं, जो सभी आभूषणों से सजी है और बारीक वस्त्र धारण किए हुए है...
श्लोक 17:
तां तथा मानुषं रूपं बिभ्रतीं सुमनोहरम्। पुंस्कामां शङ्कमानश्च चुक्रोध पुरुषादकः।।
- हिन्दी अनुवाद: ...इस प्रकार स्त्री के उस अत्यंत मनोहर और मानवी रूप को धारण किए हुए तथा परपुरुष (भीम) की कामना करने वाली अपनी बहन को देखकर वह नर-भक्षी राक्षस शंकित हुआ और भयंकर रूप से क्रोधित हो उठा।
- व्याख्या: बहन को मनुष्य रूप में और एक परपुरुष पर आसक्त देखकर हिडिम्ब का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
श्लोक 18:
संक्रुद्धो राक्षसस्तस्या भगिन्याः कुरुसत्तम। उत्फाल्य विपुले नेत्रे ततस्तामिदमब्रवीत्।।
- हिन्दी अनुवाद: हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ! अपनी उस बहन पर अत्यधिक क्रोधित होकर और अपनी बड़ी-बड़ी आँखों को फाड़कर उस राक्षस ने उससे यह कहा—
- व्याख्या: हिडिम्ब ने गुस्से में अपनी आँखें तरेरी और अपनी बहन को बुरा-भला कहना शुरू कर दिया।
श्लोक 19:
को हि मे भोक्तुकामस्य विघ्नं चरति दुर्मतिः। न बिभेषि हिडिम्बे किं मत्कोपाद्विप्रमोहिता।।
- हिन्दी अनुवाद: "भोजन करने के लिए उत्सुक मेरे इस काम में आज कौन दुर्मति विघ्न डाल रहा है? हे हिडिम्बे! क्या तू मेरे क्रोध से विचलित नहीं है और मुझसे बिल्कुल नहीं डरती?"
- व्याख्या: राक्षस अपनी बहन से सवाल करता है कि वह उसके आदेश की अवहेलना करने का दुस्साहस कैसे कर रही है।
श्लोक 20:
धिक्त्वामसति पुंस्कामे मम विप्रियकारिणि। पूर्वेषां राक्षसेन्द्राणां सर्वेषामयशस्करि।।
- हिन्दी अनुवाद: "परपुरुष की कामना करने वाली, मेरा अनिष्ट करने वाली और हमारे समस्त पूर्ववर्ती राक्षसेश्वरों के यश को कलंकित करने वाली हे असती (दुराচারী) बहन! तुझे धिक्कार है!"
- व्याख्या: हिडिम्ब अपनी बहन को कुल का कलंक और अज्ञाकारी कहकर अपमानित करता है।
श्लोक 21:
यानिमानाश्रिताऽकार्षीर्विप्रियं समुहन्मम। एष तानद्य वै सर्वान्हनिष्यामि त्वया सह।।
- हिन्दी अनुवाद: "तूने इन मनुष्यों का आश्रय लेकर जो मेरा यह बड़ा अप्रिय कार्य किया है, इसलिए आज मैं इन सभी को और तेरे सहित तुझे भी यहीं मौत के घाट उतार दूंगा!"
