श्लोक 1
वसुमानुवाच। पृच्छामि त्वां वसुमानौषदश्वि- र्यद्यस्ति लोको दिवि मे नरेन्द्र। यद्यन्तरिक्षे प्रथितो महात्मन् क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये।। (1-87-1)
हिंदी अनुवाद: वसुमान ने कहा— हे महात्मन्! मैं उषीनर पुत्र वसुमान आपसे पूछता हूँ। यदि स्वर्ग में या अंतरिक्ष में मेरे द्वारा अर्जित किए गए कोई लोक प्रसिद्ध हैं—चूँकि मैं आपको धर्म और आत्मा का मर्म जानने वाला (क्षेत्रज्ञ) मानता हूँ—तो आप मुझे बताइए।
व्याख्या: राजा वसुमान भी अष्टक और प्रतर्दन की तरह ययाति के समक्ष अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं और जानना चाहते हैं कि उनके अपने सत्कर्मों से स्वर्ग या अंतरिक्ष में कौन-से लोक सुरक्षित हैं।
श्लोक 2
ययातिरुवाच। यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च यत्तेजसा तपते भानुमांश्च। लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै तेनान्तवन्तः प्रतिपालयन्ति।। (1-87-2)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— अंतरिक्ष, पृथ्वी, दिशाएँ और सूर्य जिस प्रकार अपने तेज से पूरी दुनिया को तपाते हैं, उतने ही विशाल और अनंत लोक स्वर्ग में तुम्हारे लिए स्थापित हैं और वे अंतहीन रूप में तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं।
व्याख्या: ययाति वसुमान के महान पुण्यों और तपस्या की सराहना करते हुए बताते हैं कि उनके द्वारा किए गए कर्मों का फल अत्यंत व्यापक और महान है, जो देवलोक में उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।
श्लोक 3
वसुमानुवाच। तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु। क्रीणीष्वैतांस्तृणकेनापि राज- न्प्रतिग्रहस्ते यदि धीमन्प्रदुष्टः।। (1-87-3)
हिंदी अनुवाद: वसुमान ने कहा— हे राजन्! अंतरिक्ष और स्वर्ग में जो मेरे लोक हैं, वे सब मैं आपको दान करता हूँ। आप नीचे मत गिरिए! यदि आपके लिए प्रतिग्रह (दान लेना) लेना पाप या दूषित माना जाता है, तो आप इन्हें एक तिनके के मूल्य पर ही मुझसे खरीद लीजिए (ताकि विनिमय हो जाए)।
व्याख्या: वसुमान ययाति के प्रति अपने अगाध प्रेम और सम्मान के कारण अपनी ओर से एक अनोखा उपाय सुझाते हैं कि यदि दान लेना वर्जित है, तो वे नाममात्र के मूल्य (एक तिनके) पर अपने सारे लोक उन्हें बेचकर उनका पतन रोक सकते हैं।
श्लोक 4
ययातिरुवाच। न मिथ्याऽहं विक्रयं वै स्मरामि वृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमानः। कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै- र्विधित्समानः किमु तत्र साधुः।। (1-87-4)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— मैं जीवन में कभी भी किसी झूठे विक्रय या धोखे को नहीं जानता। मैंने कभी किसी बालक से भी शंकायुक्त होकर कोई वस्तु मुफ्त में ग्रहण नहीं की। जो कर्म पहले कभी किसी सत्पुरुष ने नहीं किए, ऐसा अनुचित कार्य मैं कैसे कर सकता हूँ? भला उसमें क्या साधुता (भलाई) हो सकती है?
व्याख्या: ययाति अपनी सत्यनिष्ठा और धर्मपरायणता पर पूरी तरह अटल रहते हैं। वे तिनके के मूल्य पर भी इस प्रकार के क्रय-विक्रय को अनुचित मानते हैं, क्योंकि यह राजधर्म और सत्य की मर्यादा के विरुद्ध है।
श्लोक 5
वसुमानुवाच। तांस्त्वं लोकान्प्रतिपद्यस्व राज- न्मया दत्तान्यदि नेष्टः क्रयस्ते। अहं न तान्वै प्रतिगन्ता नरेन्द्र सर्वे लोकास्तव ते वै भवन्तु।। (1-87-5)
हिंदी अनुवाद: वसुमान ने कहा— हे राजन्! यदि आपको यह क्रय-विक्रय स्वीकार नहीं है, तो मेरे द्वारा दिए गए उन लोकों को आप ऐसे ही ग्रहण कर लीजिए। मैं उन लोकों को वापस लेने वाला नहीं हूँ; वे सभी लोक अब आपके ही हों!
