महाभारत् -०१ आदिपर्व -२५०

महाभारत् -०१ आदिपर्व -२५०

महाभारत के आदिपर्व (खाण्डवदाह पर्व) के इस 250वें अध्याय में अग्निदेव के नैराश्य और ब्रह्मा जी के निर्देश का प्रसंग तथा अर्जुन द्वारा अग्निदेव से अपनी और श्रीकृष्ण के लिए उपयुक्त अस्त्र-शस्त्रों, दिव्य रथ और घोड़ों की माँग करने का वर्णन है।

इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या

श्लोक 1 - 6

वैशंपायन उवाच। स तु नैराश्यमापन्नः सदा ग्लानिसमन्वितः। पितामहमुपागच्छत्संक्रुद्धो हव्यवाहनः।। 1 ।। तच्च सर्वं यथान्यायं ब्रह्मणे संन्यवेदयत्। उवाच चैवनं भगवान्मुहूर्तं स विचिन्त्य तु।। 2 ।। उपायः परिदृष्टो मे यथा त्वं धक्ष्यसेऽनघ। कालं च कंचित्क्षमतां ततस्तद्धक्ष्यते भवान्।। 3 ।। भविष्यतः सहायौ ते नरनारायणौ तदा। ताभ्यां त्वं सहितो दावं धक्ष्यसे हव्यवाहन।। 4 ।। एवमस्त्विति तं वह्निर्ब्रह्माणं प्रत्यभाषत। संभूतौ तौ विदित्वा तु नरनारायणावृषी।। 5 ।। कालस्य महतो राजंस्तस्य वाक्यं स्वयंभुवः। अनुस्मृत्य जगामाथ पुनरेव पितामहम्।। 6 ।। अब्रवीच्च तदा ब्रह्मा यथा त्वं धक्ष्यसेऽनल। खाण्डवं दावमद्यैव मिषतोऽस्य शचीपतेः।। 7 ।। नरनारायणौ यौ तौ पूर्वदेवौ विभावसो। संप्राप्तौ मानुषे लोके कार्यार्थं हि दिवौकसाम्।। 8 ।। अर्जुनं वासुदेवं च यौ तौ लोकोऽभिमन्यते। तावेतौ सहितावेहि खाण्डवस्य समीपतः।। 9 ।। तौ त्वं याचस्व साहाय्ये दाहार्थं खाण्डवस्य च। ततो धक्ष्यसि तं दावं रक्षितं त्रिदशैरपि।। 10 ।। तौ तु सत्वानि सर्वाणि यत्नतो वारयिष्यतः। देवराजं च सहितौ तत्र मे नास्ति संशयः।। 11 ।। एतच्छ्रुत्वा तु वचनं त्वरितो हव्यवाहनः। कृष्णपार्थावुपागम्य यमर्थं त्वभ्यभाषत।। 12 ।। तं ते कथितवानस्मि पूर्वमेव नृपोत्तम। तच्छ्रुत्वा वचनं त्वग्नेर्बीभत्सुर्जातवेदसम्।। 13 ।। अब्रवीन्नृपशार्दूल तत्कालसदृशं वचः। दिधक्षुं खाण्डवं दावमकामस्य शतक्रतोः।। 14 ।।

हिन्दी अनुवाद:

वैशम्पायन जी कहते हैं—जब सात बार प्रयास करने पर भी वन नहीं जला, तब निराश और सदा ग्लानि से युक्त क्रुद्ध हव्यवाहन (अग्निदेव) पुन: पितामह ब्रह्मा जी के पास गए। उन्होंने अपनी वह सारी कठिनाई ज्यों-की-त्यों ब्रह्मा जी को सुनाई। तब भगवान ब्रह्मा ने कुछ मुहूर्त तक विचार करके उनसे कहा—"हे अनघ! मैंने वह उपाय देख लिया है जिससे तुम उस वन को जला सकोगे। तुम कुछ समय तक और सहन करो, उसके बाद तुम उस वन को भस्म कर लोगे। उस समय 'नर और नारायण' तुम्हारे सहायक होंगे। हे हव्यवाहन! उन दोनों के साथ मिलकर तुम इस वन को जला सकोगे।" 'तथास्तु' कहकर अग्निदेव ने ब्रह्मा जी को उत्तर दिया। हे राजन्! बहुत समय बीतने पर, उन ऋषियों 'नर और नारायण' के मनुष्य योनि में प्रकट होने की बात जानकर और स्वयंभू ब्रह्मा जी के उस पूर्ववचन का स्मरण करके, अग्निदेव पुनः पितामह ब्रह्मा जी के पास गए। तब ब्रह्मा जी ने कहा—"हे अनल! आज ही शचीपति (इंद्र) के देखते-देखते तुम खाण्डव वन को जला दोगे। हे विभावसु! प्राचीन काल के जो दो देवता 'नर और नारायण' ऋषि हैं, वे ही देवताओं के कार्य के लिए इस मनुष्य लोक में आए हैं। संसार जिन्हें अर्जुन और वासुदेव के रूप में जानता है, तुम उन्हीं दोनों के पास खाण्डव वन के समीप जाओ। खाण्डव वन को जलाने में सहायता के लिए तुम उन दोनों से ही प्रार्थना करो। तब त्रियुगी देवताओं द्वारा रक्षित होने पर भी तुम उस वन को भस्म कर डालोगे। वे दोनों ही अपनी पूरी शक्ति से सभी जीवों को तथा देवराज इंद्र को भी वहाँ रोक लेंगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।" ब्रह्मा जी के इन वचनों को सुनकर त्वरित गति वाले हव्यवाहन अग्निदेव ने श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास आकर जो बात कही थी, हे नृपोत्तम! वह मैंने तुम्हें पहले ही कह सुनाई है। अग्निदेव के उन वचनों को सुनकर बीभत्सु (अर्जुन) ने, जो अनिच्छुक शतक्रतु (इंद्र) के खाण्डव वन को जलाना चाहते थे, तात्कालिक स्थिति के अनुकूल यह बात कही।

व्याख्या:

इन श्लोकों में यह स्पष्ट किया गया है कि अग्निदेव को खाण्डव वन जलाने के लिए स्वयं ब्रह्मा जी ने उपाय बताया था कि नर और नारायण के अंशाअवतार रूप में पृथ्वी पर आए अर्जुन और श्रीकृष्ण ही उनकी इस महाकार्य में सहायता कर सकते हैं। अग्निदेव इसी दिव्य निर्देश के तहत ब्राह्मण का रूप धरकर अर्जुन और श्रीकृष्ण के पास पहुँचे थे।

श्लोक 15 - 21

अर्जुन उवाच। उत्तमास्त्राणि मे सन्ति दिव्यानि च बहूनि च। यैरहं शक्नुयां योद्धुमपि वज्रधरान्बहून्।। 15 ।। धनुर्मे नास्ति भगवन्बाहुवीर्येण संमितम्। कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद्विषहेन्मम।। 16 ।। शरैश्च मेऽर्थो बहुभिरक्षयैः क्षिप्रमस्यतः। न हि वोढुं रथः शक्तः शरान्मम यथेप्सितान।। 17 ।। अश्वांश्च दिव्यानिच्छेयं पाण्डुरान्वातरंहसः। रथं च मेघनिर्घोषं सूर्यप्रतिमतेजसम्।। 18 ।। तथा कृष्णस्य वीर्येण नायुधं विद्यते समम्। येन नागान्पिशाचांश्च निहन्यान्माधवो रणे।। 19 ।। उपायं कर्मसिद्धौ च भघवन्वक्तुमर्हसि। निवारयेयं येनेन्द्रं वर्षमाणं महावने।। 20 ।। पौरुषेण तु यत्कार्यं तत्कर्ताऽहं स्म पावक। करणानि समर्थानि भगवन्दातुमर्हसि।। 21 ।।

हिन्दी अनुवाद:

अर्जुन बोले—"हे भगवन्! मेरे पास बहुत से उत्तम और दिव्य अस्त्र हैं, जिनसे मैं वज्रधारी इंद्र जैसे बहुतेरे वीरों से भी युद्ध कर सकता हूँ। किंतु हे भगवन्! युद्ध में प्रयत्न करते समय मेरे बाहुबल के वेग को सहन कर सके, ऐसा सुदृढ़ गाण्डीव (या उपयुक्त) धनुष मेरे पास इस समय नहीं है। मुझे शीघ्रता से बाण चलाने के लिए बहुत से ऐसे अक्षय बाणों की भी आवश्यकता है, जिन्हें मेरा रथ (सामान्य रूप से) ले जाने में समर्थ नहीं हो पाएगा। इसलिए मैं वायु के समान वेग वाले श्वेत रंग के दिव्य घोड़े तथा मेघ के समान गंभीर गर्जना करने वाले और सूर्य के समान तेजस्वी रथ की भी इच्छा रखता हूँ। इसी प्रकार श्रीकृष्ण के वीर्य (पराक्रम) के समान भी कोई दूसरा अस्त्र नहीं है, जिससे माधव रणक्षेत्र में नागों और पिशाचों का संहार कर सकें। हे भगवन्! आप मुझे इस कर्म की सिद्धि का उपाय बताने की कृपा करें, जिससे मैं इस महावन में वर्षा करने वाले इंद्र को रोक सकूँ। हे पावक! पुरुषार्थ से जो कार्य करने योग्य है, उसे करने के लिए मैं पूरी तरह तैयार हूँ; किंतु हे भगवन्! आप मुझे इसके अनुकूल समर्थ साधन (अस्त्र-शस्त्र, रथ और घोड़े) प्रदान कीजिए।"

व्याख्या:

जब अग्निदेव ने खाण्डव वन को जलाने में अपनी असमर्थता और सहायता की गुहार लगाई, तब अर्जुन ने अपनी शर्तें और आवश्यकताएँ रखीं। अर्जुन कहते हैं कि उनके पास दिव्यास्त्र तो बहुत हैं, परंतु इतने बड़े युद्ध (जहाँ देवराज इंद्र से भी मुकाबला करना पड़ सकता है) के लिए उनके पास उपयुक्त दिव्य धनुष, अक्षय तूणीर, मेघ-गर्जन सा रथ और वायुवेगी श्वेत घोड़े नहीं हैं। साथ ही, वे श्रीकृष्ण (माधव) के लिए भी ऐसे अस्त्र की अपेक्षा रखते हैं जिससे वे नागों और पिशाचों का मुकाबला कर सकें। अर्जुन अग्निदेव को आश्वस्त करते हैं कि यदि उन्हें ये संसाधन मिल जाए, तो वे पुरुषार्थ से इस महाकार्य को अवश्य सिद्ध कर दिखाएंगे।

(इस प्रकार श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि खाण्डवदाहपर्वणि पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः—अर्थात् अध्याय 250 पूर्ण हुआ।)

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