महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८७

महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८७

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 187वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 5 (अर्जुन का प्रश्न और गंधर्व चित्ररथ द्वारा कथा का आरंभ)

श्लोक 1 और 2:

अर्जुन उवाच। तापत्य इति यद्वाक्यमुक्तवानसि मामिह। तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थं विनिश्चितम्।। तपती नाम का चैषा तापत्या Yत्कृते वयम्। कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: अर्जुन बोले— "हे साधु (गंधर्व)! आपने मुझे अभी जो 'तापत्य' कहकर संबोधित किया था, उस 'तापत्य' शब्द का क्या अर्थ है, मैं उसे निश्चित रूप से जानना चाहता हूँ। हे कौंतेय (अर्जुन अपने लिए कहते हैं या गंधर्व को संबोधित करते हुए— हे साधु!) यह तापती नाम की कौन है, जिसके कारण हम लोगों को 'तापत्य' कहा गया? मैं इसके तत्त्व को भली-भांति जानना चाहता हूँ।"
  • व्याख्या: पिछले अध्याय में गंधर्व द्वारा खुद को 'तापत्य' (तपती का वंशज/पुत्र) कहे जाने पर अर्जुन के मन में जिज्ञासा जागी, और वे इसके मूल इतिहास के बारे में पूछते हैं।

श्लोक 3, 4 और 5:

वैशंपायन उवाच। एवंमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनञ्जयम्। विश्रुतं त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम्।। हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम्। यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर।। उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद्वचः। तत्तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— कुन्तीपुत्र धनंजय द्वारा ऐसा पूछे जाने पर, तीनों लोकों में विख्यात उस गंधर्व (चित्ररथ) ने उन्हें वह कथा सुनाई। गंधर्व बोला— "हे पार्थ! हे सभी बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! मैं तुम्हें यह मनोरमा (मन को मोहने वाली) संपूर्ण कथा ज्यों-की-त्यों सुनाता हूँ। मैंने जिस कारण से तुम्हें 'तापत्य' कहा था, वह सब तुम्हें बताता हूँ, तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।"
  • व्याख्या: चित्ररथ गंधर्व अर्जुन के अनुरोध पर कुरु वंश की उत्पत्ति से जुड़ी देवी तपती और राजा संवरण की यह पौराणिक कथा सुनाना शुरू करता है।

श्लोक 6 से 11 (सूर्य पुत्री तपती का परिचय और राजा संवरण की तपस्या)

श्लोक 6, 7, 8 और 9:

य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा। एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता।। विवस्वतो वै देवस्य सावित्र्यवरजा विभो। विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता।। न देवी नासुरी चैव न यक्षी न C राक्षसी। नाप्सरा न C गन्धर्वी तथा रूपेण काचन।। सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसितायतलोचना। स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी।।

  • हिन्दी अनुवाद: "जो यह सूर्य (विवस्वान् देव) अपने तेज से अपने स्थान पर आकाश को व्याप्त कर रहे हैं, इन्हीं विभु देवता की 'तपती' नाम की एक गुणवती पुत्री हुई। सावित्री की छोटी पुत्री और तीनों लोकों में विश्रुत वह तपती महातेजस्वी और तपस्या से युक्त थी। रूप के मामले में न तो कोई देवी, न असुरी, न यक्षी, न राक्षसी, न अप्सरा और न ही कोई गंधर्वी उसके जैसी थी। वह सुविभक्त एवं दोषरहित अंगों वाली, सुंदर व काले बड़े नेत्रों वाली, उत्तम आचार-विचार वाली, साध्वी, सुंदर वेशभूषा से युक्त और कांतिवती भामिनी थी।"
  • व्याख्या: गंधर्व सूर्य देव की परम रूपवती और तपस्विनी पुत्री 'तपती' का दिव्य सौंदर्य और व्यक्तित्व का वर्णन करता है।

श्लोक 10 और 11:

त तस्याः सदृशं कंचित्त्रिषु लोकेषु भारत। भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः।। संप्राप्तयौवनां पश्यन्देयां दुहितरं तु ताम्। `द्व्यष्टवर्षां तु तां श्यामां सविता रूपशालिनीम्।' नोपलेभे ततः शान्तिं संप्रदानं विचिन्तयन्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे भारत! सूर्य भगवान ने रूप, शील, गुण और विद्या (श्रुत) में उस कन्या के योग्य किसी भी पति को तीनों लोकों में नहीं पाया। जब उन्होंने अपनी उस रूपशालिनी, सोलह वर्ष की श्यामा पुत्री को यौवन को प्राप्त होते देखा और उसके कन्यादान के विषय में विचार किया, तब वे इसके उचित वर की चिंता के कारण जरा भी शांति नहीं पा रहे थे।"
  • व्याख्या: सूर्य देव अपनी अत्यंत सुंदर पुत्री तपती के लिए योग्य वर की तलाश में चिंतित थे, क्योंकि तीनों लोकों में उसके समान कोई पुरुष उन्हें नहीं दिख रहा था।

