महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत अर्जुनवनवासपर्व के 237वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है।
इस अध्याय में शापमुक्ति के विधान, देवर्षि नारद के परामर्श, अर्जुन द्वारा पाँचों अप्सराओं (ग्राहों) को मुक्त कर 'पञ्चनारी तीर्थ' का उद्धार करने, पुनः मणलूर (मणिपूर) लौटकर बभ्रुवाहन को राजा चित्रवाहन को सौंपने तथा दक्षिण भारत के गोकर्ण तीर्थ की ओर यात्रा का सजीव वर्णन है।
श्लोक 1 से 11: (ब्राह्मण द्वारा शाप-मुक्ति का उपाय और 'पञ्चनारी तीर्थ' का नामकरण)
श्लोक 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 और 11:
वर्गोवाच। ततो वयं प्रव्यथिताः सर्वा भारतसत्तम। अयाम शरणं विप्रं तं तपोधनमच्युतम्।। रूपेण वयसा चैव कन्दर्पेण च दर्पिताः। अयुक्तं कृतवत्यः स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज।। एष एव वधोऽस्माकं स्वयं प्राप्तस्तपोधन। यद्वयं संशितात्मानं प्रलोब्धुं त्वामिहागताः।। अवध्यास्तु स्त्रियः सृष्टा मन्यन्ते धर्मचारिणः। तस्माद्धर्मेण वर्ध त्वं नास्मन्हिंसितुमर्हसि।। सर्वभूतेषु धर्मज्ञ मैत्रो ब्राह्मण उच्यते। सत्यो भवतु कल्याण एष वादो मनीषिणाम्।। शरणं च प्रपन्नानां शिष्टाः कुर्वन्ति पालनम्। शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म तस्मात्त्वं क्षन्तुमर्हसि।। वैशंपायन उवाच। एवमुक्तः स धर्मात्मा ब्राह्मणः शुभकर्मकृत्। प्रसादं कृतवान्भार्या रविसोमसमप्रभः।। ब्राह्मण उवाच। शतं शतसहस्रं तु सर्वमक्षय्यवाचकम्। परिमाणं शतं त्वेतन्नेदमक्षय्यवाचकम्।। यदा च वो ग्राहभूता गृह्णन्तीः पुरुषाञ्जले। उत्कर्षति जलात्तस्मात्स्थलं पुरुषसत्तमः।। तदा यूयं पुनः सर्वाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यथ। अनृतं नोक्तपूर्वं मे हसतापि कदाचन।। तानि सर्वाणि तीर्थानि ततः प्रभृति चैव ह। नारीतीर्थानि नाम्नेह ख्यातिं यास्यन्ति सर्वशः। पुण्यानि च भविष्यन्ति पावनानि मनीषिणां।।
- हिन्दी अनुवाद: वर्गा बोली— "हे भारतसत्तम! उस शाप से व्यथित होकर हम सभी उन अच्युत तपस्वी ब्राह्मण की शरण में गईं और बोलीं— 'हे द्विज! अपने रूप, सौंदर्य और कामदेव के मद में अंधी होकर हमने अनुचित कार्य किया है, आप हमें क्षमा करें! हे तपोधन! संयमी आप जैसे महात्मा को लुभाने आना ही हमारे लिए मृत्यु तुल्य दंड बन गया है। धर्मचारियों का मत है कि स्त्रियाँ अवध्य (न मारने योग्य) होती हैं, इसलिए आप धर्म की रक्षा करते हुए हमें नष्ट न करें। ज्ञानी कहते हैं कि ब्राह्मण सभी प्राणियों के प्रति मित्रभाव रखने वाले होते हैं, उनका वह कथन आपमें सत्य हो! शिष्ट जन अपनी शरण में आए लोगों की रक्षा करते हैं, हम आपकी शरण आए हैं, अतः क्षमा कीजिए।' वैशंपायन जी कहते हैं— सूर्य और चंद्रमा के समान तेजस्वी उस