महाभारत के आदिपर्व (खाण्डवदाह पर्व) के इस 252वें अध्याय में अर्जुन और श्रीकृष्ण द्वारा खाण्डव वन में चारों ओर घूमकर जीवों का संहार रोकने व वन जलाने का भीषण दृश्य, वन के जीवों की तड़प, तथा देवराज इंद्र द्वारा खाण्डव वन को बचाने के लिए मूसलाधार वर्षा करने का रोमांचक वर्णन है।
इस अध्याय के सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक-दर-श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या
श्लोक 1 - 3
वैशंपायन उवाच। तौ रथाभ्यां रथश्रेष्ठौ दावस्योभयतः स्थितौ। दिक्षु सर्वासु भूतानां चक्राते कदनं महत्।। 1 ।। यत्र यत्र च दृश्यन्ते प्राणिनः खाण्डवालयाः। पलायन्तः प्रवीरौ तौ तत्रतत्राभ्यधावताम्।। 2 ।। छिद्रं न स्म प्रपश्यन्ति रथयोराशुचारिणोः। आविद्धावेव दृश्येते रथिनौ तौ रथोत्तमौ।। 3 ।।
हिन्दी अनुवाद:
वैशम्पायन जी कहते हैं—रथियों में श्रेष्ठ वे दोनों वीर (कृष्ण और अर्जुन) अपने-अपने रथों को खाण्डव वन के दोनों ओर स्थित करके सभी दिशाओं में प्राणियों का भयंकर संहार (किए जाने वाले कार्य में सहायता) करने लगे। खाण्डव वन में रहने वाले जो-जो प्राणी प्राण बचाकर भागते हुए दिखाई देते, वे दोनों प्रवीर वीर तुरंत उधर ही दौड़ पड़ते थे। तीव्र गति से चलने वाले उन दोनों श्रेष्ठ रथों में कोई अंतराल (छिद्र या खाली जगह) दिखाई नहीं देता था; वे दोनों उत्तम रथी चारों ओर ऐसे चक्कर काटते हुए दिखाई देते थे मानो वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हों।
व्याख्या:
जब अग्निदेव ने खाण्डव वन को प्रज्वलित किया, तब अर्जुन और श्रीकृष्ण ने अपने-अपने रथों के साथ वन के चारों ओर ऐसा पहरा बिठा दिया कि कोई भी जीव जलने से या भागने से छूट न सके। उनके रथ इतनी तेजी से घूमते थे कि ऐसा प्रतीत होता था कि वे हर जगह एक साथ मौजूद हैं।
श्लोक 4 - 8
खाण्डवे दह्यमाने तु भूतान्यथ सहस्रशः। उत्पेतुर्भैरवान्नादान्विनदन्तः समन्ततः।। 4 ।। दग्धैकदेशा बहवो निष्टप्ताश्च तथाऽपरे। स्फुटिताक्षा विशीर्णाश्च विप्लुताश्च तथाऽपरे।। 5 ।। समालिङ्ग्य सुतानन्ये पितॄन्भ्रातॄनथाऽपरे। त्यक्तुं न शेकुः स्नेहेन तत्रैव निधनं गताः।। 6 ।। सन्दष्टदशनाश्चान्ये समुत्पेतुरनेकशः। ततस्तेऽतीव घूर्णन्तः पुनरग्नौ प्रपेदिरे।। 7 ।। दग्धपक्षाक्षिचरणा विचेष्टन्तो महीतले। तत्रतत्र स्म दृश्यन्ते विनश्यन्तः शरीरिणः।। 8 ।।
हिन्दी अनुवाद:
खाण्डव वन के जलने पर हज़ारों प्राणी चारों ओर भयानक चीखें और गर्जना करते हुए ऊपर उछलने लगे। बहुत से प्राणी जिनके शरीर के अंग जल चुके थे, जो बुरी तरह झुलस गए थे, जिनकी आँखें फूट चुकी थीं, जिनके अंग-प्रत्यंग बिखर रहे थे और जो विचलित हो रहे थे—वे तड़प रहे थे। कुछ जीव अपने पुत्रों, पिताओं और भाइयों को कसकर गले लगाए हुए थे, वे मोहवश उन्हें छोड़कर भागने में असमर्थ होकर वहीं आग में भस्म होकर मृत्यु को प्राप्त हो गए। अन्य कई जीव अपने दाँतों को भींचते हुए बार-बार ऊपर उछलते थे, किंतु अत्यधिक चक्कर खाने के कारण वे पुनः प्रज्वलित अग्नि में जा गिरते थे। जिनके पंख, आँखें और चरण जल चुके थे, ऐसे छटपटाते हुए प्राणी पृथ्वी पर चारों ओर नष्ट होते हुए दिखाई दे रहे थे।
