पद्मपुराण — भूमिखण्ड, वेनोपाख्यान, सुकलाचरित्र अध्याय ४९ : पद्मावती के साथ गोभिल दैत्य का छल

 
पद्मपुराण — भूमिखण्ड, वेनोपाख्यान, सुकलाचरित्र  अध्याय ४९ : पद्मावती के साथ गोभिल दैत्य का छल

पद्मपुराण — भूमिखण्ड, वेनोपाख्यान, सुकलाचरित्र

अध्याय ४९ : पद्मावती के साथ गोभिल दैत्य का छल

इस अध्याय में कथा का क्रम तीन चरणों में आगे बढ़ता है—पहले पद्मावती का वन और सरोवर में विहार, फिर गोभिल दैत्य का उसे देखकर कामासक्त होना और उग्रसेन का रूप धारण करना, और अंत में छल का पता चलने पर पद्मावती का क्रोध तथा शाप देने का संकल्प। नीचे दिए गए श्लोकों को उसी क्रम में रखा गया है।

श्लोक १–१३ : वन और सरोवर में पद्मावती का विहार

श्लोक १

एकदा तु महाभाग गता सा पर्वतोत्तमे । रमणीयं वनं दृष्ट्वा कदलीखंडमंडितम् ॥

शब्दार्थ: एकदा—एक बार; महाभाग—हे महाभाग; गता—गई; सा—वह; पर्वतोत्तमे—श्रेष्ठ पर्वत पर; रमणीयम्—सुंदर; वनम्—वन; दृष्ट्वा—देखकर; कदलीखंडमण्डितम्—केले के वृक्षों के समूहों से सुशोभित।

भावार्थ: ब्राह्मणी कहती है—हे महाभाग! एक बार पद्मावती एक श्रेष्ठ पर्वत पर गई। वहाँ उसने केले के वृक्षों के समूहों से सजे हुए रमणीय वन को देखा।

व्याख्या: कथा पद्मावती के सामान्य विहार से आरम्भ होती है। वन की सुंदरता और प्राकृतिक संपदा आगे घटित होने वाली घटना की पृष्ठभूमि तैयार करती है।

श्लोक २

शालैस्तालैस्तमालैश्च नालिकेरैस्तथोत्कटैः । पूगीफलैर्मातुलिगैर्नारंगैश्चारुजंबुकैः ॥

शब्दार्थ: शालैः—शाल वृक्षों से; तालैः—ताड़ वृक्षों से; तमालैः—तमाल वृक्षों से; नालिकेरैः—नारियल के वृक्षों से; पूगीफलैः—सुपारी के वृक्षों से; मातुलिगैः—मातुलिंग अर्थात बड़े नींबू जैसे फलों वाले वृक्षों से; नारंगैः—नारंगी के वृक्षों से; चारुजंबुकैः—सुंदर जामुन के वृक्षों से।

भावार्थ: वन में शाल, ताड़, तमाल, नारियल, सुपारी, मातुलिंग, नारंगी और सुंदर जामुन के वृक्ष भरे हुए थे।

व्याख्या: अनेक प्रकार के वृक्ष वन की समृद्धि और विविधता दर्शाते हैं। वर्णन केवल एक सुंदर स्थल का नहीं, बल्कि फलदार और छायादार वृक्षों से संपन्न प्राकृतिक परिवेश का है।

श्लोक ३

चंपकैः पाटलैः पुण्यैः पुष्पितैः कुटकैर्वटैः । अशोकबकुलोपेतं नानावृक्षैरलंकृतम् ॥

शब्दार्थ: चंपकैः—चंपा के वृक्षों से; पाटलैः—पाटल वृक्षों से; पुण्यैः—पवित्र अथवा मनोहर; पुष्पितैः—फूलों से युक्त; कुटकैः—कुटज वृक्षों से; वटैः—बरगदों से; अशोकबकुलोपेतम्—अशोक और बकुल वृक्षों से युक्त; नानावृक्षैः—अनेक प्रकार के वृक्षों से; अलंकृतम्—सजाया हुआ।

भावार्थ: वह वन चंपा, पाटल, कुटज, बरगद, अशोक और बकुल सहित अनेक प्रकार के वृक्षों तथा खिले हुए फूलों से सुशोभित था।

व्याख्या: वृक्षों, पुष्पों और सुगंध का यह विस्तार उस वातावरण को आनंदमय बनाता है, जिसमें पद्मावती अपनी सखियों के साथ विचरण कर रही है।

श्लोक ४

पर्वतं पुण्यवंतं तं पुष्पितैश्च नगोत्तमैः । सर्वत्र दृश्यते रम्यो नानाधातुसमाकुलः ॥

शब्दार्थ: पर्वतम्—पर्वत को; पुण्यवन्तम्—पुण्यमय; पुष्पितैः—खिले हुए; नगोत्तमैः—श्रेष्ठ वृक्षों से; सर्वत्र—सब ओर; दृश्यते—दिखाई देता है; रम्यः—सुंदर; नानाधातुसमाकुलः—विभिन्न खनिजों से युक्त।

भावार्थ: वह पुण्यमय पर्वत श्रेष्ठ पुष्पित वृक्षों से भरा था। विभिन्न धातुओं और खनिजों से युक्त होने के कारण वह चारों ओर से सुंदर दिखाई देता था।

व्याख्या: पर्वत की शोभा में वनस्पति और खनिज—दोनों का समावेश है। प्रकृति का सौंदर्य यहाँ जीवंत वृक्षों और पर्वत के भीतर विद्यमान पदार्थों, दोनों से प्रकट होता है।

श्लोक ५

तडागं सर्वतोभद्रं पुण्यतोयेन पूरितम् । कमलैः पुष्पितैश्चान्यैः सुगंधैः कनकोत्पलैः ॥

शब्दार्थ: तडागम्—सरोवर; सर्वतोभद्रम्—चारों ओर से सुंदर और मंगलमय; पुण्यतोयेन—पवित्र जल से; पूरितम्—भरा हुआ; कमलैः—कमलों से; पुष्पितैः—खिले हुए; अन्यैः—अन्य; सुगंधैः—सुगंधित; कनकोत्पलैः—स्वर्णाभ उत्पलों से।

भावार्थ: वहाँ एक सुंदर सरोवर था, जो पवित्र जल से भरा हुआ था। उसमें कमल और अन्य सुगंधित पुष्प खिले हुए थे तथा स्वर्ण के समान आभा वाले उत्पल उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।

व्याख्या: सरोवर वन के सौंदर्य का केंद्र है। जल, पुष्प और सुगंध मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं जहाँ विहार और जलक्रीड़ा स्वाभाविक रूप से आकर्षित करते हैं।

श्लोक ६

श्वेतोत्पलैर्विभासंतं रक्तोत्पलसुपुष्पितैः । नीलोत्पलैश्च कह्लारैर्हंसैश्च जलकुक्कुटैः ॥

शब्दार्थ: श्वेतोत्पलैः—सफेद उत्पलों से; विभासन्तम्—चमकता हुआ; रक्तोत्पलसुपुष्पितैः—लाल उत्पलों से खूब खिला हुआ; नीलोत्पलैः—नीले उत्पलों से; कह्लारैः—कह्लार पुष्पों से; हंसैः—हंसों से; जलकुक्कुटैः—जलपक्षियों से।

भावार्थ: सरोवर सफेद, लाल और नीले उत्पलों तथा कह्लार पुष्पों से शोभायमान था। उसमें हंस और जलपक्षी भी विचरण कर रहे थे।