धर्मात्मा शुभकर्मी ब्राह्मण ने प्रसन्न होकर दया की। ब्राह्मण बोले— 'शाप का समय जो मैंने सौ (१००) कहा है, वह अक्षय (अनंत) नहीं है। जब तुम सब जल में पुरुषों को पकड़ोगी और कोई पुरुषश्रेष्ठ तुम्हें जल से बाहर थल पर खींच लाएगा, तब तुम पुनः अपना मूल दिव्य रूप प्राप्त कर लोगी। मैंने हँसी में भी कभी असत्य नहीं कहा है। और आज से ये पाँचों तीर्थ 'पञ्चनारी तीर्थ' के नाम से संसार में प्रसिद्ध होंगे तथा विद्वानों को पवित्र करने वाले पुण्य तीर्थ बनेंगे।'"
- व्याख्या: अनुताप करने पर ब्राह्मण ने दया करके शाप-मुक्ति की मर्यादा तय कर दी कि जल से बाहर जमीन पर खींचे जाने पर ही वे शापमुक्त होंगी।
श्लोक 12 से 20: (देवर्षि नारद का मार्गदर्शन और अर्जुन द्वारा पाँचों अप्सराओं का उद्धार)
श्लोक 12, 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19 और 20:
वर्गोवाच। ततोऽभिवाद्य तं विप्रं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्। अचिन्तयामोऽपसृत्य तस्माद्देशात्सुदुःखिताः।। क्व नु नाम वयं सर्वाः कालेनाल्पेन तं नरम्। समागच्छेम यो नस्तद्रूपमापादयेत्पुनः।। ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत। दृष्ट्वत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम्।। संप्रहृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्षिममितद्युतिम्। अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म व्रीडिताननाः।। स नोऽपृच्छद्दुःखमूलमुक्तवत्यो वयं च तम्। श्रुत्वा तत्र यथावृत्तमिदं वचनमब्रवीत्।। दक्षिणे सागरानूपे पञ्च तीर्थानि सन्ति वै। पुण्यानि रमणीयानि तानि गच्छत मा चिरं।। तत्राशु पुरुषव्याघ्रः पाण्डवेयो धनञ्जयः। मोक्षयिष्यति शुद्धात्मा दुःखादस्मान्न संशयः।। इत्युक्त्वा नारदः सर्वास्तत्रैवान्तरधीयत। तस्य सर्वा वयं वीर श्रुत्वा वाक्यमितो गताः। तदिदं सत्यमेवाद्य मोक्षिताहं त्वयाऽनघ।। एतास्तु मम ताः सख्यश्चतस्रोऽन्या जले श्रिताः। कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय।।
- हिन्दी अनुवाद: वर्गा बोली— "तब उस विप्र को प्रणाम व प्रदक्षिणा करके हम दुःखी होकर उस स्थान से हटीं और सोचने लगीं कि हमें वह पुरुष शीघ्र कहाँ मिलेगा जो हमारा उद्धार करेगा। हे भारत! विचार करते ही हमें अमित तेजस्वी देवर्षि नारद के दर्शन हुए। उन्हें देखकर हम लज्जित मुख से प्रणाम कर खड़ी हो गईं। उन्होंने हमारे दुःख का कारण पूछा और सब सुनकर कहा— 'दक्षिण समुद्र के तट पर पाँच रमणीय तीर्थ हैं, तुम बिना देर किए वहाँ जाओ। वहाँ शीघ्र ही पुरुषश्रेष्ठ पाण्डुपुत्र धनंजय (अर्जुन) आयेंगे और तुम्हें इस दुःख से मुक्त करेंगे, इसमें संशय नहीं है।' ऐसा कहकर नारद जी अंतर्ध्यान हो गए। उनकी बात मानकर हम यहाँ आईं और आज आपके द्वारा मेरा उद्धार सत्य सिद्ध हुआ! हे अनघ वीर! जल में स्थित मेरी अन्य चार सखियों का भी उद्धार कीजिए।"
