महाभारत के आदिपर्व के यहाँ से खाण्डवदाह पर्व का प्रारंभ होता है। इस 248वें अध्याय में राजा युधिष्ठिर के न्यायप्रिय धर्मराज रूप, श्रीकृष्ण और अर्जुन के यमुना तट पर विहार करने, तथा खाण्डव वन को जलाने की इच्छा से साक्षात् अग्निदेव के ब्राह्मण वेश में उनके समक्ष प्रकट होने का वर्णन है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 7
वैशंपायन उवाच। इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्रुरन्यान्नराधिपान्। शासनाद्धृतराष्ट्रस्य राज्ञः शान्तनवस्य च।। 1 ।। आश्रित्य धर्मराजानं सर्वलोकोऽवसत्सुखम्। पुण्यलक्षणकर्माणं स्वदेहमिव देहिनः।। 2 ।। स समं धर्मकामार्थान्सिषेवे भरतर्षभ। त्रीनिवात्मसमान्बन्धून्नीतिमानिव मानयन्।। 3 ।। तेषां समविभक्तानां क्षितौ देहवतामिव। बभौ धर्मार्थकामानां चतुर्थ इव पार्थिवः।। 4 ।। अध्येतारं परं वेदान्प्रयोक्तारं महाध्वरे। रक्षितारं शुभाँल्लोकाँल्लोभिरे तं जनाधिपम्।। 5 ।। अधिष्ठानवती लक्ष्मीः परायणवती मतिः। वर्धमानोऽखिलो धर्मस्तेनासीत्पृथिवीक्षिताम्।। 6 ।। भ्रातृभिः सहितौ राजा चतुर्भिरधिकं बभौ। प्रयुज्यमानैर्विततो वेदैरिव महाध्वरः।। 7 ।।
अनुवाद: वैशम्पायन जी कहते हैं—राजा धृतराष्ट्र और शांतनुपुत्र भीष्म की आज्ञा का पालन करते हुए पांडव इंद्रप्रस्थ में निवास करते हुए अन्य राजाओं पर विजय प्राप्त करने लगे। जैसे जीव अपने देह का आश्रय लेकर रहता है, वैसे ही संपूर्ण प्रजाजन पुण्यप्रद कर्म करने वाले धर्मराज युधिष्ठिर के आश्रय में सुखपूर्वक निवास करने लगे। हे भरतश्रेष्ठ! नीतिमान युधिष्ठिर धर्म, अर्थ और काम—इन तीनों पुरुषार्थों का अपने सगे भाइयों के समान समान रूप से सेवन और सम्मान करते थे। पृथ्वी पर धर्म, अर्थ और काम को समभाव से सँभालते हुए वे राजा मानो चौथे पुरुषार्थ (मोक्ष) के समान शोभा पा रहे थे। वेदों के परम स्वाध्यायी, महान यज्ञों के अनुष्ठाता और प्रजा के रक्षक उन राजा युधिष्ठिर की सभी लोग सराहना करते थे। उनके राज्य में लक्ष्मी स्थिर थीं, बुद्धि कल्याणकारी थी और राजाओं का संपूर्ण धर्म निरंतर बढ़ रहा था। चारों भाइयों से घिरे हुए राजा युधिष्ठिर ऐसे शोभा पा रहे थे जैसे चारों वेदों द्वारा संपन्न किया जाने वाला महायज्ञ सुशोभित होता है।
व्याख्या: इन श्लोकों में पांडवों के इंद्रप्रस्थ के सुशासन का अत्यंत विशद और सुंदर वर्णन है। युधिष्ठिर के धर्मराजत्व में प्रजा अत्यंत सुखी और समृद्ध थी, और पांडव सर्वत्र धर्म की स्थापना कर रहे थे।
श्लोक 8 - 13
