ऋग्वेद १.२५.६ - शब्दार्थ और वैज्ञानिक व्याख्या
मूल मंत्र:
धृतव्रताय दाशुषे ॥६॥
जैसा कि पिछले सभी मंत्रों के विषय का साक्षात्कार करने के बाद जीव या चेतना के लिए इस १.२५.६ में ऋषि उसी विषय के अगले चरण पर विचार करते हुए कहते हैं कि उस पहले बताये गए तत् उस (सत्य या शाश्वत नियम के स्थापित उपलब्धि के उपरांत इत् ही निश्चित रूप से समानम् एक समान, समरूप या निरंतर एक साथ गतिशील जीवात्मा और परमात्मा दोनों अपने उद्देश्य को सिद्ध करते हैं, जीव ईश्वर जैसा आदर्श कर्म के द्वारा व्यापक सार्वभौमिक सार्वजनिक जगत कल्याणार्थ विश्व सौभाग्य कि आधारशिला तैयार करता है, दुसरी तरफ ईश्वर उस जीव के माध्यम से अपने सृष्टि प्रयोजंन को क्रियान्वित करता है। जिससे आशाते यह दोनों आशानुरूप उद्देश्य लक्ष्य को प्राप्त करते हैं, या अपने अपने सैद्धांतिक नियम में व्याप्त रहते हैं, इसलिए वेनन्ता ज्ञान की इच्छा रखने वाले जीव, अन्वेषण करने वाले या दो गतिशील ऊर्जाएं जैसे जीव और ईश्वर न कभी नहीं प्र युच्छतः प्रमाद करते हैं, या अपने मार्ग से विचलित होते हैं या चूकते हैं। क्योंकि यह दोनों धृतव्रताय प्राकृतिक स्वाभाविक शाश्वत सनातन नियम या अनुशासन को धारण करने वाले है। दाशुषे समर्पण करने वाले, ऊर्जा प्रदान करने वाले या यज्ञशील साधक के समान है।
ऋग्वेद १.२५.६
जीव और ईश्वर की समान उद्देश्यपूर्ण गति तथा शाश्वत नियम के साथ तारतम्य
गीता, उपनिषद्, दर्शन और रामायण के साथ समन्वित व्याख्या
मूल मंत्र
तदित्समानमाशाते वेनन्ता न प्र युच्छतः ।
धृतव्रताय दाशुषे ॥६॥
यह मंत्र पिछले मंत्र की स्वाभाविक अगली कड़ी के रूप में सामने आता है। पिछले मंत्र में जिस मनुष्य की चर्चा हुई थी जो अपनी शक्ति, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और इन्द्रियों को दिशा देकर व्यापक दृष्टि वाला बनता है, इस मंत्र में उसी चेतना की अगली अवस्था पर विचार किया गया है।
यहाँ विषय केवल मनुष्य की व्यक्तिगत उन्नति नहीं रह जाता।
अब प्रश्न है कि जब जीव अपने वास्तविक स्वरूप, सत्य और शाश्वत नियम की अनुभूति करता है, तब उसकी गति किसके साथ जुड़ती है?
आपके प्रस्तुत भाव के अनुसार यहाँ “तत्” उस सत्य या शाश्वत नियम की ओर संकेत करता है जिसकी उपलब्धि पिछले मंत्रों के क्रम में होती है। उस सत्य की स्थापना या उपलब्धि के बाद “इत्” निश्चितता का भाव देता है और “समानम्” उस अवस्था को सामने रखता है जिसमें जीवात्मा और परमात्मा अपने-अपने स्वरूप में रहते हुए एक समान उद्देश्यपूर्ण गति में कार्य करते हैं।
जीव अपने कर्म द्वारा ईश्वर के आदर्श को जीवन में अभिव्यक्त करता है और व्यापक सार्वभौमिक लोककल्याण की आधारशिला तैयार करता है।
दूसरी ओर ईश्वर उसी जीव के माध्यम से अपने सृष्टि-प्रयोजन को क्रियान्वित करता है।
इस प्रकार जीव और ईश्वर के बीच विरोध नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण संबंध स्थापित होता है।
इसी क्रम में—
आशाते — दोनों अपने-अपने उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में स्थित होते हैं।
वेनन्ता — ज्ञान की इच्छा रखने वाले, अन्वेषणशील, सत्य की खोज करने वाले; और आपके भावक्रम में दो गतिशील ऊर्जाओं—जीव और ईश्वर—की ओर भी संकेत।
न प्र युच्छतः — प्रमाद नहीं करते, मार्ग से विचलित नहीं होते, अपने नियत उद्देश्य में चूकते नहीं।
धृतव्रताय — धारण किए हुए व्रत, नियम, अनुशासन, प्राकृतिक और शाश्वत व्यवस्था के अनुसार स्थित।
दाशुषे — समर्पित होकर देने वाले, अर्पण करने वाले, यज्ञभाव से कर्म करने वाले जीव के संदर्भ में।
इस प्रकार मंत्र का मूल क्रम बनता है—
तत् → समानम् → आशाते → वेनन्ता → न प्र युच्छतः → धृतव्रताय → दाशुषे
और इस क्रम का व्यापक भाव है—
सत्य की उपलब्धि के बाद जीव और ईश्वर अपने-अपने स्वरूप में रहते हुए एक ही व्यापक शाश्वत व्यवस्था के अंतर्गत उद्देश्यपूर्ण गति करते हैं; ज्ञान की खोज करने वाला जीव प्रमाद और विचलन से बचते हुए अपने कर्म को उस सनातन नियम के प्रति समर्पित करता है और उसके माध्यम से व्यापक सृष्टि-कल्याण की प्रक्रिया में सहभागी बनता है।
१. पिछले मंत्र से इस मंत्र का संबंध
पिछले मंत्र में हमने देखा—
कदा क्षत्रश्रियं नरमा वरुणं करामहे।
मृळीकायोरुचक्षसम्॥
वहाँ मनुष्य के भीतर शक्ति के जागरण से लेकर व्यापक दृष्टि तक की यात्रा सामने आती है।
पहले—
क्षत्रश्रियं — शक्ति और सामर्थ्य।
फिर—
नरमा — नेतृत्व और मार्गदर्शन।
फिर—
वरुणं — वरण करने योग्य आदर्शता।
फिर—
करामहे — ज्ञान का कर्म में प्रवाह।
फिर—
मृळीकाय — कल्याण, शांति और संतुलन।
और अंततः—
उरुचक्षसम् — व्यापक दृष्टि।
अब प्रश्न यह है कि ऐसी व्यापक दृष्टि प्राप्त करने के बाद जीव क्या करता है?
