महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८९

महाभारत् -०१ आदिपर्व -१८९

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चैत्ररथपर्व के 189वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 12 (तपती का अंतर्धान, राजा संवरण की मूर्च्छा और मंत्रियों द्वारा उनकी रक्षा)

श्लोक 1 और 2:

गन्धर्व उवाच। एवमुक्त्वा ततस्तूर्णं जगामोर्ध्वमनिन्दिता। तपतीतपतीत्येव विललापातुरो नृपः।। प्रास्स्वलच्चासकृद्राजा पुनरुत्थाय धावति। धावमानस्तु तपतीमदृष्ट्वैव महीपतिः।' स तु राजा पुनर्भूमौ तत्रैव निपपात ह।।

  • हिन्दी अनुवाद: गंधर्व (चित्ररथ) ने आगे कहा— ऐसा कहकर वह अनिंदिता (तपती) तुरंत आकाश की ओर चली गई। तब आर्त (दुःखी) हुए राजा "तपती! तपती!" ऐसा पुकारते हुए विलाप करने लगे। राजा बार-बार लड़खड़ाकर गिरते और फिर उठकर दौड़ने लगते। दौड़ते हुए भी जब महीपति संवरण को तपती कहीं दिखाई नहीं दी, तो वे राजा वहीं पृथ्वी पर पुनः मूर्छित होकर गिर पड़े।
  • व्याख्या: तपती के आकाश में लौट जाने पर राजा संवरण विरह से पूरी तरह व्याकुल हो गए और सुध-बुध खोकर ज़मीन पर गिर पड़े।

श्लोक 3, 4, 5, 6 और 7:

अन्वेषमाणः सबलस्तं राजानं नृपोत्तमम्। अमात्यः सानुयात्रश्च तं ददर्श महावने।। क्षितौ निपतितं काले शक्रध्वजमिवोच्छ्रितम्। त हि दृष्ट्वा महेष्वासं निरस्तं पतितं भुवि।। बभूव सोऽस्य सचिवः संप्रदीप्त इवाग्निना। त्वरया चोपसङ्गम्य स्नेहादागतसंभ्रमः।। तं समुत्थापयामास नृपतिं काममोहितम्। भूतलाद्भूमिपालेशं पितेव पतितं सुतम्।। प्रज्ञया वयसा चैव वृद्धः कीर्त्या नयेन नयेन च। अमात्यस्तं समुत्थाप्य बभूव विगतज्वरः।।

  • हिन्दी अनुवाद: राजा नृपोत्तम संवरण को सेना के साथ ढूँढते हुए उनके मंत्री और अनुगामी उस महावन में आ पहुँचे। उन्होंने देखा कि वे महाधनुर्धर राजा पृथ्वी पर ऐसे गिरे हुए हैं मानो इंद्र का ध्वज गिर गया हो। उन्हें पृथ्वी पर इस प्रकार गिरा हुआ देखकर उनके सचिव (मंत्री) अग्नि के समान प्रज्वलित (क्रोधित व व्याकुल) हो उठे। स्नेह के कारण घबराए हुए वे तुरंत तेजी से उनके पास गए। काममोहित और भूमि पर गिरे हुए उन राजा को उनके मंत्री ने ऐसे उठाया जैसे कोई पिता अपने गिरे हुए पुत्र को उठाता है। बुद्धि, आयु, कीर्ति और नीति में वृद्ध (श्रेष्ठ) उन मंत्री ने राजा को उठाकर उनकी चिंता (ज्वर) दूर की।
  • व्याख्या: राजा को जंगल में इस हालत में पाकर उनके प्रधान मंत्री ने उन्हें संभाला और सांत्वना दी।

श्लोक 8, 9, 10, 11 और 12:

उवाच चैनं कल्याण्या वाचा मधुरयोत्थिम्। मा भैर्मनुजशार्दूल भद्रमस्तु तवानघ।। क्षुत्पिपासापरिश्रान्तं तर्कयामास वै नृपम्। पतितं पातनं सङ्ख्ये शात्रवाणां महीतले।। वारिणा च सुशीतेन शिरस्तस्याभ्यषेचयत्। अस्पृशन्मुकुटं राज्ञः पुण्डरीकसुगन्धिना।। ततः प्रत्यागतप्राणस्तद्बलं बलवान्नृपः। सर्वं विसर्जयामास तमेकं सचिवं विना।। ततस्तस्याज्ञया राज्ञो विप्रतस्थे महद्बलम्। स तु राजा गिरिप्रस्थे तस्मिन्पुनरुपाविशत्।।

  • हिन्दी अनुवाद: उन्होंने कल्याणी और मधुर वाणी से उठे हुए राजा से कहा— "हे मनुजशार्दूल! डरो मत, तुम्हारा कल्याण हो, हे अनघ!" युद्ध में शत्रुओं को पछाड़ने वाले उन राजा को क्षुधा और प्यास से परिश्रान्त तथा पृथ्वी पर गिरा हुआ समझकर, मंत्री ने कमल की सुगंध वाले अत्यंत शीतल जल से, राजा के मुकुट को बिना छुए उनके मस्तक का अभिषेक किया (जल छिड़का)। तब चेतना लौटने पर उन बलवान राजा ने अपने उस एक सचिव को छोड़कर बाकी संपूर्ण सेना को वापस विदा कर दिया। तदनंतर राजा की आज्ञा से वह भारी सेना वापस लौट गई, और वे राजा उसी पर्वत के शिखर पर पुनः बैठ गए।
  • व्याख्या: होश में आने के बाद राजा ने अपनी सेना को वापस भेज दिया और खुद अकेले उसी पर्वत पर तपस्या व चिंतन के लिए रुक गए।

श्लोक 13 से 27 (ऋषि वसिष्ठ का आगमन और सूर्य देव से तपती की याचना)

श्लोक 13, 14, 15 और 16:

ततस्तस्मिन् गिरिवरे शुचिर्भूत्वा कृताञ्जलिः। आरिराधयिषुः सूर्यं तस्थावूर्ध्वमुखः क्षितौ।। जगाम मनसा चैव वसिष्ठमृषिसत्तमम्। पुरोहितममित्रघ्नं तदा संवरणो नृपः।। नक्तन्दिनमथैकत्र स्थिते तस्मिञ्जनाधिपे। अथाजगाम विप्रर्षिस्तदा द्वादशमेऽहनि।। स विदित्वैव नृपतिं तपत्या हृतमानसम्। दिव्येन विधिना ज्ञात्वा भावितात्मा महानृपिः (महानृषिः):।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर उस श्रेष्ठ पर्वत पर पवित्र होकर, हाथ जोड़कर, सूर्य की आराधना करने की इच्छा से राजा संवरण पृथ्वी पर ऊपर की ओर मुख करके खड़े हो गए। राजा संवरण ने मन ही मन अपने मित्रघ्र (शत्रुओं का नाश करने वाले) पुरोहित और ऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि वसिष्ठ का स्मरण किया। इस प्रकार रात-दिन एक स्थान पर स्थित रहते हुए जब उस राजा को बारह दिन बीत गए, तब बारहवें दिन वहाँ विप्रर्षि (वसिष्ठजी) आ पहुँचे। महाभागात्मा और महान ऋषि वसिष्ठजी ने दिव्य विधि से यह जान लिया था कि राजा का मन तपती के द्वारा हर लिया गया है (यानी राजा प्रेम में व्याकुल है)।
  • व्याख्या: राजा ने बारह दिनों तक सूर्य देव की कठोर तपस्या की, और उनके पुरोहित महर्षि वसिष्ठजी दिव्य दृष्टि से राजा की व्यथा समझकर स्वयं वहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 17, 18, 19, 20 और 21:

तथा तु नियतात्मानं तं नृपं मुनिसत्तमः। आबभाषे स धर्मात्मा तस्यैवार्थचिकीर्षया।। स तस्य मनुजेन्द्रस्य पश्यतो भगवानृषिः। ऊर्ध्वमाचक्रमे द्रष्टुं भास्करं भास्करद्युतिः।। योजनानां तु नियुतं क्षणाद्गत्वा तपोधनः।' सहस्रांशुं ततो विप्रः कृताञ्जलिरुपस्थितः। वसिष्ठोहमिति प्रीत्या स चात्मानं न्यवेदयत।। तमुवाच महातेजा विवस्वान्मुनिसत्तमम्। महर्षे स्वागतं तेऽस्तु कथयस्व यथेप्सितम्।। यदिच्छसि महाभाग मत्तः प्रवदतां वर। तत्ते दद्यामभिप्रेतं यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: उस प्रकार नियतात्मा (संयमी) बने हुए उस राजा की मनोकामना पूरी करने की इच्छा से उन धर्मात्मा मुनिसत्तम (वसिष्ठजी) ने उनसे बातें कीं। उस समय मनुष्यों के इंद्र (राजा) के देखते-देखते, सूर्य के समान कांति वाले भगवान ऋषि वसिष्ठ आकाश की ओर उठे (भास्कर के पास जाने के लिए प्रस्थान किया)। तपोधन वसिष्ठजी ने क्षण भर में एक लाख योजन की दूरी तय करके, सहस्रांशु (सूर्य) के पास हाथ जोड़कर उपस्थिति दी और प्रेमपूर्वक स्वयं का परिचय देते हुए कहा— "मैं वसिष्ठ हूँ।" महातेजा विवस्वान् (सूर्य) ने उन मुनिसत्तम से कहा— "हे महर्षि! आपका स्वागत है, आपकी जो इच्छा हो, कहिए। हे वक्ताओं में श्रेष्ठ महाभाग! आप मुझसे जो भी चाहते हैं, वह अत्यंत दुर्लभ होने पर भी मैं आपको प्रदान करूँगा।"
  • व्याख्या: महर्षि वसिष्ठ अपनी योगशक्ति से पलभर में सूर्य लोक जा पहुँचे, जहाँ सूर्य देव ने उनका आदर सत्कार करते हुए मनचाहा वर मांगने को कहा।

श्लोक 22, 23, 24, 25 और 26:

एवमुक्तः स तेनर्षिर्वसिष्ठः संस्तुवन्गिरा। प्रणिपत्य विवस्वन्तं भानुमन्तमथाब्रवीत्।। `योजनानां चतुष्षष्टिं निमेषात्त्रिशतं तथा। अश्वैर्गच्छति नित्यं यस्तत्पार्श्वस्थोऽब्रवीदिदम्।। वसिष्ठ उवाच। अजाय लोकत्रयपावनाय भूतात्मने गोपतये वृषाय। सूर्याय सर्गप्रलयालयाय नमो महाकारुणिकोत्तमाय।। विवस्वते ज्ञानभृतेऽन्तरात्मने जगत्प्रदीपाय जगद्धितैषिणे। स्वयंभुवे दीप्तसहस्रचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः।। नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसूतिस्थितिनाशहेतवे। त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरिञ्चनारायणशङ्करात्मने।।

  • हिन्दी अनुवाद: सूर्य देव द्वारा ऐसा कहे जाने पर, उन ऋषि वसिष्ठ ने भानुमान विवस्वान को प्रणाम किया और वाणी द्वारा उनकी स्तुति करते हुए कहा— (जो सूर्य अपने घोड़ों द्वारा एक निमेष में तीन सौ और चौंसठ योजन की दूरी नित्य तय करते हैं, उनके पास खड़े होकर वसिष्ठजी ने यह स्तुति की—) वसिष्ठजी बोले— "जो अजन्मा, तीनों लोकों को पवित्र करने वाले, भूतात्मा, गोपति, वृष (धर्मस्वरूप), सूर्य, तथा सर्ग (उत्पत्ति) और प्रलय के आश्रय हैं, ऐसे महाकारुणिकोत्तम को नमस्कार है। जो विवस्वान्, ज्ञानस्वरूप, अंतरात्मा, जगत्प्रदीप, जगत के हितैषी, स्वयंभू, दीप्त सहस्र नेत्रों वाले, सुरोत्तम और अमित तेज वाले हैं, उन्हें नमस्कार है। जो सविता, जगत् के एकमात्र नेत्र, जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और नाश के हेतु, त्रयीमय (वेदस्वरूप), त्रिगुण (सत्व, रज, तम) को धारण करने वाले, तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूप हैं, उन सूर्य को नमस्कार है।"
  • व्याख्या: महर्षि वसिष्ठ ने वेदों और शास्त्रों के महान श्लोकों द्वारा सूर्य देव की स्तुति की।

श्लोक 27 से 36 (सूर्य देव द्वारा तपती का विवाह संवरण से तय करना)

श्लोक 27, 28 और 29:

सूर्य उवाच। संस्तुतो वरदः सोऽहं वरं वरय सुव्रत। स्तुतिस्त्वयोक्ता भक्तानां जप्येयं वग्दोस्म्यहम्'।। वसिष्ठ उवाच। यैषा ते तपती नाम सावित्र्यवरजा सुता। तां त्वां संवरणस्यार्थे वरयामि विभावसो।। स हि राजा बृहत्कीर्तिर्धर्मार्थविदुदारधीः।युक्तः संवरणो भर्ता दुहितुस्ते विहङ्गम।।

  • हिन्दी अनुवाद: सूर्य देव ने कहा— "इस प्रकार संस्तुत (प्रसन्न) किया गया वरदाता मैं हूँ, इसलिए हे सुव्रत! वर माँगो। तुमने भक्तों के योग्य जो यह स्तुति की है, यह सदा जप करने योग्य है, और मैं तुम्हें वर देने वाला हूँ।" वसिष्ठजी ने कहा— "हे विभावसु (सूर्य)! सावित्री से उत्पन्न जो तुम्हारी 'तपती' नाम की छोटी पुत्री है, उसे मैं राजा संवरण के लिए तुमसे माँगता हूँ (वरदान के रूप में माँगता हूँ)। हे विहंगम (आकाशचर सूर्य)! वे राजा संवरण महान कीर्ति वाले, धर्म और अर्थ के ज्ञाता, उदार बुद्धि वाले और तुम्हारी पुत्री के लिए सर्वथा योग्य पति हैं।"
  • व्याख्या: सूर्य देव के प्रसन्न होने पर महर्षि वसिष्ठ ने राजा संवरण के लिए उनकी पुत्री तपती का हाथ माँग लिया।

श्लोक 30, 31, 32 और 33:

गन्धर्व उवाच। इत्युक्तः स तदा तेन ददानीत्येव निश्चितः। प्रत्यभाषत तं विप्रं प्रतीनन्द्य दिवाकरः।। वरः संवरणो राज्ञां त्वमृषीणां वरो मुने। तपती योषितां श्रेष्ठा किमन्यत्रापवर्जनात्।। ततः सर्वानवद्याङ्गीं तपतीं तपनः स्वयम्। ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय महात्मने।। प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्षिस्तपतीं तदा। वसिष्ठोऽथ विसृष्टस्तु पुनरेवाजगाम ह।।

  • हिन्दी अनुवाद: गंधर्व (चित्ररथ) ने कहा— वसिष्ठजी द्वारा ऐसा कहे जाने पर दिवाकर (सूर्य) ने 'अवश्य दूँगा' ऐसा निश्चित करके प्रसन्नतापूर्वक उस विप्र (वसिष्ठ) को उत्तर दिया— "राजाओं में श्रेष्ठ संवरण हैं, ऋषियों में श्रेष्ठ आप मुने! और योषितों (स्त्रियों) में श्रेष्ठ तपती है— इनके मिलने से भला अस्वीकार (अपवर्जन) की क्या बात हो सकती है?" तदनंतर तपन (सूर्य) ने स्वयं उन दोषरहित अंगों वाली तपती को राजा संवरण के लिए महात्मा वसिष्ठ को सौंप दिया। तब महर्षि वसिष्ठ ने उस कन्या तपती को स्वीकार किया और सूर्य देव द्वारा विदा किए जाने पर वे पुनः उसी स्थान पर लौट आए...
  • व्याख्या: सूर्य देव ने अत्यंत प्रसन्नता के साथ अपनी पुत्री तपती महर्षि वसिष्ठ को सौंप दी, ताकि वे उसे पृथ्वी पर ले जाकर राजा संवरण का विवाह संपन्न करा सकें।

श्लोक 34, 35 और 36:

यत्र विख्यातकीर्तिः स कुरूणामृषभोऽभवत्। स राजा मन्मथाविष्टस्तद्गतेनान्तरात्मना।। दृष्ट्वा च देवकन्यां तां तपतीं चारुहासिनीम्। वसिष्ठेन सहायान्तीं संहृष्टोऽभ्यधिकं बभौ।। रुरुचे साऽधिकं सुभ्रूरापतन्ती नभस्तलात्। सौदामनीव विभ्रष्टा द्योतयन्ती दिशस्त्विषा।।

  • हिन्दी अनुवाद: ...जहाँ कुरुवंश के श्रेष्ठ और विख्यात कीर्ति वाले वे राजा संवरण थे। कामदेव से आविष्ट और जिनका अंतरात्मा पूरी तरह उसी में लीन था, वे राजा वसिष्ठजी के साथ आती हुई उस चारुहासिनी (सुंदर हँसी वाली) देवकन्या तपती को देखकर अत्यंत प्रफुल्लित हो उठे और उनकी शोभा बहुत बढ़ गई। आकाश के तल से उतरती हुई वह सुंदर भौंहों वाली तपती ऐसे सुशोभित हो रही थी जैसे कोई चमकती हुई बिजली (सौदामनी) आसमान से गिरकर अपनी कांति से दिशाओं को प्रकाशित कर रही हो।
  • व्याख्या: तपती को महर्षि वसिष्ठ के साथ वापस आते देख राजा संवरण की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा, और तपती का सौंदर्य बिजली के समान चमक रहा था।

श्लोक 37 से 44 (संवरण और तपती का विवाह, बारह वर्ष की वर्षा और समृद्धि)

श्लोक 37, 38, 39 और 40:

कृच्छ्राद्द्वादशरात्रे तु तस्य राज्ञः समाहिते। आजगाम विशुद्धात्मा वसिष्ठो भगवानृषिः।। तपसाऽऽराध्य वरदं देवं गोपतिमीश्वरम्। लेभे संवरणो भार्यां वसिष्ठस्यैव तेजसा।। ततस्तस्मिन्गिरिश्रेष्ठे देवगन्धर्वसेविते। जग्राह विधिवत्पाणिं तपत्याः स नरर्षभः।। वसिष्ठेनाभ्यनुज्ञातस्तस्मिन्नेव धराधरे। सोऽकामयत राजर्षिर्विहर्तुं सह भार्यया।।

  • हिन्दी अनुवाद: उस राजा के कठिनता से बारह रातें (द्वादशरात्र) पूर्ण होने पर, विशुद्धात्मा भगवान ऋषि वसिष्ठ वहाँ आ पहुँचे। वरदाता, देवों के स्वामी गोपति (भगवान शिव/सूर्य) की तपस्या से आराधित करके, संवरण ने वसिष्ठजी के ही तेज से उस भार्या (तपती) को प्राप्त किया था। तदनंतर देव और गंधर्वों द्वारा सेवित उस श्रेष्ठ पर्वत पर उन नरर्षभ (संवरण) ने विधिपूर्वक तपती का पाणिग्रहण (विवाह) किया। वसिष्ठजी द्वारा अनुमति दिए जाने पर उस राजर्षि ने उसी पर्वत पर अपनी पत्नी के साथ विहार करने की इच्छा की।
  • व्याख्या: वसिष्ठजी के आशीर्वाद और तेज से राजा संवरण ने उसी पर्वतीय क्षेत्र में तपती के साथ गंधर्व/वैदिक विधि से विवाह किया और वहीं निवास करने लगे।

श्लोक 41, 42 और 43:

ततः पुरे च राष्ट्रे च वनेषूपवनेषु च। आदिदेश महीपालस्तमेव सचिवं तदा।। नृपतिं त्वभ्यनुज्ञाप्य वसिष्ठोऽथापचक्रमे। सोऽथ राजा गिरौ तस्मिन्विजहारामरो यथा।। ततो द्वादशवर्षाणि काननेषु वनेषु च। रेमे तस्मिन्गिरौ राजा तयैव सह भार्यया।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर नगर में, राष्ट्र में, वनों और उपवनों में शासन व्यवस्था के लिए महीपाल संवरण ने अपने उसी (प्रधान) मंत्री को आदेश दिया। राजा से अनुमति लेकर वसिष्ठजी वहाँ से प्रस्थान कर गए। इसके बाद वे राजा उस पर्वत पर किसी देवता (अमर) की भाँति विहार करने लगे। इस प्रकार वे राजा अपनी उस पत्नी तपती के साथ उन वनों और उपवनों में पूरे बारह वर्षों (द्वादश वर्षाणि) तक रमण (आनंद) करते रहे।
  • व्याख्या: संवरण ने अपनी पत्नी तपती के साथ बारह वर्षों तक जंगलों और पर्वतों में देवताओं की तरह सुखपूर्वक समय बिताया।

श्लोक 44, 45, 46 और 47:

तस्य राज्ञः पुरे तस्मिन्समा द्वादश सत्तम। न ववर्ष सहस्राक्षो राष्ट्रे चैवास्य भारत।। ततस्तस्यामनावृष्ट्यां प्रवृत्तायामरिन्दम। प्रजाः क्षयमुपाजग्मुः सर्वाः सस्थाणुजङ्गमाः।। तस्मिंस्तथाविधे काले वर्तमाने सुदारुणे। नावश्यायः पपातोर्व्यां ततः सस्यानि नाऽरुहन्।। ततो विभ्रान्तमनसो जनाः क्षुद्भपीडिताः। गृहाणि संपरित्यज्य बभ्रमुः प्रदिशो दिशः।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे भारत (सत्तम)! उस राजा के उस नगर और राष्ट्र में (तपती के साथ रमण करते हुए) जब बारह वर्ष बीत गए, तब सहस्राक्ष (इंद्र) ने उनके राज्य में वर्षा नहीं की। हे अरिन्दम! जब उस प्रकार की अनावृष्टि (सूखा) उत्पन्न हो गई, तब स्थावर (वृक्ष आदि) और जंगम (जीव-जंतु) सहित सभी प्रजाएँ क्षय (नष्ट होने) को प्राप्त होने लगीं। जब वह अत्यंत दारुण समय चल रहा था, तब पृथ्वी पर ओस (अवश्याय) तक नहीं गिरी, जिससे अन्न (सस्यानि) भी उत्पन्न नहीं हुए। तब भ्रमित मन वाले और भूख से पीड़ित लोग अपने घरों को छोड़कर दिशा-दिशा में भटकने लगे।
  • व्याख्या: राजा के बारह वर्षों तक एकांत विहार करने के कारण प्रकृति रुष्ट हो गई और राज्य में भीषण सूखा व अकाल पड़ गया जिससे त्राहि-त्राहि मच गई।

श्लोक 48, 49, 50, 51 और 52:

ततस्तस्मिन्पुरे राष्ट्रे त्यक्तदारपरिग्रहाः। परस्परममर्यादाः क्षुधार्ता जघ्निरे जनाः।। तत्क्षुधार्तैर्निरानन्दैः शवभूतैस्तथा नरैः। अभवत्प्रेतराजस्य पुरं प्रेतैरिवावृतम्।। ततस्तत्तादृशं दृष्ट्वा स एव भगवानृषिः। अभ्याद्रवत धर्मात्मा वसिष्ठो मुनिसत्तमः।। तं च पार्थिवशार्दूलमानयामास तत्पुरम्। तपत्या सहितं राजन्वर्षे द्वादशमे गते। ततः प्रवृष्टस्तत्रासीद्यथापूर्वं सुरारिहा।। तस्मिन्नृपतिशार्दूले प्रविष्टे नगरं पुनः। प्रववर्ष सहस्राक्षः सस्यानि जनयन्प्रभुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर उस पुर और राष्ट्र में लोग अपनी पत्नी और परिवार का त्याग करके, मर्यादाहीन हो गए और क्षुधा से पीड़ित होकर आपस में ही एक-दूसरे को मारने लगे। भूख से तड़पते हुए, निरांद और लाशों जैसे बन चुके उन मनुष्यों से वह राष्ट्र ऐसा प्रतीत होने लगा मानो प्रेतराज (यमराज) की पूरी प्रेतों से घटी हुई नगरी हो। तब उस स्थिति को देखकर वे ही धर्मात्मा भगवान ऋषि मुनिसत्तम वसिष्ठजी वहाँ दौड़े आए (सहायता के लिए पहुँचे)। हे राजन्! बारहवें वर्ष के अंत में वे मुनिसत्तम उस पार्थिवशार्दूल (संवरण) को तपती के साथ वापस उनके नगर में ले आए। उनके आते ही सुरारिहा (इंद्र) ने वहाँ पहले की तरह वर्षा कर दी। उस नृपतिशार्दूल के नगर में पुनः प्रवेश करने पर प्रभु सहस्राक्ष (इंद्र) ने अन्न उत्पन्न करने वाली वर्षा की।
  • व्याख्या: राज्य की यह भीषण दुर्दशा देखकर महर्षि वसिष्ठ ने हस्तक्षेप किया और राजा संवरण को तपती के साथ वापस राजधानी में लेकर आए, जिसके आते ही राज्य में पुनः वर्षा हुई और अकाल समाप्त हुआ।

श्लोक 53 से 56 (सुख-समृद्धि, कुरु का जन्म और अध्याय का समापन)

श्लोक 53 और 54:

ततः सराष्ट्रं मुमुदे तत्पुरं परया मुदा। तेन पार्थिवमुख्येन भावितं भावितात्मना।। ततो द्वादश वर्षाणि पुनरीजे नराधिपः। तपत्या सहितः पत्न्या यथा शच्या मरुत्पतिः।।

  • हिन्दी अनुवाद: उस भावितत्मा पार्थिवमुख्य (संवरण) के द्वारा सम्मानित हुआ वह पुर और राष्ट्र परम आनंद से भर गया। तदनंतर उन नराधिप (संवरण) ने अपनी पत्नी तपती के साथ, जिस प्रकार शची के साथ मरुतपति (इंद्र) यज्ञ करते हैं, वैसे ही पुनः बारह वर्षों तक यज्ञ किए।
  • व्याख्या: राजा के लौटने और वर्षा होने से पूरा राज्य फिर से खुशहाल हो गया और राजा ने तपती के साथ अनेक महायज्ञ किए।

श्लोक 55 और 56 (अध्याय का समापन):

गन्धर्व उवाच। एवमासीन्महाभागा तपती नाम पौर्विकी। तव वैवस्वती पार्थ तापत्यस्त्वं यया मतः।। तस्यां संजनयामास कुरुं संवरणो नृपः। तपत्यां तपतां श्रेष्ठ तापत्यस्त्वं ततोऽर्जुन।।

  • हिन्दी अनुवाद: गंधर्व (चित्ररथ) ने कहा— हे पार्थ! प्राचीन काल की वह महाभागा 'तपती' नाम की सूर्यपुत्री ऐसी ही थीं, जिनके कारण तुम (कुरुवंशी लोग) 'तापत्य' कहलाते हो। उसी तपती के गर्भ से राजा संवरण ने 'कुरु' को उत्पन्न किया था। हे तपस्वियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उन्हीं तपती और संवरण के वंश में उत्पन्न होने के कारण तुम 'तापत्य' हो।
  • व्याख्या: चित्ररथ गंधर्व ने अर्जुन के उस प्रश्न का उत्तर दिया कि उन्हें 'तापत्य' क्यों कहा गया था— क्योंकि कुरु वंश के मूल पुरुष 'कुरु' का जन्म राजा संवरण और सूर्य पुत्री तपती के मिलन से हुआ था, इसलिए उनके वंशज तापत्य कहलाते हैं। इसी के साथ चैत्ररथपर्व का यह अध्याय पूर्ण होता है।
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