श्लोक 1
स्वर्गतः स तु राजेन्द्रो निवसन्देववेश्मनि। पूजितस्त्रिदशैः साध्यैर्मरुद्भिर्वसुभिस्तथा।। (1-81-1)
हिंदी अनुवाद: स्वर्ग में पहुँचकर देवराज के भवन में निवास करते हुए उन राजाधिराज ययाति की देवताओं, साध्यगणों, मरुद्गणों और वसुओं ने भली-भांति पूजा की।
व्याख्या: वैशंपायन जी बताते हैं कि जब राजा ययाति अपनी कठिन तपस्या के बल पर स्वर्ग पहुँचे, तो उनका स्वागत सामान्य रूप से नहीं हुआ। देवलोक की विभिन्न श्रेणियों के देवताओं—जैसे साध्य, मरुद्गण और वसु—ने उनका आदर-सत्कार किया। यह उनके महान पुण्यों और तपस्या का फल था कि उन्हें देवसभा में उच्च सम्मान प्राप्त हुआ।
श्लोक 2
देवलोकं ब्रह्मलोकं संचरन्पुण्यकृद्वशी। अवसत्पृथिवीपालो दीर्घकालमिति श्रुतिः।। (1-81-2)
हिंदी अनुवाद: पुण्यात्मा और अपनी इंद्रियों को वश में करने वाले वे पृथ्वीपाल (ययाति) देवलोक तथा ब्रह्मलोक में विचरते हुए लंबे समय तक स्वर्ग में निवास करते रहे—ऐसा मैंने सुना है।
व्याख्या: ययाति ने केवल एक ही लोक तक अपनी गति सीमित नहीं रखी, बल्कि वे अपनी साधना के प्रभाव से देवलोक और सर्वोच्च ब्रह्मलोक तक स्वतंत्र रूप से विचरण करते थे। 'पुण्यकृद्वशी' शब्द यह स्पष्ट करता है कि वे पुण्यात्मा होने के साथ-साथ जितेंद्रिय भी थे, जिन्होंने लंबे समय तक स्वर्गिक आनंद का उपभोग किया।
श्लोक 3
स कदाचिन्नृपश्रेष्ठो ययातिः शक्रमागमत्। कथान्ते तत्र शक्रेण स पृष्टः पृथिवीपतिः।। (1-81-3)
हिंदी अनुवाद: श्रेष्ठ राजाओं में अग्रगण्य वे ययाति एक दिन देवराज इंद्र के पास गए। वहाँ कथा (वार्तालाप) के अंत में देवराज इंद्र ने उन पृथ्वीपति से एक प्रश्न पूछा।
व्याख्या: स्वर्ग में निवास के दौरान एक अवसर पर ययाति की भेंट देवराज इंद्र से हुई। दोनों के बीच आदर-सत्कार और विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई। जब वह वार्तालाप समाप्त होने को आया, तब इंद्र ने ययाति की परीक्षा लेने या उनके पूर्व अनुभवों के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया।
श्लोक 4
यदा स पूरुस्तव रूपेण राज- ञ्जरां गृहीत्वा प्रचचार भूमौ। तदा च राज्यं संप्रदायैव तस्मै त्वया किमुक्तः कथयेह सत्यम्।। (1-81-4)
हिंदी अनुवाद: इंद्र ने कहा— हे राजन्! जब तुम्हारे सबसे छोटे पुत्र पूरु ने तुम्हारे रूप (बुढ़ापे) को लेकर पृथ्वी पर विचरण किया था और तुमने अपना राज्य उसे सौंप दिया था, उस समय तुमने उससे क्या कहा था? इसे मुझे सच-सच बताओ।
व्याख्या: इंद्र ययाति के उस समय के प्रसंग की याद दिलाते हैं जब उन्होंने अपने पुत्र पूरु से उसकी युवावस्था मांग ली थी और बदले में अपना बुढ़ापा उसे दे दिया था। इंद्र यह जानना चाहते हैं कि जब ययाति ने अपना राज्य पूरु को सौंपा, तो उन्होंने उसे क्या उपदेश या सीख दी थी।
श्लोक 5
