श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

शौनकजी बोले —

ये सर्पाः सर्पसत्रेऽस्मिन्पतिता हव्यवाहने। तेषां नामानि सर्वेषां श्रोतुमिच्छामि सूतज।। 

हिन्दी: शौनकजी ने कहा — इस सर्पसत्र में जो-जो सर्प हव्यवाहन (अग्नि) में गिरे थे, उन सभी के नाम मैं सुनना चाहता हूँ, हे सूतनन्दन!

सूतजी बोले — सहस्राणि बहून्यस्मिन्प्रयुतान्यर्बुदानि च। न शक्यं परिसंख्यातुं बहुत्वाद्द्विजसत्तम।।

हिन्दी: सूतजी ने कहा — हे द्विजसत्तम! इस यज्ञ में (भस्म होने वाले सर्पों की संख्या) हजारों, लाखों और करोड़ों में थी। उनकी अत्यधिक अधिकता के कारण उनकी पूरी गिनती करना संभव नहीं है।

यथास्मृति तु नामानि पन्नगानां निबोध मे। उच्यमानानि मुख्यानां हुतानां जातवेदसि।। 

हिन्दी: तथापि अपनी स्मृति के अनुसार जातवेदा (अग्नि) में आहुति दिए गए मुख्य-मुख्य पन्नगों के जो नाम मैं कह रहा हूँ, उन्हें मुझसे सुनो।

वासुकेः कुलजातांस्तु प्राधान्येन निबोध मे। नीलरक्तान्सितान्घोरान्महाकायान्विषोल्बणान।। 

हिन्दी: वासुकि के कुल में उत्पन्न हुए नीले, लाल, सफेद, घोर, महाकाय और भयंकर विष वाले प्रमुख नागों के नाम मुझसे जानो।

अवशान्मातृवाग्दण्डपीडितान्कृपणान्हूतान्। कोटिशो मानसः पूर्णः शलः पालो हलीमकः।। 

हिन्दी: माता के वचन रूपी दंड से पीड़ित, बेवस, दीन होकर अग्नि में आहुति दिए गए करोड़ों नागों में मानस, पूर्ण, शल, पाल, हलीमक—

पिच्छलः कौणपश्चक्रः कालवेगः प्रकालनः। हिरण्यबाहुः शरणः कक्षकः कालदन्तकः।। 

हिन्दी: पिच्छल, कौणप, चक्र, कालवेग, प्रकालन, हिरण्यबाहु, शरण, कक्षक और कालदन्तक—

एते वासुकिजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहने। अन्ये च बहवो विप्र तथा वै कुलसंभवाः। प्रदीप्ताग्नौ हुताःसर्वे घोररूपा महाबलाः।। 

हिन्दी: हे विप्र! वासुकि के कुल में उत्पन्न होने वाले ये तथा इनके अतिरिक्त कुल के अन्य बहुत से घोर रूप वाले महाबली नाग प्रज्वलित अग्नि में प्रविष्ट हुए (आहुति बनाए गए)।

तक्षकस्य कुले जातान्प्रवक्ष्यामि निबोध तान्। पुच्छाण्डको मण्डलकः पिण्डसेक्ता रभेणकः।।

हिन्दी: अब तक्षक के कुल में उत्पन्न हुए नागों को बताता हूँ, उन्हें सुनो— पुच्छाण्डक, मण्डलक, पिण्डसेक्ता, रभेणक—

उच्छिखः शरभो भङ्गो बिल्वतेजा विरोहणः। शिली शलकरो मूकः सुकुमारः प्रवेपनः।। 

हिन्दी: उच्छिख, शरभ, भङ्ग, बिल्वतेजा, विरोहण, शिली, शलकर, मूक, सुकुमार, प्रवेपन—

मुद्गरः शिशुरोमा च सुरोमा च महाहनुः। एते तक्षकजा नागाः प्रविष्टा हव्यवाहनम्।। 

हिन्दी: मुद्गर, शिशुरोमा, सुरोमा और महाहनु— तक्षक के कुल के ये नाग हव्यवाहन (अग्नि) में प्रविष्ट हुए थे।

पारावतः पारियात्रः पाण्डरो हरिणः कृशः। विहङ्गः शरभो मोदः प्रमोदः संहतापनः।। 

हिन्दी: पारावत, पारियात्र, पाण्डर, हरिण, कृश, विहङ्ग, शरभ, मोद, प्रमोद और संहतापन—

ऐरावतकुलादेते प्रविष्टा हव्यवाहनम्। कौरव्यकुलजान्नागाञ्शृणु मे त्वं द्विजोत्तम।। 

हिन्दी: ऐरावत के कुल से संबंधित ये नाग अग्नि में प्रविष्ट हुए थे। अब हे द्विजोत्तम! कौरव्य कुल में उत्पन्न हुए नागों को मुझसे सुनो।