व्याख्या: वसुमान अपनी जिद और श्रद्धा पर कायम रहते हुए कहते हैं कि वे अपने लोक पहले ही दान कर चुके हैं, इसलिए वे उन्हें वापस नहीं लेंगे। ययाति को उन्हें हर हाल में स्वीकार करना चाहिए।
श्लोक 6
शिबिरुवाच। पृच्छामि त्वां शिबिरौशीनरोऽहं ममापि लोका यदि सन्तीह तात। यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिताः क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये।। (1-87-6)
हिंदी अनुवाद: उशीनर पुत्र राजा शिबि ने कहा— हे तात! मैं शिबि आपसे पूछता हूँ। यदि अंतरिक्ष में या स्वर्ग में मेरे भी कुछ लोक सुरक्षित हैं—और चूँकि मैं आपको धर्म का मर्मज्ञ मानता हूँ—तो आप मेरे उन लोकों के बारे में मुझे बताइए।
व्याख्या: अपने महान त्याग और दानशीलता के लिए प्रसिद्ध राजा शिबि भी अब आगे आते हैं और ययाति से अपने पुण्यों और लोकों के विषय में जिज्ञासा प्रकट करते हैं।
श्लोक 7
ययातिरुवाच। यत्त्वं वाचा हृदयेनापि साधू- न्परीप्समानान्नावमंस्था नरेन्द्र। तेनानन्ता दिवि लोकाः श्रितास्ते विद्युद्रूपाः स्वनवन्तो महान्तः।। (1-87-7)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे नरेन्द्र! चूँकि तुमने वाणी और हृदय से कभी भी शरण में आए हुए या याचक संतों का कभी अनादर नहीं किया, इसलिए तुम्हारे लिए स्वर्ग में बिजली के समान चमकने वाले, गूँजने वाले और अनंत महान लोक सुरक्षित हैं।
व्याख्या: राजा शिबि के अद्वितीय शरण-रक्षण और दानशीलता के गुणों की प्रशंसा करते हुए ययाति बताते हैं कि उनके महान कर्मों के कारण देवलोक में उनके लिए दिव्य और असीम स्थान बने हुए हैं।
श्लोक 8
शिबिरुवाच। तांस्त्वं लोकान्प्रतिपद्यस्व राज- न्मया दत्तान्यदि नेष्टः क्रयस्ते। न चाहं तान्प्रतिपत्स्ये ह दत्त्वा यत्र गत्वा नानुशोचन्ति धीराः।। (1-87-8)
हिंदी अनुवाद: शिबि ने कहा— हे राजन्! यदि आपको क्रय स्वीकार नहीं है, तो मेरे दिए हुए उन लोकों को आप ही प्राप्त कीजिए। एक बार दान देने के बाद मैं उन्हें वापस नहीं लूँगा। धीर पुरुष जो वस्तु दान कर देते हैं, उसके लिए कभी शोक नहीं करते।
व्याख्या: दानवीर शिबि अपनी दान की हुई वस्तु को वापस न लेने के अपने दृढ़ व्रत का पालन करते हुए ययाति से आग्रह करते हैं कि वे उनके लोक चुपचाप स्वीकार कर लें।
श्लोक 9
ययातिरुवाच। यथा त्वमिन्द्रप्रतिमप्रभाव- स्ते चाप्यनन्ता नरदेव लोकाः। तथाऽद्य लोके न रमेऽन्यदत्ते तस्माच्छिबे नाभिनन्दामि दायम्।। (1-87-9)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— हे शिबि! जिस प्रकार इंद्र के समान तुम्हारा प्रभाव और तुम्हारे अनंत लोक महान हैं, उसी प्रकार मैं इस समय दूसरों के द्वारा दिए गए दान में रमण करना नहीं चाहता। इसीलिए हे शिबि! मैं तुम्हारे इस उपहार (दान) को स्वीकार नहीं कर रहा हूँ।
व्याख्या: ययाति अपनी आत्म-मर्यादा और क्षत्रिय तेज का परिचय देते हुए शिबि का दान भी यह कहकर ठुकरा देते हैं कि वे किसी और के दान के सहारे अपना पतन नहीं बचाएंगे।
श्लोक 10