- व्याख्या: क्रोध के आवेश में हिडिम्ब ने पांडवों के साथ-साथ अपनी बहन को भी जान से मारने की धमकी दी।
श्लोक 22 से 24 (हिडिम्ब का आक्रमण और भीम की ललकार)
श्लोक 22:
एवमुक्त्वा हिडिम्बां स हिडिम्बो लोहितेक्षणः। वधायाभिपपातैनान्दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन्।।
- हिन्दी अनुवाद: लाल आँखों वाले उस हिडिम्ब ने हिडिम्बा से ऐसा कहकर और अपने दाँतों को आपस में रगड़ते हुए, उन सबका वध करने के लिए तेजी से आक्रमण किया।
- व्याख्या: अपनी बहन और पांडवों को मारने के लिए राक्षस पूरी तरह आक्रामक होकर उनकी ओर झपटा।
श्लोक 23:
गर्जन्तमेवं विजने भीमसेनोऽभिवीक्ष्य तम्। रक्षन्प्रबोधं भ्रातॄणां मातुश्च परवीरहा।।
- हिन्दी अनुवाद: शत्रुओं के वीरों का नाश करने वाले भीमसेन ने उस निर्जन वन में इस प्रकार गरजते हुए आते हुए उस राक्षस को देखा, और साथ ही यह भी ध्यान रखा कि उनके सोते हुए भाई और माता की नींद में कोई खलल न पड़े।
- व्याख्या: भीम ने यह सुनिश्चित किया कि युद्ध का शोर इतना न हो कि उनके थके हुए भाई और माता अचानक जाग जाएं, और वे खुद अकेले ही उससे निपटने के लिए तैयार हो गए।
श्लोक 24:
तमापतान्तं संप्रेक्ष्य भीमः प्रहरतां वरः। भर्त्सयामास तेजस्वी तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्।।
- हिन्दी अनुवाद: प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ और तेजस्वी भीमसेन ने अपनी ओर दौड़ते हुए आते हुए उस राक्षस को देखकर उसे ललकारा और कहा— "ठहर! ठहर!"
- व्याख्या: भीम ने पूरी निडरता के साथ राक्षस को चुनौती दी और उसे अपनी सीमा में रहने को कहा।
श्लोक 25 से 36 (भीम द्वारा राक्षस को चेतावनी और ललकार)
श्लोक 25:
भीमसेनस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं प्रहसन्निव। भगिनीं प्रति सङ्क्रुद्धमिदं वचनमब्रवीत्।।
- हिन्दी अनुवाद: भीमसेन ने उस राक्षस को देखकर मानो हँसते हुए, अपनी बहन के प्रति क्रोधित हुए उस राक्षस से यह वचन कहा—
- व्याख्या: भीम उस राक्षस के गुस्से को कोई महत्व न देते हुए मुस्कुराए और उससे बात करने लगे।
श्लोक 26:
किं ते हिडिम्ब एतैर्वा सुखसुप्तैः प्रबोधितैः। मामासादय दुर्बुद्धे तरसा त्वं नराशन।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे हिडिम्ब! सुख से सोए हुए इन लोगों को जगाने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है? हे दुर्बुद्धि नर-भक्षी! यदि तुममें बल है, तो तुम सीधे मुझ पर आक्रमण करो!"
- व्याख्या: भीम ने राक्षस का ध्यान सोते हुए परिवार से हटाकर अपनी ओर आकर्षित किया ताकि वे सुरक्षित सोते रहें।
श्लोक 27:
मय्येव प्रहरैहि त्वं न स्त्रियं हन्तुमर्हसि। विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति।।
- हिन्दी अनुवाद: "तुम मुझ पर ही प्रहार करो। तुम किसी स्त्री (अपनी बहन) की हत्या करने के अधिकारी नहीं हो, विशेषकर तब जब उसने तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं किया है, बल्कि दूसरों (हम पर) के आने से यह स्थिति बनी है।"