व्याख्या:
इन श्लोकों में खाण्डव वन के दाह का अत्यंत हृदयविदारक और करुण चित्रण है। आग की भीषणता से जीव किस प्रकार तड़प-तड़प कर मर रहे थे, इसका सजीव वर्णन यहाँ किया गया है।
श्लोक 9 - 13
जलाशयेषु तप्तेषु क्वाथ्यमानेषु वह्निना। गतसत्वाः स्म दृश्यन्ते कूर्ममत्स्याः समन्ततः।। 9 ।। शरीरैरपरे दीप्तैर्देहवन्त इवाग्नयः। अदृश्यन्त वने तत्र प्राणिनः प्राणिसंक्षये।। 10 ।। कांश्चिदुत्पततः पार्थः शरैः संछिद्य खण्डशः। पातयामास विहगान्प्रदीप्ते वसुरेतसि।। 11 ।। ते शराचितसर्वाङ्गा निनदन्तो महारवान्। ऊर्ध्वमुत्पत्य वेगेन निपेतुः खाण्डवे पुनः।। 12 ।। शरैरभ्याहतानां च सङ्घशः स्म वनौकसाम्। विरावः शुश्रुवे घोरः समुद्रस्येव मथ्यतः।। 13 ।।
हिन्दी अनुवाद:
अग्नि की गर्मी से जब वन के जलाशय उबलने लगे और खौलने लगे, तब कछुए और मछलियाँ चारों ओर प्राणहीन होकर तैरते हुए दिखाई दिए। प्राणियों के इस विनाशकाल में अन्य कई जीव अपने प्रज्वलित शरीरों के साथ ऐसे दिखाई दे रहे थे मानो वे स्वयं चलते-फिरते अग्निपिंड हों। आकाश में उड़कर भागने वाले कुछ पक्षियों को पार्थ (अर्जुन) ने अपने बाणों से टुकड़े-टुकड़े करके प्रज्वलित अग्नि (पावक) में गिरा दिया। जिनके सारे शरीर बाणों से छिद चुके थे, ऐसे वे पक्षी महाशब्द करते हुए वेग से ऊपर उठकर वापस खाण्डव वन की आग में ही जा गिरे। बाणों से आहत हुए उन वन-निवासी जीवों का वह सामूहिक घोर विलाप ऐसा सुनाई दे रहा था मानो मंथन किए जाते हुए समुद्र का गर्जन हो।
व्याख्या:
अग्निदेव के भोजन के लिए वन के तालाब उबल गए और जीव-जंतुओं का भारी संहार होने लगा। अर्जुन ने यह सुनिश्चित किया कि कोई भी जीव भाग न सके, इसलिए जो पक्षी आकाश में उड़कर भागना चाहते थे, उन्हें भी उन्होंने अपने बाणों से गिरा दिया।
श्लोक 14 - 16
वह्नेश्चापि प्रदीप्तस्य खमुत्पेतुर्महार्चिषः। जनयामासुरुद्वेगं सुमहान्तं दिवौकसाम्।। 14 ।। तेनार्चिषा सुसन्तप्ता देवाः सर्षिपुरोगमाः। ततो जग्मुर्महात्मानः सर्व एव दिवौकसः। शतक्रतुं सहस्राक्षं देवेशमसुरार्दनम्।। 15 ।। देवा ऊचुः। किं न्विमे मानवाः सर्वे दह्यन्ते चित्रभानुना। कच्चिन्न संक्षयः प्राप्तो लोकानाममरेश्वर।। 16 ।।
हिन्दी अनुवाद:
प्रज्वलित अग्नि की विशाल लपटें जब आकाश की ओर उठने लगीं, तब उन्होंने देवताओं के मन में भारी उद्वेग (भय) उत्पन्न कर दिया। उस अग्नि की भयंकर लपटों से अत्यधिक संतप्त हुए महर्षियों सहित सभी महात्मान देवता असुरों के नाशक, सहस्रों नेत्रों वाले देवेश्वर शतक्रतु (इंद्र) के पास गए। देवताओं ने कहा—"हे अमरेश्वर! क्या कारण है कि ये सारे मानवाकार (या मनुष्य जैसे दिखने वाले कृष्ण-अर्जुन) चित्रभानु (अग्नि) द्वारा सब कुछ जला रहे हैं? कहीं लोकों का प्रलयकाल तो नहीं आ गया है?"