यही प्रश्न इस मंत्र में आगे बढ़ता है।
व्यापक दृष्टि केवल देखने के लिए नहीं है।
ज्ञान केवल जानने के लिए नहीं है।
चेतना केवल अपने भीतर अनुभव करने के लिए नहीं है।
जब सत्य का साक्षात्कार होता है, तब जीवन का कर्म भी उसी सत्य के अनुरूप होना चाहिए।
इसलिए छठा मंत्र पिछले मंत्र की उपलब्धि को लेकर आगे बढ़ता है।
पाँचवें मंत्र में—
व्यक्ति अपनी शक्तियों का स्वामी बनता है।
छठे मंत्र में—
वही व्यक्ति उस शक्ति को शाश्वत नियम के अनुरूप समर्पित कर्म में लगाता है।
यहीं से व्यक्तिगत आत्मविकास सार्वभौमिक व्यवस्था से जुड़ता है।
२. “तत्” — वह सत्य
मंत्र का आरंभ होता है—
तत् इत्
अर्थात्—
वह ही, निश्चित रूप से वह।
यहाँ तत् को उस सत्य, उस शाश्वत व्यवस्था और उस परम तत्त्व के रूप में ग्रहण किया जा सकता है जिसकी ओर पिछले मंत्रों का क्रम जीव को ले जाता है।
उपनिषदों में “तत्” अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत है।
छान्दोग्य उपनिषद् में गुरु उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को बार-बार उस मूल सत्य की ओर ले जाते हैं और अंततः कहते हैं—
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
अर्थात् वह सत्य ही तुम्हारा वास्तविक तत्त्व है।
यहाँ “तत्” किसी सीमित वस्तु की ओर संकेत नहीं करता।
यह उस व्यापक सत्ता की ओर संकेत करता है जिसे जानने पर व्यक्ति अपने अस्तित्व को केवल शरीर, मन या अहंकार तक सीमित नहीं रखता।
इसीलिए इस मंत्र में तत् का आरंभिक स्थान बहुत महत्वपूर्ण है।
जब तक मनुष्य केवल अपने शरीर और व्यक्तिगत इच्छाओं को सत्य मानता है, उसकी गति सीमित रहती है।
जब उसे उस व्यापक सत्य का बोध होता है, तब उसके कर्म की दिशा बदलती है।
यही पिछले मंत्र के उरुचक्षसम् से छठे मंत्र के तत् तक की यात्रा है।
३. “तत्” और ईशावास्य उपनिषद्
ईशावास्य उपनिषद् का आरंभ—
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
से होता है।
अर्थात् यह संपूर्ण गतिशील जगत ईश्वर से आवृत है।
यह दृष्टि व्यक्ति को उसके सीमित अहंकार से ऊपर उठाती है।
यदि संसार केवल “मैं” और “मेरा” है तो कर्म का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ बन जाता है।
यदि संसार ईश्वर-व्याप्त व्यवस्था है तो कर्म का उद्देश्य व्यापक कल्याण से जुड़ जाता है।
इसी उपनिषद् में आगे त्याग का भाव आता है—
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
अर्थात् त्यागभाव से भोग करो और किसी के धन के प्रति लोभ मत करो।
इसलिए तत् की अनुभूति केवल दार्शनिक विचार नहीं रहती।
वह जीवन के व्यवहार को बदलती है।
यही कारण है कि छठे मंत्र में तत् के बाद समानम् और आशाते आते हैं।
सत्य की अनुभूति के बाद जीवन की गति उस सत्य की व्यवस्था के साथ जुड़ती है।
४. “समानम्” — एक समान उद्देश्य की ओर गति
अब आता है—
समानम्
आपके भावार्थ में इसका विशेष संबंध जीवात्मा और परमात्मा की समान उद्देश्यपूर्ण गति से है।
यहाँ “समान” का अर्थ यह नहीं कि जीव और ईश्वर का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
बल्कि यह कि दोनों की गति एक व्यापक व्यवस्था में एक-दूसरे से जुड़ती है।
जीव का उद्देश्य—
ईश्वर के आदर्श कर्म को अपने जीवन में धारण करना और व्यापक लोककल्याण करना।
ईश्वर का उद्देश्य—
सृष्टि की व्यवस्था और उसके प्रयोजन को निरंतर संचालित करना।
इस प्रकार जीव और ईश्वर की भूमिकाएँ अलग होते हुए भी एक व्यापक उद्देश्य में जुड़ती हैं।
भगवद्गीता में इसी संबंध का एक महत्वपूर्ण सूत्र मिलता है—
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।
— भगवद्गीता ९.१०
मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चर-अचर जगत को उत्पन्न करती है।
यहाँ ईश्वर की व्यापक व्यवस्था और प्रकृति की क्रियाशीलता का संबंध सामने आता है।
जीव इसी व्यवस्था में कर्म करता है।
इसलिए जीव का कर्म उस व्यापक व्यवस्था से अलग नहीं है।
५. गीता में जीव और परमात्मा
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं—
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
— भगवद्गीता १८.६१
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
यहाँ ईश्वर की उपस्थिति केवल किसी दूरस्थ सत्ता के रूप में नहीं है।
वह जीव के आंतरिक क्षेत्र से भी संबंधित है।
इसके बाद कृष्ण कहते हैं—
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥
— भगवद्गीता १८.६२
अर्थात् उसी की शरण में जाओ और उसके प्रसाद से परम शांति तथा शाश्वत स्थान प्राप्त करो।
यहाँ समानम् के भाव को एक व्यापक संबंध में समझा जा सकता है।
जीव स्वतंत्र कर्म करता है, लेकिन उसकी अंतिम दिशा उस व्यापक ईश्वरीय व्यवस्था से जुड़ी रहती है।
६. जीव ईश्वर जैसा कर्म क्यों करता है?
आपके भावार्थ में एक महत्वपूर्ण बात है—
“जीव ईश्वर जैसा आदर्श कर्म के द्वारा व्यापक सार्वभौमिक सार्वजनिक जगत कल्याणार्थ विश्व सौभाग्य की आधारशिला तैयार करता है।”
यहाँ “ईश्वर जैसा” का अर्थ ईश्वर बन जाना नहीं है।
बल्कि ईश्वर के आदर्श गुणों और कर्म-दृष्टि को अपने जीवन में उतारना है।
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण स्वयं कर्म का आदर्श प्रस्तुत करते हैं—
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
— भगवद्गीता ३.२२
मेरे लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं, फिर भी मैं कर्म करता हूँ।
यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है।
यदि परम सत्ता के लिए भी कर्म लोकव्यवस्था की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, तो मनुष्य का कर्म भी केवल व्यक्तिगत लाभ तक सीमित नहीं होना चाहिए।
कृष्ण आगे कहते हैं—
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
— भगवद्गीता ३.२३
यदि मैं कर्म में सावधानीपूर्वक न लगा रहूँ तो मनुष्य मेरे मार्ग का अनुसरण करेंगे।
अर्थात् श्रेष्ठ कर्म स्वयं एक आदर्श बनता है।
यही पिछले मंत्र के नरमा और वर्तमान मंत्र के समानम् को जोड़ता है।
७. “आशाते” — उद्देश्य की प्राप्ति
मंत्र में आगे है—
आशाते
आपके भावार्थ में इसका संबंध उद्देश्य और लक्ष्य की प्राप्ति से है।
जीव और ईश्वर अपने-अपने उद्देश्य में स्थित रहते हैं और उस उद्देश्य की प्राप्ति की दिशा में गतिशील रहते हैं।
यहाँ आशा केवल सामान्य इच्छा नहीं है।
यह उद्देश्यपूर्ण अभिमुखता है।
जीव के भीतर ज्ञान की इच्छा है।
सत्य की खोज है।
श्रेष्ठ कर्म की इच्छा है।
लोककल्याण की आकांक्षा है।
दूसरी ओर ईश्वर की व्यवस्था सृष्टि के निरंतर संचालन में लगी हुई है।
इसलिए दोनों की गति एक व्यापक व्यवस्था में मिलती है।
गीता में कर्म के साथ इसी उद्देश्यपूर्ण स्थिति का वर्णन मिलता है—
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परं आप्नोति पूरुषः॥
— भगवद्गीता ३.१९
इसलिए आसक्ति रहित होकर निरंतर कर्तव्य कर्म करो; क्योंकि आसक्ति रहित कर्म करते हुए मनुष्य परम अवस्था को प्राप्त कर सकता है।
यहाँ कर्म रुकता नहीं।
गति रुकती नहीं।
लेकिन दिशा बदल जाती है।
व्यक्तिगत स्वार्थ से हटकर कर्तव्य और व्यापक उद्देश्य की ओर।
८. “वेनन्ता” — ज्ञान की इच्छा और अन्वेषण
अब आता है—
वेनन्ता
आपके प्रस्तुत अर्थ में इसका संबंध ज्ञान की इच्छा रखने वाले, अन्वेषण करने वाले जीव तथा दो गतिशील ऊर्जाओं—जीव और ईश्वर—से जोड़ा गया है।
यहाँ वेनन्ता को ज्ञान की खोज के भाव में लेने पर उपनिषदों का पूरा ज्ञानमार्ग सामने आता है।
उपनिषद् केवल विश्वास करने को नहीं कहते।
वे पूछने, जानने, विचार करने और साक्षात्कार करने की प्रक्रिया स्थापित करते हैं।
बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया—
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
अर्थात् आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना और निदिध्यासन करना चाहिए।
यहाँ ज्ञान की इच्छा एक सक्रिय प्रक्रिया है।
पहले—
श्रोतव्यः
फिर—
मन्तव्यः
फिर—
निदिध्यासितव्यः
अर्थात् ज्ञान सुनकर रुकना नहीं है।
उस पर विचार करना है।
फिर उसे गहराई से आत्मसात् करना है।
इस प्रकार वेनन्ता का अन्वेषणशील भाव उपनिषदों की ज्ञानपरंपरा के साथ जुड़ता है।
९. नचिकेता — वेनन्ता का जीवंत उदाहरण
कठोपनिषद् का नचिकेता इस भाव का अत्यंत सुंदर उदाहरण है।
नचिकेता मृत्यु के देवता यम के पास पहुँचकर प्रश्न करता है—
मृत्यु के बाद क्या है?
