महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत स्वयंवरपर्व के 202वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। इस अध्याय में रंगभूमि में उपस्थित बड़े-बड़े राजाओं, शिशुपाल, जरासंध, मद्रराज शल्य, दुर्योधन और कर्ण द्वारा द्रुपद के कठिन धनुष को उठाने और प्रत्यंचा चढ़ाने के असफल प्रयासों तथा अंत में अर्जुन के आगे बढ़ने का रोमांचक वर्णन है।
श्लोक 1 से 10 (राजाओं की लालसा, देवताओं और यादवों की उपस्थिति)
श्लोक 1, 2, 3, 4 और 5:
वैशंपायन उवाच। तेऽलङ्कृताः कुण्डलिनो युवानः परस्परं स्पर्धमाना नरेन्द्राः। अस्त्रं बलं चात्मनि मन्यमानाः सर्वें समुत्पेतुरुदायुधास्ते।। रूपेण वीर्येण कुले चैव शीलेन वित्तेन च यौवनेन। समिद्धदर्पा मदवेगभिन्ना मत्ता यथा हैमवता गजेन्द्राः।। परस्परं स्पर्धया प्रेक्षमाणाः सङ्कल्पजेनाभिपरिप्लुताङ्गाः। कृष्णा ममैवेत्यभिभाषमाणा नृपाः समुत्पेतुरथासनेभ्यः।। ते क्षत्रिया रङ्गगताः समेता जिगीषमाणा द्रुपदात्मजां ताम्। चकाशिरे पर्वतराजकन्यामुमां यथा देवगणाः समेताः।। कन्दर्पबाणाभिनिपीडिताङ्गां कृष्णागतैस्ते हृदयैर्नरेन्द्राः। रङ्गावतीर्णा द्रुपदात्मजार्थं द्वेषं प्रचक्रुः सुहृदोऽपि तत्र।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— आभूषणों से सुसज्जित, कुंडल धारण किए हुए, युवा और आपस में स्पर्धा करने वाले वे सभी नरेन्श अपने अस्त्र और बल पर अभिमान करते हुए अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ (उत्साहित होकर) उठ खड़े हुए। रूप, वीर्य, कुल, शील, वित्त और यौवन के कारण जिनके अहंकार भड़के हुए थे, तथा जो मद के वेग से मतवाले हो रहे थे, वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो हिमालय के वन के मतवाले हाथी हों। आपस में ईर्ष्या से देखते हुए और कामदेव (संकल्प) से पीड़ित अंगों वाले "कृष्णा (द्रौपदी) तो मेरी ही है!" ऐसा आपस में बोलते हुए वे राजा अपने आसनों से उठकर खड़े हो गए। रंगभूमि में एकत्र हुए वे क्षत्रिय द्रुपद की उस पुत्री को जीतने की इच्छा से ऐसे शोभा दे रहे थे जैसे पर्वतराज कन्या उमा (पार्वती) के लिए देवगण एकत्र हुए हों। कामदेव के बाणों से जिनके अंग पीड़ित थे और जिनके हृदय कृष्णा के पास लग चुके थे, वे नरेन्द्रा द्रुपदात्मजा के लिए रंगभूमि में उतरकर आपस में (यहाँ तक कि मित्रों से भी) द्वेष करने लगे।
- व्याख्या: द्रौपदी के रूप और स्वयंवर की घोषणा को देखकर सभी राजकुमार और राजा अपने अहंकार, सौंदर्य और बल के नशे में चूर होकर द्रौपदी को पाने के लिए आपस में प्रतिस्पर्धा करते हुए उठ खड़े हुए।
श्लोक 6, 7, 8, 9 और 10:
अथाययुर्देवगणा विमानै रुद्रादित्या वसवोऽथाश्विनौ च। साध्याश्च सर्वे मरुतस्तथैव यमं पुरस्कृत्य धनेश्वरं च।। दैत्याः सुपर्णाश्च महोरगाश्च देवर्षयो गुह्यकाश्चारणाश्च। विश्वावसुर्नारदपर्वतौ च गन्धर्वमुख्याः सहसाऽप्सरोभिः।। हलायुधस्तत्र जनार्दनश्च वृष्ण्यन्धकाश्चैव यताप्रधानम्। प्रेक्षां स्म चक्रुर्यदुपुङ्गवास्ते स्थिताश्च कृष्णस्य मते महान्तः।। दृष्ट्वा Tान्मत्तगजेन्द्ररूपा- न्पञ्चाभिपद्मानिव वारणेन्द्रान्। भस्मावृताङ्गानिव हव्यवाहान्कृष्णः प्रदध्यौ यदुवीरमुख्यः।। शशंस रामाय युधिष्ठिरं स भीमं सजिष्णुं च यमौ च वीरौ। शनैःशनैस्तान्प्रसमीक्ष्य रामो जनार्दनः प्रीतमना ददर्श ह।।
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर रुद्र, आदित्य, वसु, दोनों अश्विनीकुमार, सभी साध्य और मरुत्गण— यमराज और कुबेर को आगे करके— अपने विमानों से वहाँ आ पहुँचे। दैत्य, गरुड़, बड़े-बड़े नाग, देवर्षि, गुह्यक, चारण, विश्वावसु, नारद और पर्वत आदि मुख्य गंधर्व अप्सराओं के साथ अचानक आ गए। उधर बलराम (हलायुध), जनार्दन (श्रीकृष्ण) तथा वृष्णि और अंधक वंश के प्रमुख वीर भी यथाप्रधान वहाँ उपस्थित हुए। यदुवंश के वे श्रेष्ठ वीर उस अद्भुत दृश्य को देखने लगे और वे श्रीकृष्ण के मत के अधीन वहीं स्थित थे। मतवाले हाथियों के समान रूप वाले, अथवा राख से ढकी हुई अग्नि के समान छिपे हुए उन पाँच पाण्डव श्रेष्ठों को देखकर यदुवंशियों के मुख्य वीर श्रीकृष्ण ने विचार किया (मन ही मन ध्यान किया)। श्रीकृष्ण ने बलरामजी से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन (जिष्णु) और दोनों वीर यमुल (नकुल-सहदेव) का परिचय कराया। उन्हें धीरे-धीरे देखकर बलरामजी भी प्रसन्न मन से जनार्दन (कृष्ण) की ओर देखने लगे।
- व्याख्या: स्वयंवर देखने के लिए आकाश में देवता, गंधर्व और ऋषि-मुनि विमानों में बैठ कर आ गए। रंगभूमि में उपस्थित साधारण ब्राह्मणों के वेश में बैठे पाँचों पांडवों (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव) को श्रीकृष्ण पहचान लेते हैं और बलरामजी को उनके बारे में बताते हैं।
श्लोक 11 से 20 (राजकुमारों के असफल प्रयास और निराशा)
श्लोक 11, 12, 13, 14 और 15:
अन्ये तु वीरा नृपपुत्रपौत्राः कृष्णागतैर्नत्रमनःस्वभावैः। व्यायच्छमाना ददृशुर्न तान्वै सन्दष्टदन्तच्छदताम्रनेत्राः।। तथैव पार्थाः पृथुबाहवस्ते वीरौ यमौ चैव महानुभावौ। तां द्रौपदीं प्रेक्ष्य तदा स्म सर्वे कन्दर्पबाणाहता बभूवुः।। देवर्षिगन्धर्वसमाकुलं त- सुपर्णनागासुरसिद्धजुष्टम्। दिव्येन गन्धेन समाकुलं च दिव्यैश्च पुष्पैरवकीर्यमाणम्।। महास्वनैर्दुन्दुभिनादितैश्च बभूव तत्सङ्कुलमन्तरिक्षम्। विमानसंबाधमभूत्समन्ता- त्सवेणुवीणापणवानुनादम्।। समाजवाटोपरि संस्थितानां मेघैः समन्तादिव गर्जमानैः।।
- हिन्दी अनुवाद: उधर अन्य जो वीर राजाओं के पुत्र-पौत्र थे, जिनका मन कृष्णा में अटका हुआ था, वे अपने दाँतों से ओष्ठ चबाते हुए और लाल नेत्रों से क्रोध एवं उत्साह में संघर्ष करते हुए दिखाई दे रहे थे। उधर विशाल भुजाओं वाले वे पाण्डव तथा दोनों महानुभाव वीर यमुल (नकुल-सहदेव) भी उस द्रौपदी को देखकर कामदेव के बाणों से आहत हो गए। देवर्षियों और गंधर्वों से तथा गरुड़, नाग, असुर और सिद्धों से वह आकाश भर गया था। वह दिव्य गंध से युक्त तथा दिव्य पुष्पों से आच्छादित हो रहा था। दुन्दुभियों की महान ध्वजियों से वह अंतरिक्ष गूँज रहा था। वीणा, वेणु (बांसुरी) और पणव के नादों से तथा विमानों की भीड़ से वह संपूर्ण आकाश घिर गया था। समाजवाट (रंगभूमि) के ऊपर चारों तरफ मंडराते हुए विमान ऐसे गरज रहे थे मानो मेघ गरज रहे हों।
- व्याख्या: सभी राजाओं में द्रौपदी को पाने की होड़ लगी थी। पांडव भी द्रौपदी को देखकर मोहित थे, और पूरा आकाश मंडल देवताओं, गंधर्वों और वाद्ययंत्रों की ध्वजियों से सजी हुई सभा से भर गया था।
श्लोक 16, 17, 18, 19 और 20:
ततस्तु ते राजगणाः क्रमेण कृष्णानिमित्तं कृतविक्रमाश्च। सकर्णदुर्योधनशाल्वशल्य- द्रौणायनिक्राथसुनीथवक्राः।। कलिङ्गवङ्गाधिपपाण्ड्यपौण्ड्रा विदेहराजो यवनाधिपश्च। अन्य्ये च नानानृपपुत्रपौत्रा राष्ट्राधिपाः पङ्कजपत्रनेत्राः।। किरीटहाराङ्गदचक्रवालै- र्विभूषिताङ्गाः पृथुबाहवस्ते। अनुक्रमं विक्रमसत्वयुक्ता बलेन वीर्येण च नर्दमानाः।। तत्कार्मुकं संहननोपपन्नं सज्यं न शेकुर्मनसाऽपि कर्तुम्। ते विक्रमन्तः स्फुरता दृढेन विक्षिप्यमाणा धनुषा नरेन्द्राः।। विचेष्टमाना धरणीतलस्था यथाबलं शैक्ष्यगुणक्रमाश्च। गतौजसः स्नस्तकिरीटहारा विनिःश्वसन्तः शमयांबभूवुः।। हहाकृतं तद्धनुषा दृढेन विस्रस्तहाराङ्गदचक्रवालम्। कृष्णानिमित्तं विनिवृत्तकामं राजां तण्डलमार्तमासीत्।।
- *हिन्दी अनुवाद: तदनंतर कर्ण, दुर्योधन, शाल्व, शल्य, अश्वत्थामा (द्रौणायनि), क्राथ, सुनीथ, वक्र, कलिङ्ग, वङ्गाधिप, पाण्ड्य, पौण्ड्र, विदेहराज, यवनाधिप, तथा अन्य अनेक राजाओं के पुत्र-पौत्र एवं राष्ट्रों के अधिपति कमल के पत्तों जैसे नेत्रों वाले वीर— किरीट, हार, अंगद और कंकणों से अपने अंगों को विभूषित किए हुए, विशाल भुजाओं वाले वे सभी— अपने पराक्रम और बल का परिचय देने के लिए बारी-बारी से आगे आए और गर्जना करने लगे। किंतु उस संहनन से युक्त (सुदृढ़) धनुष को वे मन से भी सज्य (प्रत्यंचा चढ़ाना) करने में समर्थ नहीं हो सके। पराक्रम करते हुए, उस सुदृढ़ धनुष द्वारा बार-बार फेंके जाते हुए (झटके खाते हुए) वे नरेन्श पृथ्वी पर गिर पड़े। अपने बल और अभ्यास के अनुसार चेष्टा करते हुए वे सब तेजहीन हो गए, उनके मुकुट और हार ढीले होकर गिर पड़े, और लंबी साँसें लेते हुए वे शांत हो गए। उस दृढ़ धनुष के कारण 'हा-हा' कार मच गया, उनके हार और अंगद बिखर गए, और कृष्णा के लिए उनकी इच्छा समाप्त हो गई (वे असफल हो गए)।
- व्याख्या: कर्ण, दुर्योधन, शिशुपाल, जरासंध और शल्य सहित बड़े-बड़े महारथी राजा द्रुपद के उस महाधनुष को उठाने और उसकी प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास करने लगे, किंतु वे धनुष के खिंचाव से बुरी तरह परास्त होकर गिर पड़े और असफल हो गए।
श्लोक 21 से 38 (शिशुपाल, जरासंध, शल्य, दुर्योधन और कर्ण के असफल प्रयास)
श्लोक 21, 22, 23, 24, 25 और 26:
`एवं तेषु निवृत्तेषु क्षत्रियेषु समन्ततः। चेदीनामधिपो वीरो बलवानन्तकोपमः।। दमघोषात्मजो धीमाञ्शिशुपालो महाद्युतिः। धनुषोऽभ्याशमागम्य तस्थौ राज्ञां समक्षतः।। तदप्यारोप्यमाणं तु माषमात्रेऽभ्यताडयत्। धनुषा पीड्यमानस्तु जानुभ्यामगमन्महीम्।। तत उत्थाय राजा स स्वराष्ट्राण्यभिजग्मिवान्। ततो राजा जरासन्धो महावीर्यो महाबलः।। कम्बुग्रीवः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः। मत्तवारणताम्राक्षो मत्तवारणवेगवान्।। धनुषोऽभ्याशमागत्य तस्थौ गिरिरिवाचलः। धनुरारोप्यमाणं तु सर्षमात्रेऽभ्यताडयत्।।
- हिन्दी अनुवाद: इस प्रकार जब सभी क्षत्रिय असफल होकर पीछे हट गए, तब चेदि देश के अधिपति, यमराज के समान पराक्रमी, दमघोष के पुत्र बुद्धिमान और महाद्युतिमान वीर शिशुपाल धनुष के समीप आकर राजाओं के समक्ष खड़े हुए। वे जब उस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे, तब वह धनुष थोड़ा सा (माष मात्र) ही हिला और प्रत्यंचा के झटके से वे धनुष के दबाव से घुटनों के बल पृथ्वी पर गिर पड़े। तब वे राजा उठकर अपने राष्ट्र को वापस चले गए। तदनंतर शंख के समान ग्रीवा वाले, चौड़े कंधों वाले, मतवाले हाथी के समान पराक्रम, लाल नेत्रों और मतवाले हाथी के वेग वाले महावीर्य तथा महाबली राजा जरासंध धनुष के समीप एकचल पर्वत के समान आकर खड़े हुए। वे जब धनुष को चढ़ाने लगे, तब वह (सर्षप मात्र) थोड़ा सा हिलकर उन्हें ही आघात कर गया।
- व्याख्या: शिशुपाल और मगधराज जरासंध जैसे महान पराक्रमी राजा भी उस कठोर धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में असफल रहे और अपमानित होकर पीछे हट गए।
श्लोक 27, 28, 29, 30, 31, 32 और 33:
ततः शल्यो महावीर्यो मद्रराजो महाबलः। धनुषोऽभ्याशमागत्य तस्तु मुद्गमात्रेऽभ्यताडयत्।। तदैवागात्स्वयं राज्यं पश्चादनवलोकयन्। इदं धनुर्वरं कोऽद्य सज्यं कुर्वीत पार्थिवः।। इति निश्चित्य मनसा भूय एव स्थितस्तदा। ततो दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः परन्तपः।। मानी दृढास्त्रसंपन्नः सर्वैश्च नृपलक्षणैः। उत्थितः सहसा तत्र भ्रातृमध्ये महाबलः।। विलोक्य द्रौपदीं हृष्टो धनुषोऽभ्याशमागमगत। स बभौ धनुरादाय शक्रश्चापधरो यथा।। धनुरारोपयामास तिलमात्रेऽभ्यताडयत्। आरोप्यमाणं तद्राजा धनुषा बलिना तदा।। उत्तानशय्यमपतदङ्गुल्यन्तरताडितः। स ययौ ताडितस्तेन व्रीडन्निव नराधिपः।।
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर महावीर्य और महाबली मद्रराज शल्य धनुष के पास आए, किंतु वे भी (मुद्गर मात्र) थोड़ा सा ही हिला सके और असफल होकर बिना पीछे देखे अपने राज्य को लौट गए। "आज इस श्रेष्ठ धनुष को कौन सा पार्थिव (राजा) सज्य (प्रत्यंचा सहित) कर सकेगा?" ऐसा मन में निश्चय करके सब लोग चुपचाप खड़े रहे। तब भाइयों के मध्य से परंतप, अभिमानी, दृढ़ अस्त्रों से संपन्न और समस्त राजलक्षणों से युक्त महाबली राजा दुर्योधन सहसा उठ खड़े हुए। द्रौपदी को देखकर हर्षित हुए दुर्योधन धनुष के समीप आए, और धनुष को हाथ में लेकर वे ऐसे सुशोभित हुए मानो स्वयं इंद्र धनुष धारण किए हों। उन्होंने धनुष को चढ़ाना चाहा, किंतु वह थोड़ा सा (तिल मात्र) ही खिंच पाया। उस बलवान धनुष द्वारा प्रत्यंचा चढ़ाए जाते समय राजा दुर्योधन उंगलियों के बीच में आघात खाकर पीठ के बल (उत्तान शैया के समान) पृथ्वी पर गिर पड़े। उस शक्तिशाली धनुष से ताड़ित होकर वे लज्जित हुए से नराधिप वहाँ से हटे।
- व्याख्या: मद्रराज शल्य और कौरवराज दुर्योधन ने भी पूरी ताकत लगाकर धनुष उठाने का प्रयास किया, किंतु दुर्योधन तो धनुष के झटके से पीठ के बल जमीन पर औंधे मुँह जा गिरे।
श्लोक 34, 35, 36, 37 और 38:
ततो वैकर्तनः कर्णो वृषा वै सूतनन्दनः। धनुरभ्याशमागम्य तलयामास तद्धनुः।। तं चाप्यारोप्यमाणं तद्रोममात्रेऽभ्यताडयत्। त्रैलोक्यविजयी कर्णः सत्वे त्रैलोक्यविश्रुतः।। धनुषा सोऽपि निर्धूत इति सर्वे भयाकुलाः। एवं कर्णे विनिर्धूते धनुषा च नृपोत्तमाः।। चक्षुर्भिरपि नापश्यन्विनम्रमुखपङ्कजाः। दृष्ट्वा कर्णं विनिर्धूतं लोके वीरा नृपोत्तमाः।। निराशा धनुरुद्धारे द्रौपदीसंगमेऽपि च।।
- व्याख्या: तदनंतर विकर्तन के पुत्र (सूर्यपुत्र) सूतनंदन वृषा कर्ण धनुष के समीप आए और उन्होंने उस धनुष को तौला (उठाया)। त्रैलोक्य विजयी और अपने सत्त्व के लिए तीनों लोकों में विख्यात कर्ण जब उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने लगे, तब वह (रोम मात्र) थोड़ा सा ही हिला और धनुष के झटके से कर्ण भी आहत हो गए। कर्ण को भी उस धनुष द्वारा निर्धूत (पराजित/पटक दिया गया) देखकर सभी लोग भयभीत हो गए। कर्ण के इस प्रकार परास्त हो जाने पर संसार के सभी वीर और नृपोत्तम अपने कमल जैसे मुखों को नीचे झुकाकर अपनी आँखों से भी देखने में असमर्थ हो गए (लज्जित हो गए)। धनुष के उद्धार (चढ़ाने) और द्रौपदी के संगम से वे सभी राजा पूरी तरह निराश हो गए।
- व्याख्या: अंत में महाबली कर्ण ने आगे बढ़कर धनुष उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया, किंतु वे भी धनुष के प्रचंड झटके से असफल हो गए। बड़े-बड़े महारथियों और शूरवीरों के हार जाने से पूरी सभा में सन्नाटा छा गया और सभी राजाओं की उम्मीदें टूट गईं।
श्लोक 39 से 41 (अर्जुन का आगे बढ़ना, श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और अध्याय का समापन)
श्लोक 39, 40 और 41:
तस्मिंस्तु संभ्रान्तजने समाजे निक्षिप्तवादेषु जनाधिपेषु। कुन्तीसुतो जिष्णुरियेष कर्तुं सज्यं धनुस्तत्सशरं च वीरः।। ततो वरिष्ठः सुरदानवानामुदरधीर्वृष्णिकुलप्रवीरः। जहर्ष रामेण स पीड्य हस्तं हस्तंगतां पाण्डुसुतस्य मत्वा।। न जज्ञिरेऽन्ये नृपविप्रमुख्यः संछन्नरूपानथ पाण्डुपुत्रान्। विना हि लोके च यदुप्रवीरौ धौम्यं हि धर्मं सह सोदरांश्च।।
- हिन्दी अनुवाद: जब समाज के सभी लोग संभ्रान्त (हताश) हो चुके थे और सभी जनाधिप अपने दावे छोड़कर चुप बैठे थे, तब कुंतीपुत्र वीर जिष्णु (अर्जुन) ने उस धनुष को सज्य करने और बाणों से सुसज्जित करने की इच्छा की। तब सुर और दानवों में श्रेष्ठ, उदार बुद्धि वाले और वृष्णिकुल के प्रवीर (श्रीकृष्ण) ने यह मानकर कि "यह (द्रौपदी रूपी रत्न) अब पाण्डुपुत्र (अर्जुन) के हाथ आ गया है," बलरामजी का हाथ दबाकर अत्यंत हर्ष व्यक्त किया। संसार में अन्य कोई भी राजा या विप्रमुख्य यह नहीं जानते थे कि वे पाण्डुपुत्र छद्म वेश (ब्राह्मण रूप) में छिपे हुए हैं— सिवाय यदुवंश के दो प्रवीरों (कृष्ण-बलराम), पुरोहित धौम्य और उनके अपने भाइयों (पांडवों) के।
- व्याख्या: जब दुनिया के तमाम बड़े-बड़े राजा और महारथी धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने में पूरी तरह असफल हो गए, तब साधारण ब्राह्मण के वेश में बैठे अर्जुन ने आगे बढ़ने का निश्चय किया। भगवान श्रीकृष्ण दूर से ही यह भांप गए कि अब अर्जुन स्वयंवर जीतने वाले हैं, और वे मन ही मन अत्यंत प्रफुल्लित हुए। इसी के साथ यह अध्याय पूर्ण होता है।