व्याख्या: विभिन्न रंगों के पुष्प और जलचर सरोवर को जीवंत दृश्य बनाते हैं। वर्णन में प्रकृति की विविधता के साथ उसकी गतिशीलता भी उपस्थित है।

श्लोक ७

पक्षिभिर्जलजैश्चान्यैर्नानाधातुसमाकुलः । तडागं सर्वतः शुभ्रं नानापक्षिगणैर्युतम् ॥

शब्दार्थ: पक्षिभिः—पक्षियों से; जलजैः—जल में रहने वाले जीवों से; अन्यैः—अन्य; नानाधातुसमाकुलः—विभिन्न पदार्थों/धातुओं से युक्त; तडागम्—सरोवर; सर्वतः—चारों ओर; शुभ्रम्—स्वच्छ और उज्ज्वल; नानापक्षिगणैः—अनेक प्रकार के पक्षियों के समूहों से; युतम्—युक्त।

भावार्थ: वह सरोवर स्वच्छ और उज्ज्वल था। उसमें जलचर जीव तथा अनेक प्रकार के पक्षी समूहों में उपस्थित थे।

व्याख्या: सरोवर का वर्णन केवल जल और पुष्प तक सीमित नहीं है। उसमें रहने वाले जीव भी उसके प्राकृतिक वैभव का अंग हैं।

श्लोक ८

कोकिलानां रुतैः पुण्यैः सुस्वरैः परिशोभितः । मधुराणां तथा शब्दैः सर्वत्र मधुरायते ॥

शब्दार्थ: कोकिलानाम्—कोयलों के; रुतैः—स्वरों से; पुण्यैः—मनोहर; सुस्वरैः—मधुर स्वरों से; परिशोभितः—सुशोभित; मधुराणाम्—मधुर ध्वनियों का; शब्दैः—आवाजों से; सर्वत्र—सब ओर; मधुरायते—मधुरता से भर जाता है।

भावार्थ: कोयलों के मधुर स्वरों और अन्य मधुर ध्वनियों से वह स्थान चारों ओर से गूँज रहा था।

व्याख्या: दृश्य सौंदर्य के साथ श्रव्य सौंदर्य भी उपस्थित है। वन का वातावरण केवल देखने में सुंदर नहीं, बल्कि सुनने में भी आनंददायक है।

श्लोक ९

षट्पदानां सुनादेन सर्वत्र परिशोभते । एवंविधं गिरिं रम्यं तदेव वनमुत्तमम् ॥

शब्दार्थ: षट्पदानाम्—भ्रमरों का; सुनादेन—मधुर गुंजार से; सर्वत्र—सब ओर; परिशोभते—सुशोभित होता है; एवम्-विधम्—इस प्रकार का; गिरिम्—पर्वत को; रम्यम्—सुंदर; तत् एव—वही; वनम्—वन; उत्तमम्—श्रेष्ठ।

भावार्थ: भ्रमरों की मधुर गुंजार से वह स्थान और भी सुशोभित था। इस प्रकार पर्वत और उसका वन अत्यंत रमणीय था।

व्याख्या: कोयल के स्वर के बाद भ्रमरों की गुंजार वन की ध्वनियों को पूर्ण करती है। प्रकृति के अनेक रूप मिलकर उस स्थान की रमणीयता बनाते हैं।

श्लोक १०

तडागं सर्वतोभद्रं ददृशे नृपनंदिनी । वैदर्भी क्रीडमाना सा सखीभिः सहिता तदा ॥

शब्दार्थ: तडागम्—सरोवर को; सर्वतोभद्रम्—चारों ओर से सुंदर; ददृशे—देखा; नृपनन्दिनी—राजकुमारी; वैदर्भी—विदर्भराज की पुत्री पद्मावती; क्रीडमाना—विहार करती हुई; सखीभिः सहिता—सखियों के साथ; तदा—उस समय।

भावार्थ: उस समय विदर्भराज की पुत्री पद्मावती अपनी सखियों के साथ विहार करती हुई उस सुंदर सरोवर को देखने पहुँची।

व्याख्या: वन और सरोवर का वर्णन अब पद्मावती की कथा से जुड़ता है। वह अपने पिता के घर आई हुई है और सखियों के साथ स्वतंत्रतापूर्वक विहार कर रही है।
श्लोक ११

समालोक्य वनं पुण्यं सर्वत्र कुसुमाकुलम् । चापल्येन प्रभावेण स्त्रीभावेन च लीलया ॥

शब्दार्थ: समालोक्य—अच्छी तरह देखकर; वनम्—वन को; पुण्यम्—सुंदर, पवित्र; सर्वत्र—सब ओर; कुसुमाकुलम्—फूलों से भरा हुआ; चापल्येन—चंचलता से; प्रभावेण—अपने प्रभाव अथवा उत्साह से; स्त्रीभावेन—स्त्री-सुलभ भाव से; च—और; लीलया—क्रीड़ा करते हुए।

भावार्थ: चारों ओर फूलों से भरे उस सुंदर वन को देखकर पद्मावती चंचलता और क्रीड़ाभाव के साथ वहाँ विहार करने लगी।

व्याख्या: पद्मावती की अवस्था यहाँ सहज आनंद और खेल में लीन रहने की है। आगे यही विहार उसे गोभिल के छल के सामने ले आएगा।

श्लोक १२

पद्मावती सरस्तीरे सखीभिः सहिता तदा । जलक्रीडा समालीना हसते गायते पुनः ॥

शब्दार्थ: सरस्तीरे—सरोवर के किनारे; सखीभिः सहिता—सखियों सहित; जलक्रीडा—जल में क्रीड़ा; समालीना—पूरी तरह लीन; हसते—हँसती है; गायते—गाती है; पुनः—फिर।

भावार्थ: सरोवर के किनारे पद्मावती अपनी सखियों के साथ जलक्रीड़ा में लीन होकर हँसती और गाती रही।

व्याख्या: पद्मावती इस समय किसी आशंका से मुक्त होकर आनंद में मग्न है। कथा का अगला मोड़ इसी निश्चिंतता के बीच आता है।

श्लोक १३

रममाणा च सा तस्मिंस्तस्मिन्सरसि भामिनी । एवं विप्र तदा सा तु सुखेन परिवर्तयेत् ॥

शब्दार्थ: रममाणा—आनंदपूर्वक विहार करती हुई; सा—वह; तस्मिन् तस्मिन् सरसि—उस-उस सरोवर में; भामिनी—सुंदरी; एवम्—इस प्रकार; विप्र—हे विप्र; तदा—तब; सुखेन—सुखपूर्वक; परिवर्तयेत्—समय बिताती रही।

भावार्थ: हे विप्र! वह सुंदरी पद्मावती इस प्रकार विभिन्न सरोवरों में आनंदपूर्वक विहार करते हुए सुख से समय बिताती रही।

व्याख्या: पहले तेरह श्लोकों में प्रकृति और पद्मावती के आनंदमय विहार का चित्र पूरा होता है। अब कथा में गोभिल दैत्य का प्रवेश होता है, जो इसी स्थिति का लाभ उठाकर छल करता है।

श्लोक १४–२८ : गोभिल दैत्य की दृष्टि और कामासक्ति

श्लोक १४

विष्णुरुवाच- गोभिलो नाम वै दैत्यो भृत्यो वैश्रवणस्य च । दिव्येनापि विमानेन सर्वभोगपरिप्लुतः ॥

शब्दार्थ: विष्णुः उवाच—विष्णु ने कहा; गोभिलः—गोभिल नामक; दैत्यः—दैत्य; भृत्यः—सेवक; वैश्रवणस्य—कुबेर का; दिव्येन विमानेन—दिव्य विमान से; सर्वभोगपरिप्लुतः—सभी प्रकार के भोग-साधनों से संपन्न।