आत्मा क्या है?
वास्तविक सत्य क्या है?
यम उसे अनेक भौतिक सुखों का विकल्प देते हैं, लेकिन नचिकेता उन सबको अस्वीकार कर ज्ञान की मांग करता है।
कठोपनिषद् में नचिकेता की यह जिज्ञासा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वह क्षणिक उपलब्धियों के बजाय शाश्वत सत्य को जानना चाहता है।
यही वेनन्ता है—
ज्ञान की इच्छा।
सत्य का अन्वेषण।
अज्ञात को जानने का प्रयास।
और जब यह खोज सत्य की ओर जाती है, तब जीव का कर्म भी बदलता है।
१०. ज्ञान की खोज और गीता
गीता में भगवान कृष्ण ज्ञान के साधकों का वर्णन करते हुए कहते हैं—
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥
— भगवद्गीता ७.१६
चार प्रकार के लोग भगवान की ओर आते हैं—आर्त, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।
इनमें जिज्ञासु विशेष रूप से ज्ञान की खोज करने वाला है।
अर्थात् मनुष्य का ईश्वर की ओर जाना केवल भय या आवश्यकता से नहीं होता।
वह जिज्ञासा से भी ईश्वर की ओर जाता है।
यह वेनन्ता के भाव के साथ सीधा तारतम्य स्थापित करता है।
जीव प्रश्न करता है।
अन्वेषण करता है।
सत्य की खोज करता है।
और अंततः सत्य के अनुरूप जीवन जीने की दिशा में बढ़ता है।
११. “न प्र युच्छतः” — प्रमाद न करना
अब मंत्र का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग आता है—
न प्र युच्छतः
आपके भावार्थ में—
प्रमाद नहीं करते, अपने मार्ग से विचलित नहीं होते, चूकते नहीं।
यह पिछले मंत्र में प्राप्त आत्मसंयम की स्वाभाविक परिणति है।
जब मनुष्य अपनी शक्ति पहचान लेता है, तब अगली चुनौती है—
क्या वह उस दिशा पर स्थिर रह सकता है?
ज्ञान प्राप्त करना एक बात है।
ज्ञानानुसार निरंतर चलना दूसरी बात।
एक व्यक्ति सत्य जान सकता है, लेकिन परिस्थितियों में सत्य से हट सकता है।
एक व्यक्ति संयम की बात कर सकता है, लेकिन आकर्षण के सामने संयम खो सकता है।
एक व्यक्ति धर्म का ज्ञान रख सकता है, लेकिन स्वार्थ आने पर धर्म छोड़ सकता है।
इसलिए न प्र युच्छतः का भाव केवल “गलती नहीं करना” नहीं है।
यह मार्ग की निरंतरता है।
१२. गीता में “प्रमाद” से बचना
भगवद्गीता में बार-बार सजगता की शिक्षा मिलती है।
कृष्ण कहते हैं—
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
यहाँ सततम् महत्वपूर्ण है।
निरंतर।
लगातार।
बिना प्रमाद के।
योग भी केवल कभी-कभी की अवस्था नहीं है।
मनुष्य को अपने कर्म, विचार और लक्ष्य में निरंतरता चाहिए।
गीता में स्थितप्रज्ञ का वर्णन करते हुए कहा गया—
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
— भगवद्गीता २.५५
जब मनुष्य मन में स्थित सभी कामनाओं को छोड़कर आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
यह स्थिति मन की दिशा को स्थिर करती है।
यही न प्र युच्छतः का भाव समझने में सहायता करती है।
१३. कठोपनिषद् में प्रमाद और सावधानी
कठोपनिषद् में एक प्रसिद्ध वाक्य है—
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
उठो।
जागो।
श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करके उसे जानो।
यहाँ जाग्रत का अर्थ केवल नींद से जागना नहीं है।
यह चेतना की सजगता है।
मनुष्य को अपने लक्ष्य के प्रति जाग्रत रहना है।
अज्ञान, प्रमाद और इन्द्रिय-विक्षेप उसे मार्ग से हटाते हैं।
इसीलिए कठोपनिषद् का रथ-रूपक और ऋग्वेद का न प्र युच्छतः एक ही अनुशासन की ओर संकेत करते हुए दिखाई देते हैं।
रथ चल रहा है।
घोड़े शक्तिशाली हैं।
सारथी जाग्रत है।
लगाम नियंत्रित है।
लक्ष्य सामने है।
इस स्थिति में यात्रा विचलित नहीं होती।
१४. धृतव्रत — धारण किया हुआ शाश्वत नियम
अब मंत्र का सबसे गहरा शब्द आता है—
धृतव्रताय
धृत — धारण किया हुआ।
व्रत — नियम, संकल्प, अनुशासन, निर्धारित आचरण।
आपके भावार्थ में यह—
प्राकृतिक, स्वाभाविक, शाश्वत और सनातन नियम को धारण करने वाला
है।
यही शब्द पूरे मंत्र को एक व्यापक ब्रह्मांडीय व्यवस्था से जोड़ देता है।
जीव केवल अपनी इच्छा से नहीं चलता।
प्रकृति भी नियमों के अनुसार चलती है।
सृष्टि भी नियमबद्ध है।
ऋतुओं का क्रम है।
ग्रहों की गति है।
जीवन की उत्पत्ति और विकास की प्रक्रियाएँ हैं।
कर्म का परिणाम है।
और भारतीय वैदिक परंपरा में इस व्यापक व्यवस्था के लिए ऋत का विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
वरुण सूक्तों में भी ऋत और नियम का संबंध विशेष रूप से सामने आता है।
इसलिए धृतव्रत का भाव केवल व्यक्तिगत संकल्प नहीं है।
यह व्यापक शाश्वत व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ अनुशासन है।
१५. वरुण और ऋत
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि पूरा सूक्त वरुण से संबद्ध है।
वरुण वैदिक साहित्य में व्यापक व्यवस्था, नियम और ऋत से गहराई से जुड़े हुए हैं।
इसलिए जब इसी सूक्त में धृतव्रत आता है, तो यह पिछले मंत्रों में स्थापित वरुणीय व्यवस्था के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ता है।
अर्थात्—
जिस व्यवस्था को वरुण धारण करते हैं,
उसी व्यवस्था में जीव को भी अपने कर्म को अनुशासित करना है।
ईश्वर की व्यवस्था में प्रमाद नहीं है।
सृष्टि का क्रम अपने नियम में चलता है।
जीव जब उस नियम के अनुरूप होता है, तब उसकी गति भी उद्देश्यपूर्ण हो जाती है।
यहीं समानम् और धृतव्रत एक-दूसरे से जुड़ते हैं।
१६. गीता में शाश्वत नियम
भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं—
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥
— भगवद्गीता ९.४
मेरे अव्यक्त स्वरूप से यह संपूर्ण जगत व्याप्त है।
यहाँ ईश्वर और जगत के बीच व्यापक संबंध की स्थापना होती है।
आगे—
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः।
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥
— भगवद्गीता ९.८
प्रकृति को अपने अधीन रखकर मैं बार-बार समस्त भूतसमुदाय की सृष्टि करता हूँ।
यहाँ सृष्टि का संचालन किसी अनियमित घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यवस्था के अंतर्गत दिखाया गया है।
यही धृतव्रत की व्यापक पृष्ठभूमि है।
१७. “दाशुषे” — समर्पण और अर्पण
मंत्र का अंतिम शब्द है—
दाशुषे
इसमें देने, अर्पित करने और समर्पित होने का भाव लिया जाता है।
यदि जीव ज्ञान प्राप्त करके अपनी शक्ति को केवल अपने लिए रख लेता है, तो यात्रा अधूरी रह जाती है।
पिछले मंत्र में व्यापक दृष्टि प्राप्त हुई।
अब उस व्यापक दृष्टि का स्वाभाविक परिणाम है—
समर्पित कर्म।
अर्थात् जो ज्ञान मिला, वह समाज के लिए उपयोगी बने।
जो शक्ति मिली, वह संरक्षण और निर्माण में लगे।
जो बुद्धि मिली, वह सत्य की खोज और लोककल्याण में लगे।
जो ऐश्वर्य मिला, वह केवल व्यक्तिगत भोग का साधन न बने।
यही दाशुषे का भाव है।
१८. ईशावास्य का त्याग और दाशुषे
ईशावास्य उपनिषद् का—
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा
इसी भाव को एक अलग स्तर पर प्रस्तुत करता है।
त्याग का अर्थ सब कुछ छोड़ देना मात्र नहीं है।
त्याग का अर्थ यह भी है कि उपलब्ध वस्तु को केवल व्यक्तिगत स्वार्थ का साधन न बनाया जाए।
जीव को जो शक्ति मिली है, वह व्यापक व्यवस्था का हिस्सा है।
इसलिए उसका उपयोग भी व्यापक हित में होना चाहिए।
इसी प्रकार यज्ञ की मूल भावना भी अर्पण की है।
मनुष्य अपने कर्म को व्यापक व्यवस्था में अर्पित करता है।
गीता इसी भावना को कर्मयोग के रूप में व्यवस्थित करती है।
१९. गीता का यज्ञभाव
भगवद्गीता कहती है—
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
— भगवद्गीता ३.९
यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म मनुष्य को कर्मबंधन में बाँधते हैं।
अर्थात् कर्म का उद्देश्य केवल स्वयं तक सीमित न हो।
जब कर्म अर्पण बनता है, तब वह व्यापक व्यवस्था का हिस्सा बनता है।
इसीलिए दाशुषे और गीता का यज्ञार्थ कर्म एक-दूसरे के साथ तारतम्य स्थापित करते हैं।
जीव कर्म करता है।
लेकिन वह कर्म किसके लिए?