अष्टक उवाच। न चेदेकैकशो राजँल्लोकान्नः प्रतिनन्दसि। सर्वे प्रदाय भवते गन्तारो नरकं वयम्।। (1-87-10)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने कहा— हे राजन्! यदि आप हम सबके द्वारा अलग-अलग दिए जा रहे इन लोकों को स्वीकार नहीं करेंगे, तो हम सब अपने-अपने लोक आपको देकर खुद नरक की ओर चले जाएंगे (क्योंकि हम आपको इस तरह गिरते हुए नहीं देख सकते)।
व्याख्या: राजर्षि अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान और शिबि—सभी राजा अपने पारिवारिक और नैतिक प्रेम के वश में होकर यह जिद करते हैं कि यदि ययाति उनके पुण्य स्वीकार नहीं करेंगे, तो वे सब भी उनके साथ नरक जाने को तैयार हैं।
श्लोक 11
ययातिरुवाच। यदर्होऽहं तद्यतध्वं सन्तः सत्याभिनन्दिनः। अहं तन्नाभिजानामि यत्कृतं न मया पुरा।। (1-87-11)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— हे सत्य का अभिनंदन करने वाले संतो! तुम लोग वही प्रयास करो जिसके मैं योग्य हूँ। मैं ऐसा कोई भी पुण्य या कर्म स्वीकार करना नहीं जानता, जो मैंने अपने जीवन में पहले कभी स्वयं न किया हो।
व्याख्या: ययाति का यह कथन उनके नैतिक चरित्र का सबसे बड़ा प्रमाण है। वे बिना मेहनत या बिना अपने कर्म के किसी और का पुण्य फल लेकर धर्म के विरुद्ध नहीं जाना चाहते।
श्लोक 12
अष्टक उवाच। कस्यैते प्रतिदृश्यन्ते रथाः पञ्च हिरण्मयाः। यानारुह्य नरो लोकानभिवाञ्छति शाश्वतान्।। (1-87-12)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने पूछा— फिर ये सोने के बने हुए पाँच रथ किसके दिखाई दे रहे हैं, जिन पर सवार होकर मनुष्य शाश्वत लोकों की इच्छा रखता है (या जिन पर चढ़कर दिव्य यात्रा की जाती है)?
व्याख्या: अचानक आकाश में प्रकट हुए पाँच दिव्य स्वर्ण रथों को देखकर अष्टक प्रश्न करते हैं कि ये रथ किसके लिए आए हैं और इनका क्या प्रयोजन है।
श्लोक 13
ययातिरुवाच। युष्मानेते वहिष्यन्ति रथाः पञ्च हिरण्मयाः। उच्चैः सन्तः प्रकाशन्ते ज्वलन्तोऽग्निशिखा इव।। (1-87-13)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने उत्तर दिया— ये पाँचों स्वर्ण रथ तुम सबको (अष्टक, प्रतर्दन, वसुमान, शिबि और स्वयं ययाति को) लेकर जाने वाले हैं। अग्नि की शिखाओं के समान प्रज्वलित होते हुए ये ऊंचे रथ बहुत अधिक प्रकाशित हो रहे हैं।
व्याख्या: ययाति बताते हैं कि सभी राजाओं के महान त्याग, सत्यनिष्ठा और सत्कर्मों के फलस्वरूप देवलोक से उनके लिए ये दिव्य स्वर्ण रथ आ चुके हैं, जो अब उन्हें उच्च लोकों की ओर ले जाएंगे।
श्लोक 14-16
`वैशंपायन उवाच। अश्वमेधे महायज्ञे स्वयंभुविहिते पुरा। हयस्य यानि चाङ्गानि संनिकृत्य यथाक्रमम्।। (1-87-14) होताऽध्वर्युरथोद्गाता ब्रह्मणा सह भारत। अग्नौ प्रास्यन्ति विधिवत्समस्ताः षोडशर्त्विजः।। (1-87-15) धूमगन्धं च पापिष्ठा ये जिघ्रन्ति नरा भुवि। विमुक्तपापाः पूतास्ते तत्क्षणेनाभवन्नराः।। (1-87-16)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— हे भारत! प्राचीनकाल में ब्रह्मा जी द्वारा विहित अश्वमेध महायज्ञ में घोड़े के अंगों को यथाक्रम काटकर होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्म समेत सभी सोलह ऋत्विजगण जिस प्रकार विधिपूर्वक अग्नि में आहुति देते थे, और उस यज्ञ के धुएँ की सुगंध को पृथ्वी पर जो भी पापी मनुष्य सूँघ लेते थे, वे उसी क्षण अपने सभी पापों से मुक्त होकर पवित्र हो जाते थे—