श्लोक 12, 13 और 14:

अथर्क्षपुत्रः क्रान्तेय कुरूणामृषभो बली। सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा।। अर्ध्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः। नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि।। सुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दन। अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तदनंतर क्र्सुपुत्र (ऋक्षराज के पुत्र), कुरुवंशियों में श्रेष्ठ और बलवान राजा संवरण ने सूर्य भगवान की आराधना करना आरंभ किया। वे पवित्र होकर नियत नियमों, उपवासों और विभिन्न प्रकार की तपस्याओं के साथ अर्ध्य, माला, उपहार तथा गंध आदि से सूर्य की पूजा करते थे। हे पौरवनंदन अर्जुन! वे अहंकाररहित, पवित्र और सेवाभावी राजा संवरण प्रतिदिन उदय होते हुए अंशुमान (सूर्य) की भक्तिभाव से पूजा करते थे।"
  • व्याख्या: कुरु वंश के प्रतापी राजा संवरण ने सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या और उनकी सेवा-पूजा की।

श्लोक 15 से 20 (सूर्य देव द्वारा संवरण को तपती का दान देना)

श्लोक 15, 16 और 17:

ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि। तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम्।। दातुमैच्छत्ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम्। नृपोत्तमाय कौरव्य विश्रुताभिजनाय च।। यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा। तथा भुवि महिपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तदनंतर सूर्य देव ने कृतज्ञ, धर्मज्ञ, पृथ्वी पर रूप में अद्वितीय और अपनी पुत्री तपती के पूर्णतः योग्य राजा संवरण को ही उसका पति माना। हे कौरव्य! तब उन्होंने उस विश्रुत कुल में उत्पन्न हुए नृपोत्तम संवरण को ही अपनी वह कन्या दान करने की इच्छा की। जिस प्रकार आकाश में सूर्य अपने तेज से प्रकाश फैलाते हैं, उसी प्रकार पृथ्वी पर वे महिपाल संवरण अपने तेज से सुशोभित हो रहे थे।"
  • व्याख्या: राजा संवरण के गुणों और तपस्या से संतुष्ट होकर सूर्य देव ने अपनी पुत्री तपती का विवाह उनके साथ करने का निर्णय लिया।

श्लोक 18, 19 और 20:

यथाऽर्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः। तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः।। स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा। बभूव नृपतिः श्रीमान्सुहृदां दुर्हृदामपि।। एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव। तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे पार्थ! ब्रह्मवादी जिस प्रकार उदय होते हुए आदित्य (सूर्य) की पूजा करते हैं, उसी प्रकार प्रजा के लोग राजा संवरण का आदर करते थे। वे श्रीमान् राजा अपनी कांति के कारण चंद्रमा से भी अधिक कांत (सुंदर) और अपने तेज से सूर्य के समान थे, जो मित्रों के लिए सुखद और शत्रुओं के लिए भयंकर थे। हे कौरव! ऐसे गुणों से युक्त और सदाचार वाले उन राजा संवरण को ही स्वयं तपन (सूर्य) ने अपनी पुत्री तपती को सौंपने का मन बना लिया।"
  • व्याख्या: राजा संवरण के अद्वितीय गुणों, तेज और लोकप्रियता को देखकर सूर्य देव ने स्वयं अपनी पुत्री उन्हें देने का निश्चय किया।

श्लोक 21 से 27 (राजा संवरण का वन में शिकार खेलना और तपती के दर्शन करना)

श्लोक 21, 22 और 23:

स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः। चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल।। चरतो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः। ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः।। स मृताश्वश्चरन्पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः। ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे पार्थ! एक समय वे अमितविक्रम श्रीमान् राजा संवरण पर्वतों के उपवनों में शिकार खेलने के लिए गए। शिकार खेलते हुए भूख और प्यास से पीड़ित हुए उन राजा का वह अप्रतिम (उत्तम) घोड़ा पर्वत पर ही मर गया। हे कौंतेय! घोड़े के मर जाने पर वे राजा पर्वत पर पैदल ही विचर रहे थे, तभी उन्होंने लोक में अद्वितीय (अतुलनीय रूप वाली) एक विशाल नेत्रों वाली कन्या को देखा।"
  • व्याख्या: शिकार खेलते समय राजा संवरण का घोड़ा मर गया, और वे पैदल ही जंगल में घूम रहे थे जहाँ उनकी भेंट अचानक देवी तपती से हुई।