तं तु धौम्यादयो विप्राः परिवार्योपतस्थिरे। बृहस्पतिसमा मुख्याः प्रजापतिमिवामराः।। 8 ।। धर्मराजे ह्यतिप्रीत्या पूर्णचन्द्र इवामले। प्रजानां रेमिरे तुल्यं नेत्राणि हृदयानि च।। 9 ।। न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे। यद्बभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत्।। 10 ।। न ह्ययुक्तं न चासत्यं नासह्यं न च वाऽप्रियम्। भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य धीमतः।। 11 ।। स हि सर्वस्य लोकस्य हितमात्मन एव च। चिकीर्षन्सुमहातेजा रेमे भरतसत्तम।। 12 ।। तथा तु मुदिताः सर्वे पाण्डवा विगतज्वराः। अवसन्पृथिवीपालाँस्तापयन्तः स्वतेजसा।। 13 ।।
अनुवाद: बृहस्पति के समान विद्वान धौम्य आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण युधिष्ठिर की सेवा में वैसे ही उपस्थित रहते थे जैसे प्रजापति की सेवा में देवता रहते हैं। निर्मल पूर्णचंद्र के समान धर्मराज युधिष्ठिर को देखकर सभी प्रजाजनों के नेत्र और हृदय अत्यंत आनंदित होते थे। प्रजा केवल भाग्य के भरोसे सुखी नहीं थी, बल्कि युधिष्ठिर वही कार्य करते थे जो प्रजा के मन को प्रिय और हितकर होता था। उन सुंदर बोलने वाले बुद्धिमान पांडव (युधिष्ठिर) के मुख से कभी कोई अयोग्य, असत्य, असह्य या अप्रिय वचन नहीं निकलता था। हे भरतश्रेष्ठ! वे महातेजस्वी राजा संपूर्ण संसार के साथ-साथ अपने हित की इच्छा रखते हुए आनंदित रहते थे। इस प्रकार सभी पांडव शोक-संताप से रहित होकर अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे और अपने तेज से अन्य राजाओं को प्रभावित (संतप्त) करने लगे।
व्याख्या: युधिष्ठिर का व्यक्तित्व सत्य, अहिंसा और मधुर वाणी से युक्त था। वे अपनी प्रजा के हित के लिए निरंतर कार्य करते थे, जिससे पूरे कुरु प्रदेश में शांति और खुशहाली छाई हुई थी।
श्लोक 14 - 17
ततः कतिपयाहस्य बीभत्सुः कृष्णमब्रवीत्। उष्णानि कृष्ण वर्तन्ते गच्छावो यमुनां प्रति।। 14 ।। सुहृज्जनवृतौ तत्र विहृत्य मधुसूदन। सायाह्ने पुनरेष्यावो रोचतां ते जनार्दन।। 15 ।। वासुदेव उवाच। कुन्तीमातर्ममाप्येतद्रोचते यद्वयं जले। सुहृज्जनवृताः पार्थ विहरेम यथासुखम्।। 16 ।। वैशंपायन उवाच। आमन्त्र्य तौ धर्मराजमनुज्ञाप्य च भारत। जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृज्जनवृतौ ततः।। 17 ।।
अनुवाद: कुछ दिनों के बाद बीभत्सु (अर्जुन) ने श्रीकृष्ण से कहा—"हे कृष्ण! गर्मी के दिन आ गए हैं, चलिए हम यमुना नदी के तट पर चलें। हे मधुसूदन! मित्रों और सगे-संबंधियों के साथ वहाँ विहार करके सायं काल में पुनः लौट आएँगे, यदि आपको यह रुचिकर लगे।" वासुदेव श्रीकृष्ण बोले—"हे कुंतीपुत्र पार्थ! मुझे भी यह अत्यंत प्रिय है कि हम मित्रों के साथ जल के निकट चलकर स्वेच्छापूर्वक विहार करें।" वैशम्पायन जी कहते हैं—हे भारत! इसके बाद अर्जुन और गोविंद श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर से अनुमति प्राप्त की और अपने मित्रजनों के साथ यमुना तट की ओर प्रस्थान किया।
व्याख्या: ग्रीष्मकाल के मौसम में अर्जुन और श्रीकृष्ण ने जलविहार और वन-विहार का विचार बनाया और राजा युधिष्ठिर की आज्ञा लेकर अपने परिजनों एवं सखियों के साथ यमुना तट की ओर गए।
श्लोक 18 - 29
विहरन्खाण्डवप्रस्थे काननेषु च माधवः। पुष्पितोपवनां दिव्यां ददर्श यमुनां नदीम्।। 18 ।। तस्यास्तीरे वनं दिव्यं सर्वर्तुसुमनोहरम्। आलयं सर्वभूतानां खाण्डवं खड्गचर्मभृत्।। 19 ।। ददर्श कृत्स्नं तं देशं सहितः सव्यसाचिना। ऋक्षगोमायुशार्दूलवृककृष्णमृगान्वितम्।। 20 ।। शाखामृगगणैर्जुष्टं गजद्वीपिनिषेवितम्। शकबर्हिणदात्यूहहंससारसनादितम्।। 21 ।। नानामृगसहस्रैश्च पक्षिभिश्च समावृतम्। मानार्हं तच्च सर्वेषां देवदानवरक्षसाम्।। 22 ।। आलयं पन्नगेन्द्रस्य तक्षकस्य महात्मनः। वेणुशाल्मलिबिल्वातिमुक्तजंब्वाम्रचम्पकैः।। 23 ।। अङ्कोलपनसाश्वत्थतालजम्बीरवञ्जुलैः। एकपद्मकतालैश्च शतशश्चैव रौहिणैः।। 24 ।। नानावृक्षैः समायुक्तं नानागुल्मसमावृतम्। वेत्रकीचकसंयुक्तमाशीविषनिषेवितम्।। 25 ।। विगतार्कं महाभोगविततद्रुमसङ्कटम्। व्यालदंष्ट्रिगणाकीर्णं वर्जितं सर्वमानुषैः।। 26 ।। रक्षसां भुजगेन्द्राणां पक्षिणां च महालयम्। खाण्डवं सुमहाप्राज्ञः सर्वलोकविभागवित्।। 27 ।। दृष्टवान्सर्वलोकेश अर्जुनेन समन्वितः। पीताम्बरधरो देवस्तद्वनं बहुधा चरन्।। 28 ।। सद्रुमस्य सयक्षस्य सभूतगणपक्षिणः। खाण्डवस्य विनाशं तं ददर्श मधुसूदनः।। 29 ।।
अनुवाद: खांडवप्रस्थ के वनों में विहार करते हुए माधव श्रीकृष्ण ने फूलों से खिले उपवनों वाली दिव्य यमुना नदी को देखा। उसके तट पर सभी ऋतुओं में मनोहर, सभी प्राणियों का आश्रयस्थल 'खाण्डव वन' स्थित था। अर्जुन (सव्यसाची) के साथ श्रीकृष्ण ने उस पूरे क्षेत्र को देखा जो भालू, गीदड़, बाघ, भेड़िए, कस्तूरी मृगों, बंदरों, हाथियों, चीतों तथा तोते, मोर, चातक, हंस और सारस जैसे पक्षियों के कलरव से गुंजायमान था। वह वन देवताओं, दानवों और राक्षसों के लिए भी पूजनीय तथा महात्मा नागराज तक्षक का निवास स्थान था। वह बाँस, सेमल, बेल, जामुन, आम, चंपा, अंकोल, कटहल, पीपल, ताड़, नींबू और अनेक प्रकार की लताओं व घने वृक्षों से आच्छादित था। अत्यंत घना होने के कारण वहाँ सूर्य की किरणें भी नहीं पहुँचती थीं। हिंसक पशुओं, भयंकर विषधर सर्पों, राक्षसों और नागों का निवास होने के कारण वह मनुष्यविहीन था। सर्वलोकस्वामी पीतांबरधारी श्रीकृष्ण ने अर्जुन के साथ उस विशाल खाण्डव वन का अवलोकन किया और वृक्षों, यक्षों, भूतगणों तथा पक्षियों से युक्त उस खाण्डव वन के भावी विनाश को प्रत्यक्ष देखा।
व्याख्या: यहाँ खाण्डव वन की प्राकृतिक सुंदरता, घनेपन और उसमें निवास करने वाले भयंकर जीवों (विशेषकर नागराज तक्षक और दानवों) का विस्तृत काव्यात्मक वर्णन है। सर्वज्ञ श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि इस अरण्य के विनाश का समय आ गया है।
श्लोक 30 - 38
विहारदेशं संप्राप्य नानाद्रुममनुत्तमम्। गृहैरुच्चावचैर्युक्तं पुरन्दरपुरोपमम्।। 30 ।। भक्ष्यैर्भोज्यैश्च पेयैश्च रसवद्बिर्महाधनैः। माल्यैश्च विविधैर्गन्धैस्तथा वार्ष्मेयपाण्डवौ।। 31 ।। तदा विविशतुः पूर्णं रत्नैरुच्चावचैः शुभैः। यथोपजोषं सर्वश्च जनश्चिक्रीड भारत।। 32 ।। स्त्रियश्च विपुलश्रोष्ण्यश्चारुपीनपयोधराः। मदस्खलितगामिन्यश्चिक्रीडुर्वामलोचनाः।। 33 ।। वने काश्चिज्जले काश्चित्काश्चिद्वेश्मसु चाङ्गनाः। यथादेशं यथाप्रीति चिक्रीडुः पार्थकृष्णयोः।। 34 ।। वासुदेवप्रिया नित्यं सत्यभामा च भामिनी। द्रौपदी च सुभद्रा च वासांस्याभरणानि च। प्रायच्छन्त महाराज स्त्रीणां ताः स्म मदोत्कटाः।। 35 ।। काश्चित्प्रहृष्टा ननृतुश्चुक्रुशुश्च तथा पराः। जहसुश्च परा नार्यः पपुश्चान्या वरासवम्।। 36 ।। रुरुधुश्चापरास्तत्र प्रजघ्नुश्च परस्परम्। मन्त्रयामासुरन्याश्च रहस्यानि परस्परम्।। 37 ।। वेणुवीणामृदङ्गानां मनोज्ञानां च सर्वशः। शब्देन पूर्यते हर्म्यं तद्वनं सुमहर्द्धिमत्।। 38 ।।
अनुवाद: अनेक उत्तम वृक्षों से युक्त, इंद्रपुरी के समान सुंदर भवनों वाले उस विहार-स्थल पर पहुँचकर वार्ष्णेय श्रीकृष्ण और पांडव अर्जुन ने प्रवेश किया। वहाँ स्वादिष्ट भक्ष्य, भोज्य, पेय पदार्थ, बहुमूल्य मालाएँ, सुगंधित द्रव्य और शुभ रत्न भरपूर मात्रा में उपलब्ध थे। हे भारत! वहाँ आए हुए सभी लोग अपनी-अपनी रुचि के अनुसार क्रीड़ा करने लगे। विशाल श्रोणि (कटिभाग) और सुंदर रूप वाली स्त्रियाँ मदिरा के मद से लड़खड़ाती हुई चाल में खेलकूद करने लगीं। कुछ स्त्रियाँ वनों में, कुछ जल में और कुछ महलों में श्रीकृष्ण और अर्जुन की प्रसन्नता के लिए स्वच्छंद क्रीड़ा कर रही थीं। श्रीकृष्ण की प्रिय सत्यभामा, द्रौपदी और सुभद्रा मदिरामोद में मग्न होकर अन्य स्त्रियों को बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण बाँट रही थीं। कुछ स्त्रियाँ अत्यंत प्रसन्न होकर नाचने लगीं, कुछ गाने लगीं, कुछ हँसने लगीं और कुछ श्रेष्ठ आसव (मदिरा) का पान करने लगीं। कुछ एक-दूसरे को रोकने लगीं, आपस में विनोदपूर्ण क्रीड़ा करने लगीं और एकांत में गुप्त गोष्ठी करने लगीं। बंशी, वीणा और मृदंग के मधुर शब्दों से वह महल और अत्यंत समृद्ध वन गूँज उठा।
व्याख्या: जलविहार के अवसर पर उत्सव और उल्लास का अत्यंत जीवंत वातावरण था। महारानी सत्यभामा, द्रौपदी और सुभद्रा अपने परिजनों के साथ जलविहार और वन-विहार का पूर्ण आनंद ले रही थीं।
श्लोक 39 - 45
तस्मिंस्तदा वर्तमानो कुरुदाशार्हनन्दनौ। समीपं जग्मतुः कंचिदुद्देशं सुमनोहरम्।। 39 ।। तत्र गत्वा महात्मानौ कृष्णौ परपुरञ्जयौ। महार्हासनयो राजंस्ततस्तौ सन्निषीदतुः।। 40 ।। तत्र पूर्वव्यतीतानि विक्रान्तानीतराणि च। बहूनि कथयित्वा तौ रेमाते पार्थमाधवौ।। 41 ।। तत्रोपविष्टौ मुदितौ नाकपृष्ठेऽश्विनाविव। अभ्यागच्छत्तदा विप्रो वासुदेवधनञ्जयौ।। 42 ।। बृहच्छालप्रतीकाशः प्रतप्तकनकप्रभः। हरिपिङ्गोज्ज्वलश्मश्रुः प्रमाणायामतः समः।। 43 ।। तरुणादित्यसङ्काशश्चीरवासा जटाधरः। पद्मपत्राननः पिङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव।। 44 ।। जगाम तौ कृष्णपार्थौ दिधक्षुः खाण्डवं वनम्। उपसृष्टं तु तं कृष्णो भ्राजमानं द्विजोत्तमम्। अर्जुनो वासुदेवश्च तूर्णमुत्पत्य तस्थतुः।। 45 ।।
अनुवाद: उस उत्सव के बीच, कुरुनंदन अर्जुन और दाशार्हनंदन श्रीकृष्ण एक अत्यंत मनमोहक स्थान की ओर चले गए। वहाँ जाकर वे दोनों महात्मा और शत्रुदमन वीर बहुमूल्य आसनों पर बैठ गए। वहाँ बैठकर पार्थ (अर्जुन) और माधव (श्रीकृष्ण) अपनी पुरानी वीरतापूर्ण गाथाओं तथा अन्य अनेक कथाओं को कहते हुए स्वर्ग में अश्विनियों की भांति प्रसन्नचित्त होकर आनंद लेने लगे। तभी वासुदेव और धनंजय के पास एक ब्राह्मण आया। वह विशाल शाल-वृक्ष के समान ऊँचा, तपे हुए सोने के समान कांतिवाला, पीली व लाल दाढ़ी-मूँछों वाला, शरीर के अंग-प्रत्यंग में सर्वथा सुडौल, बाल-सूर्य के समान तेजस्वी, वल्कल वस्त्र धारण किए, जटाधारी, कमल के पत्ते जैसे मुख वाला और अपने तेज से प्रज्वलित-सा प्रतीत हो रहा था। खाण्डव वन को जलाने की इच्छा रखने वाला वह तेजस्वी द्विजोत्तम (अग्निदेव) श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास पहुँचा। उस अत्यंत कांतिमान ब्राह्मण को अपने पास आते देखकर अर्जुन और वासुदेव तुरंत अपने आसनों से उठकर खड़े हो गए।
व्याख्या: जब अर्जुन और श्रीकृष्ण एकांत में बैठकर बातचीत कर रहे थे, तभी साक्षात् अग्निदेव एक अत्यंत तेजस्वी ब्राह्मण का रूप धारण करके उनके समक्ष आए। वे खाण्डव वन को अपने आहार के रूप में भस्म (दाह) करना चाहते थे, जिसके लिए उन्हें इन दोनों महावीरों की सहायता की आवश्यकता थी।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत खाण्डवदाह पर्व का २४८वाँ अध्याय पूर्ण होता है।)