व्याख्या: वैशंपायन जी अश्वमेध यज्ञ की महिमा और उसके पवित्र प्रभाव का वर्णन करते हैं कि किस प्रकार महान यज्ञों का धुआँ और सुगंध आसपास के वातावरण और पापी मनुष्यों को भी तत्काल पवित्र कर देते हैं।
श्लोक 17-20
एतस्मिन्नन्तरे चैव माधवी सा तपोधना। मृगचर्मपरीताङ्गी परिधाय मृगत्वचम्।। (1-87-17) मृगैः परिचरन्ती सा मृगाहारविचेष्टिता। यज्ञवाटं मृगगणैः प्रविश्य भृशविस्मिता।। (1-87-18) आघ्रायन्ती धूमगन्धं मृगैरेव चचार सा। यज्ञवाटमटन्ती सा पुत्रांस्तानपराजितान्।। (1-87-19) पश्यन्ती यज्ञमाहात्म्यं मुदं लेभे च माधवी। असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं यदा।। (1-87-20)
हिंदी अनुवाद: ठीक उसी समय, तपस्या से संपन्न वह माधवी (ययाति की पुत्री) अपने शरीर पर मृगछाला (हिरण की खाल) लपेटे हुए, हिरणों के बीच रहकर उन्हीं के जैसा आहार और आचरण करती हुई, वहाँ यज्ञशाला में पहुँची। हिरणों के झुंड के साथ यज्ञ-मंडप में प्रवेश करके वह अत्यंत विस्मित हुई। यज्ञ के धुएँ की गंध को सूँघती हुई और हिरणों के साथ घूमती हुई जब उसने अपने उन सभी अजय पुत्रों (अष्टक आदि) को वहाँ देखा, तो यज्ञ के उस महान प्रभाव को देखकर उसे अपार प्रसन्नता हुई। इसके बाद, जब उसने नहुष पुत्र राजा ययाति को देखा जो पृथ्वी को स्पर्श नहीं कर रहे थे (दिव्य रूप में हवा में स्थित थे)—
व्याख्या: यहाँ ययाति की पुत्री माधवी का प्रसंग आता है, जो तपस्विनी बनकर वनों में रह रही थी। वह संयोगवश उसी यज्ञ-भूमि पर पहुँचती है, जहाँ उनके पुत्र (अष्टक आदि) और उनके पिता ययाति उपस्थित हैं।
श्लोक 21-22
दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा। तदा वसुमनापृच्छन्मातरं वै तपस्विनीम्।। (1-87-21) भवत्या यत्कृतमिदं वन्दनं पादयोरिह। कोयं देवोपमो राजा याऽभिवन्दसि मे वद।। (1-87-22)
हिंदी अनुवाद: दिव्य लोक को प्राप्त हुए और आकाश में स्थित अपने पिता (ययाति) को जानकर माधवी ने तुरंत उनके चरणों में प्रणाम किया। तब वसुमान ने अपनी उस तपस्विनी माता माधवी से पूछा— 'हे माता! आप जिनके चरणों में प्रणाम कर रही हैं, यह देवताओं के समान तेजस्वी राजा कौन हैं? हमें बताइए।'
व्याख्या: माधवी अपने पिता ययाति को पहचानकर उन्हें सादर नमन करती है। यह देखकर वसुमान को जिज्ञासा होती है कि उनकी माता जिस दिव्य पुरुष को प्रणाम कर रही हैं, वे आखिर कौन हैं।
श्लोक 23-24
माधव्युवाच। शृणुध्वं सहिताः पुत्रा नाहुषोयं पिता मम। ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति स्मृतः।। (1-87-23) पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गतः। केन वा कारणेनैवमिह प्राप्तो महायशाः।। (1-87-24)
हिंदी अनुवाद: माधवी ने कहा— हे पुत्रो! तुम सब मिलकर सुनो। ये मेरे पिता और नहुष के पुत्र राजा ययाति हैं, जो तुम सब पुत्रों के नाना (मातामह) कहे जाते हैं। इन्होंने मेरे भाई पुरु को राज्य पर बैठाकर स्वर्ग की यात्रा की थी। किंतु अब यह महायशा राजा किस कारण से यहाँ इस प्रकार पधारे हैं?