- व्याख्या: भीम ने हिडिम्बा की रक्षा करते हुए कहा कि वह अपनी ही बहन पर हाथ न उठाए, यदि हिम्मत है तो उससे (भीम से) युद्ध करे।
श्लोक 28, 29 और 30:
न हीयं स्ववशा बाला कामयत्यद्य मामिह। चोदितैषा ह्यनङ्गेन शरीरान्तरचारिणा।। भगिनी तव दुर्वृत्त रक्षसां वै यशोहर। त्वन्नियोगेन चैवेयं रूपं मम समीक्ष्य च।। कामयत्यद्य मां भीरुस्तव नैषापराध्यति। अनङ्गेन कृते दोषे नेमां गर्हितुमर्हसि।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे दुर्वृत्त राक्षस! राक्षसों का यश मिटाने वाले! यह बालिका अपने वश में नहीं है, बल्कि शरीर के भीतर संचार करने वाले कामदेव की प्रेरणा से यह आज मुझ पर आसक्ति रख रही है। तुम्हारे ही नियोग से (तुम्हारे कहने पर ही) यह यहाँ आई थी और मेरा रूप देखकर यह भीरु स्त्री आज मुझ से प्रेम करने लगी है। इसमें इसका कोई अपराध नहीं है। कामदेव द्वारा उत्पन्न किए गए इस दोष के लिए तुम्हें इसे कोसना नहीं चाहिए।"
- व्याख्या: भीम ने बहुत ही न्यायसंगत बात कही कि हिडिम्बा का प्रेम स्वाभाविक है और इसके लिए भाई को उस पर गुस्सा नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31:
मयि तिष्ठति दुष्टात्मन्न स्त्रियं हन्तुमर्हसि। संगच्छस्व मया सार्धमेकेनैको नराशन।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे दुष्टात्मा नर-भक्षी! मेरे यहाँ जीवित रहते हुए तुम किसी स्त्री की हत्या नहीं कर सकते। यदि में दम है, तो तुम अकेले हो और मैं अकेला हूँ, तुम आकर मेरे साथ युद्ध करो।"
- व्याख्या: भीम ने एक-एक की लड़ाई (द्वंद्वयुद्ध) का प्रस्ताव रखकर राक्षस को अपने साथ लड़ने के लिए ललकारा।
श्लोक 32 (क, ख, ग):
अहमेको गमिष्यामि त्वामद्य यमसादनम्। अद्य मद्बलनिष्पिष्टं शिरो राक्षस दीर्यताम्। कुञ्जरस्येव पादेन विनिष्पिष्टं बलीयसाः।।
- हिन्दी अनुवाद: "आज मैं अकेला ही तुम्हें यमराज के घर पहुँचा दूँगा। जैसे शक्तिशाली हाथी अपने पैर से किसी जीव को कुचल डालता है, वैसे ही आज मेरे बल से तुम्हारा सिर कुचलकर चूर-चूर हो जाना चाहिए।"
- व्याख्या: भीम अपनी शक्ति का घमंड तोड़ने के लिए राक्षस को आश्वस्त करते हैं कि आज उसका अंत निश्चित है।
श्लोक 33:
अद्य गात्राणि ते कङ्काः श्येना गोमायवस्तथा। कर्षन्तु भुवि संहृष्टा निहतस्य मया मृधे।।
- हिन्दी अनुवाद: "युद्ध में आज मेरे द्वारा मारे जाने के बाद तुम्हारे इन अंगों को कंक (गिद्ध), बाज और गीदड़ आनंदित होकर पृथ्वी पर खींचकर खाएंगे।"
- व्याख्या: भीम राक्षस को उसकी भयानक मृत्यु और उसकी दुर्गति का दृश्य शब्दों में चित्रित करते हैं।
श्लोक 34:
क्षणेनाद्य करिष्येऽहमिदं वनमराक्षसम्। पुरा यद्दूषितं नित्यं त्वया भक्षयता नरान्।।
