महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१६८

महाभारत्-०१ आदिपर्वा-१६८

 महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत हिडिम्बवधपर्व के 168वें अध्याय के सभी श्लोकों का क्रमबद्ध हिन्दी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है। किसी भी श्लोक को छोड़ा नहीं गया है और सभी को क्रमानुसार रखा गया है।

श्लोक 1 से 7 (शालिहोत्र सरोवर की ओर प्रस्थान और पांडवों का विश्राम)

श्लोक 1 और 2:

वैशंपायन उवाच। युधिष्ठिरवचः श्रुत्वा कुन्तीमङ्गेऽधिरोप्य सा। भीमार्जुनान्तरगता यमाभ्यां च पुरस्कृता।। तिर्यग्युधिष्ठिरे याति हिडिम्बा भीमगामिनी। शालिहोत्रसरो रम्यमाससाद जलार्थिनी।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— युधिष्ठिर के वचन सुनकर हिडिम्बा ने माता कुन्ती को अपनी गोद (या पीठ) पर बिठा लिया। भीम और अर्जुन के बीच में चलती हुई तथा नकुल और सहदेव को आगे किए हुए, युधिष्ठिर के तिरछे (बगल में) चलने वाली भीमगामिनी हिडिम्बा जल की इच्छा से सुंदर शालिहोत्र सरोवर के पास पहुँची।
  • व्याख्या: युधिष्ठिर की आजस्वी सहमति मिलने के बाद हिडिम्बा सभी पांडवों और माता कुन्ती को साथ लेकर शालिहोत्र सरोवर की ओर बढ़ चली।

श्लोक 3 और 4:

वनस्पतितलं गत्वा परिमृज्य गृहं यथा। पाण्डवानां च वासं सा कृत्वा पर्णमयं तथा।। आत्मनश्च तथा कुन्त्या एकोद्देशे चकार सा। पाण्डवास्तु ततः स्नात्वा शुद्धाः सन्ध्यामुपास्य च।।

  • हिन्दी अनुवाद: उस वनस्पति (वटवृक्ष) के नीचे जाकर, घर की तरह साफ-सफाई करके उसने पाण्डवों के रहने के लिए पत्तों की कुटिया बनाई। उसने अपने और माता कुन्ती के रहने का स्थान भी एक ही पास में बनाया। इसके बाद पाण्डवों ने उस सरोवर में स्नान किया, शुद्ध होकर संध्यावंदन किया।
  • व्याख्या: हिडिम्बा ने पांडवों और कुन्ती के रहने के लिए बड़ी तन्मयता से पर्णकुटी तैयार की और सभी ने अपनी दैनिक संध्या-पूजा संपन्न की।

श्लोक 5, 6 और 7:

तृषिताः क्षुत्पिपासार्ता जलमात्रेण वर्तयन्। शालिहोत्रस्ततो ज्ञात्वा क्षुधार्तान्पाण्डवांस्तदा।। मनसा चिन्तयामास पानीयं भोजनं महत्। ततस्ते पाण्डवाः सर्वे विश्रान्ताः पृथया सह।। यथा जतुगृहे वृत्तं राक्षसेन कृतं च यत्। कृत्वा कथा बहुविधाः कथान्ते पाण्डुनन्दनम्।।

  • व्याख्या एवं अनुवाद: प्यास और भूख से पीड़ित वे पांडव उस समय केवल जल पीकर ही अपना समय बिता रहे थे। शालिहोत्र ऋषि ने अपनी योगशक्ति से पाण्डवों की भूख-प्यास को जानकर मन ही मन महान भोजन और जल की व्यवस्था का चिंतन किया। तदनंतर माता कुन्ती के साथ वे सभी पाण्डव विश्राम करने लगे। लाक्षागृह में जो कुछ बीता था तथा राक्षस (हिडिम्ब) द्वारा जो कृत्य किया गया था, उन अनेक कथाओं की चर्चा करने के बाद, कथा के अंत में...

श्लोक 8 से 14 (माता कुन्ती का भीमसेन से आग्रह)

श्लोक 8, 9 और 10:

कुन्ती राजसुता वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत्। यथा पाण्डुस्तथा मान्यस्तव ज्येष्ठो युधिष्ठिरः।। अहं धर्मविदाऽनेन मान्या गुरुतरा तव। तस्मात्पाण्डुहितार्थं मे युवराज हितं कुरु।। निकृता धार्तराष्ट्रेण पापेनाकृतबुद्धिना। दुष्कृतस्य प्रतीकारं न पश्यामि वृकोदर।।

  • हिन्दी अनुवाद: ...राजपुत्री माता कुन्ती ने भीमसेन से यह वचन कहा— "जैसे पांडु पूजनीय हैं, वैसे ही तुम्हारे बड़े भाई युधिष्ठिर भी मान्य हैं। धर्म को जानने वाले इन युधिष्ठिर के द्वारा मैं तुम्हारी गुरु और आदरणीय हूँ। इसलिए हे युवराज भीम! पाण्डु के हित के लिए मेरा यह हितकारी कार्य करो। पापी और दुष्ट बुद्धि वाले धार्तराष्ट्र (दुर्योधन) द्वारा हम ठगाए गए हैं। हे वृकोदर! मुझे इस दुष्कृत्य का कोई तात्कालिक प्रतीकार (बदला) नजर नहीं आता।"
  • व्याख्या: कुन्ती जी भीमसेन को समझाती हैं कि राजवंश और पांडवों के हित के लिए उन्हें एक विशेष कर्तव्य निभाना होगा क्योंकि अभी शत्रुओं से बदला लेने का सीधा मार्ग नहीं दिख रहा है।

श्लोक 11, 12, 13 और 14:

तस्मात्कतिपयाहेन योगक्षेमं भविष्यति। क्षेमं दुर्गमिमं वासं वत्स्याम हि यथा वयम्।। इदमन्यन्महदुःखं धर्मकृच्छ्रं वृकोदर। दृष्ट्वाैव त्वां महाप्राज्ञ अनङ्गाभिप्रचोदिता।। युधिष्ठिरं च मां चैव वरयामास धर्मतः। धर्मार्थं देहि पुत्रं त्वं स नः श्रेयः करिष्यति।। प्रतिवाक्यं तु नेच्छामि आवयोर्वचनं कुरु।

  • हिन्दी अनुवाद: "इसलिए कुछ दिनों तक हमारा योगक्षेम इसी प्रकार चलेगा और हम इस दुर्गम वन में सुरक्षित निवास करेंगे। हे महाप्राज्ञ वृकोदर! तुम्हारे इस रूप को देखकर कामदेव से प्रेरित हुई इस हिडिम्बा ने हम दोनों (युधिष्ठिर और मुझसे) धर्मपूर्वक निवेदन किया है। धर्म की रक्षा के लिए तुम इसे एक पुत्र प्रदान करो, वह हमारा कल्याण करेगा। मैं इस पर कोई दूसरा प्रतिवाक्य (अस्वीकार) नहीं चाहती, हम दोनों (मैं और युधिष्ठिर) के इस वचन को पूरा करो।"
  • व्याख्या: माता कुन्ती और युधिष्ठिर की सहमति से कुन्ती भीमसेन को आदेश देती हैं कि वे वंश की वृद्धि और हिडिम्बा के प्रेम की लाज रखने के लिए उससे विवाह कर लें और संतान उत्पन्न करें।

श्लोक 14 (ख) से 19 (भीम का वचन देना और हिडिम्बा के साथ विहार)

श्लोक 14 (ख), 15, 16 और 17:

वैशंपायन उवाच। तथेति तत्प्रतिज्ञाय भीमसेनोऽब्रवीदिदम्।। शासनं ते करिष्यामि वेदशासनमित्यपि। समक्षं भ्रातृमध्ये तु तां चोवाच स राक्षसीम्।। शृणु राक्षसि सत्येन समयं ते वदाम्यहम्।' यावत्कालेन भवति पुत्रस्योत्पादनं शुभे।। तावत्कालं चरिष्यामि त्वया सह सुमध्यमे। `विशेषतो मत्सकाशे मा प्रकाशय नीचताम्।।'

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— 'बहुत अच्छा' कहकर उसकी प्रतिज्ञा करके भीमसेन ने कहा— "मैं वेदों के आदेश की तरह आपका यह शासन (आदेश) अवश्य मानूँगा।" फिर भाइयों के बीच सबके समक्ष उन्होंने उस राक्षसी हिडिम्बा से कहा— "हे राक्षसि! सत्यता के साथ मेरा यह नियम सुनो। हे शुभे सुमध्यमे! जब तक पुत्र की उत्पत्ति नहीं हो जाती, तब तक के लिए मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। विशेषकर तुम मेरे सामने अपनी कोई भी नीचता (राक्षसी प्रवृत्ति) प्रकट मत करना।"
  • व्याख्या: भीम माता और बड़े भाई की आज्ञा मानकर हिडिम्बा से शर्त के साथ जुड़ने का वचन देते हैं।

श्लोक 18 और 19:

उत्तमस्त्रीगुणोपेता भजेथा वरवर्णिनि। वैशंपायन उवाच। सा तथेति प्रतिज्ञाय हिडिम्बा राक्षसी तथा।। गताऽहनि निवेशेषु भोज्यं राजार्हमानयत्। सा कदाचिद्विहारार्थं हिडिम्बा कामरूपिणी।।

  • हिन्दी अनुवाद: "उत्तम स्त्रियों के गुणों से युक्त होकर हे वरवर्णिनि! तुम मेरा भजन करना।" वैशंपायन जी कहते हैं— राक्षसी हिडिम्बा ने 'बहुत अच्छा' ऐसा प्रतिज्ञा करके स्वीकार किया। इसके बाद दिन के समय वह अपने निवास से राजाओं के योग्य उत्तम भोजन ले आती थी। इच्छा के अनुसार रूप बदलने वाली वह हिडिम्बा कभी-कभी विहार (घूमने-फिरने) के लिए...

श्लोक 20 से 29 (हिडिम्बा और भीम का विभिन्न स्थलों पर विहार)

श्लोक 20, 21 और 22:

भीमसेनमुपादाय ऊर्ध्वमाचक्रमं तदा। शैलशृङ्गेषु रम्येषु देवतायतनेषु च।। मृगपक्षिविघृष्टेषु रमणीयेषु सर्वेषु। कृत्वा सा परमं रूपं सर्वाभरणभूषिता।। संजल्पन्ती सुमधुरं रमयामास पाण्डवम्। तथैव वनदुर्गेषु पर्वतद्रुमसानुषु।।

  • हिन्दी अनुवाद: ...भीमसेन को साथ लेकर आकाशमार्ग में ऊपर उठ जाती थी। सुंदर पर्वत शिखरों पर, देवताओं के मंदिरों में, पशु-पक्षियों से गुंजायमान सभी रमणीय स्थानों पर, अपना परम सुंदर रूप धारण करके और सभी आभूषणों से सजकर वह मीठी-मीठी बातें करती हुई पाण्डव (भीम) को आनंदित करती थी। इसी प्रकार वह वन के दुर्गम स्थानों, पर्वतों और वृक्षों की तत्याइयों (सानुओं) में...

श्लोक 23, 24 और 25:

सरस्तु रमणीयेषु पद्मोत्पलवनेषु च। नदीद्वीपप्रदेशेषु वैडूर्यसिकतेषु च।। देवारण्येषु पुण्येषु तथा पर्वतसानुषु। सुतीर्थवनतोयासु तथा गिरिनदीषु च।। सागरस्य प्रदेशेषु भणिहेमयुतेषु च। गुह्यकानां निवासेषु कुलपर्वतसानुषु।।

  • हिन्दी अनुवाद: ...सुंदर सरोवरों, कमलों और उत्पलों (नीलकमलों) के वनों में, नदियों के द्वीपों तथा वैूर्यमणि (लहसुनिया) जैसी रेत वाले प्रदेशों में, पवित्र देव-रण्यों में, पर्वत के शिखरों पर, सुंदर घाटों, वनों और जल वाले पर्वतीय झरनों तथा नदियों में, समुद्र के तटीय प्रदेशों तथा मणियों-सुवर्णों से युक्त स्थानों पर, गुह्यकों के निवास-स्थानों और कुल पर्वतों की घाटियों में विहार कराती थी।
  • व्याख्या: हिडिम्बा अपनी कामरूपा शक्ति के बल पर भीम को पृथ्वी के तमाम खूबसूरत, गुप्त और दिव्य स्थानों पर घुमाती और प्रेम का आनंद देती थी।

श्लोक 26, 27, 28 और 29:

सर्वर्तुफलवृक्षेषु मानसेषु वनेषु च। बिभ्रती परमं रूपं रमयामास पाण्डवम्।। `यथा सुमोदते स्वर्गे सुकृत्यप्सरसा सह। सुतरां परमप्रीतस्तथा रेमे महाद्युतिः।। शुभं हि जघनं तस्याः सवर्णमणिमेखलम्। न ततर्प तदा मृद्गन्भीमसेनो मुहुर्मुहुः।।' रमयन्ती ततो भीमं तत्रतत्र मनोजवा। सा रेमे तेन संहर्षात्तृप्यन्ती च मुहुर्मुहुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: सभी ऋतुओं के फलों वाले वृक्षों से युक्त मानस जैसे वनों में सुंदर रूप धारण करके वह पाण्डव को आनंदित करती थी। जिस प्रकार कोई पुण्यत्मा स्वर्ग में अप्सरा के साथ आनंद मनाता है, उसी प्रकार महाद्युति भीम अत्यंत प्रसन्न होकर उनके साथ रमण करते थे। मणियों की मेखला (करधनी) से सुशोभित उसके सुंदर जघन (कटि प्रदेश) का बार-बार स्पर्श करते हुए भीमसेन की तृप्ति नहीं होती थी। मन के समान वेग वाली वह हिडिम्बा भीम को जगह-जगह आनंदित करती हुई उस हर्ष से बार-बार तृप्त होकर उनके साथ विहार करती थी।
  • व्याख्या: भीम और हिडिम्बा का यह समय अत्यंत सुखद और प्रेममय बीता, जहाँ वे विभिन्न दिव्य वनों और पर्वतों पर घूमते रहे।

श्लोक 30 से 33 (दिन में विहार और रात को पांडवों की सेवा)

श्लोक 30, 31 और 32:

अहस्सु रमयन्ती सा निशाकालेषु पाण्डवम्। आनीय वै स्वके गेहे दर्शयामास मातरम्।। भ्रातृभिः सहितो नित्यं स्वपते पाण्डवस्तथा। कुन्त्याः परिचरन्ती सा तस्याः पार्श्वेवसन्निशां।। कामांश्च मुखवासादीनानयिष्यति भोजनम्। तस्यां रात्र्यां व्यतीतायामाजगाम महाव्रतः।।

  • हिन्दी अनुवाद: दिन के समय पाण्डव को इस प्रकार आनंदित करके, वह रात्रि के समय पाण्डव को अपने घर (निवास) पर ले आती और माता कुन्ती को दर्शन कराती थी। पाण्डव (भीम) नित्य अपने भाइयों के साथ सोते थे, और हिडिम्बा माता कुन्ती की सेवा करती हुई रात में उन्हीं के पास निवास करती थी। वह मुखवास (इलायची आदि) और उनकी इच्छा के अनुकूल भोजन आदि लाकर देती थी। इस प्रकार रातें बीतने लगीं।
  • व्याख्या: हिडिम्बा ने युधिष्ठिर और कुन्ती को दिए गए अपने वचन का पूर्ण पालन किया— दिन में वह भीम के साथ रहती और रात होते ही उन्हें पांडवों के पास पहुँचाकर खुद कुन्ती की सेवा में जुट जाती।

श्लोक 33 (क):

पाराशर्यो महाप्राज्ञो दिव्यदर्शी महातपाः। तेऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं शुभम्। तस्थुः प्राञ्जलयः सर्वे सस्नुषा चैव माधवी।।

  • हिन्दी अनुवाद: एक दिन जब वे सब वहाँ थे, तब पाराशर्य (पराशर पुत्र), महाप्राज्ञ, दिव्यदर्शी और महान तपस्वी महर्षि व्यास वहाँ आ पहुँचे। उन महात्मन् शुभ कृष्णद्वैपायन (व्यासजी) को अभिवादन करके, स्नुषा (बहू/कुन्ती) सहित सभी पांडव हाथ जोड़कर खड़े हो गए।
  • व्याख्या: कुछ समय बीतने के बाद महर्षि वेद व्यास पांडवों को सांत्वना देने और उनका मार्गदर्शन करने के लिए स्वयं उस शालिहोत्र सरोवर पर पधारे।

श्लोक 34 से 41 (महर्षि वेद व्यास का पांडवों को उपदेश और सांत्वना)

श्लोक 34, 35 और 36:

श्रीव्यास उवाच। मयेदं मनसा पूर्वं विदितं भरतर्षभाः। यथा स्थितैरधर्मेण धार्तराष्ट्रौर्विवासिताः।। तद्विदित्वाऽस्मि संप्राप्तश्चिकीर्ष्वै परं हितम्। न विषादो हि वः कार्यः सर्वमेतत्सुखाय वः।। सुहृद्वियोजनं कर्म पुराकृतमरिन्दमाः। तस्य सिद्धिरियं प्राप्ता मा शोचत परन्तपाः।।