व्याख्या: माधवी अपने पुत्रों (अष्टक, वसुमान आदि) को परिचय देती है कि वे जिनकी वंदना कर रही हैं, वे और कोई नहीं बल्कि उनके अपने नाना, महान राजा ययाति हैं।
श्लोक 25
वैशंपायन उवाच। तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स्वर्गाद्भ्रष्टेति चाब्रवीत्। सा पुत्रस्य वचः श्रुत्वा संभ्रमाविष्टचेतना।। (1-87-25)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— माधवी की वह बात सुनकर और यह जानने पर कि वे स्वर्ग से भ्रष्ट (नीचे गिरे) होकर आए हैं, उसके पुत्रों के मन में संभ्रम और व्याकुलता छा गई।
व्याख्या: जब माधवी और उसके पुत्रों को यह पता चलता है कि उनके नाना ययाति का स्वर्ग से पतन हुआ है और वे पुण्य क्षीण होने के कारण नीचे आए हैं, तो वे सब अत्यंत विचलित और आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
श्लोक 26-27
माधवी उवाच। माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम्। तपसा निर्जिताँल्लोकान्प्रतिगृह्णीष्व मामकान्।। (1-87-26) पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम्। स्वार्थणेव वदन्तीह ऋषयो धर्मपाठकाः। तस्माद्दानेन तपसा चास्माकं दिवमाव्रज।। (1-87-27)
हिंदी अनुवाद: माधवी ने अपने पुत्रों (दौहित्रों) से घिरे हुए अपने पिता से कहा— 'पिता जी! आप मेरी तपस्या से जीते गए इन लोकों को स्वीकार कीजिए। धर्म के ज्ञाता ऋषि लोग ऐसा कहते हैं कि पुत्रों और पौत्रों (तथा दौहित्रों) द्वारा धर्मपूर्वक अर्जित धन अपना ही होता है। इसलिए हमारे द्वारा दिए गए इस दान और तपस्या के प्रभाव से आप पुनः स्वर्ग को प्रस्थान कीजिए।'
व्याख्या: पुत्री माधवी अपने पिता ययाति के संकट को देखकर आगे आती है। वह शास्त्रसम्मत तर्क देती है कि दौहित्रों (नाती-नवासियों) के द्वारा अर्जित पुण्य वस्तुतः नाना के अपने ही परिवार के धन के समान होते हैं, इसलिए ययाति को संकोच छोड़कर उनका पुण्य स्वीकार कर लेना चाहिए।
श्लोक 28-33
ययातिरुवाच। यदि धर्मफलं ह्येतच्छोभनं भविता तव। दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितोऽहं महात्मभिः।। (1-87-28) तस्मात्पवित्रं दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके। त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।। (1-87-29) त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम्। भोक्तारः परिवेष्टारः श्रावितारः पवित्रकाः।। (1-87-30) दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभवति भास्करे। स कालः कुतपो नाम पितॄणां दत्तमक्षयम्।। (1-87-31) तिलाः पिशाचाद्रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात्। रक्षन्ति श्रोत्रियाः पङ्क्तिं यतिभिर्भुक्तमक्षयम्।। (1-87-32) लब्ध्वा पात्रं तु विद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम्। स कालः कालतो दत्तं नान्यथा काल इष्यते।। (1-87-33)