गङ्गायमुनयोर्मध्ये कृत्स्नोयं विषयस्तव। मध्ये पृथिव्यास्त्वं राजा भ्रातरोऽन्त्याधिपास्तव।। (1-81-5)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— गंगा और यमुना के बीच का यह संपूर्ण देश तुम्हारा राज्य है। तुम इस पृथ्वी के मध्य भाग के राजा हो और तुम्हारे भाई (अन्य पुत्र) सीमावर्ती प्रदेशों के अधिपति (राजा) हैं।
व्याख्या: ययाति इंद्र को अपने द्वारा पुत्रों के बीच किए गए साम्राज्य के विभाजन का ब्यौरा देते हैं। उन्होंने अपने सबसे योग्य पुत्र पूरु को मध्य देश (जो गंगा-यमुना का उपजाऊ और मुख्य क्षेत्र था) का राजा बनाया तथा अन्य पुत्रों को साम्राज्य की सीमाओं की रक्षा के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों का राजा नियुक्त किया था।
श्लोक 6
न च कुर्यान्नरो दैन्यं शाठ्यं क्रोधं तथैव च। जैहयं च मत्सरं वैरं सर्वत्रेदं न कारयेत्।। (1-81-6)
हिंदी अनुवाद: मनुष्य को कभी भी दीनता (हीनभाव), शठता (धूर्तता), क्रोध, कुटिलता (छल-कपट), ईर्ष्या और किसी से भी बैर-भाव नहीं करना चाहिए। इन दुर्गुणों को सर्वथा त्याग देना चाहिए।
व्याख्या: यह ययाति द्वारा अपने पुत्रों को दिए गए नैतिक उपदेशों का आरंभ है। वे कहते हैं कि जीवन में मानसिक और नैतिक पतन का कारण बनने वाले इन छह विकारों—दीनता, धूर्तता, क्रोध, कुटिलता, मत्सर (जलन) और शत्रुता—से मनुष्य को हमेशा दूर रहना चाहिए।
श्लोक 7
मातरं पितरं ज्येष्ठं विद्वांसं च तपोधनम्। क्षमावन्तं च राजेन्द्र नावमन्येत बुद्धिमान्।। (1-81-7)
हिंदी अनुवाद: माता, पिता, बड़े भाई, ज्ञानी पुरुष, तपस्वी (ऋषि-मुनि) और क्षमावान् व्यक्ति का बुद्धिमान मनुष्य को कभी भी अपमान नहीं करना चाहिए।
व्याख्या: ययाति समझाते हैं कि समाज में जिन व्यक्तियों का स्थान उच्च और पूजनीय है, उनका अनादर करने से मनुष्य का तेज और पुण्य नष्ट हो जाते हैं। माता-पिता जीवनदाता हैं, बड़ा भाई पिता के समान है, ज्ञानी और तपस्वी समाज का मार्गदर्शन करते हैं, तथा क्षमावान् पुरुष महानता के प्रतीक हैं—अतः इनका कभी अपमान न करें।
श्लोक 8
अशक्तः क्षमते नित्यमशक्तः क्रुध्यते नरः। दुर्जनः सुजनं द्वेष्टि दुर्बलो बलवत्तरम्।। (1-81-8)
हिंदी अनुवाद: सामर्थ्यवान् व्यक्ति ही हमेशा क्षमा करता है (कमजोर व्यक्ति क्या क्षमा करेगा?)। जो असमर्थ होता है, वही बात-बात पर क्रोध करता है। दुर्जन पुरुष सज्जन से द्वेष करता है और दुर्बल व्यक्ति अपने से अधिक बलवान् से ईर्ष्या रखता है।
व्याख्या: यहाँ ययाति मानवीय स्वभाव की गहरी मनोवैज्ञानिक समीक्षा करते हैं। क्षमाशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि शक्तिवान् का आभूषण है। जो लोग खुद कुछ करने में असमर्थ होते हैं, वे ही क्रोध और द्वेष का सहारा लेते हैं।
श्लोक 9
रूपवन्तमरूपी च धनवन्तं च निर्धनः। अकर्मी कर्मिणं द्वेष्टि धार्मिकं च नधार्मिकः।। (1-81-9)
हिंदी अनुवाद: रूपहीन व्यक्ति रूपवान् से, निर्धन व्यक्ति धनवान् से, अकर्मी (आलसी) व्यक्ति कर्मठ से तथा अधार्मिक व्यक्ति किसी धार्मिक मनुष्य से द्वेष रखता है।
व्याख्या: ईर्ष्या की यह प्रवृत्ति संसार में स्वाभाविक रूप से देखी जाती है कि जब कोई व्यक्ति किसी गुण या वस्तु से हीन होता है, तो वह उस गुण वाले संपन्न व्यक्ति से भीतर ही भीतर जलने लगता है। ययाति इसी हीनभावना जनित द्वेष को स्पष्ट कर रहे हैं।
श्लोक 10
निर्गुणो गुणवन्तं च पुत्रैतत्कलिलक्षणम्। विपरीतं च राजेन्द्र एतेषु कृतलक्षणम्।। (1-81-10)
हिंदी अनुवाद: हे पुत्र! गुणहीन व्यक्ति गुणवान् मनुष्य से द्वेष करता है—कलि (कलयुग या दुर्गुणों) के ये ही मुख्य लक्षण हैं। इसके विपरीत आचरण करने वाले लोग इनसे मुक्त होते हैं।
व्याख्या: यह श्लोक पिछले भाव को आगे बढ़ाता है कि जो व्यक्ति स्वयं गुणों से खाली होता है, वह गुणी जनों की प्रशंसा सह नहीं पाता और उनसे बैर बांध लेता है। ययाति अपने पुत्र को सचेत करते हैं कि ऐसे दुर्गुणों से बचना ही एक श्रेष्ठ शासक और मनुष्य का कर्तव्य है।
श्लोक 11
ब्राह्मणो वाथ वा राजा वैश्यो वा शूद्र एव वा। प्रशस्तेषु प्रसक्ताश्चेत्प्रशस्यन्ते यशस्विनः।। (1-81-11)
हिंदी अनुवाद: ब्राह्मण हो, क्षत्रिय (राजा) हो, वैश्य हो अथवा शूद्र ही क्यों न हो—यदि वे सभी उत्तम और प्रशंसनीय कर्मों में लगे रहते हैं, तो वे यश प्राप्त करते हैं और समाज में सम्मानित होते हैं।
व्याख्या: ययाति यहाँ वर्ण या जाति से ऊपर उठकर कर्म की महत्ता को स्थापित करते हैं। उनका स्पष्ट संदेश है कि मनुष्य अपनी जन्मजात जाति से नहीं, बल्कि अपने श्रेष्ठ और उत्तम कर्मों से ही यशस्वी और आदरणीय बनता है।
श्लोक 12
तस्मात्प्रशस्ते राजेन्द्र नरः सक्तमना भवेत्। अलोकज्ञा ह्यप्रशस्ता भ्रातरस्ते ह्यबुद्धयः।। (1-81-12)
हिंदी अनुवाद: इसलिए हे राजन्! मनुष्य को हमेशा उत्तम और कल्याणकारी कर्मों में ही अपना मन लगाना चाहिए। लोक-मर्यादा को न जानने वाले तुम्हारे वे भाई (या अन्य पुत्र) अज्ञानी और अप्रासंगिक (कमसमझ) हैं।
व्याख्या: ययाति अपने पुत्र को सलाह देते हैं कि समाज में जो मार्ग श्रेष्ठ, धर्मसम्मत और यश देने वाला हो, उसी का अनुसरण करना चाहिए। जो लोग लोक-व्यवहार और धर्म की मर्यादा को नहीं समझते, वे बुद्धिहीन माने जाते हैं।
श्लोक 13
अन्त्याधिपतयः सर्वे ह्यभवन्गुरुशासनात्। इन्द्र उवाच। त्वं हि धर्मविदो राजन्कत्थसे धर्मसुत्तमम्। कथयस्व पुनर्मेऽद्य लोकवृत्तान्तमुत्तमम्।। (1-81-13)
हिंदी अनुवाद: वे सभी सीमावर्ती प्रदेशों के राजा गुरु (पिता) के अनुशासन का पालन करते हुए ही हुए थे। इंद्र ने कहा— हे राजन्! तुम धर्म के ज्ञाता हो और उत्तम धर्म की बातें बड़ी खूबी से कहते हो। अब मुझे आज फिर से कोई उत्तम लोक-वृत्तान्त (जीवन का ज्ञान) सुनाओ।
व्याख्या: ययाति की बातें सुनकर देवराज इंद्र अत्यंत प्रसन्न होते हैं। वे ययाति की धर्मज्ञता की प्रशंसा करते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि वे सांसारिक जीवन और धर्म से जुड़े कुछ और गहरे उपदेश सुनाएं।
श्लोक 14
अक्रोधनः क्रोधनेभ्यो विशिष्ट- स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः। अमानुषेभ्यो मानुषाश्च प्रधाना विद्वांस्तथैवाविदुषः प्रधानः।। (1-81-14)