भावार्थ: भगवान विष्णु ने कहा—गोभिल नाम का एक दैत्य था, जो कुबेर का सेवक था। वह दिव्य विमान में यात्रा करता था और उसके पास भोग-विलास के सभी साधन थे।

व्याख्या: गोभिल का परिचय उसकी सामर्थ्य और संपन्नता के साथ कराया गया है। कुबेर की सेवा और दिव्य विमान उसे साधारण व्यक्ति से अलग स्थान देते हैं, लेकिन आगे उसका आचरण बताता है कि सामर्थ्य और भोग-संपन्नता अपने आप में सदाचार की गारंटी नहीं हैं।

श्लोक १५

याति चाकाशमार्गेण गोभिलो दैत्यसत्तमः । तेन दृष्टा विशालाक्षी वैदर्भी निर्भया तदा ॥

शब्दार्थ: याति—जाता था; आकाशमार्गेण—आकाश के मार्ग से; दैत्यसत्तमः—दैत्य; तेन—उसके द्वारा; दृष्टा—देखी गई; विशालाक्षी—विशाल नेत्रों वाली; वैदर्भी—विदर्भराज की पुत्री पद्मावती; निर्भया—निश्चिंत, भयमुक्त; तदा—उस समय।

भावार्थ: गोभिल दैत्य आकाशमार्ग से जा रहा था। उसी समय उसने विशाल नेत्रों वाली पद्मावती को देखा, जो अपनी सखियों के साथ निश्चिंत होकर विहार कर रही थी।

व्याख्या: पद्मावती का निश्चिंत विहार और गोभिल की आकाश से उस पर पड़ी दृष्टि—इन्हीं से कथा की अगली घटना आरम्भ होती है।

श्लोक १६

सर्वयोषिद्वरा सा हि उग्रसेनस्य वै प्रिया । रूपेणाप्रतिमा लोके सर्वांगेषु विराजते ॥

शब्दार्थ: सर्वयोषिद्वरा—स्त्रियों में श्रेष्ठ; उग्रसेनस्य प्रिया—उग्रसेन की प्रिय पत्नी; रूपेण—रूप में; अप्रतिमा—जिसकी कोई तुलना न हो; लोके—संसार में; सर्वाङ्गेषु—सभी अंगों में; विराजते—शोभा पाती है।

भावार्थ: पद्मावती स्त्रियों में श्रेष्ठ और राजा उग्रसेन की प्रिय पत्नी थी। उसके रूप की संसार में कोई तुलना नहीं थी और उसके सभी अंग शोभायमान थे।

व्याख्या: यहाँ पद्मावती के सौंदर्य के साथ उसके वैवाहिक संबंध का भी उल्लेख है। वह उग्रसेन की पत्नी है; यह तथ्य आगे गोभिल के छल और पद्मावती की प्रतिक्रिया को समझने में महत्त्वपूर्ण है।

श्लोक १७

रतिर्वै मन्मथस्यापि किं वापीयं हरिप्रिया । किं वापि पार्वती देवी शची किं वा भविष्यति ॥

शब्दार्थ: रतिः—रति; मन्मथस्य—कामदेव की; किम् वा—क्या; इयम्—यह; हरिप्रिया—भगवान विष्णु की प्रिय लक्ष्मी; पार्वती देवी—देवी पार्वती; शची—इन्द्राणी।

भावार्थ: गोभिल सोचता है—क्या यह कामदेव की पत्नी रति है? अथवा भगवान विष्णु की प्रिय लक्ष्मी है? या देवी पार्वती अथवा शची है?

व्याख्या: पद्मावती के सौंदर्य को देखकर गोभिल की दृष्टि उसकी तुलना देवियों से करने लगती है। यह वर्णन गोभिल के मन में उत्पन्न आकर्षण की तीव्रता को प्रकट करता है।

श्लोक १८

यादृशी दृश्यते चेयं नारीणां प्रवरोत्तमा । अन्यापि ईदृशी नास्ति द्वितीया क्षितिमंडले ॥

शब्दार्थ: यादृशी—जैसी; दृश्यते—दिखाई देती है; इयम्—यह; नारीणाम्—स्त्रियों में; प्रवरोत्तमा—अत्यंत श्रेष्ठ; अन्यापि—कोई दूसरी भी; ईदृशी—ऐसी; नास्ति—नहीं है; द्वितीया—दूसरी; क्षितिमण्डले—पृथ्वी पर।

भावार्थ: गोभिल सोचता है कि यह स्त्रियों में अत्यंत श्रेष्ठ है। पृथ्वी पर इसके समान दूसरी स्त्री नहीं है।

व्याख्या: गोभिल के मन में पद्मावती के प्रति आकर्षण बढ़ता जाता है। उसका विचार अब सामान्य प्रशंसा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसे अद्वितीय मानकर पाने की इच्छा की ओर बढ़ता है।

श्लोक १९

नक्षत्रेषु यथा चंद्रः संपूर्णो भाति शोभनः । गुणरूपकलाभिस्तु तथा भाति वरानना ॥

शब्दार्थ: नक्षत्रेषु—नक्षत्रों के बीच; यथा—जैसे; चन्द्रः—चंद्रमा; संपूर्णः—पूर्ण; भाति—चमकता है; शोभनः—सुंदर; गुणरूपकलाभिः—गुणों, रूप और कलाओं से; तथा—वैसे ही; भाति—शोभती है; वरानना—सुंदर मुख वाली।

भावार्थ: जैसे नक्षत्रों के बीच पूर्ण चंद्रमा सुंदर दिखाई देता है, वैसे ही पद्मावती अपने गुण, रूप और कलाओं से शोभायमान थी।

व्याख्या: चंद्रमा और नक्षत्रों का उदाहरण पद्मावती की विशिष्टता को व्यक्त करता है। गोभिल की दृष्टि में उसका सौंदर्य अन्य सभी से अलग और प्रमुख है।

श्लोक २०

पुष्करेषु यथा हंसस्तथेयं चारुहासिनी । अहो रूपमहोभाव अस्यास्तु परिदृश्यते ॥

शब्दार्थ: पुष्करेषु—कमलों के बीच; यथा—जैसे; हंसः—हंस; तथा—वैसे; इयम्—यह; चारुहासिनी—मनोहर मुस्कान वाली; अहो—आश्चर्य!; रूपम्—रूप; अहोभावः—अद्भुत भाव अथवा शोभा; अस्याः—इसकी; परिदृश्यते—दिखाई देती है।

भावार्थ: जैसे कमलों के बीच हंस शोभा पाता है, वैसे ही पद्मावती अपनी मनोहर मुस्कान से सुशोभित थी। गोभिल उसके रूप और भाव को देखकर आश्चर्य करता है।

व्याख्या: उपमा के माध्यम से पद्मावती के सौंदर्य का वर्णन आगे बढ़ता है। साथ ही, गोभिल के मन में उत्पन्न मोह भी गहरा होता जाता है।

श्लोक २१

का कस्य शोभना बाला चारुवृत्तपयोधरा । व्यमृशद्गोभिलो दैत्यः पद्मावतीं वराननाम् ॥

शब्दार्थ: का—कौन; कस्य—किसकी; शोभना—सुंदर; बाला—युवती; चारुवृत्तपयोधरा—सुंदर आकार वाले स्तन वाली; व्यमृशत्—विचार करने लगा; गोभिलः दैत्यः—गोभिल दैत्य; पद्मावतीम्—पद्मावती को; वराननाम्—सुंदर मुख वाली।

भावार्थ: पद्मावती को देखकर गोभिल दैत्य विचार करने लगा—यह सुंदर युवती किसकी है? इसका रूप इतना आकर्षक है!