यदि केवल अहंकार के लिए है, तो वह बंधन उत्पन्न करता है।
यदि व्यापक व्यवस्था और लोककल्याण के लिए है, तो वही कर्म यज्ञभाव धारण करता है।
२०. जीव और ईश्वर — विरोध नहीं, सहभागिता
इस मंत्र के आपके भावार्थ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात है—
ईश्वर जीव के माध्यम से अपने सृष्टि-प्रयोजन को क्रियान्वित करता है।
इस भाव को गीता के कर्मयोग से समझा जा सकता है।
ईश्वर व्यापक व्यवस्था का आधार है।
प्रकृति उस व्यवस्था में कार्य करती है।
जीव उसी प्रकृति और चेतना के क्षेत्र में कर्म करता है।
इसलिए जीव के श्रेष्ठ कर्म से व्यापक व्यवस्था में भी कल्याणकारी परिणाम उत्पन्न होते हैं।
गीता में भगवान कहते हैं—
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
— भगवद्गीता ३.२७
प्रकृति के गुण ही सभी कर्म कराते हैं, लेकिन अहंकार से मोहित मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है।
यहाँ मनुष्य को अपने कर्म की व्यापक व्यवस्था समझने की शिक्षा मिलती है।
जब अहंकार कम होता है, तब कर्म समर्पण बनता है।
यही दाशुषे से जुड़ता है।
२१. रामायण में जीव का ईश्वरीय उद्देश्य में सहभागी होना
रामायण में हनुमान का चरित्र इस भाव का अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है।
हनुमान के पास शक्ति है।
असाधारण गति है।
बुद्धि है।
ज्ञान है।
वाक्पटुता है।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता है—
उनकी शक्ति का समर्पण।
वे अपनी शक्ति को व्यक्तिगत प्रसिद्धि के लिए नहीं लगाते।
वे रामकार्य के लिए अपनी शक्ति अर्पित करते हैं।
समुद्र लाँघना हो—
सीता की खोज करनी हो—
लंका में प्रवेश करना हो—
संदेश देना हो—
लंकादहन करना हो—
संजीवनी लानी हो—
हर जगह उनकी शक्ति एक व्यापक उद्देश्य में समर्पित है।
यह दाशुषे का अत्यंत सुंदर जीवन-उदाहरण बनता है।
२२. हनुमान और “न प्र युच्छतः”
हनुमान के चरित्र में केवल शक्ति नहीं है।
उनमें लक्ष्य की स्पष्टता भी है।
जब वे समुद्र पार करते हैं, तब मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं।
मैनाक पर्वत।
सुरसा।
सिंहिका।
लंका का प्रवेश।
लेकिन उनका उद्देश्य विचलित नहीं होता।
वे परिस्थिति के अनुसार अपनी शक्ति का रूप बदलते हैं, लेकिन लक्ष्य नहीं बदलते।
यही न प्र युच्छतः का भाव स्पष्ट करता है।
अर्थात्—
मार्ग में परिस्थिति बदल सकती है, लेकिन सत्य-आधारित उद्देश्य नहीं बदलना चाहिए।
यह गीता के कर्मयोग और कठोपनिषद् के जाग्रत रथ से भी जुड़ता है।
२३. राम स्वयं “धृतव्रत”
रामायण में श्रीराम का चरित्र धृतव्रत का दूसरा महान उदाहरण है।
पिता का वचन।
धर्म का पालन।
राज्य का त्याग।
वनवास।
सीता की खोज।
सुग्रीव के साथ मित्रता।
विभीषण की शरणागति।
रावण के विरुद्ध युद्ध।
इन सभी परिस्थितियों में उनके जीवन का मूल धर्म नहीं बदलता।
परिस्थिति बदलती है।
भूमिका बदलती है।
राजकुमार से वनवासी।
वनवासी से मित्र।
मित्र से सेनानायक।
और अंततः राजा।
लेकिन धर्म की धुरी बनी रहती है।
यही धृतव्रत है।
२४. राम और भरत का उदाहरण
भरत का चरित्र भी इस मंत्र को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भरत के सामने राज्य था।
राजसिंहासन उनके लिए उपलब्ध था।
लेकिन उन्होंने उसे अपने अधिकार का व्यक्तिगत लाभ नहीं बनाया।
उन्होंने राम की पादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित किया और स्वयं प्रतिनिधि के रूप में राज्य चलाया।
यहाँ शक्ति का स्वामित्व नहीं, शक्ति का समर्पण दिखाई देता है।
पिछले मंत्र का क्षत्रश्रियं और इस मंत्र का दाशुषे यहाँ एक साथ दिखाई देते हैं।
शक्ति मिली—
लेकिन उसका उपयोग व्यक्तिगत अहंकार के लिए नहीं हुआ।
नेतृत्व मिला—
लेकिन उसे धर्म के अधीन रखा गया।
यही शाश्वत नियम के प्रति समर्पण है।
२५. अर्जुन — जीव की भूमिका का उदाहरण
भगवद्गीता में अर्जुन स्वयं जीव की स्थिति का अत्यंत स्पष्ट उदाहरण बनता है।
युद्धभूमि में अर्जुन भ्रमित है।
उसके पास शक्ति है।
ज्ञान है।
कौशल है।
लेकिन उसकी चेतना संकट में है।
वह अपने कर्तव्य को लेकर भ्रमित हो जाता है।
तब कृष्ण उसे आत्मा, शरीर, कर्म, ज्ञान, योग, प्रकृति, पुरुष, ईश्वर और धर्म की शिक्षा देते हैं।
अंततः अर्जुन कहता है—
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥
— भगवद्गीता १८.७३
मेरा मोह नष्ट हो गया है, स्मृति प्राप्त हो गई है, मैं स्थित हूँ, मेरे संशय समाप्त हो गए हैं; अब मैं आपके वचन का पालन करूँगा।
यहाँ वेनन्ता → न प्र युच्छतः → धृतव्रताय → दाशुषे का क्रम बहुत स्पष्ट दिखाई देता है।
पहले—
वेनन्ता — अर्जुन प्रश्न करता है।
फिर—
वह ज्ञान प्राप्त करता है।
फिर—
उसका भ्रम समाप्त होता है।
फिर—
न प्र युच्छतः — वह अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।
फिर—
धृतव्रत — धर्म के अनुसार स्थित होता है।
और अंततः—
