श्लोक 1
एवं स नाहुषो राजा ययातिः पुत्रमीप्सितम्। राज्येऽभिषिच्य मुदितो वानप्रस्थोऽभवन्मुनिः।। (1-80-1)
हिंदी अनुवाद: आयु के पुत्र राजा ययाति ने इस प्रकार अपने मनोनुकूल (योग्य) पुत्र को राज्य पर अभिषेक करके (राजा बनाकर) प्रसन्नतापूर्वक वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया और वे मुनि की भांति आचरण करने लगे।
व्याख्या: यहाँ वैशंपायन जी जनमेजय को बता रहे हैं कि किस प्रकार महान राजा ययाति ने अपने वृद्ध होने पर अपने सबसे योग्य और आज्ञाकारी पुत्र (पोरु) को अपना राज्यभार सौंप दिया। सांसारिक मोह-माया का त्याग कर राजसुख से विरक्त हो जाना और वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश कर आत्मिक शांति की खोज करना एक भारतीय सम्राट का आदर्श जीवन-क्रम रहा है। ययाति ने इसी परंपरा का पालन करते हुए वानप्रस्थ का मार्ग चुना।
श्लोक 2
उषित्वा च वने वासं ब्राह्मणैः संशितव्रतः। फलमूलाशनो दान्तस्ततः स्वर्गमितो गतः।। (1-80-2)
हिंदी अनुवाद: कठिन व्रतों का पालन करने वाले, इन्द्रियों को वश में करने वाले तथा केवल फल-मूल खाकर जीवन बिताने वाले उन राजा ययाति ने वनों में ब्राह्मणों के साथ निवास किया और तत्पश्चात वे स्वर्ग को प्राप्त हुए।
व्याख्या: राजा ययाति ने राजमहल के विलास को छोड़कर जंगल में कठिन जीवन बिताया। 'संशितव्रतः' का अर्थ है कठोर व्रतों का पालन करने वाला और 'दान्तः' का अर्थ है जिसने अपनी इंद्रियों को पूरी तरह जीत लिया हो। वे केवल कंद-मूल खाकर और ज्ञानी ब्राह्मणों की संगति में रहकर अपने तप को बढ़ाते रहे। उनके इसी उत्तम तपस्या और संयम के बल पर उन्होंने अंततः स्वर्ग लोक की प्राप्ति की।
श्लोक 3
स गतः स्वर्निवासं तं निवसन्मुदितः सुखी। कालेन नातिमहता पुनः शक्रेण पातितः।। (1-80-3)
हिंदी अनुवाद: स्वर्ग लोक में निवास करते हुए वे प्रसन्न और सुखी थे, परंतु थोड़े ही समय के बाद देवराज इंद्र द्वारा उन्हें स्वर्ग से नीचे गिरा दिया गया।
व्याख्या: ययाति ने अपने पुण्यों के प्रभाव से स्वर्ग का सुख तो प्राप्त कर लिया, किंतु यह सुख अधिक समय तक नहीं टिक सका। मनुष्य चाहे कितने भी पुण्य क्यों न कर ले, यदि अहंकार या किसी अन्य दोष का प्रवेश हो जाए, तो उसका पतन निश्चित है। यहाँ संकेत मिलता है कि ययाति के किसी कर्म या अहंकार के कारण देवराज इंद्र को उन्हें स्वर्ग से नीचे गिराना पड़ा।
श्लोक 4
`साधुभिः संगतिं लब्ध्वा पुनः स्वर्गमुपेयिवान्। जनमेजय उवाच। स्वर्गतश्च पुनर्ब्रह्मन्निवसन्देववेश्मनि। कालेन नातिमहता कथं शक्रेण पातितः'।। (1-80-4)
हिंदी अनुवाद: संत पुरुषों (साधुओं) की संगति प्राप्त करके वे फिर से स्वर्ग में लौट गए। जनमेजय ने पूछा— हे ब्रह्मन्! देवराज के भवन में निवास करते हुए वे स्वर्ग से पुनः कैसे और किस कारण से थोड़े ही समय में इंद्र द्वारा गिरा दिए गए?
व्याख्या: यह श्लोक राजा जनमेजय की जिज्ञासा को दर्शाता है। जनमेजय वैशंपायन जी से यह जानना चाहते हैं कि जब ययाति ने देवताओं के निवास-स्थान (स्वर्ग) में प्रवेश पा लिया था, तो ऐसा क्या हुआ कि इंद्र ने उन्हें नीचे गिरा दिया? साथ ही, यह भी संकेत है कि सत्संग (साधुओं की संगति) का प्रभाव इतना महान होता है कि पतन के बाद भी व्यक्ति पुनः उच्च स्थिति (स्वर्ग) को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 5
निपतन्प्रच्युतः स्वर्गादप्राप्तो मेदिनीतलम्। स्थित आसीदन्तरिक्षे स तदेति श्रुतं मया।। (1-80-5)
हिंदी अनुवाद: मैंने ऐसा सुना है कि स्वर्ग से नीचे गिरते हुए और पृथ्वी पर पहुँचने से पहले ही, वे बीच में ही आकाश (अंतरिक्ष) में रुक गए थे।
व्याख्या: यह प्रसंग ययाति के जीवन की एक विशिष्ट घटना की ओर इशारा करता है। जब उनका अहंकार और पुण्य क्षीण होने पर उन्हें स्वर्ग से नीचे धकेला गया, तब वे सीधे धरती पर नहीं गिरे, बल्कि अंतरिक्ष में ही ठहर गए। इसके पीछे उनके द्वारा पूर्वकाल में किए गए कुछ अन्य महान दान और सत्कर्म थे, जिन्होंने उन्हें बीच में ही थाम लिया था।
श्लोक 6
तत एव पुनश्चापि गतः स्वर्गमिति श्रुतम्। राज्ञा वसुमता सार्धमष्टकेन च वीर्यवान्।। (1-80-6)
हिंदी अनुवाद: मैंने ऐसा भी सुना है कि वे वहीं अंतरिक्ष से पराक्रमी राजा वसुमान् और अष्टक के साथ फिर से स्वर्ग को चले गए थे।
व्याख्या: यहाँ राजा ययाति के पुनरुद्धार की कथा का उल्लेख है। अंतरिक्ष में लटके होने की स्थिति में उनकी भेंट उनके मित्रों,नाती-पोतों और कुछ धर्मिष्ठ राजाओं (जैसे अष्टक और वसुमान) से हुई। उन सबका संवाद और उनके द्वारा ययाति को दिए गए अपने पुण्यों के अंश के कारण ययाति का संकट टला और वे पुनः स्वर्ग लोक को प्रस्थान करने में सफल हुए।
श्लोक 7
प्रतर्दनेन शिविना समेत्य किल संसदि। कर्मणा केन स दिवं पुनः प्राप्तो महीपतिः।। (1-80-7)
हिंदी अनुवाद: प्रर्हदन और शिवि के साथ सभा में मिलकर, उस महाबली महीपति (ययाति) ने किस कर्म के प्रभाव से पुनः स्वर्ग को प्राप्त किया?
व्याख्या: जनमेजय अपनी जिज्ञासा को और स्पष्ट करते हुए पूछते हैं कि प्रतर्दन और राजा शिवि जैसे महान दानी और सत्यवादी वीरों के संपर्क में आने के बाद तथा उनकी सभा में हुई चर्चा के परिणामस्वरूप ययाति ने कौन सा ऐसा श्रेष्ठ कर्म किया, जिसके बल पर उन्हें दोबारा स्वर्ग का अधिकार मिल गया?
श्लोक 8
सर्वमेतदशेषेण श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः। कथ्यमानं त्वया विप्र विप्रर्षिगणसंनिधौ।। (1-80-8)
हिंदी अनुवाद: हे विप्र! मैं इस संपूर्ण इतिहास को ब्रह्मर्षियों की इस सभा में आपके मुख से विस्तारपूर्वक और यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ।
व्याख्या: राजा जनमेजय महर्षि वैशंपायन से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे इस पूरी कथा को बिना किसी अंश को छोड़े, ब्रह्मर्षियों की इस पवित्र उपस्थिति में पूरी सत्यता और विस्तार के साथ वर्णन करें, ताकि वे ययाति के चरित्र से धर्म और कर्म का मर्म समझ सकें।
श्लोक 9
देवराजसमो ह्यासीद्ययातिः पृथिवीपतिः। वर्धनः कुरुवंशस्य विभावसुसमद्युतिः।। (1-80-9)
हिंदी अनुवाद: पृथ्वी के स्वामी राजा ययाति देवराज इंद्र के समान प्रभावशाली थे। वे कुरुवंश की वृद्धि करने वाले और अग्नि (विभावसु) के समान कांतिवान् थे।
व्याख्या: वैशंपायन जी ययाति के महात्म्य का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे साधारण राजा नहीं थे। उनका तेज सूर्य या अग्नि के समान देदीप्यमान था और उनका प्रभाव देवराज इंद्र के बराबर माना जाता था। वेदों और इतिहास में उनका नाम कुरुवंश और चंद्रवंश की प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाले प्रतापी पूर्वजों में लिया जाता है।
श्लोक 10
तस्य विस्तीर्णयशसः सत्यकीर्तेर्महात्मनः। चरितं श्रोतुमिच्छामि दिवि चेह च सर्वशः।। (1-80-10)
हिंदी अनुवाद: विस्तृत यश वाले, सत्य कीर्ति से युक्त उन महात्मा ययाति का स्वर्ग और पृथ्वी दोनों लोकों का सारा चरित्र मैं पूरी तरह सुनना चाहता हूँ।
व्याख्या: जनमेजय की जिज्ञासा और अधिक तीव्र हो जाती है। वे यह जानना चाहते हैं कि पृथ्वी पर रहते हुए ययाति ने क्या महान कार्य किए और स्वर्ग में जाने के बाद वहाँ उनका क्या अनुभव रहा। महापुरुषों का जीवन लोक-कल्याण और धर्म का पाठ पढ़ाने वाला होता है, इसलिए उनके दोनों लोकों के वृत्तांत को सुनना अत्यंत प्रेरणादायक है।
श्लोक 11
हन्त ते कथयिष्यामि ययातेरुत्तरां कथाम्। दिवि चेह च पुण्यार्थां सर्वपापप्रणाशिनीम्।। (1-80-11)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन बोले— अच्छा, अब मैं तुम्हें ययाति की वह उत्तरवर्ती कथा सुनाता हूँ, जो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों जगह से संबंधित है, अत्यंत पवित्र है और समस्त पापों का नाश करने वाली है।
व्याख्या: वैशंपायन जी जनमेजय के आग्रह को स्वीकार करते हुए ययाति के जीवन के अगले भाग की कथा आरंभ करते हैं। वे बताते हैं कि यह आख्यान केवल एक कहानी मात्र नहीं है, बल्कि यह सुनने वाले के सभी पापों को हरने वाला और मनुष्य को पुण्य तथा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाला पवित्र ग्रंथ है।
श्लोक 12
ययातिर्नाहुषो राजा पूरुं पुत्रं कनीयसम्। राज्येऽभिषिच्य मुदितः प्रावव्राज वनं तदा।। (1-80-12)
हिंदी अनुवाद: आयु के वंशज राजा ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु को राज्य पर अभिषिक्त करके, प्रसन्नचित्त होकर उस समय वन की ओर प्रस्थान किया।
व्याख्या: यहाँ कथा के उस मुख्य प्रसंग को दोहराया गया है जहाँ ययाति ने अपने यौवन को पाने के बाद अंततः मोह त्याग कर अपने सबसे छोटे पुत्र पूरु (जिसने अपनी युवावस्था उन्हें दी थी) को योग्य समझकर राजसिंहासन सौंपा और स्वयं संन्यासी की तरह वन की राह पकड़ी।
श्लोक 13
अन्त्युषे स विनिक्षिप्य पुत्रान्यदुपुरोगमान्। फलमूलाशनो राजा वने संन्यवसच्चिरम्।। (1-80-13)
हिंदी अनुवाद: यदु आदि अन्य सभी ज्येष्ठ पुत्रों को उनके उचित स्थानों पर स्थापित करके तथा केवल फल-मूल खाकर, वे राजा बहुत लंबे समय तक वन में निवास करते रहे।
व्याख्या: ययाति ने अपने अन्य पुत्रों (यदु, तुर्वसु, द्रुह्य और अनु) को भी उनके अधिकारों और क्षेत्रों के अनुसार व्यवस्थित किया। इसके पश्चात वे किसी भी प्रकार के पारिवारिक मोह या राजसी सुख में न फंसकर पूरी तरह वनवासी बन गए और लंबे समय तक केवल कंद-मूल खाकर कठोर तपस्या में लीन रहे।
श्लोक 14
शंसितात्मा जितक्रोधस्तर्पयन्पितृदेवताः। अग्नींश्च विधिवज्जुह्वन्वानप्रस्थविधानतः।। (1-80-14)
हिंदी अनुवाद: उन्होंने अपनी आत्मा को शुद्ध किया, क्रोध को पूरी तरह जीत लिया, वानप्रस्थ आश्रम के नियमों के अनुसार विधिपूर्वक अग्निहोत्र (होम) किया तथा पितरों और देवताओं को तृप्त किया।
व्याख्या: वानप्रस्थ आश्रम के धर्म का पालन करते हुए ययाति ने अपने भीतर के विकारों (विशेषकर क्रोध) पर विजय प्राप्त की। वे प्रतिदिन नियमित रूप से यज्ञ-अग्नि में आहुति देते थे, देवताओं की पूजा करते थे और अपने पूर्वजों (पितरों) का तर्पण करके उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से निर्वाह करते थे।
श्लोक 15
अथितीन्पूजयामास वन्येन हविषा विभुः। शिलोञ्छवृत्तिमास्थाय शेषान्नकृतभोजनः।। (1-80-15)
हिंदी अनुवाद: वे सामर्थ्यवान राजा वनों में मिलने वाली सामग्री (वन्य हविष्य) से अतिथियों की पूजा करते थे। खेतों से गिरे हुए अनाज के दानों को बीनने की वृत्ति (शिलोञ्छ वृत्ति) अपनाकर और अंत में बचा हुआ अन्न ही स्वयं भोजन के रूप में ग्रहण करते थे।
व्याख्या: यह श्लोक ययाति की अत्यधिक विनम्रता, संतोष और त्याग को दिखाता है। राजा होते हुए भी उन्होंने संतों की तरह 'शिलोञ्छ वृत्ति' (अर्थात खेतों में कटाई के बाद गिरे हुए अन्न के दानों को चुनकर जीवन चलाना) अपनाई। वे पहले अतिथियों और संतों का सत्कार करते थे और जो कुछ बच जाता था, उसे ही अपना आहार बनाते थे।
श्लोक 16
पूर्णं वर्षसहस्रं च एवंवृत्तिरभून्नृपः। अब्भक्षः शरदस्त्रिंशदासीन्नियतवाङ्मनाः।। (1-80-16)
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार आचरण करते हुए उस राजा को पूरे एक हजार वर्ष बीत गए। इसके बाद उन्होंने तीस वर्षों तक केवल जल पीकर और अपनी वाणी तथा मन को पूरी तरह संयमित रखकर तप किया।
व्याख्या: ययाति की तपस्या की दीर्घता और उसकी कठोरता का वर्णन यहाँ किया गया है। उन्होंने एक हजार वर्ष तक इस प्रकार का संयमित जीवन बिताया। इसके पश्चात अगले तीस वर्षों तक उन्होंने अन्न का पूरी तरह त्याग कर केवल जल के सहारे (अब्भक्षः) रहना शुरू किया और अपने मन तथा वाणी पर कठोर नियंत्रण रखा।
श्लोक 17
ततश्च वायुभक्षोऽभूत्संवत्सरमतन्द्रितः। तथा पञ्चाग्निमध्ये च तपस्तेपे स वत्सरम्।। (1-80-17)
हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात बिना किसी आलस्य के उन्होंने एक वर्ष तक केवल वायु का सेवन (वायुभक्ष) करके बिताया और इसी प्रकार एक वर्ष तक चारों ओर जल और बीच में चार अग्नियां जलाकर उनके मध्य बैठकर 'पंचाग्नि तप' किया।
व्याख्या: ययाति की तपस्या का स्तर और अधिक कठिन होता गया। उन्होंने पानी भी छोड़ दिया और केवल हवा के सहारे एक वर्ष बिताया। इसके बाद गर्मियों में चारों तरफ आग जलाकर और सिर पर सूर्य के ताप को सहते हुए अत्यंत कष्टदायक 'पंचाग्नि तपस्या' का अनुष्ठान किया, जिससे उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा चरम पर पहुँच गई।
श्लोक 18
एकपादः स्तितश्चासीत्षण्मासाननिलाशनः। पुण्यकीर्तिस्ततः स्वर्गे जगामावृत्य रोदसी।। (1-80-18)
हिंदी अनुवाद: वे छह महीनों तक केवल हवा पीकर एक पैर पर खड़े रहे। इसके पश्चात अपनी पवित्र कीर्ति से पृथ्वी और आकाश दोनों को व्याप्त करते हुए वे पुण्यत्मा राजा स्वर्ग लोक को चले गए।
व्याख्या: यह ययाति की कठिन तपस्या का अंतिम चरण है। छह महीने तक केवल वायु का भक्षण करते हुए एक पैर पर खड़े रहना किसी साधारण मनुष्य के वश की बात नहीं है। इस प्रकार अपनी असाधारण तपस्या, इंद्रिय-संयम और महान कर्मों के बल पर उनकी कीर्ति लोक-लोकान्तर में फैल गई और वे अपने दिव्य शरीर तथा पुण्यों के साथ स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गए।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि अशीतितमोऽध्यायः।। 80 ।।