हिंदी अनुवाद: ययाति ने कहा— 'यदि इससे तुम्हारा धर्म-फल श्रेष्ठ होता है, तो पुत्री और इन महात्मा दौहित्रों द्वारा आज मैं तार दिया गया हूँ। इसलिए आज से श्राद्ध आदि पैतृक कार्यों में दौहित्र को अत्यंत पवित्र माना जाएगा। श्राद्ध में तीन वस्तुएँ सबसे पवित्र होती हैं—दौहित्र, कुतप (दोपहर का समय) और काले तिल। इसके अतिरिक्त श्राद्ध में तीन बातें प्रशंसनीय हैं—पवित्रता (शौच), अक्रोध (क्रोध न करना) तथा उतावलापन न होना (अत्वरा)। भोजन कराने वाले, परोसने वाले और मंत्रों का उच्चारण करने वाले—ये सभी पवित्र होने चाहिए। दिन का आठवाँ भाग (दोपहर का समय), जब सूर्य का तेज कुछ मंद पड़ता है, 'कुतप काल' कहलाता है; इस समय पितरों को दिया गया दान अक्षय होता है। तिल पिशाचों से बचाते हैं, दर्भ (कुशा) राक्षसों से रक्षा करते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण पंकित की रक्षा करते हैं और यतियों द्वारा खाया गया भोजन अक्षय फल देता है। विद्वान, श्रोत्रिय, व्रती और पवित्र पात्र को पाकर उचित समय पर जो दान दिया जाता है, वही सच्चा काल-दान कहलाता है।'
व्याख्या: ययाति पुत्री और दौहित्रों का प्रेम स्वीकार करते हुए श्राद्ध और दान से जुड़ी सनातन धर्म की महत्वपूर्ण परंपराओं (जैसे श्राद्ध में दौहित्र का महत्व, कुतप काल, और तिलों की महत्ता) की स्थापना करते हैं।
श्लोक 34-36
वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान्। सर्वे ह्यवभृथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात्।। (1-87-34) अष्टक उवाच। आतिष्ठ स्वरथं राजन्विक्रमस्व विहायसम्। वयमप्यनुयास्यामो यदा कालो भविष्यति।। (1-87-35) ययातिरुवाच। सर्वैरिदानीं गन्तव्यं सह स्वर्गजितो वयम्। एष नो विरजाः पन्था दृश्यते देवसद्मनः।। (1-87-36)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— बुद्धिमान ययाति ऐसा कहकर फिर बोले कि तुम सब अवभृथ स्नान कर चुके हो, अब कार्य के गौरव (महत्व) को समझकर शीघ्रता करो। अष्टक ने कहा— 'हे राजन्! आप अपने रथ पर सवार होकर आकाश की ओर प्रस्थान कीजिए, उचित समय आने पर हम सब भी आपका अनुसरण करेंगे।' ययाति ने उत्तर दिया— 'हम सबने मिलकर स्वर्ग जीता है, इसलिए अब हम सबको एक साथ ही चलना चाहिए। देखो, यह देवलोक का निर्मल और पापरहित मार्ग हमारे सामने दिखाई दे रहा है।'
व्याख्या: ययाति और सभी राजर्षि अब स्वर्ग लौटने के लिए तैयार हैं। ययाति अकेले जाने के बजाय अपने सभी पौत्रों व दौहित्रों (अष्टक, शिबि, प्रतर्दन, वसुमान) को साथ लेकर दिव्य रथों द्वारा एक साथ देवलोक की यात्रा करने का निर्णय लेते हैं।
श्लोक 37-38
वैशंपायन उवाच। अष्टकश्च शिबिश्चैव काशेयश्च प्रतर्दनः। ऐक्ष्वाकवो वसुमनाश्चत्वारो भूमिपास्तदा। सर्वे ह्यवभृथस्नाताः स्वर्गताः साधवः सह।। (1-87-37) तेऽधिरुह्य रथान्सर्वे प्रयाता नृपस्तमाः। आक्रमन्तो दिवं भाभिर्धर्मेणावृत्य रोदसी।। (1-87-38)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— अष्टक, शिबि, काशीराज प्रतर्दन और इक्ष्वाकु वंश के वसुमान—ये चारों श्रेष्ठ भूमिपति (राजा) अवभृथ स्नान करके साधुओं के साथ स्वर्गगामी हुए। वे सभी नृपश्रेष्ठ अपने-अपने दिव्य रथों पर सवार होकर तथा अपनी कांति (तेज) से आकाश और पृथ्वी को धर्ममय बनाते हुए स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गए।
