श्लोक 1
अष्टक उवाच। कतरस्त्वनयोः पूर्वं देवानामेति साम्यताम्। उभयोर्धावतो राजन्सूर्याचन्द्रमसोरिव।। (1-86-1)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— हे राजन्! जैसे सूर्य और चंद्रमा दोनों आकाश में चलते हैं, उसी प्रकार गृहस्थ और मुनि (या इनमें से दो अलग-अलग मार्गों पर चलने वाले साधक)—इन दोनों में से कौन पहले देवताओं की साम्यता (समानता या देवत्व) को प्राप्त होता है?
व्याख्या: अष्टक यह जानना चाहते हैं कि गृहस्थ आश्रम का पालन करते हुए धर्म पर चलने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ है अथवा विरक्त मुनि? दोनों में से कौन सा मार्ग तेजी से ईश्वर या देवत्व तक पहुँचाता है।
श्लोक 2
ययातिरुवाच। अनिकेतो गृहस्थेषु कामवृत्तेषु संयतः। ग्राम एव वसन्भिक्षुस्तयोः पूर्वतरं गतः।। (1-86-2)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— जो गृहस्थों के बीच रहते हुए भी बिना घर-आवास (अनकेत) के रहता है, काम-कामनाओं से दूर और पूरी तरह संयमी है, तथा गाँव में रहते हुए भी जो भिक्षु (विरक्त) के समान आचरण करता है—इन दोनों में से वह भिक्षु (संसार में रहते हुए भी अनासक्त रहने वाला) सबसे पहले देवत्व को प्राप्त होता है।
व्याख्या: शरीर से चाहे कोई गृहस्थ हो या समाज के बीच रहता हो, किंतु यदि उसका मन आसक्तियों से मुक्त और पूरी तरह संयमी है, तो वह सबसे तीव्र गति से आध्यात्मिक सिद्धि और मुक्ति को प्राप्त करता है।
श्लोक 3
अप्राप्य दीर्घमायुस्तु यः प्राप्तो विकृतिं चरेत्। तप्यते यदि तत्कृत्वा चरेत्सोऽन्यत्तपस्ततः।। (1-86-3)
हिंदी अनुवाद: यदि कोई मनुष्य अपनी पूरी लंबी आयु को प्राप्त किए बिना ही किसी विकार (रोग, पतन या वासना) में फंसकर आचरण करने लगे, और बाद में अपने उस कृत्य के लिए पश्चाताप करे, तो उसे उस पाप से छूटने के लिए दोबारा अन्य तपस्या करनी चाहिए।
व्याख्या: जीवन में यदि कभी अनजाने में कोई गलती या पतन हो जाए, तो शोक में डूबने के बजाय प्रायश्चित और पुनश्च तपस्या के माध्यम से अपने आचरण को फिर से शुद्ध करना ही बुद्धिमत्ता है।
श्लोक 4
पापानां कर्मणां नित्यं बिभीयाद्यस्तु मानवः। सुखमप्याचरन्नित्यं सोऽत्यन्तं सुखमेधते।। (1-86-4)
हिंदी अनुवाद: जो मनुष्य हमेशा पाप कर्मों से डरता रहता है और सदा धर्मयुक्त व सुखद आचरण करता है, वह इस संसार में अत्यंत सुख और समृद्धि को प्राप्त करता है।
व्याख्या: पाप से भय और सदाचार से प्रेम ही मनुष्य के जीवन को सुखी और सुरक्षित बनाता है। जो व्यक्ति नैतिकता का पालन करता है, उसे अंततः मानसिक और भौतिक सुख दोनों मिलते हैं।
श्लोक 5
यद्वै नृशंसं तदसत्यमाहु- र्यः सेवते धर्ममनर्थबुद्धिः। अस्वोऽप्यनीशश्च तथैव राजं- स्तदार्जवं स समाधिस्तदार्यम्।। (1-86-5)
हिंदी अनुवाद: जो कार्य क्रूर या हिंसक है, उसे ही असत्य (पाप) कहा गया है। जो मनुष्य अनर्थकारी बुद्धि से धर्म का सेवन करता है, वह दीन और असमर्थ माना जाता है। हे राजन्! सरलता (ार्जव), चित्त की एकाग्रता (समाधि) और श्रेष्ठ आचरण (आर्यता) ही सबसे बड़ा धर्म है।
व्याख्या: क्रूरता और कपटपूर्ण धर्म का कोई मूल्य नहीं है। जीवन में सादगी, मन की पवित्रता, सच्चाई और परोपकार ही श्रेष्ठ आर्य संस्कृति और सच्ची साधना के मूल आधार हैं।
श्लोक 6
अष्टक उवाच। केनासि हूतः प्रहितोऽसि राज- न्युवा स्रग्वी दर्शनीयः सुवर्चाः। कुतऋ आयातः कतरस्यां दिशि त्व- मुताहोस्वित्पार्थिवं स्थानमस्ति।। (1-86-6)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— हे राजन्! आपको किसने बुलाया है और यहाँ किसने भेजा है? आप माला पहने हुए, अत्यंत सुंदर और देदीप्यमान तेज से युक्त हैं। आप कहाँ से आए हैं, किस दिशा से पधारे हैं, अथवा क्या आपका कोई पृथ्वी पर अपना स्थान है?