  • हिन्दी अनुवाद: श्री व्यासजी बोले— "हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ! यह बात मेरे मन में पहले से ही ज्ञात थी कि धार्तराष्ट्रों (कौरवों) ने अधर्म से स्थिति पैदा करके तुम्हें निष्कासित किया है। यह सब जानकर ही मैं तुम्हारा परम हित करने के लिए यहाँ आया हूँ। तुम्हें कोई विषाद (दुःख) नहीं करना चाहिए, यह सब अंततः तुम्हारे सुख के लिए ही होगा। हे शत्रुओं का दमन करने वाले परंतपों! मित्रों से वियोग का जो पूर्वकृत कर्म (भाग्य) था, उसकी यह सिद्धि प्राप्त हुई है, इसलिए शोक मत करो।"
  • व्याख्या: व्यासजी पांडवों को समझाते हैं कि लाक्षागृह और वनवास जैसी आपदाएं उनके भाग्य का चक्र है, जो अंततः उनकी भलाई और विजय का मार्ग प्रशस्त करेंगी।

श्लोक 37, 38 और 39:

समाप्ते दुष्कृते चैव यूयं ते वै न संशयः। स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्तो भविष्यथ सबान्धवाः।। दीनतो बालतश्चैव स्नेहं कुर्वन्ति बान्धवाः। तस्मादभ्यधिकः स्नेहो युष्मासु मम संप्रति।। स्नेहपूर्वं चिकीर्षामि हितं यत्तन्निबोधत। बसतेह प्रतिच्छanna ममागमनकाङ्क्षिणः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "तुम लोगों के दुष्कृत्य (कष्ट का समय) अब समाप्त हो चुके हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। तुम अपने सगे-सम्बन्धियों के साथ अपने ही राष्ट्र में स्वतंत्र रूप से विहार करोगे। सगे-सम्बन्धी दीन और बालकों पर विशेष स्नेह रखते हैं, इसलिए इस समय तुम पर मेरा स्नेह सबसे अधिक है। स्नेहपूर्वक मैं तुम्हारा हित करना चाहता हूँ, उसे सुनो— तुम मेरे आगमन की प्रतीक्षा करते हुए यहीं छिपे, निवास करो।"
  • व्याख्या: व्यासजी उन्हें आश्वासन देते हैं कि बुरे दिन बीत चुके हैं और वे शीघ्र ही अपने राज्य को प्राप्त करेंगे, तब तक वे धैर्य से वहीं रहें।

श्लोक 40 और 41:

एतद्वै शालिहोत्रस्य तपसा निर्मित सरः। रमणीयमिदं तोयं क्षुत्पिपासाश्रमापहम्।। कार्यार्थिनस्तु षण्मासान्विहरध्वं यथासुखम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: "यह शालिहोत्र ऋषि के तप से निर्मित सरोवर है। इसका जल अत्यंत रमणीय और भूख-प्यास तथा थकान को दूर करने वाला है। अपने आवश्यक कार्यों को पूरा करने के लिए तुम लोग छह महीने तक यहीं सुखपूर्वक विहार करो।"
  • व्याख्या: व्यासजी पांडवों को शालिहोत्र सरोवर के पास छह महीने तक सुरक्षित रूप से रहने की सलाह देते हैं।

श्लोक 42 से 52 (व्यासजी का आशीर्वाद और प्रस्थान)

श्लोक 42, 43 और 44:

वैशंपायन उवाच। एवं स तान्समाश्वास्य व्यासः पार्थानरिन्दमान्। स्नेहाच्च संपरिष्वज्य कुन्तीमाश्वासयत्प्रभुः।। स्नुषे मा रोद मा रोदेत्येवं व्यासोऽब्रवीद्वचः। जीवपुत्रे सुतस्तेऽयं धर्मनित्यो युधिष्ठिरः।। पृथिव्यां पार्थइवान्सर्वान्प्रशासिष्यति धर्मराट्। धर्मेण जित्वा पृथिवीमखिलां धर्मकृद्वशी।।

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डवों को इस प्रकार आश्वस्त करके और स्नेहपूर्वक आलिंगन करके प्रभु व्यासजी ने कुन्ती को भी ढांढस बंधाया। व्यासजी ने कुन्ती से कहा— "हे पुत्री (स्नुषा)! रो मत, रो मत! हे जीवपुत्रे! धर्मपरायण युधिष्ठिर तुम्हारा यह पुत्र जीवित है। यह धर्मराज संपूर्ण पृथ्वी को वैसे ही शासित करेगा जैसे कोई महान सम्राट करता है। अपनी धर्मनिष्ठा और जितेन्द्रियता से वह इस संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर..."