व्याख्या:
खाण्डव वन की भयंकर लपटें जब स्वर्ग तक पहुँचने लगीं और देवताओं ने देखा कि दो मनुष्य (कृष्ण और अर्जुन) अग्नि की सहायता से इस वन को जला रहे हैं, तो वे भयभीत होकर देवराज इंद्र के पास पहुँचे और प्रलय की आशंका जताई।
श्लोक 17 - 22
वैशंपायन उवाच। तच्छ्रुत्वा वृत्रहा तेभ्यः स्वयमेवान्ववेक्ष्य च। खाण्डवस्य विमोक्षार्थं प्रययौ हरिवाहनः।। 17 ।। महता रथबृन्देन नानारूपेण वासवः। आकाशं समवाकीर्य प्रववर्ष सुरेश्वरः।। 18 ।। ततोऽक्षमात्रा व्यसृजन्धाराः शतसहस्रशः। चोदिता देवराजेन जलदाः खाण्डवं the प्रति।। 19 ।। असंप्राप्तास्तु ता धारास्तेजसा जातवेदसः। ख एव समुशुष्यन्त नकाश्चित्पावकं गताः।। 20 ।। ततो नमुचिहा क्रुद्धो भृशमर्चिष्मतस्तदा। पुनरेव महामेघैरम्भांसि व्यसृजद्बहु।। 21 ।। अर्चिर्धाराभिसंबद्धं धूमविद्युत्समाकुलम्। बभूव तद्वनं घोरं स्तनयित्नुसमाकुलम्।। 22 ।।
हिन्दी अनुवाद:
वैशम्पायन जी कहते हैं—देवताओं की बात सुनकर वृत्र के संहारक देवराज इंद्र ने स्वयं सब स्थिति का निरीक्षण किया और खाण्डव वन को बचाने के लिए प्रस्थान किया। घोड़ों पर सवार सुरेश्वर वासव (इंद्र) अपने विशाल और अनेक रूपों वाले रथ-समूह के साथ आकाश को ढंकते हुए वहाँ पहुँचे और मूसलाधार वर्षा करने लगे। देवराज इंद्र की प्रेरणा से बादलों ने खाण्डव वन के ऊपर अक्ष (धुरी) के आकार की सैकड़ों-हजारों जल की धाराएँ एकसाथ बरसा दीं। किंतु वे जल की धाराएँ अग्निदेव के प्रचंड तेज के कारण वन तक पहुँचने से पहले ही आकाश में ही सूख गईं और एक बूँद भी पावक (अग्नि) तक नहीं पहुँच पाई। तब नमुचि के संहारक (इंद्र) प्रज्वलित अग्निदेव पर अत्यधिक क्रुद्ध हुए और उन्होंने पुनः विशाल मेघों के द्वारा बहुत सा जल बरसाया। अग्नि की लपटों और जल की धाराओं के मिलने से, तथा धुँए, बिजली और बादलों की भयंकर गर्जना से वह वन अत्यंत डरावना हो गया।
व्याख्या:
जब इंद्र को पता चला कि उनके मित्र तक्षक का निवास स्थान खाण्डव वन जल रहा है और उनके रोकने पर भी कृष्ण-अर्जुन उसे जला रहे हैं, तो वे क्रोधित होकर अपनी सेना के साथ आए और बादलों से मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। परंतु अग्निदेव के तेज के आगे इंद्र की वे जलधाराएँ आकाश में ही भाप बनकर उड़ गईं। इसके बाद इंद्र ने और भी भयंकर रूप से मेघों को भेजकर घनघोर वर्षा और वज्रपात आरंभ कर दिया।
(इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत खाण्डवदाह पर्व का ५२वाँ (252वाँ) अध्याय पूर्ण हुआ।)