दाशुषे — अपना कर्म समर्पित करता है।
२६. ज्ञान और कर्म का मिलन
इस मंत्र की विशेषता यह है कि इसमें ज्ञान और कर्म अलग नहीं हैं।
वेनन्ता — ज्ञान की खोज।
धृतव्रत — नियम में स्थिरता।
दाशुषे — कर्म का अर्पण।
अर्थात्—
ज्ञान प्राप्त करो।
ज्ञान को नियम में बदलो।
नियम को कर्म में उतारो।
कर्म को अर्पण बनाओ।
यही गीता का कर्मयोग है।
इसीलिए गीता में ज्ञान और कर्म को विरोधी नहीं बनाया गया।
भगवान कृष्ण कहते हैं—
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥
— भगवद्गीता ५.४
सांख्य और योग को अलग-अलग मानने वाले बालबुद्धि लोग हैं; जो किसी एक में भी ठीक प्रकार स्थित है, वह दोनों का फल प्राप्त करता है।
इसलिए ज्ञान और कर्म का समन्वय इस मंत्र के भावक्रम में भी स्वाभाविक रूप से दिखाई देता है।
२७. जीव की गति और ईश्वर की गति
आपके भावार्थ में वेनन्ता को दो गतिशील ऊर्जाओं—जीव और ईश्वर—के रूप में भी देखा गया है।
इस दृष्टि में दोनों की गति का उद्देश्य अलग होते हुए भी एक व्यापक व्यवस्था में जुड़ा हुआ है।
जीव—
ज्ञान की ओर गतिशील।
ईश्वर—
सृष्टि-व्यवस्था के संचालन में गतिशील।
जीव—
अपने कर्म से व्यवस्था में सहभागी।
ईश्वर—
व्यापक व्यवस्था का आधार।
जीव—
लोककल्याण के लिए कर्म कर सकता है।
ईश्वर—
सृष्टि की व्यापक व्यवस्था को धारण करता है।
इस प्रकार जीव और ईश्वर का संबंध निष्क्रिय नहीं है।
यह गतिशील संबंध है।
यही कारण है कि मंत्र में गति, उद्देश्य और नियम तीनों साथ आते हैं।
२८. उपनिषद् में जीव और परम सत्य
छान्दोग्य उपनिषद् का—
तत्त्वमसि
जीव को उस व्यापक सत्य की ओर संकेत करता है।
बृहदारण्यक का—
अहं ब्रह्मास्मि
आत्मबोध की उच्च अवस्था का संकेत देता है।
ईशावास्य का—
ईशावास्यमिदं सर्वम्
संपूर्ण जगत में ईश्वर की व्यापकता दिखाता है।
कठोपनिषद् का रथरूपक—
आत्मा, बुद्धि, मन और इन्द्रियों की आंतरिक व्यवस्था समझाता है।
इन सबको इस मंत्र के साथ रखने पर एक क्रम बनता है—
सत्य की पहचान → आत्मबोध → मन-बुद्धि का संयम → उद्देश्यपूर्ण कर्म → व्यापक व्यवस्था में सहभागिता।
यही इस मंत्र के भाव का उपनिषदिक विस्तार है।
२९. “न प्र युच्छतः” और स्थितप्रज्ञ
गीता का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति परिस्थितियों से टूटता नहीं।
वह सुख में बहता नहीं और दुःख में मार्ग नहीं छोड़ता।
कृष्ण कहते हैं—
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
यही मानसिक स्थिरता न प्र युच्छतः की व्याख्या में उपयोगी है।
मार्ग पर चलना केवल बाहरी अनुशासन नहीं है।
भीतर के आकर्षण, भय, क्रोध, मोह और लोभ के बीच भी लक्ष्य को न खोना है।
इसलिए स्थिरता स्वयं में एक शक्ति है।
और यही शक्ति पिछले मंत्र के क्षत्रश्रियं से प्राप्त हुई थी।
३०. धृतव्रत और स्वधर्म
गीता में एक महत्वपूर्ण शिक्षा है—
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
— भगवद्गीता ३.३५
अपने धर्म का पालन, चाहे उसमें कुछ कमी हो, दूसरे के धर्म को उत्तम रूप से करने से श्रेष्ठ है।
यहाँ धृतव्रत के भाव से संबंध स्थापित होता है।
मनुष्य को अपने उचित कर्तव्य की पहचान करनी चाहिए और उस पर स्थिर रहना चाहिए।
दूसरे की भूमिका की नकल करना आवश्यक नहीं।
जीव का अपना धर्म है।
उसकी अपनी क्षमता है।
उसका अपना कर्मक्षेत्र है।
जब वह अपने उचित कर्तव्य को व्यापक सत्य के साथ जोड़कर करता है, तब उसका कर्म समर्पित कर्म बनता है।
३१. विश्वकल्याण और लोकसंग्रह
आपके भावार्थ में विश्व सौभाग्य की आधारशिला और सार्वभौमिक सार्वजनिक जगत कल्याण की बात विशेष रूप से आती है।
गीता में इसका सबसे निकटतम भाव है—
लोकसंग्रह।
भगवान कृष्ण कहते हैं—
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥
— भगवद्गीता ३.२०
जनक आदि ने कर्म के द्वारा सिद्धि प्राप्त की और लोकसंग्रह को देखते हुए भी कर्म करना चाहिए।
यहाँ कर्म की व्यक्तिगत सिद्धि और सामाजिक कल्याण दोनों को जोड़ा गया है।
अर्थात् आत्मिक उन्नति संसार से पलायन नहीं है।
वह संसार के प्रति उत्तरदायित्व में भी व्यक्त हो सकती है।
यही आपके द्वारा दिए गए भाव में—
जीव ईश्वर के आदर्श कर्म के द्वारा विश्वकल्याण की आधारशिला तैयार करता है
के साथ सीधा तारतम्य स्थापित करता है।
३२. जनक का उदाहरण
राजा जनक इसका विशेष उदाहरण हैं।
वे राजा हैं।
राज्य चलाते हैं।
संसार में रहते हैं।
फिर भी ज्ञान और आत्मबोध की परंपरा में उनका स्थान अत्यंत ऊँचा है।
इससे यह भाव सामने आता है कि ज्ञान का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं है।
मनुष्य ज्ञान प्राप्त करके भी समाज में सक्रिय रह सकता है।
बल्कि उसका ज्ञान उसके कर्म को अधिक व्यापक बना सकता है।
यही—
वेनन्ता → धृतव्रत → दाशुषे
का सामाजिक रूप है।
३३. रामराज्य और विश्वकल्याण
रामायण में रामराज्य का आदर्श भी इसी दिशा में देखा जा सकता है।
राजा का सुख प्रजा के सुख से जुड़ा है।