व्याख्या: गोभिल अब पद्मावती के परिचय और उसके संबंधों के विषय में सोचता है। उसका विचार उसके सौंदर्य के वर्णन से आगे बढ़कर उसे अपने लिए पाने की इच्छा की ओर जा रहा है।

श्लोक २२

चिंतयित्वा क्षणं विप्र का कस्यापि भविष्यति । ज्ञानेन महता ज्ञात्वा वैदर्भीति न संशयः ॥

शब्दार्थ: चिन्तयित्वा—विचार करके; क्षणम्—कुछ क्षण; विप्र—हे विप्र; का—कौन; कस्य—किसकी; भविष्यति—होगी; ज्ञानेन महता—अपने विशेष ज्ञान से; ज्ञात्वा—जानकर; वैदर्भी—विदर्भराज की पुत्री; इति—ऐसा; न संशयः—कोई संदेह नहीं।

भावार्थ: कुछ क्षण विचार करने के बाद गोभिल ने अपने विशेष ज्ञान से जान लिया कि वह युवती विदर्भराज की पुत्री पद्मावती है।

व्याख्या: गोभिल उसके परिचय से अनजान नहीं रहता। वह जान लेता है कि पद्मावती कौन है। आगे उसका छल इस जानकारी के बावजूद किया गया जानबूझकर का कार्य है।

श्लोक २३

दयिता उग्रसेनस्य पतिव्रतपरायणा । आत्मबलेन तिष्ठंती दुष्प्राप्या पुरुषैरपि ॥

शब्दार्थ: दयिता—प्रिय; उग्रसेनस्य—उग्रसेन की; पतिव्रतपरायणा—पति के प्रति निष्ठावान; आत्मबलेन—अपने बल अथवा सामर्थ्य से; तिष्ठन्ती—स्थित; दुष्प्राप्या—पाना कठिन; पुरुषैः अपि—पुरुषों के लिए भी।

भावार्थ: गोभिल जानता था कि पद्मावती उग्रसेन की प्रिय पत्नी और पतिव्रता है। वह अपने आत्मबल से स्थिर है और दूसरे पुरुषों के लिए अप्राप्य है।

व्याख्या: इस श्लोक में पद्मावती की वैवाहिक निष्ठा और गोभिल की जानकारी स्पष्ट हो जाती है। आगे होने वाला छल अनजाने में नहीं, बल्कि उसके संबंध और मर्यादा को जानते हुए किया जाता है।

श्लोक २४

उग्रसेनो महामूर्खः प्रेषिता येन वै वरा । पितुर्गेहमियं बाला स तु भाग्येन वर्जितः ॥

शब्दार्थ: उग्रसेनः—उग्रसेन; महामूर्खः—बहुत मूर्ख; प्रेषिता—भेजी गई; येन—जिसके द्वारा; वै—निश्चय ही; पितुः गेहम्—पिता के घर; इयम् बाला—यह युवती; सः—वह; तु—तो; भाग्येन वर्जितः—भाग्यहीन।

भावार्थ: गोभिल अपने मन में उग्रसेन को मूर्ख और भाग्यहीन कहता है कि उसने अपनी पत्नी पद्मावती को उसके पिता के घर भेज दिया।

व्याख्या: यह गोभिल की स्वार्थपूर्ण सोच है। वह पति-पत्नी के संबंध और पिता के घर जाने की सामान्य परिस्थिति को भी अपने लिए अवसर समझ रहा है। पद्मावती को पाने की इच्छा उसके विवेक पर हावी हो रही है।

श्लोक २५

अनया विना स जीवेच्च कथं कूटमतिः सदा । किं वा नपुंसको राजा एनां यो हि परित्यजेत् ॥

शब्दार्थ: अनया विना—इसके बिना; सः—वह; जीवेत्—जी सकता है; कथम्—कैसे; कूटमतिः—टेढ़ी बुद्धि वाला; सदा—सदैव; किम् वा—क्या; नपुंसकः—नपुंसक; राजा—राजा; एनाम्—इसे; यः—जो; हि—निश्चय ही; परित्यजेत्—छोड़ दे।

भावार्थ: गोभिल सोचता है—उग्रसेन इसके बिना कैसे रह सकता है? वह कैसा राजा है जो ऐसी पत्नी को अपने से दूर जाने देता है? क्या वह नपुंसक है?

व्याख्या: गोभिल उग्रसेन के निर्णय को अपनी कामना की दृष्टि से देखता है। उसकी भाषा में दूसरे व्यक्ति के प्रति अपमान और अपनी इच्छा को उचित ठहराने का भाव है।

श्लोक २६

तां दृष्ट्वा स तु कामात्मा संजातस्तत्क्षणादपि । इयं पतिव्रता बाला दुष्प्राप्या पुरुषैरपि ॥

शब्दार्थ: ताम् दृष्ट्वा—उसे देखकर; सः—वह; कामात्मा—कामना से ग्रस्त; संजातः—हो गया; तत्क्षणात्—उसी क्षण; इयम्—यह; पतिव्रता—पति के प्रति निष्ठावान; बाला—युवती; दुष्प्राप्या—पाना कठिन; पुरुषैः अपि—पुरुषों के लिए भी।

भावार्थ: पद्मावती को देखते ही गोभिल कामना से ग्रस्त हो गया। वह जानता था कि यह पतिव्रता युवती दूसरे पुरुषों के लिए अप्राप्य है।

व्याख्या: यहाँ कथा का निर्णायक आंतरिक परिवर्तन सामने आता है। गोभिल पद्मावती की निष्ठा जानता है, फिर भी अपनी इच्छा को रोकने के बजाय उसे पूरा करने का उपाय सोचता है।

श्लोक २७

कथं भोक्ष्याम्यहं गत्वा कामो मामति पीडयेत् । अभुक्त्वैनां यदा यास्ये तत्स्यान्मृत्युर्ममैव हि ॥

शब्दार्थ: कथम्—कैसे; भोक्ष्यामि—भोग करूँगा; अहम्—मैं; गत्वा—जाकर; कामः—कामना; माम्—मुझे; अति पीडयेत्—बहुत पीड़ित कर रही है; अभुक्त्वा—भोग किए बिना; एनाम्—इसे; यदा—यदि; यास्ये—चला जाऊँगा; तत्—तो; स्यात्—होगा; मृत्युः—मृत्यु; मम एव—मेरी ही।

भावार्थ: गोभिल सोचता है—मैं इसे कैसे प्राप्त करूँ? कामना मुझे अत्यंत पीड़ित कर रही है। यदि इसे भोगे बिना चला गया, तो मानो मेरी मृत्यु ही हो जाएगी।

व्याख्या: गोभिल अपनी कामना को ऐसी अनिवार्यता मानने लगता है जिसके सामने उसे कोई दूसरा विकल्प दिखाई नहीं देता। इच्छा को नियंत्रित करने के स्थान पर वह उसकी पूर्ति को जीवन-मरण का प्रश्न बना देता है।
श्लोक २८

अद्यैव हि न संदेहो यतः कामो महाबलः । इति चिंतापरो भूत्वा गोभिलो मनसैक्षत ॥

शब्दार्थ: अद्य एव—आज ही; न संदेहः—कोई संदेह नहीं; यतः—क्योंकि; कामः—कामना; महाबलः—अत्यंत शक्तिशाली; इति—ऐसा; चिन्तापरः—चिंता में डूबा हुआ; भूत्वा—होकर; गोभिलः—गोभिल; मनसा—मन में; ऐक्षत—विचार करने लगा।