श्लोक 24, 25 और 26:

स एव एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः। तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः।। स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम्। पुनः संतर्कयामास रवेर्भ्रष्टामिव प्रभाम्।। वपुषा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः। प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवामलाम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "पर शत्रुओं का मर्दन करने वाले उन नृपतिशार्दूल (संवरण) ने उस अकेली कन्या के पास पहुँचकर एकटक (बिना पलक झपकाए) उसे देखते हुए खड़े हो गए। उस राजा ने रूप के आधार पर पहले तो यही सोचा कि यह कोई साक्षात श्री (लक्ष्मी) है; फिर उन्होंने विचार किया कि यह सूर्य (रवि) के मंडल से भ्रष्ट हुई (अलग हुई) कोई प्रभा (किरण) है। वह अपने शरीर के वर्चस से अग्नि की शिखा जैसी और प्रसन्नता व कांति से चंद्रमा की निर्मल रेखा जैसी प्रतीत हो रही थी।"
  • व्याख्या: राजा संवरण तपती के अलौकिक और दिव्य सौंदर्य को देखकर मुग्ध हो गए और सोचते रह गए कि यह कोई देवी या अप्सरा है।

श्लोक 27 और 28:

गिरिपृष्ठे तु सा Yस्मिन्स्थिता स्वसितलोचना। विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरण्मयी।। तस्या रूपेण स गिरिर्वेषेण च विशेषतः। ससवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय इवाभवत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "सुंदर काले नेत्रों वाली वह कन्या जिस पर्वत के पृष्ठ भाग (शिखर) पर बैठी थी, वहाँ सुशोभित होती हुई वह सोने की मूर्ति (प्रतिमा) जैसी चमक रही थी। उसके रूप और विशेषकर उसकी वेशभूषा के प्रभाव से वह पूरा पर्वत, वहाँ के वृक्ष, झाड़ियाँ और लताएँ— सब कुछ सोने के बने हुए जैसे प्रतीत होने लगे।"
  • व्याख्या: तपती के दिव्य स्वर्ण-तुल्य तेज से वह पूरा पर्वतीय क्षेत्र सोने जैसा जगमगाने लगा।

श्लोक 29 से 35 (राजा संवरण का मोहित होना और तपती से प्रश्न करना)

श्लोक 29, 30 और 31:

अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योषितः। अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलं।। जन्मप्रभृति यत्किचिंद्दृष्टवान्स महीपतिः। रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कयामास किंचन।। तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा। न चचाल ततो देशाद्बुबुधे न च किंचन।।

  • हिन्दी अनुवाद: "उस कन्या को देखकर राजा ने तीनों लोकों की अन्य सभी स्त्रियों को तुच्छ मान लिया, और उन्होंने यह माना कि आज उनके नेत्रों का फल उन्हें प्राप्त हो गया है। उस महीपति ने जन्म से लेकर आज तक जो कुछ भी देखा था, उसके रूप के समान उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की कल्पना तक नहीं की थी। गुणों के पाशों से उस समय उनका मन और नेत्र उस कन्या द्वारा ऐसे बाँध लिए गए थे कि वे उस स्थान से हिल तक नहीं सके और उन्हें किसी बात की सुध-बुध नहीं रही।"
  • व्याख्या: संवरण अपना सुध-बुध खो बैठे और उनका मन पूरी तरह उस अज्ञात सुंदरी के प्रेमपाश में बंध गया।

श्लोक 32, 33, 34 और 35:

अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम्। लोकं निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम्।। एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसंपदा। कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा।। तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः। जगाम मनसा चिन्तां कामबाणेन पीडितः।। दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना। अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "राजा संवरण ने उस समय यही विचार किया— 'देवता, असुर और मनुष्य सहित इस समस्त लोक को मथकर विधाता ने निश्चित रूप से इस विशालक्ष्मी (सुंदर नेत्रों वाली) का यह रूप प्रकट किया है।' रूप रूपी धन की संपदा से युक्त उस लोक में अद्वितीय कन्या को देखकर उच्च कुल में उत्पन्न हुए उन राजा ने ऐसा तर्क किया। उस कल्याणी को देखते ही कामदेव के बाणों से पीड़ित हुए उन राजा के मन में गहरी चिंता उत्पन्न हो गई। मन्मथ (कामदेव) की तीव्र अग्नि से जलते हुए उन प्रतापी राजा ने उस समय अप्रगल्भ (संकोचयुक्त या शांत) दिखाई देने वाली उस मनोहरा कन्या से कहा—"
  • व्याख्या: कामदेव के बाणों से आहत होकर राजा संवरण ने स्वयं आगे बढ़कर उस कन्या से उसका परिचय पूछने का निर्णय लिया।