व्याख्या: अष्टक अपने नाना ययाति के दिव्य स्वरूप, माला और उनके अद्भुत तेज को देखकर आश्चर्यचकित होते हैं और पूछते हैं कि वे अचानक इस रूप में कहाँ से प्रकट हुए हैं।
श्लोक 7-8
ययातिरुवाच। त्वरन्ति मां लोकपा ब्राह्मणा ये।। (1-86-7f) सतां सकाशे तु वृतः प्रपात- स्ते सङ्गता गुणवन्तश्च सर्वे। शक्राच्च लब्धो हि वरो मयैष पतिष्यता भूमितलं नरेन्द्र।। (1-86-8)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— ये सभी गुणवान और श्रेष्ठ ब्राह्मण लोकपाल (संतजन) मुझे अपनी ओर खींच रहे हैं। जब मैं भूतल पर गिर रहा था, तभी मुझे देवराज इंद्र से यह वरदान प्राप्त हुआ था कि मेरा पतन संतों और सत्पुरुषों के बीच ही हो।
व्याख्या: ययाति बताते हैं कि उनका स्वर्ग से गिरना भले ही उनके पुण्यों के क्षीण होने के कारण हुआ था, किंतु इंद्र के वरदान और उनके अपने सत्कर्मों के प्रभाव के कारण वे सीधे संतों और ज्ञानियों की इस यज्ञ-भूमि पर गिरे हैं।
श्लोक 9
अष्टक उवाच। पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं यदि लोकाः पार्थिव सन्ति मेऽत्र। यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि स्थिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये।। (1-86-9)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने प्रार्थना की— हे राजन्! आप नीचे मत गिरिए! यदि मेरे द्वारा अर्जित किए गए कोई भी लोक (पुण्य फल) यहाँ पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में या स्वर्ग में स्थित हैं—और चूँकि मैं आपको धर्म और आत्मा का मर्म जानने वाला (क्षेत्रज्ञ) मानता हूँ—तो वे सब मैं आपको अर्पित करता हूँ।
व्याख्या: अष्टक अपने महान नाना के प्रति आदर और श्रद्धा दिखाते हुए कहते हैं कि वे अपने सारे पुण्य फल उन्हें सौंपने को तैयार हैं ताकि ययाति का पतन न हो और वे संकट से मुक्त हो जाएं।
श्लोक 10
ययातिरुवाच। यावत्पृथिव्यां विहितं गवाश्वं सहारण्यैः पशुभिः पार्वतैश्च। तावल्लोका दिवि ते संस्थिता वै तथा विजानीहि नरेन्द्रसिंह।। (1-86-10)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे नृसिंह! पृथ्वी पर जितने भी गाय, घोड़े, वन, पशु और पर्वत हैं, समझ लो कि तुम्हारे उतने ही अनंत और विशाल लोक स्वर्ग में सुरक्षित रूप से स्थापित हैं।
व्याख्या: ययाति अष्टक के महान तप और उनके द्वारा किए गए विशाल यज्ञों व पुण्यों की प्रशंसा करते हुए बताते हैं कि अष्टक ने अपने जीवन में इतने महान पुण्य कमाए हैं कि देवलोक में उनके लिए असीम स्थान सुरक्षित हैं।
श्लोक 11
अष्टक उवाच। तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति। यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता- स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः।। (1-86-11)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने कहा— हे राजेन्द्र! स्वर्ग में, अंतरिक्ष में या जहाँ कहीं भी मेरे वे लोक स्थित हैं, वे सब मैं आपको देता हूँ। आप नीचे मत गिरिए! मोह का त्याग करके तुरंत उन पर अपनी कदम रखिए (उन लोकों को ग्रहण कीजिए)।
व्याख्या: अष्टक पूरी तरह निस्वार्थ भाव से अपने सभी पुण्यों का फल अपने नाना ययाति को दान करना चाहते हैं ताकि उनका पतन न हो, जो उनके पारिवारिक प्रेम और महान त्याग का प्रतीक है।
श्लोक 12-13