- हिन्दी अनुवाद: "तुम नित्य मनुष्यों को खाकर जिस वन को हमेशा दूषित करते रहे हो, आज मैं क्षण भर में ही इस वन को राक्षसों से रहित (अराक्षस) कर दूंगा।"
- व्याख्या: भीम संकल्प लेते हैं कि वे इस दुष्ट राक्षस का वध करके इस पूरे जंगल को इंसानों के लिए सुरक्षित बना देंगे।
श्लोक 35:
अद्य त्वां भगिनी रक्षः कृष्यमाणं मयाऽसकृत्। द्रक्ष्यत्यद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाद्विपम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "पहाड़ के समान विशालकाय और तुम्हें आज मेरे द्वारा बार-बार वैसे ही खींचा और घसीटा जाएगा, जैसे कोई सिंह किसी बड़े हाथी को खींचता है। तुम्हारी यह बहन आज तुम्हें यह सब देखेगी।"
- व्याख्या: भीम अपनी ताकत का अहसास कराते हुए कहते हैं कि वे राक्षस को हाथी की तरह खींचकर पटक देंगे।
श्लोक 36:
निराबाधास्त्वयि हते मया राक्षसपांसन। वनमेतच्चरिष्यन्ति पुरुषा वनचारिणः।।
- हिन्दी अनुवाद: "हे कुल को कलंकित करने वाले राक्षस! तुम्हारे मारे जाने पर वन में घूमने वाले मनुष्य बिना किसी बाधा और भय के इस वन में विचरण कर सकेंगे।"
- व्याख्या: भीम का यह उद्देश्य केवल अपना बचाव नहीं, बल्कि समाज से एक बड़े आतंक का सफाया करना भी था।
श्लोक 37 से 40 (हिडिम्ब का प्रतिउत्तर)
श्लोक 37:
हिडिम्ब उवाच। गर्जितेन वृथा किं ते कत्थितेन च मानुष। कृत्वैतत्कर्मणा सर्वं कत्थेया मा चिरं कृथाः।।
- हिन्दी अनुवाद: हिडिम्ब बोला— "हे मनुष्य! व्यर्थ में इस प्रकार गरजने और डींग हाँकने से क्या लाभ? यदि तुम में दम है, तो पहले यह सब कार्य करके दिखाओ, फिर डींग हाँकना। इसमें अब अधिक देर मत करो!"
- व्याख्या: राक्षस भीम की बातों से और अधिक भड़क गया और उसने बिना देर किए युद्ध शुरू करने की बात कही।
श्लोक 38:
बलिनं मन्यसे यच्चाप्यात्मानं सपराक्रमम्। ज्ञास्यस्यद्य समागम्य मयात्मानं बलाधिकम्।। तुम अपने आपको बहुत बलवान और पराक्रमी मानते हो, किंतु आज मुझसे भिड़कर तुम जान जाओगे कि हम दोनों में से अधिक बलवान कौन है।"
- व्याख्या: हिडिम्ब अपने बल पर घमंड करते हुए भीम को चुनौती देता है कि युद्ध के मैदान में असली ताकत का पता चल जाएगा।
श्लोक 39:
न तावदेतान्हिंसिष्ये स्वपन्त्वेते यथासुखम्। एष त्वामेव दुर्बुद्धे निहन्म्यद्याप्रियंवदम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "अभी मैं इन सोए हुए लोगों की हत्या नहीं करूँगा, ये लोग सुख से सो रहे हैं। हे दुर्बुद्धि अप्रिय बोलने वाले! आज मैं केवल पहले तुम्हारा ही वध करूँगा।"
- व्याख्या: राक्षस कहता है कि वह फिलहाल सो रहे पांडवों को नहीं मारेगा, पहले वह भीम का अहंकार तोड़ेगा।
श्लोक 40:
पीत्वा तवासृग्गात्रेभ्यस्ततः पश्चादिमानपि। हनिष्यामि ततः पश्चादिमां विप्रियकारिणीम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "तुम्हारे शरीर के अंगों से तुम्हारा सारा खून पीने के बाद, इसके बाद इन बाकी लोगों को मारूँगा, और अंत में इस मेरा अनिष्ट करने वाली (अपनी बहन) को भी मौत के घाट उतार दूंगा।"
- व्याख्या: हिडिम्ब अपनी क्रूरता का परिचय देते हुए सभी को एक-एक करके मारने की अपनी योजना बताता है।
श्लोक 41 से 51 (भीम और हिडिम्ब का भयंकर द्वंद्वयुद्ध)
श्लोक 41:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा ततो बाहुं प्रगृह्य पुरुषादकः। अभ्यद्रवत संक्रुद्धो भीमसेनमरिन्दमम्।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— ऐसा कहकर उस नर-भक्षी राक्षस ने अपनी भुजाओं को ऊपर उठाया और अत्यधिक क्रोध में भरकर शत्रुओं का दमन करने वाले भीमसेन की ओर दौड़ पड़ा।
- व्याख्या: दोनों के बीच बातचीत समाप्त होते ही हिडिम्ब ने भीम पर सीधा हमला बोल दिया।
श्लोक 42:
तस्याभिद्रवतस्तूर्णं भीमो भीमपराक्रमः। वेगेन प्रहितं बाहुं निजग्राह हसन्निव।।
- हिन्दी अनुवाद: उसकी ओर अत्यंत वेग से दौड़ते हुए आ रहे उस राक्षस की उस भुजा को, भीमपराक्रमी भीमसेन ने ऐसे पकड़ लिया मानो वे हँस रहे हों।
- व्याख्या: भीम ने राक्षस के हमले को पूरी सहजता और ताकत के साथ हवा में ही रोक लिया।
श्लोक 43:
निगृह्य तं बलाद्भीमो विस्फुरन्तं चकर्ष ह। तस्माद्देशाद्धनूंष्यष्टौ सिंहः क्षुद्रमृगं यथा।।
- हिन्दी अनुवाद: बलपूर्वक उस छटपटाते हुए राक्षस को पकड़कर भीम ने उसे उस स्थान से आठ धनुष की दूरी पर वैसे ही खींच लिया, जैसे कोई सिंह किसी छोटे मृग को खींच लेता है।
- व्याख्या: भीम ने अपनी असीम ताकत से राक्षस को पकड़कर दूर घसीट लिया, जिससे साबित हुआ कि भीम का बल उससे कहीं अधिक है।
श्लोक 44:
ततः स राक्षसः क्रुद्धः पाण्डवेन बलार्दितः। भीमसेनं समालिङ्ग्य व्यनदद्भैरवं रवम्।।
- हिन्दी अनुवाद: पाण्डव (भीम) द्वारा बल से पीड़ित किया गया वह क्रोधी राक्षस तब भीमसेन को कसकर गले लगाकर (बाँहों में जकड़कर) एक भयानक चीत्कार करने लगा।
- व्याख्या: राक्षस ने अपनी ओर से भीम को जकड़ने का प्रयास किया और जंगल को डराने वाली भयानक आवाज निकाली।
श्लोक 45 और 46:
पुनर्भीमो बलादेनं विचकर्ष महाबलः। मा शब्दः सुखसुप्तानां भ्रातॄणां मे भवेदिति।। `हस्ते गृहीत्वा तद्रक्षो दूरमन्यत्र नीतवान्। पृच्छे गृहीत्वा तुण्डेन गरुडः पन्नगं यथा।।'
- हिन्दी अनुवाद: महाबली भीम ने फिर से बलपूर्वक उसे खींच लिया, ताकि उनके सुख से सोए हुए भाइयों की नींद में कोई बाधा न पड़े। (हाथ से पकड़कर उस राक्षस को वे ऐसे दूर दूसरी जगह ले गए, जैसे गरुड़ पक्षी अपनी चोंच में किसी साँप को पकड़कर ले जाता है)।
- व्याख्या: भीम इस बात का पूरा ध्यान रख रहे थे कि युद्ध का शोर पांडवों तक न पहुँचे, इसलिए वे राक्षस को घसीटते हुए काफी दूर ले गए।
श्लोक 47:
अन्योन्यं तौ समासाद्य विचकर्षतुरोजसा। हिडिम्बो भीमसेनश्च विक्रमं चक्रतुः परम्।।
- हिन्दी अनुवाद: उन दोनों (हिडिम्ब और भीमसेन) ने एक-दूसरे के पास आकर अपने तेज और बल से एक-दूसरे को खींचना शुरू किया और अपना पराक्रम दिखाया।
- व्याख्या: दोनों महाबलियों के बीच शारीरिक शक्ति का जबरदस्त संघर्ष शुरू हो गया।
श्लोक 48, 49 और 50:
बभञ्जतुस्तदा वृक्षाँल्लताश्चाकर्षतुस्तदा। मत्ताविव चं संरब्धौ वारणौ षष्टिहायनौ।। `पादपानुद्धरन्तौ तावूरुवेगेन वेगितौ। स्फोटयन्तौ लताजालान्यूरुभ्यां गृह्य सर्वशः।। वित्रासयन्तौ तौ शब्दैः सर्वतो मृगपक्षिणः। बलेन बलिनौ मत्तावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ।।
- हिन्दी अनुवाद: साठ वर्ष की आयु वाले दो मतवाले हाथियों के समान क्रुद्ध हुए वे दोनों उस समय पेड़ों को तोड़ने लगे और लताओं को खींचने लगे। अपनी जंघाओं के वेग से प्रेरित होकर वे पेड़ों को उखाड़ रहे थे, अपनी जाँघों और बाहों से लताओं के जालों को चारों तरफ से तोड़ रहे थे। अपनी गर्जना से वे चारों तरफ के पशु-पक्षियों को भयभीत कर रहे थे। बलवानों में श्रेष्ठ, मदमस्त और एक-दूसरे का वध करने की इच्छा रखने वाले वे दोनों युद्ध कर रहे थे।
- व्याख्या: दोनों के युद्ध का यह दृश्य ऐसा था मानो दो विशालकाय मस्त हाथी आपस में लड़ रहे हों, जिससे पूरा जंगल हिल रहा था।
श्लोक 51:
भीमराक्षसयोर्युद्धं तदाऽवर्तत दारुणम्। पुरा देवासुरे युद्धे वृत्रवासवयोरिव।।
- हिन्दी अनुवाद: उस समय भीम और राक्षस का वह भयंकर युद्ध ऐसे हो रहा था, जैसे प्राचीन काल में देवासुर संग्राम में वृत्रासुर और इंद्र (वासव) के बीच हुआ था।
- व्याख्या: महाभारतकार ने इस युद्ध की तुलना पौराणिक देव-असुर संग्राम से करके इसकी भव्यता और भीषणता को दर्शाया है।
श्लोक 52 से 62 (वृक्षों और चट्टानों से भीषण युद्ध तथा पांडवों का जागना)
श्लोक 52, 53 और 54:
भङूक्त्वा वृक्षान्महाशाखांस्ताडयामासतुः क्रुधा। सालतालतमालाम्रवटार्जुनविभीतकान्।। न्यग्रोधप्लक्षखर्जूरपनसानश्मकण्टकान्। एतानन्यान्महावृक्षानुत्खाय तरसाऽखिलान्।। उत्क्षिप्यान्योन्यरोषेण ताडयामासतू रणे। यदाऽभवद्वनं सर्वं निर्वृक्षं वृक्षसङ्कुलम्।।
- हिन्दी अनुवाद: क्रोध में भरकर बड़े-बड़े पेड़ों की शाखाओं को तोड़कर वे एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। शाल, ताल, तमाल, आम, वट, अर्जुन, बहेड़ा, वटवृक्ष (न्यग्रोध), पाकर (प्लक्ष), खजूर, कटहल और कँटेले वृक्षों तथा अन्य सभी महावृक्षों को वेग से उखाड़कर, आपसी रोष के कारण हवा में उछाल-उछाल कर वे रणक्षेत्र में एक-दूसरे को मारने लगे। देखते ही देखते वह पूरा घना वन पेड़ों से विहीन (साफ) होने लगा।
- व्याख्या: युद्ध इतना भीषण था कि उन्होंने हथियारों की जगह बड़े-बड़े पेड़ों को उखाड़कर एक-दूसरे पर गदा की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
श्लोक 55 और 56:
तदा शिलाश्च कुञ्जांश्च वृक्षान्कण्टकिनस्तथा। ततस्तौ गिरिशृङ्गाणि पर्वतांश्चाभ्रलेलिहान्।। शैलांश्च गण्डपाषाणानुत्खायादाय वैरिणौ। चिक्षेपतुरुपर्याजावन्योन्यं विजयेषिणौ।।
