महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७०

महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१७०

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत हिडिम्बवधपर्व के 170वें (अंतिम) अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 4 (शालिहोत्र आश्रम से प्रस्थान और पांडवों द्वारा तपस्या व अध्ययन)

श्लोक 1 और 2:

वैशंपायन उवाच। ततस्ते पाण्डवाः सर्वे शालिहोत्राश्रमे तदा। पूजितास्तेन वन्येन तमामन्त्र्य महामुनिम्।। जटाः कृत्वाऽऽत्मनः सर्वे वल्कलाजिनवाससः। कुन्त्या सह महात्मानो बिभ्रतस्तापसं वपुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— तदनंतर महामुनि शालिहोत्र द्वारा वन के फल-फूलों से सत्कार किए जाने पर, उन महामुनि से आज्ञा लेकर सभी पाण्डवों ने माता कुन्ती के साथ अपने सिर पर जटाएँ धारण कीं, वल्कल (पेड़ की छाल) और मृगछाला (अजिन) के वस्त्र पहने तथा तापसों (ऋषियों) जैसा शरीर धारण कर लिया।
  • व्याख्या: शालिहोत्र आश्रम छोड़ने से पहले पांडवों ने संन्यासियों और तपस्वियों का वेश धारण कर लिया ताकि वे अज्ञातवास में अपनी पहचान छिपा सकें।

श्लोक 3 और 4 (क, ख, ग):

ब्राह्मं वेदमधीयाना वेदाङ्गानि च सर्वशः। नीतिशास्त्रं च धर्मज्ञा न्यायज्ञानं च पाण्डवाः।। शालिहोत्रप्रसादेन लब्ध्वा प्रीतिमवाप्य च।' ते वनेन वनं गत्वा घ्नन्तो मृगगणान्बहूउन। अपक्रम्य ययू राजंस्त्वरमाणा महारथाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वे पाण्डव शालिहोत्र की कृपा से ब्रह्मवेद (वेद), समस्त वेदांगों, नीतिशास्त्र, धर्मशास्त्र और न्यायशास्त्र का अध्ययन करते हुए परम प्रसन्नता को प्राप्त हुए। हे राजन्! इसके बाद वे महारथी वन-से-वन घूमते हुए, बहुत से हिरणों का शिकार करते हुए और तेजी से आगे की ओर प्रस्थान कर गए।
  • व्याख्या: पांडवों ने उस आश्रम में रहकर न केवल आध्यात्मिक और धार्मिक शिक्षा प्राप्त की, बल्कि अपनी यात्रा आगे बढ़ाते हुए नए वनों को पार किया।

श्लोक 5 से 8 (विभिन्न जनपदों की यात्रा और महर्षि व्यास से भेंट)

श्लोक 5 और 6:

मत्स्यांस्त्रिगर्तान्पाञ्चालान्कीचकानन्तरेण च। रमणीयान्वनोद्देशान्प्रेक्षमाणाः सरांसि च।। क्वचिद्वहन्तो जननीं त्वरमाणा महारथाः। `क्वचिच्छ्रान्ताश्च कान्तारे क्वचित्तिष्ठन्ति हर्षिताः'।।

  • हिन्दी अनुवाद: वे मत्स्य, त्रिगर्त, पांचाल और कीचक देशों के बीच के रमणीय वन-प्रदेशों तथा सरोवरों को देखते हुए आगे बढ़े। वे महारथी कभी अपनी माता को (बारी-बारी से) पीठ पर ढोते हुए तेजी से चलते थे, कभी सघन वन में थक जाने पर कहीं आनंदपूर्वक विश्राम करते थे।
  • व्याख्या: पांडवों की यह गुप्त यात्रा विभिन्न जनपदों की सीमाओं से गुजरते हुए माता कुन्ती की सुविधा का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ रही थी।

श्लोक 7 और 8:

क्वचिच्छन्देन गच्छन्तस्ते जग्मुः प्रसभं पुनः। पथि द्वैपायन सर्वे ददृशुः स्वपितामहम्।। तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं तदा। तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सह मात्रा परन्तपाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: कभी वे तीव्र ध्वनि या उत्साह के साथ आगे बढ़ते हुए मार्ग में आगे बढ़े। तभी उन परंतप पाण्डवों ने मार्ग में अपने पितामह कृष्णद्वैपायन (महर्षि व्यास) को देखा। तब माता कुन्ती के साथ उन सभी ने महात्मन् कृष्णद्वैपायन को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।
  • व्याख्या: यात्रा के दौरान पांडवों की भेंट एक बार फिर अपने दादा महर्षि वेद व्यास से हो जाती है, जिनके प्रति वे पूर्ण श्रद्धा प्रकट करते हैं।