श्लोक 45, 46 और 47:

स्थापयित्वा वशे सर्वां सपर्वतवनां शुभाम्। भीमसेनार्जुनबलाद्भोक्ष्यत्यayamसंशयम्।। पुत्रास्तव च माद्र्याश्च पञ्चैते लोकविश्रुताः। स्वराष्ट्रे विहरिष्यन्ति सुखं सुमनसस्तदा।। यक्ष्यन्ति च नरव्याघ्रा विजित्य पृथिवीमिमाम्। राजसूयाश्वमेधाद्यैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "...पर्वतों और वनों से युक्त इस सुंदर पृथ्वी को अपने वश में स्थापित करके, भीमसेन और अर्जुन के बल पर यह अवश्य ही इसका भोग करेगा, इसमें कोई संशय नहीं है। तुम्हारे और माद्री के ये पाँचों पुत्र लोकविख्यात हैं, और तब वे अपने राष्ट्र में प्रसन्नतापूर्वक सुख से विहार करेंगे। वे नरश्रेष्ठ इस पृथ्वी को जीतकर राजसूय और अश्वमेध जैसे प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञों द्वारा देवताओं का यजन (अनुष्ठान) करेंगे।"
  • व्याख्या: महर्षि व्यास भविष्य की महान घटनाओं का वर्णन करते हुए पांडवों की विजय, युधिष्ठिर के राज्याभिषेक और बड़े यज्ञों के अनुष्ठान की भविष्यवाणी करते हैं।

श्लोक 48, 49 और 50:

अनुगृह्य सुहृद्वर्गं धनेन च सुखेन च। पितृपैतामहं राज्यमहारिष्यन्ति ते सुताः।। स्नुषा कमलपत्राक्षी नाम्ना कमलपालिका। वशवर्तिनी तु भीमस्य पुत्रमेषा जनिष्यति।। तेन पुत्रेण कृच्छ्रेषु भविष्यथ च तारिताः। इह मासं प्रतीक्षध्वमागमिष्याम्यहं पुनः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "अपने सुहृद वर्ग को धन और सुख से अनुगृहीत करके तुम्हारे पुत्र अपने पिता-पड़दादा के राज्य को पुनः प्राप्त करेंगे। कमल के पत्तों जैसी आँखों वाली और कमलपालिका नाम वाली (हिडिम्बा) यह तुम्हारी बहू भीम के वशवर्तिनी बनकर एक पुत्र को जन्म देगी। उस पुत्र के द्वारा तुम लोग सभी संकटों से पार उतार दिए जाओगे। तुम लोग यहाँ एक महीने तक प्रतीक्षा करो, मैं फिर वापस आऊँगा।"
  • व्याख्या: व्यासजी स्पष्ट रूप से हिडिम्बा से होने वाले पुत्र (घटोत्कच का संकेत) के जन्म और उसके द्वारा संकटों में सहायता मिलने की बात बताते हैं।

श्लोक 51 और 52:

देशकालौ विदित्वैवं यास्यध्वं परमां मुदम्।। वैशंपायन उवाच। स तैः प्राञ्जलिभिः सर्वैस्तथेत्युक्तो जनाधिप। जगाम भगवान्व्यासो यथागतमृषिः प्रभुः।।

  • हिन्दी अनुवाद: "देश और काल की स्थिति को जानकर तब तुम लोग परम आनंद को प्राप्त होना।" वैशंपायन जी कहते हैं— हाथ जोड़े हुए उन सभी राजाधिराज पाण्डवों द्वारा 'बहुत अच्छा' ऐसा कहे जाने पर, भगवान ऋषि प्रभु व्यासजी जैसे आए थे, वैसे ही वापस चले गए।
  • व्याख्या: व्यासजी का आशीर्वाद प्राप्त कर पांडवों और माता कुन्ती को भारी संबल मिला और व्यासजी अपने लोक के लिए प्रस्थान कर गए।
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