भावार्थ: गोभिल ने निश्चय किया कि उसे आज ही अपनी इच्छा पूरी करनी है, क्योंकि उसके विचार में कामना अत्यंत शक्तिशाली है। इसी चिंता में डूबकर वह उपाय सोचने लगा।

व्याख्या: इन श्लोकों में गोभिल की मानसिक प्रक्रिया स्पष्ट क्रम में दिखाई गई है—रूप देखकर आकर्षण, आकर्षण से आसक्ति, आसक्ति से अधीरता और अधीरता से छल की योजना। अब वह उग्रसेन का रूप धारण करने का निश्चय करता है।

श्लोक २९–३५ : उग्रसेन का रूप धारण करके गोभिल का छल

श्लोक २९

कृत्वा मायामयं रूपमुग्रसेनस्य भूपतेः । यादृशस्तूग्रसेनश्च सांगोपांगो महानृपः ॥

शब्दार्थ: कृत्वा—बनाकर; मायामयम्—माया से निर्मित; रूपम्—रूप; उग्रसेनस्य—उग्रसेन का; भूपतेः—राजा का; यादृशः—जैसा; तु—निश्चय ही; साङ्गोपाङ्गः—सभी अंगों सहित, पूर्ण स्वरूप वाला; महानृपः—महान राजा।
भावार्थ: गोभिल ने राजा उग्रसेन का मायामय रूप धारण करने का निश्चय किया—ऐसा रूप, जो वास्तविक उग्रसेन के संपूर्ण स्वरूप के समान हो।

व्याख्या: गोभिल केवल बाहरी वेश बदलने की योजना नहीं बनाता, बल्कि उग्रसेन का ऐसा प्रतिरूप बनाना चाहता है जिसे देखकर पद्मावती पहचान न सके। छल का आधार पति की पहचान का दुरुपयोग है।

श्लोक ३०

गोभिलस्तादृशो भूत्वा गत्या च स्वरभाषया । यथावस्त्रो यथावेशो वयसा च तथा पुनः ॥

शब्दार्थ: गोभिलः—गोभिल; तादृशः भूत्वा—वैसा बनकर; गत्या—चाल से; स्वरभाषया—आवाज और बोलने के ढंग से; यथावस्त्रः—वैसे ही वस्त्र धारण करके; यथावेशः—वैसा ही वेश बनाकर; वयसा—आयु के अनुसार; तथा पुनः—उसी प्रकार।

भावार्थ: गोभिल ने उग्रसेन के समान रूप धारण किया। उसने अपनी चाल, आवाज, बोलने के ढंग, वस्त्र, वेश और आयु का स्वरूप भी उग्रसेन जैसा बना लिया।

व्याख्या: छल को सफल बनाने के लिए गोभिल पहचान के अनेक बाहरी संकेतों की नकल करता है। केवल चेहरा नहीं, बल्कि चाल-ढाल, आवाज और पहनावा भी इस मायावी रूप का हिस्सा बनते हैं।

श्लोक ३१

दिव्यमाल्यांबरधरो दिव्यगंधानुलेपनः । सर्वाभरणशोभांगो यादृशो माथुरेश्वरः ॥

शब्दार्थ: दिव्यमाल्यांबरधरः—दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण करने वाला; दिव्यगंधानुलेपनः—दिव्य सुगंधित पदार्थों का लेप लगाए हुए; सर्वाभरणशोभाङ्गः—सभी आभूषणों से सुशोभित; यादृशः—जैसा; माथुरेश्वरः—मथुरा का राजा उग्रसेन।

भावार्थ: गोभिल ने दिव्य मालाएँ, वस्त्र और सुगंधित लेप धारण किया। उसने अपने शरीर को सभी आभूषणों से सजाकर मथुरा के राजा उग्रसेन जैसा बना लिया।

व्याख्या: राजसी वेशभूषा पहचान का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। गोभिल बाहरी रूप को इतना समान बनाता है कि पद्मावती के सामने उपस्थित होने पर वह उसके पति जैसा दिखाई दे।

श्लोक ३२

भूत्वाथ तादृशो दैत्य उग्रसेनमयस्तदा । मायया परया युक्तो रूपलावण्यसंपदा ॥

शब्दार्थ: भूत्वा—बनकर; अथ—तब; तादृशः—वैसा; दैत्यः—दैत्य; उग्रसेनमयः—उग्रसेन के रूप वाला; तदा—उस समय; मायया परया—श्रेष्ठ अथवा प्रबल माया से; युक्तः—युक्त; रूपलावण्यसंपदा—रूप और लावण्य की संपन्नता से।

भावार्थ: इस प्रकार गोभिल दैत्य प्रबल माया और रूप-लावण्य के सहारे उग्रसेन जैसा बन गया।

व्याख्या: पिछले श्लोकों में बताए गए सभी उपाय अब एक पूर्ण मायावी रूप में परिणत हो जाते हैं। गोभिल इस रूप का उपयोग पद्मावती को धोखे में रखने के लिए करने वाला है।

श्लोक ३३

पर्वताग्रे अशोकस्यच्छायामाश्रित्य संस्थितः । शिलातलस्थो दुष्टात्मा वीणादंडेन वीरकः ॥

शब्दार्थ: पर्वताग्रे—पर्वत के शिखर पर; अशोकस्य छायाम्—अशोक वृक्ष की छाया; आश्रित्य—आश्रय लेकर; संस्थितः—स्थित; शिलातलस्थः—शिला पर बैठा हुआ; दुष्टात्मा—दुष्ट स्वभाव वाला; वीणादण्डेन—वीणा के दण्ड सहित अथवा वीणा लेकर; वीरकः—यहाँ गोभिल के लिए प्रयुक्त पद।

भावार्थ: उग्रसेन का रूप धारण करके गोभिल पर्वत पर अशोक वृक्ष की छाया में एक शिला पर बैठ गया। उसके पास वीणा थी।

व्याख्या: गोभिल अब केवल रूप से ही नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और प्रस्तुति से भी पद्मावती को आकर्षित करने की तैयारी करता है। वीणा और संगीत उसके छल का अगला साधन बनते हैं।

श्लोक ३४

सुस्वरं गायमानस्तु गीतं विश्वप्रमोहनम् । तालमानक्रियोपेतं सप्तस्वरविभूषितम् ॥

शब्दार्थ: सुस्वरम्—मधुर स्वर में; गायमानः—गाता हुआ; गीतम्—गीत; विश्वप्रमोहनम्—सबको मोहित करने वाला; तालमानक्रियोपेतम्—ताल, मात्रा और गायन-क्रियाओं से युक्त; सप्तस्वरविभूषितम्—सात स्वरों से सुसज्जित।

भावार्थ: गोभिल मधुर स्वर में ऐसा गीत गाने लगा, जो मन को मोहित करने वाला था। गीत ताल, मात्रा और सात स्वरों से सुसज्जित था।

व्याख्या: गोभिल का संगीत साधारण गायन नहीं, बल्कि आकर्षण उत्पन्न करने के उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया गीत है। कथा में संगीत उस छल का माध्यम बनता है जिसके द्वारा वह पद्मावती को अपने पास बुलाना चाहता है।

श्लोक ३५

गीतं गायति दुष्टात्मा तस्या रूपेण मोहितः । पर्वताग्रे स्थितो विप्र हर्षेण महतान्वितः ॥