- हिन्दी अनुवाद: जब पेड़ समाप्त होने लगे, तब वे शत्रु बने दोनों योद्धा बड़ी-बड़ी शिलाओं, झाड़ियों, कँटेले पेड़ों, पर्वत शिखरों, बादलों को छूने वाले पर्वतों और विशाल चट्टानों (गण्डपाषाण) को उखाड़-उखाड़कर विजय की इच्छा से एक-दूसरे के ऊपर फेंकने लगे।
- व्याख्या: पेड़ों के बाद उन्होंने पहाड़ों की चट्टानों और शिलाओं को उखाड़कर एक-दूसरे पर प्रहार करना शुरू कर दिया, जिससे युद्ध और अधिक भयंकर हो गया।
श्लोक 57 और 58:
तद्वनं परितः पञ्चयोजनं निर्महीरुहम्। निर्मलतागुल्मपाषाणं निर्मृगं चक्रतुर्भृशम्।। तयोर्युद्धेन राजेन्द्र तद्वनं भीमरक्षसोः। मुहूर्तेनाभवत्कूमर्पृष्ठवच्छ्लक्ष्णमव्ययम्।।
- हिन्दी अनुवाद: हे राजेन्द्र! भीम और राक्षस के उस भयंकर युद्ध ने उस वन के चारों ओर पाँच योजन के दायरे को पूरी तरह पेड़ों से रहित, लताओं, झाड़ियों, पत्थरों और पशु-पक्षियों से शून्य कर दिया। उन दोनों के युद्ध से वह पूरा वन एक ही मुहूर्त में कछुए की पीठ के समान बिल्कुल चिकना और समतल हो गया।
- व्याख्या: दोनों के बीच इतना भयंकर और विध्वंसकारी संघर्ष हुआ कि पाँच योजन का पूरा जंगल साफ होकर मैदान में बदल गया।
श्लोक 59 और 60:
ऊरुबाहुपरिक्लेशात्कर्षन्तावितरेतरम्। उत्कर्षन्तौ विकर्षन्तौ प्रकर्षन्तौ परस्परम्।। तौ स्वनेन विना राजन्गर्जन्तौ च परस्परम्। पाषाणसंघट्टनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः।।
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! अपनी जाँघों और भुजाओं के श्रम से वे एक-दूसरे को खींच रहे थे, ऊपर उठा रहे थे, पटक रहे थे और आपस में भिड़ रहे थे। बिना किसी शस्त्र के केवल गर्जना करते हुए वे पत्थरों के टकराने जैसी भारी आवाज़ वाले प्रहारों से एक-दूसरे को पीट रहे थे।
- व्याख्या: दोनों महाबली निहत्थे होकर भी अपनी मांसपेशियों और चट्टानों जैसे शरीर के प्रहारों से एक-दूसरे को चुनौती दे रहे थे।
श्लोक 61 (क, ख, ग):
अन्योन्यं च समालिङ्ग्य विकर्षन्तौ परस्परम्। बाहुयुद्धमभूद्धोरं बलिवासवयोरिव। युद्धसंरम्भनिर्गच्छत्फूत्काररवनिस्वनम्।।
- हिन्दी अनुवाद: एक-दूसरे को बाँहों में जकड़कर खींचते हुए उनका वह बाहुयुद्ध उतना ही घोर था, जितना बलि और इंद्र का हुआ था। उस युद्ध के जोश और संघर्ष से उनके मुँह से तेज 'फूत्कार' (साँसों की गहरी आवाज) जैसी ध्वनियाँ निकल रही थीं।
- व्याख्या: बाहुयुद्ध की यह पराकाष्ठा थी, जहाँ साँसों की और शरीर के टकराने की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दे रही थी।
श्लोक 62:
तयोः शब्देन महता विबुद्धास्ते नरर्षभाः। सह मात्रा च ददृशुर्हिडिम्बामग्रतःस्थिताम्।।
- हिन्दी अनुवाद: उन दोनों के उस महान और भयंकर शब्द (कोलाहल) से वे श्रेष्ठ पुरुष (पांडव) माता कुन्ती के साथ जाग गए और उन्होंने अपने सामने हिडिम्बा को खड़े हुए देखा।
- व्याख्या: अंततः युद्ध के इस भारी शोर के कारण पांडवों और माता कुन्ती की नींद खुल गई, और उन्होंने उठकर सामने हिडिम्बा को देखा।