व्याख्या: महान यज्ञ और सत्कर्मों के प्रभाव से सभी राजा अपने दिव्य रथों पर बैठकर स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान करते हैं, जिससे दसों दिशाएँ उनके तेज से आलोकित हो उठती हैं।
श्लोक 39-42
अष्टक उवाच। अहं मन्ये पूर्वमेकोऽस्मि गन्ता सखा चेन्द्रः सर्वथा मे महात्मा। कस्मादेवं शिबिरौशीनरोऽय- मेकोऽत्यगात्सर्ववेगेन वाहान्।। (1-87-39) ययातिरुवाच। अददद्याचमानाय यावद्वित्तमविन्दत। उशीनरस्य पुत्रोऽयं तस्माच्छ्रेष्ठोहि वः शिबिः।। (1-87-40) दानं तपः संत्यमथाऽपि धर्मो ह्रीः श्रीः क्षमा सौम्यमथो विधित्सा। राजन्नेतान्यप्रमेयाणि राज्ञः शिबेः स्थितान्यप्रतिमस्य बुद्ध्या।। (1-87-41) एवं वृत्तो ह्रीनिषेवश्च यस्मा- त्तस्माच्छिबिरत्यगाद्वै रथेन। (1-87-42)
हिंदी अनुवाद: अष्टक ने मार्ग में आश्चर्य से पूछा— 'मैं तो यह समझता था कि सबसे पहले मैं ही स्वर्ग पहुँचूँगा, क्योंकि महात्मा इंद्र हर प्रकार से मेरे सखा हैं। किंतु उशीनर पुत्र यह शिबि अपने घोड़ों को सबसे अधिक वेग से भगाकर हम सबसे आगे कैसे निकल गया?' ययाति ने उत्तर दिया— 'याचकों को अपनी सारी संपत्ति बिना संकोच के दान कर देने के कारण उशीनर पुत्र शिबि तुम सब में श्रेष्ठ है। दान, तप, सत्य, धर्म, लज्जा (विनम्रता), श्री, क्षमा, सौम्य स्वभाव और कर्तव्यपरायणता—ये सभी अपूर्व गुण अद्वितीय बुद्धि वाले राजा शिबि में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। इसी श्रेष्ठ आचरण और लज्जा-शीलता के कारण शिबि अपने रथ से सबसे आगे निकल गए हैं।'
व्याख्या: अष्टक के मन में यह जिज्ञासा होती है कि उनके रहते हुए राजा शिबि का रथ सबसे आगे कैसे निकल गया। तब ययाति शिबि की अतुलनीय दानशीलता, त्याग और सदाचार के गुणों का बखान करते हुए समझाते हैं कि वे अपने श्रेष्ठ कर्मों के कारण ही अग्रगामी हैं।
श्लोक 43-49
वैशंपायन उवाच। अथाष्टकः पुनरेवान्वपृच्छ- न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम्।। (1-87-42c) पृच्छामि त्वां नृपते ब्रूहि सत्यं कुतश्च कश्चासि सुतश्च कस्य। कृतं त्वया यद्धि न तस्य कर्ता लोके त्वदन्यः क्षत्रियो ब्राह्मणो वा।। (1-87-43) ययातिरुवाच। ययातिरस्मि नहुषस्य पुत्रः पूरोः पिता सार्वबौमस्त्विहासम्। गुह्यं चार्थं मामकेभ्यो ब्रवीमि मातामहोऽहं भवतां प्रकाशम्।। (1-87-44) सर्वामिमां पृथिवीं निर्जिगाय दत्त्वा प्रतस्थे विपिनं ब्राह्मणेभ्यः। मेध्यानश्वानेकशतान्सुरूपां- स्तदा देवाः पुण्यभाजो भवन्ति।। (1-87-45) अदामहं पृथिवीं ब्राह्मणेभ्यः पूर्णामिमामखिलां वाहनेन। गोभिः सुवर्णेन धनैश्च मुख्यै- स्तदाऽददं गाः शथमर्बुदानि।। (1-87-46) सत्येन मे द्यौश्च वसुन्धरा च तथैवाग्निज्वर्लते मानुषेषु। न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं सत्यं हि सन्तः प्रतिपूजयन्ति।। (1-87-47) यदष्टक प्रब्रवीमीह सत्यं प्रतर्दनं