हिंदी अनुवाद: क्रोध न करने वाला व्यक्ति क्रोध करने वाले से श्रेष्ठ होता है। इसी प्रकार सहनशील (क्षमावान्) व्यक्ति असहनीय स्वभाव वाले से, मनुष्य योनि अन्य जीवों से और ज्ञानी पुरुष अज्ञानी से श्रेष्ठ माना गया है।
व्याख्या: ययाति जीवन के उच्च मूल्यों की तुलना करते हुए बताते हैं कि संयम और विवेक मनुष्य को साधारण जीवों से अलग और श्रेष्ठ बनाते हैं। जो व्यक्ति क्रोध पर नियंत्रण रखता है और सहिष्णुता अपनाता है, उसका व्यक्तित्व समाज में सबसे ऊंचा होता है।
श्लोक 15
आक्रुश्यमानो नाकोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः। आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति।। (1-81-15)
हिंदी अनुवाद: यदि कोई आपको अपशब्द कहे (गाली दे), तो आपको भी पलटकर उसे अपशब्द नहीं कहने चाहिए। सहनशीलता से उत्पन्न होने वाला वह संयम उस अपशब्द कहने वाले को ही जला देता है और उसका सारा पुण्य (सुकृत) सहन करने वाले को मिल जाता है।
व्याख्या: यह सहनशीलता (क्षमा) का सबसे बड़ा आध्यात्मिक रहस्य है। जब कोई अपमान करे और आप चुप रहकर उसे सह लेते हैं, तो वह अपमान करने वाला अपने कर्मों से स्वयं नष्ट होता है, और उसके संचित पुण्य स्वतः ही क्षमाशील व्यक्ति के खाते में आ जाते हैं।
श्लोक 16
नारुन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत। ययाऽस्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेद्रुशतीं पापलोक्याम्।। (1-81-16)
हिंदी अनुवाद: मनुष्य को कभी भी किसी के मर्म पर चोट करने वाला (अरुन्तुद), क्रूरता की बात कहने वाला तथा अपनी हीनता से दूसरों का अधिकार छीनने वाला नहीं होना चाहिए। जिससे सुनकर दूसरा व्यक्ति दुःखी हो या जिसे सुनकर मन में पीड़ा हो, ऐसी दुखद और पाप पैदा करने वाली वाणी कभी नहीं बोलनी चाहिए।
व्याख्या: वाणी की शुद्धता पर जोर देते हुए ययाति कहते हैं कि कड़वे वचन किसी के दिल को चीर सकते हैं। हमें ऐसी भाषा या शब्द कभी किसी के प्रति प्रयोग नहीं करने चाहिए जो किसी को अंदर तक आहत करें या पाप के भागी बनाएं।
श्लोक 17
अरुन्तुदं पुरुषं तीक्ष्णवाचं वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यन्। विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धां निर्ऋतिं वहन्तम्।। (1-81-17)
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य दूसरों के मर्म पर चोट करने वाली तीखी बातें कहता है और अपनी चुभने वाली वाणी रूपी कांटों से लोगों को प्रताड़ित करता है, उसे इंसानों में सबसे बड़ा अभागा (अलक्ष्मीवान्) और अपने मुख में अलक्ष्मी (दरिद्रता व विनाश) को धारण करने वाला समझना चाहिए।
व्याख्या: कड़वा और अपमानजनक बोलने वाले व्यक्ति का भाग्य और सुख उससे दूर भाग जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने शब्दों से अपने ही जीवन में दुर्भाग्य और अशांति को बुलावा देता है, अतः वाणी का संयम सर्वोपरी है।