- व्याख्या: देवर्षि नारद ने ही उन अप्सराओं को दक्षिण समुद्र के तीर्थों में जाने की सलाह दी थी, क्योंकि वे जानते थे कि वनवास के दौरान अर्जुन उधर से अवश्य गुजरेंगे।
श्लोक 21 से 25: (अप्सराओं का स्वर्ग-गमन और अर्जुन का पुनः मणलूर आगमन)
श्लोक 21, 22, 23, 24 और 25:
वैशंपायन उवाच। ततस्ताः पाण्डवश्रेष्ठः सर्वा एव विशांपते। अवगाह्य च तत्तीर्थं गृहीतो ग्राहिभिस्तदा।। ग्राहीभिश्चोत्तताराशु तरयामास तत्क्षणात्। सा चाप्सरा बभूवाशु सर्वाभरणभूषिता।। एवं क्रमेण ताः सर्वा मोक्षयामास वीर्यवान्।। उत्थाय च जलात्तस्मात्प्रतिलभ्य वपुः स्वकम्। तास्तदाऽप्सरसो राजन्नदृश्यन्त यथा पुरा।। तीर्थानि शोधयित्वा तु तथानुज्ञाय ताः प्रभुः। चित्राङ्गदां पुनर्द्रष्टुं मणलूरं पुनर्ययौ।।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे विशांपते! तत्पश्चात पाण्डवश्रेष्ठ वीर्यवान अर्जुन ने उन शेष तीर्थों में प्रवेश किया। जैसे ही उन ग्राहों (मगरों) ने उन्हें पकड़ा, अर्जुन ने तुरंत उन्हें जल से बाहर निकाल दिया और वे पल भर में आभूषणों से सजी सुंदर अप्सराएँ बन गईं। इस प्रकार अर्जुन ने क्रम से उन पाँचों अप्सराओं को मुक्त कर दिया। जल से बाहर निकलकर अपना मूल दिव्य रूप पाकर वे अप्सराएँ पहले की भाँति दिव्य दिखाई देने लगीं। उन पवित्र तीर्थों को उपद्रव-मुक्त (शुद्ध) करके और अप्सराओं से विदाई लेकर प्रभु अर्जुन चित्राङ्गदा से पुनः मिलने मणलूर (मणिपूर) लौट आए।
- व्याख्या: अर्जुन ने निर्भय होकर पाँचों खतरनाक तीर्थों को जल-जंतुओं के भय से मुक्त किया और उन्हें पुनः सर्वसाधारण के स्नान योग्य 'पञ्चनारी तीर्थ' बनाया।
श्लोक 26 से 38: (पुत्र बभ्रुवाहन का जन्म, चित्राङ्गदा को संदेश और गोकर्ण तीर्थ यात्रा)
श्लोक 26, 27, 28, 29 और 30:
तस्यामजनयत्पुत्रं राजानं बभ्रुवाहनम्। तं दृष्ट्वा पाण्डवो राजंश्चित्रवाहनमब्रवीत्।। चित्राङ्गदायाः शुल्कं त्वं गृहाण बभ्रुवाहनम्। अनेन च भविष्यामि ऋणान्मुक्तो नराधिप।। चित्राङ्गदां पुनर्वाक्यमब्रवीत्पाण्डुनन्दनः। इहैव भव भद्रं ते वर्धेथा बभ्रुवाहनम्।। इन्द्रप्रस्थनिवासं मे त्वं तत्रागत्य रंस्यसि। कुन्ती युधिष्ठिरं भीमं भ्रातरौ मे कनीयसौ।। आगत्य तत्र पश्येथा अन्यानपि च बान्धवान्। बान्धवैः सहिताः सर्वैर्नन्दसे त्वमनिन्दिते।।
- हिन्दी अनुवाद: वहाँ चित्राङ्गदा के गर्भ से अर्जुन के पुत्र राजा 'बभ्रुवाहन' का जन्म हुआ। बालक को देखकर पांडव अर्जुन ने राजा चित्रवाहन से कहा— "हे नराधिप! चित्राङ्गदा के शुल्क स्वरूप आप इस बालक बभ्रुवाहन को स्वीकार करें। इसके द्वारा मैं आपकी प्रतिज्ञा (पुत्रिका-धर्म के ऋण) से मुक्त होता हूँ।" फिर पाण्डुनंदन अर्जुन ने चित्राङ्गदा से कहा— "हे कल्याणि! तुम्हारा भला हो, तुम यहीं रहकर बभ्रुवाहन का लालन-पालन करो। फिर जब तुम मेरे इंद्रप्रस्थ निवास में आओगी, तब वहाँ आनंद मनाओगी। वहाँ आकर माता कुंती, युधिष्ठिर, भीम और मेरे छोटे भाइयों तथा अन्य संबंधियों के दर्शन करना और सब बंधुओं के साथ आनंदित होना।"
- व्याख्या: अर्जुन ने अपने वचन के अनुसार चित्राङ्गदा के पुत्र बभ्रुवाहन को उनके नाना चित्रवाहन के वंशज के रूप में समर्पित कर दिया, जो आगे चलकर मणिपुर के महान राजा बने।
श्लोक 31, 32, 33, 34, 35, 36, 37 और 38:
धर्मे स्थितः सत्यधृतिः कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः। जित्वा तु पृथिवीं सर्वां राजसूयं करिष्यति।। तत्रागच्छन्ति राजानः पृथिव्यां नृपसंज्ञिताः। बहूनि रत्नान्यादाय आगमिष्यति ते पिता।। एकसार्थं प्रयातासि चित्रवाहनसेवया। द्रक्ष्यामि राजसूये त्वां पुत्रं पालय मा शुचः।। बभ्रुवाहननाम्ना तु मम प्राणो बहिश्चरः। तस्माद्भरस्व पुत्रं वै पुरुषं वंशवर्धनम्।। चित्रावाहनदायादं धर्मात्पौरवनन्दनम्। पाण्डवानां प्रियं पुत्रं तस्मात्पालय सर्वदा।। विप्रयोगेण संतापं मा कृथास्त्वमनिन्दिते। चित्राङ्गदामेवमुक्त्वा सागरानूपमाश्रितः।। स्थानं दूरं समाप्लुत्य दत्त्वा बहुधनं तदा। केरलान्समतिक्रम्य गोकर्णमभितोऽगमत्।। आद्यं पशुपतेः स्थानं दर्शनादेव मुक्तिदम्। यत्र पापोऽपि मनुजः प्राप्नोत्यभयदं पदम्।।
- हिन्दी अनुवाद: "सत्यव्रती कौंतेय युधिष्ठिर पूरी पृथ्वी को जीतकर राजसूय यज्ञ करेंगे। उसमें पृथ्वी भर के राजा आएँगे और तुम्हारे पिता भी बहुत-से रत्न लेकर आएँगे। तुम उन्हीं के साथ चलकर वहाँ आना, मैं तुम्हें राजसूय यज्ञ में देखूँगा। अतः शोक मत करो और पुत्र का पालन करो। यह बभ्रुवाहन मानो मेरा बाहर घूमता हुआ प्राण ही है! इस वंश-वर्धक, चित्रवाहन के उत्तराधिकारी और पांडवों के प्रिय पुत्र का सदा ध्यान रखना। हे अनंदिते! मेरे वियोग का संताप मत करना।" चित्राङ्गदा को ऐसा कहकर अर्जुन समुद्र तट के सहारे आगे बढ़े। दूर देशों की यात्रा करते हुए, दान देते हुए और केरल देश को पार करके वे भगवान पशुपति के आदि-स्थान 'गोकर्ण' (कर्नाटक/पश्चिम तट) पहुँचे— जो स्थान केवल दर्शन मात्र से मुक्ति देने वाला है और जहाँ पापी मनुष्य भी अभय पद पाता है।
- व्याख्या: अर्जुन ने चित्राङ्गदा को आश्वस्त किया कि भावी राजसूय यज्ञ के अवसर पर वे सब पुनः मिलेंगे। इसके बाद अर्जुन दक्षिण भारत के तटवर्ती क्षेत्रों और केरल प्रदेश को लांघकर पश्चिम तट पर स्थित भगवान शिव के पावन तीर्थ 'गोकर्ण' पहुँचे।
इसी के साथ श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत अर्जुनवनवासपर्व का 237वाँ अध्याय पूर्ण होता है।
आप इस अध्ययन यात्रा में आगे के प्रसंग (द्वारका यात्रा, सुभद्रा-हरण आदि) पर चर्चा जारी रखना चाहते हैं?