श्लोक 9 से 11 (महर्षि व्यास का मार्गदर्शन और एकचक्र नगर की ओर संकेत)

श्लोक 9 और 10:

व्यास उवाच। तदाश्रमान्निर्गमनं मया ज्ञातं नरर्षभाः। घटोत्कचस्य चोत्पत्तिं ज्ञात्वा प्रीतिरवर्धत।। इदं नगरमभ्याशे रमणीयं निरामयम्। वसतेह प्रतिच्छन्ना ममागमनकाङ्क्षिणः।।

  • हिन्दी अनुवाद: व्यासजी बोले— "हे नरश्रेष्ठो! तुम्हारे उस आश्रम से प्रस्थान करने की बात मैं जानता हूँ। घटोत्कच की उत्पत्ति (जन्म) का समाचार जानकर मेरा प्रेम और प्रसन्नता बढ़ गई है। पास ही में यह एक सुंदर और निरोगी (सुरक्षित) नगर है। तुम लोग मेरे आने की प्रतीक्षा करते हुए यहीं छिपकर निवास करो।"
  • व्याख्या: व्यासजी पांडवों की हर गतिविधि से अवगत हैं और उन्हें एक सुरक्षित नगर (जो कि 'एकचक्र नगर' है) में छिपकर रहने की सलाह देते हैं।

श्लोक 11:

वैशंपायन उवाच। एवं स तान्समाश्वास्य व्यासः पार्तानरिन्दमान्। एकचक्रामभिगतां कुन्तीमाश्वासयत्प्रभुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डवों को इस प्रकार आश्वस्त करके और एकचक्र नगर के पास आई हुई माता कुन्ती को भी प्रभु व्यासजी ने ढांढस बंधाया।
  • व्याख्या: व्यासजी के इस मार्गदर्शन से पांडवों और माता कुन्ती को अज्ञातवास के दौरान एक सुरक्षित ठिकाना मिल जाता है।

श्लोक 12 से 15 (व्यासजी का उपदेश और प्रस्थान)

श्लोक 12 और 13:

श्रीव्यास उवाच। कुर्यान्न केवलं धर्मं दुष्कृतं च तथान नरः। सुकृतं दुष्कृतं लोके न कर्ता नास्ति कश्चन।। अवश्यं लभते कर्ता फलं वै पुण्यपापयोः। दुष्कृतस्य फलेनैव प्राप्तं व्यसनमुत्तमम्।।

  • श्री व्यासजी बोले— "मनुष्य केवल धर्म ही करे, ऐसा नहीं है, वह इस संसार में सुकृत (पुण्य) और दुष्कृत (पाप) दोनों ही कर्म करता है। ऐसा कोई कर्ता नहीं है जिसने कुछ न किया हो। कर्म करने वाला मनुष्य अपने पुण्य और पाप दोनों का फल अवश्य प्राप्त करता है। तुम्हारे द्वारा पूर्व में किए गए किसी दुष्कृत (कर्म) के फलस्वरूप ही तुम्हें यह महान व्यसन (विपत्ति/कष्ट) प्राप्त हुआ है।"
  • व्याख्या: व्यासजी कर्म के सिद्धांत को समझाते हुए कहते हैं कि सुख-दुःख सभी कर्मों के परिणाम हैं, इसलिए इस आपदा को समझकर धैर्य रखना चाहिए।

श्लोक 14 और 15:

तस्मान्माधवि मानार्हे मा च शोके मनः कृथाः। वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा निवेश्यैनान्ब्राह्मणस्य निवेशने।। जगाम भगवान्व्यासो यताकाममृषिः प्रभुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए हे मानार्ह माधवी (कुन्ती)! तुम अपने मन में शोक मत करो।" वैशंपायन जी कहते हैं— उन्हें ऐसा कहकर और एक ब्राह्मण के घर में उनका निवास सुरक्षित कराकर, भगवान ऋषि प्रभु व्यासजी अपनी इच्छा के अनुसार (जहाँ चाहते थे) चले गए।
  • व्याख्या: महर्षि व्यास माता कुन्ती को सांत्वना देकर और एक ब्राह्मण के आवास में पांडवों के ठहरने की व्यवस्था कराकर अंतर्ध्यान हो जाते हैं या अपने लोक प्रस्थान करते हैं। यहाँ हिडिम्बवधपर्व पूर्ण होता है।
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