श्लोक 18
सद्भिः पुरस्तादभिपूजितः स्या- त्सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षितः स्यात्। सदाऽसतामतिवादांस्तितिक्षे- सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्तः।। (1-81-18)
हिंदी अनुवाद: सज्जन पुरुषों द्वारा सामने जिसकी प्रशंसा की जाती है और पीठ पीछे जिनकी रक्षा की जाती है, तथा जो असज्जनों के बुरे वचनों को भी सहन कर लेता है, वही श्रेष्ठ आचरण वाला पुरुष संतों के मार्ग (सदाचार) को अपनाता है।
व्याख्या: एक आदर्श और कुलीन व्यक्ति का आचरण कैसा होना चाहिए, इसका वर्णन यहाँ है। उसे सत्पुरुषों का आदर और समर्थन मिलता है, तथा वह बुरे लोगों की कटु आलोचनाओं या तानों से विचलित हुए बिना अपनी गरिमा बनाए रखता है।
श्लोक 19
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि। परस्य ये मर्मसु संपतन्ति तान्पण्डितो नावसृजेत्परेषु।। (1-81-19)
हिंदी अनुवाद: मुख से ऐसे वाणी रूपी बाण निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य रात-दिन दुःखी रहता है। जो बाण दूसरों के मर्मस्थल पर जाकर लगते हैं, बुद्धिमान् पुरुष को कभी भी ऐसे वचनों का प्रयोग दूसरों पर नहीं करना चाहिए।
व्याख्या: शब्दों की तुलना तीखे बाणों से की गई है। शारीरिक घाव तो भर जाते हैं, लेकिन कड़वे वचनों द्वारा दिल पर लगे घाव उम्रभर टीस देते हैं। एक समझदार और ज्ञानी व्यक्ति कभी भी ऐसे आहत करने वाले शब्दों का प्रयोग नहीं करता।
श्लोक 20
नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते। दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक्।। (1-81-20)
हिंदी अनुवाद: तीनों लोकों में ऐसा कोई दूसरा वशीकरण (सम्मोहन या प्रेम पाने का साधन) नहीं है, जैसा कि सभी जीवों के प्रति दया, मैत्री भाव, दानशीलता और मधुर वाणी है।
व्याख्या: यह संसार में सबसे बड़ा सत्य है कि यदि आप किसी को भी अपना बनाना चाहते हैं, तो जादू-टोने या बल की नहीं, बल्कि प्रेम की आवश्यकता होती है। सबकी भलाई चाहना, सबके प्रति दया रखना, दिल से मित्रवत व्यवहार करना और मीठा बोलना—यही सबसे शक्तिशाली वशीकरण है जो सबका दिल जीत लेता है।
श्लोक 21
तस्मात्सान्त्वं सदा वाच्यं न वाच्यं परुषं क्वचित्। पूज्यान्संपूजयेद्दद्यान्न च याचेत्कदाचन।। (1-81-21)
हिंदी अनुवाद: इसलिए मनुष्य को हमेशा सांत्वना देने वाले (प्रेमी और शांत) वचन ही बोलने चाहिए, कभी भी कठोर शब्द नहीं बोलने चाहिए। पूजनीय लोगों का सत्कार करना चाहिए, दान देना चाहिए, किंतु किसी से कभी भी कुछ नहीं मांगना चाहिए।
व्याख्या: ययाति अपने उपदेश का सार बताते हुए निष्कर्ष देते हैं कि जीवन में हमेशा मीठी और ढांढस बंधाने वाली भाषा का प्रयोग करें। बड़ों का आदर करें, यथासंभव जरूरतमंदों को दान दें, लेकिन अपनी स्वाभिमान की रक्षा करते हुए कभी किसी के आगे हाथ न फैलाएं (याचिका न करें)।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि एकाशीतितमोऽध्यायः।। 81 ।।