शब्दार्थ: गीतम्—गीत; गायति—गाता है; दुष्टात्मा—दुष्ट स्वभाव वाला; तस्याः रूपेण—उसके रूप से; मोहितः—मोहित; पर्वताग्रे—पर्वत के शिखर पर; स्थितः—स्थित; विप्र—हे विप्र; हर्षेण महता अन्वितः—अत्यधिक हर्ष से युक्त।

भावार्थ: हे विप्र! पद्मावती के रूप से मोहित गोभिल पर्वत के शिखर पर बैठकर गीत गाने लगा और अपने मन में अत्यधिक प्रसन्न हो रहा था।

व्याख्या: गोभिल की प्रसन्नता उसकी अपनी योजना से जुड़ी है। वह जिस रूप में सामने आने वाला है, उसके प्रति पद्मावती के विश्वास का लाभ उठाना चाहता है।

श्लोक ३६–४६ : संगीत के आकर्षण से पद्मावती के पास पहुँचना

श्लोक ३६

सखीमध्यगता सा तु पद्मावती वरानना । शुश्रुवे सुस्वरं गीतं तालमानलयान्वितम् ॥

शब्दार्थ: सखीमध्यगता—सखियों के बीच स्थित; सा—वह; पद्मावती—पद्मावती; वरानना—सुंदर मुख वाली; शुश्रुवे—सुनने लगी; सुस्वरम्—मधुर स्वर वाला; गीतम्—गीत; तालमानलयान्वितम्—ताल, मात्रा और लय से युक्त।

भावार्थ: सखियों के बीच बैठी सुंदर पद्मावती ने ताल, मात्रा और लय से युक्त मधुर गीत सुना।

व्याख्या: गोभिल का संगीत पद्मावती तक पहुँचता है। वह अभी गायक की वास्तविक पहचान नहीं जानती, लेकिन गीत के मधुर स्वर से आकर्षित हो जाती है।

श्लोक ३७

कोऽयं गायति धर्मात्मा महत्सौख्यप्रदायकम् । गीतं हि सत्क्रियोपेतं सर्वभावसमन्वितम् ॥

शब्दार्थ: कः—कौन; अयम्—यह; गायति—गाता है; धर्मात्मा—धर्मात्मा; महत्सौख्यप्रदायकम्—बहुत सुख देने वाला; गीतम्—गीत; सत्क्रियोपेतम्—उचित गायन-क्रियाओं से युक्त; सर्वभावसमन्वितम्—सभी भावों से युक्त।

भावार्थ: पद्मावती ने सोचा—यह कौन धर्मात्मा है, जो इतना सुख देने वाला गीत गा रहा है? यह गीत उचित गायन-क्रियाओं और विविध भावों से परिपूर्ण है।

व्याख्या: पद्मावती गीत के मधुर प्रभाव से गायक के विषय में अच्छा अनुमान लगा लेती है। गोभिल की योजना में यही आकर्षण महत्त्वपूर्ण है—वह पहले संगीत से ध्यान खींचता है और फिर उग्रसेन के रूप में सामने आता है।

श्लोक ३८

सखीभिः सहिता गत्वा औत्सुक्येन नृपात्मजा । अशोकच्छायामाश्रित्य विमले सुशिलातले ॥

शब्दार्थ: सखीभिः सहिता—सखियों के साथ; गत्वा—जाकर; औत्सुक्येन—उत्सुकता से; नृपात्मजा—राजकुमारी; अशोकच्छायाम्—अशोक वृक्ष की छाया में; आश्रित्य—आश्रय लेकर; विमले—स्वच्छ; सुशिलातले—सुंदर शिला के तल पर।

भावार्थ: गीत सुनकर राजकुमारी पद्मावती उत्सुकतावश अपनी सखियों के साथ अशोक वृक्ष की छाया में गई, जहाँ एक स्वच्छ और सुंदर शिला थी।

व्याख्या: संगीत के आकर्षण से पद्मावती उस स्थान तक पहुँच जाती है जहाँ गोभिल बैठा है। यह वह क्षण है जब उसका सामना मायावी उग्रसेन से होने वाला है।
श्लोक ३९

ददर्श भूपवेषेण गोभिलं दानवाधमम् । पुष्पमालांबरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥

शब्दार्थ: ददर्श—देखा; भूपवेषेण—राजा के वेश में; गोभिलम्—गोभिल को; दानवाधमम्—दुष्ट दानव; पुष्पमालांबरधरम्—पुष्पमालाएँ और वस्त्र धारण किए हुए; दिव्यगंधानुलेपनम्—दिव्य सुगंधित लेप लगाए हुए।
भावार्थ: पद्मावती ने राजा के वेश में बैठे गोभिल को देखा। उसने पुष्पमालाएँ और सुंदर वस्त्र धारण किए थे तथा शरीर पर दिव्य सुगंधित लेप लगा रखा था।

व्याख्या: गोभिल का मायावी वेश पद्मावती के सामने पूर्ण रूप से प्रस्तुत है। वह उसे अपने वास्तविक स्वरूप में नहीं, बल्कि राजा के वेश में दिखाई देता है।

श्लोक ४०

सर्वाभरणशोभांगं पद्मावती पतिव्रता । मथुरेशः समायातः कदा धर्मपरायणः ॥

शब्दार्थ: सर्वाभरणशोभाङ्गम्—सभी आभूषणों से सुशोभित; पद्मावती—पद्मावती; पतिव्रता—पति के प्रति निष्ठावान; मथुरेशः—मथुरा का राजा उग्रसेन; समायातः—आ पहुँचा; कदा—कब; धर्मपरायणः—धर्म में स्थित।
भावार्थ: उग्रसेन के समान वेश में आभूषणों से सुशोभित व्यक्ति को देखकर पद्मावती ने सोचा—धर्मपरायण मथुरा के राजा यहाँ कब आ पहुँचे?

व्याख्या: पद्मावती उस व्यक्ति को उग्रसेन समझती है। यहाँ छल का केंद्र स्पष्ट है: पति के रूप और पहचान का अनुकरण करके गोभिल उसके विश्वास को अपने पक्ष में करना चाहता है।

श्लोक ४१

मम नाथो महात्मा वै राज्यं त्यक्त्वा प्रदूरतः । यावद्धि चिंतयेत्सा च तावत्पापेन तेन सा ॥

शब्दार्थ: मम नाथः—मेरे स्वामी; महात्मा—महान आत्मा; वै—निश्चय ही; राज्यम्—राज्य; त्यक्त्वा—छोड़कर; प्रदूरतः—बहुत दूर से; यावत्—जब तक; चिन्तयेत्—विचार करती; सा—वह; तावत्—तभी तक; पापेन तेन—उस पापी द्वारा; सा—वह।

भावार्थ: पद्मावती अपने मन में विचार कर रही थी कि उसके स्वामी राज्य छोड़कर इतनी दूर कैसे आ गए। इसी बीच वह दुष्ट गोभिल उसे संबोधित करने लगा।

व्याख्या: श्लोक के उत्तरार्ध में वाक्य अधूरा-सा है और अगला श्लोक उसका आशय आगे बढ़ाता है। पद्मावती के मन में प्रश्न उठ रहा है, जबकि गोभिल उसे सोचने का अवसर दिए बिना अपनी योजना के अनुसार बुलाता है।
श्लोक ४२

समाहूता तुरीभूय एहि त्वं हि प्रिये मम । चकिताशंकितासाचकथंभर्त्तासमागतः ॥

शब्दार्थ: समाहूता—बुलाई गई; तुरीभूय—शीघ्रता से अथवा उतावलेपन से; एहि—आओ; त्वम्—तुम; प्रिये—हे प्रिय; मम—मेरी; चकिता—चकित; आशंकिता—आशंकित; सा—वह; कथम्—कैसे; भर्ता—पति; समागतः—आ पहुँचा।

भावार्थ: गोभिल ने उसे पुकारा—“हे प्रिये, शीघ्र मेरे पास आओ।” पद्मावती चकित और आशंकित हो उठी कि उसका पति यहाँ कैसे आ गया।

व्याख्या: गोभिल पति के संबोधन का उपयोग करके पद्मावती को निकट बुलाता है। पद्मावती की चकित अवस्था बताती है कि उसका आगमन उसके लिए अप्रत्याशित है।

श्लोक ४३

लज्जिता दुःखिता जाता अधःकृत्वा ततो मुखम् । अहं पापा दुराचारा निःशंका परिवर्तिता ॥

शब्दार्थ: लज्जिता—लज्जित; दुःखिता—दुःखी; जाता—हो गई; अधःकृत्वा मुखम्—मुख नीचे करके; अहम्—मैं; पापा—पापिनी; दुराचारा—बुरा आचरण करने वाली; निःशंका—बिना किसी आशंका के; परिवर्तिता—विचरती रही।

भावार्थ: पद्मावती लज्जित और दुःखी हो गई तथा अपना मुख नीचे कर लिया। वह सोचने लगी—मैं पापिनी और दुराचारी हूँ, जो बिना किसी आशंका के इस प्रकार घूमती रही।

व्याख्या: पद्मावती अपने पति को अचानक सामने देखकर अपने व्यवहार के विषय में संकोच अनुभव करती है। वह अभी गोभिल की वास्तविक पहचान नहीं जानती; इसलिए उसके मन में उठी लज्जा और आशंका को इसी परिस्थिति के भीतर समझना चाहिए।

श्लोक ४४

कोपमेवं महाभागः करिष्यति न संशयः । यावद्धि चिंतयेत्सा च तावत्तेनापि पापिना ॥

शब्दार्थ: कोपम्—क्रोध; एवम्—इस प्रकार; महाभागः—महाभाग, यहाँ उग्रसेन के लिए; करिष्यति—करेंगे; न संशयः—कोई संदेह नहीं; यावत्—जब तक; चिन्तयेत्—सोचती रही; सा—वह; तावत्—तभी; तेन पापिना—उस पापी द्वारा।

भावार्थ: पद्मावती सोचने लगी कि उसके पति को उसके इस प्रकार विहार करने पर निश्चित ही क्रोध आएगा। वह इसी चिंता में थी कि गोभिल ने फिर उसे पुकारा।

व्याख्या: पद्मावती की चिंता उसके पति के प्रति संबंध और सम्मान से जुड़ी है। गोभिल इसी मनःस्थिति का लाभ उठाकर अपनी बातों से उसके संदेह को दबाने का प्रयास करता है।

श्लोक ४५

समाहूता तुरीभूय एह्येहि त्वं मम प्रिये । त्वया विना कृतो देवि प्राणान्धर्तुं वरानने ॥

शब्दार्थ: समाहूता—बुलाई गई; तुरीभूय—शीघ्रता से; एहि एहि—आओ, आओ; मम प्रिये—हे मेरी प्रिय; त्वया विना—तुम्हारे बिना; देवि—हे देवी; प्राणान्—प्राणों को; धर्तुम्—धारण करने में; वरानने—सुंदर मुख वाली।

भावार्थ: गोभिल ने कहा—“हे मेरी प्रिये, शीघ्र मेरे पास आओ। हे सुंदर मुख वाली, तुम्हारे बिना मेरे लिए प्राण धारण करना कठिन हो गया है।”

व्याख्या: गोभिल उग्रसेन के रूप में प्रेमपूर्ण वचन बोलता है। वह पद्मावती को यह विश्वास दिलाना चाहता है कि उसके सामने उपस्थित व्यक्ति वही पति है, जो उससे गहरा स्नेह रखता है।

श्लोक ४६

न हि शक्नोम्यहं कांते जीवितं प्रियमेव च । तव स्नेहेन लुब्धोस्मि त्वां त्यक्त्वा नोत्सहे भृशम् ॥

शब्दार्थ: न हि शक्नोमि—मैं समर्थ नहीं हूँ; अहम्—मैं; कांते—हे प्रिये; जीवितम्—जीवन; प्रियमेव—प्रिय जीवन को ही; तव स्नेहेन—तुम्हारे स्नेह के कारण; लुब्धः अस्मि—आसक्त हो गया हूँ; त्वाम् त्यक्त्वा—तुम्हें छोड़कर; न उत्सहे—साहस नहीं कर सकता; भृशम्—किसी प्रकार भी।

भावार्थ: गोभिल कहता है—“हे प्रिये, तुम्हारे बिना मैं जीवन धारण नहीं कर सकता। तुम्हारे स्नेह में इतना आसक्त हूँ कि तुम्हें छोड़कर रहने का साहस नहीं कर सकता।”

व्याख्या: गोभिल प्रेम और विरह की भाषा का सहारा लेता है। इन वचनों का उद्देश्य पद्मावती को विश्वास में लेना है, जबकि उसके वास्तविक मन में छल और स्वार्थ है।

 श्लोक ४७–५४ : छल का खुलासा और पद्मावती का शाप-संकल्प

श्लोक ४७

ब्राह्मण्युवाच- एवमुक्ता गतापश्यत्सुमुखं लज्जयान्विता । समालिंग्य ततो दैत्यः सतीं पद्मावतीं तदा ॥

शब्दार्थ: ब्राह्मणी उवाच—ब्राह्मणी ने कहा; एवम् उक्ता—इस प्रकार कही गई; गता—गई; अपश्यत्—देखा; सुमुखम्—सुंदर मुख वाले को; लज्जयान्विता—लज्जा से युक्त; समालिंग्य—आलिंगन करके; ततः—तब; दैत्यः—दैत्य; सतीम्—सती, पतिव्रता; पद्मावतीम्—पद्मावती को; तदा—उस समय।

भावार्थ: ब्राह्मणी कहती है—गोभिल के ऐसे वचन सुनकर पद्मावती लज्जा से युक्त होकर उसके पास गई और उसे देखने लगी। तब दैत्य ने पतिव्रता पद्मावती को आलिंगन में ले लिया।

व्याख्या: पद्मावती उसे उग्रसेन समझकर उसके निकट जाती है। गोभिल इस विश्वास का अनुचित लाभ उठाता है। इस घटना में छल की सफलता पद्मावती की सहमति से नहीं, बल्कि उसकी पहचान के धोखे में रखे जाने से जुड़ी है।

श्लोक ४८

एकांतं तु समानीता सुभुक्ता इच्छया ततः । दैत्येन गोभिलेनापि सत्यकेतोः सुता तदा ॥

शब्दार्थ: एकान्तम्—एकांत में; समानीता—ले जाई गई; सुभुक्ता—भोग की गई; इच्छया—इच्छानुसार; ततः—तब; दैत्येन गोभिलेन—गोभिल दैत्य द्वारा; अपि—भी; सत्यकेतोः सुता—सत्यकेतु की पुत्री; तदा—उस समय।

भावार्थ: इसके बाद गोभिल दैत्य सत्यकेतु की पुत्री पद्मावती को एकांत में ले गया और उसके साथ छलपूर्वक भोग किया।

व्याख्या: कथा यहाँ छल के गंभीर परिणाम को सामने रखती है। पद्मावती जिस व्यक्ति को अपना पति समझ रही थी, वह वास्तव में गोभिल था, जिसने पति का रूप धारण करके उसकी पहचान और विश्वास का दुरुपयोग किया।

श्लोक ४९

सुकलोवाच- मुष्कस्थानेस्य संकेतं नाविंदत वरानना । स्ववस्त्रं सा परिगृह्य शंकिता दुःखिता ह्यभूत् ॥

शब्दार्थ: सुकलः उवाच—सुकल ने कहा; मुष्कस्थाने—गुप्तांग के स्थान पर; अस्य—उसके; संकेतं—चिह्न अथवा संकेत; न आविन्दत—नहीं पाया; वरानना—सुंदर मुख वाली; स्ववस्त्रम्—अपने वस्त्र को; परिगृह्य—संभालकर; शंकिता—संदेहग्रस्त; दुःखिता—दुःखी; अभूत्—हो गई।

भावार्थ: सुकल ने कहा—पद्मावती को उसके शरीर के गुप्तांग के स्थान पर वह परिचित संकेत नहीं मिला। अपने वस्त्र सँभालते हुए वह संदेह और दुःख से भर गई।

व्याख्या: यही वह क्षण है जब पद्मावती को समझ में आता है कि उसके सामने उपस्थित व्यक्ति उग्रसेन नहीं है। शरीर के परिचित चिह्न में अंतर उसके भ्रम को तोड़ देता है और छल उजागर हो जाता है।

श्लोक ५०

सा सक्रोधा वचः प्राह गोभिलं दानवाधमम् । कस्त्वं पापसमाचारो निर्घृणो दानवाकृतिः ॥

शब्दार्थ: सा—वह; सक्रोधा—क्रोध से भरी हुई; वचः प्राह—वचन बोली; गोभिलम्—गोभिल से; दानवाधमम्—दुष्ट दानव; कः त्वम्—तू कौन है; पापसमाचारः—पापपूर्ण आचरण करने वाला; निर्घृणः—निर्दयी; दानवाकृतिः—दानव के रूप वाला।

भावार्थ: पद्मावती क्रोध से भरकर गोभिल से बोली—“हे दुष्ट दानव! तू कौन है? तू पापपूर्ण आचरण करने वाला और निर्दयी है।”

व्याख्या: सत्य सामने आते ही पद्मावती की प्रतिक्रिया स्पष्ट और तीव्र हो जाती है। अब वह उसे पति नहीं, छल करने वाले दानव के रूप में पहचानती है और उसके कृत्य का प्रतिकार करना चाहती है।

श्लोक ५१

शप्तुकामा समुद्युक्ता दुःखेनाकुलितेक्षणा । वेपमाना तदा राजन्दुःखभारेण पीडिता ॥

शब्दार्थ: शप्तुकामा—शाप देना चाहती हुई; समुद्युक्ता—तैयार हुई; दुःखेन—दुःख से; आकुलितेक्षणा—व्याकुल नेत्रों वाली; वेपमाना—काँपती हुई; तदा—उस समय; राजन्—हे राजन्; दुःखभारेण—दुःख के भार से; पीडिता—पीड़ित।

भावार्थ: हे राजन्! पद्मावती उसे शाप देने के लिए उद्यत हुई। उसके नेत्र दुःख से व्याकुल थे, शरीर काँप रहा था और वह गहरे दुःख से पीड़ित थी।

व्याख्या: पद्मावती के भीतर दुःख, अपमान और क्रोध एक साथ प्रकट होते हैं। शाप देने का उसका संकल्प उस छल के विरुद्ध प्रतिक्रिया है जिसने उसके वैवाहिक विश्वास और पतिव्रत की मर्यादा को आघात पहुँचाया।

श्लोक ५२

मम कांतच्छलेनैव त्वयागत्य दुरात्मवन् । नाशितं धर्ममेवाग्र्यं पातिव्रत्यमनुत्तमम् ॥

शब्दार्थ: मम—मेरे; कान्त—प्रिय पति; छलेन—छल से; एव—ही; त्वया—तेरे द्वारा; आगत्य—आकर; दुरात्मन्—हे दुरात्मा; नाशितम्—नष्ट किया गया; धर्मम्—धर्म; एव—ही; अग्र्यम्—श्रेष्ठ; पातिव्रत्यम्—पति के प्रति निष्ठा; अनुत्तमम्—अत्यंत श्रेष्ठ।

भावार्थ: पद्मावती कहती है—“हे दुरात्मा! तू मेरे प्रिय पति का छलपूर्ण रूप धारण करके आया और मेरे श्रेष्ठ धर्म, मेरे अनुत्तम पतिव्रत को नष्ट कर दिया।”

व्याख्या: पद्मावती अपने साथ हुई घटना को केवल व्यक्तिगत दुःख के रूप में नहीं, बल्कि पति-पत्नी के विश्वास और पतिव्रत-धर्म पर हुए आघात के रूप में व्यक्त करती है। गोभिल ने उसके पति की पहचान का छलपूर्वक उपयोग किया; यही उसके आरोप का मूल है।

श्लोक ५३

सुस्वरं रुदितं कृत्वा मम जन्म त्वया हृतम् । पश्य मे बलमत्रैव शापं दास्ये सुदारुणम् ॥

शब्दार्थ: सुस्वरम्—ऊँचे अथवा स्पष्ट स्वर में; रुदितम् कृत्वा—रोकर; मम जन्म—मेरा जीवन अथवा जन्म; त्वया—तेरे द्वारा; हृतम्—छीन लिया गया; पश्य—देख; मे बलम्—मेरी शक्ति; अत्र एव—यहीं; शापम्—शाप; दास्ये—दूँगी; सुदारुणम्—अत्यंत कठोर।

भावार्थ: पद्मावती रोते हुए कहती है—“तूने मेरा जीवन नष्ट कर दिया। अब मेरी शक्ति देख; मैं तुझे यहीं अत्यंत कठोर शाप दूँगी।”

व्याख्या: यहाँ “मम जन्म त्वया हृतम्” उसके जीवन और अस्तित्व पर पड़े गहरे आघात को व्यक्त करता है। वह अपने दुःख को शाप के माध्यम से प्रकट करने के लिए तैयार है।

श्लोक ५४

एवं संभाषमाणा तं शप्तुकामा तु गोभिलम् ॥

शब्दार्थ: एवम्—इस प्रकार; सम्भाषमाणा—कहती हुई; तम्—उसको; शप्तुकामा—शाप देने की इच्छुक; तु—और; गोभिलम्—गोभिल को।

भावार्थ: इस प्रकार गोभिल से कठोर वचन कहती हुई पद्मावती उसे शाप देने के लिए उद्यत हो गई।

व्याख्या: अध्याय का अंत पद्मावती के शाप-संकल्प पर होता है। इस श्लोक में शाप के वास्तविक शब्द नहीं दिए गए हैं; वे आगे की कथा में आएँगे। अतः यहाँ उसके संकल्प को ही अध्याय का अंतिम बिंदु मानना चाहिए।

अध्याय ४९ का सार

इस अध्याय में गोभिल दैत्य पद्मावती के रूप से मोहित होकर उसकी वैवाहिक स्थिति और पतिव्रत-निष्ठा जानने के बावजूद छल का मार्ग अपनाता है। वह उग्रसेन का रूप, वेश, आवाज और व्यवहार धारण करता है तथा मधुर संगीत से पद्मावती को अपनी ओर आकर्षित करता है। पद्मावती उसे अपना पति समझती है; लेकिन शरीर के परिचित संकेत में अंतर देखकर छल पहचान लेती है। तब उसका दुःख और क्रोध शाप देने के संकल्प में बदल जाता है।

कथा का मुख्य क्रम है—आसक्ति, छल, पहचान का भ्रम, सत्य का उद्घाटन और मर्यादा-भंग के विरुद्ध प्रतिकार।