शासन का उद्देश्य व्यक्तिगत वैभव नहीं, लोकव्यवस्था और कल्याण है।
राम के जीवन में शक्ति है, लेकिन शक्ति धर्म के अधीन है।
राज्य है, लेकिन राज्य लोककल्याण के लिए है।
ज्ञान है, लेकिन ज्ञान कर्म से जुड़ा है।
नेतृत्व है, लेकिन नेतृत्व व्यक्तिगत अहंकार से मुक्त है।
यही पिछले मंत्र और इस मंत्र के बीच का संबंध है।
पाँचवाँ मंत्र आदर्श नेतृत्व की तैयारी करता है।
छठा मंत्र उस नेतृत्व को शाश्वत नियम और समर्पित कर्म से जोड़ता है।
३४. प्रकृति भी “धृतव्रता”
यदि मंत्र के धृतव्रत को प्राकृतिक और शाश्वत नियम के रूप में देखें, तो प्रकृति का पूरा क्रम एक उदाहरण बन जाता है।
सूर्य अपने नियम से उदित और अस्त होता है।
ऋतुएँ अपने क्रम से आती हैं।
जल चक्र चलता है।
बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज का क्रम चलता है।
शरीर में जीवन की प्रक्रियाएँ अपने नियमों में चलती हैं।
ग्रहों की गति अपने नियमों से संचालित होती है।
इस व्यापक व्यवस्था में “प्रमाद” का कोई स्थान नहीं दिखाई देता।
मनुष्य इस व्यवस्था का भाग है।
जब मनुष्य अपने कर्म को व्यापक प्राकृतिक और नैतिक व्यवस्था के अनुरूप रखता है, तब उसका जीवन भी उस शाश्वत क्रम के साथ सामंजस्य स्थापित करता है।
यही धृतव्रत है।
३५. जीव के लिए “व्रत” का अर्थ
जीव के स्तर पर व्रत का अर्थ है—
सत्य से विचलित न होना।
ज्ञान की खोज छोड़ना नहीं।
धर्म से हटना नहीं।
कर्म से भागना नहीं।
शक्ति का दुरुपयोग न करना।
ज्ञान को केवल अपने तक सीमित न रखना।
लोककल्याण की भावना बनाए रखना।
इस प्रकार व्रत कोई बाहरी अनुष्ठान मात्र नहीं है।
यह जीवन की दिशा है।
जब जीवन की दिशा सत्य के अनुरूप स्थिर हो जाती है, तब जीव धृतव्रत होता है।
३६. अर्जुन का अंतिम संकल्प — धृतव्रत
गीता के अंत में अर्जुन का—
करिष्ये वचनं तव
विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
वह केवल यह नहीं कहता कि मैंने ज्ञान सुन लिया।
वह कहता है—
मैं अब कर्म करूँगा।
यही ज्ञान की अंतिम परीक्षा है।
ज्ञान → निर्णय → संकल्प → कर्म।
यहाँ दाशुषे का भाव भी जुड़ता है।
अर्जुन अपना युद्ध व्यक्तिगत क्रोध के लिए नहीं, बल्कि कृष्ण द्वारा समझाए गए धर्म और कर्तव्य के अनुसार करता है।
इस प्रकार गीता का अर्जुन इस मंत्र के भाव का अत्यंत स्पष्ट उदाहरण बन जाता है।
३७. हनुमान — ज्ञान, शक्ति और समर्पण का संगम
हनुमान के चरित्र को फिर से देखें।
उनके पास—
ज्ञान है।
शक्ति है।
विवेक है।
गति है।
साहस है।
लेकिन इन सबका केंद्र है—
रामकार्य।
यही कारण है कि हनुमान केवल शक्तिशाली व्यक्ति नहीं हैं।
वे समर्पित शक्ति हैं।
पिछले मंत्र का क्षत्रश्रियं उनके भीतर शक्ति के रूप में है।
नरमा—वे नेतृत्व करते हैं।
वरुणं—वे वरणीय आदर्श बनते हैं।
करामहे—उनका ज्ञान कर्म में उतरता है।
मृळीकाय—उनका कर्म रामकार्य और लोककल्याण से जुड़ा है।
और इस मंत्र का—
दाशुषे—उनकी पूरी शक्ति राम को अर्पित है।
इस प्रकार दोनों मंत्रों का तारतम्य हनुमान के चरित्र में बहुत स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
३८. विभीषण का उदाहरण
विभीषण भी इस मंत्र की एक दूसरी दिशा को दिखाते हैं।
वह रावण के राज्य में रहते हुए भी अधर्म को स्वीकार नहीं करते।
उनकी चेतना सत्य और धर्म की ओर जाती है।
वे अपने पुराने संबंध और सुविधा छोड़कर धर्म की शरण लेते हैं।
यह वेनन्ता और न प्र युच्छतः दोनों से जुड़ता है।
ज्ञान की पहचान होने के बाद उसके अनुसार मार्ग चुनना।
फिर राम की शरण में आकर अपनी शक्ति और ज्ञान को धर्म के पक्ष में समर्पित करना—
यह दाशुषे के भाव को प्रकट करता है।
३९. सत्य की प्राप्ति के बाद क्या?
मंत्र का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।
यदि जीव ने सत्य जान लिया तो उसके बाद?
उत्तर—
जीवन बदलना चाहिए।
यदि आत्मा की व्यापकता का बोध हुआ है तो कर्म में व्यापकता आनी चाहिए।
यदि ईश्वर की सर्वव्यापकता का ज्ञान हुआ है तो दूसरे प्राणियों के प्रति व्यवहार बदलना चाहिए।
यदि मनुष्य को शाश्वत नियम का बोध हुआ है तो उसे अपने स्वार्थ के लिए नियम नहीं तोड़ना चाहिए।
यदि ज्ञान मिला है तो ज्ञान का उपयोग लोककल्याण में होना चाहिए।
इसीलिए मंत्र में तत् के बाद सीधे समानम्, आशाते, वेनन्ता, न प्र युच्छतः, धृतव्रत, और दाशुषे आते हैं।
सत्य का साक्षात्कार कर्म की नई दिशा बनाता है।
४०. व्यक्तिगत चेतना से सार्वभौमिक चेतना
पिछले मंत्र तक यात्रा मुख्यतः व्यक्ति के भीतर थी।
शरीर।
मन।
बुद्धि।
चित्त।
अहंकार।
इन्द्रियाँ।
संयम।
नेतृत्व।
दृष्टि।
लेकिन छठे मंत्र में चेतना का क्षेत्र व्यापक हो जाता है।
अब—
मैं कौन हूँ?
से आगे—
मैं किस व्यवस्था का भाग हूँ?
का प्रश्न आता है।
फिर—
मेरे कर्म का व्यापक उद्देश्य क्या है?
यह प्रश्न आता है।
और अंततः—
क्या मेरा कर्म उस शाश्वत नियम के साथ सामंजस्य में है?