एरकः कुण्डलो वेणी वेणीस्कन्धः कुमारकः। बाहुकः शृङ्गबेरश्च धूर्तकः प्रातरातकौ।। 

हिन्दी: एरक, कुण्डल, वेणी, वेणीस्कन्ध, कुमारक, बाहुक, शृङ्गबेर, धूर्तक और प्रातरातक—

कौरव्यकुलजास्त्वेते प्रविष्टा हव्यवाहनम्। धृतराष्ट्रकुले जाताञ्शृणु नागान्यथातथम्।। 

हिन्दी: कौरव्य कुल के ये नाग हव्यवाहन में प्रविष्ट हुए थे। अब धृतराष्ट्र के कुल में उत्पन्न हुए नागों को यथातथ्य सुनो।

कीर्त्यमानान्मया ब्रह्मन्वातवेगान्विषोल्बणान।

हिन्दी: हे ब्रह्मन्! मेरे द्वारा वायु के समान वेग वाले और भयंकर विष वाले जिन नागों के नाम लिए जा रहे हैं—

शङ्कुकर्णः पिठरकः कुठारमुखसेचकौ।। पूर्णाङ्गदः पूर्णमुखः प्रहासः शकुनिर्दरिः। 

हिन्दी: शङ्कुकर्ण, पिठरक, कुठारमुख, सेचक, पूर्णाङ्गद, पूर्णमुख, प्रहास, शकुनि, दरि—

अमाहठः कामठकः सुषेणो मानसोऽव्ययः।। `अष्टावक्रः कोमलकः श्वसनो मौनवेपगः।' 

हिन्दी: अमाहठ, कामठक, सुषेण, मानस, अव्यय, अष्टावक्र, कोमलक, श्वसन और मौनवेपग—

भैरवो मुण्डवेदाङ्गः पिशङ्गश्चोदपारकः। ऋषभो वेगवान्नागः पिण्डारकमहाहनू।। 

हिन्दी: भैरव, मुण्डवेदाङ्ग, पिशङ्ग, उदपारक, ऋषभ, वेगवान नाग, पिण्डारक और महाहनु—

रक्ताङ्गः सर्वसारङ्गः समृद्धपटवासकौ। वराहको वीरणकः सुचित्रश्चित्रवेगिकः।। 

हिन्दी: रक्ताङ्ग, सर्वसारङ्ग, समृद्धपटवासक, वराहक, वीरणक, सुचित्र और चित्रवेगिक—

पराशरस्तरुणको मणिः स्कन्धस्तथाऽऽरुणिः। इति नागा मया ब्रह्मन्कीर्तिताः कीर्तिवर्धनाः।। 

हिन्दी: पराशर, तरुणक, मणि, स्कन्ध तथा आरुणि— हे ब्रह्मन्! कीर्ति बढ़ाने वाले इन नागों के नाम मैंने तुम्हें बताए हैं।

प्राधान्येन बहुत्वात्तु न सर्वे परिकीर्तिताः। एतेषां प्रसवो यश्च प्रसवस्य च सन्ततिः।। 

हिन्दी: नागों की अत्यधिक संख्या होने के कारण यहाँ मुख्य-मुख्य नामों को ही कहा गया है, सभी के नाम नहीं बताए जा सके हैं। इन नागों के प्रसव (संतान) तथा उनकी भी संतति—

न शक्यं परिसंख्यातुं ये दीप्तं पावकं गताः। `द्विशीर्षाः पञ्चशीर्षाश्च सप्तशीर्षास्तथाऽपरे। दशशीर्षाः शतशीर्षास्तथान्ये बहुशीर्षकाः'।। 

हिन्दी: जो प्रज्वलित पावक (अग्नि) में समा गए, उनकी संख्या गिनना असंभव है। उनमें दो सिर वाले, पाँच सिर वाले, सात सिर वाले, दस सिर वाले, सौ सिर वाले तथा अन्य अनेक बहुशीर्षक (अनेक सिरों वाले) नाग भी थे।

कालानलविषा घोरा हुताः शतसहस्रशः। महाकाया महावेगाः शैलशृङ्गसमुच्छ्रयाः।। 

हिन्दी: कालानल के समान विष वाले, घोर, महाकाय, महावेगी तथा पर्वत के शिखरों के समान ऊँचे हज़ारों-लाखों नागों की आहुति दी गई।

योजनायामविस्तारा द्वियोजनसमायताः। कामरूपाः कामबला दीप्तानलविषोल्बणाः।। 

हिन्दी: जो एक योजन चौड़े और दो-दो योजन लंबे थे, जो कामरूपी, कामबली तथा प्रज्वलित अग्नि एवं विष से भयंकर थे—

दग्धास्तत्र महासत्रे ब्रह्मदण्डनिपातिताः।। 

हिन्दी: ब्रह्मदण्ड से प्रेरित होकर वे सभी महासत्र में जला दिए गए।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
आस्तीकपर्वणि सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।। 57 ।।
आस्तीकपर्वणि षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः