श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्व्यशीतितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि  संभवपर्वणि द्व्यशीतितमोऽध्यायः

श्लोक 1

इन्द्र उवाच। सर्वाणि कर्माणि समाप्य राजन् गृहं परित्यज्य वनं गतोऽसि। तत्त्वां पृच्छामि नहुषस्य पुत्र केनासि तुल्यस्तपसा ययाते।। (1-82-1)

हिंदी अनुवाद: इंद्र ने कहा— हे राजन्! नहुष के पुत्र ययाति! तुम अपने सभी गृहस्थाश्रम के कर्मों को समाप्त करके घर का त्याग कर वन में गए थे। इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ कि तपस्या में तुम्हारे समान कौन है? (अर्थात तुम्हारी तपस्या किसके बराबर है?)

व्याख्या: देवराज इंद्र ययाति की महान तपस्या और उनके द्वारा किए गए त्याग की प्रशंसा करते हुए उनसे उनके तप के समकक्ष और किसी के होने या न होने के संबंध में प्रश्न पूछते हैं। यह प्रसंग ययाति के भीतर आए सूक्ष्म अहंकार को परखने का एक माध्यम बनता है।

श्लोक 2

ययातिरुवाच। नाहं देवमनुष्येषु गन्धर्वेषु महर्षिषु। आत्मनस्तपसा तुल्यं कंचित्पश्यामि वासव।। (1-82-2)

हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे वासव (इंद्र)! मैं देवताओं, मनुष्यों, गंधर्वों तथा महर्षियों में भी अपने तप के समान किसी अन्य व्यक्ति को नहीं देखता हूँ।

व्याख्या: ययाति इस प्रश्न के उत्तर में अपने तप का अत्यधिक अहंकारयुक्त बयान दे देते हैं। अपनी कठिन तपस्या के प्रभाव में आकर वे यह मान बैठते हैं कि ब्रह्मांड में उनके जैसा तपस्वी कोई दूसरा नहीं है। अहंकार का यही क्षण उनके स्वर्ग से पतन का कारण बनता है।

श्लोक 3

इन्द्र उवाच। यदाऽवमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च अल्पीयसश्चाविदितप्रभावः। तस्माल्लोकास्त्वन्तवन्तस्तवे मे क्षीणे पुण्ये पतिताऽस्यद्य राजन्।। (1-82-3)

हिंदी अनुवाद: इंद्र ने कहा— हे राजन्! तुम अपने से श्रेष्ठ, समान और छोटे—सबकी अनभिज्ञता के कारण उपेक्षा (अपमान) कर चुके हो। इसी कारण तुम्हारे ये स्वर्ग लोक अंतवान (नष्ट होने वाले) हो गए हैं और तुम्हारे पुण्य क्षीण होने पर तुम आज स्वर्ग से नीचे गिराए जा रहे हो।

व्याख्या: इंद्र ययाति को उनके अहंकार का स्मरण कराते हैं। दूसरों को अपने से हीन समझना और उनका अनादर करना महान पुण्यों को भी मिट्टी में मिला देता है। ययाति के भीतर उत्पन्न इसी घमंड के कारण उनके पुण्य क्षीण हो गए और उन्हें देवलोक से नीचे गिरना पड़ा।

श्लोक 4

ययातिरुवाच। सुरर्षिगन्धर्वनरावमाना- त्क्षयं गता मे यदि शक्रलोकाः। इच्छाम्यहं सुरलोकाद्विहीनः सतां मध्ये पतितुं देवराज।। (1-82-4)

हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— हे देवराज! यदि सुरर्षियों, गंधर्वों और मनुष्यों का अनादर करने के कारण मेरे स्वर्ग लोक नष्ट हो गए हैं और मैं गिर रहा हूँ, तो मैं यह चाहता हूँ कि स्वर्ग से विहीन होकर भी कम से कम सज्जनों (संतों) के बीच गिरूँ।

व्याख्या: ययाति को अपनी भूल का आभास हो जाता है। यद्यपि वे स्वर्ग से नीचे गिर रहे हैं, तथापि उनकी श्रेष्ठता और सत्संग के प्रति प्रेम देखिए कि वे कामना करते हैं कि उनका पतन भले ही हो जाए, किंतु वे दुष्टों के बीच न गिरकर पुण्यात्माओं और संतों के समाज में गिरें।

श्लोक 5

इन्द्र उवाच। सतां सकाशे पतिताऽसि राजं- श्च्युतः प्रतिष्ठां यत्र लब्धासि भूयः। एतद्विदित्वा च पुनर्ययाते त्वं माऽवमंस्थाः सदृशः श्रेयसश्च।। (1-82-5)

हिंदी अनुवाद: इंद्र ने कहा— हे राजन्! तुम संत पुरुषों के समीप ही गिरे हो, जहाँ तुम्हें पुनः प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। इसलिए हे ययाति! यह सब जानकर अब कभी भी अपने समान या अपने से श्रेष्ठ लोगों का अनादर मत करना।

व्याख्या: इंद्र ययाति को सांत्वना और अंतिम उपदेश देते हैं कि उनका गिरना अंतरिक्ष में ऐसे संतों और राजाओं (जैसे अष्टक आदि) के बीच हुआ है, जो उनका उद्धार करेंगे। वे चेतावनी देते हैं कि भविष्य में कभी भी किसी भी परिस्थिति में अहंकारवश किसी का अपमान न करें।

श्लोक 6

वैशंपायन उवाच। ततः प्रहायामरराजजुष्टा- न्पुण्याँल्लोकान्पतमानं ययातिम्। संप्रेक्ष्य राजर्षिवरोऽष्टकस्त- मुवाच सद्धर्मविधानगोप्ता।। (1-82-6)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— इसके पश्चात, देवताओं द्वारा सेवित उन पवित्र स्वर्ग लोकों को छोड़कर नीचे गिरते हुए ययाति को देखकर, उत्तम धर्म के नियमों की रक्षा करने वाले श्रेष्ठ राजर्षि अष्टक ने उनसे कहा।

व्याख्या: यह उस घटना का वर्णन है जब ययाति स्वर्ग से नीचे उतरते हुए अंतरिक्ष में पहुँचे। वहाँ राजर्षि अष्टक (जो अपने धर्म और तप के लिए प्रसिद्ध थे) की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने ययाति को पहचानकर उनसे संवाद आरंभ किया।

श्लोक 7

अष्टक उवाच। कस्त्वं युवा वासवतुल्यरूपः स्वतेजसा दीप्यमानो यथाऽग्निः। पतस्युदीर्णाम्बुधरान्धकारा- त्खात्खेचराणां प्रवरो यथाऽर्कः।। (1-82-7)

हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— हे युवा पुरुष! देवराज इंद्र के समान रूप वाले, अग्नि की तरह अपने ही तेज से प्रदीप्त होने वाले और बादलों के अंधकार को चीरकर आकाश से नीचे गिरते हुए तुम कौन हो, जो आकाश में विचरने वालों में सूर्य के समान श्रेष्ठ प्रतीत हो रहे हो?

व्याख्या: राजर्षि अष्टक अंतरिक्ष में नीचे गिर रहे ययाति के दिव्य तेज और उनकी भव्य आकृति को देखकर अचंभित हो जाते हैं। वे नहीं जानते कि यह कौन महान आत्मा है, इसलिए वे उनका परिचय और यहाँ गिरने का कारण पूछते हैं।

श्लोक 8

दृष्ट्वा च त्वां सूर्यपथात्पतन्तं वैश्वानरार्कद्युतिमप्रमेयम्। किं नु स्विदेतत्पततीति सर्वे वितर्कयन्तः परिमोहिताः स्मः।। (1-82-8)

हिंदी अनुवाद: अग्नि और सूर्य के समान अप्रमेय कांति वाले आपको सूर्य के मार्ग से नीचे गिरते हुए देखकर, हम सब 'यह क्या गिर रहा है?' ऐसा विचार करते हुए पूरी तरह भ्रमित हो गए हैं।

व्याख्या: अष्टक बताते हैं कि ययाति के शरीर की चमक इतनी तीव्र है कि वह सूर्य और अग्नि के समान लग रही है। उनके इस प्रकार अचानक अंतरिक्ष से नीचे आने के दृश्य को देखकर अष्टक और उनके साथ के अन्य राजा संशय में पड़ गए हैं।

श्लोक 9

दृष्ट्वा च त्वां धिष्ठितं देवमार्गे शक्रार्कविष्णुप्रतिमप्रभावम्। अभ्युद्गतास्त्वां वयमद्य सर्वे तत्त्वं प्रपाते तव जिज्ञासमानाः।। (1-82-9)

हिंदी अनुवाद: इंद्र, सूर्य और विष्णु के समान प्रभाव वाले आपको देवमार्ग (आकाश) पर स्थित देखकर, हम सब आज आपके इस पतन के मार्ग में सत्य जानने की इच्छा से आपकी ओर आए हैं।

व्याख्या: राजर्षि अष्टक और उनके साथी राजा यह जानने के लिए उत्सुक हैं कि यह देवता जैसी शक्ति और तेज वाला व्यक्ति कौन है और इसकी इस दुर्दशा या पतन का वास्तविक कारण क्या है। इसी जिज्ञासावश वे ययाति के पास पहुंचे हैं।