श्लोक 36 से 44 (संवरण का परिचय पूछना और तपती का अंतर्धान होना)

श्लोक 36, 37 और 38:

काऽसि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि। कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते।। त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता। विभभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम्।। न देवीं नासुरीं चैव न यक्षीं न च राक्षसीम्। न च भोगवतीं मन्ये न गन्धवीं न मानुषीम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे सुंदर जंघाओं वाली (रम्भोरु)! तुम कौन हो, किसकी पुत्री हो और यहाँ किस उद्देश्य से बैठी हो? हे सुंदर मुस्कान वाली! इस निर्जन वन में तुम अकेली क्यों विहार कर रही हो? तुम सर्वथा दोषरहित अंगों वाली और समस्त आभूषणों से भूषित हो, मानो स्वयं आभूषणों की भी शोभा बढ़ाने वाली हो। मैं तुम्हें न तो कोई देवी मानता हूँ, न असुरी, न यक्षी, न राक्षसी, न नागलोक की (भोगवती), न गंधर्वी और न ही कोई साधारण मानुषी।"
  • व्याख्या: संवरण पूछते हैं कि इस भयंकर और निर्जन वन में वह दिव्य आभूषणों से सजी हुई अकेली कौन सी अलौकिक बाला घूम रही है।

श्लोक 39, 40 और 41:

या हि दृष्टा मया काश्चिच्छ्रुता वाऽपि वराङ्गनाः। न तासां सदृशीं मन्ये त्वामहं मत्तकाशिनि।। दृष्ट्वैव चारुवदने चन्द्रात्कान्ततरं तव। वदनं पद्मपत्राक्षं मां मथ्नातीव मन्मथः।। एवं तां स महीपालो बभाषे न तु सा तदा। कामार्तं निर्जनेऽरण्ये प्रत्यबाषथ किंचन।।

  • हिन्दी अनुवाद: "हे मत्तकाशिनि! मैंने जितनी भी श्रेष्ठ सुंदर स्त्रियों को देखा या जिनके बारे में सुना है, उनमें से किसी को भी तुम्हारे समान नहीं मानता हूँ। हे सुंदर मुख वाली! चंद्रमा से भी अधिक कांत तुम्हारे इस कमल-पत्र जैसे नेत्रों वाले मुख को देखकर कामदेव मेरे मन को मथ रहा है।" महीपाल संवरण ने जब इस प्रकार उस कन्या से बातें कहीं, तब उस निर्जन वन में कामदेव से पीड़ित हुए राजा को उसने (कन्या ने) कोई उत्तर नहीं दिया।
  • व्याख्या: राजा संवरण ने अपने प्रेम और काम-वेदना का खुलकर इजहार किया, किंतु तपती ने राजा की बात का कोई उत्तर नहीं दिया।

श्लोक 42, 43 और 44:

ततो लालप्यमानस्य पार्थिवस्यायतेक्षणा। सौदामिनीव चाभ्रेषु तत्रैवान्तरधीयत।। तामन्वेष्टुं स नृपतिः परिचक्राम सर्वतः। वनं वनजपत्राक्षीं भ्रमन्नुन्मत्तवत्तदा।। अपश्यमानः स तु तां बहु तत्र विलप्य च। निश्चेष्टः पार्थिवश्रेष्ठो मुहूर्तं स व्यतिष्ठत।।

  • हिन्दी अनुवाद: राजा के इस प्रकार प्रलाप करने पर वह आयतेक्षणा (विशाल नेत्रों वाली कन्या) बादलों में बिजली (सौदामिनी) के समान वहीं अंतर्धान हो गई। तब कमलपत्र जैसे नेत्रों वाली उस कन्या को ढूँढने के लिए वे नृपति पागलों की तरह उस वन में चारों ओर चक्कर काटने लगे। जब वह उन्हें कहीं नहीं मिली, तब वहाँ बहुत विलाप करके वे पार्थिवश्रेष्ठ संवरण एक मुहूर्त तक निश्छल और निश्चेष्ट खड़े रहे।
  • व्याख्या: राजा के प्रेम-निवेदन के बाद तपती आसमान में बिजली की तरह अचानक गायब हो गई, जिससे संवरण पागल की तरह उसे जंगलों में ढूँढने लगे और अंत में विरह में तड़पने लगे। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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