यही धृतव्रत है।
४१. जीव और परमात्मा का तारतम्य
इस पूरे मंत्र को जीव और परमात्मा के संबंध में इस प्रकार रखा जा सकता है—
परमात्मा
सृष्टि की व्यापक व्यवस्था का आधार।
प्रकृति
उस व्यवस्था को क्रियान्वित करने वाली शक्ति।
जीव
उस व्यवस्था में चेतन कर्मकर्ता और अनुभवकर्ता।
ज्ञान
जीव को अपने वास्तविक उद्देश्य की पहचान कराता है।
संयम
जीव को अपने मन और इन्द्रियों की दिशा निर्धारित करने योग्य बनाता है।
कर्म
जीव को सृष्टि-व्यवस्था में सक्रिय सहभागी बनाता है।
समर्पण
कर्म को व्यापक कल्याण से जोड़ता है।
शाश्वत नियम
जीव की गति को धर्म और ऋत के अनुरूप रखता है।
इस प्रकार जीव और ईश्वर के बीच संबंध एक गतिशील सहभागिता के रूप में सामने आता है।
४२. “समानम्” का गहरा भाव
यहाँ फिर समानम् पर लौटना आवश्यक है।
जीव और परमात्मा एक ही नहीं कहे जा रहे हैं।
बल्कि उनके उद्देश्यपूर्ण कर्म की दिशा एक व्यापक सत्य से जुड़ती है।
जीव अपने स्तर पर कर्म करता है।
ईश्वर अपने व्यापक स्तर पर व्यवस्था को धारण करता है।
जीव का श्रेष्ठ कर्म उस व्यवस्था में सहयोग करता है।
इसलिए “समान” का भाव उद्देश्य और नियम की संगति के रूप में समझना इस मंत्र के पूरे क्रम को स्पष्ट करता है।
जैसे—
सूर्य अपने नियम में चलता है।
पृथ्वी अपने नियम में चलती है।
जल अपने चक्र में चलता है।
जीव अपनी चेतना और कर्म के माध्यम से उसी विश्वव्यवस्था में सहभागी होता है।
जब जीव अपनी गति को सत्य और धर्म के अनुरूप करता है, तब उसकी गति व्यापक व्यवस्था से सामंजस्य स्थापित करती है।
४३. ज्ञान से विश्वकल्याण
आपके भावार्थ में विश्व सौभाग्य की आधारशिला का विचार इस मंत्र की अंतिम दिशा को बहुत स्पष्ट करता है।
सत्य का ज्ञान यदि केवल व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित हो जाए तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित हो सकता है।
लेकिन जब ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान को कर्म में लगाता है, तब शिक्षा, संस्कृति, सेवा, विज्ञान, न्याय, पर्यावरण, समाज और मानवकल्याण जैसे अनेक क्षेत्रों में उसका प्रभाव पड़ सकता है।
गीता का लोकसंग्रह इसी व्यापक कर्मदृष्टि का आधार है।
रामायण में राम का राज्यधर्म इसी का जीवन-रूप है।
हनुमान का रामकार्य इसी का समर्पित रूप है।
भरत का त्याग इसी का शासनात्मक रूप है।
नचिकेता की जिज्ञासा इसका ज्ञानात्मक रूप है।
जनक का कर्मयोग इसका राजकीय और सामाजिक रूप है।
और अर्जुन का युद्धभूमि में धर्मानुकूल कर्म इसका निर्णायक रूप है।
४४. चारों परंपराओं में एक ही क्रम
अब मंत्र को चारों ज्ञानपरंपराओं के साथ एक साथ रखें।
ऋग्वेद
तत् → समानम् → आशाते → वेनन्ता → न प्र युच्छतः → धृतव्रताय → दाशुषे
सत्य की पहचान से उद्देश्यपूर्ण, नियमबद्ध और समर्पित कर्म तक।
उपनिषद्
तत् → आत्मबोध → मन-बुद्धि का विवेक → सत्य में स्थित होना
तत्त्वमसि, आत्मदर्शन, रथरूपक और ब्रह्मविद्या इसी दिशा को प्रकाशित करते हैं।
भगवद्गीता
ज्ञान → योग → आत्मसंयम → स्वधर्म → कर्मयोग → लोकसंग्रह → समर्पण
यह वही यात्रा कर्म के विस्तृत रूप में प्रस्तुत करती है।
रामायण
राम का धर्म → भरत का त्याग → हनुमान की शक्ति → विभीषण का सत्य-ग्रहण → लोककल्याणकारी शासन
यह उसी ज्ञान को जीवन और चरित्र में प्रकट करती है।
इस प्रकार चारों में एक ही मूल क्रम अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है।
४५. मंत्र का समग्र भावार्थ
अब पूरे मंत्र को आपके मूल भाव के आधार पर एक साथ पढ़ें—
तत् इत् — वह सत्य ही निश्चित रूप से वह परम आधार है जिसकी उपलब्धि और साक्षात्कार की ओर पूर्ववर्ती मंत्रों का क्रम जीव को ले जाता है।
समानम् — उस सत्य की उपलब्धि के पश्चात् जीवात्मा और परमात्मा अपने-अपने स्वरूप में रहते हुए भी व्यापक सृष्टि-व्यवस्था के एक समान उद्देश्यपूर्ण क्रम में गतिशील होते हैं।
आशाते — दोनों अपने-अपने उद्देश्य और लक्ष्य में स्थित होकर उसे सिद्ध करने की दिशा में कार्य करते हैं।
जीव ईश्वर के आदर्श कर्म को अपने जीवन में धारण करके व्यापक सार्वभौमिक और सार्वजनिक जगतकल्याण की आधारशिला तैयार करता है।
दूसरी ओर परमात्मा उसी जीव की चेतना, बुद्धि, शक्ति और कर्म के माध्यम से अपने सृष्टि-प्रयोजन को व्यापक व्यवस्था में क्रियान्वित करता है।
वेनन्ता — जीव ज्ञान की इच्छा रखने वाला, सत्य का अन्वेषण करने वाला और चेतना की उच्च अवस्था की ओर गतिशील है; तथा इस व्यापक क्रम में जीव और ईश्वर दोनों अपने-अपने स्तर पर गतिशील शक्तियों के रूप में कार्य करते हैं।
न प्र युच्छतः — वे अपने सत्य, उद्देश्य और नियत मार्ग से प्रमादपूर्वक विचलित नहीं होते; ज्ञान की खोज और धर्मपूर्ण कर्म की दिशा में चूकते नहीं हैं।
धृतव्रताय — क्योंकि वे धारण किए हुए शाश्वत, प्राकृतिक, स्वाभाविक और सनातन नियम के अनुसार स्थित हैं।
दाशुषे — और जीव उस व्यवस्था के प्रति अपने ज्ञान, कर्म, शक्ति और जीवन को अर्पित करने वाला बनता है।
४६. अंतिम तारतम्य — पाँचवें से छठे मंत्र तक
इन दोनों मंत्रों को एक साथ पढ़ने पर उनकी क्रमबद्धता और भी स्पष्ट होती है।
पाँचवाँ मंत्र
क्षत्रश्रियं
शक्ति प्राप्त करो।
नरमा
उस शक्ति को दिशा देकर नेतृत्व योग्य बनो।
वरुणं
अपने चरित्र को वरणीय और आदर्श बनाओ।
करामहे
ज्ञान को कर्म में उतारो।
मृळीकाय
कर्म को कल्याणकारी और संतुलित बनाओ।
उरुचक्षसम्
दृष्टि को व्यापक करो।
छठा मंत्र
तत्
उस व्यापक सत्य को पहचानो।
समानम्
उस सत्य की व्यवस्था के साथ अपनी गति को सामंजस्यपूर्ण बनाओ।
आशाते
उद्देश्यपूर्ण कर्म में स्थित रहो।
वेनन्ता
ज्ञान और सत्य की खोज जारी रखो।
न प्र युच्छतः
मार्ग से विचलित मत हो।
धृतव्रताय
शाश्वत नियम को धारण करो।
दाशुषे
अपने कर्म और शक्ति को व्यापक उद्देश्य में अर्पित करो।
इस प्रकार पाँचवाँ मंत्र आदर्श मनुष्य की तैयारी करता है और छठा मंत्र उस आदर्श मनुष्य को ब्रह्मांडीय व्यवस्था और लोककल्याण से जोड़ता है।
४७. एक सरल उदाहरण
एक विद्यार्थी की कल्पना करें।
उसमें बुद्धि है।
शक्ति है।
समय है।
इन्द्रियाँ हैं।
वह पहले अपने मन को नियंत्रित करता है।
मोबाइल, मनोरंजन और अन्य आकर्षणों के बीच अपने लक्ष्य को चुनता है।
यह—
क्षत्रश्रियं।
वह अपने साथियों को भी पढ़ने और अनुशासन के लिए प्रेरित करता है।
यह—
नरमा।
उसका चरित्र दूसरों के लिए आदर्श बनता है।
यह—
वरुणं।
वह अपने ज्ञान का उपयोग किसी उपयोगी कार्य में करता है।
यह—
करामहे।
उसके भीतर संतुलन और संयम आता है।
यह—
मृळीकाय।
उसकी दृष्टि केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं रहती; वह समाज के लिए कुछ करने की सोचता है।
यह—
उरुचक्षसम्।
अब छठे मंत्र की यात्रा शुरू होती है।
वह सत्य और ज्ञान की खोज करता है—
वेनन्ता।
अपने उद्देश्य से विचलित नहीं होता—
न प्र युच्छतः।
अपने जीवन में अनुशासन और नैतिक नियम धारण करता है—
धृतव्रताय।
और अपनी विद्या को समाज के उपयोग में लगाता है—
दाशुषे।