श्लोक 10

न चापि त्वां धृष्णुमः प्रष्टुमग्रे न च त्वमस्मान्पृच्छसि ये वयं स्मः। तत्त्वां पृच्छामि स्पृहणीयरूप कस्य त्वं वा किंनिमित्तं त्वमागाः।। (1-82-10)

हिंदी अनुवाद: न तो हम साहस करके आपसे आगे बढ़कर कुछ पूछ पा रहे हैं और न ही आप हमसे पूछ रहे हैं कि हम कौन हैं। इसलिए हे स्पृहणीय (मनोहर) रूप वाले! मैं आपसे पूछता हूँ कि आप किसके पुत्र हैं और किस कारण से यहाँ आए हैं?

व्याख्या: अष्टक ययाति के अलोकौकिक तेज के कारण उनके सामने झिझक का अनुभव कर रहे हैं, किंतु अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए वे अंततः आदरपूर्वक उनका परिचय और उनके यहाँ आने का प्रयोजन पूछ लेते हैं।

श्लोक 11

भयं तु ते व्येतु विषादमोहौ त्यजाशु चैवेन्द्रसमप्रभाव। त्वां वर्तमानं हि सतां सकाशे नालं प्रसोढुं बलहाऽपि शक्रः।। (1-82-11)

हिंदी अनुवाद: हे इंद्र के समान प्रभाव वाले! अब आप अपना भय, विषाद और मोह शीघ्र ही त्याग दीजिए। संतों के बीच उपस्थित हुए आपको देखकर, वज्र को धारण करने वाले देवराज इंद्र भी आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकते (आपका सामना करने में समर्थ नहीं हैं)।

व्याख्या: अष्टक ययाति को ढांढस बंधाते हैं कि उन्हें अब दुखी या भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। चूँकि वे अब सत्पुरुषों (संतों और धर्मिष्ठ राजाओं) के बीच आ चुके हैं, इसलिए यहाँ उन्हें पूर्ण सुरक्षा और आदर मिलेगा।

श्लोक 12

सन्तः प्रतिष्ठा हि सुखच्युतानां सतां सदैवामरराजकल्प। ते सङ्गताः स्थावरजङ्गमेशाः प्रतिष्ठितस्त्वं सदृशेषु सत्सु।। (1-82-12)

हिंदी अनुवाद: हे अमरराज के समान कांति वाले! सुख से भ्रष्ट हुए लोगों के लिए संत लोग ही हमेशा सबसे बड़ी प्रतिष्ठा (आश्रय) होते हैं। आज आप इन स्थावर-जंगम के स्वामियों रूपी संतों के साथ मिल गए हैं, और अब आप अपने ही जैसे श्रेष्ठ सत्पुरुषों के बीच प्रतिष्ठित हो चुके हैं।

व्याख्या: यहाँ अष्टक ययाति को यह समझाते हैं कि जीवन में जब कभी किसी का पतन होता है, तो सत्संग और सज्जनों का सानिध्य ही उसका सबसे बड़ा संबल बनता है। ययाति यद्यपि स्वर्ग से गिरे हैं, परंतु वे अच्छे लोगों के बीच गिरे हैं, जो उनका पूर्ण सम्मान करेंगे।

श्लोक 13

प्रभुरग्निः प्रतपने भूमिरावपने प्रभुः। प्रभुः सूर्यः प्रकाशित्वे सतां चाभ्यागतः प्रभुः।। (1-82-13)

हिंदी अनुवाद: तपाने में अग्नि प्रभु (समर्थ) है, वस्तुओं को धारण करने में पृथ्वी समर्थ है, प्रकाश फैलाने में सूर्य समर्थ है, और इसी प्रकार आए हुए अतिथियों (संतों) की रक्षा करने में सत्पुरुष हमेशा प्रभु (समर्थ) होते हैं।

व्याख्या: प्रकृति के विभिन्न तत्वों के उदाहरण देते हुए अष्टक यह स्पष्ट करते हैं कि जिस प्रकार अग्नि, पृथ्वी और सूर्य अपने-अपने गुणों में परिपूर्ण और समर्थ हैं, उसी प्रकार सत्पुरुष भी शरण में आए हुए या अपने बीच उपस्थित अतिथि की रक्षा और सत्कार करने में पूरी तरह समर्थ होते हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि

संभवपर्वणि द्व्यशीतितमोऽध्यायः।। 82 ।।

संभवपर्वणि एकाशीतितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि त्र्यशीतितमोऽध्यायः