चौषदश्विं तथैव। सर्वे च लोका मुनयश्च देवाः सत्येन पूज्या इति मे मनोगतम्।। (1-87-48) यो नः स्वर्गजितः सर्वान्यथावृत्तं निवेदयेत्। अनसूयुर्द्विजाग्र्येभ्यः स लभेन्नः सलोकताम्।। (1-87-49)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— इसके बाद इंद्र के समान तेजस्वी अपने नाना अष्टक ने पुनः कौतूहलवश पूछा—'हे नृपते! मैं आपसे सत्य पूछता हूँ, आप कौन हैं और किसके पुत्र हैं? आपने संसार में ऐसा कौन-सा महान कार्य किया है, जो आपके सिवा दूसरा कोई क्षत्रिय या ब्राह्मण आज तक नहीं कर सका?' ययाति ने उत्तर दिया— 'मैं नहुष का पुत्र, पुरु का पिता और इस पृथ्वी का सार्वभौम सम्राट ययाति हूँ। मैं अपने प्रियजनों के सामने यह गुप्त रहस्य प्रकट कर रहा हूँ कि मैं स्पष्ट रूप से तुम सबका नाना हूँ। मैंने इस संपूर्ण पृथ्वी को जीतकर ब्राह्मणों को दान कर दिया और स्वयं वन में चला गया। मैंने ब्राह्मणों को घोड़ों, गायों, सोने और मुख्य धनों से परिपूर्ण यह सारी पृथ्वी अर्पण की थी। मेरे सत्य के प्रभाव से ही यह द्युलोक, पृथ्वी और मनुष्यों के बीच प्रज्वलित रहने वाली अग्नि सदा शुद्ध रूप से चमकती है। मेरा कभी कोई वचन झूठा नहीं होता, क्योंकि सत्पुरुष हमेशा सत्य का आदर करते हैं। हे अष्टक, प्रतर्दन और वसुमान! मैं जो यह कह रहा हूँ, वह पूर्णतः सत्य है। संपूर्ण लोक, मुनि और देवता सत्य से ही पूजनीय हैं—ऐसा मेरा विचार है। जो मनुष्य हम सभी स्वर्ग-विजेताओं के इस इतिहास को ईर्ष्या-रहित होकर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समक्ष सुनाएगा, वह हमारे ही समान लोक (सलोकता) को प्राप्त करेगा।'
व्याख्या: ययाति अपने महान कुल, अपनी चक्रवर्ती सम्राट की स्थिति, उनके द्वारा किए गए विशाल दान और सबसे बढ़कर उनके 'सत्य व्रत' के प्रभाव का गौरवपूर्ण वर्णन करते हैं। वे अंत में यह भी घोषणा करते हैं कि इस पवित्र संवाद को जो भी श्रद्धापूर्वक सुनता या सुनाता है, वह भी उनके समान दिव्य गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 50
वैशंपायन उवाच। एवं राजा स महात्मा ह्यतीव स्वैर्दौहित्रैस्तारितोऽमित्रसाह। त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा स्वर्गं गतः कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम्।। (1-87-50)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं— शत्रुओं को जीतने वाले वे महामनस्वी राजा ययाति इस प्रकार अपने ही दौहित्रों (नाती-नवासियों) द्वारा उतारे (तारे) गए। परमोदार कर्म करने वाले तथा अपनी कीर्ति से पृथ्वी को व्याप्त कर देने वाले वे राजा ययाति सब कुछ त्यागकर पुनः स्वर्ग को प्राप्त हो गए।
व्याख्या: इस प्रकार महाभारत के आदि पर्व के अंतर्गत आने वाला यह प्रसिद्ध ययाति-चरित्र और उनके संतानों/दौहित्रों के साथ हुआ यह संवाद संपन्न होता है, जो त्याग, सत्य, दान और पारिवारिक प्रेम का एक अद्भुत आध्यात्मिक संदेश देता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि सप्ताशीतितमोऽध्यायः।। 87 ।।