ययातिरुवाच। नास्मद्विधोऽब्राह्मणो ब्रह्मविच्च प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य। यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य- स्तथाऽददं पूर्वमहं नरेन्द्र।। (1-86-12) नाब्राह्मणः कृपणो जातु जीवे- द्या चाप्यस्याऽब्राह्मणी वीरपत्नी। सोऽहं नैवाकृतपूर्वं चरेयं विधित्समानः किमु तत्र साधुः।। (1-86-13)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने दृढ़ता से मना करते हुए कहा— हे राजमुख्य! मेरे जैसा ब्रह्मवेत्ता और क्षत्रिय राजा कभी भी दूसरों से प्रतिग्र्रह (दान लेना) स्वीकार नहीं कर सकता। मैंने तो हमेशा अपने जीवन में ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को दान ही दिया है, कभी किसी से लिया नहीं है। कोई भी ब्राह्मण या दीन व्यक्ति कभी दूसरों के दान पर जीवित न रहे—ऐसी मर्यादा मैंने हमेशा रखी है। भला मैं अपने कुल की इस परंपरा के विरुद्ध जाकर दान कैसे ले सकता हूँ?
व्याख्या: ययाति अपनी राजसी मर्यादा और धर्म का पालन करते हुए अष्टक का पुण्य दान लेने से इंकार कर देते हैं। उनका मानना है कि राजा का धर्म हमेशा देना (दान करना) है, लेना नहीं, चाहे कितनी भी विपत्ति क्यों न आ जाए।
श्लोक 14
प्रतर्दन उवाच। पृच्छामि त्वां स्पृहणीय रूप प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोकाः। यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये।। (1-86-14)
हिंदी अनुवाद: प्रतर्दन ने कहा— हे मनमोहक रूप वाले राजन्! मैं प्रतर्दन आपसे पूछता हूँ। यदि अंतरिक्ष में या स्वर्ग में मेरे भी कुछ लोक (पुण्य) संचित हैं—और चूँकि मैं आपको धर्म का मर्मज्ञ मानता हूँ—तो आप मेरे उन लोकों को ग्रहण करें।
व्याख्या: ययाति के त्याग और उच्च चरित्र को देखकर वहाँ उपस्थित एक अन्य महान राजा, प्रतर्दन भी आगे आते हैं और अष्टक की तरह अपने पुण्य फल ययाति को अर्पित करने की इच्छा व्यक्त करते हैं।
श्लोक 15
ययातिरुवाच। सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र अप्येकैकः सप्तसप्ताप्यहानि। मधुच्युतो घृतपृक्ता विशोका- स्ते नान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति।। (1-86-15)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे नरेन्द्र! तुम्हारे द्वारा अर्जित किए गए बहुत से ऐसे लोक हैं, जिनमें से प्रत्येक लोक सात-सात दिनों तक (असीम काल तक) अमृत रूपी मधु और घृत से सिंचित, शोक-रहित और अंतहीन रूप में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
व्याख्या: ययाति प्रतर्दन के महान कर्मों और पुण्यों की सराहना करते हुए बताते हैं कि उनके द्वारा किए गए सत्कर्मों के फलस्वरूप देवलोक में उनके लिए अद्भुत और सुखद स्थान सुरक्षित हैं।
श्लोक 16
प्रतर्दन उवाच। तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते भवन्तु। यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता- स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोहः।। (1-86-16)
हिंदी अनुवाद: प्रतर्दन ने कहा— हे राजन्! स्वर्ग या अंतरिक्ष में जो मेरे लोक हैं, वे सब मैं आपको दान करता हूँ। वे आपके ही हों! आप नीचे मत गिरिए और मोह छोड़कर तुरंत उन लोकों पर अधिकार कीजिए।
व्याख्या: प्रतर्दन भी अष्टक की तरह पूरी उदारता और आदर के साथ अपने सारे पुण्य फल ययाति को देने की जिद करते हैं ताकि ययाति का पतन टल सके।