यही वैदिक भाव का सरल जीवन-उदाहरण है।
४८. व्यापक निष्कर्ष
इस मंत्र में जीव की यात्रा केवल आत्मज्ञान तक नहीं रुकती।
यह यात्रा इस प्रकार आगे बढ़ती है—
सत्य की पहचान
↓
जीव और व्यापक ईश्वरीय व्यवस्था का संबंध
↓
उद्देश्यपूर्ण जीवन
↓
ज्ञान की निरंतर खोज
↓
प्रमाद से मुक्ति
↓
शाश्वत नियम में स्थिरता
↓
कर्म का समर्पण
↓
लोककल्याण
यही कारण है कि इस मंत्र में तत् से प्रारंभ होकर दाशुषे पर समाप्त होने वाली यात्रा अत्यंत अर्थपूर्ण है।
सत्य केवल जानने की वस्तु नहीं है।
सत्य जीवन की दिशा बनता है।
जीवन की दिशा कर्म बनती है।
कर्म जब शाश्वत नियम के अनुरूप होता है तो वह यज्ञभाव ग्रहण करता है।
और जब यज्ञभाव लोककल्याण से जुड़ता है तो जीव व्यापक सृष्टि-व्यवस्था में सहभागी बन जाता है।
४९. अंतिम सूत्र
ऋग्वेद १.२५.६ को पिछले मंत्र के साथ जोड़कर इसका मूल सूत्र इस प्रकार रखा जा सकता है—
शक्ति को पहचानो।
शक्ति को संयमित करो।
ज्ञान प्राप्त करो।
ज्ञान को कर्म में उतारो।
दृष्टि को व्यापक करो।
सत्य को पहचानो।
ईश्वरीय व्यवस्था के साथ अपनी गति का सामंजस्य स्थापित करो।
अपने उद्देश्य से विचलित मत हो।
शाश्वत नियम को धारण करो।
और अपनी शक्ति, ज्ञान तथा कर्म को लोककल्याण के लिए अर्पित करो।
इसी क्रम में ऋग्वेद का “तत्”, उपनिषद् का “तत्त्वमसि”, गीता का कर्मयोग और लोकसंग्रह, तथा रामायण का रामधर्म, भरत का त्याग और हनुमान का समर्पित रामकार्य एक-दूसरे के साथ तारतम्य स्थापित करते हैं।
यहाँ जीव अपने व्यक्तिगत अहंकार की सीमा से ऊपर उठकर यह समझता है कि उसका ज्ञान, उसकी शक्ति और उसका कर्म किसी पृथक् स्वार्थ की वस्तु नहीं हैं।
वह एक व्यापक व्यवस्था का भाग है।
और जब वह उस व्यवस्था के धृतव्रत—शाश्वत नियम—को धारण करके कर्म करता है, तब उसका जीवन केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं रह जाता।
वह—
ज्ञान का साधक,
धर्म का धारक,
कर्म का साधन,
लोककल्याण का सहभागी,
और
ईश्वरीय सृष्टि-व्यवस्था के उद्देश्य में सहयोगी
बन जाता है।
इस प्रकार ऋग्वेद १.२५.६ में पिछले मंत्र से आगे बढ़ती हुई चेतना की यात्रा का सार है—
“सत्य का साक्षात्कार करने वाला जीव, शाश्वत नियम को धारण करके, प्रमादरहित और उद्देश्यपूर्ण कर्म के द्वारा अपने जीवन को व्यापक ईश्वरीय सृष्टि-व्यवस्था तथा विश्वकल्याण के लिए समर्पित करता है।”
और यही—
तत् → समानम् → आशाते → वेनन्ता → न प्र युच्छतः → धृतव्रताय → दाशुषे
का क्रमबद्ध भाव है।
हिंदी विवरण
शब्द-दर-शब्द अर्थ (Padartha):
तत् (Tat): उस (सत्य या शाश्वत नियम को) (That)
इत् (It): ही / निश्चित रूप से (Indeed / Exactly)
समानम् (Samānam): एक समान, समरूप या निरंतर (Uniform / Constant)
आशाते (Āshāate): प्राप्त करते हैं या व्याप्त रहते हैं (Pervade / Manifest)
वेनन्ता (Venantā): ज्ञान की इच्छा रखने वाले, अन्वेषण करने वाले या दो गतिशील ऊर्जाएं (जैसे सूर्य-चंद्र या ऊर्जा-चेतना) (The seekers or dual forces)
न (Na): कभी नहीं (Never)
प्र युच्छतः (Pra Yucchatah): प्रमाद करते हैं, विचलित होते हैं या चूकते हैं (Slackens / Deviates / Lapses)
धृतव्रताय (Dhritavratāya): प्राकृतिक नियमों या अनुशासन को धारण करने वाले के लिए (For one who upholds the cosmic laws / steady in discipline)
दाशुषे (Dāshushe): समर्पण करने वाले, ऊर्जा प्रदान करने वाले या यज्ञशील साधक के लिए (For the contributor / dedicated system)
वैज्ञानिक व्याख्या (Scientific Interpretation):
यह मंत्र प्रकृति के अचूक नियमों, निरंतरता (Uniformity of Nature and Conservation Laws) और ऊर्जा के संरक्षण का एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत करता है:
* समानम् आशाते और न प्र युच्छतः (Invariant Laws & Conservation Principles): 'समानम् आशाते' का अर्थ है कि ब्रह्मांड के मूल नियम सर्वत्र और सदैव एक समान रूप से कार्य करते हैं। आधुनिक भौतिकी में इसे Laws of Invariance और Conservation Laws (जैसे ऊर्जा संरक्षण का नियम) कहा जाता है, जो कभी भी अपने मार्ग से विचलित (प्र युच्छतः) नहीं होते। प्राकृतिक नियम कभी 'प्रमाद' (Error) नहीं करते; वे अत्यंत सटीक रूप से कार्य करते हैं।
* धृतव्रताय दाशुषे (Systemic Reciprocity & Feedback): जो प्रणालियाँ या व्यक्ति प्रकृति के अनुशासन (धृतव्रत) को धारण करते हैं और उसके साथ संतुलन बनाए रखते हैं, उन्हें ब्रह्मांडीय व्यवस्था से निरंतर ऊर्जा और स्थिरता प्राप्त होती है। यह आधुनिक इकोलॉजी और थर्मोडायनामिक्स के उस सिद्धांत से मेल खाता है जहाँ सुसंगत (Coherent) प्रणालियाँ ऊर्जा का सही आदान-प्रदान करती हैं।
* वैज्ञानिक संदेश: यह मंत्र इस सार्वभौमिक सत्य को स्थापित करता है कि ब्रह्मांडीय नियम अटूट और निष्पक्ष हैं। जो विज्ञान और प्रकृति के नियमों के अनुकूल चलता है, प्रकृति उसके लिए अपनी संपूर्ण व्यवस्था को एक समान और संरक्षित रखती है।
English Translation
Word-by-Word Meaning:
* Tat: That (Truth / Universal Law)
* It: Indeed / Exactly
* Samānam: Uniform, constant, or invariant
* Āshāate: Pervade / manifest / attain
* Venantā: The seekers, observers, or dual dynamic forces
* Na: Never
* Pra Yucchatah: Slacken, lapse, or deviate
* Dhritavratāya: For one who upholds cosmic ordinances and natural laws
* Dāshushe: For the dedicated worker, contributor, or aligned system
Scientific Explanation:
This verse articulates the absolute consistency of natural laws, invariant principles, and the conservation of cosmic order (Laws of Invariance and Systemic Reciprocity):
* Samānam Āshāate and Na Pra Yucchatah (Invariant Laws and Non-Deviation): Samānam āshāate denotes that fundamental universal laws operate uniformly across space and time. In modern physics, this corresponds to Conservation Laws and Physical Invariance (such as the conservation of energy), which never deviate (na pra yucchatah) or make errors. Nature's fundamental mechanics are entirely deterministic and precise.
* Dhritavratāya Dāshushe (Feedback and Alignment): Systems or individuals that embody dhritavrata (adherence to structural and ecological discipline) align themselves with universal equilibrium. This mirrors modern systems theory, where open systems maintaining high internal order (low entropy) through proper energetic exchanges achieve long-term sustainability.
* Scientific Implication: The verse reinforces the immutability of cosmic laws. Nature does not indulge in arbitrary chaos; rather, it sustains predictable, invariant harmony for those who respect and integrate with its foundational parameters.