श्लोक 17-18
ययातिरुवाच। न तुल्यतेजाः सुकृतं कामयेत योगक्षेमं पार्थिव पार्थिवः सन्। दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां- श्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा।। (1-86-17) धर्म्यं मार्गं यतमानो यशस्यं कुर्यान्नृपो धर्ममवेक्षमाणः। न मद्विधो धर्मबुद्धिः प्रजान- न्कुर्यादेवं कृपणं मां यथाऽत्थ।। (1-86-18)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने पुनः समझाया— अपने समान तेज वाले दूसरे राजा का पुण्य फल एक राजा होकर कभी नहीं लेना चाहिए। दैव के विधान से संकट आने पर भी कोई विद्वान और धर्मज्ञ राजा कभी किसी नीच या अनुचित मार्ग का आचरण नहीं करता। राजा को हमेशा धर्म, यश और न्याय के मार्ग पर चलते हुए ही कर्म करना चाहिए। मेरे जैसी धर्म की समझ रखने वाला व्यक्ति कभी भी इस प्रकार दीन और लालची बनकर दूसरों के पुण्य नहीं ले सकता।
व्याख्या: ययाति अपने राजधर्म और आत्मसम्मान पर अटल रहते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि संकट के समय भी दूसरों के पुण्यार्जित फल को भीख की तरह लेना एक सच्चे राजा के लिए वर्जित और शोभा के विरुद्ध है।
श्लोक 19-21
कुर्यादपूर्वं न कृतं यदन्यै- र्विधित्समानः किमु तत्र साधु। धर्माधर्मौ सुविनिश्चित्य सम्य- क्कार्याकार्येष्वप्रमत्तश्चरेद्यः।। (1-86-19) स वै धीमान्सत्यसन्धः कृतात्मा राजा भवेल्लोकपालो महिम्ना। यदा भवेत्संशयो धर्मकार्ये कामार्थौ वा यत्र विन्दन्ति सम्यक्।। (1-86-20) कार्यं तत्र प्रथमं धर्मकार्यं यन्नो विरुध्यादर्थकामौ स धर्मः (1-86-21)
हिंदी अनुवाद: जो पुरुष ऐसा नया और अनुचित आचरण करता है जिसे पहले कभी किसी सत्पुरुष ने न किया हो, वह भला साधु कैसे कहला सकता है? जो मनुष्य धर्म और अधर्म को अच्छी तरह समझकर, करने योग्य और न करने योग्य कार्यों में हमेशा सावधान रहता है, वही सच्चा बुद्धिमान, सत्यप्रतिज्ञा, पवित्र आत्मा और अपने महिमामय प्रभाव से लोकपाल के समान राजा बनता है। जीवन में जब कभी धर्म, अर्थ या काम के निर्णय को लेकर संशय उत्पन्न हो जाए, तब सबसे पहले धर्म के कार्य को ही प्राथमिकता देनी चाहिए; और ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे अर्थ और काम का धर्म के साथ कोई विरोध न हो—वही वास्तविक धर्म है।
व्याख्या: ययाति अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपदेश में राजाओं को राजधर्म, नैतिकता और निर्णय लेने के सही सिद्धांतों की सीख देते हैं। वे कहते हैं कि जीवन में व्यक्तिगत इच्छाओं (काम) या धन (अर्थ) से भी ऊपर हमेशा धर्म और न्याय को रखना चाहिए, क्योंकि यही राजा और मनुष्य दोनों के जीवन की सबसे बड़ी सफलता है।
वैशंपायन उवाच।
ब्रुवाणमेवं नृपतिं ययातिं नृपोत्तमो वसुमानब्रवीत्तम्।। (1-86-21)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— इस प्रकार उपदेश दे रहे राजा ययाति से तब उत्तम राजा वसुमाने ने पुनः निवेदन किया।
व्याख्या: ययाति के इस महान और दार्शनिक उपदेश को सुनकर वहाँ उपस्थित अन्य राजा वसुमान उनके प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं और संवाद आगे बढ़ता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि षडशीतितमोऽध्यायः।। 86 ।।
